Tuesday 9 December 2008

जनगाथा दिसम्बर, 2008


मध्यप्रदेश के मुख्यत: जिला इंदौर, उज्जैन, देवास, शाजापुर, रतलाम और राजगढ़ का क्षेत्र मालवा-अंचल कहलाता है। समूचा मालवा-अंचल अपनी सांस्कृतिक, साहित्यिक, कलात्मक और शैल्पिक उच्चता के कारण विश्वभर में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। लघुकथा के क्षेत्र में भी मालवा-अंचल के कथाकारों के अपना विशिष्ट योग दिया है, उसे स्तरीयता प्रदान की है। पिछ्ले दिनों इंदौर के कथाकार श्रीयुत सुरेश शर्मा के संपादन में मालवा-अंचल के कथाकारों की लघुकथाओं का संकलन ‘काली माटी’ प्रकाशित हुआ है, जिसमें शरद जोशी, निरंजन जमींदार, डॉ0 श्यामसुन्दर व्यास, डॉ0 सतीश दुबे, सूर्यकांत नागर, विक्रम सोनी, प्रभु जोशी, प्रतापसिंह सोढ़ी, सतीश राठी, एन0 उन्नी आदि मालवा-अंचल के कुल 57 कथाकारों की 140 से ऊपर लघुकथाएँ संकलित हैं। इस बार प्रस्तुत हैं ‘काली माटी’ में संकलित कुछ महिला कथाकारों की लघुकथाएँ। –बलराम अग्रवाल

समय के साथ चलते मालवांचल के लघुकथाकार
सूर्यकांत नागर

मालवा की शस्य-श्यामल भूमि अत्यन्त उर्वरा है। यहाँ गेहूँ, गन्ना, चना बहुतायत से उपजता है तो प्रतिभाएँ भी समान रूप से जन्म लेती हैं। एक समय था जब मालवा की शामें ठण्डी और रातें सुहावनी होती थीं। प्रकृति के साथ खिलवाड़ ने इस भू-भाग के मिजाज बदल दिए हैं। अब तो हालत यह है कि—‘रात गनीमत थी लोग कहते हैं, सुबह भी बदनाम हो रही है अब।’ मौसम के मिजाज भले ही बदल गए हों, मालवी व्यक्ति के संस्कार अभी भी पूरी तरह नहीं बदले हैं। बहुत कुछ बचा है, जिस पर गर्व किया जा सकता है। आज भी यहाँ मनुष्य के व्यवहार में नरमी और शालीनता है, आचरण में भद्रता है, उदारता है। संस्कृति की छाप हमें मालवी लोक-गीतों और लोक-कथाओं में स्पष्ट दिखाई देती है। यही क्रम हमें बाद की कथा-कहानियों में भी दृष्टिगत होता है। वस्तुत: अपने मूल-संस्कारों, वृत्तियों से मुक्त हो पाना आसान नहीं है। यही कारण है कि अंचल के साहित्यिक में यहाँ की माटी की सौंधी सुगंध मौजूद है। मानवीय मूल्य और पड़ौसी से प्रेम की गुहार आज भी यहाँ है। एक परिवार की बेटी पूरे गाँव की बेटी है। हाँ, समय के अनुसार सामाजिक जागरूकता का परिचय भी मालवावासियों ने दिया है और वे समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चले हैं।
आधुनिक संदर्भ में भले न हो, मालवा-क्षेत्र में लोक और बोध-कथाओं के रूप में लघुकथाओं का अस्तित्व रहा है। लघुकथा का आदि-ग्रंथ सन 1802-1803 में रचा गया। बताया जाता है कि ‘हिंदी स्टोरी टेलर’ में 108 लघुकथाएँ थीं। वर्ष 1894 में ‘बैताल पच्चीसी’ का प्रकाशन इंदौर से ही हुआ था। मालवी में भी लघुकथाएँ लिखी गईं। निरंजन जमींदार, बालमुकुंद गर्ग, सतीश दुबे, ललिता रावल आदि की मालवी लघुकथाएँ लोकप्रिय हुईं। अगस्त, 1945 के ‘वीणा’ के अंक में डा0 श्यामसुन्दर व्यास की लघुकथा ‘ध्वनि प्रतिध्वनि’ प्रकाशित हुई थी। उल्लेखनीय है कि उस समय व्यासजी की आयु मात्र अठारह वर्ष थी। तब से व्यासजी द्वारा लघुकथा-लेखन मृत्युपर्यंत जारी रहा। मालवा-क्षेत्र में लघुकथा को जीवित रखने में डा0 व्यास का विशेष योगदान रहा। उनकी लघुकथाएँ प्राय: प्रतीकात्मक होती हैं और उनमें व्यंग्य की एक अन्तरधारा की भाँति प्रवाहित होता रहता है। ‘काँकर- पाथर’ पुस्तक में उनकी 51 लघुकथाएँ हैं। व्यासजी की कुछ प्रमुख लघुकथाएँ हैं—गाल पर उभरे निशान, ठण्डी आग, आजाद प्रहरी, खूँटा और चारा आदि। व्यासजी के अनुसार,‘लघुकथा जीवन के महाकाव्य का एक छोटा-सा छन्द है।’ रामचन्द्र श्रीवास्तव ‘चन्द्र’ ने भी लघुकथाएँ लिखीं, जो ‘वीणा’ में प्रकाशित हुईं। सन 1928 में लिखी उनकी लघुकथा ‘बेबी’ काफी चर्चित रही। यह उल्लेख असंगत नहीं होगा कि पड़ोसी निमाड़ ने भी मालवा को लघुकथा-लेखन के लिए प्रेरित किया। स्व0 माखनलाल चतुर्वेदी की ‘बिल्ली और बुखार’, जिसे हिंदी की प्रथम लघुकथा कहा गया है तथा स्व0 रामनारायण उपाध्याय द्वारा लिखित और सन 1940 में ‘वीणा’ में प्रकाशित उनकी लघुकथाएँ ‘आटा’ और ‘सीमेंट’ इस कथन की पुष्टि करती हैं।
हिंदी लघुकथा-लेखन में नए दौर की शुरुआत तब हुई, जब कमलेश्वर ने ‘सारिका’ में लघुकथाओं का प्रकाशन प्रारम्भ किया। उस दौर में मुख्यत: व्यवस्था पर चोट करती व्यंग्य-प्रधान लघुकथाएँ लिखी जाती रहीं। लेकिन आठवें दशक के उत्तरार्द्ध में व्यंग्यात्मक सत्ता वाली लघुकथाओं के स्थान पर मानवीय संवेदना और मनोवैज्ञानिक धरातल वाली लघुकथाएँ लिखी जाने लगीं। सीधे व्यंग्य-युक्त कथाओं के स्थान पर करुणा-सिक्त व्यंग्य का प्रयोग होने लगा। यह जरूरी भी था, क्योंकि केवल राजनीतिक विसंगतियाँ ही सब-कुछ नहीं हैं। जीवन के विविध पक्षों को, जीवन के सत्य को और मानवीय मूल्यों को उकेरा जाना भी उतना ही जरूरी है। इस बदलाव की प्रतिध्वनि मालवा-क्षेत्र में भी और इंदौर में भी सुनाई देने लगी। इसका बीड़ा उठाया ‘वीणा’ ने तथा डा0 सतीश दुबे और विक्रम सोनी के संपादन में प्रकाशित ‘लघु आघात’ ने। वर्ष 1974 में ही सतीश दुबे की 34 लघुकथाओं का संग्रह ‘सिसकता उजास’ भी आ गया था। इनमें कुछ लघुकथाएँ अपेक्षाकृत लम्बी थीं, लेकिन वे लघुकथा के ढाँचे में ही समाहित थीं। दुबेजी को यह श्रेय भी प्राप्त है कि वर्ष 1978 में उन्होंने सर्वप्रथम मालवी में लघुकथा लिखी और सन 1981 में पहली बार उनकी लघुकथा का मंचन भी हुआ। उनकी प्रमुख लघुकथाएँ हैं—रीढ़, कम्प्रोमाइज, बरकत, वादा, शक आदि। इसके बाद नए विचार, नए विषय और नए शिल्प के साथ लघुकथाएँ आने लगीं, हालाँकि आधुनिक-लघुकथा का वह शैशव-काल ही था। घिसे-पिटे विषयों पर प्राय: सामान्य-सी लघुकथाएँ लिखी जा रही थीं, लेकिन पहला धमाका तब हुआ जब रतलाम से रमेश जैन और भगीरथ के संपादन में ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ प्रकाशित और चर्चित हुआ। इस संकलन की चर्चा आज भी सर्वत्र होती है। वर्ष 1976 में ‘वीणा’ के रजत जयन्ती अंक में कई नामधारी लेखकों की लघुकथाएँ छपीं। इसी वर्ष सतीश दुबे और सूर्यकांत नागर के संपादन में ‘प्रतिनिधि लघुकथाएँ’ नामक संकलन प्रकाशित हुआ जिसमें अधिकांश लेखक इंदौर और उसके आसपास के क्षेत्र के थे।
यह तथ्य कम महत्वपूर्ण नहीं है कि मालवा में जन्मे, बढ़े-पढ़े प्रख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी ने भी कुछ लघुकथाएँ लिखी थीं। उनकी लघुकथाओं में व्यंग्य एक ‘अण्डर-करण्ट’ की तरह रहता है। उनकी मैं भगीरथ हूँ, कुत्ता, चौथा बंदर आदि लघुकथाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वैसे लघुकथाएँ कहानीकार-चित्रकार प्रभु जोशी ने भी लिखीं, लेकिन जब बाद में उन्होंने कहानियाँ लिखना बंद कर दिया तो लघुकथाओं के लिए भी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी। ‘प्रजातंत्र’ उनकी यादगार लघुकथा है।
विक्रम सोनी, जो इन दिनों मौन हैं और लगता है जैसे सन्यासाश्रम में चले गये हैं, को आज भी गोष्ठियों, सेमिनारों और संकलनों में सम्मान के साथ याद किया जाता है। दरअसल, उनका योगदान है ही इतना महत्वपूर्ण। उन्होंने सन 1981 से प्रारम्भ आगामी सात वर्षों तक ‘लघु आघात’ का संपादन-प्रकाशन इंदौर से किया और लघुकथा के प्रचार-प्रसार में महती भूमिका निभाई। यही नहीं, उन्होंने मानचित्र(1983), छोटे-छोटे सबूत(1984), पत्थर से पत्थर तक, दरख्त तथा लावा(1987) जैसे अखिल भारतीय स्तर के लघुकथा-संकलनों का संपादन भी किया। ‘लघु आघात’ और ‘प्रतिनिधि लघुकथाएँ’ के माध्यम से जो एक नया नाम उभरा, वह है—वेद हिमांशु। वह आज भी लघुकथा के प्रति समर्पित हैं। उन्होंने राजेन्द्र निरन्तर को साथ लेकर ‘स्याह हाशिए’ लघुकथा-संकलन का संपादन किया। इसमें लगभग 50 क्षेत्रीय लघुकथाकारों की कथाएँ संकलित हैं। फिलवक्त वह शाजापुर में हैं।
दिसम्बर 1981 इसलिए याद किया जाएगा, क्योंकि इस माह में साहित्यिक पत्रिका ‘वीणा’ का लघुकथा विषेशांक प्रकाशित हुआ था, जिसमें अनेक प्रतिष्ठित एवं नवोदित लघुकथाकारों की लघुकथाएँ छपी थीं। इसमें जहाँ एक ओर विष्णु प्रभाकर, रामनारायण उपाध्याय, रमेश बतरा, कमल चोपड़ा, बलराम, कमलेश भारतीय, मनीषराय यादव जैसे प्रतिष्ठित एवं स्थापित रचनाकारों की लघुकथाएँ थीं, वहीं क्षेत्रीय-स्तर पर डा0 श्यामसुन्दर व्यास, राजेन्द्र कुमार शर्मा, चन्द्रशेखर दुबे, सुरेश शर्मा, निरंजन जमींदार, वसंत निरगुणे, वेद हिमांशु, महेश भंडारी, अर्जुन चौहान आदि की लघुकथाएँ भी शामिल थीं। लघुकथा-विधा के विविध पक्षों पर विचारोत्तेजक आलेख भी थे। इस दौरान धार के देवीप्रकाश हेमन्त ने भी कुछ अच्छी लघुकथाएँ लिखीं।
एक और लघुकथाकार, जिनके नामोल्लेख के बिना यह विवरण अधूरा ही माना जाएगा, वह हैं इंदौर के स्व0 राजेन्द्र कुमार शर्मा। गलत ट्रेन, बाँध, धन्धा, दो नम्बर आदि उनकी यादगार लघुकथाएँ हैं। ‘गलत ट्रेन’ लघुकथा की तारीफ तो कथाकार बलराम ने एकाधिक बार की है। राजेन्द्र कुमार ने ही ‘स्वदेश’ समाचार-पत्र में मालवा-क्षेत्र के अनेक लघुकथाकारों को लेकर लघुकथा-केन्द्रित एक परिशिष्ट निकाला था। राजेन्द्र की असामयिक मृत्यु लघुकथा-विधा की एक बड़ी क्षति है।… (शेष आगामी अंक में)


लघुकथाएँ


छोटा बच्चा
सीमा पाण्डे ‘सुशी’

रिमझिम फुहारें बरसना अभी बस बन्द ही हुई थीं। बगीचे के वृक्षों की पत्तियों पर बूँदें मोती की तरह अटकी हुई थीं। ठण्डी हवा के झोंके, चाय का प्याला, नजर उपन्यास पर तो कभी राह से गुजरने वाले इक्का-दुक्का लोगों पर ठहर जाती।
“ले लो…ऽ…बरसाती…ऽ…छोटे बच्चों की…ऽ…!” मीठी-सी हाँक सुनाई दी। जब देखा, तो चेहरे पर हँसी बिखर गई। बेचने वाला खुद ही एक छोटा-सा बच्चा था। नजरों से नजरें मिलीं और उसके कदम गेट तक आ गये।
“बरसाती चाहिए बच्चों की?” बिल्कुल मुसीबत से उबारने वाला अन्दाज।
“नहीं, जब घर में छोटा बच्चा ही नहीं है तो बरसाती का क्या उपयोग?”
“अच्छा…!” कदम पलटे।
सुनो! तुम क्यों नहीं ओढ़ लेते एक बरसाती? भीग रहे हो।” माथे पर छितरे बाल और चेहरे पर चमकते-लुढ़कते मोती देखकर रहा न गया।
“क्लऽऽच!” ‘बेकार में टाइम खोटी कर दिया’ जैसे कुछ भाव चेहरे पर थे और वातावरण में देर तक गूँजता रहा उसका यह प्रश्न—“मैं कोई छोटा बच्चा हूँ क्या?”

