Saturday 31 January 2009

जनगाथा फरवरी 2009


समय के साथ चलते मालवांचल के लघुकथाकार
सूर्यकांत नागर

(गतांक से आगे)
न्य लघुकथाकार, जिनका उल्लेख जरूरी लगता है, वे हैं—कृष्ण्कान्त दुबे, संजय कुमार डागा(हातोद), सुरेश बजाज, डॉ तेजपाल सिंह सोढ़ी, सिंघई सुभाष जैन, वीरचन्द नरवाले, सत्यनारायण पटेल, रमेश जाधव, कान्तिलाल ठाकरे, राज केसरवानी, मधुकर पँवार, महेश भण्डारी आदि। डॉ सोढ़ी का सन 2005 में लघुकथा संकलन ‘महामानव’ आया है। कृष्णकान्त दुबे ने प्रकृति और ग्रामीण परिवेश को लेकर अच्छी लघुकथाएँ लिखी हैं। डॉ रमेशचन्द्र दुबे का अलग से उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि उन्होंने भी लघुकथा विधा के संवर्धन हेतु बहुत काम किया है। ‘आस्था’ उनकी एक अविस्मरणीय लघुकथा है। व्यंग्यकार से एक जागरूक कवि का चोला पहन लेने वाले ब्रजेश कानूनगो ने यद्यपि कम ही लघुकथाएँ लिखी हैं, लेकिन जो भी लिखी हैं, वे उन्हें एक समर्थ लघुकथाकार सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। घुलती पृथ्वी, रंग-बिरंग आदि उनकी महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैं।
मालवा-अंचल की महिला लघुकथाकारों में ध्यान आकर्षित करने वाले नाम हैं—चेतना भाटी, अन्तरा करवड़े, लीला रूपायन, कृष्णा अग्निहोत्री, सीमा पाण्डे ‘सुशी’, रेखा कारड़ा, सुनयना वोरा, सुमति देशपाण्डे, डॉ पुष्पारानी गर्ग, स्वाति तिवारी(सभी इंदौर), प्रज्ञा पाठक और मीरा जैन(दोनों उज्जैन)। इनमें भी चेतना भाटी, अन्तरा करवड़े, सीमा पाण्डे, मीरा जैन और प्रज्ञा पाठक अधिक सक्रिय हैं। रेखा कारड़ा शारीरिक रूप से अशक्त होते हुए भी मानसिक रूप से काफी सशक्त हैं। साहित्य और कला के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। ‘उसका सपना’(2005) रेखाजी का लघुकथा-संग्रह है। प्रचार-प्रसार से दूर रहने वाली अंतरा करवड़े ने बहुत ही खूबसूरत लघुकथाएँ लिखी हैं। उनके लघुकथा-संग्रह ‘देन उसकी हमारे लिए’ को अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद ‘दिव्य’ रजत अलंकरण मिल चुका है। सीमा पाण्डे ‘सुशी’ और अंतराजी इंटरनेट पर भी बहुत सक्रिय हैं। चेतना भाटी की उल्लेखनीय लघुकथाएँ हैं—हेलमेट, ऊँची जाति, मंजर आदि। मीरा जैन की अब तक सौ से अधिक लघुकथाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। कई अन्य लघुकथा-संकलनों में भि वे संकलित हैं। ‘मीरा जैन की सौ लघुकथाएँ’ उनका एकल लघुकथा-संग्रह है। लघुकथा-लेखिकाओं की अधिकांश लघुकथाएँ परिवेशजन्य हैं। घर-परिवार, नाते-रिश्तों को शायद पूरी तरह छोड़ पाना उनके लिए संभव नहीं है। इसीलिए उनकी रचनाओं में अनुभूति की प्रामाणिकता है। प्रश्न यही है कि जो एक स्त्री अपने जीवन में झेलती-भोगती है, उसे पुरुष तो क्या, वह स्त्री जिसने वह-सब भोगा नहीं है, ठीक-से बयान नहीं कर सकती।
उज्जैन का जिक्र आया है तो वहाँ के पुरुष-लघुकथाकारों को भी याद कर लिया जाए। पोलियोग्रस्त स्व0 अरविन्द नीमा विकलांग होते हुए भी विचित्र जिजीविषा के धनी थे। लिखने-पढ़ने में उनकी गहरी रुचि थी। अच्छी रचनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया भेजना वे कभी नहीं भूलते थे। उनका एक लघुकथा-संग्रह ‘गागर में सागर’ उनकी मृत्यु के पश्चात सन 2000 में प्रकाशित हुआ था। उज्जैन के ही सन्तोष सुपेकर, राजेन्द्र नागर ‘निरन्तर’, मुकेश जोशी, शैलेन्द्र पाराशर, स्वामीनाथ पाण्डेय, डॉ शैलेन्द्र कुमार शर्मा, भगीरथ बड़ोले, बी0 एल0 आच्छा, डॉ प्रभाकर शर्मा, रमेश कर्नावट और श्रीराम दवे आदि अनेक रचनाकार लघुकथा-विधा से जुड़े हैं। ख्यात व्यंग्यकवि ओम व्यास ने भी लघुकथाएँ लिखी हैं। ‘मजदूरी’ उनकी एक महत्वपूर्ण रचना है। डॉ प्रभाकर शर्मा का संकलन ‘सागर के मोती’(2004) चर्चित रहा है। लेखक, पत्रकार, चिंतक श्रीराम दवे ने भी लघुकथाएँ लिखी हैं। उनके संपादन में इंदौर के तीन लघुकथाकारों का संकलन ‘त्रिवेणी’(2003) आया था। प्रो0 शैलेन्द्र पाराशर के संपादन में लघुकथाओं के संकलन ‘सरोकार’ का प्रकाशन उज्जैन से हुआ था। संकलन में रमेशचन्द्र शर्मा, हरीश कुमार, प्रभाकर शर्मा, रमेश कर्नावट, प्रवीण देवलेकर आदि की लघुकथाएँ शामिल थीं। उक्त संकलन का भव्य लोकार्पण-समारोह हुआ था जिसमें सांसद सत्यनारायण जटिया, ख्यात कवि-आलोचक प्रमोद त्रिवेदी, प्रो0 रमेश गुप्त ‘चातक’ आदि अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। उक्त संकलन का लोकार्पण सूर्यकांत नागर ने किया था। इस अवसर पर लघुकथाकार वेद हिमांशु को सम्मानित भी किया गया था। प्रो0 बी0 एल0 आच्छा ने लघुकथा के सिध्दान्त-पक्ष पर अनेक विचारपरक लेख लिखे हैं। पिलकेन्द्र अरोरा भी इस दिशा में काफी सक्रिय हैं।
लेखक, कवि, विचारक और वरिष्ठ विज्ञानी रतलाम के डॉ जयकुमार जलज ने हिसाब, हासिल, नेता-शिष्य, वंशबेल, झूठा सच, शॉर्टकट जैसी यादगार कथाएँ लिखकर सिद्ध कर दिया है कि उनकी इस विधा पर गहरी पकड़ है। उनकी लघुकथाओं में मनुष्य के दोहरे चेहरे और स्खलित होते मानवीय मूल्यों के प्रति उनकी चिन्ता को रेखांकित किया जा सकता है। साहित्य की विभिन्न विधाओं में सतत लिखने वाले झाबुआ के रामशंकर ‘चंचल’ भी अब तक अनेक श्रेष्ठ लघुकथाएँ लिख चुके हैं। उनकी रचनाएँ देशभर की छोटी-बड़ी पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। उनके द्वारा संपादित ‘एकलव्य’(2004) संकलन में उनकी अनेक लघुकथाएँ संकलित हैं। उनकी झीतरा और ब्लाउज रचनाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अशोक ‘आनन’(मक्सी) ‘आयाम’ लघु-पत्रिका निकालते रहे हैं। इस पत्रिका का एक पूरा अंक लघुकथा को समर्पित था। ‘आनन’ ने स्वयं भी अनेक लघुकथाएँ लिखी हैं। ‘मातुश्री कमलादेवी स्मृति पुरस्कार’ का प्रोत्साहन पुरस्कार भी उनको मिल चुका है। ‘खिलौने’ उनकी उल्लेखनीय लघुकथा है। देवास के उपेन्द्र मिश्र एवं नितिन घुणे के समर्पण-भाव को याद रखना भी जरूरी है।
इंदौर में रहे और मुंबई में जा बसे अनन्त श्रीमाली ने सतीश राठी के साथ मिलकर लघुकथा के संवर्धन के लिए खूब काम किया। राठीजी के साथ वे ‘क्षितिज’ और ‘मनोबल’ के सहयोगी संपादक रहे। इंदौर के एक और लघुकथाकार जो फिलहाल नौकरी के सिलसिले में मुंबई में हैं, वे हैं—डॉ सतीश शुक्ल। शुक्लजी भी लघुकथा के प्रति समर्पित रहे हैं। कर्ज-अदायगी तथा स्वाभिंमान जैसी लघुकथाओं के माध्यम से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
मालवा-अंचल के देवास, उज्जैन, इंदौर आदि स्थानों पर लघुकथा-सम्मेलनों, सेमीनारों, कार्यशालाओं, लोकार्पण-समारोहों और चर्चा-गोष्ठियों का आयोजन अक्सर होता रहता है। इनमें लघुकथा लेखन के विविध पक्षों पर खुली चर्चा होती है। कुछ स्थानों पर लघुकथाओं पर आधारित चित्र-प्रदर्शनियाँ भी लगाई जा चुकी हैं। दिल्ली निवासी मधुदीप के लघुकथा-संग्रह ‘मेरी बात तेरी बात’ पर स्वयं मधुदीप की उपस्थिति में इंदौर में विस्तृत चर्चा हुई थी। चैतन्य त्रिवेदी के लघुकथा-संग्रह ‘उल्लास’ पर भी एकाधिक बार बहस हो चुकी है। मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति द्वारा भी लघुकथा-वाचन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। गत वर्ष डॉ सतीश दुबे की लघुकथाओं के गुजराती संकलन ‘करोड़ रज्जू’ का वृहद लोकार्पण-समारोह गुजराती समाज द्वारा आयोजित किया गया था। गुजरात साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित और कभी इंदौर में ही रहे रोहित श्याम चतुर्वेदी द्वारा हिन्दी से गुजराती में अनूदित यह पुस्तक काफी चर्चित रही। सतीश राठी ने ‘क्षितिज’ के लिए 1983-84 में लघुकथा-प्रतियोगिता आयोजित कि थी जिसमें फजल इमाम मलिक, मदन शर्मा और शंकर पुणतांबेकर को पुरस्कृत किया गया था। निर्णायक थे—निमाड़ लोक संस्कृति के पोषक रामनारायण उपाध्याय, सूर्यकांत नागर और राजेन्द्र पाण्डेय। अशोक शर्मा ‘भारती’ द्वारा आयोजित प्रतियोगिता का उल्लेख पूर्व में किया जा चुका है। मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति की मुख-पत्रिका ‘वीणा’ में आज भी लघुकथाओं का प्रकाशन नियमित रूप से हो रहा है। लघुकथा पर क्षेत्र के अनेक छात्र-छात्राओं द्वारा एम फिल हेतु लघु शोध-प्रबन्ध तथा पी-एच डी हेतु शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत कर डिग्रियाँ हासिल की गई हैं। इनमें कुछ नाम हैं—सुनीता पाटीदार, संजय गुप्ता, पल्लवी, भारती ललवानी, मनीषा व्यास आदि।
देश में लघुकथा के बदलते नक्शे के साथ-साथ मालवांचल में भी लघुकथा लेखन में भाषा, शिल्प और कथ्य के स्तर पर बदलाव आया है। हृदयहीनता, भ्रष्टाचार और परस्पर विरोधी स्थितियों वाले घिसे-पिटे विषयों से मुक्ति मिल रही है। अतिरिक्त स्पष्टीकरण और विवरणात्मकता के प्रति भी लेखक-वर्ग सावधान हुआ है। बदलते यथार्थ को सामने लाने के लिए लघुकथा के रचनात्मक स्वरूप में रूपात्मक बदलाव आया है। पहले लगता था, सारी लघुकथाएँ एक ही टकसाल से निकलकर आ रही हैं। अब मालवा का लघुकथाकार अधिक सजग हुआ है। उसने लघुकथा के बने-बनाए ढाँचे को तोड़ने की कोशिश की है। उसकी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समझ विकसित हुई है। लघुकथा के विकास की दृष्टि से यह एक शुभ लक्षण है। विक्रम सोनी, सतीश दुबे से प्रारम्भ परम्परा विकसित-पल्लवित होकर नए रंग-रूप में अपनी सुरभि बिखेर रही है और लघुकथा विधा के संवर्धन में अपना विनम्र योगदान कर रही है। निस्सन्देह मालवा-अंचल के लघुकथाकारों ने साहित्य कोष को समृद्ध करने और लघुकथा को अधिकाधिक लोगों से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उम्मीद है, अंचल की नई प्रतिभाएँ भी आगे आएँगी और इस विधा की जड़ों को मजबूत करने में भरपूर सहयोग करेंगी।
मोबाइल:09893810050

