Thursday, 15 October 2020

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-7 / डॉ॰ सतीशराज पुष्करणा

 

दिनांक 15-10-2020 से आगे

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-7

7वीं समापन कड़ी

 

प्रत्येक लघुकथा की भाषा एवं उसकी शैली संवादों में उसके पात्रों के परिवेश, अवस्था एवं उनके चरित्रानुसार

ही होनी चाहिए, चाहे उसमें शाब्दिक एवं व्याकरणिक दोष भी क्यों न आ जाएँ। पूरी लघुकथा में एक शब्द तक कम या अधिक नहीं होना चाहिए। फालतूपन से लघुकथा प्रायः बोझिलता का शिकार हो जाती है, अतः बचना चाहिए। कारण, इसी पफालतूपन के कारण ही ‘कालत्व दोष’ उत्पन्न होता है और कालत्व दोष लघुकथा का एक बड़ा दोष है जो लघुकथा को कहानी होने का अहसास कराने लगता है। इस दोष से युक्त मैं चितरंजन गोप की लघुकथा ‘सिन्दूर का सामर्थ्य’ उदाहरणस्वरूप रखना चाहूँगा, ताकि कालत्व दोष को समझने में सुविधा हो सके। ;पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-30द्ध

इस लघुकथा में देखें प्रथम अनुच्छेद के पश्चात् ‘दस वर्ष बाद...’ लिखा है। यानी एक छोटी-सी लघुकथा में इतना बड़ा अन्तराल? लघुकथा ऐसा अन्तराल सहन नहीं करती है। अतः ‘कालत्व दोष’ के कारण यह लघुकथा समीक्षक द्वारा खारिज कर दी जा सकती है। हाँ, कभी-कभी लघुकथा में यह दोष लघुकथाकार के कुशल सृजन से इस प्रकार आता है कि पाठक को सहज इसका अहसास तक नहीं होता, तो ऐसे प्रवाह में यह दोष प्रत्यक्ष होते हुए विलुप्त-सा प्रतीत होता है, तो ऐसी स्थिति में यह दोष, दोष न रहकर सृजनकर्त्ता का कौशल बन जाता है। ऐसी स्थिति हेतु कल्पना मिश्र की लघुकथा ‘आलू-टमाटर की सब्जी’ का उदाहरणस्वरूप अध्ययन किया जा सकता है। ;पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-30द्ध

इस लघुकथा में यों तो ‘कालत्व दोष’ दो स्थान पर आया है। ‘‘अभी बीस दिन पहले ही की तो बात है। वह रक्षाबन्धन पर आई थी।’’

‘अभी बीस दिन पहले ही की तो बात है।’ यहाँ कालत्व दोष होते हुए भी रचनाकार के कौशल से इसका सहज अहसास नहीं होता। अतः इसे ‘कालत्व दोष’ की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। पुनः इसी लघुकथा में देखें

—इसके पाँच दिन बाद ही खबर मिली कि बाबूजी की हालत ठीक नहीं है, अस्पताल में हैं। वह छटपटा उठी और दूसरे दिन ही हॉस्पीटल पहुँच गई।

इसी लघुकथा में यह दुबारा ‘कालत्व दोष’—‘इसके पाँच दिन बाद ही खबर मिली...’ आया है किन्तु यहाँ भी कल्पना मिश्र के रचना-कौशल से वह अपने होने का अहसास तक नहीं होने देता। अतः यह भी कालत्व दोष में नहीं माना जाएगा।

यहीं यह भी स्पष्ट कर देना प्रासंगिक होगा कि कभी-कभी जाने-अनजाने या अज्ञानतावश ‘काल-दोषयुक्त’ लघुकथाएँ भी लघुकथाकार लिख देते हैं। यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि ‘काल-दोष’ होता क्या है? ‘काल-दोष’ से तात्पर्य यह है कि मान लीजिए किसी ने मुगलकाल का वर्णन करती लघुकथा लिखी तो तय बात है वहाँ लघुकथा में मुगल काल की भाषा एवं संवाद उसी शैली में होंगे, न कि वर्तमान हिन्दी या अंग्रेजीयुक्त शब्दों में। इसी प्रकार यदि हमने वेश-भूषा दिखानी है तो उसी काल की दिखानी होगी, न कि कुर्त्ता-धोती या पायजामा या पिफर पैण्ट-शर्ट आदि। यदि ऐसा करते हैं तो यह ‘काल-दोष’ कहलाएगा। यों यह अच्छी बात है, अब लघुकथाओं में ‘काल-दोष’ की जैसी भूल दिखाई नहीं देती, अब लघुकथाकार इस मामले में सतर्क हैं। अब जरूरत है उन्हें ‘कालत्व दोष’ से बचने की।

