Wednesday, 13 April 2022

समीक्षा/सवाल-दर-सवाल/मिन्नी मिश्रा

गोलियाँ खत्म होने पर संगीन की मुठभेड़-सा करतब, लघुकथा बखूबी निभा सकती है


लघुकथा की महत्वपूर्ण पुस्तक 'सवाल-दर-सवाल' लघुकथा-विज्ञ अशोक भाटिया के संपादन में... रमेश बत्तरा के कृतित्व पर आधारित है | अशोक भाटिया ने जिस निष्ठा से उनके सपने को साकार किया, वो काबिलेतारीफ़ है | आप लघुकथा विधा के उत्थान के लिए समर्पित लघुकथाकार ही नहीं , प्रख्यात आलोचक के साथ नामचीन लेखक और संपादक भी हैं | आपकी दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।


हिन्दी साहित्य के विविध विधाओं में लघुकथा विधा तीक्ष्णता और निहित गहरी संवेदना के कारण आजकल सबसे लोकप्रिय बन गई है| लघुकथा क्षण विशेष की घटना ,न सिर्फ हमारे जीवन से उपजी विसंगतियों को उभार कर सामने लाती है, बल्कि उन विसंगतियों से बाहर निकालने का हमें सही राह भी दिखलाती है| 


धारदार , संवेदनशील लघुकथा कैसे लिखी जाए ? नए विषय पर कलम चलाना क्या होता है ? कसावट, सशक्त शैली, मारक अंत किसे कहते हैं ? प्रतीक का लघुकथा में क्या महत्व है ? इन तमाम महत्वपूर्ण बिन्दुओं को भलीभाँति समझने के लिए सभी लघुकथा लेखकों को... रमेश बत्तरा की लघुकथाएँ पढ़ना नितांत आवश्यक है| सहज प्रवाह के कारण सभी वर्गों के लिए यह पुस्तक पठनीय है । 


रमेश बत्तरा लघुकथा के लिए समर्पित थे, जिसका प्रत्यक्ष दृष्टांत पुस्तक के शुरू में ही पढ़ने से मिला-- 'वो 'तारिका' और 'साहित्य निर्झर' के लघुकथा विशेषांक के संपादक रह चुके हैं|’


*दो शब्द आपसे-- 'लघुकथा के विकास में रमेश बत्तरा की महत्वपूर्ण रचनात्मक भूमिका रही है, अधिकतर लघुकथा-लेखक भी उनकी लघुकथाओं के विषय में बहुत कम जानते हैं| रमेश का लघुकथा-साहित्य रचना और आलोचना दोनों धरातलों पर, आज भी लेखकों के लिए आकाशदीप की भांति दिशा दिखाने वाला है|’ अशोक भाटिया का ऐसा लिखना काबिलेगौर है| 

*मत-अभिमत--विशिष्ट साहित्यकारों ने अपने -अपने अनुभव के आधार पर रमेश बत्तरा के बारे में अलग-अलग विचार प्रकट किए हैं | यथा--जया रमेश (अपने प्रति लापरवाह थे रमेश) 'रमेश लेखक भी थे, पत्रकार भी और सिद्धहस्त संपादक भी| लेखन के प्रति एक सचेत जागरूकता जगाती कलाम को हथियार बनाने की परिपाटी वो गढ़ते रहे |’ प्रो.फूलचंद मानव (हमने तमाम उम्र अकेले सफर किया), सुशील राजेश (कहानीकार के भीतर 'लघुकथाकार' ), अशोक जैन (रमेश जैसा कोई न है, न होगा, पर वैसी किस्मत न मिले किसी को), 'रमेश बत्तरा और सिमर सदोष नहीं होते मेरी प्रारंभिक लेखन यात्रा में ...तो शायद मैं इतना लंबा समय नहीं दे पाता |’ अशोक जैन का ऐसा लिखना हमें बताता है कि साहित्यिक- यात्रा में सभी को एक काबिल गुरू की जरूरत होती है । भगीरथ (मनुष्य की अंतरात्मा को संबोधन), 'रमेश बत्तरा ने लघुकथाएँ भले कम लिखीं लेकिन लघुकथा को पुख्ता जमीन देने के उनके प्रयास बड़े थे|’ बलराम , सुभाष नीरव, अशोक भाटिया ( रमेश बत्तरा : लघुकथा की रचनात्मक धारा के प्रतीक ) ,रमेश बत्तरा के बारे में लिखते हैं। 


*रचना-संसार (रमेश बत्तरा की 24 लघुकथाएँ) सचमुच मैं इनमें खो गई |मुझे लगा , इनके कथानक, शैली, कथ्य एवं ततैये के डंक जैसा विचलित करने वाला अंत, मारे जैसे सभी पाठकों के मानस पटल पर अमिट छाप छोड़ने में निश्चित रूपेण सफल होंगे| इनकी धारदार , संवेदनशील लघुकथाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगीं , जितनी रचनाकाल में रही होंगी |इनकी कालजयी लघुकथा 'कहूँ कहानी' इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण है| अधिकांश लघुकथाएँ आम आदमी की ज़िंदगी से संबन्धित है  जिन्हें सांप्रदायिक, पारिवारिक, भूख, हत्या आदि जैसे संवेदनशील कथानक के रंगों से बखूबी उकेरा गया है | 'हालात’, 'खोया हुआ आदमी’ , 'संदर्भ’, 'अनुभवी', 'कहूँ कहानी' ,'खोज’, 'सूअर’, 'लड़ाई’, 'राम-रहमान, 'अंधा खुदा के बंदे’, 'दुआ, चलोगे' ... जिनके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं | ये लघुकथाएँ मेरे अंतस को झकझोर गईं |मेरी समझ से 'नई जानकारी' और 'स्वाद' जैसी कुछेक साधारण लघुकथाओं को छोड़कर बाकी सभी लघुकथाएँ एक से बढ़कर एक है | दो लघुकथाओं के शीर्षक मेरे समझ से परे रहीं, वो हैं-- 1. 'सिर्फ एक?’ (बेशक यह अलहदा लघुकथा है , लेकिन शीर्षक में प्रश्नवाचक चिह्न लगा है ! ) 2.'माँएँ और बच्चे' |


