Monday 21 March 2011

लघुकथा में समसामयिक चिंतन को आयाम देते संग्रह व संकलन

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दोस्तो, पश्चिम बंगाल के सलुवा जिले से प्रकाशित होने वाले हिंदी मासिक पत्र नई दिशा ने मार्च 2011 के अंक67 को अपने पहले लघुकथा-अंक के रूप में प्रकाशित किया है। साप्ताहिक आकार के 12 पृष्ठीय इस पत्र में देशभर के 25 कथाकारों की 30 लघुकथाएँ और लघुकथा:इतिहास के झरोखे से शीर्षक एक लेख को स्थान दिया गया है। लघुकथाओं में बेचैनी(हीरालाल मिश्र), अमानुषता(विकास रोहिल्ला प्रीत), सुसमाचार(माला वर्मा), तूतारी(मुरलीधर वैष्णव), कोख का जाया, सम्बन्ध(डॉ॰ सुधाकर आशावादी), रसीद(प्रभात दुबे), जिंदा मछली(डॉ॰ पंकज साहा), झूठी हँसी(महेन्द्र महतो), चिरंजीवी(खदीजा खान), हाजिरी(अनिल शर्मा अनिल’), हाड़-मांस की सीढ़ी(आनंद बिल्थरे) को उल्लेखनीय  माना जा सकता है।

