Friday, 1 February, 2019

तैरती है पत्तियाँ : कुछ प्रतिक्रियाएँ


ओमप्रकाश कश्यप
13 जनवरी 2019 को मैसेंजर पर
बलराम अग्रवाल के ‘तैरती हैं पत्तियाँ’ शीर्षक से आए लघुकथा संग्रह का पीला मुखपृष्ठ देखकर लगा कि कवर बनाने में चूक हुई है। पत्तियों का जिक्र है तो कवर को हरियाला होना चाहिए था। लेकिन पहली कहानी पढ़ते ही संशय दूर हो गया। जिन पत्तियों को मनस् में रखकर शीर्षक का गठन किया गया है, वे हरी न होकर अपना जीवन पूरा कर पीली हो, पेड़ से स्वतः छिटक गई पत्तियाँ हैं। छोटी-सी भूमिका में लेखक ने स्वयं कवित्वमय भाषा में इसका उल्लेख किया है। लेकिन भूमिका से गुजरकर पाठक जैसे ही पहली लघुकथा तक पहुँचता तो उसका रहा-सहा संशय भी गायब हो जाता है। संग्रह की पहली ही लघुकथा ‘समंदर: एक प्रेमकथा’ अद्भुत है। इस लघुकथा में भरपूर जीवन जी चुकी एक दादी है। साथ में है उसकी पोती। दोनों के बीच संवाद है। भरपूर जीवन अनेक लोगों के लिए पहेलीनुमा हो सकता है, लेकिन इस लघुकथा को पढ़ेंगे तो इस पहेली का अर्थ भी समझ में आएगा और पीली हो चुकी पत्तियों के प्लावन का रहस्य भी। यह वह अवस्था है जब आदमी उम्रदराज होकर भी बूढ़ा नहीं होता, पत्तियाँ पीली होने, डाल से छूट जाने के बाद भी मिट्टी में नहीं मिलतीं, उनमें उल्लास बना रहता है। इस कारण वे जलप्रवाह में प्लावन करती नजर आती हैं। प्लेटो ने इसे जीवन की दार्शनिक अवस्था कहा है। अध्यात्मवादी इसके दूसरे अर्थ भी निकाल सकते हैं, लेकिन मैं बस इतना कहूँगा कि ‘समंदर: एक प्रेमकथा’ अनुभवसिद्ध कथा है। अभी संग्रह को पूरा नहीं पढ़ा है। शुरुआत से मात्र पंद्रह-सोलह लघुकथाएँ ही पढ़ी हैं। इतनी कहानियों में ‘अपने-अपने आग्रह’, ‘अजंता में एक दिन’, ‘उजालों का मालिक’, ‘इमरान’, ‘अपने-अपने मुहाने’, ‘अपूर्णता का त्रास’ अविस्मरणीय लघुकथाएँ हैं। इतनी प्रभावी कि इनका असर कम न हो, इसलिए बाकी को छोड़ देना पड़ा। ‘अपने-अपने मुहाने’, ‘अपूर्णता का त्रास’, ‘उजालों का मालिक’ में कहानीपन के साथ-साथ प्रतीकात्मक भी है, वही इन्हें बेजोड़ बनाती है। प्रतीकात्मकता के बल पर ही किसी एक पात्र का सच पूरे समाज का सच नजर आने लगा है। प्रतीकात्मकता की जरूरत व्यंग्य में भी पड़ती है। मगर इन दिनों वह प्रतीकात्मकता से कटा है। इसलिए वह अवसान की ओर अग्रसर भी है। बलराम अग्रवाल वरिष्ठ लघुकथाकार हैं। लघुकथा को समर्पित। यूँ तो बच्चों के नाटक और बड़ों के लिए कहानियाँ भी लिखी हैं, लेकिन इन दिनों वे लघुकथा-एक्टीविस्ट की तरह काम कर रहे हैं। अपनी विधा के प्रति ऐसा समर्पण विरलों में ही देखा जाता है.... जैसा कि ऊपर बताया गया है, पुस्तक की अभी कुछ ही लघुकथाएँ पढ़ी हैं। जैसे-जैसे पुस्तक आगे पढ़ी जाएगी, यह टिप्पणी भी विस्तार लेती जाएगी।

