Friday 21 October 2016

लघुकथा संकलनों की सूची (1971 से 2016)

आवरण : कुँअर रवीन्द्र
दिनांक 19 अक्टूबर 2016 के अंक में सन् 1971 से सन् 2016 तक  प्रकाशित लघुकथा संग्रहों की सूची प्रकाशित की थी। यहाँ प्रस्तुत है उक्त काल में प्रकाशित लघुकथा संकलनों की सूची। ये सब नाम  मेरी सद्य: प्रकाशित पुस्तक 'हिन्दी लघुकथा का मनोविज्ञान' के अन्त में दर्ज़ हैं। आप सभी मित्रों के अवलोकनार्थ वह सूची यहाँ दे रहा हूँ। जिन मित्रों के संग्रहों के नाम इसमें छूट गये हों, वे तुरन्त मुझे मेरे ई-मेल 2611ableram@gmail.com पर अथवा फेसबुक पर मेरे मैसेज बॉक्स में उसकी सूचना दे सकते हैं।                                                                  --बलराम अग्रवाल
  •  दो धाराएँ: ब्रजभूषण सिंह आदर्श एवं शशांक आदर्श: 1972
  •  गुफाओं से मैदान की ओर: रमेश जैन एवं भगीरथ परिहार (सं.): 1974
  • प्रतिनिधि लघुकथाएँ: सतीश दुबे एवं सूर्यकान्त नागर (सं.): दिसम्बर 1976
  • समान्तर लघुकथाएँ: नरेन्द्र मौर्य, नर्मदाप्रसाद उपाध्याय (सं.): 1977
  • श्रेष्ठ लघुकथाएँ: शंकर पुणताम्बेकर (सं.): 1977
  • छोटी-बड़ी बातें: महावीर प्रसाद जैन, जगदीश कश्यप (सं.): 1978
  • आठवें दशक की लघुकथाएँ: सतीश दुबे (सं.): 1979
  • कितनी आवाजें: विकेश निझावन, हीरालाल नागर (सं.): 1980
  • लघुकथा: दिशा एवं दिशा: अरविंद, कृष्ण कमलेश (सं.): 1981
  • बोलते हाशिये: राजा नरेन्द्र (सं.): 1981
  • बिखरे संदर्भ: सतीशराज पुष्करणा (सं.): 1981
  • हस्ताक्षर: शमीम सर्मा (सं.): 1982
  • आतंक: धीरेन्द्र शर्मा, नन्दल हितैषी (सं.): 1983
  • स्वरों का आक्रोश: हरनाम शर्मा (सं.): 1983
  • अनकहे कथ्य: अशोक वर्मा (सं.): 1984
  • प्रतिवाद: कमल चोपड़ा (सं.): 1984
  • चीखते स्वर: नरेन्द्र प्रसाद ‘नवीन’ (सं.): 1984
  • सबूत दर सबूत: महेन्द्र सिंह महलान-मोहन योगी (सं.): 1984
  • कथानामा-1: बलराम (सं.): 1985
  • कथानामा-2: बलराम (सं.): 1985
  • आदमीनामा:  सिद्धेश्वर-तारिक असलम ‘तस्नीम’ (सं.): 1985
  • आज के प्रतिबिम्ब: सतीशराज पुष्करणा (सं.): 1985
  • अपवाद: कमल चोपड़ा (सं.): 1986
  • आयुध: कमल चोपड़ा (सं.): 1986
  • दस्तावेज़: प्रेम गुप्ता ‘मानी’ (सं.): 1986
  • कल हमारा है: मदन अरोरा (सं.): 1986
  • आवाजें: रूप देवगुण, राजकुमार निजात (सं.): 1986
  • हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ लघुकथाएँ: सतीशराज पुष्करणा (सं.): 1986
  • संघर्ष: महेन्द्र सिंह महलान, अंजना अनिल (सं.): 1987
  • बिहार की हिन्दी लघुकथाएँ: सतीशराज पुष्करणा (सं.): 1988
  • भारतीय लघुकथा कोश-1: बलराम (सं.): 1989
  • भारतीय लघुकथा कोश-2: बलराम (सं.): 1989
  • जिन्दगी के आसपास: राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’ (सं.): 1989
  • अलाव फूँकते हुए: कुलदीप जैन (सं.): 1990
  • साँझा हाशिया: कुमार नरेन्द्र (सं.): 1991
  • मंथन: महेन्द्र सिंह महलान, अंजना अनिल (सं.): 1991
  • अपराजित कथा-1: रामजी शर्मा ‘रजिका’ (सं.): 1991
  • हिन्दी की जनवादी लघुकथाएँ: रामयतन यादव (सं.): 1991
  • हिन्दी की सशक्त लघुकथाएँ: रूप देवगुण (सं.): 1991
  • समक्ष: सतीश राठी (सं.): 1991
  • स्त्री-पुरुष संबंधों की लघुकथाएँ: सुकेश साहनी (सं.): 1992
  • महानगर की लघुकथाएँ: सुकेश साहनी (सं.): 1993
  • परिहासिनी: बलराम अग्रवाल (सं.): 1996
  • तीसरा क्षितिज: सतीश राठी (सं.): 1996
  • कथाबिंदु: रूपसिंह चन्देल, सुभाष नीरव, हीरालाल नागर (सं.): 1997
  • देह-व्यापार की लघुकथाएँ: सुकेश साहनी (सं.): 1997
  • हिमाचल की श्रेष्ठ लघुकथाएँ: रतन चंद ‘रत्नेश’ (सं.): 1998
  • दिशाएँ: डाॅ सतीशराज पुष्करणा (सं.): 2000
  • बीसवीं सदी: प्रतिनिधि लघुकथाएँ: सुकेश साहनी (सं.): 2000
  • लघु कथा संग्रह भाग-एक: जयमन्त मिश्र (सं.): 2001
  • लघु कथा संग्रह भाग-दो: जयमन्त मिश्र (सं.): 2001
  • दरकते किनारे: सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा (सं.): 2002
  • झूठे सच: विश्वप्रताप भारती (सं.): 2005
  • राजस्थान की चर्चित लघुकथाएँ: भगीरथ (सं.): 2006
  • कोसी अंचल की लघुकथाएँ: महेन्द्र नारायण ‘पंकज’ (सं.): 2006
  • समप्रभ: प्रतापसिंह सोढी-योगेन्द्रनाथ शुक्ल (सं.):  2006
  • प्रतीकात्मक लघुकथाएँ: रामकुमार घोटड़ (सं.): 2006
  • पौराणिक सन्दर्भ की लघुकथाएँ: रामकुमार घोटड़ (सं.): 2006
  • प्रतिनिधि लघुकथाएँ: तारिक असलम ‘तस्नीम’ (सं॰): 2006
  • बीसवीं सदी की चर्चित हिंदी लघुकथाएँ: जगदीश कश्यप (सं.): 2007
  • दलित समाज की लघुकथाएँ: रामकुमार घोटड़ (सं.): 2008
  • मानक हिन्दी लघुकथा कोश-1: बलराम (सं.): 2009
  • मानक हिन्दी लघुकथा कोश-2: बलराम (सं.): 2009
  • नींव के नायक: अशोक भाटिया (सं.): 2010
  • तेलुगु की मानक लघुकथाएँ: बलराम अग्रवाल (सं.): 2010
  • हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकथा: रूप देवगुण (सं.): 2010
  • आधुनिक हिंदी लघुकथाएं: त्रिलोक सिंह ठकुरेला (सं.): 2012
  • लघुकथाएँ मेरी पसन्द: सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु (सं.): 2012
  • दिल्ली की लघुकथाएँ: अनिल शूर आजाद (सं.): 2013
  • पड़ाव और पड़ताल: मधुदीप (सं.): 2013
  • नारी संवेदना की लघुकथाएँ: मालती बसंत-कुंकुम गुप्ता (सं.) 2013
  • लघुकथा: देश-देशान्तर: सुकेश साहनी-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु (सं.): 2013
  • लघुकथाएँ जीवन-मूल्यों की: सुकेश साहनी-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु (सं.): 2013
  • हरियाणा की समकालीन लघुकथा: सुभाष रस्तोगी (सं.): 2013
  • मध्यप्रदेश की लघुकथाएँ: अनिल शूर आजाद (सं.): 2014
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-6: अशोक भाटिया (सं.): 2014
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-2: बलराम अग्रवाल (सं.): 2014
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-4: भगीरथ (सं.): 2014
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-3: मधुदीप (सं.): 2014
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-5: मधुदीप (सं.): 2014
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-7: मधुदीप (सं.): 2014
  • गुलाम भारत की लघुकथाएँ: रामकुमार घोटड़ (सं.): 2014
  • पंजाब से लघुकथाएँ: अशोक भाटिया (सं.): 2015
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-10: अशोक वर्मा (सं.): 2015
  • ककुभ-4: कुँवर प्रेमिल (सं.): 2015
  • मुट्ठी भर अक्षर: नीलिमा शर्मा (सं.): 2015
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-8: प्रबोध कुमार गोविल (सं.): 2015
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-9: मधुदीप (सं.): 2015
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-11: मधुदीप (सं.): 2015
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-13: मधुदीप (सं.): 2015
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-14: मधुदीप (सं.): 2015
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-15: मधुदीप (सं.): 2015
  • पड़ाव और पड़ताल खण्ड-12: रामकुमार घोटड़ (सं.): 2015
  • हरियाणा महिला लघुकथा लेखन: परिदृश्य: रूप देवगुण (सं.): 2015
  • हरियाणा से लघुकथाएँ : अशोक भाटिया (सं.): 2016
  • मधुदीप की 66 लघुकथाएँ: उमेश महादोषी (सं.): 2016
  • भगीरथ की 66 लघुकथाएँ: मधुदीप (सं.): 2016
  • बलराम अग्रवाल की 66 लघुकथाएँ: मधुदीप (सं.): 2016
  • सतीश दुबे की 66 लघुकथाएँ: मधुदीप (सं.): 2016
  • कमल चोपड़ा की 66 लघुकथाएँ: मधुदीप (सं.): 2016
  • अशोक भाटिया की 66 लघुकथाएँ: मधुदीप (सं.): 2016
  • सतीशराज पुष्करणा की 66 लघुकथाएँ: मधुदीप (सं.): 2016
  • मधुकान्त की 66 लघुकथाएँ: मधुदीप (सं.): 2016
  • चलें नीड़ की ओर: कान्ता राय (सं.): 2016
  • बूँद बूँद सागर: जितेन्द्र जीतू, नीरज सुधांशु (सं.): 2016
  • समसामयिक हिंदी लघुकथाएँ: त्रिलोक सिंह ठकुरेला (सं.): 2016
  • आँखों देखी लघुकथा: विकास मिश्र (सं.): 2016
  • लघुकथा अनवरत: सुकेश साहनी-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ (सं.): 2016
  • आदिम पुराकथाएँ (पुराकथा संकलन) वसन्त निरगुणे (सं.): 2016
 कुछ और लघुकथा संकलन--विगत दशक की पंजाबी लघुकथाएँ: श्याम सुन्दर अग्रवाल-श्याम सुन्दर ‘दीप्ति’ (सं.) ; ककुभ-2: कुँवर प्रेमिल (सं.); ककुभ-3: कुँवर प्रेमिल (सं);  असफल दाम्पत्य की लघुकथाएँ: इं. केदारनाथ (सं.); नारी जीवन की लघुकथाएँ: इं. केदारनाथ; इमारत: महेन्द्र सिंह महलान-अंजना अनिल (सं.)

