Tuesday, 26 December, 2017

डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक की याद-2 / श्याम बिहारी श्यामल

[डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक हमारे समय के महत्वपूर्ण समालोचक रहे हैं। हिन्दी लघुकथा पर उनकी दृष्टि अन्य आलोचकों की तुलना में कहीं अधिक सधी और सटीक रही है। नवें दशक में उन्होंने कुछ विचारोत्तेजक लेख लघुकथा साहित्य को प्रदान किए थे जो हमेशा ही उपयोगी रहेंगे। दिनांक 7-12-2017 की सुबह लगभग 79 साल 10 माह की उम्र में उनके निधन से हुई क्षति अपूरणीय है। हमारे विशेष अनुरोध पर उनके समग्र व्यक्तित्व को याद करते इस संस्मरण को उपलब्ध कराया है वरिष्ठ पत्रकार और कथाकार भाई श्याम बिहारी श्यामल ने। इस लेख की पहली किस्त 17 दिसम्बर, 2017 को प्रस्तुत की गयी थी। आज प्रस्तुत है इसकी दूसरी यानी समापन किस्तबलराम अग्रवाल]                 
   दिनांक 17-12-2017 को प्रकाशित पोस्ट से आगे………    
हिन्दी साहित्य के मौजूदा मानचित्र या परिदृश्य से परिचित किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए जिसे सत्तर से नब्बे के दशकों के दौरान या उसके बाद भी पलामू के सांस्कृतिक जीवन-जगत में डा. व्रजकिशोर पाठक की वाग्मिता के ऐश्वर्य और रचनाशीलता के वैभव से अवगत होने का अवसर मिला हो, आज बड़े स्तर पर उनकी कहीं कोई उपस्थिति का न दिखना केवल और केवल दुखद आश्चर्य ही पैदा कर सकता है। एक ऐसा ज्ञाता जिसकी जिह्वा पर ही संस्कृत के वाल्मीकि-कालिदास ही नहीं अंग्रेजी के वडर्सवर्थ-शेक्शपीयर से लेकर हिन्दी के तुलसीदास-भारतेंदु  व प्रेमचंद-प्रसाद, मुक्तिबोध-अज्ञेय तक बसते हों ! 
श्याम बिहारी श्यामल
कॉलेज में जिस शख्स को सुनने के लिए कक्षा में साहित्येत्तर विषयों के भिन्न कक्षायी छात्र से लेकर फिजिक्स-केमेस्ट्री के प्राध्यापक तक पिछले दरवाजों से धड़धड़ाकर भर जाया करते हों और जिसके मुंह से फूटने का अवसर पाते ही शब्द दृश्यांतरित होकर अतिरिक्त अभिव्यक्ति-क्षमता के नए बल से संस्कारित हो जाते हों, ऐसे व्यक्तित्व की हमारे शब्द संसार की परिधि में एकबारगी संपूर्ण अदृश्यता आखिर क्या संकेत कर रही है ? यह स्वयं उनकी कार्य-भूमिका में किसी व्यवहारगत कमी या बेपरवाही का हश्र है अथवा हमारे साहित्य समाज की किन्हीं घनघोर बाड़ेबंदियों का दहला देने वाला सबूत?

(स्व॰) डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक

व्रजकिशोर पाठक ने लघुकथा आंदोलन के दूसरे उत्थान-काल में अस्सी के दशक के दौरान इस नव्यतर विधा की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। नौवें दशक के प्रारंभिक वर्षों में डालटनगंज से प्रकाशित कृष्णानंद कृष्ण संपादित पत्रिका 'पुन:' के बहुचर्चित लघुकथांक में सम्मिलित उनका आलेख 'हिन्दी लघुकथा का शरीर-विज्ञान और उसकी प्रसव-गाथा' न केवल उल्लेखनीय बल्कि इस विधा का ऐसा महत्वपूर्ण आधार-विश्लेषण है जिसे पढ़े बगैर कोई समीक्षक लघुकथा पर आगे बात कर ही नहीं सकता। उनकी समालोचना-शैली हिन्दी में एक ऐसे नए प्रकार का विश्लेषण रूप प्रस्तुत करती है जिसमें समीक्षकीय माप-तौल की शुष्क तराजू-बटखरी खटर-पटर के मुकाबले सृजनात्मक मनन-मंथन का मधुर मथानी-संगीत अधिक मुखर है।
वह भी एक दौर रहा जब पलामू में कोई भी रचनाकार अपनी कोई किताब छपाने को आगे बढ़ता तो सबसे पहले भूमिका लिखाने उन्हीं के पास पहुंचता। बेशक इस निमित्त दो नाम और भी सबके सामने उपलब्ध होते डा. जगदीश्वर प्रसाद और डा. चंद्रेश्वर कर्ण, लेकिन प्राय: रचनाकारों की पहली पसंद व्रजकिशोर पाठक ही होते। इसकी जो वजह अब समझ में आ रही वह है शेष दोनों आचार्यों की प्रचलित छवियां जो नए लोगों को असहज बना देती थीं। दोनों प्रथमत: से लेकर अंतत: तक आचार्य ही गोचर होते रहते। डा. जगदीश्वर प्रसाद सहज तो रहे लेकिन उनके बारे में बौद्धिक जनमानस में एक यह धारणा बहुत गहरे पैठी रही कि वह अत्यधिक बहुपठित और उद्भट विद्वान हैं। लोग उन्हें बोपदेव कहा करते। इस कारण लोग स्वयं ही आत्मसंशय का शिकार हुए रहते कि ऐसा घनघोर आचार्य भला स्थानीय स्तर के किसी नए रचनाकार को क्या तरजीह देगा !
दूसरे डा. चंदेश्वर कर्ण का तो व्यक्तित्व भी सख्त रहा। वह बहुत अधुनातन शब्दावली में लिखते और बोलने में भी एक-एक शब्द बहुत माप-जोखकर खर्च करते। अपने समकक्षीय रचनाकारों के बीच वह कभी-कभी हंसते-ठठाते भी दिख जाते लेकिन कनीय रचनाकारों के बीच उनकी संजीदगी देखते बनती। हां-हूं से शायद ही कभी आगे बढ़ते।
रचना-मूल्यांकन की उनकी मानक कसौटी ऐसी आला दर्जे की रही कि स्थानीय नयों को इससे खासा दहशत महसूस होती। अस्सी के दशक के शुरुआती दिनों में ही पलामू के सुकंठ गीतकार हरिवंश प्रभात की कविताओं की किताब 'बढ़ते चरण' रामेश्वरम के असु प्रेस से छपकर आई थी। जाहिरन यह पलामू के एक नए रचनाकार की रचनाओं का संग्रह था, किसी गिरिजा कुमार माथुर या श्रीकांत वर्मा की किताब नहीं लेकिन डा. कर्ण ने इसकी बहुत कठोर समीक्षा की। उन्होंने 'बढ़ते चरण को रोको' शीर्षक से इसकी 'पलामू दर्पण' में ऐसी खबर ली कि हरिवंश प्रभात ही नहीं, दूसरे स्थानीय रचनाकार तक सहमकर रह गए थे।
दोनों के विपरीत व्रजकिशोर पाठक की आचार्य वाली छवि हमेशा गौण रही। वह हमेशा रचनात्मक आभा से भरे रहते। नए से नए रचनाकार से एकदम उसी के स्तर पर घुल-मिलकर एकाकार हो जाते। कवि आता तो उसके सामने उनका मधुर गीतकार मुखर हो उठता और गद्यकार पहुंचता तो उनका सजग कथाकार। भूमिका लिखाने पहुंचने वाले शायद ही किसी रचनाकार को उन्होंने कभी निराश लौटाया हो। साधारण से साधारण रचनाओं को भी वह खारिज नहीं करते। सौ की जगह पांच फीसद भी कुछ सप्राण तत्व होता तो वह क्षतिग्रस्त पंचान्बे को तो बेशक चिह्नित कर देते लेकिन सकारात्मक पांच की संभावनाओं को धुनकर रूई के फाहे की तरह लहराकर पेश करते।

