Sunday, 12 August 2018

हरिपाल त्यागी की लघुकथाएँ

॥ 1॥ आस्था
अपने चौर्य-कर्म से पहले ईश्वर-आराधना उसके लिए जरूरी थी, ताकि भगवान की कृपा से वह अपने कार्य में सफलता प्राप्त कर सके। सही मौका देखकर एक रात वह चारदीवारी फाँदकर मंदिर में जा घुसा और सोने के फ्रेम में जड़ी भगवान की तस्वीर के आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

हरिपाल त्यागी
         ‘फ्रेम में सोने की मात्रा आधा किलोग्राम से कम तो नहीं होगी।’—उसने अनुमान लगाया; और मन ही मन प्रार्थना की :
         ‘प्रभु, अपने पेशे की मजबूरी के कारण फिलहाल मैं आपकी खास इज्जत नहीं कर पा रहा हूँ, इसके लिए मुझे क्षमा करेंगे और मुझे मेरे कार्य में सफलता का वरदान भी देंगे। प्रभु, आप से क्या छुपा है, आप तो अंतर्यामी हैं।’
         चोर ने भगवान को अभय-मुद्रा में सीने पर हाथ उठाये देखा। इसके बाद उसने तस्वीर को फ्रेम से अलग किया और सिर्फ फ्रेम को ही अपने काम की चीज समझा। जब वह चलने को हुआ, तभी शंख-घंटे-घड़ियाल बजाते हुए भक्तों का दल मंदिर के द्वार पर आ पहुँचा।
         चोर ने घबराकर अपनी गरदन फ्रेम में डाल दी। पद्मासन लगाकर वह वहीं एक स्तंभ से सटकर बैठ गया।
         वह दिन था और आज का दिन है, चोर उसी स्थान पर डटा हुआ मूर्तिमान है; लेकिन आस्थावान लोग हैं कि उसी की पूजा करते आ रहे हैं।

॥ 2 ॥ दामाद
वह एक चोर था, पर था बहुत शातिर। कई दिनों से एक घर के आस-पास चक्कर लगा रहा था। असल में, मकान की खिड़की पर एक लड़की पढ़ाई करती थी। उसे खिड़की से बाहर के दृश्य बहुत प्रिय थे। उन्हीं दृश्यों में एक मानव-आकृति भी शामिल हो गयी जो उसी चोर की थी।
         तुम कौन हो और यहाँ क्यों घूमते रहते हो/ लड़की ने पूछा।
         चोर ने बिल्कुल झूठ नहीं बोला। उत्तर में एक पुराना फिल्मी गीत गा दिया—
                           मैं चोर हूँ काम है चोरी, दुनिया में हूँ बदनाम,
                           दिल को चुराने हूँ मैं आया, यही है मेरा काम।
         कुछ दिनों बाद ही चोर लड़की को उड़ा ले जाने में कामयाब हो गया। यही नहीं, लड़की को आगे करके उसने उसके पिता से जरूरी सामान की माँग भी की। बेटी की सुख-सुविधा को ध्यान में रखते हुए लड़की के माता-पिता ने आपस में सलाह करके चोर की माँग स्वीकार कर ली। अब वह, इस घर का सम्मानित ‘दामाद’ जो था।  