राजेश आहूजा  
31 जनवरी 2019 को मैसेंजर पर
पुस्तक मेले में तैरती हैं पत्तियाँ बलराम अग्रवाल जी के सामने ही ख़रीदी लेकिन न तो इनके साथ चित्र खिंचवाया और न ही पुस्तक पर हस्ताक्षर लिए। चलिए कोई बात नहीं, आशा करता हूँ भविष्य में भेंट होती रहेगी।
पुस्तकें कम ही ख़रीदता हूँ। कारण यह कि अधिकतर को पढ़ने के बाद अफ़सोस होता है कि क्यों ख़रीदी। इस पुस्तक को देख कर कुछ निराशा ज़रूर हुई कि पूरा कवर पीला क्यों बना दिया। लेकिन जब पढ़ना शुरू किया तो अहसास हुआ कि कवर भले ही केवल पीला है लेकिन अंदर तरह-तरह के रंग बिखरे हुए हैं। फ़ेसबुक पर बलराम जी द्वार पोस्ट की गई ओमप्रकाश जी की प्रतिक्रिया को पढ़ रहा था तो उसमें पीले कवर की बात आई और मुझे लगा कि अब रहस्योद्घाटन होने लगा है। मैंने तुरंत उस प्रतिक्रिया को पढ़ना बंद कर दिया।
किताब अगर कहानियों, कविताओं या लघुकथाओं की हो तो मैं उसे शुरूआत से पढ़ना प्रारंभ नहीं करता। कभी कोई पन्ना खोल लेता हूँ, कभी कोई। पत्तियों को मैंने अंत से पढ़ना शुरू किया। अब तक बीस से अधिक लघुकथाएँ पढ़ी हैं और उन्हें खरा पाया है। उम्मीद तो यही है कि अंत तक, या यूँ कहिए की शुरूआत तक सभी लघुकथाएँ इसी स्तर की होंगी। यानी यह पुस्तक मुझे बलराम जी की दूसरी पुस्तक ख़रीदने पर विवश कर देगी। लेकिन दूसरी तभी ख़रीदूँगा जब वे सामने होंगे ताकि उसके पहले पन्ने पर अपने लिए कुछ लिखवा सकूँ।


