Monday, 23 November, 2020

लघुकथा : साहित्य के आकाश पर/कमलेश भारतीय

सन् 1974 के बाद फिर मैदान में भगीरथ परिहार-नये लघुकथा संग्रह मैदान से वितान की ओर । सन् 1974 में संपादित संग्रह दिया था--गुफाओं से मैदान की ओर । इतने सालों बाद मैदान से वितान की ओर । दोनों नाम बहुत सार्थक । पहले गुफा काल था लघुकथा का । अब लघुकथा साहित्य के आकाश पर पहुंच चुकी है । सभी विधाओं के बीच अपना आकाश पा चुकी है । हालांकि यह शीर्षक बलराम अग्रवाल ने दिया है पर सोच विचार सांझी रही । 

आधुनिकता के बोध और अपने समय की युग चेतना से युक्त माना और कहा है बलराम अग्रवाल ने लघुकथा को  । यह बहुत आसान विधा भी नहीं , जैसे कि इसके लघु आकार को देख कर नये लेखक उछल पड़ते हैं । इसमें सकारात्मक मानवीय दृष्टि होना भी बहुत जरूरी है । इस संकलन में 115 लघुकथाएं संकलित हैं जो ज़िंदगी की बुनियादी  सच्चाइयों से टकराती हैं । हमारा सामना करवाती हैं । यह भूमिका में कहा बलराम अग्रवाल ने । 

भगीरथ परिहार का चयन का आधार कि जब जब कोई लघुकथा पसंद आई वे इसे अलग से रखते गये और इस  पसंद में मेरी लघुकथा किसान भी शामिल । मेरे लिए खुशी की बात । पर इतने दिन इस संग्रह को मिले हो गये । मैं सुबह सवेरे उठकर इनको पढ़ता और आनंद के साथ साथ लघुकथा की यात्रा को जानता रहा । बहुत अलग लघुकथाएं हैं । कुछ लघुकथाएं अपनी धर्मपत्नी को जगा जगा कर सुनाईं और वह जल्दी जगाने से नाराजगी भूल गयी । सचमुच हेमंत राणा की दो टिकट एक अलग तरह की प्रेम कथा है । अरूण कुमार की स्कूल हमारी आधुनिक शिक्षा पर चोट करती है । अंजना अनिल हो या अंतरा करवड़े , अपराजिता अनामिका, अर्चना तिवारी, चंद्रेश कुमार छतलानी, चित्रा मुद्गल, चित्रा राणा राघव , चैतन्य त्रिवेदी, सुरेंद्र मंथन , सुकेश साहनी , बलराम अग्रवाल कितने नये पुराने रचनाकारों ने अलग से कहा और अपनी बात पाठक तक पहुंचाने में सफल रहे । बहुत सार्थक लघुकथा संग्रह । साबित कर दिया कि लघुकथा आकाश क्यों छू रही है । 

बहुत बहुत बधाई भगीरथ और बलराम अग्रवाल ।

Monday, 9 November, 2020

दीपावली पर कमलेश भारतीय की लघुकथाएं

#और मैं नाम लिख देता हूं 

दीवाली से एक सप्ताह पहले अहोई माता का त्योहार आता है । 

तब तब मुझे दादी मां जरूर याद आती हैं । परिवार में मेरी लिखावट दूसरे भाई बहनों से कुछ ठीक मानी जाती थी । इसलिए अहोई माता के चित्र  बनाने व इसके साथ परिवारजनों के नाम लिखने का जिम्मा मेरा लगाया जाता।

दादी मां एक निर्देशिका की तरह मेरे पास बैठ जातीं । और मैं अलग अलग रंगों में अहोई माता का चित्र रंग डालता । फिर दादी मां एक कलम लेकर मेरे पास आतीं और नाम लिखवाने लगतीं । वे बुआ का नाम लिखने को कहतीं । 

मैं सवाल करता - दादी, बुआ तो जालंधर रहती है । 

- तो क्या हुआ ?  है तो इसी घर की बेटी । 

फिर वे चाचा का नाम बोलतीं । मैं फिर बाल सुलभ स्वभाव से कह देता - दादी... चाचा तो...

- हां , हां । चाचा तेरे मद्रास में हैं । 

- अरे बुद्धू । वे इसी घर में तो लौटेंगे । छुट्टियों में जब आएंगे तब अहोई माता के पास अपना नाम नहीं देखेंगे ? अहोई माता बनाते ही इसलिए हैं कि सबका मंगल , सबका भला मांगते हैं । इसी बहाने दूर दराज बैठे बच्चों को माएं याद कर लेती हैं । 

बरसों बीत गए । इस बात को । अब दादी मां रही नहीं । 

जब अहोई बनाता हूं तब सिर्फ अपने ही नहीं सब भाइयों के नाम लिखता हूं । हालांकि वे अलग अलग होकर दूर दराज शहरों में बसे हुए हैं । कभी आते जाते भी नहीं । फिर भी दीवाली पर एक उम्मीद बनी रहती है कि वे आएंगे। 

...और मैं नाम लिख देता हूं । 


#परदेसी पाखी 

-ऐ भाई साहब,  जरा हमार चिट्ठिया लिख देवें...

-हां , लाओ , कहो , क्या लिखूं ? 

-लिखें कि अबकि दीवाली पे भी घर नाहिं आ पाएंगे ।

-हूं । आगे बोलो ।

-आगे लिखें कि हमार तबीयत कछु ठीक नाहिं रहत । इहां का पौन-पानी सूट नाहिं किया । 

-बाबू साहब । इसे काट देवें । 

-क्यों ? 

-जोरू पढ़ि  के उदास होइ जावेगी। 

- और क्या लिखूं ? 

- दीवाली त्यौहार की बाबत रुपिया पैसे का बंदोबस्त करि मनीआर्डर भेज दिया है । बच्चों को मिठाई पटाखे ले देना और साड़ी पुरानी से ही काम चलाना । नयी साड़ी के लिए जुगत करि रह्या हूं । 

-हूं । 

-काम धंधा मिल जाता है । थोड़ा बहुत लोगन से पहिचान बढ़ गयी है । बड़के को इदर ई बुला लूंगा ।  दोनों काम पे लग गये तो तुम सबको ले आऊंगा । दूसरों के खेतों में मजूरी से बेपत होने का डर रहता है । अखबार सुनि के भय उपजता है । इहां चार घरों का चौका बर्तन नजरों के सामने तो होगा । नाहिं लिखना बाबूजी । अच्छा नाहिं लगत है ।

-क्यों ? 

-जोरू ने क्या सुख भोगा ? 

- और तुमने ? 

- ऐसे ई कट जाएगी जिंदगानी हमार । लिख दें सब राजी खुशी । थोडा लिखा बहुत समझना । सबको राम राम । सबका अपना मटरू। पढने वाले को सलाम बोलना । 


#चौराहे का दीया 

दंगों से भरा अखबार मेरे हाथ में है पर नजरें खबरों से कहीं दूर अतीत में खोई हुई हैं । 

इधर मुंह से लार टपकती उधर दादी मां के आदेश जान खाए रहते । दीवाली के दिन सुबह से घर में लाए गये मिठाई के डिब्बे और फलों के टोकरे मानों हमें चिढ़ा रहे होते । शाम तक उनकी महक हमें तड़पा डालतीं । पर दादी मां हमारा उत्साह सोख डालतीं,  यह कहते हुए कि पूजा से पहले कुछ नहीं मिलेगा । चाहे रोओ, चाहे हंसो । 

हम जीभ पर ताले लगाए पूजा का इंतजार करते पर पूजा खत्म होते ही दादी मां एक थाली में मिट्टी के कई  दीयों में सरसों का तेल डालकर जब हमें समझाने लगती - यह दीया मंदिर में जलाना है , यह दीया गुरुद्वारे में और एक दीया चौराहे पर...