॥ 3 ॥ उसका ठिकाना
मंदिर वाली गली के नुक्कड़ पर वह अचानक मुझसे टकरा गया। घुप्प अंधेरे की वजह से मैं उसे ठीक-से पहचान नहीं पाया; लेकिन शायद उसने मुझे पहचान लिया था, वर्ना वह भागते-भागते ठिठकता क्यों?
         “ओह, सॉरी!” उसने अपनी उखड़ी साँस को सम पर लाते हुए कहा, “मैं मुसीबत में हूँ… वे मेरे पीछे पड़े हैं… मुझे छुपने के लिए जगह चाहिए, और आपा मेरी रक्षा कर सकते हैं!”
         “लेकिन आप हैं कौन? …और कौन हैं वे लोग, जो तुम्हारे पीछे पड़े हैं?”
         “यह समय सवाल-जवाब का नहीं है। जल्दी-से मुझे… !”
         अँधेरे में भौतिक चक्षुओं के बजाय मैंने अंतर्दृष्टि से काम लेना शुरू किया। तब उसकी एक झलक मिली—वह दीवाली के कैलेंडर से प्रकट हुआ किसी पुराने राजसी घराने का मालूम होता था। मुझे उसका चेहरा कुछ जाना-पहचाना सा लगा। फिर भी, वह किसी तयशुदा चेहरे से मेल खाता नहीं लग रहा था। बदली हुई कल्पना की उपज ही था।
फिलहाल वह बदहवास और काफी घबराया हुआ था। लगा, कि आदत के अनुसार, उसने कुछ मुस्कराने की कोशिश की है। लेकिन यह मेरा भ्रम भी हो सकता था। आखिर संकट की ऐसी घड़ी में कोई मुस्करा कैसे सकता है!
मैं उसे लेकर अपनी चित्रशाला की तरफ मुड़ा। मन में डर था, कि कहीं यह आतंकी न हो!… या फिर, कैदखाने से फरार कोई संगीन मुजरिम भी हो सकता है… या… या…।
दिमाग ठीक-से काम नहीं कर पा रहा था। मैं सोच नहीं पा रहा था कि क्या उचित है, क्या अनुचित? दूर, गली में, धप्-धप् के साथ शोर-गुल बढ़ रहा था। वे उसी भगोड़े की खोज में धमा-चौकड़ी मचा रहे थे।
आखिरकार, दुनियाभर की नजरों से बचता-बचाता मैं उसे अपनी चित्रशाला तक ले आने में कामयाब हो गया। अब वह नये कला-रूप में मेरे चित्रों में छुपा है।
और लोग हैं कि गली-मुहल्लों के, मंदिरों-मस्जिदों के चक्कर काटते फिर रहे हैं!
                                                                                मो 88600 78079

Monday, 16 July 2018

परिंदों के दरमियां : पत्रात्मक प्रतिक्रिया-2 / डॉ. कुंकुम गुप्ता

कृति की सफलता उसके पाठकों के संतोष में निहित होती है। 'परिंदों के दरमियां' पर लगातार उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रियाएँ मिल रही हैं। अभी-अभी भोपाल निवासी आ. डॉ. कुंकुम गुप्ता की प्रतिक्रिया रजिस्टर्ड डाक से मिली है। आभारी हूँ। प्रस्तुत है उनका कथन :

आदरणीय बंधु
नमस्कार।
कांता राय द्वारा (प्रदत्त) आपकी पुस्तक 'परिंदों के दरमियां' पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, साथ ही लघुकथा की बारीकियाँ भी सीखने को मिलीं। मेरे मन में जो प्रश्न थे, उनके उत्तर भी अन्य प्रश्नकर्ताओं के प्रश्न में समाहित थे जिनका उत्तर आपकी पुस्तक पढ़कर मिल गया।
डॉ॰ कुंकुम गुप्ता
        मेरी, भोपाल की बहिनों के प्रश्न और उनकी लघुकथाओं का उल्लेख करना मेरे लिए गर्व की बात है। कुछ बातें, जो मन को अच्छी लगीं, उनका उल्लेख करना आवश्यक समझती हूँ :
1. विधा की जीवंतता और रचना की कालातीतता के लिए जरूरी है कि हम सिर्फ अनुशासन सीखें, साष्टांग बिछ जाना नहीं।
2. प्रतियोगिता के विषय पर लिखें अवश्य, लेकिन भेजने की आतुरता से बचें।
3. 'बाजारवाद' पर रोहिणी अग्रवाल की टिप्पणी सटीक है।
4. लघुकथाकार पात्रों के परस्पर संवादों, मनोभावों और द्वंद्व के माध्यम से दृश्य निर्माण करता है।
5. कथ्य का संवेदन-बिंदु कागज पर पूर्णता कब पाता है, यह महत्वपूर्ण बात है।
6. मानवीय मूल्यों का संरक्षण साहित्य का मुख्य उद्देश्य है।
7. उच्च-स्तरीय अध्ययन हमारे लेखन में उबाल भी पैदा करता है और एक दिशा भी देता है।
8. लघुकथाकार को संकेत की भाषा, व्यंजना की भाषा स्वयं में अवश्य विकसित करनी चाहिए।
9. अमर्यादित भाषा कोई भी साहित्य-प्रेमी स्वीकार नहीं करता।
10. नयी भावभूमि का चयन करना बेहतर है।
11. लघुकथा इंसटेंट लेखन नहीं है।
       कांता राय, कल्पना भट्ट, लता अग्रवाल, नीना (सिंह) सोलंकी, नयना (आरती)  कानिटकर की लघुकथाएँ शामिल कीं, यह प्रसन्नता की बात है।
        मैं तो इस विधा में नया कदम रख रही हूँ। यह विधा सामयिक एवं प्रभावी लगती है। पुस्तक पढ़कर आपके द्वारा दिये गये उत्तरों से आपकी अध्ययनशीलता तथा विधा के प्रति गहन चिंतन स्पष्ट झलकता है। आगे भी आपसे मार्गदर्शन की अपेक्षा रहेगी। 
     ◆ कुंकुम गुप्ता, भोपाल