सुधा भार्गव 
31 जनवरी 2019 को अपनी फेसबुक वॉल पर
मित्रो, बलराम अग्रवाल जी का नया लघुकथा संग्रह है—'तैरती हैं पत्तियाँ’। इन दिनों यह चर्चा में है। जैसे-जैसे इसकी रचनाओं के बारे में सुनती या पढ़ती इस संग्रह को पढ़ने की लालसा बलवती होती गई। बलराम भाई जी ने अंतत: मुझे भी इसे उपलब्ध करा ही दिया। इसके लिए मैं उनकी आभारी हूँ।
संग्रह की भूमिका सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखी है। उनकी इस बात से मैं शत-प्रतिशत सहमत हूँ कि इस संग्रह की लघुकथाएँ जीवन को आधुनिक व्यापक दृष्टि से देखने वाले कथाकार की रचनाएँ हैं। इन पत्तियों को पढ़कर हम कहानी नहीं, जीवन पढ़ते हैं।  बलराम जी ने भी अपने मन की बात इस संग्रह में बड़ी बेबाकी से लिखी है, “आने वाले समय में कहानी ‘कहानीपरक लघुकथा’ की तरफ खिंच जाएगी। ‘कहानी’ आकार बढ़ाने के लिए रेत-सा बिखरना छोड़ देगी और ‘लघुकथा’ आकार को संकुचित रखने की शास्त्रीय शर्तों से विद्रोह कर देगी।”
थोड़ी-बहुत मैं भी कहानियाँ लिखती रहती हूँ। मैंने अनुभव किया है कि समय की रफ्तार और समकालीन परिस्थितियों के कारण बड़ा कथानक, लंबे-लंबे संवाद और पात्रों की भीड़ देखकर पाठक जल्दी-जल्दी पृष्ठ पलटते हुए अंत जानने की कोशिश में रहता है। धैर्य से खुद को कहानी से जोड़ने में वह अपने को असमर्थ पाता है। इसलिए कहानी के फैलाव को रोकना ही होगा। ऐसा मेरा भी सोचना है।
लघुकथा संग्रह मिलते ही मैंने पढ़ना तो शुरू कर दिया; पर पहली लघुकथा पर ही अटककर रह गई हूँ। वह है ही ऐसी! पहले आप भी उसे पढ़ लीजिये फिर मैंने उस पर जो कहा है, वह पढ़िए—
समंदर : एक प्रेमकथा
उधर से तेरे दादा निकलते थे और इधर से मैं… ”
दादी ने सुनाना शुरू किया। किशोर पौत्री आँखें फाड़कर उनकी ओर देखती रही…… एकदम निश्चल; गोया कहानी सुनने की बजाय कोई फिल्म देख रही हो।
लंबे कदम बढ़ाते, करीब-करीब भागते-से, हम एक-दूसरे की ओर बढ़ते… बड़ा रोमांच होता था।”
यों कहकर एक पल को वह चुप हो गयीं और आँखें बंद करके बैठ गयीं।
बच्ची ने पूछा—“फिर?”
फिर क्या! बीच में समंदर होता था—गहरा और काला…।”
समंदर!”
हाँ… दिल ठाठें मारता था न, उसी को कह रही हूँ।”
दिल था, तो गहरा और काला क्यों?”
चोर रहता था न दिल में… घरवालों से छिपकर निकलते थे!”
ओ…s…आप भी?”
…और तेरे दादा भी।”
फिर?”
फिर, इधर से मैं समंदर को पीना शुरू करती थी, उधर से तेरे दादा…! सारा समंदर सोख जाते थे हम और एक जगह जा मिलते थे।”
सारा समंदर!! कैसे?”
कैसे क्या…s…जवान थे भई, एक क्या सात समंदर पी सकते थे!”
मतलब क्या हुआ इसका?”
हर बात मैं ही बतलाऊँ! तुम भी तो दिमाग के घोड़ों को दौड़ाओ कुछ। दादी ने हल्की-सी चपत उसके सिर पर लगाई और हँस दी।