Sunday, 17 December, 2017

डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक की याद-1 / श्याम बिहारी श्यामल

[डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक हमारे समय के महत्वपूर्ण समालोचक रहे हैं। हिन्दी लघुकथा पर उनकी दृष्टि अन्य आलोचकों की तुलना में कहीं अधिक सधी और सटीक रही है। नवें दशक में उन्होंने कुछ विचारोत्तेजक लेख लघुकथा साहित्य को प्रदान किए जो हमेशा ही उपयोगी रहेंगे। दिनांक 7-12-2017 की सुबह लगभग 79 साल 10 माह की उम्र में उनके निधन से हुई साहित्यिक क्षति अपूरणीय है। हमारे विशेष अनुरोध पर उनके समग्र व्यक्तित्व को याद करते इस संस्मरण को उपलब्ध कराया है वरिष्ठ पत्रकार और कथाकार भाई श्याम बिहारी श्यामल ने। आभार सहित प्रस्तुत है उसकी पहली किस्त--बलराम अग्रवाल]
  
(स्व॰) डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक
बिहार से अलग हुए झारखंड में गढ़वा और लातेहार के जिला बन जाने के बाद '' से पलाश, '' से लाह और '' से महुआ वाली पलामू की प्राकृतिक त्रि-उत्‍पादाधारित  पुरानी लो‍कप्रिय परिभाषा अब कितनी सार्थक रह गई है, यह अन्‍य लोगों के लिए चिंता-चिंतन या विश्‍लेषण-मनन की बात होगी, हमारे मन-मस्तिष्‍क में तो इस धरती की वह मूल पहचान आज भी कायम है जो प्राय: दो रूपों में अक्षुण्‍ण है। 
पहली तो वह कोयल नदी, जो प्रवाह रहने पर ऐसे कूकती हुई बहती है जैसे बिंधे मन व रुंधे कंठ से वन प्रांतर की कोई जल-पार्वती अपने अछोर जीवन-संघर्ष का अरुण-करुण महाकाव्‍य आलाप रही हो ! अद्भुत नदी, जो निर्जल हो जाने पर भी कभी निर्प्रवाह नहीं होती। सूख जाने पर कहीं स्‍वर्णाभ तो कहीं रजताभ विस्‍तार के रूप में गजब चमचमाने लगती है। कुछ यों जैसे उसकी कौंधें हवा पर प्रवाहित हो रहीं फेनिल राग-ध्‍वनियां हों। …और दूसरी पहचान, डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक; सतत अध्‍ययन-मनन व अपरिमित ज्ञान से रंजित जिनके बुलंद-बिंदास बोल सदा जैसे कानों के सामने ही लहराते रहते हों। जैसे गजब के अध्येता व रचनाकार वैसे ही अनोखे वक्‍ता-बोल्‍ता। जिनके मुख से जब आख्‍यान-व्‍याख्‍यान या भाषण-संभाषण फूटने लगें तो धरती से लेकर आकाश तक शब्‍द-संवेदना की जैसे उर्ध्‍व सलिला ही प्रवा‍हित होने लग जाएं। अफसोस की बात यह कि उन्‍हें वह बड़ा फलक न मिल सका जिसके वह हकदार रहे। यह हिन्‍दी साहित्‍य संसार का अपना दुर्भाग्‍य है कि वह अपनी ही एक प्रतिभा की ऐसी शख्सियत से पूरी तरह वाकिफ नहीं।
व्रजकिशोर पाठक को पहली बार देखने का संदर्भ स्‍मरण में सुस्‍पष्‍ट तो नहीं लेकिन उनकी प्रथम निकटता का आज भी कायम धड़कता अहसास यह बताने को काफी है कि मिलने के पहले से उन्‍हें काफी जान चुका था। वह निश्चित रूप से सन् उन्‍नीस सौ अस्‍सी या उससे एकाध साल पीछे का ही साल रहा होगा। आज के मेदिनीनगर और तब के डाल्‍टनगंज का वही कूकती कोयल नदी वाला तट और वहीं स्थित अपने गिरिवर हाई स्‍कूल का नाति हरित प्रांगण। वह वस्‍तुत: स्‍कूल के वार्षिकोत्‍सव जैसा ही कोई आयोजन रहा। 
श्याम बिहारी श्यामल
स्‍वप्‍नलोक की आभा महसूस होने और उस घोर पिछड़े इलाके में तब प्राय: घनघोर दुर्लभ रही बिजली के बल्‍ब-झालरों से सजा, ऊंचे पेड़ों के साए में बना मंच। ऊपर विराजमान लोगों के बीच उनके निकट होने, उनकी उठी निगाहों को आसपास महसूसते हुए काँपते पाँवों से माइक स्‍टैंड तक पहुँचने, अधपके किशोर स्‍वर में कुछ तुतले किंतु स्‍वरचित काव्‍यांश बाँचने और लौटते हुए अपने नत मस्‍तक पर उनके कुछ आशीर्वचनी शब्‍द बरसने का स्‍मरण आज भी है। वही मुख्‍य अतिथि रहे। उन्‍होंने अपनी मूल विशिष्‍टता के अनुरुप ही खूब मुखर व्‍याख्‍यान दिया था। 
