Tuesday, 12 December, 2017

डॉ. शकुन्तला ‘किरण’ से डॉ लता अग्रवाल की बातचीत-2

अर्जुन का तीर है लघुकथाडॉ. शकुन्तला किरण

साथियो ! लघुकथा के क्षेत्र में आदरणीया डॉ॰ शकुन्तला ‘किरण’ जी एक जाना-पहचाना और सम्मानित नाम है। आप देश के किसी भी विश्वविद्यालय में लघुकथा के लिए पंजीकृत पहली शोधार्थी व पीएच॰ डी॰ शोधोपाधि प्राप्त व्यक्तित्व हैं (राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर सन् 1976 में पंजीकृत व सन् 1982 में पीएच॰ डी॰ उपाधि प्राप्त)| इस नाते इस क्षेत्र में आज जो भी इतिहास उपलब्ध है उसमें आपकी बड़ी भूमिका है | आपके द्वारा लिखित आलोचना पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा’ लघुकथा के महासागर का ऐसा लाइट हाउस है जिससे उस राह के राहगीर और पोत सदैव दिशा और प्रेरणा पाते रहेंगे |

सुखद संयोग रहा कि अक्टूबर 2017 में अजमेर यात्रा के दौरान मुझे उनका निकट सान्निध्य मिला | दीदी ने नवें दशक से ही साहित्य पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया देने से स्वयं को दूर रखा था; किन्तु उस दिन मेरे निवेदन पर (जिसकी मैंने कल्पना नहीं की थी, न ही इस तैयारी के साथ उनसे मिलने गयी थी) उनकी अनुमति से, जो प्रश्न उस समय मस्तिष्क में आये मैंने उनसे किये और उन्होंने सहर्ष उन सबके जवाब भी दिए | उनकी पहली किस्त इसी ब्लॉग पर कुछ दिन पहले पोस्ट की गयी थी। आज उस बातचीत की दूसरी और अन्तिम किस्त आपसे साझा कर रही हूँ |डॉ॰ लता अग्रवाल]