अब मुझे भी कहना है कुछ…
प्रेम शिखा हमेशा प्रज़्जलित रहती है चाहे वह अतीत हो या वर्तमान। भविष्य में भी इसकी कड़ियाँ जुड़ी रहेगी इसका अहसास जब शिराओं में स्पंदित होता है तो अंग-अंग उजाले से भर उठता है। और प्रेम… दुगुन वेग से महकने लगता है। तभी तो दादी मुग्धा की तरह पोती के सामने अपना दिल खोल बैठी-लंबे कदम बढ़ाते, करीब भागते-से, हम एक दूसरे की ओर बढ़ते—बड़ा रोमांच होता था।… बीच में समंदर होता था—गहरा और काला…। …इधर से मैं समंदर को पीना शुरू करती थी, उधर से तेरे दादा…! सारा समंदर सोख जाते थे हम और एक जगह जा मिलते थे।”
समंदर’ शब्द में भी कितना गूढ रहस्य छिपा है। यह समंदर नदियों के विलयन वाला नील समंदर नहीं, बल्कि प्रेमियों के बीच लहराता गहरा काला दिल । काला दिल ! चौंकाने वाली बात ! इससे पर्दा उठाते हुए दादी की जुबान से ही सुनिए—“चोर रहता था न दिल में… घरवालों से छिपकर निकलते थे।”
बहुत ही खूबसूरती से काले दिल को परिभाषित किया है। अति मर्यादित रूप में युवावस्था के प्रेम की असीम शक्ति को उजागर करते उसे एक ही वाक्य में सांकेतिक भाषा में पिरो दिया गया है जब बच्ची ने आश्चर्य से पूछा—“सारा समंदर !! कैसे?”
जवान थे भई, एक क्या सात समंदर पी सकते थे।”
इसका मतलब पूछने पर दादी सुनहरे अतीत की घाटियों में अवश्य प्रेम, प्रणय और समर्पण की स्निग्ध बौछारों में भीग गई होगी। तभी तो उससे केवल इतना कहते बना—“तुम भी तो दिमाग के घोड़ों को दौड़ाओ कुछ।
अपने कथ्य, भाषा, गठन और संप्रेषण की दृष्टि से प्रेमकथाओं में यह एक श्रेष्ठ लघुकथा है। इसमें निहित गूढ़ संवादों ने इसका कद बहुत ऊँचा कर दिया है। बलराम जी ने एक-एक शब्द का सावधानी से चयन कर लघुकथा की दीवार पर सुंदरता से उन्हें टंकित किया है। न कहीं अनर्गल अलाप न अनावश्यक विस्तार। लघुकथा के अंतिम छोर पर पहुँचते-पहुँचते तो लगा—इर्द-गिर्द प्यार भरी फूल की पत्तियाँ झरझरा कर झर रही हैं।

सुभाष नीरव
04 फरवरी 2019  को अपनफेसबुक वॉल पर

मित्र बलराम अग्रवाल का सद्य प्रकाशित लघुकथा संग्रह ' तैरती हैं पत्तियाँ ' कल देर रात तक पढ़ता रहा। मैं तो कहीं भी नहीं खड़ा हूं। मैंने तो इसके पासंग भर भी नहीं लिखा। यार बलराम, मुझे तुमसे ईर्ष्या हो रही है, इस संग्रह की एक एक लघुकथा तुम्हारी सोच और रचनात्मकता की गवाही तो भर ही रही है, बल्कि लघुकथा में प्रभाव की अन्विति क्या होती है, ये लघुकथाएं उसका उदाहरण हैं।
बधाई तुम्हें ! 

संंध्या  तिवारी
अपनी फेसबुक वॉल पर 08-02-2019 को

आदरणीय डॉ बलराम अग्रवाल सर के सौजन्य से मुझे उनका लघुकथा संग्रह 'तैरती हैं पत्तियाँ ' दिनांक 05/02/19 को प्राप्त हुआ, समयाभाव के चलते मैं इसकी कुछ ही लघुकथाएं अभी पढ़ पाई हूँ परंतु 'इन पत्तियों में जीवन है' आदरणीय 'विश्वनाथ त्रिपाठी जी' एवं 'ये पत्तियाँ ' 'डॉ बलराम अग्रवाल जी' के द्वारा लिखे आमुख मैंने सबसे पहले पढ़े। और इन दोनों महानुभावों की बातों से मैं काफी हद तक इत्तेफाक रखती हूँ। 

