Wednesday 27 April 2011

'प्रेमी' हृदय ही बने रहे ‘काली’चरण नहीं बन पाए वह/बलराम अग्रवाल

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मौत को धता बताते हुए कैंसर वार्ड में भी लिखते-पढ़ते रहे प्रेमी जी फोटो:बलराम अग्रवाल
15 जुलाई, 1962 को गाजियाबाद(उ॰प्र॰) के गाँव मोरटा के एक निर्धन दलित परिवार में जन्मे कालीचरण ने बेरोजगारी के दिनों में, सम्भवत: बी॰ए॰ पास करने के तुरन्त बाद सन् 1978 में क्रेडिट एंड थ्रिफ्ट किस्म की किसी प्राइवेट कम्पनी में ज्वाइन कर लिया था। उक्त कम्पनी ने उन्हें अपने बुलन्दशहर कार्यालय का प्रभारी बनाया। वस्तुत: तो कार्यालय नामधारी छोटी-सी वह अंधेरी कोठरी ही उनकी शरणस्थली भी थी। सिवा इस तसल्ली के कि वह नौकरी पा गये थे, कोई अन्य सुख बुलन्दशहर में रहते हुए उन्हें नहीं था। यह नौकरी उन्हें कुछ ही माह खपा पाई, बहुत जल्द छूट गई। स्वभाव से कालीचरण अपने अन्तस तक मृदुल थे और सम्भवत: इसी कारण अपना उपनाम उन्होंने प्रेमी चुना जो उनकी प्रकृति से शतश: मेल खाता था। मैं उन दिनों प्रधान डाकघर, बुलन्दशहर में कार्यरत था। कालीचरण ने किसी दिन शायद वहीं पर मुझसे भेंट की और अपना परिचय दिया। मुझे लगता है कि उन्हीं दिनों उन्होंने लघुकथाएँ लिखना भी प्रारम्भ कर दिया था। ऐसा मैं इसलिए कह सकता हूँ कि उनकी एक प्रारम्भिक लघुकथा पर मैंने भीष्म साहनी की एक कहानी मेड इन इटली की छाया महसूस की थी। मेरे यह बताने का मन्तव्य न समझकर जगदीश कश्यप ने मिनीयुग के किसी अंक में उनका जिक्र इसी आधार पर चोर लेखक के रूप में कर दिया था। बाद में, बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि यह किस्सा बी॰ ए॰ की कक्षा लेते हुए उनके अध्यापक डॉ॰ कुँअर बेचैन ने किसी दिन सुनाया था जिसे उन्होंने लघुकथा का रूप देकर एक पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेज दिया, उन्हें इस किस्से की वास्तविकता का पता नहीं था। कालीचरण प्रेमी की स्पष्टवादिता और स्वीकारोक्ति का यह एक ही प्रसंग नहीं है, अनेक अन्य भी हैं।