डॉ लता अग्रवाल : दीदी, कहा जाता है कि लघुकथा इकहरे, एकांगी कथ्य की विधा है। इसका क्या अर्थ है ?
जैसाकि  ‘लघुकथा’ नाम से पता चलता है, यह कम शब्दों में कही जाने वाली कथा-विधा है | इसमें कथ्य के एक पहलू पर ही लेखक अपना काम करता है | यद्यपि कथ्य के एक ही पहलू पर अनेक कहानियाँ भी लिखी जाती रही हैं; फिर भी, कहानी कुछ ऐसे विस्तारों की ओर जाने को बाध्य होती जिनके बिना उसकी काया को विस्तार देना कहानीकार के लिए असम्भव होता है। ऐसी हर बाध्यता से मुक्त रचना ही ‘लघुकथा’ कहलाती है और सही अर्थों में वही एकांगी प्रस्तुति होती भी है।
डॉ लता अग्रवाल : लघुकथा में ‘समापन बिंदु’ और ‘अंत’ दो अलग स्थितियाँ कही जाती हैं। ये किस तरह अलग होती हैं
तात्त्विक दृष्टि से देखा जाए तो, किसी भी लघुकथा का ‘समापन’ नहीं होता, और न ‘अंत’ ही होता है। मेरा प्रारम्भ से ही मानना रहा है कि लघुकथा जहाँ समाप्त होती है, वहीं से पाठक के मनो-मस्तिष्क में पुन; शुरू होती है। फिर वह कथा चिन्तन को और तत्जनित प्रतिक्रिया को जन्म देती है, और कुछ नहीं तो दूसरी कथा को जन्म देती है। इसीप्रकार यह क्रम चलता रहता है | फिर भी, कुछ लघुकथाओं में समापन और अंत की स्थिति देखने को मिलती है जिसे रचना को देखे बिना यहाँ समझाना सम्भव नहीं है।
डॉ लता अग्रवाल : प्राचीन काल से लेकर अब तक, समकालीन हिन्दी लघुकथा में मानवीय सम्वेदना की प्रस्तुति को आप किस-किस रूप में रेखांकित करेंगी ? तात्पर्य यह कि उसके रूप में क्या-क्या परिवर्तन नजर आते हैं?
साहित्य में एक विधा के रूप में लघुकथा छोटी से छोटी अनुभूति को विराट मानवीय संवेदना के स्तर पर गहराई से मूर्त रूप प्रदान करती है | मर्म को छू लेना लघुकथा की ऐसी  विशेषता है जिसका निर्वाह वह आदिकाल से अब तक करती आ रही है | वही लघुकथा जीवित रहती है जिसका मर्म जीवित हो।
डॉ लता अग्रवाल : एक सफल लघुकथा में दृश्य विधान का क्या महत्व है?
बहुत महत्वपूर्ण रोल है | दृश्य विधान नाट्यशास्त्र का विषय है। यह न केवल लिखित साहित्य पर अपना फोकस रखता है वरन श्रव्य या पठनीय साहित्य में भी अपनी भूमिका का निर्वाह उतनी ही गंभीरता और प्रभावपूर्ण ढंग से करता है | दृश्यात्मकता किसी वस्तु के अवलोकन के कई द्वार खोल देती है। लघुकथाकार के पास शब्दों की वह शक्ति होनी चाहिए जिससे वह जो रच रहा है, उसे पाठक की आँखों के सामने मूर्त कर सके | दृश्यात्मकता रचना और रचनाकार दोनों की उत्कृष्टता का पैमाना है |
डॉ लता अग्रवाल : आपकी दृष्टि में कौन-से विषय हैं जो अभी भी लघुकथा में अछूते हैं और जिन पर तत्परता से काम होना चाहिए ?
आज हर क्षेत्र में पुराने मानक अक्षम साबित हो रहे हैं। कारण, जिन्दगी का केनवास बहुत विस्तार पा गया है | यही बात लेखन पर भी लागू होती है | लघुकथा में पारिवारिक, सामाजिक मुद्दों पर बहुत लेखन हुआ है, राष्ट्रीय मुद्दों पर भी | किन्तु आज आवश्यकता है इन मुद्दों पर गहराई से चिन्तन करने की। चिन्तन में उथलापन होगा तो रचना में भी गहराई नहीं आ पाएगी। लघुकथा के कथ्यों को विश्वस्तर पर ले जाने की बात भी यदा-कदा सामने आती रहती है| इस बारे में किसी आलोचक का एक कथन मुझे याद आ रहा है। उन्होंने शायद कहा था— कथ्य-चुनाव के मामले में लघुकथाकारों को एक प्रक्रिया से गुजरना चाहिए। वे पहले स्थानीयता से जुड़ें, फिर राष्ट्रीयता से और उसके बाद अन्तरराष्ट्रीयता से।
डॉ लता अग्रवाल : जी दीदी, अजमेर में हुए ‘शब्द निष्ठा’ सम्मान के दौरान आदरणीय बलराम अग्रवाल जी ने यह बात कही थी।
तो इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है। ऐसा नहीं कि इस दिशा में कोई काम ही नहीं हुआ, बहुत हुआ है। अनेक युवा भी इसी प्रक्रिया को अपना रहे होंगे, सही दिशा में सक्रिय होंगे | फिर भी, आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो समस्याएं, चिन्तन उभरकर आ रही हैं उनकी ओर से आँखें मूँदना गलत होगा। उन पर चिंतन और मंथन को जारी रखने की आवश्यकता है |
डॉ लता अग्रवाल : शैली किसी भी कथ्य के सम्प्रेष्ण को प्रभावी बनाती है। लघुकथा में कौन–कौन सी शैली कथ्य और तथ्य को बेहतर संप्रेषित करने की क्षमता रखती है
बेशक, शैली किसी भी कथ्य के सम्प्रेष्ण को प्रभावी बनाती है; लेकिन कब, कौन-सी शैली अपनायी जाए, इसका निर्धारण भी एक कला है। शैली का सम्बन्ध सम्बन्धित कथ्य और उसके लेखक से है। किसी एक शैली को प्रभावशाली मान लेना कथाकार के अपने हित में भी नहीं है।
डॉ लता अग्रवाल : बहुत-सी लघुकथाएँ मात्र विवरणात्मक अथवा व्याख्यात्मक शैली में लिखी मिल जाती हैं। प्रभाव और सम्प्रेषण की दृष्टि से इस शैली को  कितना अपनाया जाना चाहिए ?