लघुकथाएँ


लक्ष्मी-निवास
सुरेश शर्मा

दीपावली की आधी रात बीत चुकी थी। लक्ष्मीजी अपने वाहन पर सवार उपयुक्त पात्र को वरदान देने निकल पड़ीं।
एक झोपड़ी का दरवाजा बन्द था। भीतर-बाहर अँधेरा पसरा देखकर विस्मय के साथ लक्ष्मीजी ने पूछा, “दीवाली की रात भी अँधेरा?”
“यह एक गरीब मजदूर का घर है। दिनभर कठोर श्रम करने के बाद भी इसके परिवार का गुजारा नहीं हो पाता। इसीलिए आपका स्वागत नहीं कर पाया बेचारा।” उल्लू ने स्थिति स्पष्ट की तो लक्ष्मीजी ने आगे बढ़ने का इशारा किया।
कुछ दूर चलने के बाद एक घर के आगे केवल एक दीया टिमटिमाता हुआ देखकर वे ठिठकीं। आशय समझकर उल्लू बोला,“यह एक ईमानदार शासकीय कर्मचारी का घर है। ऊपर की कमाई को हाथ लगाना भी पाप समझता है। इसीलिए इसका परिवार गरीबी और अभाव से त्रस्त रहता है। अपनी क्षमता अनुसार ही आपकी सेवा कर सन्तुष्ट है, देवि!”
लक्ष्मीजी की खामोशी का अर्थ समझकर उल्लू आगे बढ़ लिया। तभी उनकी नजर विद्युत रोशनी से जगमगाते एक भव्य भवन पर पड़ी। वहाँ आतिशबाजी से आसमान तक गूँज रहा था। दर्जनों देशी-विदेशी कारों की लाइन लगी हुई थी। अच्छा-खासा शोर मचा हुआ था। लक्ष्मीजी को खोया हुआ-सा जानकर उल्लू बताने लगा, “यह एक हवाला और घोटालेबाज का महल है देवि! इसके पास अपार सम्पत्ति व काला धन है।”
सुनकर लक्ष्मीजी बोलीं, “तुम मुझे यहीं उतार दो।”
उल्लू उल्लू-सा खड़ा-खड़ा लक्ष्मीजी को भीतर जाते देखता रहा।
मोबाइल:09926080810

संस्कार
श्यामसुन्दर व्यास
(निधन: 03 अक्तूबर, 2007)

सार्वजनिक नल पर पानी भरने वालों की भीड़ जमा हो गई थी। हंडा भर जाने के बाद बूढ़ी अम्मा से हंडा उठाया नहीं जा रहा था।
लोगों का अधैर्य बड़बड़ाहट में बदलने लगा। मनकू ने हंडा हटाकर अपनी बाल्टी लगाते हुए बूढ़ी से कहा, “बहू को मेंहदी लगी है क्या, जो तू आ गई?”
कातर स्वर में बूढ़ी के बोल फूटे—“उसका पाँव भारी है।”
मनकू को लगा जैसे किसी ने उस पर घड़ों पानी डाल दिया हो।
उसने हंडा उठाया और बूढ़ी अम्मा के द्वार पर रख आया।


मूल्यान्तर
विक्रम सोनी

रोगाजी प्याऊ के आगे अंजुरी बाँधते उसे देखकर बेहद आत्मीयता व नम्रता से बोले,“क्यों बे हरामी की औलाद अहीरराम, तूने अभी तक एक टीन घी नहीं पहुँचाया? एक तेरे ही घर का हुआ तो हम खाते-पीते हैं। गाँव में एक तेरे ही घर की किसी चीज से हमें परहेज नहीं है, और तू है कि…”
“तीन गायें मर गयीं हुजूर।”
“अबे तो गाँवभर में सौ-सौ ग्राम भी माँग लिया होता तो टीन भर जाता। देखता, कौन साला हमारे नाम से नहीं देता!”
वह कुछ उत्तर देता, तभी पानी पिलाने वाली बुढ़िया ने धीरे-से कहा,“माँगकर ला देना बेटा, भिखारी को जूठन से परहेज नहीं होता।”
सम्पर्क:0734-2533910


हक़ की मजदूरी
प्रताप सिंह सोढ़ी

पने पाँच-वर्षीय बच्चे का हाथ पकड़े भूरीबाई दाड़की पाने की प्रतीक्षा में लगभग दो घण्टे से मजदूर-चौक में खड़ी हुई थी। उसने मजदूरी मिलने की आस अब छोड़ दी थी। सुस्ताने के लिए वह पास की पुलिया पर बैठ गयी। तभी, उसे किसी की आवाज़ सुनाई दी,“क्या काम नहीं मिला?”
उसने देखा कि एक नौजवान अपनी पतली नुकीली मूँछों पर उँगली फेरते हुए उसे घूर रहा था। संक्षिप्त-सा उत्तर दिया उसने—“नहीं मिला।”
“हम देंगे तुम्हें बढ़िया काम।”
“क्या मजदूरी दोगे?”
कमीज की कॉलर ऊपर उठाते हुए उसने कहा, “मुँहमाँगी मजदूरी मिलेगी।”
उसे घूरते हुए दृढ़तापूर्वक वह बोली, “हक़ की मजदूरी ही लूँगी। कहाँ जाना होगा?”
कुटिल हँसी बिखेरते हुए उस नौजवान ने उत्तर दिया, “मेरे ठिकाने पर चलना होगा, जहाँ सभी मजदूरिनें जाती हैं। वहाँ सभी सुविधाएँ हैं। दो-तीन घण्टे में तुम्हें छुट्टी मिल जाएगी और भरपूर मजदूरी भी।”
अनपढ़ भूरीबाई सब-कुछ समझ गई। उसकी भृकुटी तन गई और पूरी ताकत लगा वह चीख पड़ी, “अबे हरामी, मैं मजदूरी कर पेट भरती हूँ, इज्जत बेचकर नहीं। भाग जा यहाँ से, नहीं तो…।”
एक बड़ा-सा पत्थर उसके हाथ में था। भूरीबाई के इस विकराल रूप को देखकर वह नौजवान भयभीत वहाँ से भाग खड़ा हुआ। भूरीबाई ने अपने बच्चे का हाथ पकड़ा और लम्बे-लम्बे डग भरती, बड़बड़ाती हुई अपने घर की तरफ चल दी।
मोबाइल:09753128044

