Thursday 8 September 2016

लघुकथा और मधुदीप / कमल किशोर गोयनका



साहित्य का क्षेत्र सभी के लिए समान रूप से खुला है। सम्भवत: अपनी इसी धारणा के अन्तर्गत मधुदीप एक ऐसा प्रस्ताव लेकर मेरे सामने आए थे जो मेरे लिए तब सर्वथा नया न होकर भी नया ही था। यह 1988 के मध्य किसी माह की बात है जब मधुदीप ‘पड़ाव और पड़ताल’ नाम की एक स्वयं द्वारा सम्पादित पांडुलिपि लेकर मेरे पास आए थे। उनका आग्रह था कि मैं उस पांडुलिपि के आधार लेख के रूप में लघुकथा पर कुछ लिखकर दूँ। उनके इस आग्रह से पहले मैंने डॉ॰ सतीश दुबे के लघुकथा संग्रह ‘सिसकता उजास’ पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी ही लिखी थी, बस।  नवलेखन को सहानुभूतिपूर्वक देखना प्रारम्भ से  मेरे आचरण में रहा है। लेकिन यह नवलेखन के साथ-साथ नई विधा का भी मामला था। सर्वथा नई विधा पर आधार लेख लिखना निश्चित रूप से एक चुनौतीपूर्ण कार्य था; इसलिए मधुदीप के आग्रह को एकाएक टाल देना मैंने उचित नहीं समझा। ‘हाँ’ कर दी। लघुकथा के कुछेक तत्कालीन रुझानों और रवैयों का अध्ययन करके मैंने तब ‘लघुकथा : कुछ विचारणीय प्रश्न’ शीर्षक लेख लिखा जो ‘पड़ाव और पड़ताल’ (प्र॰ सं॰ 1988) में प्रकाशित हुआ।  मधुदीप के उस समय तक 6 उपन्यास और एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके थे; यानी वह भी ठीक-ठाक लेखन के बाद लघुकथा में आए थे, नए मुल्ला नहीं थे। देखा जाए तो इस तरह ‘पड़ाव और पड़ताल’ का सम्पादक और भूमिका लेखक दोनों ही लघुकथा से बाहर के व्यक्ति थे। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि बाद के अनेक वर्षों तक कुछ कूप-मंडूकों ने आलोचक के तौर पर लघुकथा में मेरे प्रवेश को ‘बाहरी व्यक्ति’ की घुसपैठ करार दिया।  दुर्भाग्य से, वे आज जीवित नहीं हैं: होते तो देखते कि लघुकथा के बाहर वाले दो व्यक्तियों का रोंपा वह पौधा आज 25 महत्वपूर्ण शाखाओं वाला ऊँचा और घना वटवृक्ष बन चुका है जिसकी 100 से ऊपर हरी-भरी शाखाओं पर विभिन्न रंग, रूप और स्वर वाले परिंदे चहचहा रहे हैं और जिसकी विस्तृत छाँह तले भविष्य में भी कितने ही प्राणी बहुत-कुछ सीख और गुन सकेंगे।
कथाकार मधुदीप
मधुदीप पहली मुलाकात से ही मुझे संकल्पवान व्यक्ति लगे। वह उपन्यास और कहानी लेखन से लघुकथा लेखन में आए थे; लेकिन लघुकथा को उन्होंने कभी भी अपने लेखन की तीसरी विधा नहीं माना, इसके प्रति प्रारम्भ से ही समर्पण-भाव रखा। लघुकथा लेखन में वह कब आए, मुझे नहीं मालूम। मैं बस इतना जानता हूँ कि उन्होंने अपने समय के बहुत-से लघुकथाकारों की तरह धड़ाधड़ लघुकथाएँ नहीं लिखीं। उन्होंने अपनी लघुकथाओं की संख्या पर कम उनकी गुणवत्ता पर ध्यान केन्द्रित रखने का प्रयास अधिक किया। सन् 1991 में प्रकाशित उनके लघुकथा संग्रह ‘तेरी बात मेरी बात’ में मात्र 30 लघुकथाएँ थीं । उन लघुकथाओं से अलग उस संग्रह के बाद उनकी कोई लघुकथा किसी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हुई हो, उसका मुझे ज्ञान नहीं है। मेरा अनुमान है कि ये ही लघुकथाएँ 1988 में प्रकाशित उनके कथा-संग्रह ‘हिस्से का दूध’ में उनकी कुछ कहानियों के साथ संग्रहीत थीं; तात्पर्य यह कि  1988 से लेकर 1991 तक की अवधि में उन्होंने कोई नई लघुकथा नहीं लिखी थी।
अब, सम्भवत: 1913 से, उन्होंने लघुकथा-लेखन की दूसरी पारी शुरू की है। 25 साल के लम्बे अन्तराल के बाद उनका तन-मन और धन ही नहीं, मजबूत कलम के साथ पुन: लघुकथा विधा के उन्नयन के लिए कूद पड़ना ही वह कारण है जिसकी वजह से मेरे इस विश्वास को बल मिला कि मधुदीप एक संकल्पवान व्यक्ति हैं । दूसरी पारी में लिखित नई लघुकथाओं के साथ वर्ष 2015 में प्रकाशित उनका लघुकथा संग्रह ‘समय का पहिया…’ इस बात का प्रमाण है कि प्रकाशन और सम्पादन के साथ-साथ वे लघुकथा-लेखन में भी पूरी शक्ति के साथ संलग्न हैं ।