और हम ऊब जाते । ठीक है , ठीक है कहकर जाने की जल्दबाजी मचाने लगते । हमें लौट कर आने वाले फल , मिठाइयां लुभा ललचा रहे होते । तिस पर दादी मां की व्याख्याएं खत्म होने का नाम न लेतीं । वे किसी जिद्दी ,प्रश्न सनकी अध्यापिका की तरह हमसे प्रश्न पर प्रश्न करतीं कहने लगतीं - सिर्फ दीये जलाने से क्या होगा ? समझ में भी आया कुछ ? 

हम नालायक बच्चों की तरह हार मान लेते । और आग्रह करते - दादी मां । आप ही बताइए । 

- ये दीये इसलिए जलाए जाते हैं ताकि मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे से एक सी रोशनी , एक सा ज्ञान हासिल कर सको। सभी धर्मों में विश्वास रखो । 

- और चौराहे का दीया किसलिए , दादी मां ? 

हम खीज कर पूछ लेते । उस दीये को जलाना हमें बेकार का सिरदर्द लगता । जरा सी हवा के झोंके से ही तो बुझ जाएगा । कोई ठोकर मार कर तोड़ डालेगा । 

दादी मां जरा विचलित न होतीं । मुस्कुराती हुई समझाती... 

- मेरे प्यारे बच्चो । चौराहे का दीया सबसे ज्यादा जरूरी है। इससे भटकने वाले मुसाफिरों को मंजिल मिल सकती है। मंदिर गुरुद्वारे  को जोड़ने वाली एक ही ज्योति की पहचान भी । 

तब हमे बच्चे थे और उन अर्थों को ग्रहण करने में असमर्थ। नगर आज हमें उसी चौराहे के दीये की खोजकर रहे हैं , जो हमें इस घोर अंधकार में भी रास्ता दिखा दे ।

मोबाइल : 9416047075

Sunday, 25 October, 2020

डॉ. पुरुषोत्तम दुबे से संतोष सुपेकर की बातचीत

 ख्यात लघुकथाकार एवं समीक्षक डॉ. पुरुषोत्तम दुबे से संतोष सुपेकर की बातचीत

 लघुकथा कभी भी जल्दबाजी की उपज नहीं होती

डॉ॰ पुरुषोत्तम दुबे 


 

    [किसी भी विधा की समृद्धि के लिए उसमें उत्कृष्ट सृजन तो आवश्यक है ही, उसके मूल्यांकन हेतु, विधा के उज्ज्वल भविष्य के लिए, उसके लेखकों को आईना दिखाने हेतु उस विधा में किये गए सृजन की समीक्षा, समालोचना भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है। पिछले कई वर्षों से लघुकथा की समालोचना, सम्पादन, समीक्षा में रत वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर पुरुषोत्तम दुबेजी से लघुकथा को लेकर कुछ ऐसे प्रश्नों पर मैंने चर्चा की जो आज के लेखक को अक्सर दुविधा में डालते हैं-संतोष सुपेकर ]


संतोष सुपेकर : कहा जाता है कि कथ्य अपना शिल्प खुद तय करता है
, लघुकथा लेखक इससे क्या आशय समझे? कृपया किसी उदाहरण से समझाएं तो बेहतर।

डॉ. दुबे : लघुकथा का प्राणतत्त्व लघुकथा का कण्टेण्ट होता है। यह लघुकथाकार पर निर्भर है कि वह लघुकथा के लिए हाथ आए कथ्य को किस तरह सम्प्रेषित कर कथ्य को लघुकथा का आकार दे। लघुकथा में शिल्प का आगमन कथ्य की कलात्मक अभिव्यक्ति से सम्भव है। लघुकथा लेखन में सर्वप्रथम शिल्प पर नहीं, प्रत्युत कथ्य पर विचार किया जाता है। शिल्प तो उस नदी के समान है जो टेढ़े-मेढ़े पथ से गुजरते हुए समुद्र की थाह पा लेती है। लघुकथा में कथ्य को विवेचित करने में शिल्प की सहज उपस्थिति को एक उदाहरण से हल करता हूँ। 'विवेक की आर्थिक समृद्धि और तरक्की दिन-ब-दिन ऐसे बढ़ रही थी मानो गमले का मनी प्लाण्ट।'

प्रश्न २ : क्या सम्प्रेषण की तीव्रता लघुकथा में हमेशा आवश्यक है?

डॉ. दुबे : लघुकथा कभी भी जल्दबाजी की उपज नहीं होती। लघुकथाकार उसके विचारों की भट्टी में कण्टेण्ट को जितना पकाएगा, लघुकथा का कथ्य उतना प्रभावी होकर सामने आएगा। जब कण्टेण्ट विचारों में उबलने लगेगा, तब लघुकथा लेखन की तीव्रता स्वमेव लघुकथाकार में पैदा होगी।

प्रश्न 3. : कहते हैं कि एक लेखक को अपने अंदर के आलोचक को हमेशा जीवित रखना चाहिए, लघुकथाकार इस उलझन में पड़ जाते हैं कि वे पाठक के लिए लिखें या आलोचक के लिए? दूसरे शब्दों में, लघुकथा में क्लिष्टता और शुष्कता को प्राथमिकता दी जाए या सहज सरल लेखन को?

डॉ. दुबे : प्रथमत: लेखक ही आलोचक होता है। वह रचना के लिए विषय वस्तु का चयन आलोचनात्मक दृष्टि को आजमा कर ही करता है। किसी भी लघुकथाकार को लघुकथा लिखते समय यही विचार करना चाहिए कि वह लघुकथा के लिए लघुकथा लिख रहा है। पहले लघुकथा है, फिर पाठक, तदन्तर आलोचक। लघुकथा जितनी सहज और सरल होगी, उतना ही वह पाठकीय तादात्म्य प्राप्त कर सकेगी। आलोचना का काल्पनिक भय लघुकथा की रचना प्रक्रिया को सृजनात्मक साँसें कभी नहीं लेने देता है।

प्रश्न ४ : संवाद आधारित लघुकथा में कथा तत्व का अभाव हो जाता है, इसको लेकर आपका दृष्टिकोण?

डॉ. दुबे : संवाद लघुकथा की अन्त:वस्तु को विस्तार देता है। मेरी दृष्टि में कथा का एक तत्त्व संवाद है। प्राय: संवाद, कथा में निहित चरित्रों के मध्य घटता है। संवाद कथा के अंश हैं, अंशी नहीं।

प्रश्न ५ : सोशल मीडिया में आने से लघुकथा का भला हुआ है या बुरा?