खामोश
रमेश मनोहरा

“क्यों लीला, आजकल खामोश क्यों रहने लगी? क्या हो गया, बोल्।”
“कुछ नहीं हुआ।”
“जो हमेशा दिन-रात बड़बड़ाती रहती थी। अपनी बहू को कम दहेज लाने पर कोसती रहती थी। मगर कुछ दिनों से देख रही हूँ—किसी ने तुम्हारी जुबान सी दी है। बता, बहू ने कुछ कह दिया क्या?”
“बहू क्या कहेगी मीरा बहिन्।”
“तो फिर किसने कह दिया?”
“मेरे अपने बेटे ने।”
“क्या कह दिया ऐसा तुम्हारे बेटे ने?”
“कह दिया, तुम दहेज के लिए बार-बार बहू को परेशान नहीं करोगी।”
“बेटे ने ऐसा कह दिया और तुम डर गई?”
“डरे मेरी जूती।” जरा गुस्से से लीला बोली।
“तो फिर, इतनी खामोश क्यों रहने लगी? बहू को भी अब दहेज के लिए नहीं उकसाती हो?”
“बात दरअसल यह हुई मीरा बहिन, बेटे ने जोर देकर कह दिया—अब दहेज के लिए बहू को परेशान करोगी तो हम दोनों आत्महत्या कर लेंगे।”
“और तुम डर गई?”
“हाँ मीरा बहिन, बेटा तो मेरा ही है। बहू में आँसू आ गये।
“यानी कि बेटा बहू का गुलाम हो गया?” मीरा ने उसके दर्द को फिर कुरेदा।
“हाँ मीरा बहिन, मैं अपने को नहीं खोना चाहती।” कहकर लीला ने अपनी वेदना उगल डाली।
मीरा बहिन अन्दर-बाहर से मुस्करा दी, क्योंकि यह योजना उसी की थी।
सम्पर्क:07414-229414


आशंका
डॉ योगेन्द्रनाथ शुक्ल

घर के सामने कार रुकने की आवाज़ आते ही पिता छड़ी के सहारे रूम की ओर चल दिए।
“बेटा! यात्रा में कोई कष्ट तो नहीं हुआ?”
“नहीं पिताजी।”
“कार्यक्रम अच्छी तरह निपट गया?”
“जी पिताजी। चाचाजी आपको बहुत याद कर रहे थे…मैंने कह दिया कि आपकी तबियत ठीक नहीं थी, इसलिए नहीं आ सके।”
“बेटा, तुम्हारी चाची बहुत अच्छी महिला थी…तुम्हें तकलीफ तो हुई होगी, लेकिन उनके तेरहवें में शामिल होना बहुत जरूरी था…उनका परिवार भले ही दूसरे शहर में रह रहा हो, पर हमारा खून तो एक ही है…।” यह कहते हुए उनकी आँखें भर आई थीं; किन्तु उन्हें मन ही मन सन्तोष भी था कि पुत्र और पुत्रवधू ने उनकी आज्ञा का पालन किया था।
रात को यश उनके कमरे में आया।
“दादाजी, पापा कानपुर से मेरे लिए ये वीडियो-गेम लाए हैं।”
“यह तो बहुत अच्छा है! जरा मुझे भी बताओ…।” उसके सिर पर हाथ फेरते हुए दादाजी ने कहा।
“दादाजी, मम्मी कह रही थी कि चाचीजी की साग-पूड़ी चार हजार में पड़ी।…दादाजी, क्या साग-पूड़ी इतनी मँहगी मिलती है?”
यश अपने प्रश्न का जवाब चाह रहा था और दादाजी अपने भावी जीवन के प्रति आशंकित हो मूर्तिवत खड़े थे।
सम्पर्क:0731-2483893


कचरा
मनोज सेवलकर

प्रतिदिन गली में आने वाली स्वीपर प्रत्येक घर के सामने झाड़ू लगाते हुए अपना निर्धारित वाक्य दोहराती—“आंटीजी, कचरा्।” तथा प्रत्येक घर उसका आशय जान उसकी हाथ-ट्राली में कचरा डाल देते। परन्तु मेरे पड़ोस में जब भी वह आती, तब उसके वाक्य में परिवर्तन हो जाता। कहती—“दादाजी, कचरा।” क्योंकि दादाजी प्रतिदिन उसी समय अपने घर के आँगन तथा आसपास की सफाई कर कचरा डस्टबिन में डालते, फिर उस स्वीपर की हाथ-ट्राली में।
आज भी दादाजी व्यस्त थे तथा उनकी बहू दरोगा की माफिक बरामदे में खड़ी अपने ससुरजी की गतिविधियों को देख रही थी। जैसे ही स्वीपर ने “दादाजी, कचरा” कहा, वैसे ही उन्होंने उससे प्रश्न किया—“तुम मुझे इस ट्राली में कहाँ डालोगी?”
स्वीपर ने कहा—“क्यों मजाक करते हैं दादाजी!”
“तुम ही तो रोज कहती हो—दादाजी कचरा!”
“वो तो दादाजी, मैं कचरा माँगती हूँ।”
“नहीं बेटा, मैं तो अब रोज कचरा होता जा रहा हूँ…।”
दादाजी की बात को वह तो हँसी-ठिठोली समझकर आगे बढ़ गई। बहू उनके आशय को समझ नाराजगी प्रकट करती, पैर पटकती घर के अन्दर चली गई।
सम्पर्क:0731-2484321

