Thursday 25 September 2008

हरियाणा का हिंदी लघुकथा लेखन / डा॰ अशोक भाटिया


मित्रो,
‘जनगाथा’ के इस सितम्बर, 2008 अंक से हिंदी लघुकथा के समर्थ हस्ताक्षर डा अशोक भाटिया के शोधपरक लम्बे लेख ‘हरियाणा का हिंदी लघुकथा-लेखन’ को प्रकाशित किया जा रहा है। लेख के समापन तक तदनुरूप लघुकथाओं का चयन भी हरियाणा-केन्द्रित ही रखने का प्रयास रहेगा। -बलराम अग्रवाल

हरियाणा का हिंदी लघुकथा-लेखनडा अशोक भाटिया
‘लघुकथा’ एक ऐसी कथा-रचना है, जिसका फलक और आकार ‘कहानी’ से छोटा है। भारत सहित विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में लघुकथाएँ लिखी गई हैं और लिखी जा रही हैं। अरबी में खलील जिब्रान और फारसी में शेख सादी की लघुकथाएँ विश्व-प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार जर्मन में बर्तोल्त ब्रेख्त, रूसी में इवान तुर्गनेव, अंग्रेजी में कार्ल सैंडबर्ग, चीनी में लू शुन और उर्दू में इब्ने इंशा व सआदत हसन मंटो की लघुकथाएँ विशेष रूप से चर्चित हैं। भारतीय भाषाओं में बांग्ला में रवीन्द्रनाथ टैगोर व बनफूल, मलयालम में एस के पोट्टेक्काट, मराठी में वि स खांडेकर, पंजाबी में श्याम सुंदर अग्रवाल व श्याम सुंदर दीप्ति, उर्दू में जोगिन्दर पाल और गुजराती में मोहनलाल पटेल की लघुकथाएँ महत्वपूर्ण हैं। किंतु हिंदी लघुकथा-साहित्य भारतीय भाषाओं में सबसे अधिक ध्यान खींचता है। डा लक्ष्मीनारायण लाल ने ‘हिंदी साहित्य कोश’(भाग 1) में लिखा है: “आधुनिक कहानी के संदर्भ में लघुकथा का अपना स्वतंत्र महत्व एवं अस्तित्व है। प्रेमचंद, प्रसाद से लेकर जैनेन्द्र, अज्ञेय तक इस धारा की शक्तिशाली गति है।”
हरियाणा के ख्याति-प्राप्त लेखक विष्णु प्रभाकर अपने लघुकथा-संग्रह ‘कौन जीता कौन हारा’(1989) की भूमिका में लिखते हैं—“जब मैंने लिखना शुरू किया था तो सर्वश्री जयशंकर प्रसाद, सुदर्शन, माखनलाल चतुर्वेदी, उपेन्द्रनाथ अश्क, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, जगदीश चन्द्र मिश्र, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, रावी और रामनारायण उपाध्याय आदि सुप्रसिद्ध सर्जक इस क्षेत्र में भी सक्रिय थे।” आदरणीय विष्णु जी के इस कथन से हिंदी लघुकथा की मजबूत पृष्ठभूमि का पता चलता है।