उनकी पहले दौर की जिन लघुकथाओं के कथ्य मुझे अभी भी प्रिय हैं उनमें  ‘अस्तित्वहीन नहीं’, ‘ऐलान-ए- बग़ावत’ और ‘हिस्से का दूध’ का नाम मैं विशेष रूप से लेना पसन्द करूँगा। समाज में व्यक्ति की स्थिति को जितना त्रासद बेरोज़गारी बनाती है, अल्प वित्त पोषण भी उसे उतना ही दीन-हीन बनाता है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय समाज की आधे से अधिक आबादी आज भी अल्प वित्त पोषित आबादी है। बहुत-से परिवारों में आज भी बच्चे के ‘हिस्से का दूध’ अतिथि की चाय की भेंट चढ़ाना पड़ जाता है। मधुदीप की अधिकतर लघुकथाओं के कथ्य आर्थिक अभावों की पीड़ा को शब्द देते हैं, तथापि तत्कालीन राजनीति के घिनौने हो चुके चेहरे पर से नकाब हटाने का प्रयास भी उनकी कुछेक लघुकथाओं में हुआ अवश्य है।
मैं प्रारम्भ से ही लघुकथा को ‘लेखकविहीन विधा’ कहता और मानता आया हूँ। अध्ययन सम्बन्धी किंचित अस्पष्टता के कारण बलराम अग्रवाल ने इसका गलत अर्थ ग्रहण किया और  ‘अवध पुष्पांजलि’ पत्रिका के एक अंक में लेख लिखकर ‘लेखकविहीनता’ की मेरी अवधारणा पर अपना विरोध जताया; लेकिन बाद में मेरे समझाने पर इस सिद्धांत से वह सहमत हो गया। आज स्थिति यह है कि वह स्वयं मेरी इस अवधारणा का अर्थ और लघुकथा में उसके प्रभाव से दूसरे लेखकों को परिचित कराने का यत्न करता है। इधर, अपने दूसरे लघुकथा संग्रह ‘समय का पहिया…’ की कुछेक लघुकथाओं में मधुदीप ने कथा-कथन की ‘सूत्रधार शैली’ का प्रयोग किया है।  यथा, ‘तो पाठको! यह चालीस वर्ष का किस्सा यहीं समाप्त होता है। अब आप इसे लघुकथा मानें या न मानें, इसका निर्णय मैं आप पर ही छोड़ता हूँ।’ (समय बहुत बेरहम होता है)। ‘तो पाठको ! आप मुझे कौन-से विकल्प की सलाह देते हैं? शायद आपकी सलाह ही मुझे उलझन से बाहर निकाल सके।’ (विकल्प)। ‘तो पाठको ! यह किस्सा यूँ समाप्त होता है कि…’ (किस्सा इतना ही है)। यह शैली कुछ पाठकों को उक्त लघुकथाओं में लेखक के आ उपस्थित होने का भ्रम दे सकती है। मैं स्पष्ट कर दूँ कि लघुकथा में लेखक का आ उपस्थित होना इससे एकदम अलग स्थिति होती है। लेखक द्वारा पाठक से एकत्व स्थापित करने के प्रयास को रचना में उसका उपस्थित होना नहीं माना जाता है। लघुकथा में लेखक इससे अलग, एक नहीं अनेक प्रकार से आ उपस्थित होने की गलती अक्सर ही कर बैठता है। उनमें से एक यह है कि उसकी कथा के पात्र अपनी नहीं, लेखक की भाषा बोलते हैं; अपने स्तर के अनुरूप नहीं, लेखक की विद्वता के अनुरूप शब्द बोलते हैं। दूसरी यह है कि रचना के अन्त में लेखक एक समाधानपरक टिप्पणी लगाकर आलोचक की भूमिका अपना बैठता है। लेखक कब रचना में आ उपस्थित हुआ, इस बात का पता कभी-कभी स्वयं उसे भी नहीं चल पाता है। उदाहरण के लिए, मधुदीप की लघुकथा ‘वज़ूद की तलाश’ का यह समापन वाक्य देखें—‘मुझे लगता है, मेरी तलाश पूरी हो गयी है।’ लघुकथा को क्योंकि आत्मपरक शैली में लिखा गया है, इसलिए लेखक के आ उपस्थित होने का खतरा किंचित बढ़ गया है। अन्य नामधारी पात्रों की तुलना में लेखक ‘मैं’ में स्वयं को अधिक इन्वॉल्व पाता है, पात्र को स्वयं में महसूस करने या पात्र की काया में प्रवेश करने में उसे सुविधा महसूस होती है। ‘वजूद की तलाश’ का यह पात्र यदि ‘मैं’ की बजाय, मान लीजिए ‘राम’ होता तो इस अन्तिम वाक्य को यों लिखा जाता—‘राम को लगता है, उसकी तलाश पूरी हो गयी है।’ इस तरह के वाक्य निश्चित रूप से आलोचक के अधिकार-क्षेत्र में दखल के नाते लघुकथा में त्याज्य होने चाहिए।