अब बात करते हैं किताब के आवरण की, किताब का पीला आवरण और पीली कत्थई पत्तियाँ यूं तो पतझड़ तथा जर्जरता का एहसास कराती हैं परन्तु रंगो का अपना विज्ञान है और उसमें पीला रंग आशा विश्वास का प्रतीक हैं तथा ये टूटी हवा में तैरती पत्तियाँ मानो - "हवा पे रखे सूखे पत्ते, पांव ज़मी पर रखते ही उड़ लेते हैं दोबारा" वाली बात कहती ज्यादा प्रतीत होती हैं। 
बलराम अग्रवाल सर ने अपनी भूमिका में खुद ही कहा है कि उनकी कुछेक लघुकथाएं कहानी के कलेवर में लिपटी हुई हैं और मैं भी उनकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ। 
  1. "तैरती हैं पत्तियाँ" लघुकथा संग्रह की अभी मैंने जितनी लघुकथाएं पढ़ीं हैं उन को देखते हुए मैं कहना चाहती हूं कि अभी तक संग्रह की एक भी कथा अभिधात्मक शैली की नहीं मिली। लक्षणा और व्यंजना से पूरित कोमलकांत पदावली सी लघुकथाएं अन्तस्थल में ऐसे धस जातीं हैं जैसे सीमेंटेड दीवार में ड्रिल मशीन। 
अभी के लिए बस इतना ही कहना चाहूंगी कि ये कथायें जैसे स्वतःस्फूर्त होकर नया आसमान खोज रही हों लेकिन यह तो समय पर छोड़ना ही पड़ेगा कि कितनी सफलता मिली।
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Thursday, 31 January, 2019

लघुकथा : मैदान से वितान की ओर-21

इस धारावाहिक प्रस्तुति की अंतिम कड़ी

[रमेश जैन के साथ मिलकर भगीरथ ने 1974 में एक लघुकथा संकलन संपादित किया था—‘गुफाओं से मैदान की ओर’, जिसका आज ऐतिहासिक महत्व है। तब से अब तक, लगभग 45 वर्ष की अवधि में लिखी-छपी हजारों हिन्दी लघुकथाओं में से उन्होंने 100+ लघुकथाएँ  चुनी, जिन्हें मेरे अनुरोध पर उपलब्ध कराया है। उनके इस चुनाव को मैं अपनी ओर से फिलहाल लघुकथा : मैदान से वितान की ओरनाम दे रहा हूँ और वरिष्ठ या कनिष्ठ के आग्रह से अलग, इन्हें लेखकों के नाम को अकारादि क्रम में रखकर प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसकी प्रथम  11 किश्तों का प्रकाशन क्रमश: 17 नवम्वर 2018, 24 नवम्बर 2018, 1 दिसम्बर 2018,  4 दिसम्बर 2018, 8 दिसम्बर 2018, 12 दिसम्बर 2018, 15 दिसम्बर 2018, 17 दिसम्बर 2018, 20 दिसम्बर 2018, 24 दिसम्बर 2018, 27 दिसम्बर 2018, 30 दिसम्बर 2018, 2 जनवरी, 2019, 6 जनवरी 2019, 12 जनवरी 2019, 16 जनवरी 2019, 19 जनवरी 2019, 22 जनवरी 2019, 26 जनवरी 2019 तथा 29 जनवरी 2019 को  जनगाथा ब्लाग पर ही किया जा चुका है। यह इसकी इक्कीसवीं किश्त है। 
            टिप्पणी बॉक्स में कृपया ‘पहले भी पढ़ रखी है’ जैसा अभिजात्य वाक्य न लिखें, क्योंकि इन सभी लघुकथाओं का चुनाव पूर्व-प्रकाशित संग्रहों/संकलनों/विशेषांकों/सामान्य अंकों से ही किया गया है। इन  लघुकथाओं पर आपकी  बेबाक टिप्पणियों और सुझावों का इंतजार रहेगा।  साथ ही, किसी भी समय यदि आपको लगे कि अमुक लघुकथा को भी इस संग्रह में चुना जाना चाहिए था, तो यूनिकोड में टाइप की हुई उसकी प्रति आप  भगीरथ जी के अथवा मेरे संदेश बॉक्स में भेज सकते हैं। उस पर विचार अवश्य किया जाएगाबलराम अग्रवाल]
धारावाहिक प्रकाशन की  इक्कीसवीं कड़ी में शामिल लघुकथाकारों के नाम और उनकी लघुकथा का शीर्षक…
101  सूर्यकांत नागर—फल
102  हरनाम शर्मा—अब नाहीं
103  हरिशंकर परसाई—जाति
104  हसन जमाल—प्रत्याक्रमण
   105  हेमंत राणा—दो टिकट