जीवन में अध्ययन को प्रमुखता देने वाले कालीचरण ने घोर आर्थिक विपन्नता के बावजूद एम॰ए॰(हिंदी) की पढ़ाई पूरी की और उसके उपरान्त तत्कालीन मेरठ विश्वविद्यालय(वर्तमान चौधरी चरण सिंह विश्वविद्याल, मेरठ) से हिंदी लघुकथा पर केन्द्रित किसी विषय पर शोध हेतु पंजीकरण भी कराया था, लेकिन निर्धनता के कारण अपने शोध-कार्य को वे न तो कभी शुरू कर पाये और न पूरा ही कर पाये। आम निर्धन परिवार की तरह उनका पारिवारिक परिवेश भी सम्भवत: शैक्षिक मूल्यों वाला कम, आर्थिक आधार की तलाश वाला अधिक रहा। स्व-अस्तित्व को बचाने का चिन्तन निर्धन समाज में आर्थिक आधार को मजबूत करने से ही शुरू होता है, मानसिक या बौद्धिक आधार को मजबूत करने से नहीं। भूखे आदमी की पहली जरूरत नि:संदेह रोटी रहती है। अन्य सारी जरूरतें दूसरे, तीसरे पायदान की बातें हैं। शायद इसी सिद्धांत के मद्देनजर, कालीचरण का पी-एच॰ डी॰ की ओर उन्मुख होना परिजनों के लिए मनोविलास से अधिक कुछ नहीं था। आर्थिक विपन्नता से निपटने के लिए कालीचरण ने तब अपने पारिवारिक एवं ग्रामीण परिवेश की समझ में आ सकने वाली शिक्षा की ओर कदम बढ़ाए और बी॰एड॰ किया। लेकिन नौकरी पाने की दिशा में यह राह उन दिनों भी आसान तो थी नहीं। अध्यापक बनने हेतु उन्होंने काफी धक्के खाये, लेकिन बात कहीं बनीं नहीं क्योंकि उनके पास किसी भी विद्यालय-मैनेजमेंट को घूस देने के लिए पर्याप्त रकम नहीं थी और न ही कोई राजनीतिक पहुँच उनके या परिवार के पास थी। नौकरी हेतु संघर्ष के उन दिनों में सौभाग्य से, उनका चयन डाक-सहायक के तौर पर हो गया और नियुक्ति भी गाजियाबाद में ही मिल गई।
डाक-विभाग में कार्यरत कालीचरण प्रेमी ने कैसे-कैसे आरोप झेले और कितने मानसिक व शारीरिक कष्ट झेले, यह इसी बात से स्पष्ट है कि समय-समय पर आ पड़ने वाले अवांछित संकटों ने पहले उन्हें तनावग्रस्तता जनित मधुमेह की ओर धकेला, फिर आर्थिक-अभाव की ओर। आसुरी सोच वाले एक अफसर(अधीक्षक डाकघर) ने तो उन्हें नौकरी से टर्मिनेट ही कर दिया, वह भी इस तथ्य को अनदेखा करके कि कुछ ही माह पूर्व उस अफसर का सीनियर(निदेशक डाकघर) कालीचरण को पदोन्नत कर चुका था। कालीचरण ने नि:संदेह अपूर्व जीवट का परिचय देते हुए उक्त टर्मिनेशन आदेश को उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में चुनौती दी। माननीय उच्च न्यायालय ने कालीचरण के टर्मिनेशन आदेश को असंवैधानिक करार दिया और पुन: उनकी बहाली के आदेश विभाग को दिये। सिंहगढ़ की विजय की तर्ज पर कहा जाय तो इस जीत से कालीचरण ने गढ़ तो पा लिया लेकिन उनके भीतर का सिंह ब्लड कैंसर का शिकार हो गया। तानाशाही वृत्ति के कुछेक अफसरों द्वारा अपनी अहंतुष्टि मात्र के लिए कालीचरण जैसे सरस्वती-पूजकों को काल के गाल में धकेल देने की अनेक घटनाएँ देख-सुन लेने के कारण ही मेरा यह अटल विश्वास है कि आसुरी सोच वाले लोग आत्मा नाम के अवयव से हीन होते हैं इसीलिए अपनी हार पर वे शर्मिंदा कभी नहीं होते बल्कि दूसरे के विनाश पर खिल-खिल पड़ते हैं। अपने द्वारा किए जाने वाले समस्त अत्याचारों को वे  कर्म की परिभाषा के अन्तर्गत रखते हैं। कालीचरण को काल के गाल में धकेल देने वाला वह असुर यद्यपि काफी समय पहले पृथ्वी से उठ गया, लेकिन उस-जैसे अन्य अनेक अभी भी हैं और आगे भी रहेंगे। दुष्कर्म क्या है और सत्कर्म क्यायह जानने की उन्हें लेशमात्र भी जरूरत नहीं है। कालीचरण और उसके परिजनों को जीने हेतु जितने सुख की जरूरत होती है, उस सुख कीमत पर वे अपनी खाल बचाने के उद्यम में लगे हैं, लगे रहेंगे। कितने ही कालीचरण और उनके परिजन इसी प्रकार अत्याचार झेलते रहने को विवश होते रहेंगे। आसुरी-व्यवस्था ने इस बार उसे उच्च न्यायालय की शरण में जाने देने जैसा आत्मघाती कदम न उठाकर उसके इलाज हेतु मेडिकल-एडवांस की फाइल को यहाँ-वहाँ घुमाते रहने का क्रूर तरीका अपनाया। विभाग से आर्थिक सहायता मिलने की आशा में कालीचरण हताश-निराश-सा शान्ति मुकुन्द मेडिकल सेंटर, दिल्ली के आई॰सीयू॰ और कैंसर-वार्ड के बीच लगभग 30दिनों तक चकराता रहने के बाद पूरी तरह टूटकर कोमा में चले गये। मेडिकल सेंटर में उनका इलाज कर रहे डॉक्टरों ने यह बताते हुए कि कालीचरण अब और संघर्ष की हालत में नहीं है, उनके परिजनों को सलाह दी कि वे घर पर रखकर ही उनकी सेवा करें। 33दिन लम्बी मानसिक पीड़ा झेलते रहने के उपरान्त कालीचरण की साँसों ने अन्तत: हार मान ली और 24-25 अप्रैल, 2011 की रात 01 बजकर 40 मिनट पर अनन्त में विलीन हो गईं।
लेखक के तौर पर कालीचरण प्रेमी ने मुख्यत: लघुकथा को ही अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया था। गाजियाबाद के अनेक पत्रों के वह साहित्य संपादक रहे और उनमें स्तरीय लघुकथाओं को स्थान देने का लगातार प्रयत्न करते रहे। उनकी लघुकथाओं का पहला संग्रह कीलें सन् 2002 में आया था तथा दूसरा लघुकथा संग्रह तवा जिसे उन्होंने विश्वभर में कैंसर से जूझ रहे जाँबाजों को समर्पित करने की इच्छा मेरे सामने व्यक्त की थी, शीघ्र प्रकाश्य है। तवा के प्रकाशन हेतु आर्थिक सहायता सुलभ इंटरनेशनल ने प्रदान की है। मैं समझता हूँ कि तवा हिंदी कथा-साहित्य में चित्रित होने वाली उस भारतीय जीवन-परम्परा का प्रतीक है जो मिट्टी और सांवेदनिक-मूल्यों से जुड़ी है। इस परम्परा की शुरुआत प्रेमचंद ने की, अपनी कहानी ईदगाह के बाल-पात्र हामिद द्वारा अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदवाकर। उपन्यास में इसका निर्वाह कथाकार चित्रा मुद्गल ने आवां लिखकर किया; और संग्रह को तवा नाम देकर हिंदी लघुकथा को यह परम्परा कालीचरण प्रेमी ने दी है। सन् 2010 में प्रकाशित उनके द्वारा संपादित लघुकथा संकलन अंधा मोड़ भी खासा चर्चित रहा है। (संदर्भ हेतु लिंक करें—http://jangatha.blogspot.com  दिसम्बर 2010 अंक)