शब्‍द या कथ्‍य-संदर्भ आदि तो अब ध्‍यान में नहीं, लेकिन यह पक्‍का स्‍मरण है कि उनके ठनकते बोलों ने जैसे वहाँ के मौजूद एक-एक चेतन-अचेतन या व्‍यक्ति-अव्‍यक्ति को संपूर्ण सचेतन-ससंज्ञ्य बना दिया था। कुछ यों जैसे सृष्टिकार के हाथ भी जिन हवा-झोंके, पेड़-पत्‍ते, ईंट-दीवारें व धूल-ढेलों को पंच-ज्ञानेंद्रिय-सज्जित न कर सके थे, उन्‍हें वाणी के एक जादूगर ने शब्‍दमय-ध्‍वनिमय और संवेदनापूरित कर जैसे संपूर्ण भावमग्‍न कर डाला हो। 
साढ़े तीन दशक के अंतराल के बाद आज आकलन करते हुए यह महसूस कर रहा हूँ कि बाद में बढ़ी निकटता व कुल कोई दशक भर की प्रत्‍यक्ष संपर्क-अवधि के दौरान उनसे जब-जब जहाँ कहीं भी मिलना हुआ हर संदर्श में सबसे पहले वही गिरिवर-प्रांगण वाली कहकहाती छवि सर्वप्रथम खिंचती और हर संसर्ग-संदर्भ को हमेशा-हमेशा सींचती रही। 
जीएलए कॉलेज के दिनों में स्‍वाभाविक रूप से डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक और तत्‍कालीन हिन्‍दी विभागाध्‍यक्ष डॉ॰ जगदीश्‍वर प्रसाद से लेकर डॉ॰ चंद्रेश्‍वर कर्ण तक से कक्षाओं में सामना होता रहा लेकिन तीनों से बतौर रचनाकार सहज संपर्क बाद में विकसित हो सका। दूसरे की तुलना में शेष दो से अधिक और प्रथम अर्थात् व्रजकिशोर पाठक से तो सर्वाधिक। एक दौर ऐसा भी आया जब जिले में पटना या रांची के अखबारों के संवाददाता वाला कार्य करने के दौरान घोर समयाभाव के बावजूद उनसे प्रतिदिन मिलने का क्रम चलता रहा। 
दिन भर की लाख भाग-दौड़ के बावजूद डालटनगंज के बाजार-क्षेत्र में अखबारी साथियों के बीच से शाम होते अचानक गायब हो जाना और वहीं से पाँव-पैदल छहमुहान-बस स्‍टैंड-कचहरी होते चर्च के सामने से गुजर रेललाइन पार करके रेड़मा और अंतत: ढाई-तीन किलोमीटर की दूरी के बाद चरकी भट्ठा के पास उनके घर। अक्‍सर उनके घर के बाहर छोटे-से कैंपस के भीतर ही बैठकी जमती। कभी-कभी मेरे साथ हृदयानंद मिश्र या रामाशीष पांडेय जैसे तब के युवा नेताओं में से भी कोई न कोई खिंचा पहुँच जाता। 
साहित्‍य या समाज के अप्रचलित विषय-संदर्भों पर लंबी खिंचती चर्चा साथ गए व्‍यक्ति को कभी-कभी बहुत भारी भी पड़ने लगती लेकिन डाक्‍टर साहब की रोचक शैली एकबारगी उसे भाग खड़े होने से भी बचाए चलती। नीचे इधर-उधर अनियोजित घास। अंधेरे में इससे उत्‍साह के साथ निकलते और टूटते मच्‍छरों से भरसक बचने के लिए काठ की चौड़ी कुर्सी पर दोनों पाँव ऊपर ही समेटकर बैठना-बतियाना होता। 
कुछ तो खबरिया पेशे का आवारा सूखापन और कुछ हमारी आदतन गाफिली ऐसी कि हम पर अक्‍सर फांकाकशी धूल-गर्द की तरह उड़ती-झझराती रहती। इसका अहसास श्रीमती पाठक को शायद अच्‍छी तरह था। डाक्‍टर साहब तो जिस विषय पर शुरू हो जाते उसे भारतीय फलक से उठाकर देखते ही देखते विश्‍व साहित्‍य के आकाश तक उड़ा ले जाते। ऐसे समय उनके अध्‍ययन-विश्‍लेषण बल का विस्‍मयकारी अहसास होता। हम आदिकवि वाल्‍मीकि की करुणा से महाकवि गोस्‍वामी तुलसीदास, कालिदास, केशव, भारतेंदु, प्रेमचंद, प्रसाद, निराला, मुक्तिबोध,अज्ञेय और उधर टीएस इलियट, वर्ड्सवर्थ से लेकर एजरा पाउंड व शेक्‍सपीयर या टाल्‍सटाय तक जैसे रचनाकारों के रचना-कौशल या सृजन-संदर्भों के किसी न किसी आयाम से प्राय: प्रतिदिन अवगत-चमत्‍कृत होते चलते। 

