Wednesday, 21 February, 2018

हिन्दी लघुकथा में राष्ट्रीय चेतना / डॉ. पुरुषोत्तम दुबे

डॉ॰ पुरुषोत्तम दुबे
राष्ट्र एक  बहुआयामी सांस्कृतिक अवधारणा है। जिसका आभ्यान्तरिक रचाव राष्ट्र में वासित मानवता, धार्मिक-सरोकार, रीति-रिवाज, रहन-सहन, भाषागत व्यवहार, वैचारिक-विनिमय इत्यादि कारकों से परिपूरित है। उक्त सांस्कृतिक विषयक विभिन्न कारकों की सजगता ही राष्ट्र का शरीर है।
      राष्ट्र का स्वरूप स्थायी न होकर परिवर्तनशील बना रहता है। सन् 1947 से लगायत अद्यतन अनेकानेक विकासशील रास्तों पर डग भरते हुए भारत-राष्ट्र का वर्तमान रूप हमारे सामने है। गोया कि तरक्कियों की तस्वीरें, सभ्यताओं के लवाजमें, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धाओं के मायने, विस्तृत हुए विशाल नगरों के कायावी/मायावी आकर्षण, यह सब ऐसी बातें हैं, राष्ट्र के तारतम्य में जिन पर गम्भीरता से बोला जा सकता है। बरअक्स इसके लिखा भी जा सकता है। लेकिन अधिकांशत: प्रामाणिकता बतौर लेखन के आती है।
      किसी भी राष्ट्र का प्रतिबिंब उस राष्ट्र के साहित्य में दमकता है। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध इत्यादि हिन्दी साहित्य की प्रचलित विधाओं के अतिरिक्त वर्तमान में हिन्दी-लघुकथा-विधा सिरमौर बनी हुई है। हिन्दी साहित्य की अन्य सद्यः स्फुट विधाओं की भाँति हिन्दी लघुकथा भी अपने तट से अपने ‘वतन’ का पता देने लगी है। विशाल राष्ट्र की अस्मिता को दर्शाने में जहाँ हजारों पन्नों में लिखा साक्ष्य भी कमतर जान पड़ रहा है, वहाँ हिन्दी लघुकथा लेखन की छोटी-सी धरती पर विशाल राष्ट्र का कैनवास रचती मिल रही है।
      ऐतिहासिक क्रम में भारतेन्दु बाबू का स्रोत पकड़कर हिन्दी की प्रायः सभी मान्य विधाओं की विकासगत धाराओं का अध्ययन होता रहा है, लेकिन आधुनिक काल को पल्लवित करने में एक बड़ा नाम मुंशी प्रेमचंद का आता है, जिनके कथा साहित्य में बहुतायत रूप में राष्ट्रीय धड़कनों का धड़कता आभास केन्द्रित है। इस दृष्टि से हिन्दी लघुकथा में राष्ट्रीय चेतना को मुखरित बनाने के क्रम में कथा सम्राट प्रेमचंद अग्रगण्य है। प्रेमचंद की लघुकथा ‘राष्ट्र का सेवक’ अपनी मूल चेतना में जात-पाँत, धर्म-अधर्म, ऊँच-नीच के घिनौने भाव को दरकिनार करती हुई भारतीय राष्ट्रीयता का आदर्श विवेचित करती मिलती है। लेकिन समभाव और समानता का उत्कट भाव जगाने वाले उद्घोषक की अपनी बेटी अछूत को अपना जीवन साथी बनाना चाहती है, तो उद्घोषक पिता अपनी बेटी के निर्णय से मुँह फेर लेता है। इस तरह राष्ट्रीय चेतना की डगर पर बढ़ाया पहला कदम ही चोटिल हो जाता है। आदर्श बघारने वालों की कथनी और करनी का अन्तर प्रस्तुत करने वाली ‘राष्ट्र का सेवक’ लघुकथा अंजाम गिनाने में भले ही नाकाम सिद्ध हुई मिलती है, लेकिन असमानता के आकाश में समभाव का एक छेद करने में पत्थर जरूर उछालती है।