समीक्षा करते समय लघुकथा में विशेष रूप से ‘शीर्षक’ पर भी गम्भीरता से ध्यान देना चाहिए। लघुकथा का शीर्षक उसके एक महत्त्वपूर्ण अंग की भाँति होना चाहिए, न कि मात्रा औपचारिकतावश। लघुकथा, लघुकथा ही होनी चाहिए, समाचार की कतरन, दृश्यग्रापफी, वक्तव्य, गद्य-काव्य, चुटकुला या कहानी में प्रवेश-सा नहीं। कथ्य प्रासंगिक एवं मानवोत्थानिक होना चाहिए। लघुकथा किसी अन्य कथा-रचना से प्रभावित नहीं है, यह देखना भी अनिवार्य है। समीक्ष्य रचना में यदि कोई प्रयोग किया गया है, तो यह देखना चाहिए कि वह कितना सार्थक/उपयोगी है और लघुकथा को समृ( करता है या नहीं? प्रयोग सदैव ऐसा होना चाहिए जो लघुकथा को लघुकथा ही रहने दे, उसे अन्य किसी विधा में प्रवेश न करा दे।

यहाँ यह बता देना भी जरूरी है कि लघुकथा को ‘लघुकथा’ यानी लघु कथा एक साथ मिलाकर लिखना चाहिए कि लघुकथा वस्तुतः अपने आपमें एक पूर्ण संज्ञा है। यों भी यह बात स्पष्ट है जब भी किसी विधा या किसी अन्य का कोई नाम होगा तो वह संज्ञा ही होगा। ‘लघुकथा’ अलग-अलग लिखते ही ‘लघु’ विशेषण हो जाएगा और ‘कथा’ संज्ञा। ऐसी  स्थिति में यह किसी विधा का नाम तो हो ही नहीं पाएगा। जैसे किसी व्यक्ति का नाम छोटेराम है। यह संज्ञा है। इसे ‘छोटे राम’ ऐसे लिखने पर छोटे विशेषण और राम संज्ञा बन जाएगा। किन्तु किसी व्यक्ति का नाम-विशेष अलग करके नहीं बोला जा सकता। अतः नाम कोई भी हो, वह संज्ञा ही कहलाएगी। संज्ञा को खण्ड-खण्ड करके एक शब्द को विशेषण और दूसरे को संज्ञा के रूप में नहीं लिखा जा सकता। अतः ‘लघुकथा’ भी चूँकि एक विधा का नाम है, अतः उसे अलग नहीं लिखा जा सकता। अतः उसे लघुकथा ही लिखा जाएगा।

लघुकथा के आकार पर चर्चा करें, इससे पूर्व यह जान लेना चाहिए, साहित्य गणित नहीं है जो सूत्रों के बल पर काम करता हो। सूत्रा रूढ़ होते हैं, उन्हें बदला नहीं जा सकता और साहित्य बदलते समय के साथ-साथ बदलता है। यही कारण है लघुकथा 1874 या 1875 ई. में कैसी लिखी जा रही थी, और उसमें क्रमशः बदलाव आते-आते आज किस रूप में हमारे समक्ष उपस्थित है। बदलाव में कथानक, शिल्प आदि सब बदलते जाते हैं। इनके बदलाव से इनके आकार में भी बदलाव आया है।

हसन मुन्शी अली, भारतेन्दु और पिफर सातवें-आठवें दशक की लघुकथाएँ अवलोकित करें और देखें, आकारगत दृष्टि से कितने छोटे आकार में थीं। मात्र कुछ पंक्तियाँ या आधा-पौन पृष्ठ तक सीमित थीं और आज इनकी सीमा डेढ़-दो पृष्ठ भी हो जाती है। अतः कथानक के अनुसार शिल्प ढलता है और शिल्प ही कथानक के अनुसार उसे सही आकार देता है। अतः अब आकार को लेकर बहस करना, अपना एवं दूसरों का समय नष्ट करना ही है।