*आलोचना संसार (रमेश बत्तरा के पाँच आलेख / टिप्पणियाँ ) "लघुकथा नहीं" - में एक जगह ऐसा वर्णित है, ‘....चुटकियों में उलझाकर हिजड़ा किस्म की कोई ...’ यहाँ 'हिजड़ा' शब्द का प्रयोग मुझे अच्छा नहीं लगा ! मेरी समझ से इसकी जगह यदि "छिछोरा" लिखा होता , वा कोई दूसरा शब्द, तो बढ़िया | क्योंकि हम साहित्यकार 'हिजड़ा ' को सम्मानजनक दृष्टि से देखते हैं | लघुकथा :किस लिए और क्यों ? - ‘लघुकथा लेखन के लिए शब्द संख्या नहीं ,शब्दों की संवेदना और संरचना महत्वपूर्ण है |’ ...में उद्धृत यह पंक्ति पढ़कर मुझे बहुत अच्छी लगी | .लघुकथा : संवेदना का सूत्र, लघुकथा की साहित्यिक पृष्ठभूमि : संदर्भ और सरोकार, लघुकथा : बारीकी, सलीका और करीना|


पुस्तक के अंत में... साक्षात्कार ( रमेश बत्तरा से गौरीनन्दन सिंहल द्वारा लघुकथा - विषयक लंबी बातचीत) ,में लिखित यह पंक्तियाँ 'हिन्दी में लघुकथा का भविष्य किसी भी अन्य भाषा की अपेक्षा कहीं उज्ज्वल है | लघुकथा घटना नहीं बल्कि उसकी घटनात्मक्ता से प्रस्फुटित विचार हैं , जो यथागत पात्रों के माध्यम से उभरे | निष्कर्षतः  'सवाल-दर-सवाल' लघुकथा विधा के लिए मील का पत्थर साबित होगा | इस विधा के प्रति भाटिया सर का समर्पण सराहनीय एवं अनुकरणीय है | अशोक भाटिया सर को इस अनुपम कृति को प्रकाश में लाने हेतु हृदय तल से बधाई प्रेषित करती हूँ | □


समीक्ष्य कृति : सवाल-दर-सवाल 

(रमेश बत्तरा का लघुकथा साहित्य)

पृष्ठ संख्या-112, मूल्य -₹ 175

प्रकाशक : भावना प्रकाशन,दिल्ली


मिन्नी मिश्रा














राज्य-- बिहार
देश-- भारत
शिक्षा --- स्नातकोत्तर 
स्वतंत्र लेखन 
लघुकथा लेखन-- वर्ष 2017 से
साहित्यिक परिचय--
प्रकाशित रचनाएँ --
दृष्टि, किस्साकोतहा ,लघुकथा कलश , अट्टहास,चुनिंदा लघुकथाएँ, कलमकार मंच, क्षितिज, संगिनी, मधुरिमा, अहा! ज़िंदगी, हंस, सुरभि, लोकचिंतन ,अविराम साहित्यिकी, लघुकथा डाॅट काॅम, अक्षरा आदि पत्रिकाओं में।
सम्मान--- लघुकथा श्री सम्मान, कलमकार मंच, भाषा सहोदरी , लघुकथा स्टोरी मिरर प्रतियोगिता तथा साहित्य विचार प्रतियोगिता आदि अन्य संस्थाओं से।
पता-- 
Minni Mishra 
shivmatri apartment, 
flat no.- 301, 
Road number---3, 
maheshnagar, Patna 
Pin--- 800024
मोबाइल नं-- + 917970931940


Monday, 14 March 2022

लघुकथा का वसंत पर्व

लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल की दिल्ली शाखा ने अंजु खरबंदा, सतीश खनगवाल, रेनुका सिंह आदि की अगुआई में अपनी स्थापना के 3 वर्ष (2019--2022) सफलतापूर्वक पूरे कर चौथे वर्ष में प्रवेश किया। 
मार्च 2020 से प्रारंभ हुए कोरोना-जनित परस्पर मिलन के  व्यापक गतिरोध को तोड़ते हुए 12 मार्च 2022 को भव्य सम्मिलन का आयोजन किया। 
उक्त अवसर पर वसंत की कुछ विशिष्ट छवियाँ। साथ ही, चुनी हुई  कुछ लघुकथाएँ भी :

।।1।।


।।2।।


चुनी हुई कुछ  लघुकथाएँ
 
इंसानियत का स्वाद  / शोभना श्याम 

उसके साँवले सलोने गोलाकार मुख , बड़ी बड़ी मासूम सी आँखें, घुंघराले बाल और फ़िल्मी संवाद  बोंलने के अद्भुत अंदाज को देखकर रामलीला कमिटी के प्रधान उस किशोर को अपने साथ ले आये थे।

आज रामलीला का पहला दिन था। उसे उसके संवाद तथा सारे दृश्य समझा और याद करा कर अब राम  की भूमिका के लिए उसका श्रृंगार किया जा रहा था कि कमिटी के सेकेट्री वहां आ पहुंचे।

"ये आप किसको ले आये प्रधान जी ? ये तो दूसरे महल्ले का एक नंबर का छटा हुआ बदमाश, चोर और जेबकतरा है इसकी शक्ल और आयु पर मत जाईये। अभी दो महीने पहले बाल सुधार-गृह में तीन वर्ष की सज़ा काट कर आया है और आते ही इसने फिर अपने कारनामे शुरू कर दिए |अभी भी इसकी जेब में एक-दो चाक़ू-छुरे आपको मिल ही जायेंगे।" सेकेट्री प्रधान के कानों में फुसफुसाते हुए बोले।