      प्रेमचंद की दूसरी लघुकथा ‘गमी’ है, जो गहन-विषाद के साथ भारतीय राष्ट्रीय चेतना का एक ऐसा परिशिष्ट खोलती है जिस पर अमल करके एक और जहाँ बढ़ती जनसंख्या की बाढ़ को रोका जा सकता है, वहीं दूसरी ओर सीमित पारिवारिकता के आनंद को बटौरा जा सकता है। प्रस्तुत ‘गमी’ लघुकथा की तरंग आधुनिक समय के ‘हम दो हमारे दो’ रूपी किनारे को पोषित करती प्रतीत होती है। वस्तुतः प्रस्तुत लघुकथा राष्ट्रीय चेतना का सार्वकालिक रूप बुनती मिलती है। परिवार में तीसरी संतान का आना, न केवल उसके पोषण के लिहाज से आर्थिक संकट पैदा कर देता है, अपितु एक तरह से तीसरी संतान के जन्मते ही पारिवारिक आनंद की मृत्यु हो जाती है।
      हिन्दी लघुकथा क्षेत्र में व्यापक लेखन बीसवीं सदी के आठवें दशक से सामने आता है। आपातकाल के बाद भारतीय राष्ट्रीयता का गौरवधारी परिवेश स्थान-स्थान से इस तरह खंडित हुआ, जिनसे उत्पन्न दरारों में कहीं साम्प्रदायिकता का अप्रीतिकर रूप, कहीं राजनैतिक स्वार्थपरता, कहीं असीमित भ्रष्टाचार, कहीं मानवीय आदर्शों का अवमूल्यन, जैसी अनेक दुरावस्थाएँ पनपीं जिनसे भारतीय राष्ट्रीयता का उत्स धराशाही होता गया। ऐसे जटिल मुकामों से संश्लिष्ट होकर हिन्दी लघुकथा लेखन के पटल पर कई चिन्तन परक लघुकथाकारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जिनमें एक नाम डा. कमल चोपड़ा का आता है। कमल चोपड़ा की अनेक-अनेक लघुकथाऐं साम्प्रदायिकता के उलट सामाजिक समभाव का आदर्श रूप स्थापित कर भारतीय राष्ट्रीय चेतना का नया अध्याय खोलती है। कमल चोपड़ा की अनेक लघुकथा ‘पवित्र स्थान’ समाज की फिजाँ बिगाड़कर राजनैतिक तौर पर रोटियाँ सेंकने वाले उन्हीं धर्मावलम्बियों को दोषी ठहराती है, जो अपने ही धर्म के मन्दिर के सामने जानवर के कटे हुए अंगों को फेंक देते हैं। लेकिन मंदिर का सहिष्णु पुजारी  मंदिर में आने वाले दर्शनार्थ भक्तों के आगमन के पूर्व ही मंदिर के आगे पड़े जानवर के अंगों को उठाकर नदी में प्रवाहित कर राष्ट्रीय चेतना के उज्जवल पक्ष को उद्घाटित करता है।
      लघुकथाकार मधुदीप की लघुकथा ‘तुम इतना चुप क्यों हो दोस्त!’ राष्ट्र की प्याली में अराजकताओं की उबाल खाती कॉफी का अरुचिकर स्वाद प्रस्तुत करती है। देश की गत्र्त में जाती अर्थव्यवस्था, देश को लूटकर खाने वाले नेतागण, हमारे सैनिकों के सिर काटते हुए दुश्मन और देश में पनपते हुए भ्रष्टाचार को गिनाते हुए वर्तमानकालिक राष्ट्रीय मानसिकता में अराजकता के विरूद्ध चेतना जगाती मिलती है।
      डॉ. अशोक भाटिया की लघुकथा ‘देश’ एक अलग प्रकार की चेतना का आयाम रचती है। पाकिस्तान से हुए दो युद्ध की विभीषिकाओं के सदमें से आज की पैंसठ-सत्तर साल की पीढ़ियाँ एकबारगी उबर चुकी हैं लेकिन अपने देश में लड़की के साथ बस में हुई दरिन्दगी की खबर एक वृद्ध स्त्री को हिलाकर रख देती है। यहाँ राष्ट्रीय चेतना का स्वर मानवीय संवेदनाओं के बूते से प्रकट होता है।
      डॉ. बलराम अग्रवाल की अनेकानेक लघुकथाओं में राष्ट्रीय चेतना के स्वर भास्वरित हुए हैं। उनकी ‘खोई हुई ताकत’ लघुकथा राष्ट्रीयता के पक्ष में जोश और जुनून के साथ खड़ी मिलती है। लघुकथा का नायक मसूद मियाँ खोई हुई ताकत का शर्तिया इलाज करने वाले एक डाक्टर के क्लीनिक में आशापूर्ण कदमों से दाखिल होता है। वह डाक्टर से नपुंसकता का नही प्रत्युत वृद्धावस्था की वजह से शिथिल पड़े अपने जज्बे का इलाज कराना चाहता है कि बहत्तर बरस के हो चुकने के बाद भी वह उन अराजकताओं से