नि:सन्देह, ‘किस्सागोई’ कथा कहने की एक लोकप्रिय और मनभावन शैली है, तथापि ‘नैरेशन’ को ‘किस्सागोई’ अथवा ‘किस्सागोई’ को ‘नैरेशन’ नहीं समझ लिया जाना चाहिए।  मधुदीप की दूसरे दौर की लघुकथाओं में यह सावधानी नजर भी आती है और अधिकतर प्रभावित भी करती है; तथापि मेरा मानना है कि लघुकथा जैसी लघुकाय कथा-रचना के लेखक को मात्र नैरेशन अथवा उसके आधिक्य से यथासम्भव बचना चाहिए। ‘किस्सागोई’ शैली में लिखी गई रचनाओं के कथ्य और भाषा को भी मुख्यत: संवाद ही प्रभावशाली, प्रवहमान, आकर्षक और सम्प्रेषक बनाते हैं।
मधुदीप की दूसरे दौर की लघुकथाओं में मेरे अनुसार,  मुख्यत: ‘ऑल आउट’, ‘एकतन्त्र’, ‘ठक-ठक…ठक-ठक’, ‘दौड़’, ‘मुआवज़ा’, ‘मुक्ति’, ‘मेरा बयान’, ‘महानायक’, ‘धर्म’ का जिक्र स्तरीय रचनाओं के रूप में किया जाना चाहिए। उन्होंने इस दौर में शैलीपरक कुछ अन्य प्रयोग भी अपनी लघुकथाओं में लिए हैं। यथा—‘डायरी का एक पन्ना’ को डायरी-शैली में, ‘महानगर का प्रेम-संवाद’ व ‘साठ या सत्तर से नहीं’ को संवाद-शैली में तथा ‘समय का पहिया घूम रहा है’ को नाट्य-शैली में लिखा है। मधुदीप की लघुकथाओं में विषय वैविध्य प्रभावित करता है जो कि इस दौर के कुछ बड़े लघुकथारों में भी कम ही देखने को मिलता है। उनकी लघुकथाओं के शीर्षकों पर अलग से बात की जा सकती है।
मधुदीप के व्यवहार में कुछ महत्वपूर्ण भाव मुझे देखने को मिलते हैं। इनमें पहला है—कुछ अच्छा कर दिखाने की ज़िद। अब से लगभग 28 वर्ष पहले, 1988 में मैंने विक्रम सोनी और उनके लेखन पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी लिखी थी। उसके एक अंश को यहाँ उद्धृत कर रहा  हूँ—‘प्रत्येक साहित्य-आन्दोलन में कुछ वास्तविक प्रतिभा-सम्पन्न लेखकों के साथ लेखक बने अलेखकों की भी एक भीड़ होती है, जिसमें कुछ कदम चलकर पुराने लोग अदृश्य होने लगते हैं और नए सम्मिलित होते रहते हैं। ऐसे अलेखक, निष्ठाहीन रचनाकार एक भीड़ बन जाते हैं और प्रतिभा-सम्पन्न रचनाकारों को अपनी संख्या की शक्ति से छिपा देना चाहते हैं, किंतु यह भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगती है, क्योंकि दूर तक चलने की क्षमता इसमें नहीं होती। यह भीड़ आन्दोलन को अपयश का भागी बनाती है, रास्ते में काँटे बोती है, किंतु अनजाने में लाभ भी पहुँचाती है; और वह यह कि यह भीड़ ही साहित्यिक आन्दोलन अथवा नई साहित्यिक प्रवृत्ति को देश के कोने-कोने तक, जन-जन तक पहुँचाती है और पाठकों का एक बड़ा वर्ग निर्मित करती है।’ लघुकथा लेखकों की इस भीड़ में हम अनेक ऐसे नाम गिना सकते हैं जो प्रतिभा दिखाने के बावजूद या तो इस विधा में नहीं टिक पाए या समूचे लेखकीय परिदृश्य से ही गायब हो गये। लम्बे समय तक स्वयं मधुदीप उक्त भीड़ का हिस्सा बने रहे; लेकिन उनके अन्दर के वास्तविक लेखक ने अन्तत: अँगड़ाई ली और आगे की मुहिम के लिए उठ खड़ा हुआ। उनके अन्दर के इस भाव को ही मैंने ‘कुछ अच्छा कर दिखाने की ज़िद’ कहा है। इस ज़िद के चलते ही अपने संयोजन और सम्पादक में प्रकाशित ‘पड़ाव और पड़ताल’ के प्रथम 15 खंडों में उन्होंने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर अब तक के लगभग समूचे इतिहास को किसी न किसी रूप समेट लिया है। दूसरा है—लघुकथा के लिए समर्पण भाव, जिसके बारे में अब अधिक स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं रह गयी है। तीसरा और अत्यधिक महत्वपूर्ण भाग