Monday, 9 July 2018

परिंदों के दरमियां : बुक शेल्‍फ की शोभा मत बनाइए, पढ़ डालिए, रोज पढ़िए / राजेश उत्साही


राजेश उत्साही


लघुकथा पर केन्द्रित बलराम अग्रवाल जी की पुस्‍तक ‘परिंदों के दरमियां’ अपन को भी प्राप्‍त हो गई है।
बलराम जी ने अपनी पिछली बेंगलूरु यात्रा में मुलाकात के समय किताब की तैयारी का जिक्र किया था। तब वे इसके आवरण को अन्तिम रूप देने में जुटे थे। अब किताब प्रकाशित हो गई है। इन्‍दौर के क्षितिज लघुकथा सम्‍मेलन में इसका विमोचन हो गया है।
लघुकथा लेखन और अध्‍ययन करने वालों के लिए यह एक नायाब किरताब बनी है, इसमें कोई शक नहीं है। इसे पढ़ते हुए मुझे बार-बार डॉ.भोलानाथ तिवारी की पुस्‍तक ‘अच्‍छी हिन्‍दी- कैसे बोलें,कैसे लिखें’ याद आती रही। यह पुस्‍तक पिछले पच्‍चीस वर्षों से सन्‍दर्भ के लिए मेरी टेबिल पर हर वक्‍त सामने रखी होती है। बलराम जी ‘परिंदों के दरमियां’ भी लघुकथा के सन्‍दर्भ में इसी श्रेणी की पुस्‍तक है। इस क्रम में अशोक भाटिया जी की ‘परिंदे पूछते हैं’ को भी रखा जाना चाहिए।
‘परिंदों के दरमियां’ के अन्‍दर के पृष्‍ठों पर तो महत्‍वपूर्ण बातें हैं ही। पर मेरा मत है कि केवल लघुकथा लेखक ही नहीं, बल्कि हर तरह का साहित्‍य रचने वालों के लिए सबसे महत्‍वपूर्ण बात किताब के फ्लैप पर ही दी गई है।
वह इस तरह है —
‘‘साहित्‍य सदा ही ‘स्‍वांत: सुखाय’ होता है, कोई माने या न माने। हाँ, इतना जरूर है कि लेखक का ‘अंत:करण’ जितना व्‍यापक होगा, रचनाशीलता भी उतनी ही व्‍यापक होगी, स्‍वमेय ही ‘परहिताय’ बनेगी। लेखक का ‘अंत:करण’ जितना संकुचित होगा, रचनाशीलता भी उतनी ही संकुचित रहेगी। कुछ रचनाएँ बाहरी तौर पर जितनी आकर्षक होती हैं, भीतरी तौर पर उतनी ही घातक हो सकती हैं। कुल मिलाकर, स्‍वयं की दृष्टि से स्‍वयं के लिए लिखिए, यह मानते हुए कि आप एक मानवीय इकाई हैं, न कि साम्‍प्रदायिक। यही मानते हुए स्‍वयं की दृष्टि से स्‍वयं के लिए लिखिए, किसी दूसरे के लिए नहीं। दूसरी बात, ’विचार’ में पैनापन और ‘दृष्टि’ में प्रगतिशीलता को पनपाइए। जड़ों से जुड़ने या जुड़ा रहने के मुहावरे को हमने परम्‍परा और रीति-रिवाजों से चिपके रहना मान लिया है, जबकि उनसे चिपके रहना अनेक बार ‘जड़ता’ का ही द्योतक बन जाता है।’’
बलराम जी के इस कथन पर गम्‍भीरता से ध्‍यान दिया जाना चाहिए। लघुकथा लेखकों को तो मेरी सलाह है कि हर बार नई लघुकथा लिखने से पहले एक बार इस कथन को अवश्‍य ही याद कर लें, पढ़ लें। अच्‍छा होगा कि इसका एक पोस्‍टर बनाकर अपने अध्‍ययन कक्ष में लगा लें। वैसे बार-बार पढ़ने पर कुछ समय बाद यह आपके मस्तिष्‍क में ही अंकित हो जाएगा। वैसे जरूरत इस बात की भी है कि इसे ज्‍यों का त्‍यों न मान लें। इसे परत-दर-परत खोलकर भी देखें।