Wednesday 19 October 2016

लघुकथा संग्रह सूची (1971 से 2016)

सन् 1971 से सन् 2016 तक  प्रकाशित जिन लघुकथा संग्रहों की सूचना मुझे प्राप्त हुई थी, उन सबके नाम  मेरी सद्य: प्रकाशित पुस्तक 'हिन्दी लघुकथा का मनोविज्ञान' के अन्त में दर्ज़ हैं। आप सभी मित्रों के अवलोकनार्थ वह सूची यहाँ दे रहा हूँ। जिन मित्रों के संग्रहों के नाम इसमें छूट गये हों, वे तुरन्त मुझे मेरे ई-मेल 2611ableram@gmail.com पर अथवा फेसबुक पर मेरे मैसेज बॉक्स में उसकी सूचना दें।                                                                                            --बलराम अग्रवाल

लघुकथा संग्रह  सूची (प्रकाशन वर्ष के क्रम में)

¨    ऐतिहासिक लघुकथाएँ: आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र: 1971
¨    नया पंचतन्त्र : रामनारायण उपध्याय: 1974
¨    सिसकता उजास: डाॅ सतीश दुबे: 1974
¨    मोहभंग : प्रो. कृष्ण कमलेश: 1975
¨    निर्माण के अंकुर : शरद कुमार मिश्र ‘शरद’: 1975
¨    अभिमन्यु का सत्ताव्यूह : श्रीराम ठाकुर ‘दादा’: 1977
¨    छोटी-बड़ी बातें: महावीर प्रसाद जैन-जगदीश कश्यप: 1978
¨    कालपात्र : दुर्गादत्त दुर्गेश: 1979
¨    एक और अभिमन्यु: सनत मिश्र: 1979
¨    नीम चढ़ी गुरबेल : श्रीराम मीणा: 1980
¨    विकलांग श्रद्धा का दौर : हरिशंकर परसाई: 1980
¨    आपकी कृपा है : विष्णु प्रभाकर : 1982
¨    मिट्टी की गंध : चन्द्रभूषण सिंह ‘चन्द्र’: 1984
¨    मुटठी भर आक्रोश : मुकेश रावल: 1985
¨    कांकर पाथर : श्याम सुन्दर व्यास: 1985
¨    अक्षरों के आँसू : शराफत अली खान : 1985
¨    तुलसी चैरे पर नागफनी : डाॅ॰ उपेन्द्र प्रसाद राय: 1987
¨    प्रसंगवश : सतीशराज पुष्करणा : 1987
¨    यहीं-कहीं: सुरेश जांगिड़ उदय : 1989
¨    कौन जीता कौन हारा : विष्णु प्रभाकर: 1989
¨    बदलती हवा के साथ : डाॅ सतीशराज पुष्करणा: 1990
¨    अभिप्राय: कमल चोपड़ा: 1990
¨    भीड़ में खोया आदमी: डाॅ सतीश दुबे: 1990
¨    अपने-अपने दायरे: पवन शर्मा: 1990
¨    हिस्से का दूध: मधुदीप: 1991
¨    डरे हुए लोग: सुकेश साहनी: 1991
¨    अतीत का प्रश्न: मालती महावर: 1991
¨    इस बार: कमलेश भारतीय: 1992
¨    मृगजल: बलराम: 1992
¨    इक्कीस जूते: रामकुमार आत्रेय : 1993
¨    जहर के खिलाफ: सतीशराज पुष्करणा: 1993
¨    सरसों के फूल: बलराम अग्रवाल: 1994
¨    खाते बोलते हैं : अशोक वर्मा: 1995
¨    मेरी बात तेरी बात : मधुदीप : 1995
¨    रुकी हुई हंसिनी : बलराम : 1995
¨    प्रहार : गोविन्द गौड़ : 1996
¨    जंग लगी कीलें : पवन शर्मा : 1996
¨    मैं समय हूँ : विपिन जैन : 1996
¨    तीन न तेरह : पृथ्वीराज अरोड़ा : 1997
¨    ईश्वर की कहानियाँ : विष्णु नागर : 1997
¨    आग : माधव नागदा : 1998
¨    प्रेक्षागृह : डाॅ सतीश दुबे : 1998
¨    असभ्य नगर : रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ : 1998
¨    आँखों वाले अंधे : रामकुमार आत्रेय : 1999
¨    उल्लास: चैतन्य त्रिवेदी: 2000
¨    परिवर्तन: माला वर्मा: 2000
¨    अंधेरे के विरुद्ध: डाॅ मिथिलेश कुमारी मिश्र: 2000
¨    तरकश का आखिरी तीर: अतुल मोहन प्रसाद: 2001
¨    सच्चा सुख: आशा मेहता: 2001
¨    दो सौ ग्यारह लघुकथाएँ: उषा जैन शीरीं: 2001
¨    अन्यथा: कमल चोपड़ा: 2001
¨    इधर उधर से: बीजेन्द्र कुमार जैमिनी: 2001
¨    केक्टस:  मोइनुद्दीन अतहर: 2001
¨    अभिमन्यु की जीत: राजेन्द्र वर्मा: 2001
¨    जंगल की आग: सी. रा. प्रसाद: 2001
¨    राजा नंगा हो गया: सुनीता सिंह: 2001
¨    सलीब पर टँगे चेहरे: सुरेन्द्र कुमार अंशुल: 2001
¨    यथार्थ के साये में: आलोक भारती: 2002
¨    रूडोल्फ पाइनर: अनु. अमृत मेहता: 2002
¨    सुरंगनी: कृष्णा भटनागर: 2002
¨    कीलें: कालीचरण प्रेमी: 2002
¨    घोषणापत्र: जीवितराम सेतपाल: 2002
¨    हजारों-हजार बीज: भगवान दास वैद्य ‘प्रखर’: 2002
¨    बदले हुए शब्द: भारती खुबालकर:  2002
¨    मीमांसा: मथुरानाथ सिंह ‘रानीपुरी’: 2002
¨    एक और एकलव्य: मदन लाल वर्मा: 2002
¨    ब्लैकबोर्ड: मधुकांत: 2002
¨    अपने आसपास: मनु स्वामी: 2002
¨    हलफनामा: मनोज सोनकर: 2002
¨    छँटता कोहरा: डाॅ. मिथिलेश कुमारी मिश्र: 2002
¨    जब द्रोपदी नंगी नहीं हुई: युगल: 2002
¨    कागज के रिश्ते: राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’: 2002
¨    सरोवर में थिरकता सागर: वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज: 2002
¨    शब्द साक्षी है: सतीश राठी: 2002
¨    रोटी का निशान: सुखचैन सिंह भंडारी: 2002
¨    अपनी-अपनी सोच: संतोष गर्ग: 2002
¨    पश्चाताप की आग: सुदर्शन भाटिया: 2002
¨    साॅरी सर!: सुदर्शन भाटिया: 2002
¨    गुस्ताखी माफ: सुदर्शन भाटिया: 2002
¨    लुटेरे छोटे-छोटे: सत्यप्रकाश भारद्वाज: 2002
¨    यह भी सच है: डाॅ. शैल रस्तौगी: 2002
¨    मेरा शहर और ये दंगे: डाॅ. शैल रस्तौगी: 2002
¨    स्याह सच: हृषीकेश पाठक: 2002
¨    कटाक्ष: किशोर श्रीवास्तव: 2003
¨    लपटें: चित्रा मुद्गल: 2003
¨    कदम कदम पर हादसे: जगदीश कश्यप: 2003
¨    अनुभव: डाॅ.. नरेन्द्र नाथ लाहा: 2003
¨    पूजा: पृथ्वीराज अरोड़ा: 2003
¨    लघुदंश : प्रद्युम्न भल्ला: 2003
¨    खुलते परिदृश्य: प्रेम विज: 2003
¨    नमस्कार प्रजातन्त्र: महेन्द्र राजा: 2003
¨    मीरा जैन की सौ लघुकथाएँ: मीरा जैन: 2003
¨    भूखे पेट की डकार: रविशंकर परसाई: 2003
¨    यह मत पूछो: रूप देवगुण: 2003
¨    उत्तराधिकारी: सुदर्शन भाटिया: 2003
¨    पहाड़ पर कटहल: सुदर्शन वशिष्ठ: 2003
¨    कीकर के पत्ते: शराफत अली खान: 2003
¨    देन उसकी हमारे लिए: अन्तरा करवड़े: 2004
¨    सपनों की उम्र: अशोक मिश्र: 2004