डॉ॰ पाठक अक्‍सर अपने गुरुदेव डॉ॰ रामखेलावन पांडेय की किसी न किसी रूप में चर्चा लगभग रोज करते। कभी उनके 'हिंदी साहित्‍य के नया इतिहास' को लेकर, रामचंद्र शुक्‍ल से लेकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तक के साथ उनकी इतिहास-दृष्टि के भेद का संदर्भ तो कभी हिन्‍दी के विभिन्‍न बड़े समकक्षीय रचनाकारों के साथ उनके मतभेद-विवाद के संदर्भ। गजब दक्षता के साथ वह बात को बात से जोड़ते चले जाते। उनसे कुछ ही घंटों का बतियाना दर्जनों ग्रंथों के बहुविध संदर्भ से जोड़ देता। उनके लंबे अध्‍ययन-मंथन का दुर्लभ अर्क सहज ही जिह्वा तक आ पहुँचने का तृप्ति-सुख।
हाथ आए विषय को वह लगातार ईख की तरह ऐसा पेरते चले जाते और घंटों अथक मथते-फेंटते रह जाते कि पूरा वातावरण मीठी तरलता से छलछलाता रह जाता लेकिन गले के नीचे तृप्ति तभी उतरती जब भाप छोड़ते भरे हुए प्‍लेट हाथ आते। आलू के पतले-लंबे पीले तताए टुकड़े, चूड़े के ललाए कुरकुरे दाने और हरी मिर्च के साथ उसके गल जाने तक खूब भुने प्‍याज के करियाये लरजे सोंधाई छोड़ते क्षीण हिस्‍से। इन सबसे उठता सोंधाई से भरा आह्लाद जगाता स्‍वाद। मात्रा कभी कामचलाऊ नहीं, हमेशा भरपूर। इसके साथ ही लगे हाथ स्‍टील के परिपक्‍व गिलास में पौन ऊंचाई तक ऊपर पहुँची-झाँकती गाढ़े दूध की ललौहीं चाय। उनकी चर्चा को मुक्तिबोध के 'अंधेरे में' से निकलकर चूड़े की सोंधाई व चाय की सांद्रता के शास्‍त्र में प्रविष्‍ट होने में पल भर की भी देर नहीं लगती। गजब यह कि हल्‍के से हल्‍के लगने वाले विषय के संदर्भ को संतृप्‍त करने के लिए वह कभी 'गोदान' से दृष्‍टांत खींच लाते तो कभी 'नदी के द्वीप' या 'शेखर एक जीवनी से'
सबसे खास होता निशा काल में बैठकी की समाप्ति का रूप। साथ में किसी और के आए होने पर तो नहीं लेकिन जिस दिन मैं उनके यहाँ अकेला पहुँचा रहता उस दिन गजब हो जाता। लाख मना करने और श्रीमती पाठक के टोकने के बावजूद डाक्‍टर साहब कमीज डालकर मुझे विदा करने साथ निकल लेते। शाम से ही शुरू चर्चा अविराम अपने नए-नए अध्‍याय बदलती रहती। उनका बाेलना, बोलते चला जाना और मेरा पूछना व सवाल उठाते रहना अबाध। इसी के समानांतर चरकी भट्ठा से निकलकर हमदोनों का कभी छोटे तो कभी बड़े डगों के साथ रेलवे क्रॉसिंग की ओर बढ़ना भी जारी। डेढ़-दो किलोमीटर चलकर जब हम रेल लाइन को लांघ आरा मिल के पास पहुँचते तो डॉक्‍टर साहब मुझे विदा कहकर लौटने लगते। 
इसके बाद मैं उन्‍हें विदा करने को कहकर उनके साथ हो लेता। चर्चा चलती रहती और मैं एक किलोमीटर चलकर उन्‍हें रेड़मा चौराहे पर छोड़कर लौट पड़ता। तब तक जारी चर्चा के खत्‍म न होने का हवाला देकर डॉक्‍टर साहब फिर मुझे रेल लाइन तक छोड़ने लौट चलते। इसके बाद भी अक्‍सर फिर मैं पीछे मुड़कर उनके साथ। कहाँ कुर्सी से उठते हुए बैठकी की समाप्ति की घोषणा का समय रात के दस या ग्‍यारह बजे का और कहाँ परस्‍पर एक-दूसरे को छोड़ने के पथ-परिक्रमा के क्रम में घड़ी की सुइयाँ डेढ़-दो को छूती हुई भोर की ओर इशारा करने लग जातीं। बड़ी मुश्किल से बिलगाव होता। दूसरे दिन की बैठकी की शुरुआत में ही बीती रात का विलंब न दोहराने का संकल्‍प लिया जाता लेकिन यह शायद ही कभी एक बार भी पूरा हो सका हो। 
वह पढ़ाकू ऐसे कि साहित्‍य ही क्‍यों इतिहास-भूगोल, बाग-बगवानी, प्रदूषण-पर्यावरण से लेकर साइंस-अर्थशास्‍त्र आदि तक किसी विषय-संदर्भ की कोई पोथी शाम को पकड़ा आइए और दूसरे दिन सुन लीजिए पृष्‍ठांक संदर्भ के साथ उसकी संपूर्ण सप्रसंग व्‍याख्‍या। सुनने वाला अरुचिकर-अनपेक्षित विषय होने के नाते कभी शुरू में भले कुछ कसमस करता हुआ भी लग जाए लेकिन कुछ ही देर में उस पर उनकी सरस वाणी के जादू का चल जाना व रस-रंग में डूबकर उसका डोलता दिखना भी तय। कविता और उपन्‍यास से लेकर आलोचना तक में उनकी दुर्लभ लेखन-प्रतिभा की एक से एक बानगी। 
इमर्जेंसी के दौर की उनकी कविता 'लंगड़े कुत्‍ते का भाषण' गजब की रचना है जिसमें विकलांग कर दी गई चेतना का प्रतीक बनकर पेश लंगड़ा कुत्‍ता देश की तत्‍कालीन परिस्थितियों को रेखांकित करता हुआ कहता है कि देश में सारे पुल्लिंग शब्‍द स्‍त्रीलिंग हो गए हैं! पी.एच.डी. के लिए साठ के दशक में तैयार उनका शोधग्रंथ 'भारतेंदु की गद्य-भाषा' न केवल आज पेश हो रहे ज्‍यादातर डी.लिट. प्रबंधों पर भारी है बल्कि हिन्‍दी भाषा-साहित्‍य के जनक बाबू हरिश्‍चंद्र के मूल्‍यवान लेखन पर प्रारंभिक गंभीर व्‍याख्‍या-कार्य के रूप में अत्‍यंत वरेण्‍य योगदान भी। 
उन्‍होंने बिहार राष्‍ट्रभाषा परिषद की शोध-पत्रिका में अनेक ऐसे रचनाकारों पर गंभीर पड़ताली आलोचना लिखी है जिन्‍हें अचर्चा की धूल ने युगों-युगों से ढंक रखा था। इस क्रम में बाबू भोलाराम गहमरी पर लिखा विशिष्‍ट शोध आलेख और कवि बोधिदास के भूले-बिसरे काव्‍यग्रंथ 'झूलना' पर किया गया उनका पड़ताली कार्य तो तत्‍काल स्‍मरण में कौंध रहा है। 'हिन्‍दी साहित्‍य के अचर्चित पृष्‍ठ' स्‍तंभ-नाम के साथ छपे उनके ऐसे सारे लेखों को तत्‍काल संकलित किए जाने की आवश्‍यकता है लेकिन यह सब कुछ खोजना और समुचित क्रम-संदर्भादि का निरुपण करते हुए प्रसंगों को खोलते-जोड़ते हुए इंट्रो नोट या पाद टिप्‍पणियों के साथ प्रभावशाली ग्रंथ-प्रस्‍तुति संभव बनाना साहित्‍य के ही किसी श्रमशील अनुरागी के योगदान से संभव है। 
उन्‍होंने मगही में भी काफी कुछ लिखा है। उनका उपन्‍यास 'गांजा बाबा' तब  काफी चर्चे में रहा। यह अपनी भाषा और कहन की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण कृति है किंतु हिन्‍दी की मूल रचना न होने के कारण स्‍वाभाविक रूप से बड़े फलक के अपेक्षित विमर्श या स्‍वीकृति-लाभ से वंचित। उसी तरह मगही में ही उनकी 'मेयादी बोखार' रचना का भी मुझे स्‍मरण है जिसका जब वह स्‍वयं वाचन करते तो एक-एक शब्‍द जैसे अग्नि-कणों की तरह दृश्‍यांश बिच्‍छुरित करते चले जाते। 1988 में मेरे पलामू छूटने के बाद भी डाक्‍टर साहब ने काफी कुछ काम किया है। इसी क्रम में पलामू के अमर शहीदों पर लिखी उनकी कृति 'नीलांबर पीतांबर' खास है। आवश्‍यकता इस बात की है कि उनके समूचे लेखन-कार्य को गंभीरतापूर्वक अनुक्रमित और संपादित कर समग्र रचनावली-रूप में प्रकाशित कराया जाए।
                                                                              समापन किस्त आगामी अंक में………    