लघुकथा कम शब्दों में कही जाने वाली गद्य कथा-विधा है। अपनी पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा’ में इसे परिभाषित करते हुए मैंने लिखा है—‘शाब्दिक मितव्ययता के सन्दर्भ में, लघुकथा एक प्रकार से एक प्रबुद्ध अर्थशास्त्री का ऐसा निजी बजट है जिसे वह सकारात्मक सोच-समझ के साथ इस प्रकार बनाता है कि प्रत्येक पैसे का (लघुकथा के सन्दर्भ में—प्रत्येक शब्द का) सार्थक उपयोग हो सके।’ इसमें अनावश्यक स्थूल विवरण, अस्वाभाविक बडबोलापन रचना को छितरा और प्रभावहीन बनाता है। लघुकथाकार को शिल्प के छितरेपन से बचना चाहिए।  इसके स्थान पर द्वंद्व, प्रतीक एवं संकेतों के माध्यम से बात कहने पर बल देना चाहिए|
डॉ लता अग्रवाल : लघुकथा में 'आत्मकथात्मक शैली' का प्रयोग किया जाना चाहिए अथवा नहीं; यदि हाँ, तो किस रूप में और किस हद तक ? क्या इस शैली में लिखी लघुकथा को लेखक की सीधी उपस्थिति की कथा माना जाएगा?
कथा-विधा में प्रयुक्त होने वाली या प्रयुक्त हो सकने वाली कोई भी शैली लघुकथा में अवांछित नहीं है—आत्मकथात्मक शैली भी नहीं। इस शैली की रचनाएँ जाहिर है कि ‘प्रथम पुरुष’ में लिखी जाती हैं। इस बारे में बलराम अग्रवाल का एक वक्तव्य पिछले दिनों कहीं पढ़ा था जिसमें उन्होंने कहा था—‘ 'प्रथम पुरुष' में लिखी रचनाओं में से अधिकतर में 'मैं' पात्र को लेखक ग्लोरीफाई ही अधिक करता देखा जाता है। कारण? 'मैं' जबकि एक स्वतंत्र पात्र होना चाहिए, फिर भी अधिकतर लेखक अपने आप को उससे जोड़ने का मोह संवरण कर लेते हैं और अपने ऊपर लानत-मलानत भेजने से कतराते हैं।’ उनका मानना है कि ‘कही जाने वाली घटना से स्वयं जुड़ा होने के बावजूद लिखी जाने वाली घटना से लेखक स्वयं को दूर रखे।’ मेरा भी मानना है कि लेखक अगर कथा-घटना से स्वयं को दूर नहीं रखेगा तो निश्चित रूप से अपनी उपस्थिति लघुकथा में दर्ज करके उसकी प्रस्तुति को कमजोर करने का कारण बन जाएगा।
डॉ लता अग्रवाल : क्या संवाद को लघुकथा में 'प्रभाव की बैसाखी' कहना उचित होगा ?
संवाद को प्रभाव की बैसाखी नहीं बल्कि उसकी व्याप्ति कहना अधिक न्यायसंगत होगा। संवाद सहज लगें, पात्र के अनुकूल हों, संक्षिप्त हों; किन्तु अर्थ की दृष्टि से उनमें विस्तार हो|
डॉ लता अग्रवाल : लघुकथा दृश्यांकन है, चित्रांकन है, चरित्रांकन है या यह तीनों
तीनों। जब चरित्र की बात होगी तो उसके आसपास का चित्र भी कथा में झलकेगा ही। जब चित्र की बात होगी तो पात्र उसका अभिन्न अंग होगा इसलिए यह कहना सही नहीं होगा की लघुकथा चित्र या चरित्र में से किसी एक का ही प्रतिनिधित्व करती है |
डॉ लता अग्रवाल : क्या प्राचीन लेखन को देखते हुए लघुकथा में नये पिलर खड़े करने की आवश्यकता आप महसूस करती हैं ?
बिलकुल। यदि किसी विधा में समय के साथ नवीनता बनाये रखना है तो नये पिलर तो खड़े करने होंगे न। नये पिलर ही किसी विधा को नया आधार और नयी ऊँचाई देते हैं। वे नये वातायनों का निर्माण करते हैं जिनसे समयानुकूल ताजी हवा और रोशनी अन्दर आ सके। जो विधाएँ नयेपन से कतराती हैं, वे रुग्ण होकर अन्तत: नष्ट हो जाती हैं। 
डॉ लता अग्रवाल : कालजयी लघुकथा आप किसे कहेंगी यानी आपकी दृष्टि से उसमें क्या गुण-धर्म होने चाहिएँ?
किसी भी विषय अथवा घटना को जबरन लघुकथा में धकेलने का प्रयास इस विधा को कृत्रिम और कमजोर बनाता है अत: जब तक लेखक के भीतर का द्वंद्व कागज पर नहीं उतरेगा, प्रभावशाली लघुकथा नहीं लिखी जा सकेगी | वस्तुत: लघुकथा घटना या विषय में नहीं उस गूँज में होती है जो कथा के बाद पाठक के मनो-मस्तिष्क में विस्तार पाती है | इस बात को ध्यान  में रखकर लिखी गई कथा निश्चय ही कालजयी रचना होगी |
डॉ लता अग्रवाल : आप हिन्दी लघुकथा के विचार पक्ष की माइलस्टोन हैं और आपका रचना पक्ष भी स्तरीय है। उसके बाद राजनीति में शीर्ष स्थान पर रहीं। उसे भी त्यागकर गत लगभग तीन सदी से आप आध्यात्मिक साधना की राह पर अग्रसर हैं। इन तीनों ही क्षेत्रों के अनुभव आपको हैं। यदि क्रम में रखना हो तो निश्चित ही आप अध्यात्म को प्रथम और राजनीति को तृतीय स्थान पर रखेंगी। क्यों
प्रथम—हम आध्यात्म को जीवन का उद्देश्य मानते हैं, जो साधना द्वारा ईश्वर प्राप्ति का मार्ग है। द्वितीय—साहित्य पर आए; इसका उद्देश्य भी स्वान्त: सुखाय, सर्वहिताय रहा है। सही कहा—अंत में रखना चाहूँगी राजनीति को; क्योंकि आज न केवल नेता और कार्यकर्ता बल्कि दल भी राष्ट्रीय हितों से दूर हैं।
डॉ लता अग्रवाल : जैसे कि कहा जाता है :
               * "अतीत की स्मृतियों का ताना बाना हैसंस्मरण।"
               * "ध्रुपद की तान हैकहानी।"
               * "जज्बात और अल्फ़ाज़ का बेहतरीन गुंचा हैग़ज़ल।"
               लघुकथा के लिए ऐसा एक वाक्य आप क्या निर्धारित करना पसन्द करेंगी ?
"अर्जुन का तीर है लघुकथा।"
डॉ लता अग्रवाल : अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष--इन चार पुरुषार्थों को लेकर लघुकथा में कोई काम हुआ है या हो सकता है या होना चाहिए

