Sunday, 2 September, 2018

जाना सरस्वती का मुक्ताकाश में



श्रद्धांजलि : डॉ॰ सरस्वती माथुर

नीलिमा टिक्कू जी की फेसबुक वॉल के माध्यम से यह अविश्वसनीय-सी खबर है। डॉ॰ सरस्वती माथुर के एकाएक यूँ चले जाने से मन दुखी है।

मई 2017 में अपनी लघुकथाओं के संग्रह ‘गुलदस्ता’ की भूमिका उन्होंने लिखवाई थी। उस संग्रह के बारे में गत माह ही उन्होंने बताया था कि इस बार भारत आएँगी तो प्रकाशक से किताब मिल जाएगी। मैं यहाँ उस किताब की लघुकथाओं पर अपनी भूमिका, स्वयं सरस्वती जी के ‘मन की बात’ सहित कुछ लघुकथाएँ भी श्रद्धांजलि स्वरूप यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। उनकी स्मृति को नमन।

भूमिका : लघुकथा संग्रह ‘गुलदस्ता’

सरस्वती माथुर की लघुकथाएँ

समकालीन लघुकथा की नई पीढ़ी के लिए ‘सरस्वती माथुर’ नया नाम हो सकता है। समकालीन लघुकथा की वरिष्ठ पीढ़ी के भी अनेक लघुकथाकारों के लिए यह नाम अनसुना-सा हो सकता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि वे आठवें दशक के पूर्वार्द्ध में ही लघुकथा-लेखन से जुड़ गई थीं। यही नहीं, उन्हीं दिनों विद्यालय में अपनी कुछ लघुकथाओं का मंचन उन्होंने कराया था तथा एक साइक्लोस्टाइल्ड संग्रह भी स्वयं प्रकाशित किया था। सरस्वती जी के अनुसार, उस संग्रह की एक प्रति डॉ॰ सतीश दुबे के भण्डार में सुरक्षित है, ऐसा एक बार पत्र द्वारा उन्होंने सरस्वती जी को सूचित किया था। तीन-साढ़े तीन दशक के लम्बे अन्तराल के बाद वे लघुकथा लेखन में पुन: सक्रिय हुई हैं तो लघुकथा ने शिल्प, शैली और सौन्दर्य के कई परिधान अब तक बदल डाले हैं। जो भी हो, ‘गुलदस्ता’ नाम से उनकी सौ लघुकथाओं का यह संग्रह हमारे सामने है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
‘गुलदस्ता’ शीर्षक से इस संग्रह में दो लघुकथाएँ हैं। एक में वे यह विचार प्रस्तुत करती हैं कि साम्प्रदायिक सद्भाव का जो आवेग पुरानी पीढ़ी में था, वह आज की पीढ़ी में दुर्लभ है; दूसरी की महक और आकर्षण पहली से एकदम अलग है। संग्रह की अनेक रचनाएँ स्त्री मनोविज्ञान के विभिन्न रूपों को उजागर करती हैं। इन रचनाओं में स्त्री के ‘माँ’, ‘बहन’, ‘पत्नी’, ‘सहेली’ आदि अनेक रूप सामने आते हैं। माँ का एक रूप ‘साथिया’ में है तो दूसरा ‘राजदार’ में। ‘सोने की नसरनी’ में स्त्री के पारम्परिक और आधुनिक दोनों चरित्रों का चित्रण मिलता है। ‘लक्ष्मी आई है’ में भी नवजात कन्या के आगमन को प्रसन्नता से स्वीकारने वाली दर्शना जी का चित्रण आधुनिक सोच की ठंडी बयार-सा सुकून देता है। लघुकथा ‘बिंदी’ भी अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करती है। ‘पतंग’ स्त्री में स्वाभाविक रूप से पाई जाने वाली ममता और स्नेह की भावना को सामने लाती है। ‘लक्ष्मी का दिया’ जहाँ आधुनिक परिवेश को शिद्दत से सामने रखती है, वहीं परम्परा के निर्वाह से दूर हटने की टीस को भी सामने लाती है। यह टीस कुछ अलग तरह से उनकी लघुकथा ‘करवा चौथ का चाँद’ में भी है और ‘पहला करवा चौथ’ में भी। सास के पारम्परिक और आधुनिक दोनों रूपों का चित्रण सरस्वती जी की लघुकथाओं में हुआ है, लेकिन पैरवी वे उसके आधुनिक चरित्र की ही करती हैं (स्नेह-सूत्र)। ‘मुझे लगता है डे केयर से ज़्यादा इन्हें परिवार के केयर की ज़रूरत है(केयर)’ जैसी चिन्ताएँ सरस्वती जी के सामाजिक सरोकारों को उजागर करती हैं। यह किसी न किसी रूप में उनकी अधिकतर लघुकथाओं की केन्द्रीय चिन्ता है और यही वह विचार है जो उनके लेखन के प्रति आश्वस्त करता है।
‘बालदिवस’ में उन्होंने दिखाया है कि यह मन्त्रियों और अनाथालय संचालकों की अपनी-अपनी जिजीविषाओं का पर्व बनकर रह गया है। ‘बालहित’ इस पर्व से नदारद है। लघुकथा ‘दुर्गा’ को जनवादी तेवर से प्रेरित माना जा सकता है। ‘इंतजार’ में कामकाजी महिला की सहनशीलता को दर्शाया गया है, लेकिन इसका स्थापत्य पाठक को सन्तुष्ट नहीं कर पाता।  शांता के चरित्र का यहाँ विस्तार होना चाहिए था कि वह आखिर किस कारण से आँखों देखी मक्खी को निगल रही है, पति की बेवफाई को शांतिपूर्वक क्यों सहन कर रही है।
सरस्वती जी के अनेक कथ्य आम आदमी की पीड़ा के बहुत नजदीक हैं लेकिन उनकी भाषा और शिल्प, गठन की माँग करते हैं। कई लघुकथाएँ संवेदनशील कथ्य के बावजूद भाषिक अथवा शैल्पिक कसावट अथवा दोनों की कमी के कारण पाठक पर यथेष्ट प्रभाव डालने से चूक  जाती हैं। ‘उस दिन सर्दी बहुत थी l धूप में भी तेजी नहीं थी, धुंध का पर्दा हवा में रह-रह कर काँप उठता था। अलसाई-सी इस सुबह किसका मन होता है बाहर निकलने का; पर भंवरी  को तो जाना ही होगा (श्रम का बीज) l’—इस सूक्ष्म अनुवीक्षण की प्रशंसा की जानी चाहिए लेकिन कथानक-चयन की दृष्टि से यह रचना एक लम्बी कहानी को अपनी छोटी काया में जबरन समाए प्रतीत होती है। इस संग्रह की अन्य भी अनेक लघुकथाओं को देखकर नि:संकोच कहा जा सकता है कि सरस्वती जी कहानी-शैली की लघुकथाकार हैं। कहानी-शैली के अनेक लघुकथाकार समकालीन लघुकथा में हैं—सुभाष