Tuesday, 14 November, 2017

पंजाबी कथाकार गुरदीप सिंह पुरी की लघुकथाएँ

सारे जहां से अच्छा
इस बार पंचकुला में आयोजित 26 वें अन्तरराज्यीय लघुकथा सम्मेलन में डॉ॰ श्याम सुन्दर दीप्ति की ओर से जो सामग्री बाँटी गयी उनमें गुरदीप सिंह पुरी के पंजाबी लघुकथा संग्रह ‘सारे जहां से अच्छा’ (1998) का हिन्दी रूपान्तर भी शामिल था। इसका रूपान्तर किया है श्री के॰ एल॰ गर्ग ने और भूमिका प्रि॰ दलीप सिंह भूपाल व डॉ॰ श्याम सुन्दर दीप्ति ने लिखी है। यहाँ पेश हैं उस संग्रह से तीन लघुकथाएँ :

पहली बार रोये
एक मुहल्ले के लोगों को अपने मुहल्ले में गुरुद्वारा बनाने का चाव चढ़ा।
उन्होंने घर-घर जाकर धन इकट्ठा किया और एक निहायत खूबसूरत गुरुद्वारे का निर्माण कर लिया। नाम रखा—श्री कलगीधर गुरुद्वारा।
पहला साल अच्छा व्यतीत हुआ।
अगले वर्ष गुरुद्वारा कमेटी चुनाव में मुहल्ले के दो धड़े बन गये।
अलग हुए धड़े ने अपना नया गुरुद्वारा खड़ा कर लिया। सोच-सोच कर नाम रखा—गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर जी।
अब हर कार्यक्रम के वक्त इस गुरुद्वारे की कमेटी गुरु-घर के बाहर खड़ी होकर ‘कलगीधर गुरुद्वारे’ जाने वाली संगत को रोककर रोष से कहती है :
 “तुम्हें शर्म आनी चाहिए। बाप का घर छोड़कर पुत्तर के दर पे जाते हो! घोर बेअदबी!”
पिता-पुत्र अपने सिक्खों पर पहली बार धाहें मार-मार कर रोए।

बोझा
“यार, जब से यह नयी कमेटी आयी है न, ससुरों ने गुरु-घर में सुधार-लहर ही चला दी है!” गुरु-घर के ग्रंथी सिंह ने बड़े दु:खी स्वर में कहा।
“वह कैसे?” दूसरे गुरु-घर के ग्रंथी ने गुरु-भाई से हैरानी से पूछा।
“देखो न—नयी गुल्लक धर दी है! इसमें न चिमटी पड़ती है और न ही गोंद वाला डक्का। अब ये छोटी-छोटी हरकतों पे उतर आये हैं। रात के अखंड-पाठ की माया भी गुल्लक में डाल देते हैं।”
“हूवर (वेक्यूम मशीन) चला लिया कर न! ऐसे मन क्यों मैला करता है।”
सुनते ही पहले ग्रंथी के सिर से मनों बोझा उतर गया।

बूढ़ी भिखारन
“बेटा, सुबह का कुछ नहीं खाया। भगवान के नाम पर रोटी दे दे! भगवान तुझे लम्बी उम्र दे। तेरी कुल ऊँची हो। तेरा आँगन खुशियों से भर जाये।” बूढ़ी भिखारन ने दफ्तर के लॉन में बैठे बाबू को रोटी वाला डिब्बा खोलते देख मिन्नत-सी की।
बाबू ने डिब्बा खोला तो उसमें पहले की तरह तीन रोटियाँ ही थीं, जिनसे बाबू का ही पेट मुश्किल से भरता था।
उसने दो रोटियों पर थोड़ी-सी सब्जी रखकर बुढ़िया की तरफ बढ़ा दी।
बूढ़ी के थिरकते होठों से बस यही निकला :
“बेटा, रोटियाँ तो तीन ही हैं! आप खा लो। मेरा क्या है, मैं कहीं और से माँग लूँगी। कहीं आप भूखे रह गये तो… ”
बुढ़िया लाठी टेकते आगे सरक गयी। बाबू कितनी ही देर अपने आँसू ठेलने की कोशिश करता रहा।


गुरदीप सिंह पुरी  की अन्य कृतियाँ :
कहानी संग्रह
1 उदासे फुल बहारां दे (1981)
2 ख्वाहिश (1990)
3 इक रात दा कत्ल (1990)
मिन्नी कहानी संकलन का संपादन
गुआचे दिनां दी भाल (1992)
मुलाकातें
बिन तुसां असी सखने (1985)
काव्य संग्रह
सखने हथ (1994)
निवास  का पता : 73-मैडक्नि स्ट्रीट, 3-एल, व्हाइट इंच, ग्लासगो जी-149 आर॰ टी॰ (यू॰ के॰)