¨    अछूते संदर्भ: कनु भारतीय: 2004
¨    बयान: चित्रा मुद्गल: 2004
¨    सच के सिवा: जसवीर चावला: 2004
¨    कड़वे सच: दलीप भाटिया: 2004
¨    सफेद होता खून: डाॅ. प्रदीप शर्मा ‘स्नेही’: 2004
¨    सागर के मोती: डाॅ. प्रभाकर शर्मा: 2004
¨    जुबैदा: बलराम अग्रवाल: 2004
¨    चन्ना चरनदास: (कहानी-लघुकथा) बलराम अग्रवाल: 2004
¨    मुर्दे की लकड़ी: भगवान देव चैतन्य: 2004
¨    बुढ़ापे की दौलत: मालती वसंत: 2004
¨    पोस्टर्स: मनोज सोनकर: 2004
¨    कर्तव्य-बोध: माणक तुलसीराम गौड़: 2004
¨    अपना हाथ जगन्नाथ: सुदर्शन भाटिया: 2004
¨    कीकर के पत्ते: शराफत अली खान: 2004
¨    अपना अपना दुःख: शिवनाथ राय: 2004
¨    उसी पगडंडी पर पाँव: डाॅ. शील कौशिक: 2004
¨    चुभन: अतुल मोहन प्रसाद: 2005
¨    प्रभात की उर्मियाँ: आशा शैली: 2005
¨    अन्तर्मन की कथाएँ: करुणाश्री: 2005
¨    आस्था के फूल: कमल कपूर: 2005
¨    भोर होने तक: कृष्ण लता यादव: 2005
¨    कसकती बीथियाँ: कृष्णा भटनागर: 2005
¨    अनुवांशिकी: कुँवर प्रेमिल: 2005
¨    आज का सच: प्रो.॰ जितेन्द्र सूद: 2005
¨    अनुष्ठान: डाॅ. नरेन्द्र मिश्र ‘धड़कन’: 2005
¨    जाँच: मनोज सोनकर: 2005
¨    अन्तर्मन की आग: मीरा शलभ: 2005
¨    वर्तमान का सच: मोइनुद्दीन अतहर: 2005
¨    गर्म रेत: युगल: 2005
¨    फूल मत तोड़ो: प्रो. रघुवीर ‘अनाम’: 2005
¨    दूर होता गाँव: राजेन्द्र परदेसी: 2005
¨    उसका सपना: रेखा कारड़ा: 2005
¨    व्यथा रोग: ललित नारायण उपाध्याय: 2005
¨    बच्चा और गेंद: विष्णु नागर: 2005
¨    बेदर्द माँ:  विनोद खनगवाल: 2005
¨    दिनदहाड़े: सरला अग्रवाल: 2005
¨    रथ का पहिया: सुदर्शन भाटिया: 2005
¨    मजदूर का मसीहा: सुदर्शन भाटिया: 2005
¨    सुविधा शुल्क: सुदर्शन भाटिया: 2005
¨    तो यह बात है: सुदर्शन भाटिया: 2005
¨    रोशनी की किरचें: डाॅ. सुधा जैन: 2005
¨    हवा के खिलाफ: सुरेन्द्र कुमार अंशुल: 2005
¨    प्रसाद: सुरेन्द्र गुप्त: 2005
¨    कही-बतकही: सूरज मृदुल: 2005
¨    प्रतिनिधि लघुकथाएँ: अनिल शूर आजाद: 2006
¨    गुलाब के काँटे: अशोक माधव: 2006
¨    स्वांतः सुखाय: उर्मिला कौल: 2006
¨    उल्टी गिनती: चेतना भाटी: 2006
¨    आतंकवादी: जसबीर चावला: 2006
¨    आज का समाजवाद: जगतनारायण प्यारा वशिष्ठ: 2006
¨    पोस्टकार्ड: जीवितराम सेतपाल: 2006
¨    प्रतिनिधि लघुकथाएँ: तारिक असलम तस्नीम: 2006
¨    पहली उड़ान: देवेन्द्र गो. होल्कर: 2006
¨    समयचक्र: नदीम अहमद नदीम: 2006
¨    कानून के फूल: पवन चैधरी ‘मनमौजी’: 2006
¨    नेगेटिव्ज: मनोज सोनकर: 2006
¨    कूरियर: मनोज सोनकर: 2006
¨    कागज की नाव: महेन्द्र राजा: 2006
¨    यह दिल्ली है बुढ़ऊ: मदन मोहन वर्मा: 2006
¨    शिक्षा और संस्कार : मालती वसंत : 2006
¨    पड़ाव से आगे : युगल : 2006
¨    मानसगंध: रमेश सिद्धार्थ: 2006
¨    रू-ब-रू: डाॅ. रामकुमार घोटड़: 2006
¨    छोटी-सी बात: रामकुमार आत्रोय: 2006
¨    देवदासी: रामबहादुर माथुर ‘व्यथित’: 2006
¨    नई सदी की लघुकथाएँ: रामप्रसाद अटल: 2006
¨    सुहागरात: वीरेन्द्र कुमार भटनागर: 2006
¨    दीवार के पार: संजय कुमार शर्मा: 2006
¨    समय का दर्पण: सुकीर्ति भटनागर: 2006
¨    जज्बात : सुखवंत सिंह मरवाहा: 2006
¨    यू आर ग्रेट: सुदर्शन भाटिया: 2006
¨    संकल्प में शक्ति: सुदर्शन भाटिया: 2006
¨    विषबीज: सूर्यकांत नागर: 2006
¨    सुख की साँस: शिवनाथ राय: 2006
¨    विडम्बना: शैल चन्द्रा: 2006
¨    मैं हिन्दू हूँ: असगर वजाहत: 2007
¨    अंजुरीभर साहित्य: अनिल शूर ‘आजाद’: 2007
¨    सच को तलाशती लघुकथाएँ: डाॅ.अरुणेन्द्र भारती: 2007
¨    कोख का दर्द: आचार्य भगवान देव ‘चैतन्य’: 2007
¨    भविष्य से साक्षात्कार: इन्दु गुप्ता: 2007
¨    गांधारी की पीड़ा: इन्दिरा खुराना: 2007
¨    नंगा नाचे मातादीन: डाॅ. उपेन्द्र प्रसाद राय: 2007
¨    चेतना के रंग: कृष्ण लता यादव: 2007
¨    तलाश: गुरनाम सिंह रीहल: 2007
¨    हौं कहता अँखियन देखी: नरेन्द्र सिंह: 2007
¨    एक और गान्धारी: नरेन्द्र कौर छाबड़ा: 2007
¨    आओ इन्सान बनाएँ: पृथ्वीराज अरोड़ा: 2007
¨    सायरन: मनोज सोनकर: 2007
¨    प्रतिहार: मुकुट सक्सेना: 2007
¨    कथन: वीरबाला भावसागर: 2007
¨    समकालीन सौ लघुकथाएँ: डाॅ. सतीश दुबे: 2007
¨    हाशिए का आदमी: संतोष सुपेकर: 2007
¨    इन्द्रधनुषी लघुकथाएँ: सुदर्शन भाटिया: 2007
¨    आधुनिक समाज की लघुकथाएँ:  सुदर्शन भाटिया: 2007
¨    कलियुग की लघुकथाएँ: सुदर्शन भाटिया: 2007
¨    पौराणिक तथा ऐतिहासिक लघुकथाएँ: सुदर्शन भाटिया: 2007
¨    दूध का दूध पानी का पानी: सुदर्शन भाटिया: 2007
¨    विश्वगुरु भारत: सुदर्शन भाटिया: 2007
¨    पागल कौन: सुशील डाबर ‘साथी’: 2007
¨    शुद्धिपत्र : सुशील ‘शीलू’: 2007
¨    मेरी प्रिय लघुकथाएँ: सुरेन्द्र कृष्ण: 2007
¨    ऐसा भी होता है: शैल रस्तोगी: 2007
¨    नावक के तीर: श्याम सखा ‘श्याम’: 2007
¨    मेरी एक सौ इक्कीस लघुकथाएँ: श्रीराम ठाकुर ‘दादा’: 2007
¨    अपने देश में: हरनाम शर्मा: 2007
¨    तुम क्या जानो: अशोक गुजराती: 2008
¨    साकार स्वप्न: अर्चना अर्ची: 2008
¨    दृष्टि: उर्मिकृकृष्ण: 2008
¨    ऐसे न थे तुम: कमलेश भारतीय: 2008
¨    पर्दे के पीछे: किशनलाल शर्मा: 2008
¨    कोमा में मछली: जसबीर चावला: 2008
¨    सुनो, रहमान बाबू: जोगिन्दरपाल सिंह: 2008
¨    भेड़िया जिन्दा है: ज्ञानदेव मुकेश: 2008
¨    खुदा की देन: तारिक असलम तसनीम: 2008
¨    टूटे हुए चेहरे: देवेन्द्र नाथ साह: 2008