नीरव, मधुदीप, बलराम, बलराम अग्रवाल, कमल चोपड़ा, सतीशराज पुष्करणा… लेकिन इनमें से अधिकतर की रचनाओं में लघुकथा के शिल्प-विधान का अनुसरण पाया जाता है। समकालीन लघुकथा में कथा-कहने दो रूप इन दिनों प्रचलन में हैं—पहला, सीधे-सपाट रूप में कथा-कहन और दूसरा, बिम्बों-प्रतीकों का प्रयोग करते हुए कथा-कहन। अशोक भाटिया, श्याम सुन्दर अग्रवाल आदि अधिकतर लघुकथाकार सीधे-सपाट रूप से कथ्य को सम्प्रेषित करते पाये जाते हैं; जबकि सुकेश साहनी, बलराम अग्रवाल, मधुदीप आदि कुछ लघुकथाकार बिम्बों और प्रतीकों का प्रयोग करते हुए कथ्य को सम्प्रेषित करने के समर्थक प्रतीत होते हैं। समापन अथवा अन्त की ओर कहानी की तुलना में किंचित क्षिप्र गति से बढ़ना लघुकथा का एक गुण है, यह ध्यान रखने की बात है। यह उल्लेखनीय है कि लघुकथा लिखते हुए सरस्वती माथुर की क्षिप्रता पात्रों और परिस्थितियों को निरा मैकेनिकल मानकर नहीं चलती। वे दृश्य बनाते हुए चलने की तरफदार हैं। उनके पात्रों के पास पढ़ने का समय भी है और आसपास फुदकती चिड़ियों को देखने यानी प्रकृति से जुड़े रहने का भी (जलती इमारत)।  ‘मानदेय’ सरीखी कुछ लघुकथाओं में इतर प्रसंगों का जुड़ाव उनके कथानक को कहानी जितना विस्तार देने की माँग करता है। दरअसल, इतर प्रसंगों की पहचान पर ही लघुकथा का सौष्ठव टिका होता है। उस पहचान से कथाकार विचलित हुआ नहीं, कि रचना न कहानी बन पाती है और न लघुकथा ही रह पाती है। संग्रह की कुछ लघुकथाएँ बहुत-जल्द समेट दी गई भी लगती हैं (आम आदमी)। लघुकथा के सम्प्रेषणीय प्रभाव को जितनी क्षति उसके कथानक के बहु-बिंदुवीय विस्तार से पहुँचती है, उतनी ही उसके संकुचन से भी पहुँचती है। हिन्दी लेखकों के बीच से आज शाब्दिक शुद्धता, वाक्य-विन्यास की सावधानी, विराम-अर्द्धविराम आदि व्याकरण चिह्नों का समुचित प्रयोग जैसी बातें लगभग गायब हैं। सब एक-से हों तो कोई किसी पर उँगली भी नहीं उठा पाता है—यहाँ तक तो ठीक परेशानी तब होती है जब गलतियों को स्वीकार करने की पैरवी करते हुए अनेक कुतर्क सामने आने लगते हैं।
सरस्वती जी ने अपनी लघुकथाओं में पर्यावरण रक्षा की पैरवी की है। सिर्फ पेड़-पौधों की रक्षा और उनके रख-रखाव तक सीमित न होकर पर्यावरण की उनकी अवधारणा व्यापक फलक पर चित्रित है। पेड़-पौधों के साथ-साथ उसमें पक्षियों, पर्वों और रीति-रिवाजों का भी समावेश है। उसका एक रूप आध्यात्मिक चिंता के रूप में (तुलसी का बिरवा) सामने आता है और दूसरा धरोहर रक्षा (आ री कनेरी चिड़िया) के रूप में।
सरस्वती जी की कुछ लघुकथाएँ शब्द-चित्र शैली की प्रतीत होती हैं। इनमें कथा भी है और मनोवैज्ञानिक चित्रण भी। इन सभी में व्यक्ति के सूक्ष्म मनोभावों को चित्रित करने की जागरूक कोशिश नजर आती है। उदाहरण के लिए ‘डिस्चार्च टिकट’, ‘पाँच रुपए का सिक्का’, ‘बारिश’, ‘शिरीष खिल रहा है’, ‘गुलाब की पंखुड़ियाँ’ जैसी अनेक लघुकथाओं का नाम ले सकते हैं। वे भावनाओं के कोमल पक्ष की कुशल चितेरी हैं। उनकी लघुकथाओं में आक्रोश, दम्भ, क्रूरता के दर्शन प्राय नहीं होते हैं। ‘पिताजी की पूँजी’ में ससुर की पुस्तकें कबाड़ी को बेचने की पति की कोशिश पर भाभी का यह कथन कि—-"जी नहीं, यह रद्दी नहीं है। यह मेरी सास और ससुर की जमा पूँजी है। अपने जीते जी मैं इन्हें नहीं बेचने दूँगी। मैं अम्मा की तरह ही हर साल इन्हें सहेजूँगी।" पाठक को भीतर तक भिगो देता है।
डॉ॰ शंकर पुणताम्बेकर ने माना है कि लघुकथा का अन्त और उसका समापन बिंदु दो अलग बातें हैं। उनका कहना था कि कथ्य की दृष्टि से कई लघुकथाएँ अपने अन्त से पहले ही समापन को प्राप्त कर लेती हैं। इस संग्रह की ‘लहू का रंग’ अन्तिम पैरा से पहले ही समाप्त हो जाती है। इस लघुकथा में यद्यपि समापन बिंदु पर ही सन्देश भी ध्वनित हो चुका था, लेकिन लेखिका को लगा कि इसे स्पष्ट कर देना चाहिए। अन्तत: तो उसे हर स्तर के पाठक को अपने ध्यान में रखना होता है। लेकिन स्पष्ट करने की यह प्रक्रिया कुल मिलाकर लघुकथा के कलेवर को कमजोर ही करती है। स्पष्टीकरण की इस प्रक्रिया में सबसे बड़ा खतरा तो ‘उपदेशक’ अथवा ‘स्पष्टकर्ता’ के रूप में लेखक का स्वयं का उपस्थित होना होता है। अत्यन्त संवेदनशील विषय पर लिखी गयी ‘पहला करवा चौथ’ शैल्पिक कमजोरी के कारण अपने बिम्ब सहित निष्प्रभ रह गयी है। वाक्य-विन्यास की बात करें तो एक गलती सामान्यत: सभी नवोदितों में पाई जा रही है। नवोदितों की छोड़िए, वरिष्ठ भी कुछ कम नहीं हैं। वह गलती है—हर वाक्य में संज्ञा शब्दों का प्रयोग करना। सर्वनाम के प्रयोग को वे जैसे जानते ही न हों। सरस्वती जी की भी अनेक लघुकथाओं में ऐसे प्रयोग मिलते हैं। उदाहरण के लिए, ‘बचपना’ का यह वाक्य देखें—‘निर्मला ने धीरे-धीरे घर को फिर से संभालना शुरू किया । लेकिन यह क्या निर्मला ने देखा कि उसकी बड़ी बेटी,उसकी नन्हीं सी गुड़िया तो एकदम बदल गयी है।’ हाइफन और कौमा आदि का प्रयोग न करने की बात छोड़िए, इस अंश के दूसरे वाक्य में निर्मला शब्द को दोहराया जाना व्याकरण की दृष्टि से गलत प्रयोग है। ये गलतियाँ भाषा के प्रवाह को तो अवरुद्ध करती ही हैं, उसकी सौम्यता को भी नष्ट करती हैं।
उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि सरस्वती जी अनेक लघुकथाओं में लोक-जीवन, लोक-परम्पराओं, विस्मृत होते रीति-रिवाजों और उनमें गुँथे सद्भाव की झलक मिलती है। दीपावली पर घर की साफ-सफाई से लेकर, भारत में किस त्योहार पर अथवा परिवार से दूर रह रहे किसी सदस्य के आगमन के अवसर पर खुशियाँ व्यक्त करने के क्या-क्या तरीके थे, उमंग को व्यक्त करने के लिए क्या-क्या व्यंजन बनाए जाते थे, आदि सभी बातें इन लघुकथाओं में मिल जाएँगी। यानी अपने समय का सामाजिक-सांस्कृतिक ताना-बाना भी सरस्वती जी इन लघुकथाओं में पिरोती-बुनती चलती हैं। ‘सपनों की गुलाल’ का यह पैरा देखिए—‘ आज घर में चहल पहल थी, शेखर विदेश से लौट जो रहा था l कुछ दिन बाद ही होली भी आ रही है l माँ बसंती देवी ने बेटे की पसंद की केसरिया खीर, दही बड़े, गुझिया और ठंडाई बनाई और बेचैनी से इंतज़ार करने लगी, वह बहुत बड़ा आँखों का डॉक्टर बन कर जो आ रहा था।’ ये ऐसी बातें हैं जो उन्हें इस काल के अनेक कथाकारों की लघुकथा प्रस्तुतियों से किंचित भिन्न और बेहतर सिद्ध करती हैं। रचना को कथा-रस प्रदान करने में ये प्रयोग सहायक सिद्ध होते हैं।
 विपरीत परिस्थितियाँ दुश्मन बन चुके दो सगे भाइयों के सम्मिलन का भी कारण बन जाती हैं, इस तथ्य को ‘सुबह का भूला’ के माध्यम से समझा जा सकता है। ‘प्रत्यारोपण’ चिकित्सा जैसे जीवनदायी विभागों में भी राजनीतिक दबावों से उपजी उस संवेदनहीनता को व्यक्त करती है, जिसके चलते यह पूरा देश ही पंगु हो गया है। संवेदनहीनता का ही दूसरा उदाहरण ‘दस का नोट’ भी है, लेकिन यहाँ इसे धोखाधड़ी की श्रेणी में रखकर प्रस्तुत किया गया है। ‘घरौंदा’ और ‘रक्षाबन्धन’ मानवीय सौहार्द की बेहतरीन लघुकथाएँ हैं।
भारत भूषण जी के एक गीत की पंक्ति है—वैसे कोई नहीं चाहता, लेकिन क्षुधा करा देती है। ‘बहुरूपिया’ की भिखारिन को इसी के मद्देनजर देखा जाना चाहिए। यों भी, लेखक की नजर दीन-हीन, लाचार पात्रों के बहुरूपियापन की बजाय सम्पन्न और सक्षम लोगों के बहुरूपियापन का पर्दाफाश करे, यही बेहतर है। ‘महिला मंडली’ हल्की-फुल्की रचना है जिसमें लेखिका यह बताने का यत्न करती है कि ठाली बैठी महिलाओं का मुख्य शगल क्या है। यहाँ दीवार भी महिलाएँ हैं और उसके कान भी वे स्वयं ही हैं। ‘गोल्डन फ्रेम’ बताती है कि परिस्थिति विशेष में अनुपयोगी और त्याज्य हो चुकी परम्पराओं को नया रंग-रूप देकर आकर्षक व उपयोगी बनाया जा सकता है।  ‘उपहार’ का दहेज-विरोधी विक्रांत ‘नि:शब्द खड़ा हाथ में रखी फ़्लैट और कार की चाबी को तो देर तक शून्य आँखों से देखता रहा पर शायद माँ की कुटिलता से भरी आँखें नहीं समझ पाया।’ इस एक वाक्य में ही माँ की जिजीविषा को कथाकार ने उसकी सम्पूर्णता में चित्रित कर दिया है।
 ‘बदलाव और प्रेम की सुहानी हवा’ में वह कहती हैं—‘परिवर्तन तो पलटते युग की माँग है ... पश्चिम का यह सूरज पूरब की दिशा में आया है तो चलो, इस उत्सव का स्वागत पूरी बिरादरी को बुलाकर किया जाए।’ यानी ग्राह्य हो तो पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण भी उन्हें स्वीकार्य है; और ग्राह्यता के इस गुण को इस संग्रह की लघुकथाओं के लगभग सभी पात्र तहेदिल से स्वीकारते-अपनाते हैं। ‘अवसर’ का यह पैरा देखिए—‘रमन ने स्नेह भरी निगाहों से स्वरा को देखा और सोचा परिवार के लिये एक तो क्या सौ प्रमोशन क़ुर्बान हैं। अब उसका दिल फूल-सा हल्का हो गया था।’ तात्पर्य यह कि सरस्वती जी की लघुकथाओं में बेटा ही नहीं, बहू भी परिवार के दु:ख-सुख में भागीदारी का दायित्व निर्वाह करती है, भले ही वह भारत में नहीं, अमेरिका में रह रही है। दायित्व-बोध, संस्कृतियों की ग्राह्यता और स्वीकार्यता का यह खुलापन ही वस्तुत: भारतीय दर्शन है। इस दृष्टि से देखा जाए तो सरस्वती माथुर इन लघुकथाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति की प्रस्तोता भी सिद्ध होती हैं। आज के क्लिष्ट समय में, जबकि पारिवारिक सौहार्द गौण होता जा रहा है, व्यक्ति अपने-आप में ही डूबने-उतरने का अभ्यस्त रह गया है, इस संग्रह की लघुकथाएँ व्यापक मानवीय फलक पाठक को दिखाती हैं। कथन-भंगिमा जैसी भी हो, इनके कथ्य अद्भुत हैं, सन्देश और स्थापनाएँ मानवीयता के अति निकट हैं; और इसीलिए ये साहित्य सृजन के लेखकीय दायित्व का निर्वाह भी करती हैं। इनका स्वागत होगा, पूर्ण विश्वास है।
                                                                                                                       —डॉ॰ बलराम अग्रवाल
एम-70, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032                                                 
ई-मेल : 2611ableram@gmail.com                                                                                     मोबाइल : 8826499115