प्रधान ने मुस्कुराते हुए मेकअप कराते उस किशोर को देखा और बोले, "बंसल साहब, इसकी छवि पर तो मेरा दिल आ गया है, राम तो इसी को बनाएंगे , जो होगा सो देखा जायेगा।"

आज की रामलीला के ख़त्म होने के बाद परंपरानुसार चारों भाइयों की आरती की जा रही थी। श्रद्धालु उस मनमोहक व सुदर्शन राम के दर्शनों के लिए मंच पर उमड़ आए थे। पुरुष, स्त्री, बच्चे--कोई प्रणाम कर रहा था कोई पैर छू रहा था। कुछ प्रौढ़ा और वृद्धाएँ तो स्नेहवश अपने हाथ को चुम्बन की मुद्रा में अपने होठों को छू कर उसके गाल को छुआ गयी। अनजाने में ही सेकेट्री बंसल भी उस छवि के सम्मुख नतमस्तक हो गए।

राम की पोशाक उतार कर वो अपने कपडे पहन ही रहा था कि उसका साथी सोमू उसे खींच कर एक और ले गया, "अबे राजू तू तो ये कह के आया था कि मौका पाते ही यहां से पोशाकें और जेवर वगैरह समेट कर भाग आएगा। तू तो यही रह गया ,साले सच्ची में राम बनने का इरादा तो नहीं?.. ले लगा ले सुट्टा , मुझे पता है तुझे तलब लग रही होगी , इतनी देर तो तू कभी इसके बिना नहीं रहता। भूल तो नहीं गया न कि आज लंबा हाथ मारने का प्लान है। वो मोटे सेठ का पूरा परिवार शहर से बाहर गया हुआ है।

" सोमू रे , सोच कर तो यही आया था कि कमिटी के माल पर हाथ मार कर यहाँ से चम्पत हो जाऊंगा, लेकिन आज जो इज्जत और प्यार मिला है न, माँ कसम ! कभी सपने में भी नहीं मिला | बड़े बड़े इज्जतदार, नामी रईस, आंटियां मुझे  भगवान् समझ कर मेरे पैर छू रहे थे.... सोमू मैं भगवान् तो नहीं बन सकता पर इनके प्यार और श्रद्धा ने इंसान बनने पर मजबूर कर दिया है....अब ये सुट्टा ...नहीं चाहिए .. ये ले ,मेरा चाकू भी ले जा, अब इसकी जरूरत नहीं है। मैंने इंसानियत का स्वाद चख लिया है स्सा....., सोमू !"

   ".........."

   " रुक सोमू , अभी रामलीला में बहुत सारे किरदारों की जगह  खाली है अगर तू चाहे तो ....आ जा यार..|"

मो.- 9953235840


सेलिब्रेशन / शोभा रस्तोगी

आईने के समक्ष खुद को निहारा उसने। यूँ तो रोज ही खड़ा करती स्वयं को इसमें संवेदना रहित। टोटल औपचारिक। आज आँधी की उडान जोरों पर थी। अपनी आँखों में झाँका तो आँसुओं की नमकीन बर्फ जमी पड़ी मिली। रात के तीन बजे थे। आज वह जल्दी फारिग हो गयी। 

महिला दिवस का सेलिब्रेशन जो करना था। कुछ घंटे स्वतंत्रता का उद्घोष। अपने शरीर के अनगिनत पड़ावों को देखा। जगह जगह राहगीरों के रुकने के निशान मौजूद थे। पिकनिक मनाई थी पुरुषों ने उसकी देह पार्क में। ठर्रा और व्हिस्की की  बोतलों के ढक्कन उसकी गोलाइयों के ओपनर से ही  खोले गए थे। खाने पीने की चीजों के खाली पाउच-सी रिसती उसकी नसें, सिगरेट के टोटे, मिली जुली सुगंध -दुर्गन्ध में जलते लवों की मुहर से आबाद थी उसकी संगमरमरी देह। नर नाखूनों से बनी आड़ी तिरछी ज्यामितीय आकृतियाँ। कहीं कहीं फफोले थे ग़मगीन दुनिया का गम छिपाए। बीच बीच में आदम बत्तीसी  के प्यार की स्टेम्प। इन सब पर नज़र फेरते हुए उसकी दृष्टि एक जगह रुक गयी जहाँ उस किसी ने  सहलाया भर था। अपनी भाव नदिया को उसकी आँखों में उंडेलने की हलकी-सी कोशिश की थी।  वह कोमल अहसास उसके अन्दर  कहीं गहरे सुरक्षित था। अट्टहास किया उसने। चलो इसी शानदार सुनहरी याद की  केवल एक किरण को ओढ़ महिला दिवस मनाएँ…। 

मोबाइल-96502 67277


चुनाव / रेनुका सिंह 

चुनाव सर पर था । सब तरफ गहमा गहमी लगी हुई थी । प्रचार का दौर पूरे शबाब पर था ।

आज विधायक साहब सलेमपुर  गांव में आने वाले थे । उनके सहकर्मियों ने खूब मज़मा लगा लिया था। 

सायरन बजाती हुई विधायक साहब की गाड़ी व पीछे पीछे 6-7 और गाड़ियों का काफिला पहुँच गया।  जल्दी जल्दी कुर्सियां ठीक की गयी । माइक लगाया गया। फूल माला पहनने के बाद विधायक साहेब ने जोरदार भाषण दिया । 

खूब तालियां बजी। चलते समय कुछ लोगो ने विधायक साहब का फोन नंबर माँगा तो उन्होंने कहा, "अरे सोनुआ, तनी नम्बर तो नोट करा इनके।"

सोनुआ नम्बर लिखवाकर बाहर आकर बोला "सरकार काहे नम्बरवा लिखवा दिए रोज  रोज़ फोन करिहै सो... "

 "धत मर्दवा ! गदहा कही का जीतले के बाद के फोन उठाई रे..."