101
  
सूर्यकान्त नागर
 
फल
“अम्माजी ने सुबह से कुछ नहीं खाया है, इन्हें भी कुछ दो।” लम्बी यात्रा के सहयात्री के नाते मैंने अपनी चिन्ता व्यक्त की।
“माँ सफर में अन्न ग्रहण नहीं करती,” बेटे ने बताया।
“कुछ फल-वल ही खरीद दो।” मैंने सुझाया। पता नहीं, बेटे ने सुना भी या नहीं, अथवा सुनकर भी अनसुना कर दिया। अगले स्टेशन पर ट्रेन रुकी तो अम्मा का नन्हा पोता अंगूरवाले को देख अंगूरों के लिए मचल उठा। हारकर पिता ने बेटे की इच्छा पूरी कर दी।
“बेटे, कुछ अंगूर दादी को भी दो।” पिता ने कहा, लेकिन लाडला इसके लिए तैयार नहीं हुआ। माँ-बाप ने डाँटा भी, मगर उस डाँट में प्यार इस तरह लिपटा था कि नन्हे पर कोई असर नहीं हुआ।
कुछ देर बाद “दस के तीन”, “दस के तीन” कहता हुआ सन्तरे बेचने वाला आया तो मुझसे फिर रहा न गया, “अम्माजी के लिए सन्तरे ही खरीद लो।” मैंने अपनी ओर से खरीदने की पहल इसलिए नहीं की कि अपमान मानकर पिता यह न कह बैठे—हमें भिखारी समझ रखा है क्या? बेटे ने कुछ देर विचार किया, फिर माँ से कहा, “अम्मा, जरा दस रुपए देना, मेरे पास छुट्टा नहीं है।”
“अम्मा ने कहा, “रहने दे बेटा, ऐसा भी क्या जरूरी है।”
बेटे ने जिद की तो अम्मा ने गाँठ से निकाल दस का नोट बेटे के हाथ पर धर दिया, लेकिन इस बार भी नन्हे ने सन्तरे की थैली झपट ली, बोला, “मैं किछी को छन्तरे नई दूँगा। अकेले खाऊँगा।”
बाप ने जोर-जबरदस्ती की तो नन्हा जोर-जोर से रोने लगा, हाथ-पैर पटकने लगा। छीना-झपटी में उसने पापा का मुँह भी नोच लिया। दादी अम्मा ने कहा, “रहने दे बेटा! नन्हा खा लेगा तो समझूँगी, मैंने खा लिया।”
नन्हे का पेट भर गया तो एक सन्तरा पापा की ओर बढ़ाते हुए कहा, “पापा, ये तुम खा लो।”
“दादी को दो बेटा!” पापा ने समझाना चाहा, पर नन्हा राजी नहीं हुआ। दादी निरीह भाव से यह सब देख रही थी। आखिर उसने कहा, “आज दे रहा है तो खा ले बेटा, पता नहीं, कल कैसा फल मिले।”