दवा में छिपा दर्द
मीरा जैन


एक हितैषी ने बारह वर्षीय ध्रुव को लगभग डाँटते हुए समझाने की कोशिश की—“क्यों रे धुरवा, लगता है तू कुछ ज्यादा ही समझदार हो गया है? बड़े लोगों की बराबरी करने में तुला है!! पहले अपने शरीर को देख, हड्डियों का ढाँचा हो रहा है। पेट और पीठ चिपककर एक हो गये हैं। खाने के लिए भरपेट भोजन नहीं है, फिर भी इस कड़कड़ाती ठण्ड में तू शायद दूसरों की देखा-देखी दौड़ लगाता है। इतना मत दौड़ा कर, नहीं तो सूख कर काँटा हो जाएगा। स्वस्थ रहने के चक्कर में तू बीमार भी पड़ सकता है, समझा?”
पहले तो ध्रुव चुप रहा, लेकिन हितैषी की समझाइश जब लम्बी होने लगी तब उसने हिचकिचाते हुए मुँह खोला—“बाबूजी, मैं स्वस्थ रहने के लिए ही दौड़ता हूँ, पर दूसरों की देखा-देखी नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से। रात की चौकीदारी करने के बाद सुबह पाँच बजे बापू जब घर आते हैं, तब मेरा ओढ़ना-बिछौना उनका हो जाता है। उस वक्त मेरे पास ठण्ड से बचने के लिए दौड़ने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं होता है।”
ध्रुव का स्पष्टीकरण सुन कुछ समय पूर्व हितैषी के चेहरे पर व्याप्त गर्वीलापन अब सिमटकर सिर से पर तक धारण ऊनी वस्त्रों में समाहित हो चुका था।

बाकी सब
प्रज्ञा पाठक

“चल यार! कॉलेज की छुट्टी होने वाली है। लड़कियाँ बाहर निकलेंगी, जरा मजा लेंगे।”
पहले की बात से दूसरा पूर्णत: सहमत था। कॉलेज पहुँचने पर पहले ने दूसरे की ओर तेजी से पलटकर कड़क स्वर में कहा—“बाकी सब तो ठीक है, मगर वह पीले रंग के सूट वाली मेरी बहन है, उसके आसपास भी मत फटकना।”
दूसरे ने भी उसी रुक्षता से पहले को अपनी बहन के प्रति सावधान किया। पुन: दोनों परस्पर सहमत हुए और बाकी सब पर अपना नैसर्गिक अधिकार मानकर मजा लेने में मशगूल हो गए।

ग्रह-शान्ति

चेतना भाटी

फिर वही चीख-पुकार, जैसीकि हमेशा रहती थी उस घर में। चिड़चिड़ापन, तनाव, गुस्सा, जलन, कुढ़न, प्रतिस्पर्धा, बदले की भावना एक-दूसरे से, घर के प्रत्येक सदस्य में।
अभी कुछ ही दिनों पहले बड़ा यज्ञ करवाया था ग्रह-शान्ति के लिए गृह-स्वामी ने और तीर्थ-स्थल पर जाकर भी करवाई थी ग्रह-शान्ति। और अब फिर वही स्थिति! ग्रह-कलह!!
दूर, अन्तरिक्ष में स्थित ग्रह हैरान थे—हमें तो शान्त किया जा रहा है, मगर इनका क्या?

भविष्यफल
लीला रूपायन

श्रीमती सहगल को पता नहीं, वहम था या उनकी दुर्बलता। उन्हें भविष्यफल जानने की बड़ी उत्सुकता रहती थी। कभी पेपर में भविष्यफल देखतीं, कभी किसी हस्तरेखा जानने वाले के पास चली जातीं या उसे घर पर ही बुलवा लेतीं। हर ज्योतिषी को पूरे परिवार की पत्रिका दिखाती रहतीं। उनकी इस आदत के कारण सारा घर परेशान था। पति समझाते—“भगवान का दिया क्या नहीं है हमारे पास। पैसा, इज्जत, अच्छी सन्तानें, घर की इतनी बड़ी कोठी, नौकर-चाकर; और क्या चाहिए तुम्हें? इतने आज्ञाकारी बच्चे पाकर भी जाने तुम और क्या जानना चाहती हो? मन में कोई बात हो तो मुझे बताओ, बच्चों को बताओ। खड़े-खड़े पूरी कर देंगे।”
बड़े भारी मन से वह पति को बतातीं—“कुछ खास नहीं जी, बस यही धड़का लगा रहता है, कहीं किसी बच्चे के साथ कोई अनहोनी न हो जाए। रोज-रोज पेपरों में पढ़-पढ़कर जान निकल जाती है। कहीं अपहरण हो गया, कहीं बलात्कार, कहीं एक्सीडेंट! परिवार में छोटे से लेकर बड़े बाहर आते-जाते रहते हैं। लड़कियाँ भी स्कूल कॉलेज जाती हैं, किसी के साथ कोई…!”
“तो क्या ये हस्तरेखा जानने वाले, जिन्हें बुलाकर घर में बिठा लेती हो, वे तुम्हारी हर समस्या को सुलझा देंगे?” पति की आवाज में गुस्सा होता है।
श्रीमती सहगल बड़ी निश्चितता से बताती,“हाँ जी, जो उपाय बताते हैं, उन्हें पूरा करने से ग्रह टल जाते हैं। देखो न, अपना बंटी पाठ करने से ठीक हो गया था। कैसे मन से पण्डित जी ने सारा पूजा-पाठ किया था।”
“और जो डॉक्टर ने इलाज किया था?”
“मानो या न मानो। ठीक तो पण्डित जी की पूजा से ही हुआ था। जब उठकर भागने लगा था, तब पूजा समाप्त की थी उसने।”
“कौन माथा फोड़े तुम्हारे स्त्री-हठ से।” पति के गुस्से का भी उन पर असर नहीं होता था।
एक दिन उनकी पोती सारा कॉलेज से आई तो देखकर दंग रह गई। दादी एक को नहीं, दो-दो को हाथ दिखा रही हैं। साथ में घर वालों की जन्म-पत्रिका भी लेकर बैठी हैं। वे दोनों, जो सूरत से गुण्डे-मवाली लग रहे थे, दादी को ग्रह-दशा बता-बता कर ठगे जा रहे थे।
“माँ जी, अपना ध्यान रखना…घर में कोई सदस्य आपको नुकसान पहुँचा सकता है।” एक ने कहा।
दूसरा बोला,“बोला न माँ जी, पैसा बुरी चीज है, पैसे की खातिर…।” बाकी बात उसने अधूरी छोड़ दी।
सारा सब-कुछ आराम से सुनती रही। फिर वह चुपके-से उठी और घासलेट की बोतल के साथ माचिस भी ले आई। उनके ऊपर घासलेट उँड़ेलकर बोली,“क्यों महाराज, आज अपना भविष्यफल देखकर नहीं निकले थे घर से कि आपकी मृत्यु एक कन्या के हाथों होने वाली है?” और उसने माचिस की तीली जला ली। दोनों भविष्यफल बताने वाले महाशय अपना झोला छोड़कर सिर पर पैर राखकर भाग गए। सारा की हिम्मत दादी की आँखों पर पड़ा परदा हटा दिया।


परिवर्तन
रेखा कारड़ा

“देखो बेटा, कल आपके प्रिंसीपल ने सबके सामने मम्मी और पापा को बेइज्जत किया या नहीं?” रोहित अपने आठ वर्षीय बेटे से कह रहा था।
“जी पापा!” अंकुर का सिर शर्म से झुक गया।
“जानते हो, उन्होंने यह धमकी दी है कि अगर इस साल तुम्हारा रिजल्ट अच्छा नहीं बना तो तुम्हें स्कूल से निकाल देंगे।”
“…”
“बेटे, हम आप पर कितना खर्च करते हैं, आपने कभी सोचा है?”
“…”
“सुबह नींद से उठकर आप रोजाना चाय पीते हैं…”
“…”
“…और नहीं तो एक रुपए की तो होगी!”
“…”
“फिर आप नाश्ता खाते हैं, उस पर कितने खर्च होते हैं?”
“…”
“उसके बाद दिन का खाना, स्कूल जाने-आने का टैक्सी का किराया, स्कूल की फीस, आवश्यक अध्ययन सामग्री, फिर शाम की चाय और रात का भोजन। इसके अलावा भी बेटे, हम अनगिनत खर्च तुम्हारे लिए करते हैं; जैसे, घुमाने ले जाना, पिक्चर ले जाना, नए कपड़े, जूते लाना अथवा खेल-खिलौने आदि…।”
पापा की सारी बातें सुन अंकुर मुँह से कुछ भी नहीं कह पाया।
“लेकिन बेटे, इन सब के बदले हम आपसे चाहते क्या हैं? सिर्फ यही न कि तुम हमारा मान बढ़ा नहीं सकते तो कम-से-कम घटाओ तो नहीं।”
अगले परीक्षा-परिणाम में अंकुर पूरे प्रदेश में प्रथम रहा।

मुखौटा
सुमति देशपाण्डे

आश्रम की सफाई का कार्य बहुत जोर-शोर से चल रहा था।
दीनानाथ जी अपने कमरे में शान्ति से बैठे थे। आश्रम के अधिकारी ने उनके कमरे में झाँका—“चलो, आपका कमरा तो एकदम साफ-सुथरा और व्यवस्थित है। आज सभी से अपने-अपने कमरे साफ करवाने हैं। कल शहर के प्रतिष्ठित माननीय श्रीमान केसरलाल जी आश्रम देखने आ रहे हैं। बड़े दानी हैं वे। साफ-सफाई का बहुत अच्छा ख्याल रहता है उनका। वृद्धों के प्रति उनके मन में बहुत आस्था-आदर है।”
आश्रम के अधिकारी उनकी तारीफ के पुल बाँधे जा रहे थे। वह कह रहे थे,“कल जब वे आएँगे, सब के लिए कम्बल लेकर आ रहे हैं, कल का खाना भी उन्हीं की तरफ से रहेगा। उनके पापा की पसन्द का खाना बनेगा।”
दीनानाथ जी को बातें सुनना असह्य हो रहा था। उन्हें लग रहा था कि जोर-से चिल्ला कर कह दें—“केसरलालजी, और कोई नहीं, मेरा बेटा केशव है।”

Sunday 16 November 2008

हरियाणा का हिंदी लघुकथा लेखन / डा॰ अशोक भाटिया

सितम्बर, 2008 में प्रारम्भ हुए डा अशोक भाटिया के लेख की अंतिम किश्त इस बार प्रस्तुत है। इसी के साथ ‘जनगाथा’ की प्रस्तुति का पहला वर्ष भी पूरा हो रहा है। सभी मित्रों से आवश्यक सुझाव व सहयोग आमंत्रित हैं। – बलराम अग्रवाल


हरियाणा का हिंदी लघुकथा लेखन
डा॰ अशोक भाटिया

अक्टूबर, 2008 से आगे का अंश…
हरियाणा के प्रतिनिधि लघुकथा लेखक

विष्णु प्रभाकर
हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार विष्णु प्रभाकर मूलत: नाटककार व कहानीकार हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने जीवनी और लघुकथा-साहित्य में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है।
विष्णु प्रभाकर की पहली लघुकथा ‘सार्थकता’ मुंशी प्रेमचंद द्वारा संस्थापित/संपादित ‘हंस’ पत्रिका के जनवरी 1939 अंक में प्रकाशित हुई थी। इनके अब तक—‘जीवन पराग’(1963), ‘आपकी कृपा है’(1982) और ‘कौन जीता कौन हारा(1989)—तीन लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इन तीनों ही संग्रहों में लघुकथाएँ और बोधकथाएँ, दोनों साथ-साथ रखी गई हैं। ‘आपकी कृपा है’ संग्रह में लघुकथा-आंदोलन के महत्व का उल्लेख करते हुए वह कहते हैं—“आज लघुकथा को लेकर जो आंदोलन उभरा है, यदि वह न उभरा होता तो संभवत: मेरा ध्यान इस ओर इतनी गंभीरता से न जाता।” उनके ही शब्दों में—“आदर्श लघुकथा वह होती है, जो किसी कहानी का कथानक न बन सके।”
विष्णु प्रभाकर की अनेकश: चर्चित लघुकथाओं में फर्क, पानी की जाति, ईश्वर का चेहरा और दोस्ती प्रमुख हैं। ‘फर्क’ लघुकथा में मनुष्य-मनुष्य के बीच बनाई हुई सीमाओं पर सहज व्यंग्य किया गया है, तो ‘ईश्वर का चेहरा’ रचना भावनात्मक धरातल पर आकर सांप्रदायिक भेदभाव को भुलाने की प्रेरणा देती है।
विष्णु प्रभाकर की सन 1963 के बाद लिखी लघुकथाएँ मुख्य रूप से मानवीय संवेदनाओं की रचनाएँ हैं। उन्होंने द्वंद्व के माध्यम से मानव में छिपे शुभ और सुंदर तत्वों को उभारने का कलात्मक प्रयास किया है। इन रचनाओं की ताकत इनकी सजग सरलता व सहजता में है।

पूरन मुद्गल
मूलत: कहानीकार और कवि पूरन मुद्गल की पहली लघुकथा ‘कुल्हाड़ा और क्लर्क’ सन 1964 में हिंदी मिलाप में प्रकाशित हुई थी। इनकी लघुकथाओं का पहला संग्रह ‘निरंतर इतिहास’ सन 1982 में प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त ‘लघु आघात’ पत्रिका में इन्होंने लघुकथा के आलोचना-पक्ष पर भी कलम चलाई है। वह आठवें दशक में हिंदी लघुकथा आंदोलन के सक्रिय साक्षी रहे हैं।
पूरन मुद्गल जन-पक्षधरता के रचनाकार हैं। अपनी लघुकथाओं में इन्होंने विभिन्न सामाजिक-पारिवारिक विषयों को उकेरा है। ‘अमरता’, ‘निरंतर इतिहास’, ‘बाहर भीतर’, ‘पहला झूठ’ इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं। हंसराज रहबर के शब्दों में—“पूरन मुद्गल ने अपनी लघुकथाओं में जीवन की साधारण घटनाओं को इस तरह उकेरा है कि वर्तमान समाज का कोई न कोई सत्य नजरों के सामने आकर साकार हो जाता है।” शंकर पुणतांबेकर का मत है कि—“पूरन मुद्गल संस्कारगत(कुसंस्कारगत भी) व्यक्ति के चित्रण में सिद्धहस्त हैं।”