अन्त में एक और बात जिसका समीक्षा करते समय ध्यान रखना अनिवार्य है कि सातवें-आठवें दशक की तरह अब लघुकथा में व्यंग्य भी हो तो सकता है, किन्तु अब यह लघुकथा की अनिवार्यता कतई नहीं है। लादा हुआ व्यंग्य लघुकथा को सतही बना देता है।

लघुकथा की समीक्षा करते समय कथानक/विषयवस्तु को केन्द्र मानकर चलना चाहिए। मेरे विचार से इन बातों को ध्यान में रखकर किसी भी लघुकथा की समीक्षा/मूल्यांकन एवं उसके प्रति न्याय आसानी से कर सकते हैं।

सम्पर्क : अध्यक्ष, अ. भा. प्रगतिशील लघुकथा मंच,

‘लघुकथानगर’, महेन्द्रू, पटना-800 006 ;बिहारद्ध

मो.ः 082984 43663, 090064 29311

म.उंपसरू ेंजपेतंरचनेांतंदं/हउंपसण्बवउ

सन्दर्भ

1. डॉ. सतीशराज पुष्करणा (सं.), लघुकथा : बहस के चौराहे पर

2. डॉ. सतीशराज पुष्करणा (सं.), लघुकथा : सर्जना एवं समीक्षा

3. मधुदीप (सं.), हिन्दी की कालजयी लघुकथाएँ

4. डॉ. सतीशराज पुष्करणा (सं.), हिन्दी लघुकथा : संरचना और मूल्यांकन

5. डॉ. सतीशराज पुष्करणा (सं.), तत्पश्चात्

6. योगेन्द्रप्रताप सिंह, हिन्दी आलोचना : इतिहास और सि(ान्त

7. मधुदीप (सं.), पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-20

8. प्रो. (डॉ.) रामदेव प्रसाद, हिन्दी व्याकरण-चिन्तन  

9. डॉ. नगेन्द्र, नई समीक्षा : नए सन्दर्भ

10. धीरेन्द्र वर्मा (प्रधान संपादक),  हिन्दी साहित्य कोश, भाग-1

11. बलराम अग्रवाल (सं.); पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-2

12. मधुदीप (सं.), पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-1, 3, 22, 25, 27, 28, 30

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-6 / डॉ॰ सतीशराज पुष्करणा

 दिनांक 14-10-2020 से आगे

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-6

छठी कड़ी

2. वैचारिक समीक्षा—

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस प्रकार की समीक्षाओं में समीक्षक प्रायः उस विचारधाराको आधार बनाकर समीक्ष्य लघुकथा को अपने निकष पर कसता है, जिस विचारधारा के प्रति वह प्रतिब( होता है। अपनी-अपनी प्रतिब(ताओं को ध्यान में रखकर कोई भी समीक्षक प्रभाववादी, तुलनात्मक, निर्णयात्मक, ऐतिहासिक, व्याख्यात्मक, चरितात्मक, मनोवैज्ञानिक, प्रगतिवादी, सौन्दर्यवादी, रूपवादी, पाठकीय इत्यादि अपनी-अपनी प्रतिब(ता के अनुसार ही समीक्षाएँ लिखता है।

;पद्ध प्रभाववादी समीक्षा—इस प्रकार की समीक्षा में समीक्षक लघुकथा अथवा कृति से जुड़ी अपनी वैचारिक प्रतिब(ता को अभिव्यक्ति प्रदान करता है।

;पपद्ध तुलनात्मक समीक्षा—इस प्रकार की समीक्षा का आयाम बड़ा विस्तृत है। एक पंक्ति की लघुकथा से लेकर डेढ़-दो पृष्ठों की लघुकथा तक उसकी तुलना किसी बड़ी कृति से विचारधारा अथवा रचना-कौशल के स्तर पर की जा सकती है।

