Friday 15 August 2008

जनगाथा अगस्त 2008


जनगाथा की ओर से समस्त भारत-प्रेमियों को भारतीय-स्वाधीनता के 62वें पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
लघुकथा-समीक्षा के मानदण्ड
उमेश महादोषी

कथा-साहित्य में लघुकथा, जो कि विकासशील सम्भावनाओं के कारण एक विशिष्ट कथा-विधा के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है, सम्पूर्ण समीक्षा के मानदण्डों के अभाव से अभी भी जूझ रही लगती है। लघुकथा की अपनी विशेष पहचान है, अपना स्वभाव, अपनी प्रवृत्ति है जो कहानी से सर्वथा भिन्न है। परन्तु उसकी समीक्षा के जो मानदण्ड अब तक सामने आये हैं वे या तो प्रमुखत: कहानी के हैं या मात्र संरचनात्मक तत्वों की समीक्षा तक सीमित होने के कारण आधे-अधूरे हैं। इसलिए जरूरी है कि लघुकथा की सम्पूर्ण समीक्षा के मानदण्ड निर्धारित हों।
एक रचना-विधा की समीक्षा के मानदण्ड दूसरी रचना-विधा के मानदण्डों से अलग होते हैं। अत: विधा-विशेष की समीक्षा के मानदण्डों को अलग से पहचानने के लिए उन्हें रचना-सृजन की कसौटी को दृष्टिगत रखते हुए तीन विभागों में रेखांकित किया जा सकता है:
(1) रचना का विधागत-स्वभाव
(2) उसके संरचनात्मक तत्व, तथा
(3) रचना की वैचारिक यात्रा
यद्यपि उपर्युक्त तीनों विभागों के अन्तर्गत किसी न किसी अर्थ में रचना के संरचनात्मक तत्वों की ही समीक्षा होती है, क्योंकि विधागत स्वभाव और वैचारिक यात्रा को रचना के संरचनात्मक तत्वों से पूर्णत: अलग नहीं किया जा सकता। तथापि रचना को इन तीनों समीक्षा-विभागों में रखकर उसकी सम्पूर्ण विशिष्टता के साथ अधिक गहराई तक परखा जा सकता है।
हर विधा का अपना स्वभाव-विशेष होता है जिसके आधार पर रचना-विशेष को विधा-विशेष की श्रेणी में रखा जाता है। यह स्वभाव रचना की मान्य विशिष्ट प्रवृत्तियों, उसके आकार एवं शिल्पगत तत्वों आदि से सम्बन्धित हो सकता है। समीक्षक को विधा-विशेष की रचना में इन सबकी उपस्थिति की समीक्षा करनी होती है। दूसरे विभाग के अन्तर्गत संरचनात्मक तत्वों के निर्धारण, संयोजन, समन्वयन और उनकी प्रकृति की समीक्षा शामिल है। समीक्षक को देखना चाहिए कि समस्त आवश्यक संरचनात्मक तत्वों का समुचित निर्धारण व संयोजन तथा उनमें परस्पर उपयुक्त समन्वय है या नहीं। उन तत्वों की प्रकृति क्या है? अर्थात वे स्वाभाविक, प्रभावोत्पादक, मान्य व ग्राह्य हैं या नहीं। तीसरी समीक्षा रचना की वैचारिक यात्रा की करनी होती है। देखना होता है कि रचना की वैचारिक जमीन क्या है? वह जीवन के कितनी निकट है। रचना की वैचारिक-यात्रा काल और स्थान के परिप्रेक्ष्य में गतिशील होती है। एक अच्छी रचना से अभिजात्यता से इतर हर हाल में सृजनात्मकता की अपेक्षा की जाती है।
जहाँ तक यथार्थ का प्रश्न है, वह दो प्रकार का है। एक वह, जो है और दूसरा वह, जो होना चाहिए। प्रत्येक विवेकशील समीक्षक को रचना-समीक्षा के दौरान ‘जो है’ से ‘जो होना चाहिए’ तक की यात्रा अनिवार्यत: तय करनी चाहिए।