¨    डोंगी: नीरज नैथानी: 2008
¨    किरचें: प्रदीप शर्मा ‘स्नेही’: 2008
¨    शब्द संवाद: प्रताप सिंह सोढ़ी: 2008
¨    सीधी है भोली कला भाल में रची चावल रोली: पारस दासोत: 2008
¨    चुभन: भानु सिंहल: 2008
¨    नींद टूटने के बाद: मधुकांत: 2008
¨    खिड़कियाँ: मनोज सोनकर: 2008
¨    माँ की तस्वीर: माणक तुलसीराम गौड़: 2008
¨    मुखरित संवेदनाएँ: डाॅ. मुक्ता: 2008
¨    लघुकथाओं का पिटारा: डाॅ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल: 2008
¨    रेत का सफर: राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’: 2008
¨    कथा संवाद: राज हीरामन(माॅरीशस) : 2008
¨    स्वर्ग से जम्बूद्वीप तक : वेद शर्मा: 2008
¨    आज के देवता : सैली बलजीत: 2008
¨    पूनम की चाँदनी: सत्यपाल ‘निश्चिंत’: 2008
¨    समय का सच: सुधा जैन: 2008
¨    भीड़ में: सुरेन्द्र मंथन: 2008
¨    विष-कन्या: सुरेन्द्र अरोड़ा: 2008
¨    बुद्धि और बल: सुदर्शन भाटिया: 2008
¨    आशा की किरण: डाॅ. हरनेक सिंह कैले: 2008
¨    आजादी की फसल: अमरीक सिंह दीप: 2009
¨    अन्तत: आलोक भारती: 2009
¨    दुपट्टा: विकेश निझावन: 2009
¨    नंगा सच: रोहित यादव: 2009
¨    कस्तूरी गंध: अंजु दुआ जैमिनी: 2009
¨    मानवता के हत्यारे: गणेश प्रसाद महतो: 2009
¨    अपने-अपने सपने: घनश्याम अग्रवाल: 2009
¨    जल तरंग: ज्योति जैन: 2009
¨    तस्तरी चाँदी की: प्रो. जितेन्द्र सूद: 2009
¨    थाली कैसे बजेगी: देव शर्मा: 2009
¨    हम जहाँ हैं: पवन शर्मा: 2009
¨    वह अजनबी: प्रदीप शशांक: 2009
¨    अर्थ के आँसू: मोहम्मद आरिफ: 2009
¨    दृष्टि: मोइनुद्दीन अतहर: 2009
¨    अक्षय तूणीर: मुरलीधर वैष्णव: 2009
¨    फूलों वाली दूब: युगल: 2009
¨    हो चुका फैसला: डाॅ. राम निवास मानव: 2009
¨    कोठरी वाली माँ: डाॅ. राजेन्द्र साहिल: 2009
¨    मौन पुकार: राम कुमार गहलावत: 2009
¨    आधी दुनिया की लघुकथाएँ: डाॅ. रामकुमार घोटड़: 2009
¨    मेरी श्रेष्ठ लघुकथाएँ: डाॅ. रामकुमार घोटड़: 2009
¨    घाव करे गम्भीर: राज हीरामन: 2009
¨    कतरा कतरा सच: लक्ष्मी रूपल: 2009
¨    आवरण के आर-पार: सत्यवीर ‘मानव’: 2009
¨    सीपी में सागर: सरला अग्रवाल: 2009
¨    अँधेरे में आँख: अशोक भाटिया: 2010
¨    धूमकेतु: अरविन्द बेलवाल: 2010
¨    मुश्किल काम: असगर वजाहत: 2010
¨    कबूतरों से भी खतरा है: एन. उन्नी: 2010
¨    आस्था के फूल: करुणाश्री: 2010
¨    सत्यमेव जयते: गुरनाम सिंह: 2010
¨    सुनामी सड़क: चेतना भाटी: 2010
¨    तेंतीसवीं पुतली: जसवीर चावला: 2010
¨    युगगाथा: त्रिलोक सिंह बृजवाल: 2010
¨    दर्द अपना-अपना: नन्दल हितैषी: 2010
¨    एहसास: नरेन्द्र गौड़: 2010
¨    मेरी लोकप्रिय लघुकथाएँ: निर्मला सिंह: 2010
¨    चुभते लम्हे: टी. महादेव राव: 2010
¨    दर्पण एक बिम्ब अनेक: प्रकाश तातेड़: 2010
¨    सिर्फ तुम: पंकज शर्मा: 2010
¨    आम आदमी से सम्बन्धित लघुकथाएँ: पुष्पलता कश्यप: 2010
¨    101 लघुकथाएँ: मीरा जैन: 2010
¨    मेरी शैक्षिक लघुकथाएँ: मधुकांत: 2010
¨    बाॅस का डिनर: महेश राजा: 2010
¨    मोती-से आँसू: रमेश माहेश्वरी ‘राजहंस’: 2010
¨    हिमायत: राम निवास बाँयला: 2010
¨    उम्रकैद: राजेन्द्र सिंह यादव: 2010
¨    प्रतिनिधि लघुकथा शतक: रत्नकुमार सांभरिया: 2010
¨    बन्द आँखों का समाज: सन्तोष सुपेकर: 2010
¨    कतरन: सत्यनारायण सिंह ‘आलोक’: 2010
¨    छोटे छोटे महायुद्ध: संतोष परिहार: 2010
¨    संजय कामरेड हो गया: संदीप तोमर: 2010
¨    एक मुट्ठी आसमान: सिमर सदोष: 2010
¨    आत्मिक शान्ति: सुदर्शन भाटिया: 2010
¨    101 लघुकथाएँ: विजय अग्रवाल: 2011
¨    आकाशदीप: नरेश कुमार उदास: 2012
¨    वचन: पूरन सिंह: 2012
¨    सत्यमेव जयते : डाॅ. लीला मोरे धुलधुये: 2012
¨    गुलामी तथा अन्य लघुकथाएँ: वेदप्रकाश अमिताभ: 2012
¨    सफर में आदमी: सुभाष नीरव: 2012
¨    अजनबी: सुरेन्द्र प्रसाद: 2012
¨    टुकड़ा-टुकड़ा जि़न्दगी: हरपाल सिंह पँवार: 2012
¨    मेरी किन्नर केद्रित लघुकथाएँ: पारस दासोत: 2013
¨    मेरी मनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ: पारस दासोत: 2013

¨    बूंदों का उपहार: रंजना फतेपुरकर: 2013
¨    वेदना संवेदना: सुधा भार्गव: 2013
¨    विरासत: अमित कुमार: 2014
¨    कथा शतक: अंजुल कंसल ‘कनुप्रिया’: 2014
¨    हरी-सुनहरी पत्तियाँ: कमल कपूर: 2014
¨    नीम का पेड़: किशनलाल शर्मा: 2014
¨    रामदीन का चिराग: गोविन्द शर्मा: 2014
¨    तेरा मेरा खुदा: जफर मेंहदी जाफरी: 2014
¨    उतरन: ज्ञानदेव मुकेश: 2014
¨    हौसला: मधुकान्त: 2014
¨    बिके हुए लोग: वसंत निरगुणे: 2014
¨    तीसरा पैग: सुरेन्द्र अरोड़ा: 2014
¨    दिन अपने लिए: शोभा रस्तोगी: 2014
¨    गैर हाजिर रिश्ता: श्याम सुन्दर दीप्ति: 2014
¨    बेटी का हिस्सा: श्याम सुन्दर अग्रवाल: 2014
¨    माटी कहे: आभा सिंह: 2015
¨    अनर्थ: कमल चोपड़ा: 2015
¨    घाट पर ठहराव कहाँ: कान्ता राय: 2015
¨    आँगन से राजपथ: पवित्रा अग्रवाल: 2015
¨    पीले पंखों वाली तितलियाँ: बलराम अग्रवाल: 2015
¨    समय का पहिया: मधुदीप: 2015
¨    उसे नहीं मालूम: महेन्द्र नेह: 2015
¨    थोड़ी-सी हँसी: माला वर्मा: 2015
¨    दर्पण के उस पार: रामकुमार घोटड़: 2015
¨    ट्वीट: सतीश दुबे: 2015
¨    अंदाज नया: अशोक गुजराती: 2016
¨    जीवन का प्रवाह: कल्पना विजयवर्गीय: 2016
¨    आँगन-आँगन हरसिंगार: कमल कपूर: 2016
¨    पथ का चुनाव : कान्ता राय: 2016
¨    अनसुलझा प्रश्न : किशनलाल शर्मा: 2016
¨    एक पेग जिन्दगी : पूनम डोगरा: 2016
¨    रिंगटोन : ब्रजेश कानूनगो: 2016
¨    सम्यक लघुकथाएँ : मीरा जैन: 2016
¨    एक सेल्फी रिश्तों की : रश्मि प्रणय वागले : 2016
¨    किसी और देश में : विनय कुमार : 2016
¨    इत्रफ़रोश : रोहित शर्मा : 2016
¨    उद्गारों का कलश : कमल नारायण मेहरोत्रा: 2016
¨    ततः किम: संध्या तिवारी: 2016