मोबाइल: 9807303555


खेल भावना / सदानंद कवीश्वर

“हूँ... तो आप मि. भारत हैं ?”

“जी।”

“आज आपको यहाँ कार्यभार संभालना है ?”

“जी, आप से काम की जानकारी लेने भेजा गया है।”

“पानी में उतरेंगे तो तैरना आ ही जाएगा।”

“जी।”

“एक बात जो आपको हमेशा याद रखनी है वह सुन लीजिये और समझ भी लीजिये।”

“जी।”

“आपकी नियुक्ति खेल-कोटा में हुई है न, तो हर काम खेल-भावना से करिए।”

“जी, समझ गया।”

“क्या समझे ?”

“सब काम खेल-भावना से करना है अर्थात काम मन लगा कर करना है, पूरी लगन होनी चाहिए, जीतने का संकल्प होना चाहिए, असफलता मिल भी गयी तो हताश होने के स्थान पर पुनः प्रयत्न करना है और जीत के प्रति दृढनिश्चय करके काम करना है l”

“नहीं, मैं बताता हूँ, खेल-भावना क्या होती है... कौनसे खेल में रुचि है आपकी ?”

“टेबल-टेनिस।”

“सामने से सर्विस आती है तो क्या करते हैं ?”

“कुशलता से लौटा देता हूँ।”

“फिर बॉल पलट कर आए तो ?”

“फिर लौटा देता हूँ।” 

“और जितनी बार आती है बॉल, उतनी बार बिना उसे गिरने देते हुए लौटा देते हैं।”

“जी।”

“बस, यही खेल-भावना है और यही आपको करना है, फिर वह बॉल हो चाहे फाइल...”

मोबाइल-98104 20825


बुलावा / अंजू खरबंदा

ठक-ठक....!

"कौन ? दरवाजा खुला है आ जाओ ।"

"राम राम चन्दा!"

"राम राम बाबूजी! आप यहाँ!"

"क्यों मैं यहाँ नहीं आ सकता?"

"आ क्यों नही सकते! पर यहाँ आता ही कौन है!"

"आया न आज ! ये कार्ड देने मेरे बेटे की शादी का!"

"कार्ड ! बेटे की शादी का !"

"हाँ अगले महीने मेरे बेटे की शादी है तुम सब आना।" 

"......!"

"...और ये मिठाई सबका मुँह मीठा करने के लिये!"

काँपते हाथों से मिठाई का डिब्बा पकड़ते हुए चंदा बोली, "हम तो जबरदस्ती पहुँच जाते है शादी ब्याह या बच्चा पैदा होने पर तो लोग मुँह बना लेते हैं और आप हमें बुलावा देकर...!"

आगे के शब्द चंदा के गले में ही अटक कर रह गए।

"चन्दा, बरसों से तुम्हें देख रहा हूँ सबको दुआएं बाँटते !"

".....!"

"याद है जब मेरा बेटा हुआ था तो पूरा मोहल्ला सिर पर उठा लिया था तुमने खुशी के मारे ।"

"हाँ! और आपने खुशी खुशी हमारा मनपसंद नेग भी दिया था !"

"तुम लोगों की नेक दुआओं से मेरा बेटा पढ़ लिख कर डॉक्टर बन गया है... और तुम सबको उसकी शादी में जरुर आना है !"

"क्यों नही आएँगें बाबूजी! जरुर आएँगें ! आपने इतनी इज्ज़त मान से बुलाया है  तो क्यों न आएँगें!"

कहते हुए चंदा की आँखे गंगा जमुना सी बह उठी और उसका सिर बाबूजी के आगे सजदे में झुक गया । 

मोबाइल : 9582404164


मुस्कुराहट वाली चादर / नीता सैनी

तू खुश तो है रानो ?"  रानो से उसकी सहेली ने पूछा । 

"हु उँ ... " इतना ही बोल पायी रानो और उसने बिस्कुट की प्लेट सुरेखा की तरफ बढ़ा दी ।  "ले ना, तूने तो चाय के साथ कुछ लिया  ही नहीं।"

रानो,  मैंने जो पूछा तूने उसका सही से जबाब नहीं दिया । बता ना ठीक से , रमेश जी तुझे  प्यार तो करते हैं ना?"

"हाँ , बहुत , बहुत ही ज्यादा ।" रानो ने कहीं खोई हुई सी आवाज में जबाब दिया ।

चल ठीक है जो हुआ सो हुआ अब तू सब कुछ भूलकर अपनी नई जिंदगी शुरू कर ।" सुरेखा ने रानो को समझाते हुए कहा ।

"किसी को  भूलना इतना आसान होता है क्या सुरेखा?" 

"आसान तो नहीं , लेकिन भूलने का भरम पालना पड़ता है बहन और इसी में सबकी भलाई है।"

हम्म.. एक लंबी साँस ली रानो ने । "इसीलिए तो हर वक़्त चेहरे पर मुस्कुराहट की झूठी चादर ओढ़कर रहती हूँ । वरना उन्हें लगता है कि मुझे पहले वाले कि याद आ रही है और वे उदास हो जाते हैं ।" 

रानो के अंदर का दर्द आँसू बनकर गालों पर लुढ़कने लगा । सुरेखा ने अपने हाथों से उसके  आँसूं पोंछें और दोनो सहेलियां गले लगकर फफक पड़ी । 

रोते रोते रानो बोली  "वो तो एक ही बार मरा लेकिन मैं तो रोज ही मरती हूँ । तिसपर कुछ लोग पीठ पीछे खुसर-फुसर करते हैं कि इसका क्या गया इसको तो नया खसम मिल गया।"

मोबाइल : 85271 89289


विडम्बना / केदारनाथ 'शब्द मसीहा'

"अरे पापा! ये हिन्दी भी कैसी अजीब चीज है, जबर्दस्ती पढ़नी पड़ती है।" बेटा बोला। 

"क्या हो गया ? क्यों नीम चढ़ा करेला हो रहा है।" पिता ने हँसते हुए पूछा। 

"ये विडम्बना का मतलब क्या होता है?" बेटे ने पूछा। 

"अर्थ बताऊँ या समझाऊँ खोलकर?"