रमेश बतरा
समकालीन हिंदी लघुकथा को सही दिशा देने वाले रचनाकारों में कथाकार-संपादक रमेश बतरा अग्रणी हैं। इन्होंने आठवें दशक के आरंभ से ही एक ओर अपने विभिन्न लेखों के माध्यम से लघुकथा की शक्ति और व्यापकता को लगातार रेखांकित किया तो दूसरी ओर स्तरीय लघुकथाएँ लिखकर इस साहित्य-प्रकार को समृद्ध किया। 1971-72 में करनाल से पाक्षिक समाचार-पत्र ‘बढ़ते कदम’ संपादित कर उसमें लघुकथाओं को स्थान दिया। अगस्त 1973 में इन्होंने अम्बाला छावनी से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘तारिका’ का लघुकथांक संपादित किया और जून 1974 में चंडीगढ़ से प्रकाशित ‘साहित्य निर्झर’ का लघुकथांक। इस दौर के बाद पहले वह प्रतिष्ठित कथा-पत्रिका ‘सारिका’ में, तत्पश्चात ‘नवभारत टाइम्स’ तथा ‘संडे मेल’ में उप-संपादक व वरिष्ट उप-संपादक रहे। इन सभी पत्र-पत्रिकाओं में कार्यरत रहते हुए इनके माध्यम से तथा इनके अतिरिक्त अन्य पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी रमेश बतरा ने हिंदी लघुकथा के स्वरूप को निखारने-सँवारने का काम निरंतर जारी रखा। अपनी लघुकथाओं का हालाँकि वह कोई एकल लघुकथा-संग्रह प्रकाशित नहीं करा पाए; बावजूद इसके समकालीन हिंदी लघुकथा साहित्य में उनका स्थान अक्षुण्ण है। ‘सुअर’, ‘खोया हुआ आदमी’, ‘बीच बाज़ार’, ‘नौकरी’, ‘लड़ाई’, ‘नागरिक’ आदि इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं। ‘कहूँ कहानी’ शीर्षक इनकी लघुकथा अपने अति-लघु आकार व तीव्र संवेदनशीलता के कारण बेहद चर्चित है—
--ए रफीक भाई! सुनो…उत्पादन के सुख से भरपूर थकान की खुमारी लिए, रात मैं कारखाने से घर पहुँचा, तो मेरी बेटी ने एक कहानी कही—एक लाजा है, वो बोत गलीब है!
रमेश बतरा की लघुकथाएँ अँधेरे में रोशनी का काम करती हैं। कलात्मकता और सांकेतिकता के ज़रिए वह अपने कथन को सशक्त रूप में उभारते हैं। इनकी लघुकथाएँ ज़रा-सा कलात्मक घुमाव देकर शब्दों से नई अर्थ-व्यंजनाएँ उभारने में सक्षम हैं। इनकी ‘सुअर’ शीर्षक लघुकथा सांप्रदायिक उन्मादियों को सचेत करती है कि—मस्जिद में सुअर नहीं घुस आया, बल्कि सुअर तो राजनीतिक गलियारे से निकली संकीर्णता का नाम है।


पृथ्वीराज अरोड़ा
समकालीन हिंदी लघुकथा को पुनर्स्थापित करने में महत्वपूर्ण योग देने वाले कथाकारों में पृथ्वीराज अरोड़ा प्रमुख हैं। इनकी अधिकतर लघुकथाएँ ‘सारिका’ के माध्यम से सामने आईं। अब तक इनके दो लघुकथा-संग्रह—‘तीन न तेरह’(1997) और ‘आओ इंसान बनाएँ’(2007) प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी पहली लघुकथा ‘एहसास’ सन 1974 में प्रकाशित हुई।
पृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथाओं का मूल-स्वर अन्याय और कुप्रथाओं का विरोधी है। मुख्यत: मध्य-वर्ग पर केन्द्रित इनकी रचनाएँ मध्य-वर्ग की संवेदना की उपज हैं। इनकी लघुकथाएँ पाठक को संघर्षशील होने व अन्याय के विरुद्ध सक्रिय होने की प्रेरणा देती हैं। ‘दया’, ‘दु:ख’, ‘विकार’, ‘कील’, ‘प्रभु-कृपा’ आदि इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं। ‘दया’ पृथ्वीराज अरोड़ा की ही नहीं, हिंदी की श्रेष्ठ लघुकथाओं में अपना स्थान रखती है। ‘दया-भाव भी धन पर निर्भर है’—इसे रचनात्मक माध्यम द्वारा स्पष्ट करते हुए यह रचना इतिहास की छोटी-सी कड़ी को नई दृष्टि से देखने का आग्रह करती है।

कमलेश भारतीय
आठवें दशक में हिंदी लघुकथा के परिदृश्य में जो कथाकार निरंतर सृजनरत रहे, उनमें कमलेश भारतीय प्रमुख हैं। व्यवसाय से पत्रकार कमलेश भारतीय के अब तक तीन लघुकथा-संग्रह—‘मस्तराम जिंदाबाद’(1984), ‘इस बार’(1992), और ‘ऐसे थे तुम’(2008) प्रकाशित हो चुके हैं। भारतीय की पहली लघुकथा ‘किसान’ सन 1971 में ‘प्रयास’ में प्रकाशित हुई थी। इनकी लघुकथाएँ मुख्यत: ‘सारिका’, ‘कादम्बिनी’, ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में छपी हैं। इनके अतिरिक्त प्रमुख लघुकथा-विशेषांकों में भी इनकी लघुकथाएँ शामिल होती रही हैं।
कमलेश भारतीय ने अपनी लघुकथाओं में एक साथ ग्राम्य जीवन, महानगरीय सभ्यता और आतंकवाद-विरोध पर कलम चलाई है। इनकी प्रतिनिधि लघुकथाओं में ‘अब क्या देंगे’, ‘किसान’, ‘सपने’, ‘कायर’, ‘विश्वास’ और ‘मन का चोर’ शामिल हैं। ‘कायर’ इनकी सबसे चर्चित लघुकथा है, जो संतुलन और मजबूती के साथ स्त्री-पुरुष संबंधों को उभारती है। कमलेश भारतीय मूलत: मानवीय संबंधों के कथाकार हैं। इनकी लघुकथाओं की भाषा अपनी रवानगी व सादगी के कारण खास तौर से ध्यान खींचती है।

अशोक भाटिया

अशोक भाटिया ने लघुकथा के क्षेत्र में रचना, आलोचना, संपादन और अनुवाद—चार धरातलों पर कार्य किया है। ‘जंगल में आदमी’(1990) इनकी लघुकथाओं का चर्चित संग्रह है। इनकी पहली लघुकथा ‘अपराधी’ जून 1978 में प्रकाशित ‘समग्र” के लघुकथांक में छपी थी। ‘रंग’, ‘रिश्ते’, ‘तीसरा चित्र’, ‘पीढ़ी-दर-पीढ़ी’, ‘चौथा चित्र’, ‘व्यथा कथा’, ‘कपों की कहानी’ आदि इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ मानी जाती हैं। राधेलाल बिजघावने के शब्दों में, “अशोक भाटिया डस्टबिन-संस्कृति की सड़ाँध और एकतरफा अभियोगों की छिन्न-भिन्न मानसिकता को लघुकथाओं में बुनते हैं।” और रामयतन यादव के शब्दों में,“… ‘रंग’ वेदनात्मक अनुभूति पर आधारित सहज रूप से तिलमिला देने वाली लघुकथा है। यह लघुकथा सूक्ष्म विचार-शक्ति और सर्जनात्मक क्षमता का विस्मयकारी प्रमाण है।”
बलराम अग्रवाल का कहना है कि—“…‘श्रेष्ठ पंजाबी लघुकथाएँ’(1990) अशोक भाटिया का पंजाबी से हिंदी में किए गए स्तरीय अनुवाद और संपादन का कार्य है, जबकि ‘पेंसठ हिंदी लघुकथाएँ’(2001), ‘निर्वाचित लघुकथाएँ’(2005) और ‘विश्व साहित्य से लघुकथाएँ’(2006) उनके सजग लघुकथा-चयन और शोधपरक संपादकीय लेखों/ बेधक भूमिकाओं के कारण अनगिनत संपादित लघुकथा-संकलनों की भीड़ में अपना अलग और विशिष्ट मुकाम रखते हैं। उनका आलोचनात्मक लेख ‘हिंदी लघुकथा की यात्रा’ अनेक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।”
‘लघुकथा और शास्त्रीय सवाल’(1987) लघुकथा पर इनका पहला आलोचनात्मक लेख था और यह कार्य अद्यावधि जारी है। पंजाबी के अलावा अशोक भाटिया अंग्रेजी और उर्दू भाषा से भी लघुकथाओं का हिंदी में अनुवाद करते रहे हैं।

रामकुमार आत्रेय
मूलत: कवि, रामकुमार आत्रेय सन 1980 से लघुकथाएँ भी निरंतर लिख रहे हैं। इनकी लघूकथाएँ हिंदी की राष्ट्रीय स्तर की लगभग सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं, यथा—‘सारिका’, ‘हंस’, ‘कथादेश’, ‘कथाक्रम’, ‘वर्तमान साहित्य’, ‘अक्षरा’, ‘वागर्थ’ और व्यावसायिक/सरकारी पत्रिकाओं ‘कादम्बिनी’ व ‘आजकल’ में छपती रही हैं। अब तक रामकुमार आत्रेय के तीन लघुकथा-संग्रह—‘इक्कीस जूते’(1993), ‘आँखों वाले अंधे’(1999) और ‘छोटी सी बात’(2006) प्रकाशित हो चुके हैं।
‘समझ’, ‘सपनों की संदूकची’, ‘नींद’, ‘इक्कीस जूते’, ‘मक्कारी’, ‘छोटी-सी बात’, ‘हरिद्वार’, ‘समय’ आदि इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं। इनकी लघुकथाओं का मूल-स्वर अन्याय की खिलाफत और न्याय की तलाश है। प्रभावान्विति के लिए रामकुमार आत्रेय कहीं आंचलिक भाषा का, तो कहीं दृष्टांत और रूपक का सहारा लेते हैं।

रामनिवास मानव
मूल रूप से कवि रामनिवास मानव की कलम पिछले तीन दशकों से लघुकथा-लिखन में भी चलती रही है। अब तक रामनिवास मानव के दो लघुकथा-संग्रह ‘घर लौटते कदम’(1988) और ‘इतिहास गवाह है’(1996) प्रकाशित हो चुके हैं। इनसे पूर्व दर्शन दीप के साथ इनकी लघुकथाओं का संग्रह ‘ताकि सनद रहे’(1982) भी प्रकाशित हो चुका है। डा सुभाष रस्तोगी के शब्दों में—“…’घर लौटते कदम’ में जहाँ पारिवारिक जीवन और दाम्पत्य-संबंधों से जुड़ी लघुकथाओं का प्राधान्य था, वहाँ इस(इतिहास गवाह है) संग्रह में लेखक ने सामाजिक विसंगतियों, राजनीतिक विद्रूपताओं तथा जीवन के अन्यान्य पक्षों से जुड़े कथा-प्रसंगों को अपनी लघुकथा-रचना का आधार बनाया है।”
‘स्टेटस’, ‘टोलरेन्स’, ‘मुक्ति’, ‘बोझ’, ‘साँप’ आदि इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं। सहज, सजग भाषा इनकी लघुकथाओं की शक्ति को बढ़ाती है।

हरियाणा राज्य की अनेक महिला लघुकथाकारों की लघुकथाएँ भी यत्र-तत्र छ्पती रही हैं, परन्तु सार्थक लेखन की दृष्टि से समकालीन लघुकथा के उन्नयन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली जिन दो कथाकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है, वे हैं—उर्मि कृष्ण और कमला चमोला।

उर्मि कृष्ण
सार्थक लेखन में विश्वास करने वाली उर्मि कृष्ण ने लेखन और संपादन दोनों माध्यमों से लघुकथा-साहित्य को समृद्ध किया है। अम्बाला छावनी से, पहले महाराज कृष्ण जैन ने और 2002 के बाद से उर्मि कृष्ण ने ‘तारिका’ में लगातार लघुकथाओं को स्थान दिया है। ‘तारिका’ के अगस्त 2002 और सितम्बर 2005 के अंक इन्होंने लघुकथांक के रूप में संपादित किए हैं। उर्मि कृष्ण की लघुकथाओं के संग्रह का नाम ‘दृष्टि’ है।
‘मैं दुर्गा हूँ’, ‘कुहनी की चोट’, ‘दृष्टि’, ‘यह मेरा भाई है’ आदि इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं।
इनकी लघुकथाएँ एक ओर नारी के स्वर को दृढ़ता से उभारती हैं, तो दूसरी ओर जीवन के श्रेष्ठ और उज्ज्वल पक्ष को वाणी प्रदान करती हुई अँधेरे के खिलाफ अलख जगाती हैं। उर्मि कृष्ण की लघुकथाएँ ‘सादगी में उँचाई’ सिद्धांत को साकार करने वाली रचनाएँ हैं।

कमला चमोला
कमला चमोला मूल रूप से कहानीकार हैं। किंतु, सन 2000 के लगभग से वह लघुकथा-लेखन में भी सार्थक हस्तक्षेप कर रही हैं। हिंदी की प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में इनकी लघुकथाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। सन 2000 में, ‘हंस’ में प्रकाशित रचना ‘लाठी’ इनकी पहली लघुकथा है।
‘भय’ और ‘देश-दिल्ली’ इनकी प्रथिनिधि व बहु-प्रशंसित लघुकथाएँ है। ‘भय’—जहाँ पुरुष की फितरत को सहज लेकिन तिलमिला देने शैली मे सामने लघुकथा है; वहीं ‘देश-दिल्ली’ लघुकथा देश की दुर्दशा का तकलीफदेह बयान है।

अन्य प्रमुख लघुकथाकार
लघुकथा-लेखन में रत राज्य के समस्त रचनाकारों के लघुकथा-कार्य पर टिप्प्णी प्रस्तुत करने की अनुमति यह फार्मेट नहीं देता है। फिर भी, उपर्युक्त लघुकथाकारों के अतिरिक्त विकेश निझावन, मधुकांत, रूप देवगुण, अरुण कुमार, ज्ञानप्रकाश विवेक, हरनाम शर्मा, अनिल शूर आज़ाद, प्रद्युम्न भल्ला, सुरेन्द्र गुप्त, सुरेश जाँगिड़ उदय, प्रेमसिंह बरनालवी, आदि उल्लेखनीय रचनाकार हैं, जो हिंदी लघुकथा-पटल पर आधिकारिक कलम चला रहे है।