Saturday 17 January 2009

जनगाथा जनवरी, 2009





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प्रिय पाठकगण,
नया साल आपके जीवन को नई स्फूर्ति से भर दे। समृद्धि सदैव बनी रहे और उन्नति के मार्ग हमेशा खुले रहें।
27 दिसम्बर, 2007 को हमने लघुकथा समालोचना और रचना पर केन्द्रित जनगाथा का शुभारम्भ किया था। जनवरी, 2009 से समकालीन लघुकथा नाम से एक अन्य ब्लॉग सिर्फ लघुकथाओं के लिए प्रारम्भ किया है। इसे आप दायीं ओर हमकदम शीर्ष तले दिए गए लिंक समकालीन लघुकथा पर क्लिक करके आसानी से पढ़ सकते हैं। आशा है कि लघुकथा के लेखकों-पाठकों-अध्येताओं को जनगाथा के साथ-साथ समकालीन लघुकथा का अंक भी पसंद आयेगा।
दिसम्बर 2008 से हमने मालवा-अंचल के लघुकथा-लेखन से परिचित कराना प्रारम्भ किया है।
इसी दौरान मध्य प्रदेश के ही निमाड़-अंचल के श्रमशील लेखक श्रीयुत जगदीश जोशीला ने हिन्दी के 44 चुनिंदा कथाकारों की कुल 132 लघुकथाओं का निमाड़ी-बोली में पुस्तकाकार अनुवाद प्रस्तुत किया है—‘निमाड़ी मऽ हिन्दी की खास नानी वार्ता नऽ नाम से। जोशीला जी के अनुसार प्रस्तुत पुस्तक देश की बोलियों में लघुकथाओं का प्रथम अनुवाद है। बेशक, हिन्दी लघुकथाओं ने भारत की लगभग हर भाषा तक अपनी पहुँच बनाई है। जर्मनी की डॉ इरा वलेरिया सरमा को कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से भारतीय भाषा के इतिहास और दक्षिण एशियाई अध्ययन के अन्तर्गत हिन्दी कला और साहित्य में अभिव्यक्ति की नवीन गद्यात्मक शैली का ऐतिहासिक व साहित्यिक विश्लेषण(A Historical and literary Analysis of Modern Hindi Prose Genre) विषय मिला, जिसका आधार उन्होंने हिन्दी लघुकथा को बनाया। भारतीय विशेषकर हिन्दी लघुकथा-साहित्य पर केन्द्रित उनका शोध-प्रबंध 344 पृष्ठीय अंग्रेजी आलोचनात्मक पुस्तक के रूप में द लघुकथा नाम से 2003 में बर्लिन के प्रकाशन संस्थान वॉल्टर डि ग्रूते(Walter de Gruyter) से प्रकाशित हो चुका है और उसमें देशभर के चर्चित-अचर्चित सैकड़ों लघुकथाकारों की लघुकथाओं को संदर्भ के रूप में उद्धृत किया गया है। यह पुस्तक कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस के अनुमोदन पर छपी है। वर्तमान में इसका मूल्य लगभग 158 अमरीकी डॉलर उल्लिखित है। तात्पर्य यह कि लघुकथा ने निमाड़-अंचल से लेकर कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी तक का सफर सफलतापूर्वक तय कर लिया है।
लघुकथा के क्षेत्र में आज भले ही बहुत अधिक हो-ल्ला नहीं मच रहा है, लेकिन काम लगातार हो रहा है। एक और अच्छी खबर यह है कि अजमेर की डॉ शकुन्तला किरण द्वारा सम्पन्न लघुकथा का हिन्दी का पहला शोध-ग्रंथ हिन्दी लघुकथा अपनी स्वीकृति(1981) के लगभग 27 वर्षों के लम्बे अन्तराल के बाद अब प्रकाशित हो गया है। 256 पृष्ठीय यह ग्रंथ लघुकथा-आन्दोलन और समकालीन-लघुकथा से जुड़े अनेक पहलुओं को समझने के लिए एक आवश्यक पुस्तक है। लघुकथा के इस विकास और सफलता के पीछे जिन हजारों जुझारू लेखकों का श्रम छिपा है, उन सभी को हमारा नमन। बलराम अग्रवाल
समय के साथ चलते मालवांचल के लघुकथाकार
सूर्यकांत नागर
(गतांक से आगे)
मालवा के ग्रामीण जन-जीवन के चितेरे, मालवी संस्कारों में रचे-बसे कथाकार चन्द्रशेखर दुबे, जिनका जनवरी 2005 में 80 वर्ष की आयु में देहावसान हुआ, ने बहुत अच्छी लघुकथाएँ लिखी हैं। निश्छल ग्रामीण-जन की तस्वीर उकेरने में वह सिद्धहस्त थे। शहरी बाबू की ठसक की तुलना में गाँव का व्यक्ति अधिक सहज, सरल एवं शालीन होता है, इस तथ्य को उनकी फासला लघुकथा में रेखांकित किया जा सकता है। बिना किसी शिल्प-वैभव के अपनी बात को प्रभावी ढंग से कहने में दुबेजी माहिर थे। उनकी अन्य महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैंउनका स्नेह, फालतू बातें, राँग नम्बर, ये शब्द आदि।
मूलत: इंदौर निवासी, फिलवक्त मनावर में पदस्थ बैंक-अधिकारी, श्री सतीश राठी पिछले ढाई दशक से लघुकथा-विधा से गहराई से जुड़े हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं में लिखने वाले, लघुकथा को समर्पित राठी क्षितिज वार्षिकी का सम्पादन करते हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने तीसरा क्षितिज, मनोबल, समक्ष लघुकथा-संकलनों का संपादन किया है। उनकी अनेक लघुकथाओं का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनकी कुछ उल्लेखनीय रचनाएँ हैंनियति, कंसलटेंसी, आग्रह, कुत्ता, खुली किताब आदि।
सुरेश शर्मा ने शुरुआत कहानी-लेखन से की थी। उनके कुछ एकल और कुछ संपादित कहानी-संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं; लेकिन जल्दी ही उन्हें लगा कि कहानी के बजाय वे लघुकथा में अपने भावों को और भी सशक्त ढंग से अभिव्यक्त कर सकते हैं, और शायद इसीलिए उन्होंने पूरे समर्पण भाव से इस दिशा में अपना रुख कर लिया। आज उनकी गिनती देश के प्रमुख लघुकथाकारों में होती है। अनुभव से उपजी उनकी लघुकथाएँ वैचारिक और सांकेतिक हैं। एक व्यंग्य दृष्टि भी वहाँ स्पष्ट नजर आती है। एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य था—‘समान्तर पत्रिका के वृह्द लघुकथा-अंक(2001) का संपादन, जिसे सुरेश शर्मा एवं डॉ इसाक अश्क ने संयुक्त रूप से संपादित किया। इसमें देशभर के 126 लघुकथाकारों की कथाएँ संकलित हैं। त्रिवेणी लघुकथा-संकलन में भी सुरेश शर्मा की कीटाणुनाशक प्रतिनिधि लघुकथाएँ संग्रहीत हैं। इज्जत, संस्कार, घर और मकान, माँ और माँ, बन्द दरवाजे आदि उनकी उल्लेखनीय लघुकथाएँ हैं।