;पपपद्ध निर्णयात्मक समीक्षा—इस प्रकार की लघुकथा-समीक्षा में लघुकथा के समस्त गुण-दोषों को निरूपित करते हुए उसका महत्त्व निर्धारित करना होता है, हालाँकि यह समीक्षा-प्रकार परम्परागत है।

;पअद्ध ऐतिहासिक समीक्षा—यह सर्वमान्य है, प्रत्येक श्रेष्ठ लघुकथा अपने समय का सच होती है। कोई भी लघुकथा देश-काल से निरपेक्ष नहीं होती। अतः ऐतिहासिक से वर्ग एवं परिवेश, समाज-रचना के प्रचलित मूल्य-संस्कार तथा युग-विशेष के आयामों से कृति लघुकथा को बाहर रखना सम्भव नहीं है।

;अद्ध व्याख्यात्मक समीक्षा—आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, ‘‘व्याख्यात्मक समीक्षा किसी पुस्तक में आई हुई बातों को एक व्यवस्थित रूप में सामने रखकर इनका अनेक प्रकार से स्पष्टीकरण करती है। यह मूल्य-निर्धारित करने नहीं जाती है। योगेन्द्रप्रताप सिंह के अनुसार, ‘‘रचना में सन्निहित सर्वनात्मक तत्त्व एवं सामाजिक मूल्य तथा उनको व्यवस्थित अर्थात् क्रमब( तथा तार्किक रूप से प्रस्तुत करके विश्लेषण करना इस प(ति का मुख्य धर्म है।’’

;अपद्ध चरित्रात्मक समीक्षा—किसी लघुकथा की व्याख्या के साथ सर्जक के परिवेश, देश-काल एवं संस्कारों की छानबीन के साथ उसके कर्तृव्व का विश्लेषण ही चरित्रात्मक समीक्षा है।

;अपपद्ध मनोवैज्ञानिक समीक्षा—यह सर्वमान्य है कि कोई भी लघुकथा लघुकथाकार के मन में उपजी उसकी अवधारणाओं की विशेष अभिव्यक्ति है। यह रचनाकार की मन में उपजी अवधारणा है कि लघुकथा में वर्णित स्वरूप को विषयवस्तु या कथानक के अनुकूल कौन-सा शिल्प प्रदान कर दे। इस सन्दर्भ में मनोवैज्ञानिक समीक्षा रचनाकार की मानसिक समझ एवं रुझान के उन सन्दर्भों की खोज करने हेतु प्रतिब( होती है—जो सृजन के सापेक्ष्य में अपने प्रभाव से उसकी सम्पूर्णता को अपने अनुकूल परिवर्तित करती है। यही मनोवैज्ञानिक समीक्षा है।

;अपपपद्ध प्रगतिवादी समीक्षा—कार्ल मार्क्स के भौतिक द्वन्द्ववाद के प्रचार के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्रा में प्रगतिवादी विचारधारा का प्रवेश हुआ और इस विचारधारा के समीक्षक इस प्रगतिवादी समीक्षा को साहित्य के विवेचन के आधार के रूप में स्वीकृति प्रदान करते हैं। यही स्थिति लघुकथा विधा में भी है। इसी को मार्क्सवादी अथवा सामाजिक यथार्थवादी समीक्षा-प(ति भी कहते हैं। तात्पर्य यह है कि मार्क्स के भौतिक द्वन्द्व को निकष मानकर जब किसी लघुकथा की समीक्षा की जाती है तो वह प्रगतिवादी समीक्षा कहलाती है।

;पगद्ध सौन्दर्यवादी समीक्षा—सटीक शिल्प द्वारा प्रदत्त सौन्दर्य से सजी लघुकथा की कलात्मक अभिव्यक्ति किसी भी पाठक को सहज ही आकर्षित करती है। इस आकर्षण के मूल में सौन्दर्यमूलक सर्जन के उपादान लघुकथा के अनिवार्य धर्म हैं-और उनकी व्याख्या तथा विश्लेषण करना आलोचक का मुख्य कार्य है। इस प्रकार की गई समीक्षा सौन्दर्यवादी समीक्षा कहलाती है।