हिंदी लघुकथा : पृष्ठभूमिजब कोई साहित्य-रूप अपने समय की सच्चाइयों का जीवंत दस्तावेज़ होने के साथ ही अपनी स्वतंत्र शैली भी विकसित कर लेता है, तो उसकी स्वतंत्र पहचान स्वयं बन जाती है। हिंदी लघुकथा ने भी अपनी एक संक्षिप्त ही सही, सुदृढ़ यात्रा तय की है तथा वस्तु और शिल्प—दोनों दृष्टियों से अपनी साहित्यिक-उपयोगिता का अनुभव कराया है।
‘छत्तीसगढ़ मित्र’(वर्ष 2, अंक 4, सन 1901) में प्रकाशित पं माधवराव सप्रे(1871-1926) की रचना ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को हिंदी की पहली लघुकथा माना जाता है। इसके बाद प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, सुदर्शन, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि की लघुकथाएँ मिलती हैं। 1947 के बाद और आठवें दशक से पहले हिंदी में ‘समकालीन तेवर वाली लघुकथा’ की एक धारा बननी प्रारम्भ हो गई थी। इस अवधि में आनंद मोहन अवस्थी, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, रामनारायण उपाध्याय, अयोध्या प्रसाद गोयलीय, रामप्रसाद विद्यार्थी ‘रावी’ और श्यामनंदन शास्त्री, भृंग तुपकरी आदि द्वारा रचित प्राय: बोध-वृत्ति से युक्त ‘लघुकथात्मक’ संग्रह प्रकाशित हुए। इसी अवधि में हरियाणा के लब्ध-प्रतिष्ठ रचनाकार विष्णु प्रभाकर का लघुकथा-संग्रह ‘जीवन पराग’(1963) प्रकाशित हुआ।
आठवें दशक में हिंदी लघुकथा एक सहज आंदोलन के रूप में सामने आई, जिसमें मुख्य रूप से तत्कालीन युवा-पीढ़ी के आक्रोश को सशक्त अभिव्यक्ति मिली। इसमें हरियाणा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। कमलेश्वर के संपादन में जुलाई 1973 का ‘सारिका’ का लघुकथा-विशेषांक लघुकथा के इतिहास में मील का पत्थर सिद्ध हुआ; लेकिन इसके आसपास हरियाणा से लघुकथा के दो अति-महत्वपूर्ण विशेषांक आ चुके थे। पहला, इससे पहले मई 1973 में महावीर प्रसाद जैन के संपादन में ‘दीपशिखा’ का लघुकथा-विशेषांक कैथल से; तथा दूसरा, इसके तुरंत बाद अगस्त 1973 में रमेश बतरा के संपादन में कहानी लेखन महाविद्यालय, अंबाला छावनी की मासिक पत्रिका ‘तारिका’ का लघुकथा-विशेषांक। इस प्रकार समकालीन तेवर के लघुकथा-लेखन की स्थापना में हरियाणा का योगदान ऐतिहासिक महत्व का रहा है। तब से अब तक लघुकथा के लेखन, संपादन और समीक्षण—तीनों ही क्षेत्रों में हरियाणा निरंतर सक्रिय है। इन दिनों प्रमुखत: ‘हरिगंधा’(पंचकूला), ‘हरियाणा संवाद’(चंडीगढ़) और ‘शुभ तारिका’(अम्बाला छावनी) पत्रिकाएँ लघुकथा के विकास में अपनी भूमिका सकारात्मक रूप में निभा रही हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका ‘हरिगंधा’ का प्रवेशांक 1987 में आया था, जिसमें अशोक भाटिया(करनाल) की लघुकथाएँ और नंदलाल मेहता(गुड़गाँव) का ‘लघुकथा का शिल्प’ शीर्षक लेख शामिल था। तब से अब तक, अपने लगभग हर अंक में यह पत्रिका लघुकथा को समुचित सम्मान दे रही है। ‘हरिगंधा’ का जुलाई 2007 अंक लघुकथा-विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ। ‘तारिका’(पिछले काफी समय से ‘शुभ तारिका’) नियमित रूप से लघुकथाएँ प्रकाशित करती आ रही है। लघुकथाओं को प्रमुखता के साथ प्रकाशित करने वाले, किंतु अब स्थगित हो चुके पत्र-पत्रिकाओं में ‘पींग’(रोहतक, संपादक: डी आर चौधरी), विश्वमानव(करनाल, संपादक: ---), ‘आगमन’(रेवाड़ी, संपादक: तरुण जैन) और ‘राही’(गुड़गाँव, संपादक: मुकेश शर्मा) प्रमुख हैं। इनमें ‘आगमन’ का 1985 में प्रकाशित लघुकथा-विशेषांक और ‘राही’ का 1986 में प्रकाशित लघुकथा-समीक्षा अंक ध्यान आकर्षित करते हैं। कुरुक्षेत्र से प्रकाशित ‘कुरुशंख’ पत्रिका का 1980 में, शमीम शर्मा के अतिथि-संपादन में लघुकथा-विशेषांक आया और अपने अखिल भारतीय स्वरूप के कारण देशभर में चर्चित रहा। अंबाला छावनी से अगस्त 2002 व सितंबर 2005 में उर्मि कृष्ण के संपादन में ‘तारिका’ के अंक भी लघुकथा-विशेषांक के रूप में सामने आए। (शेष आगामी अंक में)………