लड़ सके जो आज भी देश को गुलाम बनाई हुई है। बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘गुलमोहर’ प्रतीक रूप में वह सब कहती है कि आजादी के इतने बरस बाद भी भारतीय राष्ट्रीयता का वह मुखर रूप हमारे सामने नहीं है। जिसको देखने में शहीदों ने बलिदान किये हैं। बलराम अग्रवाल की एक अन्य लघुकथा ‘यह कौन सा मुल्क है’ जो बताती है कि हमारा वर्तमान राष्ट्र एक ऐसी भीड़ है जो मस्तिष्क के उपयोगी बूते से नही अंगों-प्रत्यंगों से चलायमान है, जहां चेतना नही मगर दिशाहीन दिशाओं में मस्तिष्क विहीन धड़ों की रेलमपेल है। कोई मंसूबा कारगार नही है। राष्ट्र केवल अंधों की बेमतलब की दौड़ रह गया है।
      राष्ट्रीय चेतना से प्लावित अशोक जैन की लघुकथा ‘पैंतरे’ चुनाव के मौसम में किराये पर हल्ले करने वाली भीड़ को इंगित करती है। राजकुमार निजात की ‘ब्लास्ट’ लघुकथा नेताजी का जन्मदिन स्कूल में बालकों के मध्य मनाने की दूषित परंपरा को रेखित करती है, ताकि आज के बच्चे कल के नागरिक न बनकर नेताजी की फौज के रूप में दिखाई पड़े। श्याम बिहारी ‘श्यामल’ की लघुकथा ‘राजनीतिज्ञ’ डाकू से नेता बने व्यक्ति पर केन्द्रित है ध्वनित करती है कि डाकू के रूप में लूट-खसौटकर जंगल में छुपने से बेहतर है कि नेता के रूप में जनता को लूटकर एशोआराम से शहर में रहा जा सकता है। प्रतापसिंह सोढ़ी की लघुकथा ‘दंगा-फसाद’ ऐसे मौका परस्त लोगों को केन्द्र में रखकर लिखी गई है जो परदे के पीछे से राष्ट्रीय अस्मिता को विखण्डित करने का खेल खेलते हैं। डॉ. शकुन्तला किरण की लघुकथा ‘इमरजेंसी में राष्ट्रीय चेतना के भाव को जगाया न जाकर थोपे जाने की बात होती है, ‘‘जीजी, कल पन्द्रह अगस्त है, स्कूल में कुछ बोलना है, आजादी के बारे में कुछ रटवा दो।’’
 संपर्क : डॉ. पुरुषोत्तम दुबे, शशीपुष्प, 74-जे/ए, स्कीम नं. 71, इन्दौर-452009 (म.प्र.)
मो.नं. 9407186940/9329581414

Sunday, 18 February, 2018

मुट्ठी में सूर्य को उतारने की क्षमता रखती है लघुकथा—चित्रा मुद्गल



कथाकार चित्रा मुद्गल
डॉ लता अग्रवाल की वरिष्ठ—कथाकार श्रीमती चित्रा मुद्गल जी से बातचीत                                  [वरिष्ठ कथाकार चित्रा मुद्गल ने आठवें-नौवें दशक में काफी लघुकथाएँ लिखीं जो कथा-पत्रिका 'सारिका' आदि में स्थान पाती रहीं। उनकी लघुकथाओं का संग्रह 'बयान' सन् 2003 में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हो चुका है। एक सफल

उपन्यासकार के रूप में विख्यात होने के बावजूद चित्रा जी के विचार में 'लघुकथा' महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कथा-विधा है। पिछले दिनों भोपाल निवासी डॉ॰ लता अग्रवाल ने उनसे लघुकथा से जुड़े विभिन्न बिंदुओं पर बात की थी, जो योगराज प्रभाकर जी के संपादन में इसी माह छपकर आई अर्द्धवार्षिक लघुकथा-पत्रिका 'लघुकथा कलश' में प्रकाशित हुई है। उस पूरी बातचीत को हम साभार यहाँ शेअर कर रहे हैं।—बलराम अग्रवाल]                                                           
डॉ लता अग्रवाल - कहा जाता है सुंदर स्त्री से गुफ्तगू करने का नाम ग़जल है। इसी तर्ज पर आप लघुकथा के लिए एक पंक्ति में क्या कहेंगी ?