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लघुकथाएँ

एक और अभिमन्यु
मुकेश शर्मा

बड़बड़ाता हुआ छुन्ना बैठक के भीतर प्रवेश कर गया। सामने नेताजी खाना खा रहे थे, इसीलिए छुन्ना चुपचाप सामने रखी कुर्सी पर जा बैठा। नेताजी की अनुभवी आँखों से छुन्ना की परेशानी छिपी न रह सकी; बोले, “छुन्ना, क्या बात है, कुछ परेशान हो?”
“परेशान तो क्या साब…बस्स…!”
“हूँ…क्या हुआ?”
“साब वो…वो इंसपेक्टर है ना, पुलिसवाला—अभिमन्यु…साब, उसे मालूम है मैं आपका आदमी हूँ…फिर भी साब, साले की आँखों में लिहाज नहीं है!”
“कुछ हुआ भी होगा?”
“साब, आज फिर ढाई लाख का माल पकड़ लिया है। पहले भी ये गिरी हुई हरकत एक-दो बार कर चुका है।”
“हूँ!” नेताजी गंभीर हो गए।
“रात मेरे आदमी ट्रक पर माल लाद रहे थे, साब…चूहा, चूहा साब!”
“हैं?” नेताजी की प्रश्नवाचक दृष्टि उसकी ओर उछली।
“साब, वो आपके पाँव के पास मोटा-सा चूहा है।”
“ओ…” नेताजी नीचे देखते हुए मुस्कराने लगे, “सुनो, क्या रेट है उसका?”
“किसका साब? उस पुलिसवाले का? साब, बड़ा बेईमान आदमी है, रिश्वत के नाम से ही बिदकता है।”
“अच्छा! तब तो वाकई समस्या गंभीर है!” नेताजी ने थाली में हाथ धोए और उसी में कुल्ला करके बोले, “सुनो, ये थाली बाहर रख आओ।”
“जी साब!” छुन्ना मुस्कराते हुए उठा और थाली बाहर रखकर भीतर आ गया।
“कमरे का दरवाजा भीतर से बंद कर लो…और खिड़की भी।”
छुन्ना एक क्षण के लिए हैरान हुआ, किंतु फिर आदेश का पालन करने लगा।
“मेज पर रखे फल फ्रिज में रख दो, यह मिठाई का डिब्बा भी…”
“जी साब!”
“और हाँ, फ्रिज में से एक पनीर का टुकड़ा निकालकर उस चूहे के पिंजरे में लगा दो…अब पिंजरा नीचे रख दो…हाँ, अब बताओ, तुम क्या कह रहे थे।”
“साब, मैं बता रहा था कि…”
छुन्ना अपनी बातों को दोहराने लगा। एकाएक ‘खट’ की आवाज सुनकर छुन्ना चुप हो गया।
“चूहा पिंजरे में फँस गया है। पिंजरे में अटके पनीर के टुकड़े के अतिरिक्त कोई खाने की चीज खुले स्थान पर नहीं थी। इसे भूख लगी होगी।” नेताजी रहस्यमय ढंग से मुसकराए।
“अच्छा साब, अनुमति दीजिए।” छुन्ना एकाएक उठ खड़ा हुआ।
“पर वो तुम्हारा इंसपेक्टर वाला मामला?”
“साब, अब तो यह काम मैं खुद निपटा लूँगा।”
छुन्ना की बात सुन नेताजी जोर-जोर से हँसने लगे।


बौना आदमी
हीरालाल नागर

अंतत: फैसला हुआ कि इस बार भी माँ हमारे साथ नहीं जाएगी। पत्नी और बच्चों को लेकर स्टेशन पहुँचा। ट्रेन आई और हम अपने गंतव्य की ओर चल पड़े। ठीक-से बैठ भी नहीं पाए होंगे कि डिब्बे के शोर को चीरता हुआ फ़िल्मी-गीत का मुखड़ा—‘हम बने तुम बने एक दूजे के लिए’—गूँज उठा। उँगलियों में फँसे पत्थर के दो टुकड़ों की टिक्…टिक्…टिकिर…टिक्…टिक् के स्वर में मीठी पतली आवाज ने जादू का-सा असर किया। लोग आपस में आपस में धँस-फँसकर चुप रह गए।
गाना बंद हुआ और लोग ‘वाह-वाह’ कर उठे। उसी के साथ उस किशोर गायक ने यात्रियों के आगे अपना दायाँ हाथ फैला दिया।
“बाबूजी, दस पैसे!” मेरे सामने पाँच-छ्ह साल का दुबला-पतला लड़का हाथ पसारे खड़ा था।
“क्या नाम है तेरा?” मैंने पूछा।
“राजू।”
“किस जाति के हो?”
लड़का निरुत्तर रहा। मैंने लड़के से अगला सवाल किया, “बाप भी माँगता होगा?”
“बाप नहीं है।”
“माँ है?”
“हाँ है, क्यों?” लड़के ने मेरी तरफ तेज निगाहें कीं।
“क्या करती है तेरी माँ?”
“देखो साब, उलटी-सीधी बातें मत पूछो। देना है तो दे दो।”
“क्या?”
“दस पैसे।”
“जब तक तुम यह नहीं बताओगे कि तुम्हारी माँ क्या करती है, मैं एक पैसा नहीं दूँगा।” मैंने लड़के को छकाने की कोशिश की।
“अरे बाबा, कुछ नहीं करती। मुझे खाना बनाकर खिलाती-पिलाती है और क्या करती है!”
“तुम भीख माँगते हो और माँ कुछ नहीं करती? भीख माँगकर खिलाते हो उसे?”
“माँ को उसका बेटा कमाकर नहीं खिलाएगा तो फिर कौन खिलाएगा?” लड़के ने करारा जवाब दिया। मेरे चेहरे का रंग बदल गया, जैसे मैं उसके सामने बहुत बौना हो गया हूँ।

रिश्तों की पहचान

सुरेन्द्र कुमार अंशुल

“सारी मिस्टर, अब कुछ नहीं हो सकता…।” कहते हुए डाक्टर ने मरीज का निर्जीव हाथ छोड़ दिया था और फिर मरीज की पथराई आँखों को मूँदते हुए चादर सिर उढ़ा दी थी।
“आपकी फीस डाक्टर…?” युवक की दर्द में लिपटी आवाज सुनाई पड़ी।
“रहने दीजिए। जब मैंने कुछ किया ही नहीं तो फीस कैसी? और फिर, इंसानियत भी तो कोई चीज है भई।” युवक के कंधे को थपथपाते हुए डाक्टर ने सहानुभूति व स्नेह दर्शाया था और फिर अपना बैग उठाकर घर से बाहर निकल गया था।
युवक और उसकी पत्नी किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े थे कि क्या करें और क्या न करें।
तभी पत्नी बोली,“सुनो, बाबूजी मर ही चुके हैं…अब कम से कम बाबूजी की उँगली में पड़ी सोने की अँगूठी व हाथ में बँधी घड़ी तो उतार लो…पास-पड़ोस के लोग आने के बाद तो…! व्यर्थ में ही ये कीमती सामान बाबूजी की चिता में…!”
युवक ने पत्नी की ओर देखा और फिर वह लपककर बाबूजी की निर्जीव उँगली से सोने की अँगूठी व हाथ में बँधी घड़ी को उतारने में जुट गया।
और फिर कुछ देर बाद, उस घर से रोने की आवाजें सुनाई पड़ने लगीं। धीरे-धीरे पड़ोस के लोग वहाँ एकत्रित होने लगे थे।

दाग
राजकुमार निजात

रात्रि में वह पहुँचा। बस से उतरकर सीधा अपने मित्र के यहाँ मिलने चला आया। दरवाजा खटखटाया। भीतर से पूछा गया—“कौन है?”
“मैं…दिलीप!”
“दिलीप?”
“हाँ, त्रिवेदीजी का मित्र—दिलीप पंकज।”
दरवाजा खुल गया।
“भीतर चले आइए। कहाँ से आए हैं आप?”
“दूर से आ रहा हूँ।”
“मगर वे तो हैं नहीं। बाहर गए हैं।”
“ओह! मैं तो मित्रवत आया था। समीप के नगर में किसी कार्यक्रम में मुझे आना पड़ा। सोचा, बीस किलोमीटर और सही। उनसे मिलाप हो जाएगा—अत: चला आया था। …अच्छा, रुकूँगा तो यहीं पर ही मैं। आपको असुविधा…?”
“नहीं-नहीं, आप बेफिक्र सोइए। मुझे कोई असुविधा नहीं होगी। …खाना तो खाएँगे न?”
“खाना मैं खा चुका हूँ, धन्यवाद!”
सुबह मेहमान जल्दी ही उठ गया। नहा-धोकर प्रात: पाँच बजे ही वह तैयार हो गया। उसे वापस लौटना था, जल्दी। श्रीमती त्रिवेदी से नमस्ते की। थैला उठाया और चल पड़ा। बाहर अँधेरा खुल गया था। एक-दो व्यक्ति गली में से गुजरे।
सुबह होने तक आस-पड़ोस में चर्चा उभरी—बड़ी पवित्र और चरित्रवाली बनी फिरती है। रात में जाने कौन था वह! अँधेरे-अँधेरे ही भगा दिया उसे। पौ फटने से पहले ही।”
उसने सुना।
उसे लगा—अब वह जीवित नहीं रही। उसे जिंदा ही गाड़ा जा रहा है या लटका दिया गया है, आसमान में कहीं।

आँकड़े
कमला चमोला

वह देह-व्यापार करने वाली औरतों पर शोध कर रही थी। शाश्वत समाजशास्त्रीय विषय था। आँकड़ों के एकत्रीकरण के लिए अक्सर उसे लालबत्ती-क्षेत्र की वर्जित गलियों में जाना पड़ता। आते-जाते कुछ ऊल-जुलूल फब्तियाँ भी कान में पड़ जातीं—नई चिड़िया लगती है…है तो खूबसूरत…नईं रे, मैडमजी हैं…क्यों, मैडमजी के क्या…
आगे का वार्तालाप अश्लील इशारे में हो रहा है—समझ जाती वह। कान में अनसुनेपन की रुई ठूँसती आगे बढ़ जाती। उसे क्या इनकी बकवास से; उसे तो जल्द से जल्द काम खत्म करना है। समय कम है उसके पास। कालेज में पोस्ट विज्ञापित होने ही वाली है प्राध्यापिका की।
यहाँ की औरतों के लिए अब अपरिचित नहीं है वह। देह-व्यापार के पक्ष में इनके अपने ही तर्क हैं—अपनी-अपनी कमाई के ढंग हैं बहना…तू भी तो कलम चलाकर हाथ की कमाई खाती है…पेट भरने को शरीर का कोई न कोई अंग तो बेचना ही पड़ता…।
लिखित-सामग्री का प्रारूप लेकर रोज नरेन्द्रपाल जी के पास जाना पड़ता है उसे। वे भी पूरा सहयोग दे रहे हैं। पोस्ट को अपने रसूख से दो माह के लिए विज्ञापित होने से उन्होंने ही रोक रखा है किसी तरह। उनकी पत्नी का भी पूरा सहयोग है। वे लोग तो काम में जुटे रहते हैं और श्रीमती पाल भरे चाय के कप रखने और खाली कप उठाने में लगी रहती हैं। उसने सोच रखा है—शोध-प्रबंध के धन्यवाद-ज्ञापन में श्रीमती पाल का भी अवश्य आभार प्रकट करेगी। दो-एक केस-स्टडी ही शेष हैं अब तो। आज भी वह जुटी थी काम में।
नरेन्द्रपाल बोले, “इसी हफ्ते काम खत्म करने की कोशिश करो। महीने के अंत तक थीसिस जमा हो जानी चाहिए। दोनों शिक्षक भी मेरे अपने हैं। पन्द्रह दिन के अंदर ही रिपोर्ट भेज देने का वादा ले लिया है उनसे…बस, अब प्राध्यापिका ही समझो अपने-आपको। वशिष्ठजी के दोनों विद्यार्थियों को तो कम से कम छह माह लगेंगे डिग्री लेने में। तुम्हारा रास्ता साफ है।”
“धन्यवाद सर…” कृतकृत्य-सी हो उठी वह।
एकाएक नरेन्द्रपाल ने उसका हाथ खींचा…असंतुलित-सी वह उनकी ओर ढह गई।
“ये…ये क्या सर…?”
“एडवांस में मिठाई माँग रहे हैं भई, और क्या…?”
“पत्नी मायके गई है। आज तो चाय भी तुम्हें ही बनानी पड़ेगी डाक्टर अंजलि। भई, हमारे लिए तो तुम अभी से डाक्टर हो…”
देह-व्यापार का अंतिम आँकड़ा भी पूरा हो गया था।


अनलिखा
हरनाम शर्मा

लंच-बाक्स खुलते ही मेरे चहुँ ओर शुद्ध घी में तली सब्जी की महक फैल गई, जिसका स्वाद मैंने उसे खाकर और निकट बैठे एक मजदूर ने सूँघकर लिया।
वह बैठा किसी को खत लिख रहा था। लिखते-लिखते उसने एक-दो बार मेरी ओर देखा तो मुझे अटपटा-सा लगा। मैंने एक रोटी उसकी ओर बढ़ा दी। उसने कहा, “नहीं बाबूजी, हम खाते हैं।” हालाँकि साफ जाहिर था कि वह कभी खा पाता है, कभी नहीं। दिन-रात मशीनों पर काम करके उसे न तो खाने का अवकाश ही मिलता है और न स्वाद ही।
मैंने आग्रह किया तो उसने कहा,”चार रोटियाँ खा चुकने के बाद मुझे एक रोटी देने का आपका आशय?”
इसका उत्तर यद्यपि मेरे पास नहीं था, किन्तु मैं बोला, “नहीं, खा लो। अगर तुम बुरा न मानो, मैंने केवल औपचारिकतावश पूछा था। इसे कुछ और न समझो।”
उसने मेरे हाथ से रोटी ले ली और तुरन्त बड़ी शालीनता से कहा, “बुरा न मानें, मैं आपकी यह रोटी औपचारिकता से लौटा रहा हूँ। अपनी रोटी मैं वक्त पर खा चुका हूँ।”
मैं हड़बड़ाकर पीछे हटा तो वह भी मुस्कराता हुआ चला गया।
जिस पुरजे पर वह खत लिख रहा था, वह वहीं रह गया। लिखा था—माँ, वहाँ हल चलाकर शाम की रोटी नसीब हो जाती थी। यहाँ न सोने का समय है, न तुम्हें याद करने का…और रोटी खाने का तो न समय है और न पैसे!

निरुत्तर
सत्यवीर मानव

“कहाँ जा रहे हो?”
“मंजिल पर।”
“पर…रास्ता तो इधर है!”
“जाया तो इधर से भी जा सकता है न?”
“पर, बना-बनाया रास्ता छोड़कर?”
“क्या यह रास्ता सदा से है?”
“नहीं तो।”
“फिर?”
“!”