ख्यातिलब्ध ललित निबन्धकार एवं प्राचीन चित्रकला के अध्येता नर्मदाप्रसाद उपाध्याय का अधिकांश कार्यकाल इंदौर-उज्जैन में रहा है। इन दिनों भी वे इंदौर में हैं। सन 1977 में उन्होंने नरेन्द्र मौर्य के साथ समान्तर लघुकथाएँ का संपादन किया था जिसमें कमलेश्वर, नरेन्द्र कोहली, रमेश बतरा, हिमांशु जोशी, कमल गुप्त और हरिशंकर परसाई जैसे दिग्गजों की लघुकथाएँ शामिल थीं। उपाध्यायजी ने पेट, मूल्यों के लिए, शीर्षक, पश्चाताप जैसी अविस्मरणीय लघुकथाओं की रचना की है। डॉ योगेन्द्रनाथ शुक्ल ने बहुत बाद में लघुकथाएँ लिखना प्रारम्भ किया, लेकिन वे इन दिनों काफी तेजी से लघुकथाएँ लिख रहे हैं और थोड़े ही समय में उन्होंने स्वयं को प्रतिभाशाली लघुकथाकार के रूप में स्थापित कर लिया है। चूँकि शुक्लजी प्राध्यापक हैं, अत: उनकी अनेक लघुकथाएँ शिक्षा-जगत से संबंधित हैं। ईमान का इनाम और चीख को उनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ कहा जा सकता है। हालाँकि श्रीराम दवे द्वारा संपादित संकलन त्रिवेणी विख्यात लघुकथाकार बलराम अग्रवाल ने लिखा है—‘डॉ शुक्ल किसी बात को अंडर करंट नहीं करते। सब-कुछ साफ-साफ कह देते हैं। डॉ शुक्ल के सद्प्रयासों से एक अभिनव आयोजन शासकीय कला एवं वाणिज्य विद्यालय, इंदौर में लघुकथा के विचार-पक्ष पर हुआ था। इसमें साहित्यकार और जिलाधीश मनोज श्रीवास्तव, प्रकाशक-लेखक मधुदीप(दिल्ली), ख्यात लघुकथाकार डॉ कृष्ण कमलेश(भोपाल), सूर्यकांत नागर और स्वयं डॉ योगेन्द्रनाथ शुक्ल ने शिरकत की थी। इसमें मनोज श्रीवास्तव ने लघुकथा को परिभाषित करते हुए कहा था कि यदि उपन्यास सर्च-लाइट है, कहानी स्पॉट-लाइट है तो लघुकथा लेज़र-लाइट है जो घाव करने के साथ-साथ उपचार भी करती है। श्री शुक्ल का लघुकथा-संग्रह शपथ-पत्र (1999) भी चर्चित रहा। बाद में मराठी भाषा में भी उसका अनुवाद हुआ।
त्रिवेणी के तीसरे लघुकथाकार हैं प्रतापसिंह सोढ़ी। वे भी लम्बे समय से लघुकथाएँ लिख रहे हैं। सोढ़ीजी गहन चिन्तन-दृष्टि के स्वामी हैं। वे भारतीय संस्कृति के पोषक हैं, लेकिन अंधविश्वास और अंधश्रद्धा के खिलाफ। उनका भरोसा संकेतात्मकता में है। उनकी संरक्षण, तस्वीर बदल गई, जूते आदि लघुकथाएँ हमें दूर तक सोचने को मजबूर करती हैं।
एक और रचनाकार जिसके अल्प और विनम्र योगदान को याद रखा जा सकता है, वह है इन पंक्तियों का लेखक। काली माटीके संपादक सुरेश शर्मा के शब्दों मेंश्री सूर्यकांत नागर पिछले तीन दशक से सक्रिय हैं। मनुष्य के दोहरे और दोगलेपन तथा उसकी कथनी-करनी के भेद को उजागर करने की व्याकुलता उनकी लघुकथाओं में देखी जा सकती है। नैतिक और मानवीय मूल्यों के प्रति आग्रह भी उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है। डॉ सतीश दुबे के साथ लघुकथा-संकलन प्रतिनिधि लघुकथाएँ का तथा गजानन देशमुख के साथ मध्य प्रदेश के 52 लघुकथाकारों की लघुकथाओं का संकलन तीसरी आँख का उन्होंने संपादन किया है। लघुकथा विधा के सिद्धांत-पक्ष पर उनके अनेक आलेख प्रकाशित हुए हैं। उनकी लघुकथाओं का मराठी, पंजाबी और सिन्धी में अनुवाद हुआ है। हाल ही में किताबघर(दिल्ली) से उनकी लघुकथाओं का संग्रह विषबीज (2006) आया है। उन्होंने प्रतिष्ठित समाचार-पत्र नई दुनिया में बहैसियत उप-संपादक आठ वर्षों तक निरन्तर लघुकथाओं को स्थान दिया। यह उल्लेख अप्रासंगिक न होगा कि अनेक नए रचनाकारों ने अपनी लघुकथाओं के लेखन का प्रारम्भ नई दुनिया से ही किया था।
इंदौर के ही अशोक शर्मा भारती के योगदान को भी कम करके नहीं आँका जा सकता। उन्होंने अनेक यादगार लघुकथाएँ लिखने के अतिरिक्त अपनी माँ की स्मृति में लघुकथा-प्रतियोगिता का आयोजन भी किया था। प्राप्त 161 लघुकथाओं को तलाश जारी है(1988) शीर्षक पुस्तक में संकलित किया था। प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार खण्डवा के लखन स्वर्णिक को तथा तृतीय पुरस्कार दिल्ली के कमल चोपड़ा को मिला था। रोजगार, सबक, तब क्या होगा, आदमी आदि भारतीजी की महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैं। इसी क्रम में राजेन्द्र पाण्डेय का नाम भी काबिले-जिक्र है, हालाँकि इन दिनों वे कम सक्रिय हैं। चरणसिंह अमी लघुकथा के नियमित लेखक नहीं हैं, लेकिन पूर्व में उन्होंने उम्दा लघुकथाएँ लिखी हैं जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों में प्रकाशित हुई हैं। वे एक अच्छे कवि, कला-समीक्षक और संपादक हैं। वे चित्रावण और इबारत जैसी पत्रिकाओं का संपादन भी करते हैं। उन्होंने कुछ वृत्त-चित्र भी बनाए हैं। रमेश अस्थिवर अत्यन्त स्वाभिमानी, आत्मविश्वासी और दृष्टि-सम्पन्न रचनाकार हैं। अनेक सार्थक लघुकथाएँ लिखने के अलावा उन्होंने लम्बे समय तक शब्दवर पत्रिका का संपादन किया और उसमें लघुकथाओं को पर्याप्त स्थान दिया। आदमी(1989) उनकी लघुकथाओं का संग्रह है।
चैतन्य त्रिवेदी का नाम लघुकथा की दुनिया में अचानक विद्युत की भाँति कौंधा। मूलत: कवि और व्यंग्यकार श्री चैतन्य त्रिवेदी ने आर्य स्मृति सम्मान(किताबघर, दिल्ली) से अलंकृत होने से पूर्व उजागर रूप से कोई लघुकथा नहीं लिखी थी। पहले ही स्ट्रोक में उन्होंने अपनी प्रतिभा और अभिव्यक्ति-कौशल का जो परिचय दिया, उसने सभी को चौंका दिया। उनके पुरस्कृत लघुकथा-संग्रह उल्लास(2000) की लघुकथाओं ने लघुकथा के बँधे-बँधाए ढाँचे को ध्वस्त किया है। उनका रचना-विधान विलक्षण है। उनकी लघुकथाएँ सांकेतिक और काव्यात्मक हैं। दास साहब का कुत्ता, जूते और कालीन, उस दिन मांडव में, खुलता बन्द घर, टी वी वाले भैया आदि उनकी उल्लेखनीय लघुकथाएँ हैं।
कम किन्तु अच्छा लिखने वाले और प्रचार से दूर रहने वाले एक लघुकथाकार हैंहिन्दीतर भाषी, इंदौर के ही एन उन्नी। कथाकार-पत्रकार बलराम और कथाकार-संपादक बलराम अग्रवाल दोनों ही उन्नीजी की लघुकथाओं से बेहद प्रभावित हैं। उन्नीजी की कुछ अच्छी लघुकथाएँ हैंकबूतरों से भी खतरा है, सर्कस, तलाश आदि। हिन्दी में लिखने वाले मालवा-अंचल के दूसरे हिन्दीतर भाषी लघुकथाकार हैंराजेन्द्र काटदरे। उन्होंने समय-समय पर अनेक विचार-प्रधान लघुकथाएँ रची हैं। लघुकथा के प्रति उनके समर्पण-भाव का ही परिणाम है कि उन्होंने हिन्दी लघुकथा डॉट कॉम नाम से वेबसाइट शुरू की हुई है। पिछले दिनों उन्होंने अपने माता-पिता की स्मृति में लघुकथा-कथन का आयोजन भी किया था, जिसमें डॉ सतीश दुबे, सुरेश शर्मा, सूर्यकांत नागर और देवेन्द्र होलकर ने अपनी-अपनी लघुकथाओं का पाठ किया था। काटदरेजी की महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैंनशा, बचत, गुस्सा, चोरी और आतंकवादी। देवेन्द्र होलकर के नाम से याद आया कि मालवा-अंचल से वह तीसरे हिन्दीतर भाषी कथाकार हैं जो लघुकथाएँ लिखते रहते हैं। समाज सेवा, व्यापार, युक्ति और तरकीब उनकी उल्लेखनीय लघुकथाएँ हैं। वैसे, देवेन्द्र होलकर की ख्याति एक सजग पत्र-लेखक के रूप में भी है।
मोबाइल:09893810050
(शेष आगामी अंक में)