दायें से —श्रीमती चित्रा मुद्गल, श्रीमती लता अग्रवाल, श्रीमती ममता कालिया
चित्रा मुद्गल जी – ‘किसी भी व्यक्ति के मन का अंतर्द्वंद है : लघुकथा|’ लघुकथा वो बैचेनी है, वो पीड़ा है जो दूसरों को यंत्रणा में देखकर उभरती है | अगर वो उस पीड़ा को व्यक्त करने के लिए शब्दों के गली-गलियारों को नाप सकता है तो वो बहुत कम शब्दों में लिखी जाने वाले लघुकथा को, उसकी दृष्टि को इतना विस्तार दे सकता है कि उसे पढ़ते हुए किसी भी पाठक को यह महसूस हो कि लेखक ने तो उसके अंतर्मन के दर्द के कई-कई मीलों के सफर को तय कर लिया है |
डॉ लता अग्रवाल – आपने अपने उक्त प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रत्येक विराम चिन्ह पर जोर दिया; इसी से एक प्रश्न ज़ेहन में आयालघुकथा बहुत संक्षिप्त में कहने की विधा है। तो क्या इसके सम्प्रेषण में विराम-चिन्हों की कोई भूमिका है ?
चित्रा मुद्गल जी – निश्चित| जब हमें अपनी दृष्टि को शब्दबद्ध करना है, उसके आयामों को भी उसके अंदर समाहित करना है अथवा समाहित करने की चेष्टा करना है तो विराम चिह्न आवश्यक है ताकि वह लघुकथा की बह-आयामिता को समेट सकें, उसे व्याख्यायित कर सकें, कठौती में गंगा की तरह |
डॉ लता अग्रवाल – कहानी और उपन्यास में रचनाकार अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाता है; किन्तु कहते हैंलघुकथा में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं होता। आपकी  इस सम्बन्ध में क्या राय है ?
चित्रा मुद्गल जी – ऐसा नहीं है। कल्पना के बिना यथार्थ को आप रख नहीं सकते | जो सत्य आप देख रहे हैं, जब उसे लिखेंगे तब आप उस स्थान को, उस दृश्य को छोड़ चुके होंगे; साथ ही, जो घट गया है उससे जो एक दृश्य, एक तड़प, एक सम्वेदना आप में उपजती है, उसे लेकर आप उस घटना को मानवीय कल्पना के साथ ही न रचेंगे | तब हमें नहीं पता वह पात्र कहाँ का है? हम लिखते हैं उसके नाम को, उसके स्थान को... उसके परिवेश को रचते हैं; वह हमारी कल्पना ही तो है| हम उस सम्भावना, उस द्वन्द को कल्पना के बल ही रचते हैं जिसे हम नहीं जानते | कल्पना यथार्थ के बगैर एक कदम नहीं चल सकती |
डॉ लता अग्रवाल – लघुकथा में तथ्य और कथ्य के तादात्म्य को आप किस तरह परिभाषित करेंगी ?
चित्रा मुद्गल जी – तथ्य में कथ्य तो रहेगा, मगर कथ्य में तथ्य रचनाशीलता को अलग सरोकारों से लेजाकर जोड़ेगा | तथ्य ही कथ्य नहीं है, वैसे कथ्य ही तथ्य नहीं है | दोनों की अपनी स्वतंत्र सत्ता है, दोनों ही अभिव्यक्ति के लिए बराबर की भूमिका का निर्वाह करते हैं |
डॉ लता अग्रवाल – साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है, यह भी कहा जाता है कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता | फिर किसी कथ्य को सकारात्मक मोड़ देना क्या उस दर्पण पर आवरण डाल देने जैसा नहीं?