Wednesday 1 October 2008

जनगाथा अक्टूबर, 2008

हरियाणा का हिंदी लघुकथा-लेखन
डा अशोक भाटिया
सितम्बर, 2008 से आगे का अंश…
हरियाणा-आधारित कथाकारों के लघुकथा-संग्रह
सन 2008 तक हरियाणा के लघुकथाकारों के लगभग 70 लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। लघुकथा के संग्रह प्रकाशन का यह सिलसिला 1963 में प्रतिनिधि साहित्यकार विष्णु प्रभाकर के लघुकथा-संग्रह जीवन पराग के प्रकाशन से प्रारंभ होता है। इसके पश्चात सन 1966 में सुगनचंद मुक्तेश की 66 लघुकथाओं का संग्रह स्वाति बूँद आया। यद्यपि इसी संग्रह का संशोधित संस्करण सन 1996 में आया, तथापि चौंकाने वाला एक सच यह भी है कि हरियाणा के कथाकारों द्वारा लगातार लिखी जाने के बावजूद भी सन 1967 से 1981 तक यानी 15 वर्षों की लम्बी कालावधि में हरियाणा के कथाकारों का कोई भी एकल या संपादित लघुकथा-संग्रह देखने में नहीं आता है। सन 1966 के बाद सीधे सन 1982 में पूरन मुद्गल का लघुकथा-संग्रह निरंतर इतिहास प्रकाशित हुआ। 1982 में ही रामनिवास मानव व दर्शन दीप के संयुक्त प्रयास के रूप में ताकि सनद रहे प्रकाश में आया जिसमें दोनों कथाकारों की बारह-बारह लघुकथाएँ शामिल थीं; और यहीं से हरियाणा-आधारित कथाकारों के एकल व संपादित लघुकथा-संग्रहों के लगातार प्रकाशित होते रहने का जैसे श्रीगणेश हो जाता है। इसके बाद सन 1983 में विष्णु प्रभाकर का दूसरा लघुकथा-संग्रह आपकी कृपा है तथा सुरेन्द्र वर्मा का लघुकथा-संग्रह दो टाँगोंवाला जानवर प्रकाश में आये। अगले ही वर्ष सन 1984 में कमलेश भारतीय का मस्तराम जिंदाबाद और मधुकांत का तरकश संग्रह प्रकाश में आये। सन 1985 में अनिल शूर आजाद का लघुकथा-संग्रह सरहद के इस ओर प्रकाशित हुआ। सन 1988 में सुरेन्द्र वर्मा का दूसरा लघुकथा-संग्रह आदमी से आदमी तक तथा रामनिवास मानव का घर लौटते कदम छपे। सन 1989 में विष्णु प्रभाकर के तीसरे लघुकथा-संग्रह कौन जीता कौन हारा के अतिरिक्त, प्रेमसिंह बरनालवी का बहुत बड़ा सवाल और सुरेश जांगिड़ उदय का यहीं कहीं प्रकाशित हुए। सन 1990 में अशोक भाटिया का जंगल में आदमी और रूप देवगुण का दूसरा सच लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुए, जो खासे चचित रहे । सन 1991 में मधुदीप का हिस्से का दूध व बीजेंद्र कुमार जैमिनी का प्रात:काल; सन 1992 में कमलेश भारतीय का दूसरा लघुकथा-संग्रह इस बार व रूप देवगुण का दूसरा लघुकथा-संग्रह कटा हुआ सूरज प्रकाशित हुए। सन 1993 में हरियाणा के चार कथाकारों के लघुकथा-संग्रह प्रकाश में आएरामकुमार आत्रेय का इक्कीस जूते, प्रेमसिंह बरनालवी का देवता बीमार है, अनिल शूर आज़ाद का क्रान्ति मर गया तथा दर्शनलाल कपूर का पर्दे के पीछे। इनमें प्रेमसिंह बरनालवी और अनिल शूर आज़ाद के ये दूसरे लघुकथा-संग्रह थे। सन 1994 में विकेश निझावन का दुपट्टा और प्रभुलाल मंढ़इया विकल का तरकश संग्रह प्रकाशित हुए। सन 1995 में हरियाणा के किसी भी कथाकार के किसी लघुकथा-संग्रह के प्रकाशित होने का प्रमाण नहीं मिला; अलबत्ता अगले ही वर्ष सन 1996 में रामनिवास मानव का दूसरा लघुकथा-संग्रह इतिहास गवाह है प्रकाश में आया। सन 1997 में हरियाणा के एक और महत्वपूर्ण हस्ताक्षर पृथ्वीराज अरोड़ा का तीन न तेरह और सुश्री इंदिरा खुराना का औरत होने का दर्द लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुए; जबकि 1998 पुन: जैसे तैयारियों में ही चला गया। परन्तु इसकी खानापूर्ति सन 1999 में आए पूरे 5 लघुकथा-संग्रहों ने कर दी। ये थेरामकुमार आत्रेय का दूसरा संग्रह आँखों वाले अंधे, सत्यवीर मानव का केक्टस की छाँव तले, रोहित यादव का सब चुप हैं, कृष्णलता यादव का अमूल्य धरोहर तथा मधुदीप का मेरी बात तेरी बात। सन 2000 में बंसीराम शर्मा का खेल ही खेल में और रमेश सिद्धार्थ का कालचक्र लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुए।
इस प्रकार समकालीन हिंदी लघुकथा के सृजन की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण माने जाने वाले सन 1971 से सन 2000 यानी बीसवीं सदी के अवसान-वर्ष के अंत तक हिंदी लघुकथा साहित्य को अकेले हरियाणा ने लगभग 34 लघुकथा-संग्रहों का योगदान किया। प्रसन्नता और संतोष की बात यह है कि हरियाणा के कई कथाकारों ने संख्यापरक-लेखन की बजाय गुणात्मक-लेखन पर लगातार अपना ध्यान केन्द्रित रखा है और वे इसमें सफल भी रहे हैं।
इक्कीसवीं सदी में भी हरियाणा-आधारित कथाकारों के लघुकथा-संग्रह सन 2001 से ही लगातार प्रकाश में आ रहे हैं और सन 2008 तक ही लगभग 14 लघुकथा-संग्रहों की सूचि हमें प्राप्त होती है। इनके नाम हैं—‘सलीब पर टँगे चेहरे(सुरेन्द्र कुमार अंशुल, 2001), इधर उधर से(बीजेन्द्र कुमार जैमिनी, 2001), अपनी अपनी सोच(संतोष गर्ग, 2001), लुटेरे छोटे छोटे(सत्यप्रकाश भारद्वाज, 2002), ब्लैक बोर्ड(मधुकांत, 2002), रोटी का निशान(सुखचैन सिंह भंडारी, 2002), एक और एकलव्य(मदनलाल वर्मा, 2002), लघुदंश(प्रद्युम्न भल्ला, 2003), यह मत पूछो(रूप देवगुण, 2003), सफेद होता खून(प्रदीप शर्मा स्नेही, 2004), उसी पगडंडी पर पाँव(शील कौशिक, 2004) तथा अपना अपना दुख(शिवनाथ राय, 2004)। संख्यात्मक दृष्टि से सन 2005, 2006 और 2007 के वर्ष अलग से उभरकर आते हैं। 2005 में आस्था के फूल(कमल कपूर), फूल मत तोड़ो(रघुवीर अनाम), प्रसाद(सुरेन्द्र गुप्त), आज का सच(जितेन्द्र सूद), हवा के खिलाफ(सुरेन्द्र कुमार अंशुल), रोशनी की किरचें(सुधा जैन) और बेदर्द माँ(विनोद खनगवाल) यानी कुल 7 संग्रह आए; जबकि 2006 में छोटी-सी बात(रामकुमार आत्रेय), बाज़ार(अरुण कुमार), कानून के फूल(पवन चौधरी मनमौजी), गुलाब के काँटे(अशोक माधव), सुख की साँस(शिवनाथ राय) और मानस गंध(रमेश सिद्धार्थ) सहित कुल 6 संग्रह प्रकाशित हुए। सन 2007 में आओ इंसान बनाएँ(पृथ्वीराज अरोड़ा), अपने देश में(हरनाम शर्मा), शुद्धिपत्र(सुशील शील), भविष्य से साक्षात्कार(इन्दु गुप्ता), नाविक के तीर(श्याम सखा श्याम), गांधारी की पीड़ा(इंदिरा खुराना), चेतना के रंग(कृष्णलता यादव), मेरी प्रिय लघुकथाएँ(सुरेन्द्र कृष्ण), पागल कौन(सुशील डाबर साथी)कुल 9 लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुए। सन 2008 में सितम्बर के अंत तक, नींद टूटने के बाद(मधुकांत), किरचें(प्रदीप शर्मा स्नेही), चुप मत रहो(भारत नरेश) तथा दृष्टि(उर्मि कृष्ण) प्रकाश में आ चुके थे।
हरियाणा के सत्यपाल सक्सेना, यश खन्ना नीर, अमृतलाल मदान, महावीर प्रसाद जैन, तरुण जैन, राजकुमार निजात, भगवान प्रियभाषी, तारा पांचाल, कमला चमोला आदि बहुत-से अन्य कथाकार भी लघुकथाएँ लिखते रहे हैं, जिनके एकल लघुकथा-संग्रह अभी तक प्रतीक्षित हैं।
यद्यपि, संख्यात्मक दृष्टि से बहुत-से संग्रहों का आ जाना, किसी साहित्यिक विधा की उपलब्धि नहीं होती; तथापि उपर्युक्त सूचि हरियाणा में लघुकथा-साहित्य के प्रति नवयुवा वर्ग का आकर्षण तो जाहिर करती ही है।
हरियाणा से संपादित प्रमुख लघुकथा-संकलन
लघुकथा-क्षेत्र में लेखन के साथ-साथ हरियाणा राज्य से अखिल भारतीय स्तर पर कुछ ऐसे संकलनों का संपादन भी किया गया, जिन्होंने हिंदी लघुकथा के स्वरूप को निर्धारित करने में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाई
इस क्रम में, सर्वप्रथम, सुशील राजेश द्वारा सन 1981 में संपादित अक्षरों का विद्रोह का नाम लिया जा सकता है। इस संकलन की सबसे बड़ी विशेषता हैरचनाओं का सजगता से चयन और हरियाणा-राज्य के कथाकारों को प्राथमिकता देना। पृथ्वीराज अरोड़ा, महावीर प्रसाद जैन, अशोक जैन, भगवान प्रियभाषी, मधुकांत, अशोक भारती, हरनाम शर्मा, अशोक भाटिया, मधुदीप आदि हरियाणा के अनेक कथाकारों को इस संकलन में प्रमुखता से छापा गया है।
लघुकथा संबंधी अपने शोध-हेतु सामग्री जुटाने के क्रम में शमीम शर्मा द्वारा सन 1982 में लघुकथा-संकलन हस्ताक्षर का संपादन किया गया। अपनी काया में यह संकलनरचना, आलोचना और कोशतीनों आयामों को समेटे हुए है। इसमें जहाँ 194 कथाकारों की लघुकथाएँ संकलित हैं, वहीं डा पुष्पा बंसल व शमीम शर्मा के उपयोगी लेख भी हैं। इसके परिशिष्टों में 620 लघुकथा-लेखकों की सूचि उनकी एक-एक प्रतिनिधि-लघुकथा के उल्लेख के साथ दर्ज है। इसमें 1982 तक प्रकाशित लघुकथा-संग्रहों की सूचि के साथ-साथ 330 ऐसी पत्रिकाओं की सूचि भी है, जिनमें लघुकथाएँ छपती रही हों।
सन 1988 में रूप देवगुण व राजकुमार निजात के संपादन में हरियाणा का लघुकथा-संसार नामक लघुकथा का बहु-आयामी ग्रंथ प्रकाशित हुआ। दस आलेखों, परिचर्चाओं, साक्षात्कारों, प्रतिनिधि व पुरस्कृत लघुकथाओं से सुसज्जित यह संकलन हरियाणा में लघुकथा-लेखन को शिद्दत से रेखांकित करता अपने समय का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
वर्ष 1993 में मुकेश शर्मा द्वारा संपादित लघुकथा : रचना और समीक्षा-दृष्टि प्रकाशित हुआ। इस संकलन की सबसे बड़ी विशेषता हैलघुकथा पर विष्णु प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, रामनारायण उपाध्याय, डा कमल किशोर गोयनका व डा हरिश्चंद्र वर्मा जैसे उच्च-स्तरीय लेखकों-आलोचकों से संपादक द्वारा लिया गया साक्षात्कार। रचना-स्तर पर इस संकलन में हरियाणा का प्रतिनिधित्व महावीर प्रसाद जैन, पृथ्वीराज अरोड़ा, कमलेश भारतीय, अशोक भाटिया व मुकेश शर्मा ने किया है।
वर्ष 2005 में अशोक भाटिया द्वारा संपादित निर्वाचित लघुकथाएँ संकलन प्रकाशित हुआ। इसमें सन 1876 से 2003 तक के 110 हिंदी कथाकारों की 150 प्रतिनिधि लघुकथाएँ प्रकाशित हुई हैं। रचना-चयन का आधार, संपादक के शब्दों में—‘उस(रचना) का विज़न, संघर्ष और विडंबनाओं के उभार की उसकी क्षमता रहा है। पूरे संकलन की रचनाओं को—‘नींव के नायक, झूठी औरत, कोई अकेला नहीं और खुलता बंद घर’—कुल चार उपशीर्षकों में विभक्त रखा गया है।
अन्य प्रमुख लघुकथा-संकलनों में—‘कितनी आवाज़ें(सं विकेश निझावन व हीरालाल नागर, 1982), पड़ाव और पड़ताल(सं मधुदीप, 1988), पेंसठ हिंदी लघुकथाएँ(सं अशोक भाटिया, 2001) को गिनाया जा सकता है।
(शेष आगामी अंक में)………
लघुकथाएँ
जेबकतरा
ज्ञानप्रकाश विवेक
बस से उतरकर जेब में हाथ डाला। मैं चौंक पड़ा। जेब कट चुकी थी। जेब में था भी क्या? कुल नौ रुपए और एक खत, जो मैंने माँ को लिखा था किमेरी नौकरी छूट गई है; अभी पैसे नहीं भेज पाऊँगा…। तीन दिनों से वह पोस्टकार्ड जेब में पड़ा था। पोस्ट करने को मन ही नहीं कर रहा था।
नौ रुपए जा चुके थे। यूँ नौ रुपए कोई बड़ी रकम नहीं थी, लेकिन जिसकी नौकरी छूट चुकी हो, उसके लिए नौ रुपए नौ सौ से कम नहीं होते।
कुछ दिन गुजरे। माँ का खत मिला। पढ़ने से पूर्व मैं सहम गया। जरूर पैसे भेजने को लिखा होगा।…लेकिन, खत पढ़कर मैं हैरान रह गया। माँ ने लिखा था—“बेटा, तेरा पचास रुपए का भेजा हुआ मनीआर्डर मिल गया है। तू कितना अच्छा है रे!…पैसे भेजने में कभी लापरवाही नहीं बरतता।
मैं इसी उधेड़-बुन में लग गया कि आखिर माँ को मनीआर्डर किसने भेजा होगा?
कुछ दिन बाद, एक और पत्र मिला। चंद लाइनें थींआड़ी-तिरछी। बड़ी मुश्किल से खत पढ़ पाया। लिखा था—“भाई, नौ रुपए तुम्हारे और इकतालीस रुपए अपनी ओर से मिलाकर मैंने तुम्हारी माँ को मनीआर्डर भेज दिया है। फिकर न करना।…माँ तो सबकी एक-जैसी होती है न। वह क्यों भूखी रहे?…तुम्हाराजेबकतरा!
हाथ वाले
महावीर प्रसाद जैन
शो शुरू होने में अभी देर है; और इस तरह के खाली समय का उपयोग भी वह सार्थक ढंग से करता है यानीफुटपाथ पर बिखरी किताबों के ढेरों को देखना-टटोलना। उसका अनुभव है कि इन फुटपाथी ढेरों में कभी-कभार बड़ी उम्दा किस्म की किताबें हाथ लग जाती हैं। उसके कदम उस परिचित दुकान पर जाकर रुक गए। यह बहुत पुरानी फुटपाथी दुकान है…और इसके मालिक के दोनों हाथ कटे हुए हैं।
दुकानदार उसे देखकर हल्के-से मुसकराया और उसने एक तरफ इशारा किया, जिसका मतलब था कि इस ढेर से आपको कुछ न कुछ मिल जाएगा। वह किताबें देखने लगा। तभी उसकी बगल में एक युवक आकर खड़ा हो गया। उसने उसे एक नजर देखा। वह युवक किताबें छाँटने में लग गया। कुछ देर बाद उसकी नजरें फिर उस युवक की ओर उठीं, और उसने देखा कि एक किताब को बगल में दबाए वह अभी-भी किताबों को उलट-पलट रहा था।
दुकानदार अन्य ग्राहकों को निपटाने में लगा हुआ था कि वह युवक चल दिया। उसने देखाउसकी बगल में पुस्तक दबी है। बिन पैसे दिये…यानी…ऐसे ही…चोरी? और उसके मुँह से निकल पड़ा—“वह तुम्हारी किताब ले गया है…बिना पैसे दिये…! उसने जाते युवक की ओर इशारा भी किया।
मुझे मालूम है भैयाजी…!
यार, बड़े अहमक हो!…जब मालूम है, तो रोका क्यों नहीं?
कुछ देर वह चुप रहा और फिर उसके सवाल का जवाब देते हुए बोला,हाथ वाले ही तो चोरी कर सकते हैं भैयाजी!
हिस्से का दूध
मधुदीप
उनींदी आँखों को मलती हुई वह अपने पति के करीब जाकर बैठ गई। वह दीवार का सहारा लिए बीड़ी के कश ले रहा था।
सो गया मुन्ना?
जी,…लो, दूध पी लो। सिल्वर(एल्यूमीनियम) का पुराना गिलास उसने बढ़ाया।
नहीं, मुन्ने के लिए रख दो। उठेगा तो… वह गिलास को माप रहा था।
मैं उसे अपना दूध पिला दूँगी। वह आश्वस्त थी।
पगली, बीड़ी के ऊपर दूध नहीं पीते। तू पी ले। उसने बहाना बनाकर दूध को उसके और करीब कर दिया।
तभी, बाहर से हवा के साथ एक स्वर उसके कानों में टकराया।
उसकी आँखें खूँटी पर टँगे कुर्ते की खाली जेब में घुस गईं।
सुनो, जरा चाय रख देना। पत्नी से कहते हुए उसका गला बैठ गया।
बू
रामकुमार आत्रेय
एक बात पूछूँ? युवक ने युवती से पूछा।
पूछो। युवती ने उत्तर दिया।
बुरा मत मानना।
नहीं।
तुम मुझसे प्यार करती हो न?
हाँ, करती हूँ। मगर, यही प्रश्न न जाने कितनी बार तुम मुझसे पूछ चुके हो। क्या तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं होता?
होता तो है, पर…
पर क्या? साफ-साफ कहो न।
तुमने आज तक, कभी मुझे प्यार से राजा नहीं कहा। यही बात मुझे परेशान करती है।
राजा! मैं समझी नहीं? युवती ने जानना चाहा।
हाँ-हाँ, राजा। जैसे हर लड़की अपने प्रेमी को मेरे राजा कहकर बुलाया करती है। युवक भावुक हो उठा था।
क्या तुम्हारे पूर्वज किसी रियासत की राजगद्दी के मालिक थे,जिनसे उत्तराधिकार के रूप में वहाँ की गद्दी तुम्हें मिल गई हो? युवती की भौहें कमान का रूप धारण कर चुकी थीं। उसके स्वर में व्यंग्य था।
नहीं तो; लेकिन, तुम्हारे दिल की रियासत का राजा तो हूँ ही न। मैंने तुम्हें कभी भी रानी से कम नहीं माना। समझी?
समझ गई। आज सब-कुछ समझ गई। मुझे तुम्हारे पास आते ही, एक विशेष प्रकार की बू आने लगती थी; लेकिन वह बू किस चीज की है, समझ नहीं पा रही थी। अब मालूम हुआ कि बू तुम्हारे भीतर बैठे निरंकुश स्वामित्व के विचार की है!
मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि तुम क्या कह रही हो? अबकी बार युवक उलझन में था।
सुनो, पुरुष आज भी उसी सामन्ती-युग में जी रहा है, जहाँ वह हर वस्तु पर अपना एकमात्र अधिकार समझता था। औरत भी उसके लिए एक वस्तु-मात्र होती थी। इसलिए प्यार के मामले में वह अपने आपको राजा कहलाना पसंद करता था। औरत को रानी कहकर लूटता रहता था। मैं तुम्हें ऐसे पुरुषों से भिन्न समझती थी, लेकिन मेरे लिए न तो कोई राजा है, और न ही मैं किसी की रानी हूँ। सभी बूओं में यदि कोई खतरनाक है, तो वह हैसब-कुछ पर स्वामित्व पा लेने की बू।… मैं तो इस बू को कभी सहन नहीं कर सकती।
युवक हतप्रभ-सा वहीं बैठ गया। युवती अपने घर लौट चुकी थी।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
अशोक भाटिया
उसके पिता ने उसे पढ़ाया नहीं था।
उसने सोचामैं अपने बच्चों को जरूर पढ़ाऊँगा।
उसने अपने बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाया।
एक दिन बच्चे ने किताबों की माँग की।
दूसरे दिन बच्चे ने स्कूल-ड्रेस की माँग की।
तीसरे दिन बच्चे ने फीस की माँग की।
वे फसल की कटाई के दिन थे। पिता ने कहाबेटा, फसल मंडी में बिकेगी, तभी मजूरी मिल पायेगी।
मजबूर बेटा पिता का हाथ बँटाने लगा।
एक दिन पाठ याद न होने पर बच्चे को सज़ा मिली।
दूसरे दिन स्कूल-ड्रेस न होने पर बच्चे को घर भेज दिया गया।
तीसरे दिन फीस न भरने पर उसका नाम काट दिया गया।
वह बच्चा फिर कभी स्कूल नहीं गया।
जब वह बड़ा हुआ, तो उसने सोचामैं अपने बच्चों को जरूर पढ़ाऊँगा।
डर
अशोक जैन
वह कभी काफी सालिड रहा है, किन्तु अब?
दिल्ली महानगर:
भीड़-भरे इलाके के चौराहे पर जब तीन ओर से आ रही बसों से कुचले जाने का उसका प्रयास असफल रहा, तो वह बौखला उठा। उसने मौत को एक भद्दी-सी गाली दी थीहरामजादी! जिसे जरूरत है, उसके पास फटकती नहीं; और जो इसके साये से दूर-दूर रहता है, उसे खट-से दबोच लेती है।
अगले रोज़:
अखबार में, शहर में चल रही सर्कस का विज्ञापन पढ़कर उसे लगा कि अब वह मर सकेगा। विज्ञापन थामौत के कुएँ में मोटर-साइकिल चलाने के लिए ट्रेनीज़ की आवश्यकता है।
…आज वह एक सिद्धहस्त चालक माना जाने लगा है। कई कम्पनियों ने उसे पुरस्कृत भी किया है। वह अब मरना नहीं चाहता। मौत उसकी दहलीज़ पर डेरा डाले बैठी है।
वह डरा-डरा-सा रहने लगा है।
कराहटें
विकेश निझावन
बूढ़ी सास बार-बार कराह रही थी—“अरे, कोई है…एक गिलास पानी ही दे दो…।
सास की आवाज़ को अनसुना कर बहू ने बेटे को पढ़ाना शुरू कर दिया—“टू वन्ज़ आर टू, टू टूज़ आर फ़ोर…।
सास के कराहने की आवाज़ पुन: आई तो बहू ने अपना स्वर और ऊँचा कर लिया—“टू वन्ज़ आर टू, टू टूज़ आर फ़ोर!
बार-बार दादी की कराहटें सुन पोता बोल उठा,मम्मी, दादी…!
तो तुम्हारा ध्यान टेबल्ज़ की तरफ़ है ही नहीं! अगर इस बार तेरे नाइन्टी परसेंट नम्बर न आए तो देख…मैं तेरी जान ले लूँगी। कहते हुए मम्मी ने कसकर उसका कान मरोड़ा।
पोते की चीख सुनकर दादी ने कराहना बंद कर दिया था।