मन  की  बात 
लघुकथा के बारे में 
वर्तमान दौर लघुकथा लेखन का है । यह लघुकथा लेखन गागर में सागर भरने जैसा है। लघुकथा शब्द का निर्माण ‘लघु’ और ‘कथा’ से मिलकर हुआ है अर्थात् लघुकथा गद्य की एक ऐसी विधा है जो आकार में ‘लघु’ है और उसमें ‘कथा’ तत्व विद्यमान है। तात्पर्य यह कि आकारगत लघुता  भी इसकी मुख्य पहचान है। आकार में राई से भी छोटे लघु बीज में जैसे विशाल वटवृक्ष समाहित रहता है उसी तरह लघुकथा की छोटी काया में अपने समय का गहन चिन्तन समाहित रहता है। कलेवर की लघुता के कारण ही कथा के अन्य तत्व इसमें स्वयं ही गौण मान लिए जाते हैं तथापि वे महत्वहीन नहीं हो जाते। लघुकथा को वस्तु और रूप, दोनों दृष्टि से कथा-रस से परिपूर्ण गद्य रचना होना ही चाहिए। यह समसामयिक सरोकारों से जुड़ी नव्य कथा-विधा है। कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कहने की सामर्थ्य रखना इसके लेखक की विशेषता है। वस्तु लघुकथा का प्राणतत्व है और शैली परिधान। किंतु वस्तु को, प्राण को, जितनी अच्छी शैली के परिधान में सजाकर प्रस्तुत करेंगे, उतना ही अधिक उसका प्राणतत्व प्राणवान और प्रभावशाली बनेगा। लघुकथा आज कथा-साहित्य की स्वतंत्र और स्वत: परिपूर्ण विधा है। इसकी लोकप्रियता और स्वीकार्यता का मूलाधार इसकी तीव्र संप्रेषणीयता है । लघुकथा वस्तुत; शब्द और वाक्य के सटीक प्रयोग, शैली और शिल्प की साधना है । 
लघुकथा का उद्भव और विकास प्राचीन काल से ही हुआ माना जाता है । तथापि समकालीन कथा-विधा के रूप में इसका आरम्भ सातवें दशक के उत्तरार्द्ध और आठवें दशक के पूर्वार्द्ध से माना जाता है । सन् 1970 के बाद लघुकथाओं में अच्छा ख़ासा परिवर्तन आया और आठवाँ दशक आरंभ हो जाने से यह एक चर्चित विधा के रूप में चर्चित रही । देखा जाए तो आठवाँ और नौवाँ दशक हिन्दी लघुकथा के विकास के लिए महत्वपूर्ण भी रहा है। आज हम कह सकते हैं कि एक स्तरीय लघुकथा अपने समाज और परिवेश का आइना होती है । पात्र और घटनाएँ हमारी अनुभूति की उपज होते हैं जिन्हें हम भिन्न-भिन्न रूपों में व्यक्त करते हैं, उनमें कल्पना  के आधार पर जो हिस्से जोड़ते हैं वे भी उस यथार्थ से मिलते-जुलते हैं; तभी तो हमारी कल्पना में आते हैं । जीवन में घटित हुआ  कुछ भी अगर मन पर अंकित हो जाये तो चिन्तन में तब्दील हो जाता है । चिन्तन लेखन को दिशा देता है और लेखन जीवन को। कथाकार के समक्ष कथानक और शब्द मिट्टी और पानी की तरह होते हैं। इन्हीं को आवश्यक अनुपात में गूँथकर वह कथा का ढाँचा तैयार करता है । इनमें एक शहर, एक बस्ती, कुछ घर और कुछ लोग होते हैं जिन्हें वह अपने आसपास देखता है । उनकी सहायता के बिना वह न लघुकथा गढ़ सकता है, न कहानी न उपन्यास । जिन परिस्थितियों,चरित्रों और वातावरण को मैंने ख़ुद महसूस किया उन्हें सहज और स्वाभाविक प्रवाह में उतार दिया। वे सब ही इन लघुकथाओं के ‘गुलदस्ता’ के रूप में आपके हाथ में हैं। कितनी सफलता मिलीमैं नहीं जानती। इसलिए, इसका  आकलन आप सब पर छोड़ती हूँ ।
मैं बहुत बहुत आभारी हूँ अपने पति इंजीनियर श्री जे. एल. माथुर जी, बेटे  दीपक माथुर, बहू  प्रज्ञा, बेटी स्वाति व श्वेता की; जिनके संग-साथ व सहयोग के बिना लेखन क़तई संभव नहीं हो पाता । इसी क्रम में अपने पिता श्रीयुत् गणेश नारायण माथुर व माता श्रीमती कृष्णा माथुर का स्मरण करना नहीं भूल पा रही हूँ । नमन करते हुए उन्हें यह लघुकथा संग्रह समर्पित कर रही हूँ। 