लघुकथाएँ
औकात
एन उन्नी
कबाड़ की माँग बढ़ रही है। कबाड़ की कीमत बढ़ रही है। कबाड़ से नए-नए सामान बनकर मण्डी पहुँच रहे हैं। कुल मिलाकर कबाड़ की इज्जत काफी बढ़ गई है।
इस ज्ञान के साथ घर का अति-सूक्ष्म निरीक्षण किया तो पाया कि कमरे कबाड़ से भरे पड़े हैं। एक-साथ दे नहीं सकते, क्योंकि कॉलोनी में एक ही कबाड़ी आता है। कबाड़ ले जाने के लिए उसके पास एक ही ठेला है। मैंने कबाड़ को इकट्ठा किया। भाव करके किश्तों में कई बार ठेला भर दिया। कबाड़ी की खुशी देखते ही बनती थी। आखिर में, जब घर खाली हुआ और मुझे खाने को दौड़ा, तो कबाड़ की अन्तिम किश्त के रूप में मैं स्वयं ठेलागाड़ी पर आसीन हो गया। मजाक समझकर कबाड़ी हँस दिया। कहने लगा, कबाड़ की कीमत आप जानते ही हैं और आप की भी। आप कृपया उतर जाइए।
मैं उतर गया और वह चला गया। उस निर्दयी कबाड़ी की चाल मैं चुपचाप देखता रहा। सोचता रहा किआखिर मेरी औकात क्या है?
सम्पर्क:09893004848