10 comments:

राजेश उत्‍साही said...

प्रेमी जी को आपकी कलम से इस तरह याद करना उनके प्रति श्रदांजलि जैसा ही है। असल में यह हर आम भारतीय की कथा है। वे उसका ही प्रतिनिधित्‍व कर रहे हैं।

सहज साहित्य said...

कालीचरण प्रेमी जैसे निष्ठावान् व्यक्तियों को सरकारी तानाशाह ऐसे ही निगलते आए हैं और निगलते रहेंगे जब तक क्रूर व्यवस्था के पोषकों पर कार्य्वाही नहीं की जाती । उनकी फ़ाइल का महीने भर भटकना जिन निकम्मे लोगों के कारण हुआ , उन्हें इस मृत्यु का जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए ।

बलराम अग्रवाल said...

NANDLAL BHARATI
to me
show details 11:36 AM (36 minutes ago)
प्रकाशनार्थ------
हत्या-लघुकथा ...
आखिरकार कम उम्र में स्वर्ग सिधार गए, विभागीय मेडिकल सहायता राशि के इन्तजार में .
मेडिकल सहायता राशि कि इन्तजार में...........?
हां ....बेचारे गरीब परिवार से थे. ब्लड कैंसर से पीड़ित थे. अस्पताल के पलंग पर मृत्यु से संघर्षरत थे. मेडिकल सहायता की फाइल दिल्ली से गाजियाबाद के जाम में महीनों से फंसी थी. डाक विभाग की यह लापरवाही एक नवजवान कलमकार को लील गयी.
कौन थे...................?
मानवतावादी रचनाकार श्री कालीचरण प्रेमी.....
प्राकृतिक मौत नहीं यह असामयिक ह्त्या है ....नन्द लाल भारती... २८.०४.२०११

सुनील गज्जाणी said...

नमस्कार !
प्रेमी साब को जाना बेहद अच्छा लगा , आग में ताप के ही कुंदन बनता है जो प्रेमी साब नेदिखाया भी , हर कोई अपने पीछे कोई ना कोई धरोहर छोड़ जाता है किसी ना किसी रूप में ' श्रेदेय पेर्मी साब ने अपना दिल जीत लेने वाला व्यक्तीतव और अद्भुत साहित्य छोड़ कर गए है जिस से वे सदा हम सब के बीच ज़िंदा रहेगे , बल राम सर आप का भी आभार जो जो बिरले व्यक्तित्व के दर्शन करवाया !
सादर

भारतेंदु मिश्र said...