कुछ और लघुकथा संग्रह----खिली धूप: रुखसाना सिद्दीकी; मेरी रोचक और प्रेरक लघुकथाएँ: सुभाष चन्द्र लखेड़ा; बड़ा भिखारी: रमेश मनोहरा; अन्दर एक समन्दर: सुरेश तन्मय; बोलता आईना: रघुविन्द्र यादव; अपनी-अपनी पीड़ा: रघुविन्द्र यादव; अभी बुरा समय नहीं आया है: राधेश्याम भारतीय; गुरु-ज्ञान : बालकृष्ण शर्मा ‘गुरु’; लघुकथाएँः वैज्ञानिक की कलम से: सुभाष चन्द्र लखेड़ा; पतझड़ में मधुमास:  कृष्णलता यादव;  सच की परछाइयाँ: सावित्री जगदीश; आप ठीक कहते हैं: लक्ष्मी रूपल; उमंग, उड़ान और परिन्दे राजकुमार निजात; शरीफ जसबीर: जसबीर सिंह; मुखौटों के पार: मोइनुद्दीन अतहर; दृष्टि : मोइनुद्दीन अतहर;  मुखौटे: लक्ष्मी शर्मा; अनकही पीड़ा: सुकीर्ति भटनागर; फोकस: सुनील विकास चौधरी;  गाँधीगीरी: आरिफ मोहम्मद; कला का मूल्य: जवाहर इन्दु; कोमा में मछलियाँ: जसबीर चावला;  समकालीन लघुकथाएँ: डा. अरुणेन्द्र भारती; सच को तलाशती लघुकथाएँ: डा. अरुणेन्द्र भारती; चेतना के रंग: कृष्ण लता यादव