"अर्थ, धर्म और काम—ये तीनों आदिकाल से ही सामान्य जन की चिन्ताओं से जुड़े रहे हैं इसलिए जन-साहित्य का, जिसमें लघुकथा भी शामिल है, हिस्सा भी लगातार बनते रहे हैं। पूर्वकालीन लघुकथाओं में दर्शन के माध्यम से ‘मोक्ष’ की ओर भी मनुष्य का ध्यान आकर्षित किया जाता रहा है। ‘मोक्ष’ प्रचलित अर्थों में समकालीन लघुकथा का ध्येय नहीं है अलबत्ता सड़ी-गली मान्यताओं और मानसिक गुलामी की जंजीरों से ‘मुक्ति’ उसका विषय अवश्य है और हमेशा रहेगा।"

Tuesday, 14 November, 2017

पंजाबी कथाकार गुरदीप सिंह पुरी की लघुकथाएँ

सारे जहां से अच्छा
इस बार पंचकुला में आयोजित 26 वें अन्तरराज्यीय लघुकथा सम्मेलन में डॉ॰ श्याम सुन्दर दीप्ति की ओर से जो सामग्री बाँटी गयी उनमें गुरदीप सिंह पुरी के पंजाबी लघुकथा संग्रह ‘सारे जहां से अच्छा’ (1998) का हिन्दी रूपान्तर भी शामिल था। इसका रूपान्तर किया है श्री के॰ एल॰ गर्ग ने और भूमिका प्रि॰ दलीप सिंह भूपाल व डॉ॰ श्याम सुन्दर दीप्ति ने लिखी है। यहाँ पेश हैं उस संग्रह से तीन लघुकथाएँ :

पहली बार रोये
एक मुहल्ले के लोगों को अपने मुहल्ले में गुरुद्वारा बनाने का चाव चढ़ा।
उन्होंने घर-घर जाकर धन इकट्ठा किया और एक निहायत खूबसूरत गुरुद्वारे का निर्माण कर लिया। नाम रखा—श्री कलगीधर गुरुद्वारा।
पहला साल अच्छा व्यतीत हुआ।
अगले वर्ष गुरुद्वारा कमेटी चुनाव में मुहल्ले के दो धड़े बन गये।
अलग हुए धड़े ने अपना नया गुरुद्वारा खड़ा कर लिया। सोच-सोच कर नाम रखा—गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर जी।
अब हर कार्यक्रम के वक्त इस गुरुद्वारे की कमेटी गुरु-घर के बाहर खड़ी होकर ‘कलगीधर गुरुद्वारे’ जाने वाली संगत को रोककर रोष से कहती है :
 “तुम्हें शर्म आनी चाहिए। बाप का घर छोड़कर पुत्तर के दर पे जाते हो! घोर बेअदबी!”
पिता-पुत्र अपने सिक्खों पर पहली बार धाहें मार-मार कर रोए।

बोझा
“यार, जब से यह नयी कमेटी आयी है न, ससुरों ने गुरु-घर में सुधार-लहर ही चला दी है!” गुरु-घर के ग्रंथी सिंह ने बड़े दु:खी स्वर में कहा।
“वह कैसे?” दूसरे गुरु-घर के ग्रंथी ने गुरु-भाई से हैरानी से पूछा।
“देखो न—नयी गुल्लक धर दी है! इसमें न चिमटी पड़ती है और न ही गोंद वाला डक्का। अब ये छोटी-छोटी हरकतों पे उतर आये हैं। रात के अखंड-पाठ की माया भी गुल्लक में डाल देते हैं।”
“हूवर (वेक्यूम मशीन) चला लिया कर न! ऐसे मन क्यों मैला करता है।”
सुनते ही पहले ग्रंथी के सिर से मनों बोझा उतर गया।

बूढ़ी भिखारन
“बेटा, सुबह का कुछ नहीं खाया। भगवान के नाम पर रोटी दे दे! भगवान तुझे लम्बी उम्र दे। तेरी कुल ऊँची हो। तेरा आँगन खुशियों से भर जाये।” बूढ़ी भिखारन ने दफ्तर के लॉन में बैठे बाबू को रोटी वाला डिब्बा खोलते देख मिन्नत-सी की।
बाबू ने डिब्बा खोला तो उसमें पहले की तरह तीन रोटियाँ ही थीं, जिनसे बाबू का ही पेट मुश्किल से भरता था।
उसने दो रोटियों पर थोड़ी-सी सब्जी रखकर बुढ़िया की तरफ बढ़ा दी।
बूढ़ी के थिरकते होठों से बस यही निकला :
“बेटा, रोटियाँ तो तीन ही हैं! आप खा लो। मेरा क्या है, मैं कहीं और से माँग लूँगी। कहीं आप भूखे रह गये तो… ”
बुढ़िया लाठी टेकते आगे सरक गयी। बाबू कितनी ही देर अपने आँसू ठेलने की कोशिश करता रहा।


गुरदीप सिंह पुरी  की अन्य कृतियाँ :
कहानी संग्रह
1 उदासे फुल बहारां दे (1981)
2 ख्वाहिश (1990)
3 इक रात दा कत्ल (1990)
मिन्नी कहानी संकलन का संपादन
गुआचे दिनां दी भाल (1992)
मुलाकातें
बिन तुसां असी सखने (1985)
काव्य संग्रह
सखने हथ (1994)
निवास  का पता : 73-मैडक्नि स्ट्रीट, 3-एल, व्हाइट इंच, ग्लासगो जी-149 आर॰ टी॰ (यू॰ के॰)