है—अहंकारविहीनता और सम्पादकीय स्पष्टता। यह लेख लिखे जाने तक ‘पड़ाव और पड़ताल’ के 19 खंड मुझ तक पहुँच चुके हैं। मैं हैरान हूँ उनमें आए ‘समर्पण पृष्ठ’  और सम्पादकीय स्वरूप लिखे प्रारम्भिक पृष्ठों की सामग्री को देखकर। इतने बड़े काम का श्रेय स्वयं लेने की बजाय इस व्यक्ति ने उसे विभिन्न रचनाकारों को अर्पित किया है। सामान्य चलन जब कि यही है कि कार्य का यथायोग्य श्रेय कोई भी व्यक्ति किसी अन्य को देना ही नहीं चाहता, सब-कुछ स्वयं लूट लेना चाहता है। इतिहास में नाम लिखाने की इस लिप्सा से मधुदीप को मैं दूर खड़ा पाता हूँ। इतिहास साक्षी  है कि लिप्सा से यह दूरी ही किसी व्यक्ति को इतिहास में बनाए रखती है। मैं देख रहा हूँ कि ‘पड़ाव और पड़ताल’ श्रृंखला के जिन खण्डों का सम्पादन मधुदीप ने किया है, एक नजर उन के समर्पण पृष्ठों पर डालते हैं—‘उन सभी लघुकथाकारों को जो इस पड़ाव तक मेरे सहयात्री रहे हैं’ (खण्ड—1): ‘यह खण्ड 2013 ई॰ के नाम जिसने मुझे इस विधा में पुन; सक्रिय किया’ (खण्ड—3);  ‘यह खण्ड 1976 ई॰ के नाम जहाँ से मैंने लघुकथा का सफर शुरू किया था’ (खण्ड—5);  ‘यह खण्ड भाई बलराम अग्रवाल को समर्पित, जिन्होंने ‘पड़ाव और पड़ताल’ श्रृंखला को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले सहयोग भरा हाथ आगे बढ़ाया’ (खण्ड—7);  ‘यह खण्ड मेरी दिनांक 29 नवम्बर से 5 दिसम्बर 2014 तक इन्दौर एवं उज्जैन की साहित्यिक-सांस्कृतिक यात्रा की मधुर स्मृति को समर्पित’ (खण्ड—9);  ‘यह खण्ड लघुकथा के सहयात्री भाई मधुकान्त को समर्पित’ (खण्ड—11);  ‘लघुकथा के सहयात्री भाई कुमार नरेन्द्र के लिए’ (खण्ड—13); ‘यह खण्ड नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला-2013 की उस शाम को समर्पित है जब (डॉ॰) कविता सिंह ‘पड़ाव और पड़ताल’ के 1988 में प्रकाशित खण्ड को तलाश करती हुई दिशा प्रकाशन के स्टॉल पर आई थीं। शायद उसी समय ही मैंने इस श्रृंखला को आगे बढ़ाने का मन बना लिया था।’ (खण्ड—14) ‘यह खण्ड शकुन्तदीप को समर्पित है, जिसके मानसिक और आर्थिक सहयोग के बिना लघुकथा की इस श्रृंखला को आगे बढ़ा पाना सम्भव नहीं था।’ (खण्ड—15); ‘यह खण्ड मैं अपने पूज्य पिताजी (स्व॰) भगवानदास जी की पावन स्मृति को समर्पित करता हूँ’ (खण्ड—16); ‘यह खण्ड समकालीन लघुकथा के प्रारम्भिक हस्ताक्षर रमेश बतरा की स्मृति को समर्पित है जिसके असमय चले जाने से लघुकथा विधा की अपूरणीय क्षति हुई’ (खण्ड—17); ‘यह खण्ड आदरणीय विष्णु प्रभाकर की स्मृति को समर्पित है जिन्होंने इस विधा को प्रतिष्ठा दिलवाने में अपनी सम्पूर्ण क्षमता से योगदान दिया’ (खण्ड—18)। इस श्रृंखला के जिन खण्डों का सम्पादक अन्य लोगों ने किया है, इसमें उनके समर्पण पृष्ठों का उल्लेख नहीं है, भले ही श्रृंखला संयोजक होने के नाते उन्हें भी मधुदीप ने ही लिखा हो।
         कहने का तात्पर्य यह कि मधुदीप श्रेय को सम्बन्धित व्यक्ति में ही नहीं। तत्सम्बन्धी परिस्थिति, समय और स्थान में बाँटने के विशुद्ध भारतीय या कहें कि विशुद्ध मानवीय संस्कार  से युक्त हैं। यह संस्कार व्यापक दृष्टिबिध से उत्पन्न होता है। यही कारण है कि वे अपनी पूरी शक्ति से इस विधा के उन्नयन में जुट पा रहे हैं। किसी समय मैंने कहा था—इक्कीसवीं सदी लघुकथा की होगी। मधुदीप के लेखन और सम्पादन ने मेरे कथन को पुष्ट करने की ओर सार्थक कदम बढ़ाया है। इस कार्य में उनकी सफलता के लिए मैं हृदय से अनन्त मंगलकामनाएँ प्रस्तुत करता हूँ। 
                                                  (लेख साभार 'घुकथा का समय' से)