चित्रा मुद्गल जी –  तुम्हारे इस प्रश्न को मैं दो भागों में विभाजित करती हूँ | प्रथम – रचनाकार व्यवस्था के जिस प्रभाव से गुजर रहा है, उसका अनुभव; चाहे वह समाज को लेकर हो या व्यक्तिगत को यानी निज को; उसका उद्वेलन जब रचनाकार को लेखन हेतु बेचैन करता है, तो वह कभी यह नहीं सोचता कि उसे दुखांत लिखना है या सुखांत | लेखन नहीं चुनता कि मुझे सुखांत होना है या दुखांत | यदि वह रचनाकार है तो मान्यता की चादर ओढ़कर उसके अनुशासन में कभी बंधकर नहीं लिखेगा |
द्वितीय -  दर्पण की बात; जो समाज में घट रहा है वह साहित्य में भी घट रहा है, लेखक का दायित्व है कि उसके आगे जाकर सृजन करे, उसे समाज से जोड़े| सम्भावना तलाश करे, अपवाद ही सही, अगर वह सत्य है तो बयाँ किया जा सकता है क्योंकि कथा तो वहाँ भी बनती है|                                          डॉ लता अग्रवाल – लघुकथा में आप संवेदना को कितना आवश्यक मानती हैं ?
चित्रा मुद्गल जी – सम्वेदना के बिना लघुकथा अपने सम्प्रेषण को पूरी तरह से नहीं जी सकती | मानवीय मनोविज्ञान के आधार पर रचनाकार एक बेहतर समाज की कल्पना करता है  और बेहतर समाज सम्वेदना के बिना असम्भव है |
डॉ लता अग्रवाल – वर्तमान में लघुकथा के क्षेत्र में स्त्री लघुकथाकार और स्त्री लेखन पर आपके विचार जानना चाहूँगी ?
चित्रा मुद्गल जी – यद्यपि दोनों अलग-अलग प्रश्न हैं किन्तु इस सम्बन्ध में मेरा एक ही उत्तर पर्याप्त होगा। आज मुझे एहसास हो रहा है कि स्त्रियाँ अपनी गृहस्थी की जद्दोजहद में लगी होकर भी अपनी सृजनात्मकता की तड़प लघुकथा विधा को सौंप रही हैं| इतनी बड़ी मात्रा में स्त्रियों का एक साथ इस परिमाण में आना मैं मानती हूँ बहुत-बहुत शुभ संकेत हैं |
डॉ लता अग्रवाल – लघुकथा में क्या नये पिलर खड़े किये जाने की आवश्यकता आप महसूस करती हैं ?
चित्रा मुद्गल जी – नये पिलरों, नई भितियों, स्तम्भों की हमेशा से ही आवश्यकता रही है और रहेगी, अन्यथा लघुकथा एक सीमा तक बढ़ने के बाद काल कवलित हो जाएगी| इसलिए निरंतर नई पीढ़ी को सक्रिय होना चाहिए, उनका स्वागत होना चाहिए| बस उन्हें लघुकथा और चुटकुलों के अंतर को गंभीरता से जानने की आवश्यकता है| वो पढ़ें, अपने वरिष्ठ साहित्यकारों के लेखन से मार्गदर्शन लें, उन्हें अमृतलाल नागर, प्रभाकर श्रोत्रिय, राजेन्द्र यादव आदि को पढ़ना चाहिए कि कैसे सामाजिक सरोकारों को उन्होंने लघु दायरे में समेटा है ताकि वे चेतना सम्पन्न हो सकें | विधा की सशक्तता को समझते हुए उन्हें अपने दृश्य, कल्पनाशीलता सृजनात्मकता के अनुसार उसे रचना होगा |
डॉ लता अग्रवाल – लेखन अन्तस् की प्रेरणा से उपजता है, आप इस बात से कितनी सहमति रखती हैं ?