डॉ. दुबे : अब सोशल मीडिया प्रासंगिक हो चुका है। नए लघुकथाकारों के लिए सोशल मीडिया वरदान साबित हो रहा है। देखा जाए तो नए लघुकथाकार फेसबुक या व्हाट्सएप पर अपनी लघुकथाएँ भेज कर अपनी लघुकथाओं पर पाठकीय प्रमाण-पत्र प्राप्त करने में जुटे हुए हैं। एक प्रकार से सोशल मीडिया किसी रचना की सृजनात्मकता को पारित करने में 'क्लियरिंग विण्डो' का काम करता है।

प्रश्न ६ : लघुकथा को लेकर अब भी बहुत सारी 'फ्रेम' हैं। कोई 'लघु' पर जोर देता है तो कोई 'कथा' पर! मशहूर लेखक चार-पाँच पंक्ति की रचना लिखे तो प्रशस्ति पाती है पर कोई नया लेखक ऐसा प्रयास करे तो उसे कमजोर रचना, कथातत्व का अभाव, अधूरी लघुकथा, पंच नहीं है, बताकर नकार दिया जाता है, इस पर आपके विचार?

डॉ. दुबे : यह लघुकथाकार को समझना है कि कथा के जिस कण्टेण्ट को लेकर वह चल रहा है, उसकी गति क्या है, कैसी है और उसका कथ्य कहाँ जाकर समाप्त होता है, यही एक लघुकथा के लिए उसकी 'फ्रेम' कही जाएगी। कथ्य को सम्प्रेषित करने में अनावश्यक बातों से बचकर चलना ही कथ्य की सटीकता पैदा करता है। लघुकथा अर्थ देने लगे यही लघुकथा का 'पंच' है। कोई आलोचक केवल हवा में बात कर लघुकथा की मीमांसा करे, तो ऐसे धमकीले स्वरों को नजरअंदाज कर चलते हुए लघुकथाकार 'लघु' और 'कथा' में सामंजस्य पैदा कर लेगा।

प्रश्न ७ : प्रथम पुरुष में कोई लघुकथा रची जाए तो क्या सावधानी रखी जाए कि वह संस्मरण न लगे?

डॉ. दुबे : सही कहा आपने। प्रथम पुरुष में लघुकथा लिखने के दौरान प्राय: लघुकथाकार पर संस्मरण रचने का आरोप मढ़ा जाता है। 'मैं' की संज्ञा को 'वह' के सर्वनाम की तरह उपयोग में लाकर लघुकथा को संस्मरण के आरोप से बचाया जा सकता है।

प्रश्न ८ : लघुकथा में कालखण्ड दोष और लेखकीय प्रवेश पर आपका दृष्टिकोण?

डॉ. दुबे : कोई एक घटते क्षण का सिरा ही एक संवेदनशील लघुकथाकार को लघुकथा रचना का प्रेरक आधार देता है। अत: समय के उसी एक क्षण की लगाम पकड़कर लघुकथाकार क्षण की बलिहारी से हल आये कथानक को विवेचित करता चलेगा, तो ऐसे में जनित लघुकथा कालदोष के कुचक्र से सर्वथा वंचित रहेगी। कभी-कभी ऐसी दशा में कि लघुकथा का कथ्य लेखक के चरित्र से साम्य खाता हुआ लघुकथाकार की स्मृति पटल पर छाप छोड़ने लगता है, तब लघुकथाकार लघुकथा के प्रणयन में लेखकीय प्रवेश पा लेता है, तो कोई हर्ज की बात नहीं है।

प्रश्न ९ : अब तक लघुकथा सम्मेलन हुए हैं जिसमें लघुकथाएँ पढ़ी जाती हैं आलोचक उन पर चर्चा करते हैं। विधा की सशक्तता के लिए क्या कोई लघुकथा पाठक सम्मेलन भी होना चाहिए?

डॉ. दुबे : लघुकथा सम्मेलन के आयोजन, लघुकथा विधा की बढ़ोतरी तथा विद्या को आयाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लघुकथा पर सम्मेलनों के आयोजन सदैव ही लघुकथा की दशा, दिशा और सम्भावनाओं के पक्षों को उजागर करते हैं। अत: ऐसे सम्मेलनों के आयोजन चलते रहने चाहिए। जहाँ तक लघुकथा पाठक सम्मेलन की बात है उसका निदान इसी में छुपा है कि अक्सर लघुकथा सम्मेलनों में भाग लेने के अर्थ में बहुधा लघुकथा में रुचि रखने वाले पाठक भी जुड़ जाया करते हैं। असल में लघुकथा के सम्मेलनों में उपस्थित लघुकथाकार स्वयं पहले लघुकथा के पाठक होते हैं, तदन्तर लघुकथाकार।

प्रश्न १० : कई बार लघुकथा पर सतही और घटनाप्रधान होने के आरोप लगते रहे हैं, इससे कैसे बचा जाए?

डॉ. दुबे : किसी लघुकथा पर सतही होने का आरोप तब ही लग जाता है कि ऐसी लघुकथा या तो जल्दबाजी में लिखी गई है या फिर लघुकथाकार की मानसिकता में लघुकथा की रचना-प्रक्रिया की समझ पैदा नहीं हुई है। घटना के आलोढ़न यदि नहीं होंगे तो लघुकथा कभी सजीव और अर्थवान नहीं हो सकेगी। सवाल यह कि लघुकथाकार अपनी अनुभूति में वासित घटना को सार्वभौमिक रूप दे पाता है अथवा नहीं? व्यक्ति से समष्टि की ओर पहुँचना ही एक लघुकथा की विजय यात्रा है।

प्रश्न ११ : आपकी नजर में लघुकथा में ऐसा कुछ शेष है जो अब तक नहीं रचा गया?

डॉ. दुबे : वैश्विकवाद, बाजारवाद तथा उदारवाद की धारणाओं ने अन्तराष्ट्रीय स्तर पर जहाँ एक ओर दुनिया को एक गाँव बना दिया है वहाँ मनुष्य की पहचान अन्तराष्ट्रीय बना दी है। ऐसी दृष्टि में एक बड़ा 'विजन' खुल गया है। मानवीय सभ्यता कहाँ से चली है और वर्तमान में किस रूप में परिलक्षित हो रही है। इसी विकासक्रम को आज तक का साहित्य रेखांकित करता है। जब तक सृष्टि पर मानवीय हलचल है, लेखन के लिए नए-नए आयामों के परिशिष्ट खुलते मिलेंगे।

सम्पर्क : *डॉ. पुरुषोत्तम दुबे, 'शशीपुष्प', ७४ जे/ए स्कीम न. ७१, इन्दौर-

मो. : ९३२९५८१४१४

             *संतोष सुपेकर, ३१, सुदामा नगर, उज्जैन- / मो. : ९४२४८१६०९६

Thursday, 15 October, 2020

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-5 / डॉ॰ सतीशराज पुष्करणा

 दिनांक 13-10-2020 से आगे

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-5

पाँचवीं कड़ी

क्षिप्रतालघुकथा का अतिविशिष्ट गुण ‘क्षिप्रता’ है जिसका अर्थ लघुता में पफुर्तीलापन और गति में त्वरा

होता है। क्षिप्रता के बिना लघुकथा का सृजन ही सम्भव नहीं है। क्षिप्रता ही वह गुण है जो लघुकथा में अनावश्यक शब्दों को रोकता है। क्षिप्रता शब्दों में मितव्ययिता को जमकर प्रोत्साहन देती है। यही कारण है कि मैं लघुकथा को स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा मानता हूँ और इसे इसी रूप में परिभाषित भी आरम्भ से करता आया हूँ। इस सन्दर्भ में कुणाल शर्मा की ‘उसका जिक्र क्यों नहीं करते?’ लघुकथा का सहज ही अवलोकन किया जा सकता है। (पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-30)