                                                                                                —डा.सरस्वती माथुर 


 सरस्वती माथुर के प्रस्तावित संग्रह 'गुलदस्ता' से कुछ लघुकथाएँ

॥ 1 ॥ सोने की नसरनी 

"बेटा जन देती तो पड़दादी सोने की नसरनी चढ़ जाती!"  
प्रसव के बाद अस्पताल से लौटी बहू पर ताना कसती मुहल्ले की एक बूढ़ी ने अपनी पड़ोसन से कहा।
‘‘कोई बात नहीं अम्मा जी, ’’ पड़ोसन बोली, ‘‘कोख खुल गई है तो अगली बार बेटा भी हो ही जाएगा।’’
‘‘तब तक बुढ़िया बची न बची…!’’ बूढ़ी बुदबुदाई।
वाहन से उतरकर, घर में घुसती बहू ने यह वार्तालाप सुना। उसकी आँखें भर आईं ! देहरी पर खड़ी उसकी सास ने तुरन्त ही उन दोनों को सुनाते हुए, मालिश करने आई दाई-माँ से कहा, "अरी भंवरी, सवा महीने की पूजन के साथ एक फंक्शन और रखा है। पूरे मोहल्ले को न्योता देना है।"
"कैसा फंक्शन बीबीजी?" हथेली पर तम्बाकू मसलती भँवरी ने पूछा।
"अरी, तीसरी पीढ़ी की पहली सन्तान है मेरी पोती। मोहेल्लेभर को लड्डू नहीं खिलाऊँगी? बड़ी धाय को भी तो सोने की नसरनी चढ़ाकर मान-सम्मान दूँगी ना!"
बहू की भरी हुई आँखें इस बार बाहर को छलक पड़ीं। उसने कृतज्ञता से सासू माँ की ओर देखा।
बगलवाली बुढ़िया अपने घर में घुस चुकी थी।

॥ 2 ॥ पाँच रुपये का सिक्का
कार जैसे ही मोती डूँगरी के चौराहे पर रुकी, चौदह वर्ष का एक नन्हा बालक राधा की कार के शीशे से सटकर आ खड़ा हुआ।
दीदी जी, बढ़िया खुशबू वाली अगरबत्ती ले लीजिए… मना मत करिएगा… भगवान की क़सम दीदी,  सुबह से बोनी तक नहीं हुई है। बस एक ही ले लीजिए… भगवान आपका भला करेगा। वह गिड़गिड़ाने लगा। 
राधा ने देखा—उसके हाथ में अगरबत्तियों के तरह-तरह के पैकेट थे और वह बदल-बदलकर दिखा रहा था। कार का शीशा नीचे सरकाकर उसने चंदन की गंध वाली अगरबत्ती का एक पैकेट ले लिया। बटुआ खोलकर बीस रुपये का बँधा नोट ढूँढने लगी, पर खुले पंद्रह रुपये ही मिले। बाक़ी नोट पाँच-पाँच सौ के थे। बालक ने देखा—बत्ती हरी हो गयी है! वह पंद्रह रुपये लेकर ही पीछे हट गया। हवा में हाथ हिलाकर बड़ी आत्मीयता से बोला, दीदी, आप लौटते वक़्त दे देना। शाम छह बजे तक मैं यहीं पर सामान बेचता हूँ।
कहकर वह फुटपाथ की तरफ़ भाग गया। पंद्रह रुपये पाकर जो चमक उस बालक के चेहरे पर आई थी, वह राधा से छिपी नहीं रही ।
शाम को आफ़िस से लौटते वक़्त उसने पाँच रुपये का सिक्का बटुए से निकालकर पास की सीट पर रख लिया।
चौराहे के नजदीक पहुँचते-पहुँचते राधा ने निगाहें दौड़ानी शुरू कीं। पर वह दिखाई नहीं दे रहा था। चौराहे की दूसरी तरफ़ ट्रेफ़िक जाम था। कार का शीशा नीचे कर उसने एक व्यक्ति से पूछा, क्या हुआ भैया, इतनी भीड़ क्यों हो रही है?”
किसी का एक्सिडेंट हो गया है जी।कहकर वह आगे बढ़ गया। सीटी बजा-बजाकर पुलिस भीड़ को सड़क से हटा रही थी। सरकती गाड़ियों के बीच राधा ने सड़क पर पड़े व्यक्ति को देखने की कोशिश की। उसका बदन कुचल गया था; लेकिन जैसे ही नज़रें शव के चेहरे पर पड़ीं, वह चौंक पड़ी। उसका कलेजा मुँह को आ गया। सुबह जब वह अगरबत्ती देने के लिये ज़िद कर रहा था तो बराबर बोल रहा था—‘दीदी, मेरे माँ-बाबा बिमार हैं… और कोई कमाने वाला नहीं है।  छह महीने की एक बहन है, उसको दूध चाहिये। हम ग़रीब हैं। पढ़ाई की उम्र में यह सामान बेचना मेरी मजबूरी है। पर दीदी, रात के सरकारी स्कूल में रोज पढ़ने जाता हूँ।’
साथ की सीट पर रखा पाँच का सिक्का मुटठी में दबाकर उसने ज़ोर से आँखें भींच लीं। उसे लगा कि वह किसी गहरे भँवर की स्याह लहरों में गोते लगा रही है ।