चित्रा मुद्गल जी - तुम्हारे इस सवाल को लता, मैं इस तरह कहना चाहूँगीजो लेखक है, वह अपने इर्द–गिर्द का कार्यक्षेत्र जहाँ लम्बा समय बीतता हैपरिचित, अपरिचित चेहरों को अपने सामने उधड़ता हुआ देखता है तो उसे अचरज होता है , कितने चेहरे हैं जिन्हें पढकर वह चकित हो जाता है, यह मनोविज्ञान उसे उद्वेलित करता है लिखने को। जिस यथार्थ से उसका सामना होता है वह उसकी चेतना को सन्निध करता है उसके खिलाफ लिखने के लिए|  लेखक को प्रेरणा वो चीखें देती हैं, वह मनोविज्ञान देता है, उसके अपने  अनुभव के माध्यम से उसके शब्द उसे पुकारते हैं जो उसे कलम उठाने को विवश कर देते हैं| और आपने वो दुनिया नहीं देखी है उसमें रहने वाले लोगों को नहीं देखा है तो आपकी अन्तस् प्रेरणा कुछ नहीं कर सकती | आपका लेखन भी पाठकों के दिलों को प्रभावित नहीं कर सकता | लेखन ऐसा हो कि पाठक कहे कि आपने तो उसके दिल की बात कह दी |
डॉ लता अग्रवाल – शिल्प लघुकथाकार का स्वतंत्र लोकतंत्र है अर्थात कथाकार अपने कहन के लिए कोई भी शैली, कोई भी शिल्प चुन सकता है। क्या आप इसके लिए कोई नियम आवश्यक मानती हैं ?
चित्रा मुद्गल जी – नहीं; इसमें कोई नियम नहीं। आप किसी दृश्य से छोटी-सी बात को बहुत गहराई से व्यक्त करना चाहते हैं तो वह आप किसी भी शिल्प में लिखें, बस आपके कहन में संवेदना, विषय का गाम्भीर्य, द्वंदात्मकता को संजीदगी के साथ संप्रेषित करने की क्षमता होनी चाहिए, अन्यथा बात बनेगी नहीं। कहाँ किस बात की कितनी जरूरत है वह शिल्प ही तय करेगा| शिल्प अपने आप कोई भी लघुकथा स्वयं तलाशती है कि किस रूप में वह अपनी ढाल को, आवेगात्मकता को संप्रेषित करेगी |  कथाकार को लगता हैवह किस शैली में अपनी बात प्रभावित ढंग से कह सकता है। इसके लिए वह स्वतंत्र है |
डॉ लता अग्रवाल – ऐसे कौन से विषय हैं जिन्हें आप समझती हैं कि वे लघुकथा से अछूते रह गये हैं या फिर उन पर और काम करने की आवश्यकता है ?
चित्रा मुद्गल जी - इधर मैं एक बात बहुत गहराई से महसूस कर रही हूँ, कि  स्त्री–पुरुष सम्बन्ध, भ्रष्टाचार, शोषण, दमन, जनसाधारण के बुनियादी हक़ की पैरवी में बहुत लघुकथाएँ लिखी गई हैं | इसमें संदेह नहीं कि लघुकथा ने विस्तृत फलक को अपने में समेटा है | मुझे लगता है कि जो परिवर्तन समाज, राष्ट्र और वैश्विक स्तर पर हो रहे  हैं, साथ ही जो देश और समाज को प्रभावित कर रहे हैं, जो भूमण्डली करण हो रहा है, इसके चलते उपभोक्तावाद गहरे अपनी जड़ों में स्थान पा रहा है | मेरा आशय  हैहमारे जो परम्परागत मूल्य रहे हैं, परम्परागत संवेदना रही है, रिश्तों की संवेदना रही है उसमें व्यक्तिवादिता प्रवेश कर गई है | वो सम्बन्ध सतही हो गये हैं | जिन माता-पिता ने अपनी जीवन-पूंजी खोकर बच्चों के जीवन को संजोया, उन्हीं बच्चों के जीवन में माता-पिता के लिए कोई कोना सुरक्षित नहीं |
यह मानसिक शोषण है, मनोवैज्ञानिक शोषण है। मुझे लगता है कि इसे और अधिक वैश्विक दबाव, गहराई के साथ प्रस्तुत करने की आवश्यकता है | इस पर परिवक्व और चैतन्य दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता है| आज जिन सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, सभ्यता और परम्परा के टूटने की कगार पर जो हम खड़े हुए हैं, इस पर गहराई से सोचने की आवश्यकता है |
दूसरी चीज है - आर्मी, एयरफोर्स, सैनिक जीवन पर, उसने कहा था या शैलैश  मटियानी की कुछ कहानियां हैं जो सैनिक जीवन को लेकर लिखी गईं हैं, मगर लघुकथा में अभी नहीं के बराबर काम हुआ है। आवश्यकता है उनके व्यक्तित्व और कृतित्व, उनकी पत्नी, परिवार, बच्चों के जीवन की जटिलताओं को लेकर लघुकथा लिखी जानी चाहिए | अपनी मुट्ठी में सूर्य को उतारने की क्षमता रखती है लघुकथा |  मुझे लगता है हम इस बहाने समाज को उनके जीवन की गहराई से जोड़ सकेंगे | ऐसे लघुकथाकार जो इस जीवन से परिचित हैं वे लिखें। कहीं न कहीं लघुकथा के अनुभव विस्तार, उसकी सर्वंगीनता के लिए यह बहुत आवश्यक है |
डॉ लता अग्रवाल – लघुकथा चरित्रांकन है या चित्रांकन अथवा दोनों ?