 यह लघुकथा प्रथम एवं अन्तिम वाक्य को छोड़कर पूरी लघुकथा संवादों में ही पूर्ण हुई है। इसमें चार पात्रा हैं जो वार्तालाप करते हुए ही गन्तव्य तक लघुकथा को पहुँचा देते हैं। इनकी बातचीत का विषय लड़की का किसी लड़के के साथ भाग जाना है और तीन पात्रा इस कर्म हेतु लड़की को ही दोषी मानते हैं, किन्तु चौथा व्यक्ति पहले तो चुपचाप तीनों की बातें सुनता है पिफर अन्त में कहता है—‘‘अकेली भागी है क्या लड़की? अगर नहीं, तो भाई, लड़के के बारे में भी कुछ बोलो, उसका जिक्र क्यों नहीं करते...?’’

इस विषय को क्षिप्रता के साथ प्रस्तुत करने हेतु संवाद-शिल्प ही सटीक था, लेखक के इस कौशल ने लघुकथा को श्रेष्ठ बनाने में पूर्ण सहयोग किया।

सुष्ठुतासुष्ठु को अंग्रेजी में ‘कॉम्पैक्ट’ कहते हैं। लघुकथा का यह गुण लघुकथा को फालतूपन की ओर जाने से रोकता है, किन्तु आवश्यकता के अनुसार आये सटीक एवं आवश्यक शब्दों को बहुत ही करीने से प्रस्तुत करता है। सुष्ठुता को प्रस्तुत करती सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की लघुकथा ‘जंगल और कुल्हाड़ी’ उदाहरणस्वरूप रखी जा सकती है। (पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-27हिन्दी की कालजयी लघुकथाएँ)

इस लघुकथा में यह स्पष्ट किया गया है कि जो काम भी करो, करने से पूर्व भली-भाँति उसके परिणाम के विषय में पूरी गम्भीरता से सोच-समझ लो। इस बात को लेखक ने सीधे न कहकर जंगल, पेड़ और कुल्हाड़ी को माध्यम बनाकर बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है। इस लघुकथा की परख वर्तमान की लघुकथाएँ सामने रखकर नहीं की जा सकती। इस लघुकथा को इसके रचनाकाल के समय को देखते हुए ही इसकी परख की जानी चाहिए। कारण, जिस काल में यह लघुकथा रची गई यानी वह काल चौथा दशक है और आज नई सदी का यह दूसरा दशक व्यतीत होने को है, अतः प्रत्येक दृष्टिकोण से इन दोनों कालों की लघुकथाओं के शिल्पों में अन्तर तो होगा ही।

सांकेतिकतासांकेतिकता का अर्थलघुकथा में जब भाषा या अन्य स्तरों पर प्रत्यक्ष कोई बात न कहकर संकेत में कही जाती है तो इस क्रियात्मकता को सांकेतिकता कहते हैं। जब कथा में सांकेतिकता का उपयोग किया जाता है तो लघुकथा में शब्दों की मितव्ययिता तो आ ही जाती है, साथ ही इसकी श्रेष्ठता भी कई गुना बढ़ जाती है।

सांकेतिकता का उपयोग करते हुए जाने-अनजाने बहुत नहीं तो कुछ लघुकथाएँ तो अवश्य ही प्रकाश में आई हैं, जो श्रेष्ठ लघुकथाओं की श्रेणी में गिनी जाती हैं। ऐसी लघुकथाओं में किशोर काबरा की ‘तीन बन्दर’ देखी-परखी जा सकती है। (हिन्दी की कालजयी लघुकथाएँ, पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-30, धरोहर भाग)

इस लघुकथा में गांधीजी के तीन बन्दरों को लेकर वर्तमान समय में व्याप्त भ्रष्टाचार को नपे-तुले शब्दों की सांकेतिक भाषा में बहुत ही सुन्दर ढंग से अभिव्यक्त कर दिया है। परिणामतः यह एक श्रेष्ठ लघुकथा बन गई है। लघुकथाकारों को सांकेतिकता का उपयोग करते हुए पर्याप्त मात्रा में लघुकथाएँ लिखनी चाहिए। सांकेतिकता यदि सटीक ढंग से उपयोग में लायी गई हो तो लघुकथा को वह श्रेष्ठता के शिखर तक पहुँचा देती है।

सार-संक्षेप में लघुकथा के रचना-विधान को यों व्यक्त किया जा सकता है, लघुकथा जो विश्वसनीय मानवोत्थानिक कथ्य, प्रासंगिक कथानक, सटीक भाषा-शैली, जीवन-संघर्ष, रंजन, संप्रेषणीय प्रस्तुति, हृदयस्पर्शी, चरमबिन्दु के साथ-साथ सभी कथा-तत्त्वों, उपतत्त्वों को वर्तमान की जमीन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाहित किए एवं यथार्थवादी/यथार्थवादी-सी रचना के रूप में कोई-न-कोई मानवोत्थानिक सन्देश लिए प्रस्तुत होती है। लघुकथा, कथा का ही आधुनिक और विकसित स्वतन्त्रा स्वरूप या विधा है। इसे यों भी परिभाषित किया जा सकता है कि ‘लघुकथा स्थूल से सूक्ष्म की रंजनात्मक कथा-यात्रा है।’ अतः यह समाचार, चुटकुला, लतीपफा, रिपोर्टिंग, कहानी में प्रवेश-सा वक्तव्य, गद्यगीत, संस्मरण, दृश्यग्रापफी आदि न बन जाए अपितु इसमें गद्यात्मक कथापन की उपस्थिति अपरिहार्य है।

लघुकथा के रचना-विधान के पश्चात् लघुकथा की समीक्षा पर भी बात कर लेना प्रासंगिक होगा। साहित्य की गद्य विधा में ‘समीक्षा’ भी एक महत्त्वपूर्ण विधा के रूप में अपना उल्लेखनीय स्थान बना चुकी है।

‘समीक्षा’ शब्द ‘सम+ईक्षा’ से निर्मित हुआ है, जिसका अर्थ किसी भी वस्तु को बराबर दृष्टि से देखना, यानी उसे उसकी पूर्ण विशेषताओं और कमियों के साथ देखना-परखना, उनकी पड़ताल करना। साहित्य में इसका तात्पर्य किसी भी कृति अथवा रचना को गम्भीरतापूर्वक तटस्थ भाव से अवलोकित करते हुए उसके गुण एवं दोषों पर अपनी विशिष्ट भाषा-शैली में बहुत सुन्दर ढंग से प्रकाश डालना है।

यों तो समीक्षा-कर्म व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है कि अमुक समीक्षक की क्या विचारधारा है या कोई रचना/कृति उसके मन/हृदय को कैसी लगती है। इसी आधार पर समीक्षा के दो प्रकार बताए जाते हैं1. व्यवहारिक समीक्षा, 2. वैचारिक समीक्षा।