॥ 3 ॥ डोर
आठवें माले की बालकनी में खड़ी चारुमित्रा बाल सुखा रही थी।
सुबह की धूप सुहानी लग रही थी। हवा शीतल पंखे-सा आभास दे रही थी।  नीचे, सोसाइटी के पार्क में कुछ बच्चे खेल रहे थे। पुराने कपड़ों को गोल लपेटकर बनाई हुई गेंद से मारा-मारी। सभी बच्चे इस सोसाइटी के फ़्लैटों में झाड़ू-पोंचा करने वाली बाइयों के थे।  
बाइयाँ सड़क-पार की कच्ची बस्ती से आती हैं। स्कूल जाने से रुके छोटे बच्चों को यहाँ पार्क में छोड़, अलग-अलग घरों में घुस जाती हैं। घुसने से पहले खड़े होकर परस्पर बतियाती हैं। उनकी यह आपसदारी रोज़ का नज़ारा है। देखकर लगता है कि देश की राजनीतिक उठा-पटक की तरह इनकी बस्ती और इस कालोनी की राजनीति के मसले भी यहीं विमर्श के भंवर में गोते लगाते हैं।
चारुमित्रा की आज छुट्टी थी। इसलिए उसे बालकनी में लगे फूलों के पौधों व गमलों को देखने में आनन्द आ रहा था। बच्चों के चीखने-चिल्लाने की आवाजों का शोर भी उसे बुरा नहीं लग रहा था। तभी उसकी निगाह आठेक साल के एक काले-कलूटे बच्चे पर पड़ी। खेलने वालों से अलग, वह चारुमित्रा की ओर मुँह उठाए खड़ा था। उसे लगा—शायद कोई विमंदित बच्चा है। खेल नहीं रहा, बस उसकी ओर देखे जा रहा है!
तभी बच्चे ने अँगूठे की पास वाली एक उँगली उठाकर बालकनी की तरफ़ इशारा किया।  
कुछ भी न समझ पाने के भाव से चारुमित्रा ने पूछा, “क्या है?”
बिना बोले उसने फिर उँगली ऊपर को उठा दी। चारुमित्रा ने उसकी उँगली की दिशा में देखा। वहाँ एक लंबी डोर उलझ रही थी और नीचे की तरफ़ जाकर लाल रंग की एक पतंग पर रुक गई थी। उसका इशारा समझ वो मुस्कराई । डोर की लपेटन छुड़ाकर उसने पतंग ढीली कर नीचे की ओर छोड़ दी। बच्चा उसकी ओर लपका।
लेकिन यह क्या ! गेंद खेल रहे सभी बच्चे भी अपना खेल रोक उस ओर लपक पड़े!!
पतंग मंथर गति से हवा में तैरती नीचे को उतरने लगी। उस पर नजरें जमाए, लपकने को उत्सुक सभी बच्चे दोनों हाथ उठाए पैंतरे बदलने लगे। चारुमित्रा उनके उल्लास को देखती, मुस्कराती खड़ी रही। तभी, सिनेमा के किसी दृश्य की तरह सभी बच्चे एकाएक स्थिर हो गये। चारुमित्रा ने झाँककर नीचे की ओर देखा—नीचे उतरती पतंग की डोर तीसरे माले की ग्रिल में अटक गयी थी। थोड़ी देर इंतजार के बाद सभी बच्चे वापस गेंद के खेल में लग गये।
पहले की तरह ही, अपने अन्य साथियों से अलग खड़ा वह बच्चा अब तीसरे माले की ओर मुँह उठाए खड़ा था।
चारुमित्रा का उस पर स्नेह उमड़ पड़ा। वह बालकनी से हटी और तीसरे माले के फ्लैट की ओर जाने के लिए लिफ्ट में जा खड़ी हुई।