Thursday 8 September 2016

लघुकथा और मधुदीप / कमल किशोर गोयनका



साहित्य का क्षेत्र सभी के लिए समान रूप से खुला है। सम्भवत: अपनी इसी धारणा के अन्तर्गत मधुदीप एक ऐसा प्रस्ताव लेकर मेरे सामने आए थे जो मेरे लिए तब सर्वथा नया न होकर भी नया ही था। यह 1988 के मध्य किसी माह की बात है जब मधुदीप ‘पड़ाव और पड़ताल’ नाम की एक स्वयं द्वारा सम्पादित पांडुलिपि लेकर मेरे पास आए थे। उनका आग्रह था कि मैं उस पांडुलिपि के आधार लेख के रूप में लघुकथा पर कुछ लिखकर दूँ। उनके इस आग्रह से पहले मैंने डॉ॰ सतीश दुबे के लघुकथा संग्रह ‘सिसकता उजास’ पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी ही लिखी थी, बस।  नवलेखन को सहानुभूतिपूर्वक देखना प्रारम्भ से  मेरे आचरण में रहा है। लेकिन यह नवलेखन के साथ-साथ नई विधा का भी मामला था। सर्वथा नई विधा पर आधार लेख लिखना निश्चित रूप से एक चुनौतीपूर्ण कार्य था; इसलिए मधुदीप के आग्रह को एकाएक टाल देना मैंने उचित नहीं समझा। ‘हाँ’ कर दी। लघुकथा के कुछेक तत्कालीन रुझानों और रवैयों का अध्ययन करके मैंने तब ‘लघुकथा : कुछ विचारणीय प्रश्न’ शीर्षक लेख लिखा जो ‘पड़ाव और पड़ताल’ (प्र॰ सं॰ 1988) में प्रकाशित हुआ।  मधुदीप के उस समय तक 6 उपन्यास और एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके थे; यानी वह भी ठीक-ठाक लेखन के बाद लघुकथा में आए थे, नए मुल्ला नहीं थे। देखा जाए तो इस तरह ‘पड़ाव और पड़ताल’ का सम्पादक और भूमिका लेखक दोनों ही लघुकथा से बाहर के व्यक्ति थे। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि बाद के अनेक वर्षों तक कुछ कूप-मंडूकों ने आलोचक के तौर पर लघुकथा में मेरे प्रवेश को ‘बाहरी व्यक्ति’ की घुसपैठ करार दिया।  दुर्भाग्य से, वे आज जीवित नहीं हैं: होते तो देखते कि लघुकथा के बाहर वाले दो व्यक्तियों का रोंपा वह पौधा आज 25 महत्वपूर्ण शाखाओं वाला ऊँचा और घना वटवृक्ष बन चुका है जिसकी 100 से ऊपर हरी-भरी शाखाओं पर विभिन्न रंग, रूप और स्वर वाले परिंदे चहचहा रहे हैं और जिसकी विस्तृत छाँह तले भविष्य में भी कितने ही प्राणी बहुत-कुछ सीख और गुन सकेंगे।
कथाकार मधुदीप
मधुदीप पहली मुलाकात से ही मुझे संकल्पवान व्यक्ति लगे। वह उपन्यास और कहानी लेखन से लघुकथा लेखन में आए थे; लेकिन लघुकथा को उन्होंने कभी भी अपने लेखन की तीसरी विधा नहीं माना, इसके प्रति प्रारम्भ से ही समर्पण-भाव रखा। लघुकथा लेखन में वह कब आए, मुझे नहीं मालूम। मैं बस इतना जानता हूँ कि उन्होंने अपने समय के बहुत-से लघुकथाकारों की तरह धड़ाधड़ लघुकथाएँ नहीं लिखीं। उन्होंने अपनी लघुकथाओं की संख्या पर कम उनकी गुणवत्ता पर ध्यान केन्द्रित रखने का प्रयास अधिक किया। सन् 1991 में प्रकाशित उनके लघुकथा संग्रह ‘तेरी बात मेरी बात’ में मात्र 30 लघुकथाएँ थीं । उन लघुकथाओं से अलग उस संग्रह के बाद उनकी कोई लघुकथा किसी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हुई हो, उसका मुझे ज्ञान नहीं है। मेरा अनुमान है कि ये ही लघुकथाएँ 1988 में प्रकाशित उनके कथा-संग्रह ‘हिस्से का दूध’ में उनकी कुछ कहानियों के साथ संग्रहीत थीं; तात्पर्य यह कि  1988 से लेकर 1991 तक की अवधि में उन्होंने कोई नई लघुकथा नहीं लिखी थी।
अब, सम्भवत: 1913 से, उन्होंने लघुकथा-लेखन की दूसरी पारी शुरू की है। 25 साल के लम्बे अन्तराल के बाद उनका तन-मन और धन ही नहीं, मजबूत कलम के साथ पुन: लघुकथा विधा के उन्नयन के लिए कूद पड़ना ही वह कारण है जिसकी वजह से मेरे इस विश्वास को बल मिला कि मधुदीप एक संकल्पवान व्यक्ति हैं । दूसरी पारी में लिखित नई लघुकथाओं के साथ वर्ष 2015 में प्रकाशित उनका लघुकथा संग्रह ‘समय का पहिया…’ इस बात का प्रमाण है कि प्रकाशन और सम्पादन के साथ-साथ वे लघुकथा-लेखन में भी पूरी शक्ति के साथ संलग्न हैं ।
उनकी पहले दौर की जिन लघुकथाओं के कथ्य मुझे अभी भी प्रिय हैं उनमें  ‘अस्तित्वहीन नहीं’, ‘ऐलान-ए- बग़ावत’ और ‘हिस्से का दूध’ का नाम मैं विशेष रूप से लेना पसन्द करूँगा। समाज में व्यक्ति की स्थिति को जितना त्रासद बेरोज़गारी बनाती है, अल्प वित्त पोषण भी उसे उतना ही दीन-हीन बनाता है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय समाज की आधे से अधिक आबादी आज भी अल्प वित्त पोषित आबादी है। बहुत-से परिवारों में आज भी बच्चे के ‘हिस्से का दूध’ अतिथि की चाय की भेंट चढ़ाना पड़ जाता है। मधुदीप की अधिकतर लघुकथाओं के कथ्य आर्थिक अभावों की पीड़ा को शब्द देते हैं, तथापि तत्कालीन राजनीति के घिनौने हो चुके चेहरे पर से नकाब हटाने का प्रयास भी उनकी कुछेक लघुकथाओं में हुआ अवश्य है।