Friday, 10 November, 2017

डॉ॰ सतीश दुबे को याद करते हुए

न हन्यते हन्यमाने शरीरे

गत एक वर्ष मन लगातार उद्विग्न रहा है; और 25-26 अक्टूबर के बाद तो कोई दिन ऐसा नहीं बीता जब अन्दर ही अन्दर आँसू लगातार न झरे हों।
लघुकथा लेखन ने जो बृहद् परिवार दिया है, उसमें से किसी का भी चले जाना मस्तिष्क को हिला जाता है, ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु’ को जानते हुए भी।
डॉ सतीश दुबे
जीवन में कई बार ऐसा घटित होता जाता है कि मस्तिष्क जो कहता है, मन उसे स्वीकार नहीं करता, तर्क पर तर्क देता हुआ अपनी बात मनवाता रहता है। गत 25 दिसम्बर, 2016 से अब तक यह लगातार हुआ है। इनके सन्दर्भ में राम-नाम के सत्य को मन स्वीकार नहीं कर रहा है। 
उम्र में और लेखन में भी, बहुत वरिष्ठ होने के बावजूद उनका सम्बोधन ‘आप’ ही रहता था। कई सालों से प्रत्येक नवरात्र की नवमी तिथि को मैं उन्हें फोन किया करता था। एक बार नवमी के बजाय दशहरे की शाम को किया तो उधर से बोले—“हाँ, मैं कल आपके फोन का इन्तजार करता रहा। अब सोच ही रहा था कि आज तो आपका फोन जरूर आएगा।” लेकिन विडम्बना देखिए कि इस साल (मार्च-अप्रैल 2017 में पड़े) चैत्र नवरात्र की नवमी भी खाली गयी और सितम्बर 2017 में पड़े शारदीय नवरात्र की नवमी भी। ऐसा नहीं कि भूल गया था; याद रहा, इस बार तो हर बार से ज्यादा याद आया, लेकिन फोन की ओर हाथ बढ़ाने की, नम्बर डायल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
सुरेश शर्मा जी
रोना ऐसा भी होता है, सच कहूँ, पहली बार जाना। आँसू अब से पहले भी भीतर गिरते रहे हैं, लेकिन अब से पहले इतनी गहराई से महसूस नहीं किया था।
इन्होंने ही सुरेश शर्मा जी के चले जाने की सूचना फोन पर दी थी। संयोग से उस समय नासिक में था और त्र्यम्बकेश्वर दर्शन की ओर मेरा मुख था। शायद इसीलिए शर्मा जी के प्रति मन अनजानी श्रद्धा से भर गया था। त्र्यम्बकेश्वर महादेव के प्रांगण में बैठकर कुछ समय सुरेश शर्मा जी की ओर से जाप किया था। तब से, जब भी देव-दर्शन का संयोग बनता है, सुरेश शर्मा जी मेरी स्मृति में आ जाते हैं। जैसे मैं अपने पिताजी-चाचाजी की ओर से मंत्र जाप करता हूँ, सुरेश शर्मा जी की ओर से भी करता हूँ। उस कड़ी में अब ये भी आ जुड़े हैं। सोचा नहीं था कि इतनी जल्दी आ जुड़ेंगे।
गत 1 नवम्बर, 2016 को मेरे मोबाइल पर संदेश आया—‘जन्मदिन मुबारक हो।’ मैंने तुरन्त फोन किया—“प्रणाम भाईसाहब, अभी से?”
बोले, “हाँ।”
“लेकिन मुझसे पहले तो आपका जन्मदिन पड़ेगा?”
बोले, “बलराम भाई, पहले-बाद का मसला ही नहीं है। यह पूरा माह हमारा है। इसलिए पहले ही संदेश भेज दिया कि कहीं आप बाजी न मार लें।”
‘कोई दूसरा बाजी न मार ले’ की स्पर्द्धात्मक भावना का यह स्नेह-पक्ष था। उसके बाद तो 12 नवम्बर को भी बात हुई, 26 नवम्बर को भी और एक बार सम्भवत: दिसम्बर के पहले-दूसरे सप्ताह में भी। इतनी जल्दी-जल्दी वार्तालाप के बीच से संवादकर्ता का उठकर अनायास चले जाना कचोटता है। आखिर हुआ क्या? भरे-पूरे परिवार को, हँसती-खिलती महफिल को एकाएक भौंचक कर, बिना कुछ बताए क्यों चले गये?
लेकिन, यह शिकायत करें किससे? पूछें किससे?
इन सवालों के बावजूद हम निश्चिन्त हैं। क्यों? इसलिए कि हमारा विश्वास जैसे ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु’ में है, वैसे ही ‘ध्रुवं जन्म मृतस्य च’ में भी है; और ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ में तो अटूट है। ‘न हन्यते’ के रूप में उनका लेखन हमारे बीच मौजूद है, मौजूद रहेगा।
मन है कि उनके इस मौन को उनकी कुछ लघुकथाओं के माध्यम से तोड़ू; लेकिन इस समय नहीं। यह जिम्मेदारी उठाने की स्वस्थ मन:स्थिति में नहीं हूँ। यह समय उनकी स्मृति को नमन करने का है। 12 नवम्बर का इन्तजार मुझ पर बहुत भारी पड़ रहा है, इसलिए आज ही इस पोस्ट को डाल देने को विवश हूँ। मित्रगण क्षमा करें।                                                                –बलराम अग्रवाल   

Saturday, 4 November, 2017

पंचकुला-2017 : हिन्दी लघुकथाएँ… चौथी कड़ी

नजदीक की दूरी /  सतविन्द्र कुमार राणा                                                               
सतविन्द्र कुमार राणा
काम से घर लौटते हुए गली में ही गर्म तेल की महक महसूस हुई। घर में घुसते ही अपने ही घर के चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ी दिखी। अनुमान लगाना मुश्किल न था, किसी का जन्मदिन अथवा सालगिरह होगीतभी ऐसा होता है। अक्ल के घोड़े दौड़ाना शुरु ही किये थे कि पिताजी की आहट सुनाई दी।
"पापा जी सालगिरह मुबारक होआज आपकी और मम्मी जी की शादी  सालगिरह है न?" मंझली बहू धीरे-से बोली।
"आँ...हाँ..हाँग्यारह मई हैआज ही।याद करते हुए बोले।
"बहूइसको क्या ध्यान रहना थाकभी ये चोंचले किये ही नहीं।"
 माँ की शिकायत में तंज था।
दूसरी बहू ने छेड़ा, "पापा जी को नया फोन मिलेगा आज तो गिफ्ट में।"
पिता जी धीमे-से मुस्कुराए।
छः बेटों के किसान पिता। सब बच्चे अब बाप बन चुके थे। छः कमरे का मकानसंयुक्त परिवार का घर था।
चाय के साथ सब ने पकौड़े खाए। सबने उन्हें सालगिरह की बधाई दी। पिताजी को सस्ता-सा नया फोन मिलाजिसे वे आसानी से चला सकते थे।
चलने के लिए उठे तो माँ ने टोका, "कहाँ चल दिए अब?"
पिता जी झट से बोले, "वहीँ जो बरसों से मेरा ठिकाना हैतबेले के साथ वाला कोठड़ा।"
अब माँ चुप थी।
पिताजी आगे बोले, "तू सँभाल अपने पोते-पोतियों को और मैं सँभालूँ भैंसों को।"
दोनों के होठों पर मुस्कान और आँखों में  विवशता झलक रही थी।
पिता जी चले गए।
माँ बड़बड़ा रही थी ,"बड़े परिवार में बड़े पास रहते हैंपर एक साथ नहीं।"
                                  
 मौन शब्द  /  विभा रश्मि
विभा रश्मि
"सुनो ! दोनों में नोक-झोंक चल रही है। आज सुबह से बहू-बेटे में रूठना-मनाना जारी है।"
घबरा कर अधेड़ पत्नी अपने पति से बोली।
"सुनो! उनके बेडरूम से तेज़ आवाजें आ रही हैखूब झगड़ रहे है।"
"क्योंक्या हुआ?" पति का स्वर चिन्तित था।
"शिकायत चल रही हैदो साल हो गये शादी कोबहू ने न जाने कितनी बार हमारे बेटे से प्यार का इज़हार किया। पर हमारे बेटे ने ‘वे शब्द’ नहीं बोले पलट केजो आजकल बोलने का बहुत फ़ैशन हो गया है।"
"क्या नहीं बोलकौन-से शब्द?" पति का सवाल था।
"वोही···…।" पत्नी के नेत्रों में इस उम्र में भी रंगीन बल्बों की लड़ियाँ जल उठी थीं।
"अच्छा…अच्छा··· ।" पति समझ गया।
उसे लगा पत्नी कहीं वे 'खास शब्दबोल न पड़े। आगे बढ़ कर उसने अधेड़ पत्नी की मुलायम हथेली अपनी दोनों हथेलियों में कैद कर उसे चुप करा दिया और उसे असीम प्यार से तकता रहा।
                         
