Sunday 27 November 2011

हिन्दी लघुकथा : शोध की स्थिति/बलराम अग्रवाल


दोस्तो, डॉ॰ रामकुमार घोटड़ के संपादन में वर्ष 2011 में एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है—‘भारत का हिन्दी लघुकथा संसार। इसके बारे में जनगाथा के जनवरी 2011 अंक में परिचयात्मक टिप्पणी लिखी जा चुकी है। इस पुस्तक के पृष्ठ 160 पर डॉ॰ रामकुमार घोटड़ का एक ब्यौरापरक लेख है—‘भारतीय हिन्दी लघुकथा साहित्य में शोध कार्य। इसे मैं ब्यौरा कह रहा हूँ क्योंकि इसमें दर्ज सूचनाओं के पीछे मुझे डॉ॰ घोटड़ की हिन्दी लघुकथा के लिए कुछ करने की आकांक्षा तो नजर आती है, शोधवृत्ति नहीं। भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में पी-एच॰ डी॰ की उपाधि हेतु नामांकित अथवा पी-एच॰ डी॰ उपाधि से सम्मानित ऐसे सभी विषयों को जिनमें लघुकथा शब्द का प्रयोग हुआ है, सूचीबद्ध करके उन्होंने नि:संदेह अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है, परंतु यह शोधपरक नहीं है।
मैं स्वयं पी-एच॰ डी॰ उपाधि हेतु शोधार्थी रहा हूँ। नामांकन से पूर्व मुझे भ्रम था कि मैं शोध करूँगा लेकिन वह मैं कर नहीं पाया। मैंने भी ब्यौरे ही इकट्ठे किए और शोध के नाम पर उन्हें विश्वविद्यालय में जमा करा दिया। नामांकन कराए बिना मैं शायद बेहतर कार्य कर सकता था। मेरे शोध-निदेशक ने, महाविद्यालय व विश्वविद्यालय के लिपिकों ने, महाविद्यालय के प्रधानाचार्य ने, हिन्दी प्रवक्ताओं ने, यहाँ तक कि चपरासियों ने भी लगातार मुझे जिस दृष्टि से देखा, मैं यही महसूस करता रहा किआब गई, आदर गया, नैनन गया सनेह…। परंतु इस पत्र का विषय यह नहीं है, दूसरा है।

Thursday 3 November 2011

इक्कीसवीं सदी : पहले दशक की लघुकथाएँ : वर्ष 2001/बलराम अग्रवाल

दोस्तो, बीसवीं सदी के प्रारम्भिक पहले वर्ष यानी सन् 2001 में, मेरी जानकारी के अनुसार कुल 10 हिन्दी लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुएअन्यथा (कमल चोपड़ा), अभिमन्यु की जीत (राजेन्द्र वर्मा), इधर उधर से(बीजेन्द्र कुमार जैमिनी) केक्टस (मोइनुद्दीन अतहर), जंगल की आग (सी॰ रा॰ प्रसाद), सच्चा सुख (आशा मेहता), तरकश का आखिरी तीर (अतुल मोहन प्रसाद), दो सौ ग्यारह लघुकथाएँ (उषा जैन शीरीं), राजा नंगा हो गया (सुनीता सिंह) तथा सलीब पर टँगे चेहरे(सुरेन्द्र कुमार अंशुल)। इनमें से मेरे पास पास केवल तीन संग्रह ही उपलब्ध थेअन्यथा, अभिमन्यु की जीत तथा राजा नंगा हो गया। उनमें से प्रस्तुत हैं निम्नलिखित चार लघुकथाएँ

उनकी सज़ा/कमल चोपड़ा
ऐसा नहीं था कि कभी कोई कार नहीं देखी था; पर इतनी लंबी और चमचमाती कार उसने पहली बार देखी थी। उसने कार के चारों तरफ एक चक्कर लगाया तो उसे लगा जैसे वह कार नहीं किसी दूसरे ग्रह से आया कोई जादुई उड़न-खटोला है।
उसने कार पर हाथ फिराया; शीशों और लाइटों को छूकर देखा। उस अजीब-से सुख से उसका मन खुशी से नाच उठा।
ज्योंही उसने कार के दरवाज़े के हैंडिल को खींचा, दरवाज़ा खटाक-से खुल गया। कार का मालिक शायद दरवाज़े को लॉक करना भूल गया था। छोटू को लगा जैसे किसी स्वर्ग का दरवाजा उसके सामने खुला पड़ा है। थोड़ा झिझकते-सहमते हुए वह कार में ड्राइवरवाली सीट पर जा बैठा। अंदर ए॰सी॰ ऑन नहीं था पर ठंडक अभी बाकी थी। उसने इधर-उधर लगे बटनों से छेड़छाड़ शुरू कर दी। स्टीरियो ऑन हुआ तो धीमे, पर इतने मधुर संगीत ने जैसे उसकी सुध-बुध ही हर ली। उसको लगा जैसे वह इस स्वर्ग का बादशाह है।
अचानक उसकी नज़र साइड में लगे कार के शीशे पर पड़ी। उसने देखासामने बिल्डिंग से एक सूट-बूट और काले चश्मेवाला आदमी चला आ रहा है। यह होगा मालिक। वह झट से निकला। दरवाज़ा बंद कर भागने को ही था कि उस आदमी ने उसे पकड़ लिया और तड़ाक से उसके एक थप्पड़ जड़ दिया,क्या चुरा रहा था साले, बोल? क्या चुरा रहा था?
ज्योंही कारवाला आदमी कार के अंदर झांककर देखने लगा कि सारी चीजें सही-सलामत हैं या नहीं, छोटू अपनी बाँह छुड़ाकर दूर जा खड़ा हुआ और ऊँची आवाज़ में बोला,चोर नहीं हूँ मैं…मैं तो यहाँ बैठकर भुने हुए चने बेचता हूँ जहाँ तुमने ये कार खड़ी कर दी। मेरा जो नुकसान हुआ वो…? हम घर के सारे लोग सारा दिन काम करते हैं, तब भी हमारे तो खर्चे पूरे नहीं होते, तुम कार कहाँ से ले आए? मैं तो दो मिनट कार को देख रहा था कि तुमने मुझे थप्पड़ मार दिया! तुम जो सारा दिन इसका मज़ा लेते हो, तुम्हें क्या सज़ा होनी चाहिए?
 (अन्यथा: 2001 से)