1. व्यवहारिक समीक्षायह एक प्रकार से पाठकीय प्रतिक्रिया होती है, किन्तु अन्तर इतना ही होता है कि पाठकीय प्रतिक्रिया एक बार रचना पढ़ते ही हृदय पर जो प्रभाव पड़ा उसकी भावपूर्ण अभिव्यक्ति होती है, जबकि व्यवहारिक समीक्षा करते समय कोई भी समीक्षक रचना का पुनः-पुनः समीक्षा-दृष्टि से अध्ययन करते हुए मन में आई तत्काल प्रतिक्रिया को उसके गुण-दोषों का समन्वय बनाकर अपनी आलोचकीय भाषा-शैली में विस्तृत अभिव्यक्ति प्रदान कर देता है। व्यवहारिक समीक्षा में तत्काल अपनी वैचारिक दृष्टि, लघुकथाकार से सम्बन्धित व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्रोतों का ज्ञान, मूल्यबोध तथा संरचना या कृति के गुण-दोष इत्यादि को समीक्षक अपनी पूरी गहराई तक जाकर देखता-परखता है। इस हेतु वह कोई विधागत शास्त्रा आदि का सहारा या ऐसी किसी शास्त्राय मान्यता के प्रति प्रतिब( नहीं होता। उसमें उस समीक्षक की अपनी वैयक्तिक प्रतिक्रिया रहती है। अभी तक प्रायः लघुकथा-लेखक ही इस दायित्व का निर्वाह करते रहे हैं किन्तु निशान्तर, रवीन्द्रनाथ ओझा, राधिका रमण अभिलाषी, कुमार अखिलेश्वरी नाथ, निशान्तकेतु, चक्रधर नलिन, लालमुनि दुबे ‘निर्मोही’, डॉ. चन्द्रेश्वर कर्ण, डॉ. ब्रजकिशोर पाठक, राधेलाल बिजघावने, डॉ. विनोद गोदरे, पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी, अमर गोस्वामी, सन्तोष सरस, भूपाल सिंह अशोक, बलदेव उपाध्याय, रामनारायण बेचैन, डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ, डॉ. कमलकिशोर गोयनका इत्यादि ऐसे आलोचक हैं जिन्होंने लघुकथाएँ नहीं लिखीं, केवल आलोचक की भूमिका में रहकर यथासम्भव लघुकथा-समीक्षा के विकास में अपना योगदान देते रहे। इनमें से कुछ तो अब इस संसार में नहीं हैं, कुछ लेखन-कर्म से ही दूर चले गए, किन्तु निशान्तर आज भी सक्रिय हैं। पड़ाव और पड़ताल में भी इन्होंने दायित्वपूर्ण ढंग से आलोचक की भूमिका का निर्वाह किया है।

इसके पश्चात् अनेक लोग मधुदीप के सम्पादकत्व में प्रकाशित ‘पड़ाव और पड़ताल’ के माध्यम से जुड़े जिनमें लघुकथा-लेखकों के अतिरिक्त जो मात्रा लघुकथा-आलोचना से जुड़े हैं, उनमें प्रो. मृत्युंजय उपाध्याय, डॉ. सुलेखचन्द्र शर्मा, विनय विश्वास, प्रो. सुरेशचन्द्र गुप्त, भारतेन्दु मिश्र, डॉ. जितेन्द्र ‘जीतू’, सुभाषचन्दर, डॉ. पुरुषोत्तम दुबे, प्रो. शैलेन्द्रकुमार शर्मा, प्रो. ॠषभदेव शर्मा, डॉ. मलय पानेरी, सुरेश यादव, डॉ. बलवेन्द्र सिंह, डॉ. ओमप्रकाश ‘करुणेश’, डॉ. राजेन्द्र टोकी, डॉ. सुभाष रस्तोगी, डॉ. राकेशकुमार, हरदान हर्ष, डॉ. हरीश नवल, ओमप्रकाश कश्यप, डॉ. स्नेह गुप्ता नवल, डॉ. रश्मि, डॉ. सुधा उपाध्याय, नवीन चौधरी, मानसी काणे, कृष्णा पाल, पारनन्दि निर्मला, डॉ. हून्दराज बलवाणी, डॉ. ब्रह्मवेद शर्मा, डॉ. शशि निगम, डॉ. ध्रुवकुमार, खेमकरण ‘सोमन’,  डॉ. इसपाक अली खान, डॉ. अनीता राकेश, डॉ. स्नेहलता श्रीवास्तव, अरुण अभिषेक, डॉ. व्यासमणि त्रिपाठी, डॉ. गुर्रमकोण्डा नीरजा, प्रो. फूलचन्द्र मानव, डॉ. शंकर प्रसाद, डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा, प्रियंका गुप्ता, प्रो. रामसजन पाण्डेय, डॉ. सत्यवीर मानव, डॉ. हृदयनारायण, भावना सक्सेनाऋ इनके अतिरिक्त पड़ाव और पड़ताल में बी.एल. आच्छा आलोचना-कर्म में सक्रिय रहे हैं, किन्तु ये लघुकथाएँ भी लिखते हैं। ‘पड़ाव और पड़ताल’ के ही 30वें खण्ड में इनकी लघुकथा प्रकाशित है। इनके अतिरिक्त कृष्णानंद कृष्ण, राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’, डॉ. मिथिलेशकुमारी मिश्र, डॉ. वीरेन्द्रकुमार भारद्वाज, डॉ. शिवनारायण, डॉ. पुष्पा जमुआर, डॉ. उमेश महादोषी, अनीता ललित, डॉ. अनीता राकेश इत्यादि ऐसे समीक्षक हैं, जो ‘पड़ाव और पड़ताल’ में आलोचक की भूमिका में हैं, यों इन आलोचकों ने पर्याप्त लघुकथा-सृजन भी किया है।

इन सभी आलोचकों ने प्रायः व्यावहारिक समीक्षाएँ ही लिखी हैं।

                                   शेष आगामी अंक में…………

Tuesday, 13 October, 2020

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-4 / डॉ॰ सतीशराज पुष्करणा

 दिनांक 12-10-2020 से आगे

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-4

चौथी कड़ी

शिल्प के छह उपतत्त्वों की चर्चा उफपर की गई है किन्तु इसके अतिरिक्त कुछ अन्य कारक एवं विशेषताएँ भी हैं जो लघुकथा के शिल्प में अपेक्षाकृत अधिक चमक लाने में सहयोग देते हैं। वे क्रमशः इस प्रकार हैं1. संवेदनशीलता, 2. संघर्ष, अर्न्द्वन्द्व, 3. अनकहे का कहना, 4. विराम-चिह्न, 5. कालत्व दोष और 6. काल-दोष।

1. संवेदनशीलतासाहित्य-जगत में संवेदना का अर्थ ज्ञान या ज्ञानेन्द्रियों का अनुभव है। जब हम कोई लघुकथा पढ़ते हैं तो कुछ लघुकथाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें पढ़कर मन भावुकता के शिखर का स्पर्श करने लगता है, तो ऐसी स्थिति को संवेदना और ऐसी रचना को संवेदनशील रचना कहते हैं। प्रायः लघुकथाकारों द्वारा ऐसी लघुकथाओं की रचना सम्भव हुई है, वस्तुतः जो लघुकथा हृदय का स्पर्श पूरी गहराई तक जाकर कर लेती है, वह लघुकथा संवेदनशील मानी जाती है। उदाहरणस्वरूप चित्रा मुद्गल की लघुकथा ‘दूध’ देखी जा सकती है। (पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-2)