लघुकथाएँ

हलराजगोपाल सिंह

“ओफ्फोह, तुम्हें कितनी बार समझाया है कि जब दो बड़े लोग आपस में बातें कर रहे हों तो…ठहरो, लो तुम इन टुकड़ों को जोड़कर लाओ। ये टुकड़े भारतवर्ष के नक्शे के हैं, समझी।”
रामप्रसाद ने चैन की साँस ली, हमने भी। चलो, कुछ देर के लिए बला टली। न टुकड़े जुड़ेंगे और न…। हम फिर सांप्रदायिकता की समस्या को सुलझाने में जुट गये।
लेकिन हमें आश्चर्यचकित हो जाना पड़ा, जब मात्र दस मिनट बाद ही रामप्रसाद की बिटिया ने मानचित्र के उन टुकड़ों को जोड़कर हमारे सामने रख दिया।
“अरे, तुमने इतनी जल्दी इन टुकड़ों को कैसे जोड़ लिया?” रामप्रसाद ने पूछा।
“देखिए पापा, इस नक्शे के पीछे एक आदमी की फोटो बनी है…हम उसके नाक, कान, हाथ, पैर जोड़ते गये और बस्…नक्शा बन गया।”
बिटिया की मासूम हँसी हमारे भीतर पैठ रही थी और हम दोनों एक दूसरे को विस्मय से देख रहे थे।

अंतिम गरीब
जगदीश कश्यप

दरबान ने आकर बताया कि कोई फरियादी उनसे जरूर मिलना चाहता है। उन्होंने मेहरबानी करके भीतर बुलवा लिया। फरियादी झिझकता-झिझकता उनके दरबार में पेश हुआ तो वे चौंक पड़े। उन्हें आश्चर्य हुआ कि वह वहाँ कैसे आ गया! फिर यह सोचकर कि उन्हें भ्रम हुआ है, उन्होंने पूछ लिया—“कौन हो?”
“मैं गरीबदास हूँ सरकार।”
“गरीबदास! तुम? तुम्हें तो मैंने दफन कर दिया था!!”
“भूखे पेट रहा नहीं गया माई-बाप। इसलिए उठकर चला आया।”
“अब क्या चाहते हो?”
“कुछ खाने को मिल जाए हुजूर्।”
“अभी देता हूँ।” उसे आश्वासन देकर उन्होंने सामने दीवार पर टँगी अपनी दुनाली उतार ली,“यह लो खाओ…!”
दुनाली ने दो बार आग उगल दी। गरीबदास वहीं ढेर हो गया।
“दरबान, इसे लेजाकर दफना दो। इस कमीने ने तो तंग ही कर दिया है…।”

दूसरे दिन जब वह गरीबी-उन्मूलन के प्रारूप को अंतिम रूप दे रहे थे तो दरबान हड़बड़ाया हुआ-सा उनके कमरे में जा घुसा। उसकी घिग्घी बँधी हुई थी।
“मरे क्यों जा रहे हो?” उन्होंने डाँटा।
“हुजूर-हुजूर…” दरबान ने भयभीत आँखों से बाहर द्वार की ओर संकेत करते हुए कहा, “वही फरियादी फिर आ पहुँचा है…!!!”

मैं वही भगीरथ हूँ
शरद जोशी
मेरे मोहल्ले के एक ठेकेदार महोदय अपनी माता को गंगा-स्नान कराने हरिद्वार ले गये। गंगा के सामने एक धर्मशाला में ठहरे। सोचा, किनारे तक टहल आएँ। वे आये और गंगा-किनारे खड़े हो गये। तभी उन्होंने देखा कि एक दिव्य-पुरुष वहीं खड़ा एकटक गंगा को निहार रहा है। ठेकेदार महोदय उस दिव्य व्यक्तित्व से बड़े प्रभावित हुए। पास गये और पूछने लगे—“आपका शुभ नाम?”
“मेरा नाम भगीरथ है।” उस दिव्य पुरुष ने कहा।
“मेरे स्टाफ में ही चार भट भगीरथ हैं। जरा अपना विस्तार से परिचय दीजिए।”
“मैं वही भगीरथ हूँ जो वर्षों पूर्व इस गंगा को यहाँ लाया था। उसे लाने के बाद ही मेरे पुरखे तर सके।”
“वाहवा, कितना बड़ा प्रोजेक्ट रहा होगा! अगर ऐसा प्रोजेक्ट मिल जाए तो पुरखे क्या, पीढ़ियाँ तर जाएँ।”