कथाकार कमल चोपड़ा द्वारा संपादित वार्षिकी संरचना का तीसरा अंक आया है। इसमें कमल चोपड़ा, भगीरथ, बलराम अग्रवाल, सिद्धेश्वर, राज हीरामन, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’, रामकुमार घोटड़ तथा अमरनाथ चौधरी अब्ज के लघुकथा विषयक लेख, 87 कथाकारों की 108 लघुकथाएँ तथा उल्लेखनीय शीर्ष के अन्तर्गत 18 लघुकथा संग्रहों व संकलनों की सूची प्रकाशित हैं। इस अंक की लघुकथाओं में अनेक ऐसी हैं जिन्हें कथ्य की दृष्टि से कई दशक पहले की माना जा सकता है। वस्तुत: संपादक विवश रहता है कि उसे साल भर में प्रकाशित-अप्रकाशित प्राप्त लघुकथाओं के बीच से ही कुछ बेहतर चुनना पड़ता है। यह कथाकारों का दायित्व है कि वे लघुकथा में अनेक बार अपनाए जा चुके कथ्यों से बचें और नए कथ्य प्रदान करें। फिर भी, अनेक लघुकथाओं का समसामयिक चिंतन से जुड़ा होना आश्वस्त करता है।
हरियाणा साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका हरिगंधा का दिसम्बर 2010-जनवरी 2011 संयुक्तांक लघुकथा विशेषांक है। इस विशेषांक के अतिथि संपादक वरिष्ठ लघुकथाकार व आलोचक अशोक भाटिया हैं जिन्होंने मुख्य संपादक डॉ॰ मुक्ता व संपादक नीलम सिंगला को स्तरीय लघुकथा सामग्री उपलब्ध कराई है। इस विशेषांक में लघुकथा के विभिन्न पक्षों पर 20 लेख, 15 लघुकथा संग्रहों-संकलनों की समीक्षाएँ तथा विदेशी, हिंदी व हिंदीतर भारतीय भाषाओं के 172 कथाकारों की 300 से ऊपर लघुकथाएँ संकलित हैं। इतनी रचनाओं के चुनाव में अपेक्षित सावधानी का बरता जाना आसान काम नहीं है। सम्भवत: इसीलिए कुछ कमजोर रचनाओं का समावेश भी इस विशेषांक में हुआ है। नि:संदेह कुछ उल्लेखनीय कथाकार इसमें सम्मिलित होने से छूट भी गये हो सकते हैं। उक्त अंक को पुस्तक रूप में प्रकाशित करने की योजना बनाकर हरियाणा साहित्य अकादमी को इन दोनों ही कमियों से निजात पाने का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।
इनके अतिरिक्त पारिवारिक दृष्टि से मराठी पृष्ठभूमि के इन्दौर निवासी दो युवा कथाकारों के लघुकथा संग्रह भी प्राप्त हुए हैं। इनमें पहला है, राजेन्द्र वामन काटदरे का अंधेरे के खिलाफ तथा दूसरा, मनोज सेवलकर का मकड़जालअंधेरे के खिलाफ के पृष्ठों को इन्दौर के ही सुप्रसिद्ध चित्रकार संदीप राशिनकर के रेखांकनों ने आकर्षक बना दिया है। मेरे अनुसार, राजेन्द्र वामन काटदरे को इस बात की ओर ध्यान देने की अधिक अवश्यकता है कि वे नेरेटिव कम रहें। कथा को पात्रों के क्रिया-कलापों, संवादों आदि के द्वारा पूर्णता प्रदान करने की चेष्टा अधिक करें। कुछेक लघुकथाएँ शीघ्र समेटी-सी लगती हैं। स्वाभाविक रूप से समापन की ओर बढ़ने देना उन्हें स्तरीय बनाया जा  सकता था। कुछ लघुकथाओं के शीर्षक भी काटदरे की लापरवाही का शिकार हुए लगते हैं। संग्रह में मन की बात’, खेल’, बचत जैसी समसामयिक चिंतन से जुड़ी अनेक स्तरीय लघुकथाएँ हैं जिनसे कथाकार के गम्भीर चिंतन-पक्ष और कथा-धैर्य का परिचय मिलता है और उम्मीद बनती है कि वे अपनी ही लघुकथाओं के परिप्रेक्ष्य में खुद के लेखन को सँवार लेंगे।
मकड़जाल में 51 लघुकथाएँ संग्रहीत हैं। इसके कथाकार मनोज सेवलकर कथ्य-प्रस्तुति के मामले में काफी चौकन्ने नजर आते हैं। कुछेक रचनाओं को छोड़कर, उनके पास लगता है कि कहने को बहुत कुछ ऐसा है जो लघुकथा को पारम्परिक कथ्य-भंगिमा से मुक्ति दिलाकर समसामयिक चिंतन और आवश्यकताओं से जोड़ने में सक्षम है। बच्चे के व्यक्तित्व विकास में माँ की सकारात्मक भूमिका का क्या अर्थ है, इस बात को उनकी लघुकथा गली का शेर अपनी सम्पूर्णता में व्यक्त करती है। उनकी लकीरें जैसी लघुकथा पूरी तरह चौंकाती है और आश्वस्त करती है कि मालवा अंचल से एक सशक्त लघुकथाकार उभर आ रहा है। 
इन्दौर के ही वरिष्ठ कहानीकार व लघुकथाकार श्रीयुत सुरेश शर्मा के संपादन में वर्तमान समय के एक ऐसे विषय पर केन्द्रित लघुकथा संकलन प्रकाश में आया है जिसकी ओर समकालीन साहित्यकारों का ध्यान लगभग नहीं है। यह विषय है--बुजुर्ग जीवन। साहित्य की चिन्ता के केन्द्र में आज स्त्री और दलित तो प्रमुखता के साथ हैं, बच्चे और बूढ़े नहीं। सुरेश शर्मा के संपादन में प्रकाशित लघुकथा संकलन का लोकार्पण गत 12 मार्च 2011 को इन्दौर में हुआ। इस कार्यक्रम में प्रबुद्ध साहित्यकार सूर्यकांत नागर मुख्य अतिथि, प्रो॰ शैलेन्द्र कुमार शर्मा चर्चाकार तथा बलराम अग्रवाल अध्यक्ष थे। 'बुजुर्ग जीवन की लघुकथाएँ' में उम्रदराज लोगों के जीवन से जुड़ी विभिन्न पक्षों को व्यक्त करती लघुकथाएँ संकलित हैं जो समग्रता के साथ समाज में उनकी स्थिति और आवश्यकता को प्रस्तुत करती हैं। 
1॰ 'सलुवा नई दिशा'(मार्च 2011): सं॰:गोपाल नेवार, श्याम कुमार राई; संपर्क:कांथरा, पुरानी बस्ती, सलुवा-721145(प॰बंगाल), सहयोग राशि:रु॰ 50/- वार्षिक
2. संरचना-3(लघुकथा वार्षिकी 2010) ,संपादक:कमल चोपड़ा, प्रकाशक : संरचना, 1600/14, त्रिनगर, दिल्ली-110035 पृष्ठ संख्या: 208, वार्षिक:रुपये 60/-
3. हरिगंधा(लघुकथा विशेषांक, दिस॰2010-जन॰2011)मुख्य सं॰:डॉ॰ मुक्ता, अतिथि सं॰:अशोक भाटिया, हरियाणा साहित्य अकादमी, अकादमी भवन, पी-16, सेक्टर-14, पंचकूला-134113, पृष्ठ संख्या:224 बड़ा आकार, संयुक्तांक:तीस रुपए, वार्षिक : एक सौ पचास रुपए।
4. अन्धेरे के खिलाफ(लघुकथा संग्रह), कथाकार:राजेन्द्र वामन काटदरे, प्रकाशक:पड़ाव प्रकाशन, एच-3, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर, भोपाल-462008, प्र॰सं॰2011, पृ॰सं॰88, मूल्य:रु0 150/-
5. मकड़जाल(लघुकथा संग्रह), कथाकार:मनोज सेवलकर, प्रकाशक:लता साहित्य सदन, ई-10/666, उत्तरांचल कालोनी(निकट संगम सिनेमा), लोनी बॉर्डर, गाजियाबाद-201102, प्र॰सं॰2011, पृ॰सं॰72, मूल्य:रु॰ 180/-
6. बुजुर्ग जीवन की लघुकथाएँ(लघुकथा संकलन), सं॰ सुरेश शर्मा, प्रकाशक: समय प्रकाशन, आई-1/16,अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, प्र॰सं॰2011,पृष्ठ संख्या: 176 मूल्य:रु॰ 250/-