सम्पर्क—डॉ॰ कमल किशोर गोयनका, ए-98, अशोक विहार फेज़ 1,  दिल्ली-110052

        
          



Thursday 14 July 2016

समय से मुठभेड़ करती लघुकथाएँ / रूपसिंह चन्देल

आज एक मित्र से अचानक 'साक्षात्कार' का अप्रैल 2016 अंक मिल गया। मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद द्वारा प्रकाशित यह स्तरीय साहित्यिक पत्रिका है। प्रस्तुत अंक में पृष्ठ 98-100 तक कथाकार मित्र माधव नागदा के लघुकथा संग्रह 'अपना अपना आकाश' की समीक्षा छपी है। समीक्षाकार हैं सुप्रसिद्ध उपन्यासकार भाई रूपसिंह चन्देल। इस अंक को प्रथम आवरण के चित्र से लेकर भीतरी रेखांकनों और अन्तिम  आवरण चित्र तक कवयित्री और चित्रकार प्रिय अनुप्रिया ने सजाया है। एक साथ मिली कई गुनी प्रसन्नता को आप सब के साथ शेअर कर रहा हूँ।



आवरण व रेखांकन : अनुप्रिया

समीक्षक : डॉ॰ रूपसिंह चन्देल

कथाकार : माधव नागदा

Tuesday 21 June 2016

कुल्हाड़ा और क्लर्क / पूरन मुद्गल

दोस्तो, वयोवृद्ध लेखक श्रीयुत् पूरन मुद्गल ने कृपापूर्वक 'दैनिक हिन्दी मिलाप' के जालंधर से प्रकाशित होने वाले उस संस्करण (बुधवार, दिनांक 24 जून, 1964) की फोटो-प्रति उपलब्ध कराई है जिसमें उनकी पहली लघुकथा 'कुल्हाड़ा और क्लर्क' प्रकाशित हुई थी। आप के अवलोकनार्थ फोटो-प्रति के साथ ही लघुकथा का पाठ अलग से भी प्रस्तुत है।----बलराम अग्रवाल



परिचय पूरन मुद्गल जी :
जन्म : 24 दिसम्बर 1931 को फाजिल्का (पंजाब) में
लघुकथा संग्रह 'निरंतर इतिहास' और 'पहला झूठ' सहित कुल 8 पुस्तकें प्रकाशित।  पत्रिका  'अक्षर पैगाम' का सम्पादन। अनेक सम्मानों  से अलंकृत।
निवास का पता : 309/5 ए, अग्रसेन कालोनी, सिरसा-125055 (हरियाणा)
मोबाइल : 09253100377
  

