Thursday 2 March 2017

सुषमा गुप्ता की लघुकथाएँ



राजनीति
"
अबे, तूने ये क्या तमाशा लगाया है! हिंदुस्तान मुर्दाबाद, पाकिस्तान जिंदाबाद?" राहुल ने यूनिवर्सिटी कैम्पस में भीड़ देख मोहन से पूछा।
मोहन फुसफुसा के बोला, "कुछ नहीं यार, तू तो जानता है मुझे राजनीति में जाना है। कई साल से देशभक्ति के नारे लगा रहा हूँ, कोई ध्यान ही नहीं देता। आज जरा  पाकिस्तान जिंदाबाद’ क्या बोला, तू सामने भीड़ देख। और तो और, मीडिया वाले भी जमघट लगाएँ है!"
"अबे गधे जेल जाएगा ।"
"गधा होगा तू। इतनी-सी बात तेरी समझ नहीं आ रही? जेल जाते ही हीरो बन जाऊँगा। सब अखबारों में छा जाऊँगा। फिर अपनी बात से पलट जाऊँगा। बेरोजगारी की झुँझलाहट का जामा पहनाऊँगा और किसी न किसी बड़ी पार्टी का टिकट पा जाऊँगा। अब हट साईड में। टाइम मत खराब कर। हिंदुस्तान मुर्दाबाद… पाकिस्तान जिंदाबाद।"
    
शादीशुदा
वो ट्रेन में मेरे सामने की सीट पर बैठी थी। इतनी खूबसूरत थी कि सब उसे ही देख रहे थे। मेरी नजर भी बार-बार उसके मासूम चेहरे पर जा रूकती। अगले स्टेशन पर डिब्बा लगभग खाली हो गया। मैंने बड़े अपनत्व से उससे पूछा, "बहन, तुम बहुत सुंदर हो। कौन हो तुम, कोई फिल्म वाली ?’’
वो खोखली हँसी के साथ बोली, "मैं शरीर हूँ… बिना आत्मा का, जिसे कभी मिनटों,  कभी घंटों के हिसाब से खरीदा जाता है और  इस्तेमाल कर वापिस दुकान में सजा दिया जाता है ।"
मुझे कहीं दूर, सोच में गुम देख वो पुन; बोलीं, "क्यों, मेरा गणित समझ नहीं आया न/"
"नहीं बहन, समझ न आने जैसा इसमें क्या है1 हमारे समाज की ज्यादातर औरतों का गणित यही है। बस बहन, तुम्हारे ग्राहक रोज बदल जाते है और मैं शादीशुदा हूँ।"

गरीब
 "
अरे राजू! सुना तूने, कल फिर राम मंदिर बनाने को लेकर जुलूस निकाला गया। जाने कितनों के सर फट गए और दो तो जान से ही चले गए।"
"हाँ दीनू! पता है, उस इलाके में बहुत ही टेंसन है । पता नही इस दंगा-फसाद से कौन-से भगवान खुश होने वाले हैं?  चल छोड़ ये सब; गाड़ी लग गई है स्टेशन पर। सवारी आती होंगी ।"  
"ओ रिक्शे वाले! भईया, राम लला जन्म स्थान जाना है?"
"
नहीं बाबूजी, वहाँ नहीं जाऊँगा।"
"अरे, फालतू पैसे ले लियो।"
"नहीं बाबूजी, फिर भी नही जाऊँगा।"
"क्यों रे मुसलमान है क्या तू?????"
"गरीब हूँ बाबूजी। हिंदू, मुसलमान तो बाद की बातें है। वहाँ बहुत टेंसन है। जिंदा रहा तो बच्चों को रोटी दूँगा न।"
और राजू अगली सवारी की ओर बढ़ गया।

                                             
सुषमा गुप्ता (डॉ॰) का आत्मकथन
मुझे लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हुए बहुत वक्त नही हुआ। पहले लॉ एवं एचआर (law n HR) पढ़ाती थी। मेरी बहुत-सी लघुकथाएँ हैं जो अप्रकाशित हैं। मुझे पता ही नहीं कहाँ-कहाँ और कैसे भेजनी है। कृपया मेरा मार्ग दर्शन करें। अगर आप अनुमति दें तो मैं अपनी कुछ लघुकथाएँ आपको भेजती हूँ । अगर आपको उनका स्तर ठीक लगे तो ही मेरा मार्गदर्शन कीजिएगा अन्यथा त्रुटियाँ बताइएगा ताकि भविष्य में और मेहनत कर उन्हें सुधार पाऊँ और अच्छा लिख पाऊँ ।
संक्षिप्त परिचय
21 जुलाई को दिल्ली में जन्म। एम कॉम (दिल्ली विश्वविद्यालय), एमबीए(आई एम टी, गाजियाबाद), एलएलबी, पीएच डी ( चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ); 2007 से 2014 तक आई एम टी, गाजियाबाद में कानून एवं मानव संसाधन की व्याख्याता
सम्मान : हिंदी सेवी सम्मान 2017
प्रकाशन : समाचार पत्रों में कुछ रचनाएं प्रकाशित हुई हैं।
प्रकाशाधीन साझा संग्रह( जे एम डी प्रकाशन ) *नारी काव्य सागर *भारत के श्रेष्ठ युवा रचनाकार                      
स्थाई पता : 327 / सेक्टर 16A, फरीदाबाद, हरियाणा  
फोन नं॰ 9899916431 E-Mail : suumi@rediffmail.com