;गद्ध रूपवादी समीक्षा—इस प्रकार की समीक्षा में कोई भी लघुकथा अपने स्वरूप में पहचानी जाती है। इसके स्वरूप की पहचान हेतु उसकी भाषा-शैली, बिम्ब, प्रतीक, रूपक-विधान, मिथकीय सन्दर्भ आदि ऐसे कारक हैं, जो उसके सर्जनात्मक कलेवर का विधान करते हैं, ऐसे कारकों की उपस्थिति का विवेचन ही रूपवादी समीक्षा कहलाती है।

;गपद्ध पाठकीय समीक्षा—अनेक विद्वानों का मत है कि कोई रचना भाषा के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति प्राप्त करती है। अतः भाषा के सर्जनात्मक सामर्थ्य की पहचान एवं विश्लेषण ही पाठकीय समीक्षा है। योगेन्द्रप्रताप सिंह के कथनानुसार—‘‘पाठकीय समीक्षा रूपवादी समीक्षा की अन्तिम परिणति है।’’

उपर्युक्त वर्णित सभी ग्यारहों प्रकार भीतर से आपस में जुड़े हैं। लघुकथा की समीक्षा करते समय यदि इन सभी प्रकारों का ध्यान रखा जाए तो किसी भी लघुकथा के साथ समीक्षक पूरा-पूरा एवं सही न्याय कर सकता है। यह सही है प्रत्येक समीक्षक की दृष्टि एवं विचारधारा भिन्न होती है। हो सकती है, किन्तु पिफर भी साहित्य का मूल एवं उद्देश्य तो एक ही रहता है, वह कभी नहीं बदलता है। अतः विचारधारा भिन्न होने के बावजूद तटस्थ समीक्षा किसी भी लघुकथा के साथ न्याय कर सकती है।

सार-संक्षेप में किसी भी लघुकथा की समीक्षा करते समय रचना को प्रथमतः एक पाठक की तरह पढ़ना चाहिए, तत्पश्चात् उसे अनेक बार समीक्षक की दृष्टि से पूरी लघुकथा को पूरी गहराई तक समझकर लेखकीय उद्देश्य तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए, तब यह देखना चाहिए वह लघुकथा समीक्षक को कहाँ तक प्रभावित करती है या कितनी हृदयस्पर्शी यानी संवेदनायुक्त है? इसके पश्चात् उसमें मानवोत्थानिक किन्तु नकारात्मकता रहित सन्देश की तलाश करते हुए उसके शिल्प  को परखना चाहिए कि वह उस लघुकथा के अनुकूल है या नहीं? कारण, अधिकांश लघुकथाएँ प्रतिकूल शिल्प के कारण ही अपना प्रभाव खो देती हैं। ‘कथ्य’ और ‘कथानक’ के अनुसार आकार को भी देखना चाहिए, कारण, आकारगत लघुता और क्षिप्रता किसी भी श्रेष्ठ लघुकथा की बड़ी विशेषताएँ हैं। लघुकथा में जो कहा गया है वह पाठकों तक सम्प्रेषणीय होना अनिवार्य है किन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि पाठक लेखक की पहुँच तक नहीं पहुँच पाता है और उसे ‘दुरूह’ लघुकथा  समझकर नकार देता है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा होगा तो जयशंकर ‘प्रसाद’ की अनेक लघुकथाएँ नकार दी जाएँगी, जबकि वे उत्कृष्ट लघुकथाएँ हैं। ऐसी स्थिति में पाठक को ऐसी दुरूह रचना को बार-बार पढ़कर उस रचना के मर्म तक पहुँचने का पूरा-पूरा प्रयास करना चाहिए। पाठक को अपनी कमी का अहसास करते हुए यह भी सोचना चाहिए कि लघुकथाकार सदैव पाठकों के लिए ही नहीं लिखता, कुछ वह अपनी पसन्द की पहचान भी पाठकों को अति विनम्रता से करवाना चाहता है और पाठकों को भी अपनी कमी का अहसास करते हुए अपनी अध्ययनशीलता को क्रमशः बढ़ाना चाहिए।