"अर्थ मैं समझ जाऊंगा, आप बताओ, मैं पागल थोड़े ही हूँ।" बेटा बोला। 

"तो सुनो, हम लोग दूसरे ग्रहों पर जीवन खोज रहे हैं बिलियन्स ऑफ डॉलर खर्च करते हैं, ताकि आदमी वहाँ रह सकें।"

"हाँ, ये तो मुझे पता है।" बेटा झुँझलाकर बोला। 

"और दुनिया को ख़त्म करने के लिए , आदमियों को मारने के लिए, ट्रिलियन्स ऑफ डॉलर हथियारों पर खर्च करते हैं .... इसे ही विडम्बना कहते हैं।"  

 Mob. 9810989904


चाँदनी / अंजू निगम

"माधव, मुझे यहाँ टाइम लग जायेगा। झांसी वाले फूफाजी की ट्रेन लेट हो गई है। टिप्पो को भी  साथ ही लेता आँऊगा। आगे पीछे ही आयेगीं दोनों की ट्रेन।" नवीन ने कहा।

"अरे भैया!!! मैंने कहा था ओलॉ कर लेगें दोनों। यहाँ अकेला मैं, क्या क्या देखूँ।" माधव परेशान सा बोला।

"झांसी वाले फुफाजी को तो जानते हो न!! अरे, फूफाजी से याद आया। अभी कैटरर वाला गद्दे पहुँचवा रहा है। चालीस बोले थे। गिनवा लेना और चाँदनी,गिलाफ देख लेना। साफ हो तभी रखवाना, नहीं वापस भेज दूसरे मँगवा लेना। झांसी वाले फूफाजी तो हाथ में सरसों नहीं उगने देते । तुम बस ये कर लेना, बाकी मैं आकर देख लूँगा।"

तभी गद्दे लिये मजदूर आ गये। गद्दे तो ठीक लगे पर चाँदनी एकदम उजाड़, भिजवा दी थी। काम ने वैसे ही माधव के दिमाग में गर्मी भर दी थी ,यह गर्मी उसने कैटरर को खरी खरी सुना कर उतारी।

सारी चाँदनी जस की तस वापस भेज दी गई , जो नयी आयी वे झक सफेद। चाँदनी के उजास से कमरा चमक सा गया।

फूफाजी आये तो खुश दिखे।

"भई, इंतजाम तो तगड़ा है। गंदगी मुझे जरा पंसद नहीं। इस बार तो सोच कर आया था, कुछ ऐसा-वैसा रहा तो होटल ले लूँगा।" फूफाजी एहसान से दबाये जा रहे थे।

घर के दामाद का रोल वे बखूबी निभा रहे थे। शाम को शगुन ले जाने की हड़बड़ी शुरु हुई। सब अपनी तैयारियों में लगे और फुफाजी की सेवा में कुछ नरमाई आ गई।

  ऊपर से नीचे तक चमक रहे फुफाजी को जूतोंं की चमक कुछ फीकी लगी और सफाईपंसद फूफाजी ने वहीं बिछी लकदक चाँदनी का कोना खींच अपने जूते चमका लिये।

उजली चाँदनी में एक काला धब्बा चिपक गया।

मोबॉइल : 7999920636 / 9479377968


खूबसूरती / उपमा शर्मा

ऑपरेशन थियेटर में डॉक्टर की आवाज कानों में पड़ने पर काजल ने धीरे से आँखें खोलीं।डॉक्टर का हाथ उसके पेट पर था।वो स्टिच लगा रही थी।साथ ही नर्स को कुछ इंस्ट्रक्शन देती जा रही थी। 

दर्द की तीव्र लहर से काजल की आँखों में आँसू आ रहे थे।उसे समझ नहीं आ रहा था कौन सा दर्द ज़यादा है ?शरीर पर लगे कट का या अपनी खूबसूरती खत्म होने का।सहेलियों की बातें रह -रहकर याद आ रहीं थीं। 

"अब तेरे पेट पर बर्थ मार्क बन जायेंगे।"

" तू अब सुंदर नहीं रही।"

देख तो मोटापे से सारी खूबसूरती का सत्यानाश कर लिया। "

"यामिनी तेरे सामने कहीं नहीं ठहरती थी।अब तेरे सारे प्रपोजल उसके पास हैं।तूने ख़ुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है। 

"बैडोल शरीर ,बढ़े हुए पेट के साथ कौन तुझसे मॉडलिंग करायेगा।अरी मूर्ख बच्चा ही चाहिए था सरोगेसी से कर लेती। "

"शीर्ष पर आ सब कुछ छूटने का दर्द तुझे बाद में समझ आयेगा काजल।"

"देखना सुंदर मॉडल देखकर एक दिन राज भी तुझे भूल जायेगा।"

काजल की आँखों के आँसू कुछ दर्द की शिद्दत और कुछ सहेलियों के आने वाले दिनों के खाके से और तेज़ हो गये।बच्चा तेज़ आवाज में रो रहा था। 

"क्या हुआ काजल?दर्द बहुत ज़्यादा हो रहा है? अभी तुझे पेन किलर के इंजेक्शन लगवाती हूँ।"

"डॉक्टर! क्या मैं अब सुंदर नहीं रही।"काजल के आँसू रूक ही नहीं रहे थे। 

"किसने कहा? "

काजल के आँसुओं में और तेजी आ गई। डॉक्टर ने स्टिच लगाना छोड़ उस नर्स को इशारा किया जो बच्चे को चुप कराने की कोशिश में थी।नर्स ने मुस्कुरा कर बच्चे को काजल के सीने पर लिटा दिया। 