Thursday 25 September 2008

हरियाणा का हिंदी लघुकथा लेखन / डा॰ अशोक भाटिया


मित्रो,
‘जनगाथा’ के इस सितम्बर, 2008 अंक से हिंदी लघुकथा के समर्थ हस्ताक्षर डा अशोक भाटिया के शोधपरक लम्बे लेख ‘हरियाणा का हिंदी लघुकथा-लेखन’ को प्रकाशित किया जा रहा है। लेख के समापन तक तदनुरूप लघुकथाओं का चयन भी हरियाणा-केन्द्रित ही रखने का प्रयास रहेगा। -बलराम अग्रवाल

हरियाणा का हिंदी लघुकथा-लेखनडा अशोक भाटिया
‘लघुकथा’ एक ऐसी कथा-रचना है, जिसका फलक और आकार ‘कहानी’ से छोटा है। भारत सहित विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में लघुकथाएँ लिखी गई हैं और लिखी जा रही हैं। अरबी में खलील जिब्रान और फारसी में शेख सादी की लघुकथाएँ विश्व-प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार जर्मन में बर्तोल्त ब्रेख्त, रूसी में इवान तुर्गनेव, अंग्रेजी में कार्ल सैंडबर्ग, चीनी में लू शुन और उर्दू में इब्ने इंशा व सआदत हसन मंटो की लघुकथाएँ विशेष रूप से चर्चित हैं। भारतीय भाषाओं में बांग्ला में रवीन्द्रनाथ टैगोर व बनफूल, मलयालम में एस के पोट्टेक्काट, मराठी में वि स खांडेकर, पंजाबी में श्याम सुंदर अग्रवाल व श्याम सुंदर दीप्ति, उर्दू में जोगिन्दर पाल और गुजराती में मोहनलाल पटेल की लघुकथाएँ महत्वपूर्ण हैं। किंतु हिंदी लघुकथा-साहित्य भारतीय भाषाओं में सबसे अधिक ध्यान खींचता है। डा लक्ष्मीनारायण लाल ने ‘हिंदी साहित्य कोश’(भाग 1) में लिखा है: “आधुनिक कहानी के संदर्भ में लघुकथा का अपना स्वतंत्र महत्व एवं अस्तित्व है। प्रेमचंद, प्रसाद से लेकर जैनेन्द्र, अज्ञेय तक इस धारा की शक्तिशाली गति है।”
हरियाणा के ख्याति-प्राप्त लेखक विष्णु प्रभाकर अपने लघुकथा-संग्रह ‘कौन जीता कौन हारा’(1989) की भूमिका में लिखते हैं—“जब मैंने लिखना शुरू किया था तो सर्वश्री जयशंकर प्रसाद, सुदर्शन, माखनलाल चतुर्वेदी, उपेन्द्रनाथ अश्क, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, जगदीश चन्द्र मिश्र, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, रावी और रामनारायण उपाध्याय आदि सुप्रसिद्ध सर्जक इस क्षेत्र में भी सक्रिय थे।” आदरणीय विष्णु जी के इस कथन से हिंदी लघुकथा की मजबूत पृष्ठभूमि का पता चलता है।

हिंदी लघुकथा : पृष्ठभूमिजब कोई साहित्य-रूप अपने समय की सच्चाइयों का जीवंत दस्तावेज़ होने के साथ ही अपनी स्वतंत्र शैली भी विकसित कर लेता है, तो उसकी स्वतंत्र पहचान स्वयं बन जाती है। हिंदी लघुकथा ने भी अपनी एक संक्षिप्त ही सही, सुदृढ़ यात्रा तय की है तथा वस्तु और शिल्प—दोनों दृष्टियों से अपनी साहित्यिक-उपयोगिता का अनुभव कराया है।
‘छत्तीसगढ़ मित्र’(वर्ष 2, अंक 4, सन 1901) में प्रकाशित पं माधवराव सप्रे(1871-1926) की रचना ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को हिंदी की पहली लघुकथा माना जाता है। इसके बाद प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, सुदर्शन, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि की लघुकथाएँ मिलती हैं। 1947 के बाद और आठवें दशक से पहले हिंदी में ‘समकालीन तेवर वाली लघुकथा’ की एक धारा बननी प्रारम्भ हो गई थी। इस अवधि में आनंद मोहन अवस्थी, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, रामनारायण उपाध्याय, अयोध्या प्रसाद गोयलीय, रामप्रसाद विद्यार्थी ‘रावी’ और श्यामनंदन शास्त्री, भृंग तुपकरी आदि द्वारा रचित प्राय: बोध-वृत्ति से युक्त ‘लघुकथात्मक’ संग्रह प्रकाशित हुए। इसी अवधि में हरियाणा के लब्ध-प्रतिष्ठ रचनाकार विष्णु प्रभाकर का लघुकथा-संग्रह ‘जीवन पराग’(1963) प्रकाशित हुआ।
आठवें दशक में हिंदी लघुकथा एक सहज आंदोलन के रूप में सामने आई, जिसमें मुख्य रूप से तत्कालीन युवा-पीढ़ी के आक्रोश को सशक्त अभिव्यक्ति मिली। इसमें हरियाणा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। कमलेश्वर के संपादन में जुलाई 1973 का ‘सारिका’ का लघुकथा-विशेषांक लघुकथा के इतिहास में मील का पत्थर सिद्ध हुआ; लेकिन इसके आसपास हरियाणा से लघुकथा के दो अति-महत्वपूर्ण विशेषांक आ चुके थे। पहला, इससे पहले मई 1973 में महावीर प्रसाद जैन के संपादन में ‘दीपशिखा’ का लघुकथा-विशेषांक कैथल से; तथा दूसरा, इसके तुरंत बाद अगस्त 1973 में रमेश बतरा के संपादन में कहानी लेखन महाविद्यालय, अंबाला छावनी की मासिक पत्रिका ‘तारिका’ का लघुकथा-विशेषांक। इस प्रकार समकालीन तेवर के लघुकथा-लेखन की स्थापना में हरियाणा का योगदान ऐतिहासिक महत्व का रहा है। तब से अब तक लघुकथा के लेखन, संपादन और समीक्षण—तीनों ही क्षेत्रों में हरियाणा निरंतर सक्रिय है। इन दिनों प्रमुखत: ‘हरिगंधा’(पंचकूला), ‘हरियाणा संवाद’(चंडीगढ़) और ‘शुभ तारिका’(अम्बाला छावनी) पत्रिकाएँ लघुकथा के विकास में अपनी भूमिका सकारात्मक रूप में निभा रही हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका ‘हरिगंधा’ का प्रवेशांक 1987 में आया था, जिसमें अशोक भाटिया(करनाल) की लघुकथाएँ और नंदलाल मेहता(गुड़गाँव) का ‘लघुकथा का शिल्प’ शीर्षक लेख शामिल था। तब से अब तक, अपने लगभग हर अंक में यह पत्रिका लघुकथा को समुचित सम्मान दे रही है। ‘हरिगंधा’ का जुलाई 2007 अंक लघुकथा-विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ। ‘तारिका’(पिछले काफी समय से ‘शुभ तारिका’) नियमित रूप से लघुकथाएँ प्रकाशित करती आ रही है। लघुकथाओं को प्रमुखता के साथ प्रकाशित करने वाले, किंतु अब स्थगित हो चुके पत्र-पत्रिकाओं में ‘पींग’(रोहतक, संपादक: डी आर चौधरी), विश्वमानव(करनाल, संपादक: ---), ‘आगमन’(रेवाड़ी, संपादक: तरुण जैन) और ‘राही’(गुड़गाँव, संपादक: मुकेश शर्मा) प्रमुख हैं। इनमें ‘आगमन’ का 1985 में प्रकाशित लघुकथा-विशेषांक और ‘राही’ का 1986 में प्रकाशित लघुकथा-समीक्षा अंक ध्यान आकर्षित करते हैं। कुरुक्षेत्र से प्रकाशित ‘कुरुशंख’ पत्रिका का 1980 में, शमीम शर्मा के अतिथि-संपादन में लघुकथा-विशेषांक आया और अपने अखिल भारतीय स्वरूप के कारण देशभर में चर्चित रहा। अंबाला छावनी से अगस्त 2002 व सितंबर 2005 में उर्मि कृष्ण के संपादन में ‘तारिका’ के अंक भी लघुकथा-विशेषांक के रूप में सामने आए। (शेष आगामी अंक में)………