                                                शेष आगामी अंक में…………

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-5 / डॉ॰ सतीशराज पुष्करणा

 दिनांक 13-10-2020 से आगे

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-5

पाँचवीं कड़ी

क्षिप्रता—लघुकथा का अतिविशिष्ट गुण ‘क्षिप्रता’ है जिसका अर्थ लघुता में पफुर्तीलापन और गति में त्वरा

होता है। क्षिप्रता के बिना लघुकथा का सृजन ही सम्भव नहीं है। क्षिप्रता ही वह गुण है जो लघुकथा में अनावश्यक शब्दों को रोकता है। क्षिप्रता शब्दों में मितव्ययिता को जमकर प्रोत्साहन देती है। यही कारण है कि मैं लघुकथा को स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा मानता हूँ और इसे इसी रूप में परिभाषित भी आरम्भ से करता आया हूँ। इस सन्दर्भ में कुणाल शर्मा की ‘उसका जिक्र क्यों नहीं करते?’ लघुकथा का सहज ही अवलोकन किया जा सकता है। (पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-30)

 यह लघुकथा प्रथम एवं अन्तिम वाक्य को छोड़कर पूरी लघुकथा संवादों में ही पूर्ण हुई है। इसमें चार पात्रा हैं जो वार्तालाप करते हुए ही गन्तव्य तक लघुकथा को पहुँचा देते हैं। इनकी बातचीत का विषय लड़की का किसी लड़के के साथ भाग जाना है और तीन पात्रा इस कर्म हेतु लड़की को ही दोषी मानते हैं, किन्तु चौथा व्यक्ति पहले तो चुपचाप तीनों की बातें सुनता है पिफर अन्त में कहता है—‘‘अकेली भागी है क्या लड़की? अगर नहीं, तो भाई, लड़के के बारे में भी कुछ बोलो, उसका जिक्र क्यों नहीं करते...?’’

इस विषय को क्षिप्रता के साथ प्रस्तुत करने हेतु संवाद-शिल्प ही सटीक था, लेखक के इस कौशल ने लघुकथा को श्रेष्ठ बनाने में पूर्ण सहयोग किया।

सुष्ठुता—सुष्ठु को अंग्रेजी में ‘कॉम्पैक्ट’ कहते हैं। लघुकथा का यह गुण लघुकथा को फालतूपन की ओर जाने से रोकता है, किन्तु आवश्यकता के अनुसार आये सटीक एवं आवश्यक शब्दों को बहुत ही करीने से प्रस्तुत करता है। सुष्ठुता को प्रस्तुत करती सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की लघुकथा ‘जंगल और कुल्हाड़ी’ उदाहरणस्वरूप रखी जा सकती है। (पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-27—हिन्दी की कालजयी लघुकथाएँ)

इस लघुकथा में यह स्पष्ट किया गया है कि जो काम भी करो, करने से पूर्व भली-भाँति उसके परिणाम के विषय में पूरी गम्भीरता से सोच-समझ लो। इस बात को लेखक ने सीधे न कहकर जंगल, पेड़ और कुल्हाड़ी को माध्यम बनाकर बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है। इस लघुकथा की परख वर्तमान की लघुकथाएँ सामने रखकर नहीं की जा सकती। इस लघुकथा को इसके रचनाकाल के समय को देखते हुए ही इसकी परख की जानी चाहिए। कारण, जिस काल में यह लघुकथा रची गई यानी वह काल चौथा दशक है और आज नई सदी का यह दूसरा दशक व्यतीत होने को है, अतः प्रत्येक दृष्टिकोण से इन दोनों कालों की लघुकथाओं के शिल्पों में अन्तर तो होगा ही।

सांकेतिकता—सांकेतिकता का अर्थ—लघुकथा में जब भाषा या अन्य स्तरों पर प्रत्यक्ष कोई बात न कहकर संकेत में कही जाती है तो इस क्रियात्मकता को सांकेतिकता कहते हैं। जब कथा में सांकेतिकता का उपयोग किया जाता है तो लघुकथा में शब्दों की मितव्ययिता तो आ ही जाती है, साथ ही इसकी श्रेष्ठता भी कई गुना बढ़ जाती है।