एक ऐसी बेटी का दर्द जिसे सयाने होने पर दूध नहीं दिया जाता और इच्छा होने पर उसे चुराकर पीना पड़ता है। ऐसी स्थिति में उसे अपनी माँ से डाँट खानी पड़ती है।

तात्पर्य यह है कि लघुकथाकार को प्रयास करना चाहिए, जब जहाँ भावुकता उत्पन्न करने का अवसर आए, उसका पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहिए, प्रत्येक लघुकथा में तो ऐसा सम्भव नहीं है, यह सही है।

2. संघर्षकथावस्तु को जो निर्णयात्मक क्षण प्रदान करती है वो स्थिति संघर्ष कहलाती है। व्यक्ति के मन में होनेवाले अन्तर्द्वन्द्व को भी संघर्ष कहते हैं। लघुकथा में संघर्ष की उपस्थिति रचना को श्रेष्ठ बनाने में भरपूर सहयोग प्रदान करती है। जाने-अनजाने प्रायः यानी अधिकांश लघुकथाओं में स्वाभाविक रूप से संघर्ष की उपस्थिति हो ही जाती है। लघुकथा में संघर्ष प्रायः नायक/नायिका अथवा दोनों का प्रत्यक्ष होता है

, संघर्ष का सटीक चित्राण लघुकथा को श्रेष्ठ बनाने में उल्लेखनीय योगदान प्रदान करता है। उदाहरणस्वरूप रूप देवगुण की ‘जगमगाहट’ लघुकथा का अध्ययन किया जा सकता है। (पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-3)

इस लघुकथा में इन पंक्तियों में ‘संघर्ष’ को देखें

‘‘अबकी बार उसने सोच लिया था, वह नौकरी नहीं छोड़ेगी, वह मुकाबला करेगी। उसी दिन दोपहर बाद बॉस ने उसे अपने साथ अकेले में उस कमरे में जाने के लिए कहा, जहाँ पुरानी पफाइलें पड़ी थीं। उन्हें उन पफाइलों की चेकिंग करनी थी। उसे सापफ लग रहा था कि आज उसके साथ गड़बड़ी होगी।

एक बार तो उसके मन में आया कि कह दे कि मैं नहीं जा सकती। किन्तु नौकरी का खयाल करते हुए वह इन्कार न कर सकी। कुछ देर में ही वह तीन कमरे पार कर चौथे कमरे में थी। वह और बॉस पफाइलों की चेकिंग करने लगे। उसे लगा, जैसे उसका बॉस पफाइलों की आड़ में केवल उसे घूरे जा रहा है। उसने सोच लिया था कि ज्योंही वह छुएगा वह शोर मचा देगी। दस मिनट हो गए, लेकिन बॉस की ओर से कोई हरकत न हुई।

अचानक बिजली गुल हो गई। यह बॉस की साजिश हो सकती हैयह सोचते ही वह काँपने लगी।’’

यह नायिका का अन्तर्द्वन्द्व/संघर्ष है जो इस लघुकथा की पृष्ठभूमि को शक्ति प्रदान करते हुए मन्तव्य की ओर त्वरा से आगे बढ़ाता है।

3. अनकहे की मुखरताश्रेष्ठ लघुकथाओं के अनेक गुणों में से एक यह गुण भी बहुत महत्त्वपूर्ण है कि जो बात लघुकथा में शब्दों में न लिखी हो, वह बात भी स्वयं को प्रत्यक्ष करे। वस्तुतः यही वह कला है जिससे लघुकथा अपनी पूर्णता बरकरार रखते हुए शब्दों की मितव्ययिता बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत कर देती है। लघुकथा को लघु आकार देने में इस गुण का बड़ा महत्त्व हो जाता है। उदाहरणस्वरूप सुभाष नीरव की ‘दर्द’ लघुकथा देखें। (पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-30

इस लघुकथा में ‘आईना’ या ‘दर्पण’ शब्द का कहीं लिखित उपयोग नहीं हुआ, और वह पूरी लघुकथा में एक मुख्य सह-पात्रा के रूप में अपनी धमाकेदार उपस्थिति प्रत्यक्ष करता रहा। यह अनकहे शब्दों का कहना या मुखर होना है, जो कलात्मक दृष्टि से लघुकथा को श्रेष्ठ बनाने में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। ये पंक्तियाँ देखें, जहाँ अनकहा मुखर होता है—‘‘वह किरच-किरच हो गया। अब वहाँ एक नहीं, अनेक चेहरे मेरा मुँह चिढ़ा रहे थे। कमाल यह था कि वह क्षत-विक्षत होकर भी बेहया-सा मुस्करा रहा था।’’ इस प्रकार की लघुकथाएँ प्रबुद्धों द्वारा विशेष रूप से सराही जाती हैं।

4. विराम-चिह्नविराम-चिह्न मुख्यतः छह होते हैं जो वाक्य संरचना को शुद्ध ढंग से पाठकों तक हू-ब-हू भाव में सम्प्रेषित करते हैं। इनमें पूर्ण विराम-चिह्न (।) उपयोग में आता है, उसके बाद ‘अर्द्धविराम’ (;), ‘अल्प विराम’ (,), ‘उपविराम’ (:), ‘प्रश्नवाचक चिह्न’ (?) और विस्मयसूचक-चिह्न (!) इन विराम-चिह्नों के अतिरिक्त लघुकथा में जिन चिह्नों का पर्याप्त मात्रा में उपयोग होता है, वे हैं डॉट-डॉट-डॉट (...), हाईफन (-), डैश (), इनवर्टेड कोमा (‘’) आदि।

इन विराम-चिह्नों को निम्न उदाहरणों से भली-भाँति समझा जा सकता है। जहाँ वाक्य पूर्ण हो जाता है, वहाँ पूर्ण विराम () का चिह्न लगाया जाता है। जैसेमैं पटना से मधुबनी जा रहा था। मैंने उसे बहुत समझाने का प्रयत्न किया किन्तु वह नहीं माना आदि।

अ(र्विराम चिह्न (;)पूर्ण विराम से कम समय के ठहराव में अर्द्धविराम चिह्न का प्रयोग किया जाता है। यथापरिश्रम आवश्यक है; इसी से सफलता मिलती है। आदि।

विरोधपूर्ण कथनों को पृथक् करने हेतु भी अर्द्धविराम चिह्न का प्रयोग किया जाता है। यथामनुष्य सोचता है कु्छ; और हो जाता है कुछ। आदि।

विभिन्न उपवाक्यों पर जोर देने हेतु भी अर्द्धविराम का चिह्न अनिवार्य है। यथा

खूब मेहनत करो; परीक्षा निकट है।

आगे बढ़ते रहो; सपफलता इसी में है। आदि।

एक ही विषय से सम्बन्धित दो या अधिक उपवाक्यों को जोड़ने हेतु भी अर्द्धविराम का उपयोग अनिवार्य है। यथासूर्यास्त हुआ; शाम हुईऋ तारे उगे और चाँद हँस पड़ा।

जहाँ मुख्य वाक्य तथा उपमुख्य वाक्य का आपस में अधिक सम्बन्ध न हो; वहाँ अर्द्धविराम का उपयोग होता है। यथासुबह उठते ही टहलना है; स्नान करना है; भोजन बनाना है; बीस मिनट में ये सब नहीं हो सकता। आदि।