102
 
हरनाम शर्मा 

अब नाहीं
“भगवन कसम मनै नेम है साहब इब मैं यो काम कत्तई नीं करता. कुछ नीं करता. बस कपड़ों पे प्रेस कर गुजर करूँ.”                
“.....” नए दरोगा की आँखें संवादहीन न थीं.
“माई-बाप कदी वर्दी प्रेस करवानी हो तो लेता आऊँगा बस यों ही काम आ सकूँ इब तो मैं.”
“हरामजादे,झूठ तुम्हारे खून में समाया रहेगा जन्मभर .तेरा रिकोर्ड बोल रहा है साले तू अफीम चरस गांजा सारी चीजें बेचता है. मुझे आज इस थाने में पन्दरवां  दिन  हो गया एक बार भी नहीं आया!”
“साहब जब धन्धा छोड़ दिया तो के करूँ आ कै .जब कमाई थी तो थाने की चौथ न्यारी सबसे पहले जावै  थी आपैई. थाने नै मेरे से कोई शिकायत नीं थी. इब बताओ...”
“हाँ-हाँ बताऊंगा। भूतनी के, अपना धन्धा छोडकर हमारा धन्धा चौपट करवा दो। जरा बताइयो, मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है। तेरा धन्धा तब ही बंद हुआ, जब मैं इस थाने में आया। साले तुम लातों के भूत बातों से नहीं मानते। एकाध बार कचैहरी के चक्कर कटवा दूँगा तो सारा धन्धा ख़ूब चल पडेगा, बोल ससुरे... ”                      
“के करूँ साहब, बात यों नहीं है।”
“और क्या है कल से कोई बात नहीं सुनूँगा। चौथ थाने में पहुँच जानी चाहिए हफ्ते बाद समझे धन्धा चालू करो या मरो।”      
“साहब साठ से ऊपर हो गया पोरस थक गे अब नहीं होगा।”
“अरे ससुरे बूढ़े,  भोतई कर्मठोक है तू तो। अरे भई, तेरी कोई औलाद तो होगी।”
“जी, छोरी थी; ब्याह दी।”
“और घरवाली।” बुढिया को इंगित कर नए साहब ने पूछा।                                   
“ना जी, यो तो निरी गऊ है जी। इसने कदी भी मेरे धंधे में साथ नहीं दिया।”
“बस देख लो; और मैं कुछ नहीं सुनना चाहता।  हमें भी आखिर कुछ चाहिए पिछले कागजों का पेटा भरने के लिए। कुछ धन्धा करो, म्हारा भी कुछ हो। समझे!”  आँखें तरेरकर दरोगा गुर्राया। बूढ़े के इंकार करने से पूर्व ही डंडा तन चुका था, मगर जर्जर हाथों ने उस डंडे को हवा में ही थाम लिया।  

103
 
हरिशंकर परसाईं
 
जाति          
कारखाना खुला। कर्मचारियों के लिए बस्ती बन गई। ठाकुरपुरा से ठाकुर साहब और ब्राह्मणपुरा से पण्डितजी  कारखाने में काम करने लगे और पास-पास के ब्लॉक में रहने लगे। ठाकुर साहब का लड़का और पण्डितजी की लड़की दोनों जवान थे। उनमें पहचान हुई, पहचान इतनी बढ़ी कि वे शादी करने को तैयार हो गए। 
जब प्रस्ताव उठा, तो पण्डितजी ने कहा, “ऐसा कभी हो सकता है… ब्राह्मण की लडकी ठाकुर से शादी करे। जाति चली जाएगी।’’
ठाकुर साहब ने कहा कि ऐसा हो नहीं सकता परजाति में शादी कारण से हमारी जाति चली जाएगी।
किसी ने उन्हें समझाया कि लड़के–लडकी बड़े हैं, पढ़े–लिखे हैं, समझदार है। उन्हें शादी कर लेने दो। अगर उनकी शादी नहीं हुई तो भी वे चोरी-छिपे मिलेंगे; और तब जो उनका सम्बन्ध होगा वह तो व्यभिचार कहा जाएगा।
इस पर ठाकुर साहब और पण्डितजी ने कहा, “होने दो।  व्यभिचार से जाति नहीं जाती है। शादी से जाती है।