सांकेतिकता का उपयोग करते हुए जाने-अनजाने बहुत नहीं तो कुछ लघुकथाएँ तो अवश्य ही प्रकाश में आई हैं, जो श्रेष्ठ लघुकथाओं की श्रेणी में गिनी जाती हैं। ऐसी लघुकथाओं में किशोर काबरा की ‘तीन बन्दर’ देखी-परखी जा सकती है। (हिन्दी की कालजयी लघुकथाएँ, पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-30, धरोहर भाग)

इस लघुकथा में गांधीजी के तीन बन्दरों को लेकर वर्तमान समय में व्याप्त भ्रष्टाचार को नपे-तुले शब्दों की सांकेतिक भाषा में बहुत ही सुन्दर ढंग से अभिव्यक्त कर दिया है। परिणामतः यह एक श्रेष्ठ लघुकथा बन गई है। लघुकथाकारों को सांकेतिकता का उपयोग करते हुए पर्याप्त मात्रा में लघुकथाएँ लिखनी चाहिए। सांकेतिकता यदि सटीक ढंग से उपयोग में लायी गई हो तो लघुकथा को वह श्रेष्ठता के शिखर तक पहुँचा देती है।

सार-संक्षेप में लघुकथा के रचना-विधान को यों व्यक्त किया जा सकता है, लघुकथा जो विश्वसनीय मानवोत्थानिक कथ्य, प्रासंगिक कथानक, सटीक भाषा-शैली, जीवन-संघर्ष, रंजन, संप्रेषणीय प्रस्तुति, हृदयस्पर्शी, चरमबिन्दु के साथ-साथ सभी कथा-तत्त्वों, उपतत्त्वों को वर्तमान की जमीन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाहित किए एवं यथार्थवादी/यथार्थवादी-सी रचना के रूप में कोई-न-कोई मानवोत्थानिक सन्देश लिए प्रस्तुत होती है। लघुकथा, कथा का ही आधुनिक और विकसित स्वतन्त्रा स्वरूप या विधा है। इसे यों भी परिभाषित किया जा सकता है कि ‘लघुकथा स्थूल से सूक्ष्म की रंजनात्मक कथा-यात्रा है।’ अतः यह समाचार, चुटकुला, लतीपफा, रिपोर्टिंग, कहानी में प्रवेश-सा वक्तव्य, गद्यगीत, संस्मरण, दृश्यग्रापफी आदि न बन जाए अपितु इसमें गद्यात्मक कथापन की उपस्थिति अपरिहार्य है।

लघुकथा के रचना-विधान के पश्चात् लघुकथा की समीक्षा पर भी बात कर लेना प्रासंगिक होगा। साहित्य की गद्य विधा में ‘समीक्षा’ भी एक महत्त्वपूर्ण विधा के रूप में अपना उल्लेखनीय स्थान बना चुकी है।

‘समीक्षा’ शब्द ‘सम+ईक्षा’ से निर्मित हुआ है, जिसका अर्थ किसी भी वस्तु को बराबर दृष्टि से देखना, यानी उसे उसकी पूर्ण विशेषताओं और कमियों के साथ देखना-परखना, उनकी पड़ताल करना। साहित्य में इसका तात्पर्य किसी भी कृति अथवा रचना को गम्भीरतापूर्वक तटस्थ भाव से अवलोकित करते हुए उसके गुण एवं दोषों पर अपनी विशिष्ट भाषा-शैली में बहुत सुन्दर ढंग से प्रकाश डालना है।

यों तो समीक्षा-कर्म व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है कि अमुक समीक्षक की क्या विचारधारा है या कोई रचना/कृति उसके मन/हृदय को कैसी लगती है। इसी आधार पर समीक्षा के दो प्रकार बताए जाते हैं— 1. व्यवहारिक समीक्षा, 2. वैचारिक समीक्षा।