‘परिंदों के दरमियां’ में 37 लोगों द्वारा पूछे गए सवालों के उत्‍तर हैं। उन उत्‍तरों में 38 लघुकथाओं का सन्‍दर्भ है।
पूछे गए सवाल ज्‍यादातर आम सवाल ही हैं। वे अशोक भाटिया जी की पुस्‍तक में भी थे। अशोक जी ने भी अपनी पुस्‍तक में उत्‍तरों को समझाने के लिए लघुकथाओं और अन्‍य सन्‍दर्भों का उपयोग किया है। ‘परिंदों के दरमियां’ में इसका उपयोग और बेहतर ढंग से किया गया है।
जब-तब यह बात उठती रहती है कि लेखन के साथ-साथ अध्‍ययन भी जरूरी है। और केवल लघुकथाओं का अध्‍ययन नहीं, सभी तरह का, उससे इतर भी। ‘परिंदों के दरमियां’ में बलराम जी ने रघुवीर सहाय, राजेन्‍द्र यादव,नरेन्‍द्र कोहली के विस्‍तृत लेखों और दिनेश कुमार तथा रोहिणी अग्रवाल की संक्षिप्‍त टिप्‍पणियों का उपयोग किया है। मेरी सलाह है कि तीनों लेखों को बहुत ध्‍यान से पढ़ा जाना चाहिए, केवल सरसरी निगाह से नहीं। इनमें कई सारी काम की ही नहीं, विमर्श की बातें भी हैं।
उत्‍तरों को पुष्‍ट करने के लिए विभिन्‍न लेखकों की लघुकथाएँ दी गई हैं। लघुकथाओं की खूबियों के बारे में भी बताया गया है। लेकिन कुछ जगहों पर शायद थोड़े और खुलासे की जरूरत मुझे महसूस हुई।
जैसे लेखकीय दायित्‍वबोध की चर्चा करते हुए तीन लघुकथाओं के उदाहरण दिए गए हैं। जिन दो रचनाओं के बारे में यह कहा गया है वे लेखकीय दायित्‍यबोध की कमी से ग्रसित हैं, उन पर और अधिक चर्चा की जरूरत थी। केवल रचनाएँ पढ़ने भर से ही यह बात समझ नहीं आती है। अव्‍वल तो जिसमें लेखकीय दायित्‍व निभाने की बात है, उसमें भी।
लघुकथा (अपनी या किसी अन्‍य की भी) की समीक्षा कैसे की जाए, उसके क्‍या मानक हैं या हों। इन सब पर सवालों के उत्‍तरों के बीच-बीच में तमाम सूत्र हैं। जैसे कि –
• ‘सैल्‍फ ऐसेस्‍मेंट’ यानी ‘आत्‍म अवलोकन’...‘आत्‍म निरीक्षण’ से बड़ा न कोई अन्‍य आलोचक हो सकता है न गुरु।
• जो रचनाकार स्‍व-आलोचना और स्‍व-समीक्षा के मार्ग से गुजरने का अभ्‍यस्‍त नहीं है,परिपक्‍वता की मंजिल तक उसका पहुँचना संदिग्‍ध हो सकता है; साथ ही, बाह्य-आलोचना और बाह्य-समीक्षा को समझने व सहने का विवेक उसमें नहीं पनप सकेगा,ऐसा मेरा (बलराम जी का) मानना है।
• अपनी खुद की रचना को उत्‍कृष्‍ट बनाने के लिए उसे यथेष्‍ट अन्‍तरालों के बाद बार-बार पढ़ना और सम्‍पादित करना चाहिए।
• ‘बयान’ का नहीं लेखन का ‘सपाट’ होना कमजोरी है।
• लघुकथा का मूल उद्देश्‍य उद्बोधन और उत्‍प्रेरण है। वह अगर दुखांत से आता है तो उसी से आने देना चाहिए।
• लघुकथा लेखक सिर्फ इशारा करता है,व्‍याख्‍या नहीं।