104

हसन जमाल

प्रत्याक्रमण
आक्रमण बलात्कार के लिए ही था।
युवती आक्रमणकारी के चंगुर में असहाय पक्षी की तरह फड़फड़ा रही थी। निजता का रास्ता न था। आक्रमणकारी दाँत भींचकर आँखों की पुतलियों को असामान्य ढंग से बाहर निकालकर नई देखी हुई फिल्म के अनुसार युवती के काबू में न आ सकने वाले चंचल हाथ-पैरों के बाँधने की ताबड़-तोड़ कोशिश कर रहा था। इस कोशिश में उसका सारा शरीर पसीने में नहा गया। बुरी तरह हाँफने लगा था वह। उसकी लस्त-पस्त देख युवती ने पहली बार प्रतिरोध को रोका। हाथ-पैर ढीले छोड़ दिए। एक हल्की-सी मुस्कान के साथ उसने निहायत मुलायम आवाज में आक्रमणकारी को सम्बोधित किया, ‘‘क्या सारा बल तुम इसी काम में लगा दोगे?’’
         स्विच बंद करते ही मशीन जिस तरह स्थिर हो जाती है, आक्रमणकारी जड़वत् हो गया। एक सकते का आमतारी हो गया उस पर। भौंचक्का-सा वह हाथ-आए शिकार को बेबसी से देखने लगा। लगा, सचमुच उसमें बल नहीं रहा।
         और इसी दरमियान अस्त-व्यस्त कपड़ों को सँभालती हुई युवती उसके चंगुल से निकल भागी। आक्रमणकारी प्रत्याक्रमण की चोट तलाशने लगा, लेकिन चोट का निशान कहीं नहीं था।
                                                           
और अंत में एक लघुकथा  बलराम अग्रवाल की ओर से…

105

हेमंत राणा

दो टिकट
जाड़ो के दिन थे, वर्मा जी बालकोनी में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। रिटायरमेंट के बाद, ज़िदगी इतनी बोर ना थी। लेकिन जब से पत्नी साथ छोड़कर गई, एक-एक पल काटना मुश्किल हो गया। अब तो अखबार ही उनका साथी था। तभी अंदर से उनके पोते ने आवाज लगाई, “दादा जी, टेबिल पर आप का फ़ोन बज रहा है…”
वर्मा जी ने वहीं बैठे-बैठे कहा, “देख तो, क्या नाम लिखा आ रहा है?”
“कोई आर जी लिखा आ रहा है…”
“उन्ही का फ़ोन है, जिनकी बेटी की शादी में तू मेरे साथ गया था।” वर्मा जी ने पोते के हाथ से फ़ोन लेते हुए कहा।
“हाँ बोलो ऋचा, कैसी हो?”
“मै ठीक हूँ, तुम कैसे हो?”
“बस अब तो बची खुची जिंदगी गुजारनी ही, सो गुजार रहे है। फ़ोन कैसे किया, कुछ काम था क्या?”
“हाँ, घर से भागना था।”
“इस सत्तर साल की उम्र में, किसके साथ भाग रही हो?”
“तुम्हारे साथ।”
“मेरे साथ भागना होता तो उस बीस साल की उम्र में भाग जातीं। तब तुम आई नहीं और मै सुबह से शाम तक हाथ में ट्रेन के दो टिकट लिए रेलवे स्टेशन पर खड़ा रहा।”
“हाँ, तब नही आ सकी।… फिर शादी, उसके बाद बच्चे। बस उसी में रम के रह गई। गुप्ता जी मेरे लिए यह मकान और बेटी की जिम्मेदारी छोड़ कर गये थे। बेटी अपने घर चली गई और यह मकान मैंने एक संस्था को लाइब्रेरी खोलने के लिए दे दिया, अपने लिए एक कमरा रखा है।"
"यह तो तुमने अच्छा किया। अब इतने बड़े मकान का अकेली करोगी भी क्या?"
"एक बस तीर्थ यात्रा के लिए जा रही है। उसी में दो टिकट बुक कराये हैं। आ जरूर जाना। कहीं ऐसा ना हो, इस बार मैं दो टिकट लिए खड़ी रहूँ।”
“तीर्थ यात्रा पर, अपने दीवाने के साथ भागकर जाओगी। भगवान बहुत पाप देंगे।” इस बार वर्मा जी की आवाज में एक खनक थी।
“अरे कोई पाप-वाप नहीं देंगे। पहले भी तो हम मन्दिर में कौन-सा पूजा करने जाते थे।” अब ऋचा की आवाज भी, वर्मा जी की आवाज के साथ खनखना रही थी।