गरीबा
आनंद बिल्थरे

“तुम कौन हो?” सरपंच ने पूछा।
“गरीबा।” उसने उत्तर दिया।
“तुम कैसे हो सकते हो? उसकी तो मौत नहर में डूबने से हो चुकी है!” सरपंच ने अचरज-से कहा।
“सरपंच जी, मैं गरीबा ही हूँ। इसी गाँव का जन्मा। मैं यहाँ हर एक को जानता हूँ।”
“हर एक को जानने से तो साबित नहीं होता कि तुम ही गरीबा हो।”
“हुजूर, मैं तीरथ यात्रा पर गया था। रास्ते में रेल दुर्घटना हो गयी। मैं कई दिनों तक जिन्दगी और मौत की लड़ाई देखता रहा। इसी में मेरी आँख और टाँग जाती रहीं।”
“लेकिन तेरी लाश की शिनाख्त चारों पंचों ने मिलकर की है…इसलिए तू सरकारी रिकार्ड के मरा जान लिया गया है।”
“माई-बाप मेरा घर, मेरे खेत…।”
“तुम्हारा नहीं, उस गरीबा का, जो तीर्थ जाने से पूर्व अपना सब-कुछ पंचायत को दान कर गया था।”
“हुजूर, मुझे मरा मान लिया जावे, लेकिन मेरी जायदाद को तो वापिस लौटा दिया जाए।”
“यह कैसे हो सकता है? उस घर में अब बालबाड़ी लगती है…खेत पंचायत की मिल्कियत हैं।”
“मैं बेमौत मर जाऊँगा सरकार!”
“देखो, हमें गरीबा की मौत का दुख है। उसका क्रिया-कर्म भी हमने निपटा दिया है। पंचायत को दान करने वाले गरीबा का फोटो मँढ़वाकर पंचायत-भवन में टाँग दिया है। तुम न जाने कौन हो, जो अपने को गरीबा बताकर उसके पुण्य को कम करना चाहते हो?”
“साहब, मैं ही गरीबा हूँ और मैंने कोई दान नहीं दिया है।”
“तुम जरूर बहुरूपिये हो। गरीबा के भेष में हमें डराना चाहते हो।”
“तुम सब अंधे युग के दुर्योधन हो…जब भगवान कृष्ण तुमको नहीं समझा सके तो मैं तो एक साधारण आदमी हूँ…।”
सरपंच के हुक्म से उसे खदेड़कर गाँव से बाहर कर दिया गया। दूसरे दिन उन्हें खबर मिली कि नामालूम आदमी ने पहाड़ी वाले कुएँ में कूदकर जान दे दी। उन्होंने जाकर देखा। लाश देखकर वे होठों ही होठों में मुस्कराये और घर आकर वारदात की तहरीर के साथ सौ-सौ के पाँच नोट नत्थी कर कोतवाली भिजवा दिये।

वे चेहरेदेवीप्रकाश हेमंत
बेहद शौक है मेरी बेटी दीप्ति को अखबार पढ़ने का। एक दिन वह दौड़ी-दौड़ी आई और बोली—“पापा-पापा, देखिए तो…अखबार में छपा है कि विदेश में एक ऐसा पेड़ होता है जिसके नीचे खड़े हो जाएँ तो उसकी पत्तियाँ हमारा सारा खून चूस लें।”
“अरे बेटी, तू पेड़ की बात करती है! वे तो एक ही बार में पूरा खून चूस लेते हैं। अपने देश में तो ऐसे आदमखोर हैं जिनके पंजे में एक बार कोई फँस जाए तो उसका व उसकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी का खून चूसते रहते हैं। उनके चंगुल में फँसे लोग बेचारे तड़पते रहते हैं, चूँ भी नहीं कर पाते।”
“सच पापा! ऐसे कौन पिशाच हैं?”
“बेटी, गरीब-गुरबों की आँखों में झाँककर देख। वे चेहरे साफ-साफ दिखाई दे जायेंगे।”