लघुकथाएँ

अमरतापूरन मुद्गल
इमली का वह पेड़ कब और किसने लगाया था, किसी को मालूम नहीं है। स्कूल के आँगन में खड़ा वह पेड़ बच्चों के लिए विशेष आकर्षण बना रहता था। जब इमली की फलियाँ लगतीं, तो बच्चे उन्हें तोड़ने के लिए उस पर चढ़ जाते और चटखारे लेकर उनकी खटाई का आनन्द लेते। चपरासी ने पेड़ के साथ घण्टी बाँध रखी थी। जब किसी लड़के को घण्टी बजाने के लिए कहा जाता तो वह घण्टी बजाने से पहले पेड़ के नीचे चारों ओर नजर घुमाता और उसे कहीं कोई फली नजर आ जाती, तो मुँह में डाल लेता।
हर वर्ष स्कूल में नए बालक प्रवेश लेते और पुराने परीक्षा पास करके स्कूल छोड़ जाते। इमली के पेड़ से नए बच्चों का रिश्ता स्थापित हो जाता और पुरानों का टूट जाता।
इस बार गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुला, तो मैंने देखा कि इमली का पेड़ सूख गया है। माली ने छोटी-बड़ी सब टहनियाँ काट दी हैं और केवल तना शेष रह गया है। कुछ ही दिनों में उसे भी काटकर गिरा दिया जाएगा। चपरासी ने तने से बँधी घण्टी उतार ली थी और उसे बरामदे में कील के सहारे लटका दिया था।
रविवार को छुट्टी थी, लेकिन मैं किसी कार्यवश स्कूल गया था। सूखे तने के पास ही इमली का एक बीज अंकुरित हो गया था। माली उसके चारों ओर बड़ी सावधानी से ईंटों की बाड़ खड़ी कर रहा था। मैं उस अंकुर को टकटकी बाँधकर देख रहा था। मुझे लगा, जैसे वह अंकुर बड़ा पेड़ बन गया है…चपरासी ने उसके तने के साथ घण्टी बाँध दी है और लड़के उस पर चढ़ गये हैं और असंख्य हरी-पीली पत्तियों में लटकी फलियों को तोड़ रहे हैं।…अचानक, एक दिन वह पेड़ ठूँठ में बदल जाता है। पास ही उस पेड़ से गिरा एक बीज अंकुरित हो रहा है।…और फिर पेड़…और फिर अंकुर…

दयापृथ्वीराज अरोड़ा
दसवीं क्लास का हिंदी का अध्यापक, जो अपने रहन-सहन, उच्च-आचरण और दयाभाव के लिए स्कूल-भर में विख्यात था, नयी क्लास को संबोधित कर रहा था—
“जीवन में सादे रहन-सहन और उच्च-आचरण से दयाभाव का महत्व कहीं ज्यादा है। असल में, जिसमें दयाभाव नहीं है, वह आदमी कहलाने का हकदार नहीं है। राजकुमार गौतम एक दिन घूमते हुए दूर तक निकल गये। एक जगह एक मछुआ मछलियों को जाल में फाँसकर किनारे पर रखे बरतन में फेंक रहा था। वह कुछ पल मछुए द्वारा पकड़ी गई मछलियों को, जो बिना पानी के तड़प रही थीं, देखते रहे; फिर मछुए से पूछा, “इन मछ्लियों का क्या करोगे?”
मछुए ने जवाब दिया, “बाजार में बेचूँगा।”
“कितने की बिक जायेंगी?” राजकुमार का अगला प्रश्न था।
“यही कोई चार या पाँच रुपये की।”
राजकुमार ने सोने की अपनी अँगूठी मछुए को देकर सारी मछलियाँ ले लीं और उन्हें दोबारा पानी में फेंक दिया। राजकुमार के दयाभाव से हमें सीख लेनी चाहिए।”
एक लड़का उठा।
“कुछ कहना चाहते हो?”
“हाँ श्रीमान!”
“कहो!”
“मैं एक मछुए का बेटा हूँ। मेरा बाप हर रोज मछलियाँ पकड़कर बेचता है। लगभग हर रोज, कुछ मछ्लियाँ बच जाती हैं और किसी अन्य सब्जी के स्थान पर हमें मछली खानी पड़ती है। जब मछलियों को छीला जाता है, तो मेरे मन में कुछ होने लगता है। कल रात मैंने खाना खाने से इंकार कर दिया, क्योंकि मैंने मछली के बजाय किसी दूसरी सब्जी की माँग की थी; परन्तु मेरे माँ-बाप ने मेरी प्रार्थना पर कोई ध्यान नहीं दिया और उल्टे डाँट दिया। मैं भूखा ही सो गया। आधी रात को मेरी नींद खुली। मुझे बेहद भूख लगी थी। ऐसा लग रहा था कि अगर मैंने खाना नहीं खाया तो प्राण निकल जायेंगे। मेरे लिए उन मछलियों को खाने के सिवा कोई चारा न था।”
लड़के का कंठ भारी हो गया। उसने अध्यापक की ओर रुआँसी आँखों से देखा।
अध्यापक ने लड़के द्वारा कही गई सच्चाई पर सोचा। फिर अपनी मोटी-मोटी किताबों को बगल में दबाए, लड़के के पास आया…और उसके कंधे थपथपाकर कक्षा के बाहर हो गया!