Friday 17 June 2016

अशोक गुजराती की लघुकथाएँ व उनकी लघुकथा-दृष्टि

लघुकथाएँ 
 

॥1॥ मारना कितना आसां

मैं क़बूल करता हूं कि मैं ही था वह... हां, वही जिसने बाबरी मस्जिद कांड के बाद भड़के दंगों में अपने सैकड़ों विजातियों को मौत के घाट उतारा था. छोटे-छोटे बच्चे! हाऽ-हाऽ-हाऽ चलते-चलते अपनी तलवार से उनके सर को धड़ से जुदा कर एक सुकून से तर-ब-तर हो जाता था मैं. जी हां, वही बंदा, जिसने मंटो की कहानियों के पात्रों को पुनर्जीवित कर दिया था. ‘खोल दो’ की बदहाल सकीना या ‘ठण्डा गोश्त’ की ख़ौफ़ज़दा मृत युवती को मन-माफ़िक़ रौंदते हुए मैं अपनी पीठ ख़ुद ही थपथपाता रहा था. इनके सामने सामानों, जानवरों, इमारतों की शख़्सियत ही क्या है. आगज़नी, लूटपाट तो मामूली चीज़ें ठहरीं. यान ओत्चेनाशेक के ‘रोमियो जूलियट और अंधेरा’ की तरह मुझे मिली युवा लड़की के साथ भी मैं पूरी रंगरेलियां मनाता नहीं थका था. यूं समझो कि इस फ़साद को सौ टका मैंने अपनी दबी वासना और अपराधिक मनोवृत्ति के उपभोग के हिसाब से भुनाया और क़ामयाब रहा. आख़िर में शरीफ़ का शरीफ़ !
          फिर... अब क्या हुआ ? अब क्यों मैं ज़हर का प्याला अपने मुक़ाबिल रखे ख़ुदकुशी करने पर आमादा हूं... मैं तो इतना साहसी था, जोश से सराबोर --- कुछ भी करने को तैयार. किसी ने कभी मुझ पर कोई शुबहा भी नहीं किया, न समाज में मेरी इज़्ज़त में कभी कोई कमतरी हुई. न ब्लड प्रेशर का मरीज़ और न कायर. अच्छी-ख़ासी कमाई, छोटा सुखी परिवार. मुस्तक़बिल की पर्वाह और आज की फ़िक्ऱ मेरे लिए बेमानी रहे. तब... मैं क्यों अपनी जान का दुश्मन बना जा रहा हूं... जानना चाहते हैं... ठीक है... बताता हूं लेकिन अपने कमज़ोर दिल को थामे रखिएगा...
          ज़रा-सा वाक़या है. मेरी दूध-डेयरी है. मैं दुकान में बैठा ग्राहकों को निपटा रहा था. डेयरी बंद करने का वक़्त क़रीब था. मैंने काउंटर से नोट निकाले. तरतीबवार लगाकर उन्हें गिन रहा था. इतने में मेरा एक साल का बेटा नंग-धड़ंग ठुमकते हुए आया-- ‘पप्पा, मम्मी खाने के लिए बुला लही हैं...’ मैंने पप्पी लेते हुए उसे नज़दीक की कुर्सी पर बैठाते हुए कहा, ‘आप थोड़ा आराम से बैठिए, मैं अभी चलता हू..’ मैं फिर से शाम की आवक समेटने में लग गया. कनखियों से निगाह रखे था कि छोटे मियां कुर्सी के हत्थे पकड़ कर खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं. मैं उनकी इस भोली-भाली, पर हिम्मतभरी अदा का क़ायल हो मन-ही-मन मुस्कराया. तभी... पता नहीं कैसे हो गया.. मैं देख रहा था.. मुन्ने के सायास खड़े होते ही कुर्सी उलार हो आगे की ओर झुकी.. एक झटके में मुन्ने को ऊपर उछालती हुई पलटी.. मुन्ना उस उछाल के साथ सीधे भट्ठी पर रखी कढ़ाई के उफनते दूध में जा गिरा.. मैं दौड़ा.. उबलते दूध में दोनों हाथ डाल उसे पकड़ना चाहा.. वह फिसल गया.. मैंने पुनः प्रयास किया, उसका तेलीय शरीर मेरी जकड़ से छूट-छूट जाता रहा.. दूध की चिकनाहट और गर्मी से मेरी उंगलियों की पकड़ सख़्त नहीं हो पा रही थी.. मैंने फिर प्रयत्न किया.. दिल-दिमाग़ को मज़बूत कर उसे ज़ोरों से पक्का थाम लिया और ऊपर उठाकर  तुरंत अपने सीने से लगाया...
          इसके पश्चात क्या-क्या हुआ होगा, आप सोच सकते हैं.. सब दौड़े हुए आये मेरा चीत्कार सुनकर. डाक्टर को फ़ौरन बुलाया. पत्नी, बड़ा बेटा और बेटी की आंसुओं की धारा रुके न रुकती थी. मैं कभी उन्हें सांत्वना देता, कभी ख़ुद को सम्भालता. डाक्टर ने चेकअप किया.. उनकी उदास आंखों ने सारा कुछ बयान कर दिया.. सब ख़त्म हो चुका था.. मेरी आंखों के सामने... काश कि मैंने उसे कुर्सी पर न बैठाया होता.. उसके साथ भीतर चला गया होता.. या उसे अपनी गोद में लेकर हिसाब करता.. या उसे तुरत-फुरत दूध से बाहर निकाल पाता.. मैं नहीं बचा सका उसे...
          मैंने इतने लोगों को मारा, कुचला, बर्बाद किया और एक जान... एक जान बचा नहीं सका. मुझे ज़िन्दा रहने का कोई हक़ नहीं है...