Friday, 10 November, 2017

डॉ॰ सतीश दुबे को याद करते हुए

न हन्यते हन्यमाने शरीरे

गत एक वर्ष मन लगातार उद्विग्न रहा है; और 25-26 अक्टूबर के बाद तो कोई दिन ऐसा नहीं बीता जब अन्दर ही अन्दर आँसू लगातार न झरे हों।
लघुकथा लेखन ने जो बृहद् परिवार दिया है, उसमें से किसी का भी चले जाना मस्तिष्क को हिला जाता है, ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु’ को जानते हुए भी।
डॉ सतीश दुबे
जीवन में कई बार ऐसा घटित होता जाता है कि मस्तिष्क जो कहता है, मन उसे स्वीकार नहीं करता, तर्क पर तर्क देता हुआ अपनी बात मनवाता रहता है। गत 25 दिसम्बर, 2016 से अब तक यह लगातार हुआ है। इनके सन्दर्भ में राम-नाम के सत्य को मन स्वीकार नहीं कर रहा है। 
उम्र में और लेखन में भी, बहुत वरिष्ठ होने के बावजूद उनका सम्बोधन ‘आप’ ही रहता था। कई सालों से प्रत्येक नवरात्र की नवमी तिथि को मैं उन्हें फोन किया करता था। एक बार नवमी के बजाय दशहरे की शाम को किया तो उधर से बोले—“हाँ, मैं कल आपके फोन का इन्तजार करता रहा। अब सोच ही रहा था कि आज तो आपका फोन जरूर आएगा।” लेकिन विडम्बना देखिए कि इस साल (मार्च-अप्रैल 2017 में पड़े) चैत्र नवरात्र की नवमी भी खाली गयी और सितम्बर 2017 में पड़े शारदीय नवरात्र की नवमी भी। ऐसा नहीं कि भूल गया था; याद रहा, इस बार तो हर बार से ज्यादा याद आया, लेकिन फोन की ओर हाथ बढ़ाने की, नम्बर डायल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
सुरेश शर्मा जी
रोना ऐसा भी होता है, सच कहूँ, पहली बार जाना। आँसू अब से पहले भी भीतर गिरते रहे हैं, लेकिन अब से पहले इतनी गहराई से महसूस नहीं किया था।
इन्होंने ही सुरेश शर्मा जी के चले जाने की सूचना फोन पर दी थी। संयोग से उस समय नासिक में था और त्र्यम्बकेश्वर दर्शन की ओर मेरा मुख था। शायद इसीलिए शर्मा जी के प्रति मन अनजानी श्रद्धा से भर गया था। त्र्यम्बकेश्वर महादेव के प्रांगण में बैठकर कुछ समय सुरेश शर्मा जी की ओर से जाप किया था। तब से, जब भी देव-दर्शन का संयोग बनता है, सुरेश शर्मा जी मेरी स्मृति में आ जाते हैं। जैसे मैं अपने पिताजी-चाचाजी की ओर से मंत्र जाप करता हूँ, सुरेश शर्मा जी की ओर से भी करता हूँ। उस कड़ी में अब ये भी आ जुड़े हैं। सोचा नहीं था कि इतनी जल्दी आ जुड़ेंगे।
गत 1 नवम्बर, 2016 को मेरे मोबाइल पर संदेश आया—‘जन्मदिन मुबारक हो।’ मैंने तुरन्त फोन किया—“प्रणाम भाईसाहब, अभी से?”
बोले, “हाँ।”
“लेकिन मुझसे पहले तो आपका जन्मदिन पड़ेगा?”
बोले, “बलराम भाई, पहले-बाद का मसला ही नहीं है। यह पूरा माह हमारा है। इसलिए पहले ही संदेश भेज दिया कि कहीं आप बाजी न मार लें।”
‘कोई दूसरा बाजी न मार ले’ की स्पर्द्धात्मक भावना का यह स्नेह-पक्ष था। उसके बाद तो 12 नवम्बर को भी बात हुई, 26 नवम्बर को भी और एक बार सम्भवत: दिसम्बर के पहले-दूसरे सप्ताह में भी। इतनी जल्दी-जल्दी वार्तालाप के बीच से संवादकर्ता का उठकर अनायास चले जाना कचोटता है। आखिर हुआ क्या? भरे-पूरे परिवार को, हँसती-खिलती महफिल को एकाएक भौंचक कर, बिना कुछ बताए क्यों चले गये?
लेकिन, यह शिकायत करें किससे? पूछें किससे?
इन सवालों के बावजूद हम निश्चिन्त हैं। क्यों? इसलिए कि हमारा विश्वास जैसे ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु’ में है, वैसे ही ‘ध्रुवं जन्म मृतस्य च’ में भी है; और ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ में तो अटूट है। ‘न हन्यते’ के रूप में उनका लेखन हमारे बीच मौजूद है, मौजूद रहेगा।
मन है कि उनके इस मौन को उनकी कुछ लघुकथाओं के माध्यम से तोड़ू; लेकिन इस समय नहीं। यह जिम्मेदारी उठाने की स्वस्थ मन:स्थिति में नहीं हूँ। यह समय उनकी स्मृति को नमन करने का है। 12 नवम्बर का इन्तजार मुझ पर बहुत भारी पड़ रहा है, इसलिए आज ही इस पोस्ट को डाल देने को विवश हूँ। मित्रगण क्षमा करें।                                                                –बलराम अग्रवाल   

