Wednesday 27 April 2011

कालीचरण प्रेमी की तीन लघुकथाएँ

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॥1॥ पैदाइशी दीवार
फोटो:आदित्य अग्रवाल
ठाकुर साहब के घर औरतों का जमघट था।  ढोलकी की थाप पर लोकगीत गूँज रहे थे। ठाकुर साहब के घर में पहली बार लड़का पैदा हुआ था। अत: हर तरफ हर्षोल्लास का आलम था। पास ही से गुजरती गंगादेई ने यह-सब देखा तो चौखट के अन्दर धँसते हुए पूछा—“अरी चमेली! क्या हुआ है री ठकुराइन को?
फोटो:आदित्य अग्रवाल
अरी कुँअर साहब आए हैं, चमेली खिलकर बोली,बोत सोणी सकल-सूरत है…बिल्कुल ठाकुर साहब पर गए हैं…सपूत हैं एकदम सपूत…
सहसा गंगादेई को ध्यान आया।
अरी, और कुछ सुना है…हरिया चमार की बहू के छोरा पैदा हुआ है या छोरी?
होता क्या, कलुआ हुआ है, हाथ नचाते हुए चमेली बोली,उस करमजले के मारे हरिया फूला फिर रहा है।
अब वे दोनों नाक सिकोड़ने लगी थीं।     
(रूपसिंह चन्देल द्वारा संपादित लघुकथा-संकलन प्रकारांतर(1991) से)

'प्रेमी' हृदय ही बने रहे ‘काली’चरण नहीं बन पाए वह/बलराम अग्रवाल

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मौत को धता बताते हुए कैंसर वार्ड में भी लिखते-पढ़ते रहे प्रेमी जी फोटो:बलराम अग्रवाल
15 जुलाई, 1962 को गाजियाबाद(उ॰प्र॰) के गाँव मोरटा के एक निर्धन दलित परिवार में जन्मे कालीचरण ने बेरोजगारी के दिनों में, सम्भवत: बी॰ए॰ पास करने के तुरन्त बाद सन् 1978 में क्रेडिट एंड थ्रिफ्ट किस्म की किसी प्राइवेट कम्पनी में ज्वाइन कर लिया था। उक्त कम्पनी ने उन्हें अपने बुलन्दशहर कार्यालय का प्रभारी बनाया। वस्तुत: तो कार्यालय नामधारी छोटी-सी वह अंधेरी कोठरी ही उनकी शरणस्थली भी थी। सिवा इस तसल्ली के कि वह नौकरी पा गये थे, कोई अन्य सुख बुलन्दशहर में रहते हुए उन्हें नहीं था। यह नौकरी उन्हें कुछ ही माह खपा पाई, बहुत जल्द छूट गई। स्वभाव से कालीचरण अपने अन्तस तक मृदुल थे और सम्भवत: इसी कारण अपना उपनाम उन्होंने प्रेमी चुना जो उनकी प्रकृति से शतश: मेल खाता था। मैं उन दिनों प्रधान डाकघर, बुलन्दशहर में कार्यरत था। कालीचरण ने किसी दिन शायद वहीं पर मुझसे भेंट की और अपना परिचय दिया। मुझे लगता है कि उन्हीं दिनों उन्होंने लघुकथाएँ लिखना भी प्रारम्भ कर दिया था। ऐसा मैं इसलिए कह सकता हूँ कि उनकी एक प्रारम्भिक लघुकथा पर मैंने भीष्म साहनी की एक कहानी मेड इन इटली की छाया महसूस की थी। मेरे यह बताने का मन्तव्य न समझकर जगदीश कश्यप ने मिनीयुग के किसी अंक में उनका जिक्र इसी आधार पर चोर लेखक के रूप में कर दिया था। बाद में, बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि यह किस्सा बी॰ ए॰ की कक्षा लेते हुए उनके अध्यापक डॉ॰ कुँअर बेचैन ने किसी दिन सुनाया था जिसे उन्होंने लघुकथा का रूप देकर एक पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेज दिया, उन्हें इस किस्से की वास्तविकता का पता नहीं था। कालीचरण प्रेमी की स्पष्टवादिता और स्वीकारोक्ति का यह एक ही प्रसंग नहीं है, अनेक अन्य भी हैं।