6 comments:

राजेश उत्‍साही said...

उपयोगी जानकारी। संरचना सुधा भार्गव जी के पास देखने को मिला था। कुछ लघुकथाएं पढ़ीं हैं। अच्‍छा निकला है।

PRAN SHARMA said...

IS BAAR BHEE UPYOGEE JANKAAREE
PAA KAR BAHUT ACHCHHAA LAGAA HAI .
ULLEKHNIY KARYA KE LIYE AAPKO
BADHAAEE .

दीपक 'मशाल' said...

Aapki itni mehnat ke baad sanjoi gain ye saari jaankaariyaan mere liye kitne kaam ki hain ye aap andaza laga sakte hain. har aalekh ek nai disha deta rahta hai ki laghukatha aaj ke sandarbh me kaise likhi jaaye aur pahle log inhen likhne me kya galtiyaan karte rahe. iske alawa prakaashakon ke baare me jaankaari milti hai so alag. :)

रूपसिंह चन्देल said...

धन्यवाद बलराम. इस प्रकार की सूचना प्रस्तुत कर तुमने हिन्दी लघुकथा प्रेमियों के लिए उल्लेखनीय कार्य किया है.

चन्देल

प्रदीप कांत said...

Hamesha ki tarah behad zaroori soochana

सुधाकल्प said...

कुछ लोग आगे बढ़ते हैं ,कुछ लोग आगे बढ़ते तो हैं पर दूसरों को साथ लेकर । उनमें से एक हैं --बलराम अग्रवाल जी । इसका गवाह हैं उनका वह लेख जिसमें लघुकथाओं के संकलनों व संग्रहों की विशद जानकारी दी गई है । लगता है मिनटों में कोसों की दूरी तय कर ली गई हो ।
सुधा भार्गव