 दूसरे की माँ /  सीमा जैन
सीमा जैन
"अजब इंसान है तू! तुझमें थोड़ी-बहुत इंसानियत भी बची है या नही? …तुझे अपनी अपाहिज़बीमार माँ से मंदिर और पूजा की ज़्यादा चिंता है। माँ का ज़रा भी ख़्याल नही…?" मेरा दोस्त श्याम एक साँस में सब कुछ कह गया।
 मैंने थकी-सी आवाज़ में कहा,  "माँ की चिंता है तभी तो एक पुजारी का इंतज़ाम करने के लिए भटक रहा हूँ। जो मेरे पीछे त्यौहार के समय मंदिर को संभाल ले।” फिर अपने आँसू पीते हुए मैंने बात आगे बढ़ाई, “ ये मंदिर की नौकरी ही तो हमारी रोज़ी-रोटी है। ये चली गई तो मैं माँ के साथ सड़क पर आ जाऊँगा…मुझे अपने कैंसर के इलाज़ के लिए शहर जाना है।”
दोस्त को सोच में पड़ा देख उसने आगे कहा, “और ये सलाह माँ ने ही दी है दोस्त कि कोई मंदिर संभालने को मिल जाये तो तू शहर चला जा…एक बार नंबर चला गया तो फिर पता नही कब लगे?
“हाँ यार, ये समस्या तो है। तुम अकेले ही हो माँ की देखभाल करने वाले।” श्याम बोला।
 “…और यदि मैं भी न रहा तो..."
श्याम ने मुझे रोककर मेरा हाथ थाम लिया, "तुम चिंता न करो, मैं घर और मंदिर दोनों संभाल लूंगा…हमारे मंदिर को पिताजी देख लेंगें।"
मैंने खुश होते हुए कहा, "अपनी माँ को तो सभी संभालते  हैं, पर दूसरों की माँ को संभालने वाले बहुत कम हैं। तुमने मेरा बहुत बड़ा बोझ उतार दिया श्याम।"
एक दर्द भरी मुस्कान के साथ वह बोला- "अब तो अपनी माँ को संभालने वाले भी कम हो रहे हैं दोस्त!"

खमियाजा / पवित्रा अग्रवाल
अरे यार बंसल, बहुत दिनों बाद मिले होकैसे होबच्चे कहाँ हैं?”
पवित्रा अग्रवाल
एक बेटा कनाडा में है और एक अमेरिका में।”
तो क्या तुम और भाभी यहाँ अकेले हो?”
हाँ गुप्ता, अब तो अकेले ही हैं और लगता है मरते दम तक अकेले ही रहेंगे।”
अरे ऐसा क्यों सोचते हो…चल सामने के रेस्त्रां में बैठ कर चाय पीते है।”
रेस्टोरेंट में चाय का इंतजार करते गुप्ता को  बंसल से हुए एक पुराने  वार्तालाप की याद आ गई।  उसने कहा था –‘अरे गुप्ता  तू तो पूरा कंजूस हैइतना पैसा होते हुए भी बच्चों का कैरियर बनाने में पीछे रह गया। मेरे पास तो इतने साधन भी नहीं थे, फिर भी पेट काट कर दोनों लड़कों को इंजीनियर बनाया है। दोनों को बड़ा अच्छा पैकेज मिला है। अब चैन से हूँ। बस दोनों की शादी और हो जायेअच्छी संस्कारी बहुएँ आ जायें तो जिंदगी आराम से कटे।’
            उसने कहा था ‘अरे यार, बेटे तभी तक अपने हैं जब तक शादी  नहीं होती।
चाय आने के साथ ही उसका ध्यान भंग हुआ। बंसल ने पूछा, “तुम्हारे बच्चे कैसे हैंकहाँ हैं?”
        “यहीं हैं हमारे साथ। मैंने तो  ग्रेजुएशन करा के बाईस की उम्र में दोनों की  शादी  कर दी थी । घर के व्यापार में लगे  हैं तो  भाग कर भी कहाँ जायेंगे?...लोग  मुझे हमेशा कंजूस कहते रहे क्योंकि  मैंने बच्चों को डाक्टरइंजिनियर नहीं बनाया। पर अब लगता है कि अच्छा ही किया…ज्यादा पढ़ाता तो कैरियर की तलाश में हमें छोड़ कर कहीं  दूर जा बैठते। फिर इतने बड़े व्यापार का मैं क्या करता?...अब दुःख तकलीफ में हम एक दूसरे के साथ  तो हैं।
       “शायद तुम ठीक ही कह रहे हो। मुझे भी अब  यही  लगता है... बच्चो को ऊँची शिक्षा दिलाने का खमियाजा  तो भुगतना ही पड़ेगा।
                                   
 बेबसी / लता अग्रवाल
लता अग्रवाल
आ ! ले ! ले !” रात के समय तीन आवारा अय्याश सड़क पर बैठी उस पगली को खाने का पैकेट दिखा कर अपनी ओर बुला रहे थे।
खाने के पैकेट के प्रति पगली की लालसा देखकर लगता था उसने काफी समय से कुछ नहीं खाया था। वह उनके पीछे- पीछे उस अँधेरे की और चल दी।
अपनी भूख शांत करने के लिए वह ओरों की भूख का शिकार हो गई।


अंडेवाला /  शोभा रस्तोगी
शोभा रस्तोगी
नुक्कड़ पर रेहड़ी लगाके दुबला और गँवार-सा आदमी अंडे बेचता है। एक के ऊपर एक कई एग-ट्रे रखी हैं | साथ ही गर्म तवा भीजिस पर आमलेट बनता है। कुछ छुटपुट सामान भी। मैं अंडे लेने उसकी रेहड़ी पर पहुँची ही हूँ। चार अंडों का ऑर्डर दिया है। यकायक मेरी तीन साला बेटी मेरा हाथ छुड़ाकर तिरछी-सी झुक गई है। मैं हैरान! तभी देखती हूँ कि अंडेवाले के सिकुड़े से मुंह पर अर्थपूर्ण  मुस्कान फ़िसल आई है जो मुझे बिल्कुल नागवार गुजरी। मैं परेशान और ये… मुस्कान ?  मैं उसे बिना कुछ बोले थोड़ा-सा झुकती हूँ । अब आश्चर्यमिश्रित मुस्कान की बारी मेरी है | रेहड़ी के दोनों पहियों पर लम्बवत्लकडी का एकफट्टा बिछा है। उसपर एक तरफ़ डलिया है जो शायद डस्टबिन का काम कर रही है। बाकी कुछेक रद्दी पेपर। उसी सब के बीच दो-चार किताबें हैं जिन्हें हाथ में पेंसिल लिये गहरी सांवली रंगत पर सपनों की झिलमिलाती चमक  सजाए पाँच-छह वर्षीय एक बच्चा पढ़ रहा है। उसकी मोटी आँखों में दूर तक उजाला साफ़ दिखता है। मेरी बेटी को देख उस उजाले का एक टुकड़ा उसके गालों तक उतर आया है। मैं सीधी खड़ी होती हुई  अपना दायाँ हाथ उठा देती हूँ  अंडेवाले के सम्मान में।