Thursday 26 January 2017

पृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथाओं का मनोविज्ञान / बलराम अग्रवाल


पृथ्वीराज अरोड़ा (10-10-1939--20-12-2015)
कथाकार पृथ्वीराज अरोड़ा की कुछ लघुकथाओं पर शोध के दौरान लिखे गएकुछ नोट्स आज एक रजिस्टर में मिल गए। इधर-उधर बिखरे होने के कारण या फिर प्रस्तुति की योजना में बदलाव के कारण बहुत-से नोट्स शोध में शामिल नहीं पाए। उन नोट्स को अब आपके समक्ष पेश हैं।  सभी लघुकथाओं के स्रोत कोष्ठक में दिए गए हैं तथापि ये सभी पृथ्वीराज अरोड़ा के लघुकथा संग्रह 'तीन न तेरह' में संकलित है।  सन्दर्भ के लिए आप उस संग्रह को देख सकते हैं।          --बलराम अग्रवाल

अहसास (साहित्य निर्झर, 1974) : बाह्य यथार्थ की कठोरता व्यक्ति के 'इगो' को कमजोर करती है। इससे कमजोर अहम् के कारण व्यक्ति-मन चिन्तित हो उठता है। ‘अहसास’ का जो बॉस कुछ पल पहले दिवाकर को कामचोर कह रहा था, वही अपने भाई की नौकरी छूट जाने की खबर सुनकर ‘परेशान-सा अपने सामने पड़े कागज समेटने लगता है’।
रामबाण (साहित्य निर्झर, 1974) : भारतीय दर्शन के अनुसार, कामना की पूर्ति हो जाए तो व्यक्ति ‘लोभ’ का शिकार होता है और अगर उसकी पूर्ति न हो तो ‘क्रोध’ व ‘चिन्ता’ का शिकार होता है। ‘रामबाण’ का ‘वह’ चिन्तित था कि आखिर भतीजे की जायदाद को किस प्रकार हथियाया जाए।
धूल-धुआँ (सारिका, 1978) : पिता को दूध से भरा बड़ा गिलास गटकते देखकर ‘मैंने आगे बढ़कर खिड़की’ बन्द कर दी, मानो अपने अभावों से नजर चुरा ली हो’।  इस नैरेशन में ‘दमन’ दृष्टिगोचर हो रहा है। कभी-कभी आत्महीनता भी दमन का कारण बनती है। इसी रचना में  ‘समंजन’ अथवा ‘औचित्य स्थापन’ की प्रवृत्ति को भी इन पंक्तियों में देखा जा सकता है—
“ऐ, तुमने दूध क्यों नहीं पिया?”
उसने भोला-सा मुँह बना दिया, “बच्चे दूध नहीं पीते।”
विकार (छोटी-बड़ी बातें, 1974) : इच्छा के विरुद्ध कार्य किया जाए तो व्यक्ति के अहम् को आघात पहुँचता है जोकि ‘क्रोध’ की उत्पत्ति का कारण बनता है। देखें—
“अगर मेरी इतनी-सी बात भी नहीं मान सकते, तो भाड़ में जाओ। मैं इतनी तेजी से नहीं चल सकता। मैं तो लौट रहा हूँ।” वह क्रोध में फुंकारता हुआ लौट गया।
दस पैसे (सारिका, 1979) : कभी-कभी व्यक्ति का अपना व्यवहार ही उसे मुँह चिढ़ाता हुआ उसके सामने आ खड़ा होता है। मनोविश्लेषण की अवधारणा में ‘अचेतन’ को व्यक्ति के व्यवहार का मुख्य प्रेरक अवयव माना जाता है। फ्रायड ने ‘अचेतन’ को दमित और निषिद्ध भावनाओं के संग्रह-स्थान के रूप में चिह्नित किया है। युंग ने उसी सिद्धांत को विकसित करके ‘सामूहिक अचेतन’ और ‘वैयक्तिक अचेतन’ की अवधारणा प्रस्तुत की। समकालीन हिन्दी लघुकथा ने अचेतन को मानव-व्यवहार के प्रमुख सूत्र के रूप में स्वीकारा और अपनाया है। दो राय नहीं कि मनुष्य का व्यवहार चेतन की तुलना में अचेतन से अधिक प्रभावित होता है। ‘दस पैसे’ का नायक एक जरूरतमंद यात्री के ‘पैसे बड़ी बेरहमी से’ उसके सामने पटक देता है; लेकिन वही नायक मिट्टी का तेल खरीदने के बाद लाला से दस पैसे वापस नहीं ले पाता। यहीं, इसी बिन्दु पर उसका ‘वैयक्तिक अचेतन’ ‘सामूहिक अचेतन’ बन जाता है जो उसे सोने नहीं देता।