घोड़े की संवेदना

संतोष सरस

“कहो दोस्त, गौदोलिया चलोगे?”
“चलूँगा बाबूजी।”
“क्या लोगे?”
“दो रुपये।”
“मित्र, गौदोलिया तक का तो डेढ़ रुपया ही होता है!”
“दो से कम न लूँगा, रात बहुत हो गयी है।”
मैं रिक्शे पर सवार हो गया। मैंने यूँ ही कहा—भाई, सच बताओ, दो रुपया ज्यादा है कि नहीं? वैसे तो मैं दो रुपया दे ही रहा हूँ, दस-पाँच पैसे और भी दे सकता हूँ, लेकिन…।”
“बाबूजी, कभी-क्भी डेढ़ पर भी चला जाता हूँ। मौके-मौके की बात है। इस समय रात बहुत हो गयी है…।”
“यदि मेरे पास डेढ़ ही रुपये होते तो क्या तुम मुझे न ले चलते?”
“ले क्यों नहीं चलता!” थोड़ी देर रुककर उसने कहा,“बाबूजी, घोड़े का काम जरूर करता हूँ, पर घोड़ा थोड़े ही हूँ!”

ममताअन्तरा करवड़े
ऊँ…आँ…।
नवजात-शिशु के रुदन से कमरा गूँज उठा। प्राची ने उनींदी, थकी आँखों से देखा—शाम के पाँच बज रहे थे। घण्टा-भर पहले ही तो इसे दूध पिलाकर सुलाया था। कल रातभर भी रो-रो कर जागता रहा था। प्राची को खीझ हो आई। पन्द्रह-बीस दिन के उस नन्हें जीव को गुड़िया जैसे उठाकर उसने गोदी में ले लिया। माँ का स्पर्श पाते ही वह गुलगोथना शिशु सन्तुष्ट हो गया। अपनी बँधी मुट्ठियों की नन्हीं, मूँगफली के दूधभरे दानों के जैसी उँगलियों को ही मुँह में लेकर चूसने लगा।
तभी प्राची की माँ वहाँ आई।
“उठ गया क्या हमारा राजकुमार? चलो, अब घूँटी पीने का समय हो गया है।”
“क्या माँ! मैं तो परेशान हो गयी हूँ इससे।” प्राची तुनक पड़ी।
“क्या हुआ?”
“क्या क्या हुआ? सोने भी नहीं देता ढंग से। एक तो रात-रात भर जागता रहता है। हर घंटे-दो घंटे में दूध चाहिए। कभी नैपी गन्दा करता है तो कभी गोदी में रहना होता। ऐसा ही रहेगा क्या ये?” प्राची रुआँसी होने लगी।
प्रसव के लिए मायके आई बेटी की इस परेशानी को समझते हुए माँ उसके पलंग पर ही पालथी लगाकर बैठ गयी। नन्हें शिशु को अपनी गोदी में लिया और प्राची का सिर भी अपनी गोदी में रखकर उसे थपथपाने लगी। उनकी आँखों से आँसू बह चले। एक प्राची के गाल पर गिरा। उसने हड़बड़ाकर माँ को देखा। वो बड़बड़ा रही थीं: जब तक इसे माँ चाहिए, तब तक यह सुख भोग ले बेटी। आजकल पराए परदेसों का कोई भरोसा नहीं है। वो धरती निगल जाती है हमारे लाड़लों को।
माँ प्राची के बड़े भैया की सामने ही रखी तस्वीर को देखे जा रही थी जो पिछले दस वर्षों से विदेश से वापस ही नहीं आये थे।
नन्हें शिशु ने प्राची की उँगली अपने मैदे-से हाथ में थाम ली थी। प्राची ने अब उसे नहीं छुड़ाया।

1 comment:

सुभाष नीरव said...
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