बच्चा पहचानी हुई धड़कनों को सुन चुप हो गया।

अपने बच्चे को अपने सीने से लगाये वो ख़ुद को दुनिया की अब सबसे खूबसूरत औरत लगी।

मोबाइल  :  8826270597


चौपाल / मन मोहन भाटिया

नगर से चार किलोमीटर दूर हाइवे पर एक कॉलोनी बसी हुई है। लगभग चार हजार की आबादी वाली कॉलोनी के निवासी नगर में व्यापार करते हैं। बच्चे नगर के स्कूल में पढ़ते हैं। कॉलोनी के बीच चौराहे पर एक मंदिर है जिस के आगे हर सुबह सब्जी मार्किट लगती है। चौराहे पर हर सुबह पीपल के पेड़ के इर्दगिर्द चौपाल जमा कर कॉलिनी के लोग गपशप में समय व्यतीत करते हैं।

"और सुना मंटू आजकल बड़े नोट छाप रहा है?" चिंटू ने दातुन मुँह में चबाते हुए पूछा।

"तेरे को क्या? मेरी दुकान पर नजर क्यों गड़ाए बैठा है?" मंटू बिगड़ गया।

"नाराज क्यों हो रहा है? एक बात बता दूँ, बिल्लू से बच कर रहियो। पेमेंट देर से देता है। मेरी मोटी रकम उसके पास फंसी हुई है। मुझे रकम नहीं दे रहा है। मैंने तो उसको माल देना बंद कर दिया है तभी तेरी दुकान पर डेरा जमाए बैठा है।" चिंटू की मुस्कान कुटिल थी।

मन में बड़बड़ाता मंटू चला गया। "पट्ठे का सबसे बड़ा खरीददार हड़प लिया तभी तिलमिला रहा है।"

मंदिर दर्शन के बाद घर वापिस लौटते समय सब्जी खरीदते हुए बीना ने रीना को कहा। "तुझे मंटू की लड़की का चक्कर पता है?"

"किसको नहीं पता। मंटू की लड़की का चिंटू के लड़के के साथ जबरदस्त चक्कर चल रहा है। सबको मालूम है।"

"नहीं मालूम तो उन दोनों को ही नहीं पता। एक दूसरे से व्यापार में लड़ते हैं। जब बच्चों की करतूत पता चलेगी तब उनके चेहरे का रंग देखेंगे।"

दोनों खिलखिला कर हँस दी। तोलमोल कर सब्जी खरीद घर की ओर रवानगी की।

नौ बजे तक सब्जी मंडी सिमट गई और चौपाल खाली हो गई।

अब चौपाल कल लगेगी।

मोबाइल - 9810972975


सबसे खूबसूरत औरत /चंद्रभान आर्य

आज जब सवेरे मेरे जीवन के सौ साल पूरे होने पर परिवार में यज्ञ किया गया, बाद में जब मेरी छठी पीढ़ी तक के वृद्धों-प्रौढ़ों, युवक-युवतियों, किशोर-किशोरियों ने मेरे चरण स्पर्श करते, मुझे फूल-मालाओं से लादते समय मुझसे एक प्यारा-सा प्रश्न पूछ लिया तो मैं एकबारगी अचकचाकर रह गया।

प्रश्न किया था मेरे पोते की पोती सुनयना ने--"बड़े दादू, एक बात पूछूं?" 

“पूछो बिटिया रानी।"

"आपकी जिंदगी में सबसे खूबसूरत औरत कौन-सी थी?"

ऐसा बेहूदा (!) सा प्रश्न सुनकर सभी ठठाकर हँस ही पड़े। एक-दो बड़ी उम्र की महिलाएँ शर्मा भी गयी थी॔ और मुस्कराती कनखियों से मेरी ओर निहार भी रही थीं। लेकिन सबके चेहरों पर ध्यान-मुद्रा अंकित हो गई थी। सबकी मुस्कराती, प्रश्नाती आँखें मेरे चेहरे पर घंटे वाली सुई की तरह टिक गई थीं।

“जब से मुझे होश है, तब से सात-आठ साल की उम्र तक मेरी माँ सबसे खूबसूरत औरत थी।

"जब मैं दस-ग्यारह का हुआ, तो मुझसे दो साल कम उम्र की मेरी बहिन सुभद्रा भी मुझे बहुत-बहुत प्यारी लगने लगी।

"मेरे मन में रह-रहकर एक सवाल कौंधता रहता--मुझे कौन ज्यादा प्यार करती है--माँ या सुभद्रा ?

"इधर मैं बीस-इक्कीस का हुआ, उधर सुलोचना की मदमाती खिलखिलाहट मेरे मन-मंदिर में गूँजने लगी। वह मेरी पहली प्रेयसी थी, आखिरी भी।

"लेकिन हमारा यह पागल प्यार बहुत दूर तक हमारे संग-संग नहीं चला। वह अपने इंजीनियर पति के साथ सात फेरे लेकर ऑस्ट्रेलिया जा बसी। मुझे समाज ने उर्वशी के हाथों में सौंप दिया। तब मैं सत्ताइस का था। अभी तीन साल पहले तक उर्वशी ही मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत औरत थी।"

उर्वशी के वियोग की तड़प मेरे चेहरे पर साक्षात् प्रकट हो गई। मेरी वाणी शिथिल हो गई। मैं कह रहा था, “अभी सेवा की मूर्तिमयी मेरी बहूरानी मेरी बुढ़ाती दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत है। "...

मैंने महसूस किया कि सबकी आँखें भीगी-भीगी सी लग रही थीं।

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Sunday, 20 February 2022

परदा : कुछ लघुकथाएँ-4

अंतिम कड़ी

।।सोलह।।

उस दिन शादी का सालग (साया) बहुत तगड़ा था,  मेरी भी शादी थी ।
जब सुबह को मै अपनी   दुल्हन विदा कराकर लाया, तो उसने परदा कर रखा था। हमारे यहां रिवाज है कि लड़का-लड़की शादी से पहले नहीं मिलते। उसे मैंने पहली बार जयमाला के समय ही देखा था ।

गर्मी बहुत थी तभी हम शहर पहुँचे जहाँ जाम बहुत तगड़ा   लगा हुआ था।

दुल्हन, जो परदा करके गाड़ी में बैठी थी, बोली, “अजी गाड़ी रोको ना!”
मैंने पूछा, “क्या प्यास लगी है?”