॥2॥ अंदाज़ नया

वे साठ पार कर चुके थे. उनकी पत्नी उनसे सात वर्ष छोटी थी. बुढ़ापा उनका था लेकिन पत्नी को गठिया की दर्दनाक तकलीफ़ हो गयी. घुटनों ने साथ छोड़ दिया और चलना-फिरना मुश्किल हो गया.
        वे जहां तक हो सके उसे सहारा देते रहते. एक दिन इस परेशानी के चलते उन्होंने मज़ाकिया लहज़े में पत्नी को सलाह दे डाली--‘ऐसा करते हैं, मैं दूसरा विवाह कर लेता हूं. वह हमसे जवान तो होगी ही, तुम्हारा पूरा ख़याल रखेगी और मेरा भी...’
        पत्नी ने उन्हें कनखियों से देखते हुए पूछा, ‘ये बताइए कि मर्द ज़्यादा सक्षम होता है या औरत ?...‘
        उन्होंने प्रश्न का मर्म न समझते हुए सहज ही उत्तर दे दिया, ‘मर्द!'
       पत्नी ने हल्की-सी मुस्कान के साथ उन्हें सवाया सुझाव देने में कोताही न की, ‘फिर यूं करते हैं, मैं ही दूसरी शादी कर लेती हूं. वह मुझे तो अच्छे-से सम्भाल लेगा ही, आपको भी...’

॥3॥ हवा

पत्नी से उसका तलाक़ हो गया था. अदालत के आदेश के अनुसार, कि उसको अभी मां के सामीप्य की ज़रूरत है, वह अपनी पांच वर्षीय बेटी को भी खो चुका था.  
   वह अकेला अपने ख़यालों में उलझा बैठा हुआ था. दरवाज़े के सामने उसे अपनी बेटी की समवयस्क और सहेली लता खेलती हुए दीखी.
   उसने उसे आवाज़ दी. वह आयी. उसने चाकलेट निकालकर उसे देते हुए अपने क़रीब खींच लिया.
   लता ने चाकलेट खाते हुए सवाल किया, ‘अंकल, प्रग्या कब आयेगी...?'
   उसने उदास-सा जवाब दिया, ‘बेटे, अब वह कभी नहीं आयेगी...' फिर अपने आंसुओं को रोकते हुए कहा, ‘अब तू ही मेरी बेटी है... तू ही प्रज्ञा है...’ और उसने उसका चुम्मा ले लिया.
   उसी वक़्त लता की मां ने, जो बिलकुल पड़ोस में ही रहती थी, आंगन में आकर उसे पुकारा-- ‘लता... ओ लता...’
   आयी मम्मी...’ कहते हुए लता दौड़ पड़ी. वह फिर अपने दुख में डूब गया.
   लता को लेकर उसकी मां अन्दर गयी. टीवी चालू था. उस पर पिछले दिनों बच्चियों के साथ हुए बलात्कारों पर चर्चा चल रही थी. मां ने उससे पूछा, ‘बेटी, वहां क्या कर रही थी ?’
   लता ने बताया कि अंकल ने बुलाया और चाकलेट भी दी. मां सतर्क हो गयी-- ‘और क्या किया?'
   लता ने असमंजस में पड़ते हुए सरलता से कहा, ‘कुछ नहीं मम्मी.’
   मां ने संतुष्ट होना चाहा-- ‘तुझे अपने नज़दीक लेकर गोद में तो नहीं बैठाया...?’
   नादान लता ने तुरंत उत्तर दिया- ‘हां... मेरी पप्पी भी ली...’
   अरे! ऐसा किया उस शैतान ने... चल... चल मेरे साथ, उसकी ख़बर लेती हूं...’ मां ग़ुस्से में थी.
   वह लता को लेकर उसके घर पहुंची. क्रोध से भरी वह चिल्लायी-- ‘कमीने, तेरे को शर्म नहीं आयी... अपनी बेटी जैसी लड़की को पास में लेकर चूमा-चाटी कर रहा था... ठहर ज़रा... मैं अभी पुलिस को फ़ोन करती हूं...'