• अपने अन्‍दर बैठे आलोचक पर विश्‍वास करें। उसे समय-समय पर सही खुराक देते रहें ताकि वह स्‍वस्‍थ्‍य बना रहे।
• लघुकथा पूर्ण होने में उतना ही समय लगता है, जितने में लेखक स्‍वयं आश्‍वस्‍त हो।
• जिसे हम ‘घटना’ कहते हैं, उसके सच से कई बार अपरिचित होते हैं।
• संकेत को लिखना ही नहीं,समझना भी कला है; और इस कला से सिर्फ लेखक को ही नहीं,पाठक और समीक्षक/ आलोचक को भी परिचित रहना चाहिए, स्‍वयं में इसका विकास करना चाहिए।
• समीक्षा बौद्धिक कर्म है, बिलकुल वैसे जैसे सृजन मनो-बौद्धिक कर्म है। समीक्षा की कसौटी नि:संदेह विवेक है, मन की भूमिका उसमें गौण रहनी चाहिए।
• व्‍यक्तिगत सम्‍बन्‍धों के निर्वहन के बावजूद समीक्षा को पाद-पूजा के स्‍तर तक गिर नहीं जाना चाहिए। यही बात व्‍यक्तिगत द्वेष की भावना पर भी लागू होती है।
• लघुकथा लेखन में सबसे पहली चीज नि:संदेह ‘मूल्‍य’ ही है। और तथ्‍य से भी बड़ी बात है कथ्‍य की विश्‍वसनीयता।
• आज के समीक्षक को इतना अधिक सैद्धांतिक और शास्‍त्रीय होने की आवश्‍यकता नहीं है। आज की लघुकथा ही यर्थाथवादी है तो उसके आलोचक को भी व्‍यवहारवादी ही होना श्रेयस्‍कर है।
• सृजन-कर्म की यदि तटस्‍थ भाव से समीक्षा/आलोचना की गई हो तो सम्‍बन्धित लेखक ही नहीं, उसके आजू-बाजू वाले,यहाँ तक कि अन्‍य समीक्षक और आलोचक भी बहुत-कुछ सीख जाते हैं। सुधार की प्रक्रिया हमेशा ग्रहण करने की नीयत से जुड़ी होती है। ग्रहण करने की नीयत न हो, और रचनाकार अथवा समीक्षक/आलोचक स्‍वयं को दूसरों की तुलना में बेहतर और अधिक जानकार अथवा नि:कृष्‍ट और निर्बुद्ध मानकर चलता रहे तो सुधार की गुंजाइश लेशमात्र भी नहीं बनती है।
‘परिंदों के दरमियां’ में ‘समीक्षक की कसौटी’ पर बलराम अग्रवाल जी से डॉ. लता अग्रवाल की सारगर्भित बातचीत भी है। लघुकथा की समीक्षा में रुचि रखने वालों को इसे अवश्‍य ही पढ़ना चाहिए।
किताब के अन्‍त में 21 वीं सदी की 22 लघुकथाएँ भी दी गई हैं। उनके आरम्‍भ में ही दी गई टिप्‍पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि उसमें हर स्‍तर की लघुकथाएँ हैं। एक मजेदार अवलोकन मैंने यह किया कि 22 में केवल 4 पुरुष लेखक ही इसमें हैं।
तो अगर आपके पास ‘परिंदों के दरमियां’ है तो उसे केवल अपनी बुक शेल्‍फ की शोभा मत बनाइए, पढ़ डालिए, रोज पढि़ए। जिनके पास नहीं है, उन्‍हें मेरी सलाह है कि वे इसे तुरन्‍त हासिल करें।
Rajesh utsahi : Editor(Hindi),Teachers of India Portal,
Azim Premji University, Pixal Park,
B-Block PES Institute of Technology South Campus,
Electronics City, Hosur Road (Beside NICE Road),
 BANGLORE 560 100
Mo * 09731788446