वह बोली, “नहीं।”

मैं समझ गया कि वह गाड़ी क्यों रुकवा रही है। मैंने ड्राइवर से कहा तो उसने गाड़ी एक लॉज के सामने रोक दी । जहां सामूहिक शादी हुई थी। सब की विदाई हो रही थी।

वह बाथरूम के लिये उसी लॉज में गई।
तभी जाम खुल गया। ड्राइवर बोला, “जल्दी से अपनी बीवी को बुलाकर लाओ।”

मैं गाड़ी से उतरा और बाथरूम के पास पहुँचा।

तभी बाथरूम से दुल्हन निकली। मै उसका हाथ पकड़कर चल दिया। वह बोली, “रुको, रुको…।”

मैंने कहा, “कपड़े गाड़ी में सही कर लेना।”

वो रोकती रही, लेकिन मैं उसे जबरदस्ती गाड़ी में ले आया ।

गाड़ी चल दी तो वह रोने लगी; लेकिन मैंने उसकी एक ना सुनी। जैसे ही शहर पार हुआ वह चीखें मारने लगी।
मैंने पूछा, “ क्या हुआ?”

वह बोली, “मुझे छोड़ दो… जाने दो… सब सामान ले लो…।

मैंने कहा, “अरे रश्मि, ये क्या कह रही हो?”

वह बोली, “मै रश्मि नहीं, नीलम हूँ।” यों कहकर उसने अपने चेहरे पर पड़े परदे को उलट दिया।

मैं एकदम चौका। वाकई, वह मेरी दुल्हन नहीं थी। क्या करता! मैंने तुरंत गाड़ी मोड़कर वापस लॉज पर करा   ली।

जब मैं लॉज पर पहुँचा तो भीड़ इकट्ठी थी। मेरी दुल्हन वहाँ खड़ी-खड़ी रो रही थी। दूसरी तरफ मेरी गाड़ी में जो दुल्हन थी वह भी रो रही थी ।

मैंने गाड़ी से उतरकर सब से क्षमा माँगी कि परदा के कारण जल्दबाजी में यह हुआ और दुल्हन बदल गई ।

जब मैंने अपनी दुल्हन को गाड़ी में बिठाया तो वह रोते हुए बोली, “मै अब कभी ‘परदा’ नहीं करूँगी।”

मैंने हँसते हुए कहा, “ओके, ठीक है बाबा, मत करना।”
और हम अपने घर पहुँच गये।

।।सत्रह।।

"देख रमा, हमारे पास कुछ भी बचा नहीं।सब वक़्त के अंधड़ में तिनके की तरह उड़ गया। अब अगर कुछ बचा है तो हमारा मान-सम्मान और घर की इज़्जत को ढाँपता ये तेरे दादाजी का  लाया ज़री वाला मखमल का पर्दा। बेटा, ज़माना बदल गया… लोगों के सोचने का नज़रिया बदल गया...बेटियों से कह कि समय से घर आएं और पर्दे में रहें।"

वृद्धा जानकी, उस घर की मुखिया, हमेशा जिनकी चारपाई  वहीं बरामदे में रहती थी, सब पर नज़र रखती थीं। उसे सभी कहते थे—इस घर का असली पर्दा तो जानकी अम्मा हैं। सब बच्चों को जमाने की ऊँच-नीच वही बताती थीं।बच्चे भी उनका मान सम्मान करते थे। बिना पिता के वे बच्चे दादी का बहुत ख्याल रखते।

अचानक जानकी इस कदर बीमार हुईं कि ऑपरेशन की  नौबत आ गई। वह मना करती रहीं, पर रमा व बच्चों ने घर का एक-एक जेवर, यहाँ तक कि वह ज़री वाला मखमली पर्दा भी बेचकर उसे एडमिट करवा दिया। ऑपरेशन के दौरान ही जानकी चल बसीं।

गाँव वाले उस परिवार को सांत्वना दे रहे थे।सबके चेहरे कह रहे थे—‘आज इस परिवार का पर्दा हमेशा के लिए उठ गया।’

।।अठारह।।

पड़ोस की बहू किरण आई। बोली, “आंटी जी, आज बेटी के जन्मदिन की पार्टी है। उसमेँ आपको जरूर-जरूर आना है।” 

“हाँ-हाँ... मैँ जरूर आऊँगी।” कहकर रमा काम में लग गई।

काम करते-करते वह सोचने लगी—चार साल पहले बहू बन किरण आई थी। सभी ने कहा था कि बड़ी मॉडर्न-सी है, किसी से पर्दा नहीँ करती। और बंसल जी की बहू को देखो—सास-ससुर से पर्दा करती है, साड़ी पहनती है। किरण तो हर किसी के घर जाना-आना, हँसना-बोलना… उसने अपना एक बुटीक भी खोल लिया! वहीं,    बंसल जी की बहू चार साल मेँ ही लड़-झगड़कर घर के एक कमरे में अपने पति और बच्चों के साथ अलग रह रही है। सास-ससुर से बोलचाल भी नहीँ। ऐसा क्यूँ? किरण जब नई-नई आई तो कोई पर्दा नहीँ किया। मॉडर्न कपड़े पहनती थी। दो दिन बाद छत पर अपने देवर और ननद के साथ पतंग   उड़ाने लगी थी। उसकी सास ने पति से कहा—देखो, बहू पतंग उड़ा रही है। मोहल्ले वाले देख रहे हैं। .... पति ने कहा था—हमको अपनी बहू के साथ रहना है, मोहल्ले वालोँ के साथ   नहीं। बेटी है वो इस घर की। … 