चित्रा मुद्गल जी – लघुकथा सब-कुछ है। कोई लघुकथा ऐसी हो सकती है जिसमें चरित्रांकन है, कोई ऐसी हो सकती है जो चित्रांकन हो, या दोनों भी; इसे किसी परिधि में बंधकर मैं नहीं देखती | यह तो रचनाकार की प्रयोगधर्मिता एवं रचनाशीलता  पर निर्भर है |
डॉ लता अग्रवाल – साहित्य का एक प्रयोजन अर्थ प्राप्ति भी है। जिस तरह कविता, ग़जल के लिए व्यावसायिक मंच हैं क्या लघुकथा को वह मुकाम हासिल हो पायेगा ?
चित्रा मुद्गल जी - क्यों नहीं, बिलकुल हो सकता है | हमने कभी कोशिश नहीं की| कवि सम्मेलन की तरह गाँव - गाँव, शहर–शहर लघुकथा सम्मेलन किये जायँ, उसकी रिपोर्टिंग हो तो आप देखिये आयोजक इस ओर लालायित होंगे; कुछ स्पांसर भी मिल ही जायेंगे जो लघुकथाकार के आने-जाने का भत्ता तो निकाल ही लेंगे |
हाल ही में इंदौर के कार्यक्रम में उद्घाटन सत्र में जब हम मंचासीन थे सभी को १५ मिनिट दिए थे | किसी ने कहानी, किसी ने उपन्यास के अंश सुनाये | मेरे समय मैंने उन्हें कहामैं १५ मिनिट नहीं, केवल ३ मिनिट लूंगी और मैंने अपनी लघुकथा ‘बयान’ सुनाई। सब स्तब्ध थे | कहने का तात्पर्यहमें समझना होगा कि लघुकथा सामर्थ्य में कहीं से कम नहीं, उसकी ताकत कहानी, कविता, उपन्यास अंश… किसी से कम साबित नहीं हुई |
डॉ लता अग्रवाल – कभी कभी देखने में आता है कि अच्छी, पकी लघुकथा उचित शीर्षक के अभाव में निष्प्रभावी हो जाती है | इसके लिए लघुकथाकार क्या करे ? इस सम्बन्ध में आपका मार्गदर्शन चाहूंगी |
चित्रा मुद्गल जी – लघुकथाकारों से मेरा कहना है कि अगर आप लघुकथा रच सकते हो तो शीर्षक क्यों नहीं रच सकते | सोचियेएक, दो, तीन बार… कोई न कोई शीर्षक आप बना ही लेंगे जो उस लघुकथा को दृष्टि दे |
डॉ लता अग्रवाल – लघुकथा के भविष्य को लेकर कुछ संदेश देना चाहेंगी ?
चित्रा मुद्गल जी – यही कि लघुकथा सहज हो सकती है मगर इसकी सृजन प्रक्रिया बहुत गम्भीर है | लघुकथा का जमाना न कभी लदा था न कभी लदेगा | आज लघुकथा अपने सीमितता से बाहर निकलकर आ रही है | शीघ्र ही यह विधा अपनी समृद्धता के साथ परचम लहराएगी |                                    साक्षात्कार कर्ता—डॉ लता अग्रवाल, 73, यश विला भवानी धाम, फेस-1, नरेला शंकरी, भोपाल–462041 / मो – 9926481878