ऐसी सच्ची श्रद्धांजलि आप ही दे सकते थे। प्रेमी जी को याद किया जाता रहेगा।

Anonymous said...

इन लघु कथाओं से ही प्रेमीजी की विलक्षण प्रतिभा के दर्शन होते हैं...कलम का धनी अभाव में जीकर भी पारस की तरह साहित्य के पटल पर अपनी चमक छोड देता है.

Surendra Arora said...

Although destiny has given its decision and it was on cards , even then it is hard to believe that Kalicharan has lost its bodiely identity and we are bound to say that Kalicharan is LATE....However he can not be rubbed from our memories.
Kalicharan was not only a SHASHAKT Laghukathar , for me he was a represntative of that comman man, who does not speaks big words but does big deeds through his works without any egoistic attitude and expecting any reward.
He did a lot for his family and friends and was the chief connecting link between them even during his hardest days of life , when he was trapped by emotionless criminal burocracy.
He was available to everyone at the time of need( DUKH ) without any reward or expectation .
He always said that Hindi Sahitya has given him great strenth during his odds. He had very good collection of book and he loved those books a lot.
I was fortunate haing regular touch with him during his utmost period of crices but I was amezed to see tha I did not find him broken exept during his last one week , when he found his file for medical treatment ,not being cleared by his department .
I have a lot to speak for him ....a comman neglected representative of Free India.

With Pray To Allmighty to Give him peace in his arms.

Surendra Arora

बलराम अग्रवाल said...

Roop Singh Chandel
to me

show details 8:28 PM (18 hours ago)

भाई बलराम,
मैंने लंबी टिप्पणी छोंड़ी लेकिन उसका क्या हुआ मुझे नहीं मालूम.
फिर से लिख रहा हूं. कालीचरण प्रेमी पर तुम्हारा संस्मरण पढ़कर उनके जीवन के उन मार्मिक पहुलुओं को जानने का अवसर मिला जिनके बारे में मुझे जानकारी नहीं थी. वह एक अच्छे लघुकथाकार थे, यही जानता था और इसी आधार पर मेरा उनसे परिचय हुआ था. जगदीश कश्यप भी एक अच्छे लघुकथाकार थे, लेकिन दुर्भाग्य से वह अपने को विधा का मसीहा मानने लगे थे. उन्होंने जितना कष्ट प्रेमी को पहुंचाया होगा उससे अधिक उनके विभाग के अफसरों ने पहुंचाया. उन्होंने तो उनकी जिन्दगी ही लील ली, जिसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है. तुम्हारे ब्लॉग के अतिरिक्त प्रेमी के जाने का समाचार कहीं प्रकाशित न होना यह प्रदर्शित करता है कि यहां कार्पोरेट किश्म साहित्यकारों के अलावा किसी की पूछ नहीं.
रूपसिंह चन्देल
०९८१०८३०९५७

उमेश महादोषी said...

प्रेमी जी से मेरा परिचय कुछ माह पहले ही अविराम के पुनर्प्रकाशन के बाद हुआ था। इसी बीच संभवत: 'कथा संसार' के एक पुराने अंक जो स्वर्गीय जगदीश कश्यप जी पर केन्द्रित था, में जगदीश जी पर ही उनका एक लेख पड़ने को मिला। वह लेख यद्यपि जगदीश जी पर था, पर उससे प्रेमी जी के व्यापक और संतुलित द्रष्टिकोण को समझना मेरे लिए ज्यादा दिलचस्प था। मित्रों के प्रति उनकी सद्भावना और लगाव अत्यंत गहरा होता था। विभाग के साथ उन्हें जो संघर्ष करना पड़ा, वह विभागीय अधिकारियों की निर्दयता की कहानी तो कहता ही है, उनके जुझारूपन की दास्ताँ भी बयां करता है। काश! अपनी बीमारी से जूझकर कुछ वर्षों के लिए भी वह दुबारा ऑफिस ज्वाइन कर पाए होते। तब शायद वह अपने अधिकारियों को कोयी ऐसा सबक सिखा जाते कि अधिकारियों ने जो उनके साथ किया वह दूसरे कर्मचारियों के साथ करने का दुस्साहस न कर पाते।

subhash chander said...

padhkar aankhe bhar aayeen.shukriya.srijangatha me maine news de di thi .