लघुकथाएँ

अमरतापूरन मुद्गल
इमली का वह पेड़ कब और किसने लगाया था, किसी को मालूम नहीं है। स्कूल के आँगन में खड़ा वह पेड़ बच्चों के लिए विशेष आकर्षण बना रहता था। जब इमली की फलियाँ लगतीं, तो बच्चे उन्हें तोड़ने के लिए उस पर चढ़ जाते और चटखारे लेकर उनकी खटाई का आनन्द लेते। चपरासी ने पेड़ के साथ घण्टी बाँध रखी थी। जब किसी लड़के को घण्टी बजाने के लिए कहा जाता तो वह घण्टी बजाने से पहले पेड़ के नीचे चारों ओर नजर घुमाता और उसे कहीं कोई फली नजर आ जाती, तो मुँह में डाल लेता।
हर वर्ष स्कूल में नए बालक प्रवेश लेते और पुराने परीक्षा पास करके स्कूल छोड़ जाते। इमली के पेड़ से नए बच्चों का रिश्ता स्थापित हो जाता और पुरानों का टूट जाता।
इस बार गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुला, तो मैंने देखा कि इमली का पेड़ सूख गया है। माली ने छोटी-बड़ी सब टहनियाँ काट दी हैं और केवल तना शेष रह गया है। कुछ ही दिनों में उसे भी काटकर गिरा दिया जाएगा। चपरासी ने तने से बँधी घण्टी उतार ली थी और उसे बरामदे में कील के सहारे लटका दिया था।
रविवार को छुट्टी थी, लेकिन मैं किसी कार्यवश स्कूल गया था। सूखे तने के पास ही इमली का एक बीज अंकुरित हो गया था। माली उसके चारों ओर बड़ी सावधानी से ईंटों की बाड़ खड़ी कर रहा था। मैं उस अंकुर को टकटकी बाँधकर देख रहा था। मुझे लगा, जैसे वह अंकुर बड़ा पेड़ बन गया है…चपरासी ने उसके तने के साथ घण्टी बाँध दी है और लड़के उस पर चढ़ गये हैं और असंख्य हरी-पीली पत्तियों में लटकी फलियों को तोड़ रहे हैं।…अचानक, एक दिन वह पेड़ ठूँठ में बदल जाता है। पास ही उस पेड़ से गिरा एक बीज अंकुरित हो रहा है।…और फिर पेड़…और फिर अंकुर…

दयापृथ्वीराज अरोड़ा
दसवीं क्लास का हिंदी का अध्यापक, जो अपने रहन-सहन, उच्च-आचरण और दयाभाव के लिए स्कूल-भर में विख्यात था, नयी क्लास को संबोधित कर रहा था—
“जीवन में सादे रहन-सहन और उच्च-आचरण से दयाभाव का महत्व कहीं ज्यादा है। असल में, जिसमें दयाभाव नहीं है, वह आदमी कहलाने का हकदार नहीं है। राजकुमार गौतम एक दिन घूमते हुए दूर तक निकल गये। एक जगह एक मछुआ मछलियों को जाल में फाँसकर किनारे पर रखे बरतन में फेंक रहा था। वह कुछ पल मछुए द्वारा पकड़ी गई मछलियों को, जो बिना पानी के तड़प रही थीं, देखते रहे; फिर मछुए से पूछा, “इन मछ्लियों का क्या करोगे?”
मछुए ने जवाब दिया, “बाजार में बेचूँगा।”
“कितने की बिक जायेंगी?” राजकुमार का अगला प्रश्न था।
“यही कोई चार या पाँच रुपये की।”
राजकुमार ने सोने की अपनी अँगूठी मछुए को देकर सारी मछलियाँ ले लीं और उन्हें दोबारा पानी में फेंक दिया। राजकुमार के दयाभाव से हमें सीख लेनी चाहिए।”
एक लड़का उठा।
“कुछ कहना चाहते हो?”
“हाँ श्रीमान!”
“कहो!”
“मैं एक मछुए का बेटा हूँ। मेरा बाप हर रोज मछलियाँ पकड़कर बेचता है। लगभग हर रोज, कुछ मछ्लियाँ बच जाती हैं और किसी अन्य सब्जी के स्थान पर हमें मछली खानी पड़ती है। जब मछलियों को छीला जाता है, तो मेरे मन में कुछ होने लगता है। कल रात मैंने खाना खाने से इंकार कर दिया, क्योंकि मैंने मछली के बजाय किसी दूसरी सब्जी की माँग की थी; परन्तु मेरे माँ-बाप ने मेरी प्रार्थना पर कोई ध्यान नहीं दिया और उल्टे डाँट दिया। मैं भूखा ही सो गया। आधी रात को मेरी नींद खुली। मुझे बेहद भूख लगी थी। ऐसा लग रहा था कि अगर मैंने खाना नहीं खाया तो प्राण निकल जायेंगे। मेरे लिए उन मछलियों को खाने के सिवा कोई चारा न था।”
लड़के का कंठ भारी हो गया। उसने अध्यापक की ओर रुआँसी आँखों से देखा।
अध्यापक ने लड़के द्वारा कही गई सच्चाई पर सोचा। फिर अपनी मोटी-मोटी किताबों को बगल में दबाए, लड़के के पास आया…और उसके कंधे थपथपाकर कक्षा के बाहर हो गया!

चेतनामधुकांत

हल्का होना भी तो अनिवार्य है। पत्नी पर बस न चले, तो नौकर पर…चाहे किसी पर भी।
गोदाम में आए, तो सेठ जी ने पल्लेदार पर ही हल्का हो लेना चाहा—
“अरे हरामजादे हरकू…अकल मारी गई तेरी…देखता नहीं, सारा अनाज धरती में गिरता जा रहा है!”
“क्या करूँ सेठ जी, बोरी फटी हुई है।” नम्रता से उत्तर दिया गया।
“अबे गधे, हाथ क्यों नहीं लगा लेता? गल जाएगा क्या। शाम को चार रुपये के लिए तो हाथ बड़ी जल्दी फैला देगा और काम धेले का नहीं…” स्वर पहले से अधिक कर्कश हो गया था।
जमीन ही कम थी जो पल्लेदारी करनी पड़ती थी। बोझ से निकलकर नजर सेठ की तोंद का परिमाप नापने लगी…हर साल बढ़ता है, लेकिन वह अनाज पैदा करके, सिर पर उठाकर भी अपने अन्दर सिकुड़ता जा रहा है।
“अरे, रुक क्यों गया पाजी, देखता नहीं—बादल चढ़ आये हैं। जल्दी माल उतार।” बादलों की गरज से सेठ का स्वर दब गया था।
“अब मुझसे नहीं उठती बोरी, सेठ जी।”
वहीं उतार दिया हरकू ने बोझ को।
“नहीं उठती…क्यों? क्या हुआ? मेरा सारा माल खराब हो जाएगा…चल, तुझे शाम को एक रुपया फालतू दूँगा…जल्दी कर।” लालच फेंका सेठ ने।
“नहीं सेठ जी, मुझे भी जाकर अपनी छत को ठीक करना है। सारी चूती है।”
“अबे, रोटी कहाँ से खाएगा…?”
“रोटी तो मैं ही पैदा करता हूँ।” कहकर हरकू बाहर निकल गया। पानी गिरने लगा। सेठ ने बहुत लालच दिया, पर कोई मजदूर काम पर नहीं आया।
सामने, गरीब बस्ती में, मजदूर अपनी छतों पर मिट्टी चढ़ा रहे थे।
वर्षा तीव्र होती जा रही थी।

ज्योति चौकप्रेमसिंह बरनालवी

“कमाल करती हो जी! रात का मतलब यह तो नहीं कि मुँह-माँगे पैसे दे दूँ!! शहर अपना है। कल तक हम यहाँ कच्छे-बनियान में घूमने आ जाते थे।”
“अब तुम बच्चे नहीं, बल्कि एक बच्चे के बाप हो।”
“हमारे पास कौन सा सामान है जो…। बस, पाँच-सात मिनट का रास्ता है।”
“आधी रात के उस सन्नाटे में थोड़ी दूर चलने के बाद उसे लगा—जान बड़ी और पैसा छोटा। शहर उसका नहीं, पुलिस वालों का(नहीं, वे लोग तो खुद जान बचाते नजर आते हैं), आतंकवादियों का या अपने ही बनाए अँधेरे से भयभीत भगवान का।”
शास्त्री मार्किट के चौराहे से करीब सौ गज पहले उन्हें किसी के तेज कदमों की आहट सुनाई दी।
“अजी, दो पगड़ी वाले!” पत्नी ने भयातुर स्वर में कहा।
“रुको मत…और तेज…” कहते पति का जैसे कण्ठ सूख गया। पाँवों में जैसे किसी ने अचानक बेड़ियाँ डाल दी हों।
“अजी, वो आवाज दे रहे हैं!”
“चुप!”
“यदि गोली मार दी?”
क्षण सोच पुरुष ने कहा, “ऐसे मरने से क्यों न अपनी बात कहकर…शायद उन्हें तरस आ जाए। अच्छा…रुक ही जाएँ।”
पीछा करने वाले करीब पहुँच चुके थे।
एक—“भाईसाहब, आप घबराइये मत्। हमें एन बी चौक तक जाना है। आजकल सी आर पी तैनात है…सोचा, आप लोग रहेंगे तो हमें…”
उनकी जैसे जान में जान आई। पुरुष ने कहा,“हमे भी ज्योति चौक तक जाना है। अपनी पुलिस से हमें भी डर लगने लगा है। आप लोगों को…”

आगरामनिवास मानव
मौहल्ले में आग लग गई थी।
वह यह सोचकर निश्चिन्त था कि आग बहुत दूर है तथा उसका घर पूर्णतया सुरक्षित है।
आग कुछ नज़दीक आ गई तो वह थोड़ा चिन्तित हुआ; लेकिन कुछ करने की आवश्यकता उसने अब भी नहीं समझी।
आग उसके पड़ोसी के घर तक आ गई, तब भी वह हाथ-पर-हाथ धरे बैठा रहा।
‘पड़ोसी के लिए वह अपने हाथ क्यों झुलसाए?’—मन-ही-मन वह सोचता है।
अब जलने की बारी उसके घर की थी। आग बुझाने के लिए वह कुछ कर पाता, इससे पूर्व ही, आग उसके घर को राख में बदलकर अगले घर तक जा पहुँची थी।



धर्म की लपेटसुरेन्द्र वर्मा

एक बाप के चार लड़के थे। वे बड़े भोले, ईमानदार और सच्चे थे। उनका पिता उन्हें विद्वान बनाना चाहता था, इसलिए उसने अपने लड़कों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए अलग-अलग जगह भेजा—
पहला—मन्दिर में।
दूसरा—मस्जिद में।
तीसरा—गिरजे में।
चौथा—गुरुद्वारे में।
शिक्षा लेने के बाद वे अपने-अपने धर्म के विद्वान बन गये। विद्या लेने के बाद चारों अपने घर वापस आ गये और अपने पिता को अपने-अपने धर्म के बारे में बताकर पूछने लगे—“बोलो बापू, कौन-सा धर्म अच्छा है?”
बापू ने कहा, “सभी धर्म अच्छे हैं बच्चो!”
“नहीं, तुम्हें एक धर्म को अच्छा बताना ही पड़ेगा। नहीं तो…”
“नहीं तो…क्या?”
“नहीं तो… हम तुम्हें मार देंगे।“
और फिर, चारों ने अपने बापू का खून कर दिया।

दूसरा सचरूप देवगुण
घर के सभी सदस्य कमरे में बैठे गप्प-शप्प मार रहे थे। अचानक, पड़ोसी जवान लड़के—सुजीत का प्रसंग छिड़ गया।
पिता ने कहा, “कितना अच्छा है सुजीत! हमारे घर के सारे काम-काज सहर्ष कर देता है।”
माँ बोली, “कितना भला है सुजीत, कई बार जेब से पैसे लगा देता है और बहुत कहने पर भी वापिस नहीं लेता।”
मुन्ना भी रह न सका,“सचमुच, सुजीत बहुत ही प्यारा है। मुझे कई बार खिलौने भी ला देता है।”
बड़ी बेटी, जो पास बैठी चुपचाप सारी बातें सुन रही थी, उठकर कमरे से बाहर चली गई। वह जानती थी कि इन सब कामों के बदले में वह उससे बहुत-कुछ प्राप्त करने की कोशिश करता रहता है।

Friday 15 August 2008

जनगाथा अगस्त 2008


जनगाथा की ओर से समस्त भारत-प्रेमियों को भारतीय-स्वाधीनता के 62वें पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
लघुकथा-समीक्षा के मानदण्ड
उमेश महादोषी