चेतनामधुकांत

हल्का होना भी तो अनिवार्य है। पत्नी पर बस न चले, तो नौकर पर…चाहे किसी पर भी।
गोदाम में आए, तो सेठ जी ने पल्लेदार पर ही हल्का हो लेना चाहा—
“अरे हरामजादे हरकू…अकल मारी गई तेरी…देखता नहीं, सारा अनाज धरती में गिरता जा रहा है!”
“क्या करूँ सेठ जी, बोरी फटी हुई है।” नम्रता से उत्तर दिया गया।
“अबे गधे, हाथ क्यों नहीं लगा लेता? गल जाएगा क्या। शाम को चार रुपये के लिए तो हाथ बड़ी जल्दी फैला देगा और काम धेले का नहीं…” स्वर पहले से अधिक कर्कश हो गया था।
जमीन ही कम थी जो पल्लेदारी करनी पड़ती थी। बोझ से निकलकर नजर सेठ की तोंद का परिमाप नापने लगी…हर साल बढ़ता है, लेकिन वह अनाज पैदा करके, सिर पर उठाकर भी अपने अन्दर सिकुड़ता जा रहा है।
“अरे, रुक क्यों गया पाजी, देखता नहीं—बादल चढ़ आये हैं। जल्दी माल उतार।” बादलों की गरज से सेठ का स्वर दब गया था।
“अब मुझसे नहीं उठती बोरी, सेठ जी।”
वहीं उतार दिया हरकू ने बोझ को।
“नहीं उठती…क्यों? क्या हुआ? मेरा सारा माल खराब हो जाएगा…चल, तुझे शाम को एक रुपया फालतू दूँगा…जल्दी कर।” लालच फेंका सेठ ने।
“नहीं सेठ जी, मुझे भी जाकर अपनी छत को ठीक करना है। सारी चूती है।”
“अबे, रोटी कहाँ से खाएगा…?”
“रोटी तो मैं ही पैदा करता हूँ।” कहकर हरकू बाहर निकल गया। पानी गिरने लगा। सेठ ने बहुत लालच दिया, पर कोई मजदूर काम पर नहीं आया।
सामने, गरीब बस्ती में, मजदूर अपनी छतों पर मिट्टी चढ़ा रहे थे।
वर्षा तीव्र होती जा रही थी।