॥ 4 ॥ दुर्गा
जेठ की तपती धूप। नौरती ने पेड़ की एक डाल पर गीली धोती का झूला टाँका।  दो माह  के बच्चे को दूध पिलाया और उसमें लिटा दिया।  तृप्त बच्चा पाँवों और हाथों से सायकिल चलाने लगा। वह लू के थपेड़ों से बेख़बर था।
नौरती तगारी में ईंटें धरती। फन्टे पर चढ़ती। दूसरी मंज़िल तक जाकर ख़ाली करती; और लौटती।  बीच-बीच में बच्चे को भी देख लेती थी। सुबह से साँझ के इस क्रम में ठेकेदार की बार-बार टोका-टाकी और दुत्कार से उसकी आंखें भर आतीं। साँझ को दिहाड़ी लेकर घर पहुँचती।
आज भी पहुँची तो उसका पति छोगाराम मूँज की खाट से फुर्ती से  उठा और छीना-छपटी करने लगा।  साँझ होते ही पव्वा पीकर  धुत पड़ जाना उसका रोज़मर्रा  का काम था।
नौरती ने पल्लू की गाँठ को मुट्ठी में कस लिया। गिड़गिड़ाती हुई बोली, छोगाराम, देख मैं फिर पेट से हूँ। तू तो कमाता नहीं है। जो मैं कमाती हूँ वो भी तू दारू में उड़ा देता है। चार बच्चे हैं हमारे। मुझ पर नहीं तो उन पर ही कुछ रहम कर। मैं तेरे हाथ जोड़ती हूँ ।
छोगाराम कहाँ मानने वाला था। नशे की लत ने  उसे जानवर बना दिया था। वह लातों-घूसों से उसे पीटने लगा।
तभी, झोंपड़ी के भीतर से उसकी तेरह साल की बेटी बाहर निकलकर आई। उसके हाथ में एक डंडा था। वह चिल्लाई—रुक जा बापू, माँ को तंग ना कर। मार दूँगी वरना।
नौरती ने हैरानी से बेटी की तरफ़ देखा। छोगा का हाथ भी जहाँ का तहाँ रुक गया।
चंदा  की  वाणी में ग़ज़ब का आत्मविश्वास था। छोगाराम उसकी आवाज़ से सहम गया और वापस मूँज की खाट पर जा बैठा। याद आया कि समाज-सेविका दीदी बस्ती के बच्चों को आज पढ़ा रही थी—‘देश की हर छोरी दुर्गा है। अन्याय के खिलाफ लड़ना उसकी पहली जिम्मेदारी है।’
‘कल से तू भी नौरती के साथ निकलना शुरू कर बेट छोगू!’ डरा-सहमा वह सोचने लगा। उसी उधेड़-बुन में  उसने पास रखे बंडल से बीड़ी निकाली। माचिस की तीली से सुलगाई और धीरे-धीरे पीने लगा।

॥ 5 ॥ बारिश
रात के दो बजे थे जब डोरबैल बजी। नींद की मीठी ख़ुमारी में डूबी सुमन अलसाई-सी अँगड़ाई ले उठी। दरवाज़ा खोला तो हैरान रह गई। काम वाली प्रभाती थी… काली पालिथीन से सिर और कन्धों को पानी से बचाने की नाकाम कोशिश करती हुई।
अरे क्या हुआ प्रभाती! इतनी रात को… ?”
बीबीजी, भयंकर बारिश हो रही है घंटों से। बाकी रात के लिए आपके यहाँ आ जाऊँ? हमारी झोंपड़ी में पानी रिसने लगा है। उसने कातर स्वर में कहा।
पर प्रभाती, तुझे तो मालूम है आज अमेरिका से मेरे मेहमान आए हुए हैं। बरसाती में सामान रखकर तो किसी तरह सबके सोने का इंतज़ाम किया है। तूने ही तो मदद की थी मेरी। घर में कहीं भी सोने-बैठने की जगह कहाँ है?” सुमन ने भारी आवाज में कहा।
ये बात तो आप सही कह रही हो बीबीजी। पर, मेरे बचवा को तेज़ बुखार है। मुन्नी भी तप रही है। चलो, मैं किसी और के यहाँ कोशिश करती हूँ। आप आराम करो बीबीजी। प्रभाती ने माफी माँगती-सी आवाज में कहा।
ठीक है, अपना  ख़्याल  रखना।  कह सुमन ने दरवाज़ा बंद किया और पलंग पर जा लेटी; लेकिन उचटने के बाद नींद एकदम-से आती कहाँ है।
उसके घर से आधा फ़र्लांग पर बसी है कच्ची बस्ती।  ज़रा-सी बारिश में पानी भरने लगता है। प्रशासन का जाने क्यों इधर ध्यान ही नहीं जाता। सोचते-सोचते सुबह के करीब उसकी आँखें लगीं, तभी डोरबैल की आवाज़ से जाग उठी। दूध वाला था।  सामने के फ़्लैट से मिसेज़ गोखलानी भी दूध का पतीला लेकर आ खड़ी हुई। दोनों के बरतनों में दूध नाप वह चला गया।
सुमन, बड़ा बुरा हुआ… अपने पिछवाड़े बनी आलू-फ़ैक्टरी के पास वाली काली बस्ती का नाला टूट गया तीन बजे के आसपास… और पानी के तेज़ बहाव में बस्ती बह गयी…   वह आते ही बोली।
“क्या कह रही हो!” सुमन के मुँह से निकला।
“गश्त लगाता चौकीदार  बताकर गया है कि हमारी कामवाली प्रभाती का भी सारा परिवार पानी की चपेट में आ गया!…”
यह सुनते ही सुमन के हाथ से दूधभरी पतीली छूटकर गिर पड़ी।  बरामदे से उतरकर दूध बारिश के पानी में मिलने लगा…। उसे लगा—दूध-मिले बारिश के पानी का रंग सफ़ेद नहीं, ख़ून-सा लाल है और उसकी ज़िम्मेदार वह है। देर तक बुत बनी वह जहाँ की तहाँ खड़ी रही। उसकी पथराई आँखों में प्रभाती की तस्वीर चिपक-सी गई थी। कानों में उसका कातर अनुरोध गूँजने लगा था—बीबी जी, बाकी रात  के लिए आपके यहाँ  आ जाऊँ!’