सच ! परदा करवाने व बंदिश में रखने से ही लड़कियाँ बंसल जी के घर जैसी बहुएँ बन जाती हैं। जहाँ उनको स्वतंत्रता मिलता है, वे किरण जैसी बेटी बन जाती हैं। बदलाव आना चाहिए..... ।

।।उन्नीस। ।

''मैंने एक लड़की पसंद कर ली, उडती चिडिया पिंजरे में बंद कर ली'' राजेश मन ही मन ये गीत गुनगुना रहा था जब से   उसने रागिनी को एरेंज्ड  मैरिज  के लिए पसंद कर लिया था। नैन नक्श, बोलचाल,चालढाल सब भा गयी थी; हालाँकि ये ढाल तो बिना तलवार के दिखाई नहीं जाती परन्तु ऐसी   कहावत है. अपनी ही जात बिरादरी में इतनी सुंदर, सुशील कन्या को पाकर राजेश गदगद हो रहा था, जन्मपत्री में    पर्याप्त गुण भी मिल गए थे, घर वाले भी राजी थे और क्या चाहिए.
रागिनी की एम. एससी. अभी चल रही थी इसलिए इसके बाद ही शादी करने का निर्णय लिया गया. अब रागिनी भी गाने लगी "मेरा पढने में नहीं लागे दिल, क्यों?उस ज़माने में मोबाइल फोंस नहीं थे, एसटीडी पीसीओ में   लम्बी कतारें लगती थी. दो विभिन्न शहरों के होने के     कार्निवाल पत्र और ग्रीटिंग कार्ड्स ही संवाद का ज़रिया थे, पत्रों के माध्यम से ही धीरे धीरे प्यार की कोपले फूंट रहीं थी .रागिनी को पत्रों का इंतज़ार रहने लगा था, कॉलेज से     निकलते वक़्त वो पत्र लेजाकर फ्री पीरियड में पढ़ती थी.  विवाह पूर्व ये मेल -मुलाकाते पापा को गवारा नहीं थी. अब रागिनी भी बहनों से गुजारिश करने लगी -"तुम्ही करो कोई सूरत उन्हें मिलाने की, सुना है उनको तो  आदत है भूल जाने की!" इधर राजेश सोच रहा था मुझसे लकी तो वो डाकिया है, दीदारे यार तो हो जाता है ..
विवाह पूर्व परस्पर अकेले में बातचीत के लिए एक दिन    निश्चित किया गया, राजेश ने कंपनी  
को लीव एप्लीकेशन दे दी "आज उनसे पहली मुलाकात होगी फिर आमने सामने बात होगी!" और बड़ी आशा से पहुँच गया एक रेस्तौरेंट में ""रागिनी डरती, सहमती हुई आई और बताया आज पापा बाहर गए हुए हैं ,इसलिए बहनों ने ये मीटिंग एरेंज  करवाई है.  "पहले सौ बार इधर और उधर देखा है ,फिर कही डर के उन्हें एक नज़र देखा है!"रागिनी को डर था की कहीं मोहल्ले के लोग, या पापा का कोई दोस्त देख न ले. ऐसा लग रहा था   जैसे सांप सूंघ के चला गया हो,  टोमेटो सूप का एक एक   घूँट बड़ी मुश्किल से हलक से उतर रहा था. दोनों ही बहुत   असहज महसूस कर रहे थे. राजेश समझ गया अभी तो गंगा पृथ्वी पर उतरी ही नहीं है, उसने कहा--चलो तुम्हारे ही घर चलते हैं, वहीँ खाना खायेंगे, घर पहुचे तो सब आश्चर्यचकित, अरे इतनी जल्दी वापस आ गए, क्या    हुआ ? मम्मी, बहनें कहने लगीं-- पागल ही है हमारी लड़की, बाहर इसलिए भेजा था की जो कुछ भी कहना सुनना समझना हो अभी सब कर लो . 

घर वापस लोटते ही रागिनी खिलखिला उठी, अब वो राजेश के साथ सहज हो    गयी और खुल के बात करने लगी, माँ बहनों और ताई जी ने प्यार से घर का खाना खिलाया अब राजेश भी खुश था। "कल रात ज़िन्दगी से मुलाकात हो गयी, लब थरथरा रहे थे मगर बात हो गयी।"

(इसे नहीं पढ़ सका। यह कहीं से भी मुझे लघुकथा महसूस नहीं हुई।)

।।बीस।।

बस एक महीना ही हुआ था रुचिका का विवाह हुए। सास, जेठानी संग धीरे-धीरे घर के तौर-तरीके सीख रही थी। बड़े थे सब उससे घर में। हर वक्त सर पर पल्ला होना चाहिए—ऐसा सास का हुक्म था। खुले विचारों वाले घर से आयी थी रुचिका, फिर भी हर   रिवाज हँसकर मान लेती। एक दिन पति नौकरी के किसी काम से दूसरे शहर गये हुए   थे। रात का काम खत्म करके सब सोने चले गये।रुचिका भी थकी थी, जल्दी ही सो गई।तभी उसे किसी की मौजूदगी का एहसास हुआ।आँख खोली तो अँधेरे में एक परछाई ही नजर आयी।कुछ बोलती, उससे पहले ही उसका मुँह एक हाथ दबा चुकाथा।

दो-तीन रात यही होता रहा। बस, परछाई बदल जाती। 

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। बहुत हिम्मत करके उसने अपनी जेठानी से बात करनी चाही, पर उसके बोलते ही जेठानी बोली—चुप रहो, मैं तो आठ सालों से ये सब सह रही हूँ। अब तुम भी…।

तभी सासुजी की आवाज आयी—परदा कर लो, ससुरजी-जेठजी घर आ गये हैं।

हा-हा परदा!!! आँखों में आँसू लिए स्तब्ध खड़ी थी रुचिका।

                                                            ■■■