ज्योति चौकप्रेमसिंह बरनालवी

“कमाल करती हो जी! रात का मतलब यह तो नहीं कि मुँह-माँगे पैसे दे दूँ!! शहर अपना है। कल तक हम यहाँ कच्छे-बनियान में घूमने आ जाते थे।”
“अब तुम बच्चे नहीं, बल्कि एक बच्चे के बाप हो।”
“हमारे पास कौन सा सामान है जो…। बस, पाँच-सात मिनट का रास्ता है।”
“आधी रात के उस सन्नाटे में थोड़ी दूर चलने के बाद उसे लगा—जान बड़ी और पैसा छोटा। शहर उसका नहीं, पुलिस वालों का(नहीं, वे लोग तो खुद जान बचाते नजर आते हैं), आतंकवादियों का या अपने ही बनाए अँधेरे से भयभीत भगवान का।”
शास्त्री मार्किट के चौराहे से करीब सौ गज पहले उन्हें किसी के तेज कदमों की आहट सुनाई दी।
“अजी, दो पगड़ी वाले!” पत्नी ने भयातुर स्वर में कहा।
“रुको मत…और तेज…” कहते पति का जैसे कण्ठ सूख गया। पाँवों में जैसे किसी ने अचानक बेड़ियाँ डाल दी हों।
“अजी, वो आवाज दे रहे हैं!”
“चुप!”
“यदि गोली मार दी?”
क्षण सोच पुरुष ने कहा, “ऐसे मरने से क्यों न अपनी बात कहकर…शायद उन्हें तरस आ जाए। अच्छा…रुक ही जाएँ।”
पीछा करने वाले करीब पहुँच चुके थे।
एक—“भाईसाहब, आप घबराइये मत्। हमें एन बी चौक तक जाना है। आजकल सी आर पी तैनात है…सोचा, आप लोग रहेंगे तो हमें…”
उनकी जैसे जान में जान आई। पुरुष ने कहा,“हमे भी ज्योति चौक तक जाना है। अपनी पुलिस से हमें भी डर लगने लगा है। आप लोगों को…”

आगरामनिवास मानव
मौहल्ले में आग लग गई थी।
वह यह सोचकर निश्चिन्त था कि आग बहुत दूर है तथा उसका घर पूर्णतया सुरक्षित है।
आग कुछ नज़दीक आ गई तो वह थोड़ा चिन्तित हुआ; लेकिन कुछ करने की आवश्यकता उसने अब भी नहीं समझी।
आग उसके पड़ोसी के घर तक आ गई, तब भी वह हाथ-पर-हाथ धरे बैठा रहा।
‘पड़ोसी के लिए वह अपने हाथ क्यों झुलसाए?’—मन-ही-मन वह सोचता है।
अब जलने की बारी उसके घर की थी। आग बुझाने के लिए वह कुछ कर पाता, इससे पूर्व ही, आग उसके घर को राख में बदलकर अगले घर तक जा पहुँची थी।



धर्म की लपेटसुरेन्द्र वर्मा

एक बाप के चार लड़के थे। वे बड़े भोले, ईमानदार और सच्चे थे। उनका पिता उन्हें विद्वान बनाना चाहता था, इसलिए उसने अपने लड़कों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए अलग-अलग जगह भेजा—
पहला—मन्दिर में।
दूसरा—मस्जिद में।
तीसरा—गिरजे में।
चौथा—गुरुद्वारे में।
शिक्षा लेने के बाद वे अपने-अपने धर्म के विद्वान बन गये। विद्या लेने के बाद चारों अपने घर वापस आ गये और अपने पिता को अपने-अपने धर्म के बारे में बताकर पूछने लगे—“बोलो बापू, कौन-सा धर्म अच्छा है?”
बापू ने कहा, “सभी धर्म अच्छे हैं बच्चो!”
“नहीं, तुम्हें एक धर्म को अच्छा बताना ही पड़ेगा। नहीं तो…”
“नहीं तो…क्या?”
“नहीं तो… हम तुम्हें मार देंगे।“
और फिर, चारों ने अपने बापू का खून कर दिया।

दूसरा सचरूप देवगुण
घर के सभी सदस्य कमरे में बैठे गप्प-शप्प मार रहे थे। अचानक, पड़ोसी जवान लड़के—सुजीत का प्रसंग छिड़ गया।
पिता ने कहा, “कितना अच्छा है सुजीत! हमारे घर के सारे काम-काज सहर्ष कर देता है।”
माँ बोली, “कितना भला है सुजीत, कई बार जेब से पैसे लगा देता है और बहुत कहने पर भी वापिस नहीं लेता।”
मुन्ना भी रह न सका,“सचमुच, सुजीत बहुत ही प्यारा है। मुझे कई बार खिलौने भी ला देता है।”
बड़ी बेटी, जो पास बैठी चुपचाप सारी बातें सुन रही थी, उठकर कमरे से बाहर चली गई। वह जानती थी कि इन सब कामों के बदले में वह उससे बहुत-कुछ प्राप्त करने की कोशिश करता रहता है।