दु: (सारिका, 1980) : शारीरिक या मानसिक दु:ख से बचने के नकारात्मक प्रयास को ‘पलायन’ की संज्ञा दी जा सकती है। विलियम मैक्डूगल के अनुसार—‘भय का भाव किसी वस्तु से बच निकलने या भागने की सहज वृत्ति से सम्बन्धित है।’ ‘दु:ख’ में, बेटे के इस प्रश्न के उत्तर में कि उसके पिता तो कहीं के राजकुमार नहीं थे, फिर सिद्धार्थ की तरह घर छोड़कर संन्यासी क्यों हो गये; माँ उत्तर देती है—‘लगता है बेटा, दोनों ही दु:खों से डर गए।’
महानता (सारिका, 1980) : इस लघुकथा की छात्रा अपने इतिहास-शिक्षक द्वारा सुनाए गये दृष्टांत के सन्त डायोजिनीज महान को महान मानने से इंकार कर देती है—‘मैं उस गै-जिम्मेदार संत को महान नहीं मानती’। क्योंकि उसकी दृष्टि में भी ‘सन्त’ बन जाना सामाजिक दायित्वों से पलायन कर जाना ही है।
पढ़ाई (सारिका, 1980) : आजादी और रोटी की जरूरत एक-जैसी है—यह इस लघुकथा का केन्द्रीय कथ्य है। पुलिस के हाथों में पड़ा नौजवान इस प्रश्न के कि  वह ‘हर रोज खान मजदूरों की झोपड़ियों में क्या करने जाता है?’ वह उत्तर देता है—‘…मैं उन्हें पढ़ाता हूँ कि जब तुम्हारा बच्चा भूख से कुलबुला रहा हो और पूरी मेहनत के बावजूद उसके वास्ते रोटी का इन्तजाम न हो सके तो उसकी भूख का इन्तजाम कैसे किया जाना चाहिए।’
यह ‘दमित’ अहम् को जागृत करने की मुहिम का मात्र एक पहलू है। मजदूर जनता के मानसिक-ह्रास को ऊपर उठाने की एक कोशिश है। यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि जीवन के स्वस्थ विकास के लिए अनुचित दमन से बचना अति आवश्यक है।
नपुंसक (सारिका, 1980) : समकालीन हिन्दी लघुकथा में कथाकारों ने काम की विकृति, अतृप्ति, अल्प-विकास और अति-विकास आदि विभिन्न रूपों को अपने कथ्य का आधार बनाया है। ‘नपुंसक’ लघुकथा में पृथ्वीराज अरोड़ा ने दिखाया है कि ‘हॉस्टल के एक कमरे में छात्रों के दोनों दलों के लड़के   (लड़कियों पर टूट पड़ने के बाद) शराब की झोंक में बतिया रहे थे’।  किसी को होठों का रसपान कर लेने पर गर्व था तो किसी को प्रेमा को बाँहों में भर लेने का। परन्तु इन सब के बीच एक ऐसा लड़का भी है जो चुप बैठा है और उस सारे हादसे पर अपनी साँस घुटती महसूस कर रहा है। ‘साला… नपुंसक !’ एक जुमला उसके लिए आता है ‘और कई ठहाके एक-साथ मिलकर’ कमरे में फैल जाते हैं।
                 ये सिर्फ नोट्स हैं। बहुत सम्भव है कि भविष्य में इन नोट्स को विस्तार दिया जा सके; बहुत सम्भव है, अब कुछ भी काम इन पर न किया जा सके। बहरहाल, आपके मन्तव्य के लिए ये प्रस्तुत हैं।
                                                                               ई-मेल : 2611ableram@gmail.com