॥ 5 ॥ डिस्चार्ज टिकट
राज कोहली लगातार शून्य आँखों से नीरव को देख रहे थे—बिना पलक झपकाए। दवाई देकर नीरव उनके पायताने बैठ गया था। उसने उन्हें देखकर मुस्कुराने की कोशिश की, तो भी वे वैसे ही उसे देखते रहे। सुबह कुछ देर के लिए उनके चेहरे पर कुछ हलचल ज़रूर हुई थी। अस्पष्ट आवाज़ में हकलाते हुए उन्होंने पूछा था, “क्… कौ…ऽ…न… हूँ ?”
छह महीने बाद उनके मुँह से जब ये शब्द निकले थे, तो डाक्टर वहीं खड़े थे। उन्होंने तुरंत उनकी नब्ज़ टटोली, रक्तचाप लिया। फिर बोले, यह सब-कुछ भूल चुके हैं,  पर शुक्र है अपनी मातृभाषा नहीं भूले; वरना हमारे पास तो ऐसे भी केस आये हैं जिनमें मरीज कोई दूसरी ही भाषा बोलने लगता है। इनका अवचेतन मन अभी भी सक्रिय है । हमने अपनी तरफ़ से कोशिश करके देख लिया है। पर अब कोई भी दवाई असर नहीं कर रही है मिस्टर कोहली। अब, ईश्वर पर भरोसा कीजिए। यहाँ के मुकाबले घर पर आप इनकी अच्छी देखभाल कर सकेंगें, इसलिये इन्हें  आज अस्पताल से छुट्टी दे रहें हैं।
डाक्टर कैसे कहते कि अब वह ज़्यादा लंबा नहीं जी सकेंगें।” यों कहते हुए उन्होंने डिस्चार्ज टिकट नीरव के हाथ में थमा दिया।
उसे याद आया कि पिताजी हमेशा कहते थे—‘मैं जब भी मरूँगा, अपने गाँव की चौखट पर ही मरूँगा।’ वही पिता अपना गाँव भूल गये हैं! जिस माँ को देखकर ही उनकी आँखों में चमक आ जाती थी, उसे सामने पाकर भी उनकी आँखें निस्तेज हैं!!
हालाँकि वो अपने बेटे नीरव तक को नहीं पहचान रहे हैं! अपना घर, अपना बैंक अकाउंट… सब भूल गये हैं! फिर भी, उसने फ़ोन करके सभी निकट सम्बन्धियों को बुला लिया है। शायद कोई चमत्कार हो जाए! सभी सगे-सम्बन्धी, जिनके बच्चों तक के नाम पिताजी को मुँह-ज़बानी याद थे, जिनकी आवाजें वो फ़ोन पर पहचान जाते थे…  वे उन  सब को  भूल गये हैं। वार्ड में आने वाले डाक्टरों-नर्सों और अपरिचित-परिचित चेहरों को ठहरी हुई नजरों से देखते हुए पड़े है। कभी-कभार केवल पलकें झपकाते हैं, बस। ऐसे मौके पर जब भी नीरव उनकी आँखों में देखता है, उसे लगता है कि वह ज़रूर ठीक हो जायेंगे। उम्मीद पर ही तो दुनिया क़ायम है।
वह पिता के माथे पर प्यार से हाथ फेरता है तो एकाएक ऐसा लगता कि वह इस शख़्स का बेटा नहीं, पिता है। उनके माथे को चूमकर वह अपनी रुलाई रोकते हुए तेज़ क़दमों से वार्ड से निकल गया है—डिस्चार्ज टिकट से जुड़ी औपचारिकताएँ पूरी करने, रिसेप्शन की ओर।

डा. सरस्वती माथुर : संक्षिप्त परिचय  

शिक्षाविद एवम सोशल एक्टिविस्ट, कवियत्री-लेखिका-साहित्यकार व हाइकुकार
 
साहित्य देश की साहित्यिक पत्रिकाओं में कवितायेँ ,कहानियां ,आलेख एवम नये नारी सरोकारों पर प्रकाशन

4 कृतियाँ प्रकाशित व साझा संकलन में कवितायें, कहानियाँ, लघुकथाएँ व हाइकु संकलित
काव्य संग्रह : प्रयास
1॰एक यात्रा के बाद
2.मेरी अभिव्यक्तियाँ
3.विज्ञान : जैवप्रोधोयोगिकी ( Biotechnology )एक पुस्तक जैव प्रोधोगिकी पर प्रकाशित
मोनोग्राम : राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी सीरीज़ के तहत : मोनोग्राम हरिदेव जोशी
साझा संकलन में कहानी कवितायें, लघुकथाएँ व हाइकु  व आलेख शामिल
पुरस्कार / सम्मान :
दिल्ली प्रेस द्वारा 1970 में कहानी ‘बुढ़ापा’ पुरस्कृत।
भारतीय साहित्य संस्थान म.प्र. द्वारा काव्य में बेस्ट कविता के लिये
Felicitation & अवार्ड given by Association ऑफ़ : डिस्ट्रिक्ट झालावाड द्वारा साहित्य में योगदान के लिये! जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल-13 में कवितानामा  सत्र में  भागीदारी
शोभना साहित्य सम्मान।
विगत कई वर्षों से निरंतर लेखन। कविता, कहानी, पत्रकारिता, समीक्षा, फ़ीचर लेखन के साथ-साथ समाज साहित्य एवं संस्कृति पर देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन।
शिक्षा व सामाजिक सरोकारों में योगदान, साहित्यिक गोष्ठियों व सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी, आकाशवाणी दूरदर्शन व विभिन्न साहित्यिक एवं शिक्षा संस्थाओं से संबद्ध, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया,पब्लिक रिलेशन काउंसिल आफ इंडिया वुमन विंग की पूर्व अध्यक्षा, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया (राजस्थान चैप्टर की चार्टर
सदस्या), गिल्ड आफ विमन एचिवर (राजस्थान चैप्टर) से संबद्ध।
जयपुर लिटरेरी फ़ैस्टिवल में कवितानामा में भागीदारी।
विदेश यात्रा के दौरान अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन के विभिन्न शहरों की संस्कृति को देखने समझने का अवसर मिला ।
संपर्क : ए-२, सिविल लाइन, जयपुर-6
दूरभाष ; 0141-2229621