चालाकी
चैतन्य त्रिवेदी
साहूकार ने कहा, ब्याज में तुम्हारा खून पी जाऊँगा।
ठीक है, लेकिन एक शर्त पर! कर्जदार भी कम नहीं था।
कैसी शर्त?
जो खून पानी-पानी हो जाएगा…
ठीक है, उसे छोड़ दूँगा।
अन्त में साहूकार को थक-हार कर अपने मूल पर सन्तोष करना पड़ा।
सम्पर्क:0731-2794711

गन्दी दीवारें
देवेन्द्र गो होलकर
अंजना और मैं पक्की सहेलियाँ थीं। दोनों ने साथ-साथ स्नातक किया। स्नातक होते ही मेरे हाथ पीले कर दिए, परन्तु अंजना की पढ़ाई जारी रही। हफ्ते-दो हफ्ते में अंजना मेरे घर आ जाती थी, तब हम दोनों खूब बातें किया करते थे। समय व्यतीत होता गया। मैं दो बच्चों की माँ बन गई। अंजना जब भी मेरे घर आती, मेरे घर को व्यवस्थित करने की सलाह अवश्य देती। वह हमेशा कहती—“सुनीता, तुमने अपने बॉबी को सिर पर बैठा रखा है। देखो, उसने सारे कमरों की दीवारों पर पेंसिल से आड़ी-तिरछी लाइनें खींचकर उन्हें गन्दा कर रखा है।
अब मैं अंजना को कैसे समझाऊँ कि मेरी बड़ी लड़की टीनू जब भी अपना होमवर्क करने बैठती है, बॉबी भी कॉपी-पेंसिल की जिद करता है और वह कॉपी सहित दीवारों को आड़ी-तिरछी लाइनों से खराब कर देता है।
अंजना की शादी हो गई। वह अपने पति के साथ दूसरे शहर चली गई। पाँच वर्षों बाद ज्ञात हुआ कि अंजना के पति का तबादला भी इसी शहर में हो गया है। बहुत प्रसन्न्ता हुई कि चलो, अब दोनों सहेलियाँ एक ही शहर में रहेंगी।
शीघ्र ही अंजना मेरे घर आई तो हम दोनों प्रसन्नता से मिलीं। उसने पूर्ववत मेरे घर का मुआयना किया तो घर को व्यवस्थित पाया। दीवारों पर नया रंग चढ़ा दिया गया था। मैंने कहा,अंजू, अब घर ठीक है? दीवारें भी साफ-सुथरी हैं। अब हमारा बॉबी बड़ा हो गया है, अब वह दीवारें गन्दी नहीं करता। तुम सुनाओ, तुम्हारे कितने बच्चे हैं? मेरा प्रश्न सुनकर उसके चेहरे पर विषाद की रेखाएँ खिंच गईं। उसने ठण्डी साँस भरकर कहा—“सुनीता, अपनी किस्मत ऐसी कहाँ कि कोई घर की दीवारों को गन्दा करे! सुनीता, वास्तव में तुम्हारे घर की वे दीवारें कितनी सुखद अनुभूति देती थीं जो तुम्हारे लाड़ले बॉबी ने आड़ी-तिरछी लाइनों से चितर दी थीं। अब मेरी एक ही अभिलाषा हैकोई नन्हा मेरी गोद में आए, वह मेरे व्यवस्थित घर को अव्यवस्थित करे, दीवारों पर अपने नन्हें-नन्हें हाथों से आड़ी-तिरछी लाइनें खींचे!
अंजना के शब्द मेरे कानों में अभी भी गूँज रहे थेबच्चों वाला अव्यवस्थित घर बिन बच्चों वाले व्यवस्थित घर से कहीं ज्यादा अच्छा है।
सम्पर्क:0731-2484452