यदि दो से अधिक उपवाक्यों में एक ही कर्त्ता का प्रयोग हो तो अन्तिम वाक्य छोड़कर, प्रत्येक में अर्द्धविराम चिह्न का प्रयोग होता है। यथाकभी वह हँसती है; कभी वह नाचती है; कभी वह रोती है; कभी वह मौन हो जाती है; कभी पत्थर पफेंकने लगती है। आदि।

अल्प विरामअर्थ में सुबोधता तथा स्पष्टता लाने हेतु अल्प विराम का प्रयोग आवश्यक है। यथा

मारो, मत जाने दो।

मारो मत, जाने दो। आदि।

यहाँ अल्प विराम से इतना बड़ा अर्थान्तर हुआ है।

दो से अधिक, समान महत्त्व वाले शब्द या वाक्यऋ जो और/तथा/एवं से जुड़ा हो, तो अन्तिम दो शब्दों या वाक्यों को छोड़कर अन्य सभी के पहले अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग होता है। यथा

शब्द-विलगाव में

छात्रा को परिश्रमी, कर्मठ, सुशील तथा ईमानदार होना चाहिए। दुकान में लाल, पीले, हरे, नीले और नारंगी कपड़े हैं। आदि।

वाक्य-विलगाव में

तुलसीदास ने स्वान्तः सुखमय लिखा, केशव ने विद्वानों के लिए लिखा, रत्नाकर ने काव्यशास्त्रियों के लिए लिखा तथा कबीर ने मूलतः जनता के लिए लिखा। आदि।

संयुक्त तथा मिश्रित वाक्यों के उपवाक्यों को अलग करते हेतु अल्प विराम का प्रयोग होता है। यथा

जब तक बिजली रही, मैं पढ़ता रहा।

राम अवश्य आता, पर उसके पास साधन नहीं थे। आदि।

आवृत्ति या शब्दों पर बल देने हेतु अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग होता है। यथाहाँ, हाँ, वह अवश्य जाएगा। आदि।

पर, परन्तु, अतः, किन्तु, इसलिए, नहीं तो, और जिससे कि से प्रारम्भ होनेवाले उपवाक्यों से पहले अल्प विराम का प्रयोग होता है। यथा

वह आता, पर वह बीमार हो गया।

वह आया, परन्तु खाली हाथ।

आज हड़ताल है, अतः दुकानें बन्द हैं।

वह घबराया, किन्तु बात समझ में आ गई।

वह लंगड़ा था, इसलिए समय पर नहीं पहुँच सका।

उसके हाथ बँधे थे, नहीं तो वह अवश्य लड़ता। आदि।

अव्ययों से प्रारम्भ होनेवाले वाक्यों में

हाँ, वह कर्मठ था।

नहीं, मैं नहीं जाऊँगा।

बस, अब अधिक नहीं खाउफँगा।

अब, माथा पकड़ने से क्या लाभ।

तो, उसने शादी कर ही ली। आदि।

वस्तुतः, कर्त्ता का अर्थ करनेवाला होता है।

सम्बोधन को शेष वाक्यों से अलग करने हेतु कभी-कभी अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग हो जाता है। यथाभाइयो, यह राजतन्त्रा नहीं, प्रजातन्त्रा है। आदि।

वाक्य में उद्धरण-चिह्न से पूर्व अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग होता है। यथाश्याम ने कहा, ‘‘मैं कल अवश्य आऊँगा।’’ आदि।

एक ही पंक्ति में नाम, ग्राम आदि पता लिखने पर उनमें से प्रत्येक के बाद अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग होता है। यथादिशा प्रकाशन, त्रिनगर, दिल्ली-110 035। आदि।

मुख्य बातें

1. सबसे कम देर के ठहराव में अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग होता है।

2. विराम-चिह्नों में सर्वाधिक प्रयोग अल्प विराम का ही होता है।

3. अर्थ के स्पष्टता को ध्यान में रखकर अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग अनिवार्य है।

उपविरामहाईफन यानी रेखिका से कुछ अधिक ठहराव में इस चिह्न का प्रयोग होता है। जैसे

गांधीजी के बारे में कुछ विचार इस प्रकार हैं

हिन्दी में तीन शैलियाँ प्रचलित हैंहिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी। आदि।

मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत छोटे-छोटे शीर्षकों के बाद उप विराम-चिह्न का प्रयोग होता है। यथा

भाषा के विविध रूप हैं :

सीमित भाषा :

कामचलाऊ भाषा :

परिनिष्ठ भाषा : आदि।

किसी महत्त्वपूर्ण विषय या कार्य पर विशेष बल देने हेतु इस चिह्न का प्रयोग होता है। यथा

फणीश्वरनाथ रेणु : कर्तव्य और कृतियाँ

हिन्दी के शोधग्रन्थ : प्रक्रिया और परम्परा

आजकल रेखिका के स्थान पर भी उप विराम का प्रयोग चल पड़ा है। यथा

अध्यापक : रिश्वत लेना अन्याय है। इसे दूसरे रूप में बताओ।

छात्रा : रिश्वत लेना एक अन्य आय है। आदि।

प्रश्नवाचक चिह्नसामान्यतः प्रश्नसूचक शब्दों ;क्या, क्यों, कैसे, कौन, कहाँ, कबद्ध के प्रयोग से जब प्रश्न का भाव सूचित होता है, तब प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग होता है। यथा

तुम कहाँ जा रहे हो?

तुम्हारे साथ कौन खड़ा है?

मोहन कैसे बीमार पड़ा?

तुम कब आओगे? आदि।

कभी-कभी प्रश्नवाचक शब्दों के अभाव में भी वाक् ध्वनि के चलते प्रश्नवाचकता आ जाती है। यथा

तुम पटना जाओगे?

तुम पुस्तक नहीं खरीदोगे?

आप जा रहे हैं? आदि।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहीं-कहीं निषेधात्मक स्थिति हेतु प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग किया है। यथा

आँखें खोले रहना भी कोई तुक की बात है?

देखा जाए तो सूरदास की साधना से उसका क्या सम्बन्ध था?

पर जामुन कौन अच्छा है? आदि।

द्विवेदीजी ने कहीं-कहीं बाहुल्यार्थ में प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग किया है। यथा

पण्डितों से कौन लड़ता पिफरे...?

क्या कहने?

कितना सुन्दर वातावरण उपस्थित है?

कभी-कभी बल देने हेतु इस चिह्न का प्रयोग किया जाता है। यथा

किस पाप-अभिसन्धि ने इस कुसुम-कलिका को तोड़ दिया था? आदि।

कभी-कभी ‘हाँ’ उत्तर पाने हेतु इस चिह्न का प्रयोग किया जाता है। ऐसी स्थिति में वाक्य के अन्त में ‘न’ का प्रयोग किया जाता है। यथा

एक बीघा जमीन में बीस कट्ठा जमीन होती है न?

‘साहित्यिक’ तो साहित्य के सम्बन्ध को कहते हैं न? आदि।

कभी-कभी उपेक्षा के अर्थ में भी इस चिह्न का प्रयोग होता है। यथा

धानुक टोली का तनुकलाल?