॥4॥ जादूगर

जादूगर तरह-तरह के करिश्मे दिखा रहा था. लोग तालियां बजा-बजाकर उसे बार-बार दाद दे रहे थे. यह रात का सेकिंड शो था. बढ़ती हुई उमस के कारण पंखों के चलते हुए भी खुली हवा की ख़ातिर थिएटर के सारे दरवाज़े खोल दिये गये थे.
   रंग-बिरंगी पोशाकें पहने ख़ूबसूरत नवयौवनाएं जादूगर के आसपास थिरक रही थीं. उनकी मदद से जादूगर एक-से-एक नायाब खेल दिखा रहा था. लोग सम्मोहित-से अपनी सीटों में जकड़े बैठे हुए थे. तभी एक कुष्ठरोगी भिखारन अपने बच्चे को छाती से चिपकाये पता नहीं कैसे चौकीदार की निगाह बचाकर अहाते में घुस आयी. वह दरवाज़े की ओट में जादूगर को अपलक निहारती खड़ी रह गयी.
   जादूगर शून्य से बहुत-कुछ पैदा करने में मसरूफ़ था. उसके हाथ उठाते ही कभी अंडा, कभी कबूतर, कभी सौ का नोट लगातार आते चले जा रहे थे. दो दिनों से भूखी भिखारन जादूगर की शक्ति से इतनी प्रभावित हुई कि अपनी औक़ात भूल संवेदना में बहती हुई बच्चे को सम्भाले जादूगर की दिशा में दौड़ पड़ी. जादूगर अवाक्! लोग भी चकराये!! जादू देखने में खोया गेट-कीपर जब तक उसे पकड़े, तब तक वह मंच पर पहुंच चुकी थी.
   वह जादूगर के पैरों के पास बच्चे को लिये-लिये जैसे ढह गयी और रोती हुई उसकी अनुनय करने लगी, ‘महाराज, दो दिन से कुच नई खाया... मेरेकू एक रोटी... बस एक रोटी बुला दो... इत्ती मेहरबानी...’
   उसे हटाने का प्रयत्न करते गेट-कीपर को जादूगर ने इशारे से रोक दिया. फिर झुककर भिखारन को उठाते हुए बोला, ‘काश! मैं रोटी पैदा करने का जादू जानता... पर तुम्हें रोटी मिलेगी, ज़रूर मिलेगी!’ 
   लोगों ने देखा--जादूगर की आंखों में आंसू थे.
   उस रात फिर जादूगर आगे खेल नहीं दिखा सका.

॥5॥ तन-मन
   संगीता, रमाकान्त और प्रवाल कालेज में सहपाठी थे. तीनों की मित्रता पूरे परिसर में चर्चा का विषय थी.
   धीरे-धीरे प्रवाल को महसूस हुआ कि संगीता और रमाकान्त बहुत घनिष्ट होते जा रहे हैं. उसने उनकी बढ़ती जा रही आत्मिक तथा दैहिक क़रीबी से ख़ुद को अलाहिदा रखना ही उचित जाना.
   अचानक, रमाकान्त और संगीता, दोनों के बीच किसी मामूली वजह से अनबन हो गयी. प्रवाल ने उनको समझाने की कोशिश की. नतीज़ा सिफ़र रहा.
   फिर नया मोड़ आया. संगीता और प्रवाल का आपस में मेल-जोल अनायास वृद्धि पाता गया. विषय रमाकान्त होता भी, नहीं भी. प्रवाल के अवांछित स्पर्शों के प्रति संगीता कोई ख़ास विरोध भी नहीं दर्शाती थी.
   प्रवाल की हिम्मत में उछाल आया. उसने एक दिन संगीता को अपने कमरे पर आने का निमंत्रण दिया. वह बिना आनाकानी के आ भी गयी.
   प्रवाल का साहस चरम पर था. उसने कमरे के एकांत में संगीता को आलिंगन में बांध चुंबनों की बौछार लगा दी. संगीता ख़ामोश थी. प्रवाल ने उसके वस्त्र उतारने की पहल शुरू की. तभी उसने प्रवाल को रोका..
   वह धीर-गंभीर स्वर में बोली, ‘‘मैं तुम्हारी यह हरकत मंज़ूर कर सकती हूं मगर एक शर्त पर... मुझे कहीं से ज़हर ला दो फिर... मैं रमाकान्त के बिना जीना नहीं चाहती...’’
   उसकी शर्त के मर्म ने प्रवाल के मर्म को झकझोर दिया. वह नज़रें झुकाये तुरंत कमरे से बाहर निकल गया.
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और अंत में, अशोक गुजराती का आलेख---एक स्वतंत्र विधा : लघुकथा
 

 













परिचय : कथाकार अशोक गुजराती