बचत
राजेन्द्र वामन काटदरे
जब बहुत देर ताक वो भिखारी मकान के सामने खड़ा हो एकाध रोटी के लिए मिन्नतें करता रहा तो मकान-मालिक गुस्से से फूट पड़ा—“अब आगे जाते हो या गालियाँ निकालूँ? साले काम-धाम को कहेंगे तो अभी नानी याद आ जाएगी। फोकट की रोटी चाहिए तुम लोगों को।
साबजी, कुछ काम हो तो बता दीजिए, कर दूँगा। भिखारी गिड़गिड़ाते हुए बोला, दो दिन से पेट में कुछ नहीं गया है।
चल, आँगन बुहार दे, एक रुपया दूँगा। मकान-मालिक बोला।
ठीक है बाबूजी। भिखारी ने हामी भरी।
तभी मकान-मालकिन बाहर आई और मकान-मालिक से गुरगुराते हुए बोली, आँगन-वाँगन साफ करवाने की कोई जरूरत ना है।
देखो, कितना गन्दा हो रहा है। सिर्फ…एक रुपए में… मकान-मालिक ने कुछ कहने की कोशिश की।
मकान-मालकिन आवाज धीमी करते हुए बोली, बड़े दानवीर कर्ण बन रहे हो! अरे जानते भी हो कि ऐसे ही लोग चोरी-चकारी करते हैं। दिन में काम के बहाने घर देख जातेअ हैं और रात में हाथ साफ कर जाते हैं। फिर कुछ सोचकर वो बोलीं, वैसे आँगन गन्दा तो हो ही रहा है…ये आशा भी दिनभर जाने क्या करती रहती है!
और उन्होंने रुपया बचाते हुए अपनी बहू को आवाज लगा दी।
सम्पर्क:0731-2592977

क्लीन-सिटी
सतीश राठी
उस सुबह नगर की सारी गन्दगी पर जैसे बर्फ की चादर पड़ गई थी। नागरिक अपने-अपने घरों में ऊँघते हुए पड़े थे। नगर के प्रथम नागरिक माननीय महापौर महोदय एक वातानुकूलित कार में, बाहर से आए हुए उस प्रतिनिधि-मण्डल को लेकर नगर-भ्रमण पर निकले थे, जिसे विभिन्न नगरों में से चयन कर, किसी एक नगर को क्लीन-सिटी का पुरस्कार देना था।
कार की खिड़कियों पर काले शीशे चढ़े हुए थे। गन्दी बस्तियों को पीछे छोड़ते हुए, कार उस प्राचीन महल के दरवाजे पर आकर रुकी जहाँ कभी प्राचीन राजवंश के महाराजा रहा करते थे। उस विशाल महल में लकड़ी के घूमते फर्श पर लगी विशाल डाइनिंग टेबल पर प्रतिनिधि-मण्डल के लिए शाही लंच की व्यवस्था थी। लंच के बाद प्रतिनिधि-मण्डल विशेष रूप से सजाई गई सड़कों से बन्द कार में गुजर गया। नदी, जो एक बदबूदार नाले में बदल चुकी थी, उसके पास के मार्ग से उन्हें ले जाया गया। कालोनियों में मल से भरी नालियाँ, स्वच्छंद विचरण करते सुअर, नल से वितरित होने वाला कीड़े-युक्त पानी और धुएँ से प्रदूषित होती हवा वाले क्षेत्रों से उन्हें बचाया गया।
रात्रि को शाही रेस्ट-हाउस में बातें हुईं। बोतलें खुलीं। सूटकेसों के आदान-प्रदान हुए। अगले दिन के समाचार-पत्रों में उस नगर के क्लीन-सिटी का पुरस्कार जीतने की घोषणा कर दी गई।
समाचार पढ़कर जिन मकानों के नालों में बदबूदार गटरों से गुजरकर कीड़े-युक्त पानी बूँद-बूँद टपक रहा था, उनके रहवासियों ने चिकौटी काट-काट कर अपने शरीर की चमड़ी लाल कर ली कि कहीं वे स्वप्न तो नहीं देख रहे!
लेकिन, जिन लोगों की चमड़ी मोटी और रक्त का रंग सफेद हो चुका था, वे सब उन ऊँघते हुए नगरवासियों को बधाई देते हुए जश्न मना रहे थे।
सम्पर्क:09893164272

चौकीदार
संतोष सुपेकर
मैं सामने के मकान में, हाल ही में रहने आए उस वृद्ध को रोज देखता हूँ। खाँसता, कराहता वह कमजोर-सा व्यक्ति, अलस्सुबह से देर रात तक, न केवल एक कुर्सी डाले घर के बाहर ही बैठा रहता है; बल्कि कई बार तो खाना भी बाहर ही बैठकर खाता है। उसके परिवार में उसके अलावा, जवान नौकरीपेशा बेटा और नवविवाहिता बहू के सिवा कोई और दिखता नहीं है।
एक दिन मैंने पूछा,बाबा, पहले आप क्या करते थे? मतलब, नौकरी…धन्धा…?
बेटा, पहले भी मैं चौकीदार ही था एक फैक्ट्री में।
पहले भी…क्या मतलब? क्या अभी भी आप…?
बेटा, मेरी बात काटता वह बोला, पहले आठ घंटे ही करता था, अब पन्द्रह-सोलह घंटे की चौकीदारी करता हूँ। दिनभर बहू घर में अकेली होती है, इसलिए…और शाम को बेटा आने के बाद, वे दोनों चार-पाँच घंटे घूमने जाते हैं, इसलिए!
सम्पर्क:09302237914

मूल्यों के लिए
नर्मदाप्रसाद उपाध्याय
वे बेहद मोटे थे। इतने कि चला भी नहीं जाता था। वे चलते नहीं, लुढ़कते थे। उन्हें चलते देखकर लगता जैसे किसी गोल-मटोल तकिए के पाँव लगे हों। वे बोलते तो उनका बोलना समझ नहीं आता और जनता बोलती तो उन्हें सुनाई नहीं देता। उनके पास सारी ज्ञानेन्द्रियाँ थीं, लेकिन ऐसी जैसे किसी मिट्टी की मूरत पर कान और नाक चिपका दिए गए हों। मगर उनका बहुत सम्मान था। जनता के लिए वे श्रद्धेय थे, पूजनीय थे, वन्दनीय थे।
वे मूल्यों के लिए जीवित थे।
उसी शहर में एक ऐसा जीव भी था, जिसे गलती से इन्सान मान लिया गया था। उसके पास पहनने को कपड़े नहीं थे। खाने को अनाज नहीं था। उसे सुनने के लिए जनता नहीं थी। दीनता अपने चरम को छूती थी उसके व्यक्तित्व में।
वह मूल्यों के लिए मर रहा था।
सम्पर्क:0731-2363449