छुछुन्दर की तरह तो सूरत है, वह महन्थ होगा? आदि।

कभी-कभी आश्चर्य, विस्मय, विपत्ति के अर्थ में भी प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग होता है। यथा

इस्स! एक हजार?

सुनते हैं, शुद्ध संस्कृत में बोल रहा है सक्षम।

सच?

विस्मयसूचक चिह्नहर्ष, विषाद, आश्चर्य, करुणा, भय इत्यादि भावों को विस्मय कहते हैं। इन्हीं भावों के अर्थ-द्योतक में इस चिह्न का प्रयोग होता है।

इस चिह्न का प्रयोग विस्मयादिबोधक पदों, पदबन्धों का वाक्यों के अन्त में होता है। यथा

शाबाश! तुमने कमाल कर दिया।

वाह! कितना सुन्दर दृश्य है।

कैसी भयंकर रात है! आदि।

सम्बोधन के लिए भी इस चिह्न का प्रयोग किया जाता है

मित्रो! परोपकार, एक सामाजिक कार्य है।

बन्धुओ! एकता में ही शक्ति है। आदि।

कभी-कभी या वाधिक्य में इस चिह्न का प्रयोग होता है। यथा

...महन्थ साहेब! महंथ साहेब सुनिए।

दमे से जर्जर शरीर में दम कहाँ! आदि।

कभी-कभी विपत्ति के अर्थ में भी इस चिह्न का प्रयोग होता है। यथा

खबड्डा! माय बाप, हाय बाप! सपाक्।

इन छह विराम-चिह्नों के अतिरिक्त (...) का भी लघुकथा में भरपूर उपयोग होता है, यों तो इन डॉट-डॉट-डॉट का प्रयोग कहीं-न-कहीं प्रायः सभी लघुकथाकारों ने आवश्यकतानुसार अपनी किसी-न-किसी लघुकथा में अवश्य ही किया है, किन्तु सर्वाधिक उपयोग पारस दासोत एवं कमल चोपड़ा ने अपनी आरम्भिक लघुकथाओं में किया है। बाद की लघुकथाओं में भी उन्होंने इन डॉट-डॉट-डॉट का प्रयोग किया है किन्तु अपेक्षाकृत बहुत कम। इनके अतिरिक्त अन्य वरिष्ठ लघुकथाकारों के साथ-साथ नए लोगों ने भी इन डॉट-डॉट-डॉट का सटीक उपयोग अपनी लघुकथाओं में किया है। कमल चोपड़ा की ‘छोनू’ लघुकथा में यह वाक्य देखें

‘‘मैं छिक्ख-छुक्ख नईं अूँ...मैं बीज-उफज नईं अूँ...मैं तो छोनू अूँ...।’’

वस्तुतः ये डॉट-डॉट-डॉट उन शब्दों/भावों के स्थान पर दिए जाते हैं जिससे पाठक पढ़ते हुए अनकहे शब्दों को मुखर रूप से पढ़-समझ लेता है।

एक अन्य उदाहरण महेश शर्मा की ‘डर’ लघुकथा में देखें—‘‘...दोपहर के भोजन के इन्तजार में कुर्सी पर उफँघते बाबूजी पर माँ झुँझलाती है, ‘‘इस कुर्सी पर रहम करो, खाना खाकर सीधे चारपाई ही तोड़ना...थोड़ा सबर कर लो...रोटियाँ सेंककर ला रही हूँ।’’ ...पिफर बिस्तर पर लेटी बहू के सामने से उसी तरह बड़बड़ाती हुई निकल जाती है कि, तंग आ गई हूँ...पेट है या कोठार... अभी दो घण्टे पहले ही तो डटकर नाश्ता किया था...।’’

वस्तुतः मैं कहना यह चाहता हूँ कि लघुकथा में और विशेष रूप से संवादों में डॉट-डॉट-डॉट का सटीक उपयोग संवादों में प्राण डाल देता है।

डॉट-डॉट-डॉट के अतिरिक्त रेखिका, यह चिह्न हाईफन से थोड़ा बड़ा होता है। इसे अंग्रेजी में ‘डैश’ कहते हैं। लघुकथाओं में भी समुचित अभिव्यक्ति हेतु इसका सही एवं सटीक उपयोग किया जाता है जो लघुकथा को श्रेष्ठ बनाने में कापफी सहायक होता है। इसका सही उपयोग कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने ‘इन्जीनियर की कोठी’ में अनेक स्थलों पर किया है। इस वाक्य में डैश () का सही उपयोग देखें—‘‘मैं सोच रहा थातो हमारा वर्तमान ही नहीं हमारा भविष्य भी हमारी मुट्ठी में हैजीवन ही नहीं स्वर्ग भी। वस्तुतः डैश का उपयोग थोड़ा लम्बा पॉज देने हेतु किया जाता है। एक अन्य उदाहरण पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की लघुकथा ‘भगवान्’ के इस वाक्य में अवलोकित करें—‘‘आदमी ने दूसरा मकान तैयार कियाबिलकुल नए ढंग का।’’

इसी प्रकार एक चिह्न छोटी रेखिका यानी हाईपफन ;-द्ध होता है, जो विलुप्त विभक्ति का अर्थ मुखर करता है। जिसे डॉ. शकुन्तला किरण की लघुकथा ‘इमरजेन्सी’ के इस वाक्य में देखें—‘‘तो तू निपटा लेगी गाँव-गिरस्ती के झगड़े?’’ यहाँ गाँव-गिरस्ती के मध्य हाईपफन विलुप्त विभक्ति ‘और’ को मुखर करता है। एक वाक्य डॉ. रामकुमार घोटड़ की लघुकथा ‘ढलते वक्त’ से देखें—‘‘सेवा भाव व छोटे-मोटे काम की तुमसे तो आशा कर ही सकता हूँ।’’ यहाँ छोटे-मोटे के मध्य हाईपफन विलुप्त विभक्ति ‘और’ को मुखर करता है। इसके अतिरिक्त इसके असंख्य उदाहरण दिए जा सकते हैं, किन्तु लेख को अनावश्यक विस्तार देना मेरा उद्देश्य नहीं है।

सभी कथात्मक विधाओं में उद्धरण-चिह्न (Inverted Commas) का उपयोग प्रायः संवादों में किया जाता है या जहाँ कुछ विशेष शब्द या वाक्य को उद्धृत करना होता है, वहाँ इनका उपयोग किया जाता है। उदाहरणस्वरूप कल्पना भट्ट की लघुकथा ‘कठपुतली’ के निम्न संवादों को देखा जा सकता है—‘‘खुद को सँभाल पगली, अब सब-कुछ तुझे ही देखना और करना...तू एक पढ़ी-लिखी स्त्रा है...तू स्वयंसिद्धा है...तुझे इस भँवर से निकलना है...।’’

एक अन्य उदाहरण सीमा जैन की लघुकथा ‘दान’ का यह संवाद भी देखा जा सकता है, ‘‘अरे नहीं, काहे की मेहनत! मुफ्रत में बगीचे से ही तो लाए हैं। देना है तो दो, नहीं तो जाओ यहाँ से।’’ तात्पर्य यह है कि उद्धरण-चिह्न किसी के कथन के आरम्भ और अन्त में उपयोग किए जाते हैं। लघुकथा में इनकी बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

                                           शेष आगामी अंक में…………