वह जो नहीं कहा / स्नेह गोस्वामी
सुबह 6 बजे
सुनो जानू! आज तुम टूर पर हो तो लग रहा है आज यह घर पूरा का पूरा मेरा है। लग रहा है मैं आज सच्चे अर्थो में घरवाली हूँवर्ना तो शाम के समय पूरे घर में तुम्हारी ही आवाजें सुनाई देती हैं
स्नेह गोस्वामी
सुनती हो चाय बनाओजल्दी से  खाना लाओचादर नहीं झाडी अब तक भई! तुम तो सारा दिन सोयी रहती हो और अब आधी रात तक बर्तन बजाती रहोगी। अब दूध क्या एक बजे रात दोगी।’ पूरा दिन यही सब सुनते बीतता है। पर आज कितनी शान्ति है। आज मैंने शादी के बाद पहली बार अदरक डली चाय बनाई है। अब आराम से अपना मनपसन्द कोई नॉवल पढ़ना चाहती हूँ। तुम तो अपनी मीटिंग की फाइलों में उलझे होवोगेफिर भी बाय!
सुबह 10 बजे
सुनो जानूमीटिंग शुरू हो गई क्यापक्का हो गई होगी। मैंने भी मन्नू भंडारी का ‘आपका बंटी’ खत्म कर लिया। बेचारा बंटी! पर बंटी को बेचारा होने से बचाने के चक्कर में कितनी शकुन हर रोज़ बेचारी होती है। तुम मर्द कैसे समझोगे। खैर जाने दो। मैंने आज अपने लिए सैंडविच और पोहा बनायाचटखारे ले कर खाया। रोज-रोज आलू के परांठे खा के उब गयी थी। तुम तो कभी ऊबते ही नहीं परोंठों से। मन में संतुष्टि हो रही है। अब कुछ देर टी.वी. पर कोई सीरियल देखूंगी। जब तुम घर होते हो तब तो टी. वी. पर या तो न्यूज चलती हैं या फिर कोई मैचवह भी तब तक जब तक तुम्हारा मन करे वरना टी.वी. बंद। अरे कोई अच्छा सा सीरियल शुरू हो गया हैइसलिए बाय!
दोपहर 3 बजे
जानूआज मैंने कई दिनों बाद फिल्म देखी। लगा थाजिन्दगी मशीन हो गई है। पर नहीं दिल अभी धड़क रहा है। पुराणी फिल्म थी साहिब बीबी और गुलाम। मीना कुमारी छोटी बहू बनी हैगरीब घर की बेटी और बड़े जमींदार की पत्नी। पति को नाचने वाली से और शराब से फुर्सत नहीं। बीवी बेचारी सारी  जिन्दगी उसे खुश करने के चक्कर में पागल हुई रहती है। सुनो! ये हसबैंड लोगों को बाहर वालियां क्यों अच्छी लगती हैंबेशक कोई बाहर वाली घास भी न डालेपर ये लट्टू हुए आगे-पीछे घूमते रहेंगे। घरवाली को सिर्फ कामवाली बाई बनाए रर्क्खेगें। अरेआज सफाई तो की ही नहीं। चलोअब थोड़ी सफाई कर ली जायफिर खाना सोचूंगी। बाय!
शाम 7 बजे
जानू,  शाम को सफाई में ही तीन घंटे लग गए। आज मैंने घर रगड़-रगड़ कर साफ़ किया। एक-एक खिड़की दरवाजारोशनदान झाड़ कर चमकाये। इस घर पर सच में बहुत प्यार आया। फिर सारी चादरें बदलींसोफा-कवर बदले। पूरा घर अलग ही लुक दे रहा है। कपड़े धोने के लिए मशीन में डाले। फिर अपने लिए रोटी बनाई। सब्जी तो वही पड़ी थी जो रात तुम्हारे लिए बनाई थीउसी के साथ खा ली। अब कुछ देर गाने सुने जाएँ,  ठीक! बाय !
रात 11 बजे
सुनो जानूशाम को खाना तो बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ीं। खाया ही आठ बजे थापर कोफ़ी का एक कप बनाया। एक तुम्हारा भी बन गया था सो दोनों कप मुझे ही पीने पड़े। फिर सास-बहू के सीरियल देखे। बहुत दिनों से देखे नहीं थेंपर लगा नहीं कि एक साल बाद देखे। वही कहानीवही करेक्टरवही उनके षड्यन्त्र। फिर भी अच्छा समय बीत गया। अब सोने जा रही हूँ। अच्छा अब गुड नाईट!
रात दो बजे
सुनो जानू,  तुम तो सो चुके होवोगेपर मुझे नींद नहीं आ रही। तुम्हारे चीखने-चिल्लाने की आवाजें  सुबह से अब तक नहीं सुनी। शायद इसलिए या इस समय पूरे कमरे में गूँजते खर्राटो के बिना सोने की आदत नहीं रही इसलिए। कारण जो भी हो पर नींद तो सचमुच ही नहीं आ रही। इतना अच्छा दिन बीता फिर तो निश्चिंत हो कर सोना चाहिये था न,  फिर भी नहीं सोई। तुम से पूरी तरह से न जुड़ पाने के बावजूद तुम्हारे बिना नींद नहीं आ रही। पर तुम यह सब कैसे जानोगे। तुम खुद कभी ये समझोगे नहीं और मैं तो शायद कभी कह ही नहीं पाऊँगी। क्योंकि जब तुम घर में रहोगे तो यह घर तुम्हारा ही होगा.  तुम ही बोलोगेतुम ही हुक्म दोगे। मैं तो सिर्फ– ‘जीआई जीजी लाई जी,’ ही कह पाती हूँ। पर फिर भी तुम्हें मिस कर रही हूँ। अपनी मीटिंग जल्दी से खत्म करो और आ जाओ। मुझे नींद नहीं आ रही है। 

पढ़ी गयी सभी लघुकथाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी डॉ॰ अशोक भाटिया तथा डॉ॰ बलराम अग्रवाल द्वारा की गयी। उन्हें इन लिंक्स पर देख-सुन सकते हैं :                                                https://www.youtube.com/watch?v=mUv_WAdGIZs&app=desktop                                                      https://www.youtube.com/watch?v=Lb6k0h8Nc9s