Saturday, 4 November, 2017

पंचकुला-2017 : हिन्दी लघुकथाएँ… चौथी कड़ी

नजदीक की दूरी /  सतविन्द्र कुमार राणा                                                               
सतविन्द्र कुमार राणा
काम से घर लौटते हुए गली में ही गर्म तेल की महक महसूस हुई। घर में घुसते ही अपने ही घर के चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ी दिखी। अनुमान लगाना मुश्किल न था, किसी का जन्मदिन अथवा सालगिरह होगीतभी ऐसा होता है। अक्ल के घोड़े दौड़ाना शुरु ही किये थे कि पिताजी की आहट सुनाई दी।
"पापा जी सालगिरह मुबारक होआज आपकी और मम्मी जी की शादी  सालगिरह है न?" मंझली बहू धीरे-से बोली।
"आँ...हाँ..हाँग्यारह मई हैआज ही।याद करते हुए बोले।
"बहूइसको क्या ध्यान रहना थाकभी ये चोंचले किये ही नहीं।"
 माँ की शिकायत में तंज था।
दूसरी बहू ने छेड़ा, "पापा जी को नया फोन मिलेगा आज तो गिफ्ट में।"
पिता जी धीमे-से मुस्कुराए।
छः बेटों के किसान पिता। सब बच्चे अब बाप बन चुके थे। छः कमरे का मकानसंयुक्त परिवार का घर था।
चाय के साथ सब ने पकौड़े खाए। सबने उन्हें सालगिरह की बधाई दी। पिताजी को सस्ता-सा नया फोन मिलाजिसे वे आसानी से चला सकते थे।
चलने के लिए उठे तो माँ ने टोका, "कहाँ चल दिए अब?"
पिता जी झट से बोले, "वहीँ जो बरसों से मेरा ठिकाना हैतबेले के साथ वाला कोठड़ा।"
अब माँ चुप थी।
पिताजी आगे बोले, "तू सँभाल अपने पोते-पोतियों को और मैं सँभालूँ भैंसों को।"
दोनों के होठों पर मुस्कान और आँखों में  विवशता झलक रही थी।
पिता जी चले गए।
माँ बड़बड़ा रही थी ,"बड़े परिवार में बड़े पास रहते हैंपर एक साथ नहीं।"
                                  
 मौन शब्द  /  विभा रश्मि
विभा रश्मि
"सुनो ! दोनों में नोक-झोंक चल रही है। आज सुबह से बहू-बेटे में रूठना-मनाना जारी है।"
घबरा कर अधेड़ पत्नी अपने पति से बोली।
"सुनो! उनके बेडरूम से तेज़ आवाजें आ रही हैखूब झगड़ रहे है।"
"क्योंक्या हुआ?" पति का स्वर चिन्तित था।
"शिकायत चल रही हैदो साल हो गये शादी कोबहू ने न जाने कितनी बार हमारे बेटे से प्यार का इज़हार किया। पर हमारे बेटे ने ‘वे शब्द’ नहीं बोले पलट केजो आजकल बोलने का बहुत फ़ैशन हो गया है।"
"क्या नहीं बोलकौन-से शब्द?" पति का सवाल था।
"वोही···…।" पत्नी के नेत्रों में इस उम्र में भी रंगीन बल्बों की लड़ियाँ जल उठी थीं।
"अच्छा…अच्छा··· ।" पति समझ गया।
उसे लगा पत्नी कहीं वे 'खास शब्दबोल न पड़े। आगे बढ़ कर उसने अधेड़ पत्नी की मुलायम हथेली अपनी दोनों हथेलियों में कैद कर उसे चुप करा दिया और उसे असीम प्यार से तकता रहा।
                         
 दूसरे की माँ /  सीमा जैन
सीमा जैन
"अजब इंसान है तू! तुझमें थोड़ी-बहुत इंसानियत भी बची है या नही? …तुझे अपनी अपाहिज़बीमार माँ से मंदिर और पूजा की ज़्यादा चिंता है। माँ का ज़रा भी ख़्याल नही…?" मेरा दोस्त श्याम एक साँस में सब कुछ कह गया।
 मैंने थकी-सी आवाज़ में कहा,  "माँ की चिंता है तभी तो एक पुजारी का इंतज़ाम करने के लिए भटक रहा हूँ। जो मेरे पीछे त्यौहार के समय मंदिर को संभाल ले।” फिर अपने आँसू पीते हुए मैंने बात आगे बढ़ाई, “ ये मंदिर की नौकरी ही तो हमारी रोज़ी-रोटी है। ये चली गई तो मैं माँ के साथ सड़क पर आ जाऊँगा…मुझे अपने कैंसर के इलाज़ के लिए शहर जाना है।”
दोस्त को सोच में पड़ा देख उसने आगे कहा, “और ये सलाह माँ ने ही दी है दोस्त कि कोई मंदिर संभालने को मिल जाये तो तू शहर चला जा…एक बार नंबर चला गया तो फिर पता नही कब लगे?
“हाँ यार, ये समस्या तो है। तुम अकेले ही हो माँ की देखभाल करने वाले।” श्याम बोला।
 “…और यदि मैं भी न रहा तो..."
श्याम ने मुझे रोककर मेरा हाथ थाम लिया, "तुम चिंता न करो, मैं घर और मंदिर दोनों संभाल लूंगा…हमारे मंदिर को पिताजी देख लेंगें।"
मैंने खुश होते हुए कहा, "अपनी माँ को तो सभी संभालते  हैं, पर दूसरों की माँ को संभालने वाले बहुत कम हैं। तुमने मेरा बहुत बड़ा बोझ उतार दिया श्याम।"
एक दर्द भरी मुस्कान के साथ वह बोला- "अब तो अपनी माँ को संभालने वाले भी कम हो रहे हैं दोस्त!"