मैं प्रारम्भ से ही लघुकथा को ‘लेखकविहीन विधा’ कहता और मानता आया हूँ। अध्ययन सम्बन्धी किंचित अस्पष्टता के कारण बलराम अग्रवाल ने इसका गलत अर्थ ग्रहण किया और  ‘अवध पुष्पांजलि’ पत्रिका के एक अंक में लेख लिखकर ‘लेखकविहीनता’ की मेरी अवधारणा पर अपना विरोध जताया; लेकिन बाद में मेरे समझाने पर इस सिद्धांत से वह सहमत हो गया। आज स्थिति यह है कि वह स्वयं मेरी इस अवधारणा का अर्थ और लघुकथा में उसके प्रभाव से दूसरे लेखकों को परिचित कराने का यत्न करता है। इधर, अपने दूसरे लघुकथा संग्रह ‘समय का पहिया…’ की कुछेक लघुकथाओं में मधुदीप ने कथा-कथन की ‘सूत्रधार शैली’ का प्रयोग किया है।  यथा, ‘तो पाठको! यह चालीस वर्ष का किस्सा यहीं समाप्त होता है। अब आप इसे लघुकथा मानें या न मानें, इसका निर्णय मैं आप पर ही छोड़ता हूँ।’ (समय बहुत बेरहम होता है)। ‘तो पाठको ! आप मुझे कौन-से विकल्प की सलाह देते हैं? शायद आपकी सलाह ही मुझे उलझन से बाहर निकाल सके।’ (विकल्प)। ‘तो पाठको ! यह किस्सा यूँ समाप्त होता है कि…’ (किस्सा इतना ही है)। यह शैली कुछ पाठकों को उक्त लघुकथाओं में लेखक के आ उपस्थित होने का भ्रम दे सकती है। मैं स्पष्ट कर दूँ कि लघुकथा में लेखक का आ उपस्थित होना इससे एकदम अलग स्थिति होती है। लेखक द्वारा पाठक से एकत्व स्थापित करने के प्रयास को रचना में उसका उपस्थित होना नहीं माना जाता है। लघुकथा में लेखक इससे अलग, एक नहीं अनेक प्रकार से आ उपस्थित होने की गलती अक्सर ही कर बैठता है। उनमें से एक यह है कि उसकी कथा के पात्र अपनी नहीं, लेखक की भाषा बोलते हैं; अपने स्तर के अनुरूप नहीं, लेखक की विद्वता के अनुरूप शब्द बोलते हैं। दूसरी यह है कि रचना के अन्त में लेखक एक समाधानपरक टिप्पणी लगाकर आलोचक की भूमिका अपना बैठता है। लेखक कब रचना में आ उपस्थित हुआ, इस बात का पता कभी-कभी स्वयं उसे भी नहीं चल पाता है। उदाहरण के लिए, मधुदीप की लघुकथा ‘वज़ूद की तलाश’ का यह समापन वाक्य देखें—‘मुझे लगता है, मेरी तलाश पूरी हो गयी है।’ लघुकथा को क्योंकि आत्मपरक शैली में लिखा गया है, इसलिए लेखक के आ उपस्थित होने का खतरा किंचित बढ़ गया है। अन्य नामधारी पात्रों की तुलना में लेखक ‘मैं’ में स्वयं को अधिक इन्वॉल्व पाता है, पात्र को स्वयं में महसूस करने या पात्र की काया में प्रवेश करने में उसे सुविधा महसूस होती है। ‘वजूद की तलाश’ का यह पात्र यदि ‘मैं’ की बजाय, मान लीजिए ‘राम’ होता तो इस अन्तिम वाक्य को यों लिखा जाता—‘राम को लगता है, उसकी तलाश पूरी हो गयी है।’ इस तरह के वाक्य निश्चित रूप से आलोचक के अधिकार-क्षेत्र में दखल के नाते लघुकथा में त्याज्य होने चाहिए।
नि:सन्देह, ‘किस्सागोई’ कथा कहने की एक लोकप्रिय और मनभावन शैली है, तथापि ‘नैरेशन’ को ‘किस्सागोई’ अथवा ‘किस्सागोई’ को ‘नैरेशन’ नहीं समझ लिया जाना चाहिए।  मधुदीप की दूसरे दौर की लघुकथाओं में यह सावधानी नजर भी आती है और अधिकतर प्रभावित भी करती है; तथापि मेरा मानना है कि लघुकथा जैसी लघुकाय कथा-रचना के लेखक को मात्र नैरेशन अथवा उसके आधिक्य से यथासम्भव बचना चाहिए। ‘किस्सागोई’ शैली में लिखी गई रचनाओं के कथ्य और भाषा को भी मुख्यत: संवाद ही प्रभावशाली, प्रवहमान, आकर्षक और सम्प्रेषक बनाते हैं।
मधुदीप की दूसरे दौर की लघुकथाओं में मेरे अनुसार,  मुख्यत: ‘ऑल आउट’, ‘एकतन्त्र’, ‘ठक-ठक…ठक-ठक’, ‘दौड़’, ‘मुआवज़ा’, ‘मुक्ति’, ‘मेरा बयान’, ‘महानायक’, ‘धर्म’ का जिक्र स्तरीय रचनाओं के रूप में किया जाना चाहिए। उन्होंने इस दौर में शैलीपरक कुछ अन्य प्रयोग भी अपनी लघुकथाओं में लिए हैं। यथा—‘डायरी का एक पन्ना’ को डायरी-शैली में, ‘महानगर का प्रेम-संवाद’ व ‘साठ या सत्तर से नहीं’ को संवाद-शैली में तथा ‘समय का पहिया घूम रहा है’ को नाट्य-शैली में लिखा है। मधुदीप की लघुकथाओं में विषय वैविध्य प्रभावित करता है जो कि इस दौर के कुछ बड़े लघुकथारों में भी कम ही देखने को मिलता है। उनकी लघुकथाओं के शीर्षकों पर अलग से बात की जा सकती है।
मधुदीप के व्यवहार में कुछ महत्वपूर्ण भाव मुझे देखने को मिलते हैं। इनमें पहला है—कुछ अच्छा कर दिखाने की ज़िद। अब से लगभग 28 वर्ष पहले, 1988 में मैंने विक्रम सोनी और उनके लेखन पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी लिखी थी। उसके एक अंश को यहाँ उद्धृत कर रहा  हूँ—‘प्रत्येक साहित्य-आन्दोलन में कुछ वास्तविक प्रतिभा-सम्पन्न लेखकों के साथ लेखक बने अलेखकों की भी एक भीड़ होती है, जिसमें कुछ कदम चलकर पुराने लोग अदृश्य होने लगते हैं और नए सम्मिलित होते रहते हैं। ऐसे अलेखक, निष्ठाहीन रचनाकार एक भीड़ बन जाते हैं और प्रतिभा-सम्पन्न रचनाकारों को अपनी संख्या की शक्ति से छिपा देना चाहते हैं, किंतु यह भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगती है, क्योंकि दूर तक चलने की क्षमता इसमें नहीं होती। यह भीड़ आन्दोलन को अपयश का भागी बनाती है, रास्ते में काँटे बोती है, किंतु अनजाने में लाभ भी पहुँचाती है; और वह यह कि यह भीड़ ही साहित्यिक आन्दोलन अथवा नई साहित्यिक प्रवृत्ति को देश के कोने-कोने तक, जन-जन तक पहुँचाती है और पाठकों का एक बड़ा वर्ग निर्मित करती है।’ लघुकथा लेखकों की इस भीड़ में हम अनेक ऐसे नाम गिना सकते हैं जो प्रतिभा दिखाने के बावजूद या तो इस विधा में नहीं टिक पाए या समूचे लेखकीय परिदृश्य से ही गायब हो गये। लम्बे समय तक स्वयं मधुदीप उक्त भीड़ का हिस्सा बने रहे; लेकिन उनके अन्दर के वास्तविक लेखक ने अन्तत: अँगड़ाई ली और आगे की मुहिम के लिए उठ खड़ा हुआ। उनके अन्दर के इस भाव को ही मैंने ‘कुछ अच्छा कर दिखाने की ज़िद’ कहा है। इस ज़िद के चलते ही अपने संयोजन और सम्पादक में प्रकाशित ‘पड़ाव और पड़ताल’ के प्रथम 15 खंडों में उन्होंने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर अब तक के लगभग समूचे इतिहास को किसी न किसी रूप समेट लिया है। दूसरा है—लघुकथा के लिए समर्पण भाव, जिसके बारे में अब अधिक स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं रह गयी है। तीसरा और अत्यधिक महत्वपूर्ण भाग है—अहंकारविहीनता और सम्पादकीय स्पष्टता। यह लेख लिखे जाने तक ‘पड़ाव और पड़ताल’ के 19 खंड मुझ तक पहुँच चुके हैं। मैं हैरान हूँ उनमें आए ‘समर्पण पृष्ठ’  और सम्पादकीय स्वरूप लिखे प्रारम्भिक पृष्ठों की सामग्री को देखकर। इतने बड़े काम का श्रेय स्वयं लेने की बजाय इस व्यक्ति ने उसे विभिन्न रचनाकारों को अर्पित किया है। सामान्य चलन जब कि यही है कि कार्य का यथायोग्य श्रेय कोई भी व्यक्ति किसी अन्य को देना ही नहीं चाहता, सब-कुछ स्वयं लूट लेना चाहता है। इतिहास में नाम लिखाने की इस लिप्सा से मधुदीप को मैं दूर खड़ा पाता हूँ। इतिहास साक्षी  है कि लिप्सा से यह दूरी ही किसी व्यक्ति को इतिहास में बनाए रखती है। मैं देख रहा हूँ कि ‘पड़ाव और पड़ताल’ श्रृंखला के जिन खण्डों का सम्पादन मधुदीप ने किया है, एक नजर उन के समर्पण पृष्ठों पर डालते हैं—‘उन सभी लघुकथाकारों को जो इस पड़ाव तक मेरे सहयात्री रहे हैं’ (खण्ड—1): ‘यह खण्ड 2013 ई॰ के नाम जिसने मुझे इस विधा में पुन; सक्रिय किया’ (खण्ड—3);  ‘यह खण्ड 1976 ई॰ के नाम जहाँ से मैंने लघुकथा का सफर शुरू किया था’ (खण्ड—5);  ‘यह खण्ड भाई बलराम अग्रवाल को समर्पित, जिन्होंने ‘पड़ाव और पड़ताल’ श्रृंखला को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले सहयोग भरा हाथ आगे बढ़ाया’ (खण्ड—7);  ‘यह खण्ड मेरी दिनांक 29 नवम्बर से 5 दिसम्बर 2014 तक इन्दौर एवं उज्जैन की साहित्यिक-सांस्कृतिक यात्रा की मधुर स्मृति को समर्पित’ (खण्ड—9);  ‘यह खण्ड लघुकथा के सहयात्री भाई मधुकान्त को समर्पित’ (खण्ड—11);  ‘लघुकथा के सहयात्री भाई कुमार नरेन्द्र के लिए’ (खण्ड—13); ‘यह खण्ड नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला-2013 की उस शाम को समर्पित है जब (डॉ॰) कविता सिंह ‘पड़ाव और पड़ताल’ के 1988 में प्रकाशित खण्ड को तलाश करती हुई दिशा प्रकाशन के स्टॉल पर आई थीं। शायद उसी समय ही मैंने इस श्रृंखला को आगे बढ़ाने का मन बना लिया था।’ (खण्ड—14) ‘यह खण्ड शकुन्तदीप को समर्पित है, जिसके मानसिक और आर्थिक सहयोग के बिना लघुकथा की इस श्रृंखला को आगे बढ़ा पाना सम्भव नहीं था।’ (खण्ड—15); ‘यह खण्ड मैं अपने पूज्य पिताजी (स्व॰) भगवानदास जी की पावन स्मृति को समर्पित करता हूँ’ (खण्ड—16); ‘यह खण्ड समकालीन लघुकथा के प्रारम्भिक हस्ताक्षर रमेश बतरा की स्मृति को समर्पित है जिसके असमय चले जाने से लघुकथा विधा की अपूरणीय क्षति हुई’ (खण्ड—17); ‘यह खण्ड आदरणीय विष्णु प्रभाकर की स्मृति को समर्पित है जिन्होंने इस विधा को प्रतिष्ठा दिलवाने में अपनी सम्पूर्ण क्षमता से योगदान दिया’ (खण्ड—18)। इस श्रृंखला के जिन खण्डों का सम्पादक अन्य लोगों ने किया है, इसमें उनके समर्पण पृष्ठों का उल्लेख नहीं है, भले ही श्रृंखला संयोजक होने के नाते उन्हें भी मधुदीप ने ही लिखा हो।
         कहने का तात्पर्य यह कि मधुदीप श्रेय को सम्बन्धित व्यक्ति में ही नहीं। तत्सम्बन्धी परिस्थिति, समय और स्थान में बाँटने के विशुद्ध भारतीय या कहें कि विशुद्ध मानवीय संस्कार  से युक्त हैं। यह संस्कार व्यापक दृष्टिबिध से उत्पन्न होता है। यही कारण है कि वे अपनी पूरी शक्ति से इस विधा के उन्नयन में जुट पा रहे हैं। किसी समय मैंने कहा था—इक्कीसवीं सदी लघुकथा की होगी। मधुदीप के लेखन और सम्पादन ने मेरे कथन को पुष्ट करने की ओर सार्थक कदम बढ़ाया है। इस कार्य में उनकी सफलता के लिए मैं हृदय से अनन्त मंगलकामनाएँ प्रस्तुत करता हूँ। 
                                                  (लेख साभार 'घुकथा का समय' से)

सम्पर्क—डॉ॰ कमल किशोर गोयनका, ए-98, अशोक विहार फेज़ 1,  दिल्ली-110052