कथा-साहित्य में लघुकथा, जो कि विकासशील सम्भावनाओं के कारण एक विशिष्ट कथा-विधा के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है, सम्पूर्ण समीक्षा के मानदण्डों के अभाव से अभी भी जूझ रही लगती है। लघुकथा की अपनी विशेष पहचान है, अपना स्वभाव, अपनी प्रवृत्ति है जो कहानी से सर्वथा भिन्न है। परन्तु उसकी समीक्षा के जो मानदण्ड अब तक सामने आये हैं वे या तो प्रमुखत: कहानी के हैं या मात्र संरचनात्मक तत्वों की समीक्षा तक सीमित होने के कारण आधे-अधूरे हैं। इसलिए जरूरी है कि लघुकथा की सम्पूर्ण समीक्षा के मानदण्ड निर्धारित हों।
एक रचना-विधा की समीक्षा के मानदण्ड दूसरी रचना-विधा के मानदण्डों से अलग होते हैं। अत: विधा-विशेष की समीक्षा के मानदण्डों को अलग से पहचानने के लिए उन्हें रचना-सृजन की कसौटी को दृष्टिगत रखते हुए तीन विभागों में रेखांकित किया जा सकता है:
(1) रचना का विधागत-स्वभाव
(2) उसके संरचनात्मक तत्व, तथा
(3) रचना की वैचारिक यात्रा
यद्यपि उपर्युक्त तीनों विभागों के अन्तर्गत किसी न किसी अर्थ में रचना के संरचनात्मक तत्वों की ही समीक्षा होती है, क्योंकि विधागत स्वभाव और वैचारिक यात्रा को रचना के संरचनात्मक तत्वों से पूर्णत: अलग नहीं किया जा सकता। तथापि रचना को इन तीनों समीक्षा-विभागों में रखकर उसकी सम्पूर्ण विशिष्टता के साथ अधिक गहराई तक परखा जा सकता है।
हर विधा का अपना स्वभाव-विशेष होता है जिसके आधार पर रचना-विशेष को विधा-विशेष की श्रेणी में रखा जाता है। यह स्वभाव रचना की मान्य विशिष्ट प्रवृत्तियों, उसके आकार एवं शिल्पगत तत्वों आदि से सम्बन्धित हो सकता है। समीक्षक को विधा-विशेष की रचना में इन सबकी उपस्थिति की समीक्षा करनी होती है। दूसरे विभाग के अन्तर्गत संरचनात्मक तत्वों के निर्धारण, संयोजन, समन्वयन और उनकी प्रकृति की समीक्षा शामिल है। समीक्षक को देखना चाहिए कि समस्त आवश्यक संरचनात्मक तत्वों का समुचित निर्धारण व संयोजन तथा उनमें परस्पर उपयुक्त समन्वय है या नहीं। उन तत्वों की प्रकृति क्या है? अर्थात वे स्वाभाविक, प्रभावोत्पादक, मान्य व ग्राह्य हैं या नहीं। तीसरी समीक्षा रचना की वैचारिक यात्रा की करनी होती है। देखना होता है कि रचना की वैचारिक जमीन क्या है? वह जीवन के कितनी निकट है। रचना की वैचारिक-यात्रा काल और स्थान के परिप्रेक्ष्य में गतिशील होती है। एक अच्छी रचना से अभिजात्यता से इतर हर हाल में सृजनात्मकता की अपेक्षा की जाती है।
जहाँ तक यथार्थ का प्रश्न है, वह दो प्रकार का है। एक वह, जो है और दूसरा वह, जो होना चाहिए। प्रत्येक विवेकशील समीक्षक को रचना-समीक्षा के दौरान ‘जो है’ से ‘जो होना चाहिए’ तक की यात्रा अनिवार्यत: तय करनी चाहिए।

लघुकथाएँ

हलराजगोपाल सिंह

“ओफ्फोह, तुम्हें कितनी बार समझाया है कि जब दो बड़े लोग आपस में बातें कर रहे हों तो…ठहरो, लो तुम इन टुकड़ों को जोड़कर लाओ। ये टुकड़े भारतवर्ष के नक्शे के हैं, समझी।”
रामप्रसाद ने चैन की साँस ली, हमने भी। चलो, कुछ देर के लिए बला टली। न टुकड़े जुड़ेंगे और न…। हम फिर सांप्रदायिकता की समस्या को सुलझाने में जुट गये।
लेकिन हमें आश्चर्यचकित हो जाना पड़ा, जब मात्र दस मिनट बाद ही रामप्रसाद की बिटिया ने मानचित्र के उन टुकड़ों को जोड़कर हमारे सामने रख दिया।
“अरे, तुमने इतनी जल्दी इन टुकड़ों को कैसे जोड़ लिया?” रामप्रसाद ने पूछा।
“देखिए पापा, इस नक्शे के पीछे एक आदमी की फोटो बनी है…हम उसके नाक, कान, हाथ, पैर जोड़ते गये और बस्…नक्शा बन गया।”
बिटिया की मासूम हँसी हमारे भीतर पैठ रही थी और हम दोनों एक दूसरे को विस्मय से देख रहे थे।

अंतिम गरीब
जगदीश कश्यप

दरबान ने आकर बताया कि कोई फरियादी उनसे जरूर मिलना चाहता है। उन्होंने मेहरबानी करके भीतर बुलवा लिया। फरियादी झिझकता-झिझकता उनके दरबार में पेश हुआ तो वे चौंक पड़े। उन्हें आश्चर्य हुआ कि वह वहाँ कैसे आ गया! फिर यह सोचकर कि उन्हें भ्रम हुआ है, उन्होंने पूछ लिया—“कौन हो?”
“मैं गरीबदास हूँ सरकार।”
“गरीबदास! तुम? तुम्हें तो मैंने दफन कर दिया था!!”
“भूखे पेट रहा नहीं गया माई-बाप। इसलिए उठकर चला आया।”
“अब क्या चाहते हो?”
“कुछ खाने को मिल जाए हुजूर्।”
“अभी देता हूँ।” उसे आश्वासन देकर उन्होंने सामने दीवार पर टँगी अपनी दुनाली उतार ली,“यह लो खाओ…!”
दुनाली ने दो बार आग उगल दी। गरीबदास वहीं ढेर हो गया।
“दरबान, इसे लेजाकर दफना दो। इस कमीने ने तो तंग ही कर दिया है…।”

दूसरे दिन जब वह गरीबी-उन्मूलन के प्रारूप को अंतिम रूप दे रहे थे तो दरबान हड़बड़ाया हुआ-सा उनके कमरे में जा घुसा। उसकी घिग्घी बँधी हुई थी।
“मरे क्यों जा रहे हो?” उन्होंने डाँटा।
“हुजूर-हुजूर…” दरबान ने भयभीत आँखों से बाहर द्वार की ओर संकेत करते हुए कहा, “वही फरियादी फिर आ पहुँचा है…!!!”

मैं वही भगीरथ हूँ
शरद जोशी
मेरे मोहल्ले के एक ठेकेदार महोदय अपनी माता को गंगा-स्नान कराने हरिद्वार ले गये। गंगा के सामने एक धर्मशाला में ठहरे। सोचा, किनारे तक टहल आएँ। वे आये और गंगा-किनारे खड़े हो गये। तभी उन्होंने देखा कि एक दिव्य-पुरुष वहीं खड़ा एकटक गंगा को निहार रहा है। ठेकेदार महोदय उस दिव्य व्यक्तित्व से बड़े प्रभावित हुए। पास गये और पूछने लगे—“आपका शुभ नाम?”
“मेरा नाम भगीरथ है।” उस दिव्य पुरुष ने कहा।
“मेरे स्टाफ में ही चार भट भगीरथ हैं। जरा अपना विस्तार से परिचय दीजिए।”
“मैं वही भगीरथ हूँ जो वर्षों पूर्व इस गंगा को यहाँ लाया था। उसे लाने के बाद ही मेरे पुरखे तर सके।”
“वाहवा, कितना बड़ा प्रोजेक्ट रहा होगा! अगर ऐसा प्रोजेक्ट मिल जाए तो पुरखे क्या, पीढ़ियाँ तर जाएँ।”

गरीबा
आनंद बिल्थरे

“तुम कौन हो?” सरपंच ने पूछा।
“गरीबा।” उसने उत्तर दिया।
“तुम कैसे हो सकते हो? उसकी तो मौत नहर में डूबने से हो चुकी है!” सरपंच ने अचरज-से कहा।
“सरपंच जी, मैं गरीबा ही हूँ। इसी गाँव का जन्मा। मैं यहाँ हर एक को जानता हूँ।”
“हर एक को जानने से तो साबित नहीं होता कि तुम ही गरीबा हो।”
“हुजूर, मैं तीरथ यात्रा पर गया था। रास्ते में रेल दुर्घटना हो गयी। मैं कई दिनों तक जिन्दगी और मौत की लड़ाई देखता रहा। इसी में मेरी आँख और टाँग जाती रहीं।”
“लेकिन तेरी लाश की शिनाख्त चारों पंचों ने मिलकर की है…इसलिए तू सरकारी रिकार्ड के मरा जान लिया गया है।”
“माई-बाप मेरा घर, मेरे खेत…।”
“तुम्हारा नहीं, उस गरीबा का, जो तीर्थ जाने से पूर्व अपना सब-कुछ पंचायत को दान कर गया था।”
“हुजूर, मुझे मरा मान लिया जावे, लेकिन मेरी जायदाद को तो वापिस लौटा दिया जाए।”
“यह कैसे हो सकता है? उस घर में अब बालबाड़ी लगती है…खेत पंचायत की मिल्कियत हैं।”
“मैं बेमौत मर जाऊँगा सरकार!”
“देखो, हमें गरीबा की मौत का दुख है। उसका क्रिया-कर्म भी हमने निपटा दिया है। पंचायत को दान करने वाले गरीबा का फोटो मँढ़वाकर पंचायत-भवन में टाँग दिया है। तुम न जाने कौन हो, जो अपने को गरीबा बताकर उसके पुण्य को कम करना चाहते हो?”
“साहब, मैं ही गरीबा हूँ और मैंने कोई दान नहीं दिया है।”
“तुम जरूर बहुरूपिये हो। गरीबा के भेष में हमें डराना चाहते हो।”
“तुम सब अंधे युग के दुर्योधन हो…जब भगवान कृष्ण तुमको नहीं समझा सके तो मैं तो एक साधारण आदमी हूँ…।”
सरपंच के हुक्म से उसे खदेड़कर गाँव से बाहर कर दिया गया। दूसरे दिन उन्हें खबर मिली कि नामालूम आदमी ने पहाड़ी वाले कुएँ में कूदकर जान दे दी। उन्होंने जाकर देखा। लाश देखकर वे होठों ही होठों में मुस्कराये और घर आकर वारदात की तहरीर के साथ सौ-सौ के पाँच नोट नत्थी कर कोतवाली भिजवा दिये।

वे चेहरेदेवीप्रकाश हेमंत
बेहद शौक है मेरी बेटी दीप्ति को अखबार पढ़ने का। एक दिन वह दौड़ी-दौड़ी आई और बोली—“पापा-पापा, देखिए तो…अखबार में छपा है कि विदेश में एक ऐसा पेड़ होता है जिसके नीचे खड़े हो जाएँ तो उसकी पत्तियाँ हमारा सारा खून चूस लें।”
“अरे बेटी, तू पेड़ की बात करती है! वे तो एक ही बार में पूरा खून चूस लेते हैं। अपने देश में तो ऐसे आदमखोर हैं जिनके पंजे में एक बार कोई फँस जाए तो उसका व उसकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी का खून चूसते रहते हैं। उनके चंगुल में फँसे लोग बेचारे तड़पते रहते हैं, चूँ भी नहीं कर पाते।”
“सच पापा! ऐसे कौन पिशाच हैं?”
“बेटी, गरीब-गुरबों की आँखों में झाँककर देख। वे चेहरे साफ-साफ दिखाई दे जायेंगे।”

घोड़े की संवेदना

संतोष सरस

“कहो दोस्त, गौदोलिया चलोगे?”
“चलूँगा बाबूजी।”
“क्या लोगे?”
“दो रुपये।”
“मित्र, गौदोलिया तक का तो डेढ़ रुपया ही होता है!”
“दो से कम न लूँगा, रात बहुत हो गयी है।”
मैं रिक्शे पर सवार हो गया। मैंने यूँ ही कहा—भाई, सच बताओ, दो रुपया ज्यादा है कि नहीं? वैसे तो मैं दो रुपया दे ही रहा हूँ, दस-पाँच पैसे और भी दे सकता हूँ, लेकिन…।”
“बाबूजी, कभी-क्भी डेढ़ पर भी चला जाता हूँ। मौके-मौके की बात है। इस समय रात बहुत हो गयी है…।”
“यदि मेरे पास डेढ़ ही रुपये होते तो क्या तुम मुझे न ले चलते?”
“ले क्यों नहीं चलता!” थोड़ी देर रुककर उसने कहा,“बाबूजी, घोड़े का काम जरूर करता हूँ, पर घोड़ा थोड़े ही हूँ!”

ममताअन्तरा करवड़े
ऊँ…आँ…।
नवजात-शिशु के रुदन से कमरा गूँज उठा। प्राची ने उनींदी, थकी आँखों से देखा—शाम के पाँच बज रहे थे। घण्टा-भर पहले ही तो इसे दूध पिलाकर सुलाया था। कल रातभर भी रो-रो कर जागता रहा था। प्राची को खीझ हो आई। पन्द्रह-बीस दिन के उस नन्हें जीव को गुड़िया जैसे उठाकर उसने गोदी में ले लिया। माँ का स्पर्श पाते ही वह गुलगोथना शिशु सन्तुष्ट हो गया। अपनी बँधी मुट्ठियों की नन्हीं, मूँगफली के दूधभरे दानों के जैसी उँगलियों को ही मुँह में लेकर चूसने लगा।
तभी प्राची की माँ वहाँ आई।
“उठ गया क्या हमारा राजकुमार? चलो, अब घूँटी पीने का समय हो गया है।”
“क्या माँ! मैं तो परेशान हो गयी हूँ इससे।” प्राची तुनक पड़ी।
“क्या हुआ?”
“क्या क्या हुआ? सोने भी नहीं देता ढंग से। एक तो रात-रात भर जागता रहता है। हर घंटे-दो घंटे में दूध चाहिए। कभी नैपी गन्दा करता है तो कभी गोदी में रहना होता। ऐसा ही रहेगा क्या ये?” प्राची रुआँसी होने लगी।
प्रसव के लिए मायके आई बेटी की इस परेशानी को समझते हुए माँ उसके पलंग पर ही पालथी लगाकर बैठ गयी। नन्हें शिशु को अपनी गोदी में लिया और प्राची का सिर भी अपनी गोदी में रखकर उसे थपथपाने लगी। उनकी आँखों से आँसू बह चले। एक प्राची के गाल पर गिरा। उसने हड़बड़ाकर माँ को देखा। वो बड़बड़ा रही थीं: जब तक इसे माँ चाहिए, तब तक यह सुख भोग ले बेटी। आजकल पराए परदेसों का कोई भरोसा नहीं है। वो धरती निगल जाती है हमारे लाड़लों को।
माँ प्राची के बड़े भैया की सामने ही रखी तस्वीर को देखे जा रही थी जो पिछले दस वर्षों से विदेश से वापस ही नहीं आये थे।
नन्हें शिशु ने प्राची की उँगली अपने मैदे-से हाथ में थाम ली थी। प्राची ने अब उसे नहीं छुड़ाया।