खमियाजा / पवित्रा अग्रवाल
अरे यार बंसल, बहुत दिनों बाद मिले होकैसे होबच्चे कहाँ हैं?”
पवित्रा अग्रवाल
एक बेटा कनाडा में है और एक अमेरिका में।”
तो क्या तुम और भाभी यहाँ अकेले हो?”
हाँ गुप्ता, अब तो अकेले ही हैं और लगता है मरते दम तक अकेले ही रहेंगे।”
अरे ऐसा क्यों सोचते हो…चल सामने के रेस्त्रां में बैठ कर चाय पीते है।”
रेस्टोरेंट में चाय का इंतजार करते गुप्ता को  बंसल से हुए एक पुराने  वार्तालाप की याद आ गई।  उसने कहा था –‘अरे गुप्ता  तू तो पूरा कंजूस हैइतना पैसा होते हुए भी बच्चों का कैरियर बनाने में पीछे रह गया। मेरे पास तो इतने साधन भी नहीं थे, फिर भी पेट काट कर दोनों लड़कों को इंजीनियर बनाया है। दोनों को बड़ा अच्छा पैकेज मिला है। अब चैन से हूँ। बस दोनों की शादी और हो जायेअच्छी संस्कारी बहुएँ आ जायें तो जिंदगी आराम से कटे।’
            उसने कहा था ‘अरे यार, बेटे तभी तक अपने हैं जब तक शादी  नहीं होती।
चाय आने के साथ ही उसका ध्यान भंग हुआ। बंसल ने पूछा, “तुम्हारे बच्चे कैसे हैंकहाँ हैं?”
        “यहीं हैं हमारे साथ। मैंने तो  ग्रेजुएशन करा के बाईस की उम्र में दोनों की  शादी  कर दी थी । घर के व्यापार में लगे  हैं तो  भाग कर भी कहाँ जायेंगे?...लोग  मुझे हमेशा कंजूस कहते रहे क्योंकि  मैंने बच्चों को डाक्टरइंजिनियर नहीं बनाया। पर अब लगता है कि अच्छा ही किया…ज्यादा पढ़ाता तो कैरियर की तलाश में हमें छोड़ कर कहीं  दूर जा बैठते। फिर इतने बड़े व्यापार का मैं क्या करता?...अब दुःख तकलीफ में हम एक दूसरे के साथ  तो हैं।
       “शायद तुम ठीक ही कह रहे हो। मुझे भी अब  यही  लगता है... बच्चो को ऊँची शिक्षा दिलाने का खमियाजा  तो भुगतना ही पड़ेगा।
                                   
 बेबसी / लता अग्रवाल
लता अग्रवाल
आ ! ले ! ले !” रात के समय तीन आवारा अय्याश सड़क पर बैठी उस पगली को खाने का पैकेट दिखा कर अपनी ओर बुला रहे थे।
खाने के पैकेट के प्रति पगली की लालसा देखकर लगता था उसने काफी समय से कुछ नहीं खाया था। वह उनके पीछे- पीछे उस अँधेरे की और चल दी।
अपनी भूख शांत करने के लिए वह ओरों की भूख का शिकार हो गई।


अंडेवाला /  शोभा रस्तोगी
शोभा रस्तोगी
नुक्कड़ पर रेहड़ी लगाके दुबला और गँवार-सा आदमी अंडे बेचता है। एक के ऊपर एक कई एग-ट्रे रखी हैं | साथ ही गर्म तवा भीजिस पर आमलेट बनता है। कुछ छुटपुट सामान भी। मैं अंडे लेने उसकी रेहड़ी पर पहुँची ही हूँ। चार अंडों का ऑर्डर दिया है। यकायक मेरी तीन साला बेटी मेरा हाथ छुड़ाकर तिरछी-सी झुक गई है। मैं हैरान! तभी देखती हूँ कि अंडेवाले के सिकुड़े से मुंह पर अर्थपूर्ण  मुस्कान फ़िसल आई है जो मुझे बिल्कुल नागवार गुजरी। मैं परेशान और ये… मुस्कान ?  मैं उसे बिना कुछ बोले थोड़ा-सा झुकती हूँ । अब आश्चर्यमिश्रित मुस्कान की बारी मेरी है | रेहड़ी के दोनों पहियों पर लम्बवत्लकडी का एकफट्टा बिछा है। उसपर एक तरफ़ डलिया है जो शायद डस्टबिन का काम कर रही है। बाकी कुछेक रद्दी पेपर। उसी सब के बीच दो-चार किताबें हैं जिन्हें हाथ में पेंसिल लिये गहरी सांवली रंगत पर सपनों की झिलमिलाती चमक  सजाए पाँच-छह वर्षीय एक बच्चा पढ़ रहा है। उसकी मोटी आँखों में दूर तक उजाला साफ़ दिखता है। मेरी बेटी को देख उस उजाले का एक टुकड़ा उसके गालों तक उतर आया है। मैं सीधी खड़ी होती हुई  अपना दायाँ हाथ उठा देती हूँ  अंडेवाले के सम्मान में।

वह जो नहीं कहा / स्नेह गोस्वामी
सुबह 6 बजे
सुनो जानू! आज तुम टूर पर हो तो लग रहा है आज यह घर पूरा का पूरा मेरा है। लग रहा है मैं आज सच्चे अर्थो में घरवाली हूँवर्ना तो शाम के समय पूरे घर में तुम्हारी ही आवाजें सुनाई देती हैं
स्नेह गोस्वामी
सुनती हो चाय बनाओजल्दी से  खाना लाओचादर नहीं झाडी अब तक भई! तुम तो सारा दिन सोयी रहती हो और अब आधी रात तक बर्तन बजाती रहोगी। अब दूध क्या एक बजे रात दोगी।’ पूरा दिन यही सब सुनते बीतता है। पर आज कितनी शान्ति है। आज मैंने शादी के बाद पहली बार अदरक डली चाय बनाई है। अब आराम से अपना मनपसन्द कोई नॉवल पढ़ना चाहती हूँ। तुम तो अपनी मीटिंग की फाइलों में उलझे होवोगेफिर भी बाय!
सुबह 10 बजे
सुनो जानूमीटिंग शुरू हो गई क्यापक्का हो गई होगी। मैंने भी मन्नू भंडारी का ‘आपका बंटी’ खत्म कर लिया। बेचारा बंटी! पर बंटी को बेचारा होने से बचाने के चक्कर में कितनी शकुन हर रोज़ बेचारी होती है। तुम मर्द कैसे समझोगे। खैर जाने दो। मैंने आज अपने लिए सैंडविच और पोहा बनायाचटखारे ले कर खाया। रोज-रोज आलू के परांठे खा के उब गयी थी। तुम तो कभी ऊबते ही नहीं परोंठों से। मन में संतुष्टि हो रही है। अब कुछ देर टी.वी. पर कोई सीरियल देखूंगी। जब तुम घर होते हो तब तो टी. वी. पर या तो न्यूज चलती हैं या फिर कोई मैचवह भी तब तक जब तक तुम्हारा मन करे वरना टी.वी. बंद। अरे कोई अच्छा सा सीरियल शुरू हो गया हैइसलिए बाय!
दोपहर 3 बजे
जानूआज मैंने कई दिनों बाद फिल्म देखी। लगा थाजिन्दगी मशीन हो गई है। पर नहीं दिल अभी धड़क रहा है। पुराणी फिल्म थी साहिब बीबी और गुलाम। मीना कुमारी छोटी बहू बनी हैगरीब घर की बेटी और बड़े जमींदार की पत्नी। पति को नाचने वाली से और शराब से फुर्सत नहीं। बीवी बेचारी सारी  जिन्दगी उसे खुश करने के चक्कर में पागल हुई रहती है। सुनो! ये हसबैंड लोगों को बाहर वालियां क्यों अच्छी लगती हैंबेशक कोई बाहर वाली घास भी न डालेपर ये लट्टू हुए आगे-पीछे घूमते रहेंगे। घरवाली को सिर्फ कामवाली बाई बनाए रर्क्खेगें। अरेआज सफाई तो की ही नहीं। चलोअब थोड़ी सफाई कर ली जायफिर खाना सोचूंगी। बाय!
शाम 7 बजे
जानू,  शाम को सफाई में ही तीन घंटे लग गए। आज मैंने घर रगड़-रगड़ कर साफ़ किया। एक-एक खिड़की दरवाजारोशनदान झाड़ कर चमकाये। इस घर पर सच में बहुत प्यार आया। फिर सारी चादरें बदलींसोफा-कवर बदले। पूरा घर अलग ही लुक दे रहा है। कपड़े धोने के लिए मशीन में डाले। फिर अपने लिए रोटी बनाई। सब्जी तो वही पड़ी थी जो रात तुम्हारे लिए बनाई थीउसी के साथ खा ली। अब कुछ देर गाने सुने जाएँ,  ठीक! बाय !
रात 11 बजे
सुनो जानूशाम को खाना तो बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ीं। खाया ही आठ बजे थापर कोफ़ी का एक कप बनाया। एक तुम्हारा भी बन गया था सो दोनों कप मुझे ही पीने पड़े। फिर सास-बहू के सीरियल देखे। बहुत दिनों से देखे नहीं थेंपर लगा नहीं कि एक साल बाद देखे। वही कहानीवही करेक्टरवही उनके षड्यन्त्र। फिर भी अच्छा समय बीत गया। अब सोने जा रही हूँ। अच्छा अब गुड नाईट!
रात दो बजे
सुनो जानू,  तुम तो सो चुके होवोगेपर मुझे नींद नहीं आ रही। तुम्हारे चीखने-चिल्लाने की आवाजें  सुबह से अब तक नहीं सुनी। शायद इसलिए या इस समय पूरे कमरे में गूँजते खर्राटो के बिना सोने की आदत नहीं रही इसलिए। कारण जो भी हो पर नींद तो सचमुच ही नहीं आ रही। इतना अच्छा दिन बीता फिर तो निश्चिंत हो कर सोना चाहिये था न,  फिर भी नहीं सोई। तुम से पूरी तरह से न जुड़ पाने के बावजूद तुम्हारे बिना नींद नहीं आ रही। पर तुम यह सब कैसे जानोगे। तुम खुद कभी ये समझोगे नहीं और मैं तो शायद कभी कह ही नहीं पाऊँगी। क्योंकि जब तुम घर में रहोगे तो यह घर तुम्हारा ही होगा.  तुम ही बोलोगेतुम ही हुक्म दोगे। मैं तो सिर्फ– ‘जीआई जीजी लाई जी,’ ही कह पाती हूँ। पर फिर भी तुम्हें मिस कर रही हूँ। अपनी मीटिंग जल्दी से खत्म करो और आ जाओ। मुझे नींद नहीं आ रही है। 

पढ़ी गयी सभी लघुकथाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी डॉ॰ अशोक भाटिया तथा डॉ॰ बलराम अग्रवाल द्वारा की गयी। उन्हें इन लिंक्स पर देख-सुन सकते हैं :                                                https://www.youtube.com/watch?v=mUv_WAdGIZs&app=desktop                                                      https://www.youtube.com/watch?v=Lb6k0h8Nc9s