1. व्यवहारिक समीक्षा—यह एक प्रकार से पाठकीय प्रतिक्रिया होती है, किन्तु अन्तर इतना ही होता है कि पाठकीय प्रतिक्रिया एक बार रचना पढ़ते ही हृदय पर जो प्रभाव पड़ा उसकी भावपूर्ण अभिव्यक्ति होती है, जबकि व्यवहारिक समीक्षा करते समय कोई भी समीक्षक रचना का पुनः-पुनः समीक्षा-दृष्टि से अध्ययन करते हुए मन में आई तत्काल प्रतिक्रिया को उसके गुण-दोषों का समन्वय बनाकर अपनी आलोचकीय भाषा-शैली में विस्तृत अभिव्यक्ति प्रदान कर देता है। व्यवहारिक समीक्षा में तत्काल अपनी वैचारिक दृष्टि, लघुकथाकार से सम्बन्धित व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्रोतों का ज्ञान, मूल्यबोध तथा संरचना या कृति के गुण-दोष इत्यादि को समीक्षक अपनी पूरी गहराई तक जाकर देखता-परखता है। इस हेतु वह कोई विधागत शास्त्रा आदि का सहारा या ऐसी किसी शास्त्राय मान्यता के प्रति प्रतिब( नहीं होता। उसमें उस समीक्षक की अपनी वैयक्तिक प्रतिक्रिया रहती है। अभी तक प्रायः लघुकथा-लेखक ही इस दायित्व का निर्वाह करते रहे हैं किन्तु निशान्तर, रवीन्द्रनाथ ओझा, राधिका रमण अभिलाषी, कुमार अखिलेश्वरी नाथ, निशान्तकेतु, चक्रधर नलिन, लालमुनि दुबे ‘निर्मोही’, डॉ. चन्द्रेश्वर कर्ण, डॉ. ब्रजकिशोर पाठक, राधेलाल बिजघावने, डॉ. विनोद गोदरे, पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी, अमर गोस्वामी, सन्तोष सरस, भूपाल सिंह अशोक, बलदेव उपाध्याय, रामनारायण बेचैन, डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ, डॉ. कमलकिशोर गोयनका इत्यादि ऐसे आलोचक हैं जिन्होंने लघुकथाएँ नहीं लिखीं, केवल आलोचक की भूमिका में रहकर यथासम्भव लघुकथा-समीक्षा के विकास में अपना योगदान देते रहे। इनमें से कुछ तो अब इस संसार में नहीं हैं, कुछ लेखन-कर्म से ही दूर चले गए, किन्तु निशान्तर आज भी सक्रिय हैं। पड़ाव और पड़ताल में भी इन्होंने दायित्वपूर्ण ढंग से आलोचक की भूमिका का निर्वाह किया है।

इसके पश्चात् अनेक लोग मधुदीप के सम्पादकत्व में प्रकाशित ‘पड़ाव और पड़ताल’ के माध्यम से जुड़े जिनमें लघुकथा-लेखकों के अतिरिक्त जो मात्रा लघुकथा-आलोचना से जुड़े हैं, उनमें प्रो. मृत्युंजय उपाध्याय, डॉ. सुलेखचन्द्र शर्मा, विनय विश्वास, प्रो. सुरेशचन्द्र गुप्त, भारतेन्दु मिश्र, डॉ. जितेन्द्र ‘जीतू’, सुभाषचन्दर, डॉ. पुरुषोत्तम दुबे, प्रो. शैलेन्द्रकुमार शर्मा, प्रो. ॠषभदेव शर्मा, डॉ. मलय पानेरी, सुरेश यादव, डॉ. बलवेन्द्र सिंह, डॉ. ओमप्रकाश ‘करुणेश’, डॉ. राजेन्द्र टोकी, डॉ. सुभाष रस्तोगी, डॉ. राकेशकुमार, हरदान हर्ष, डॉ. हरीश नवल, ओमप्रकाश कश्यप, डॉ. स्नेह गुप्ता नवल, डॉ. रश्मि, डॉ. सुधा उपाध्याय, नवीन चौधरी, मानसी काणे, कृष्णा पाल, पारनन्दि निर्मला, डॉ. हून्दराज बलवाणी, डॉ. ब्रह्मवेद शर्मा, डॉ. शशि निगम, डॉ. ध्रुवकुमार, खेमकरण ‘सोमन’,  डॉ. इसपाक अली खान, डॉ. अनीता राकेश, डॉ. स्नेहलता श्रीवास्तव, अरुण अभिषेक, डॉ. व्यासमणि त्रिपाठी, डॉ. गुर्रमकोण्डा नीरजा, प्रो. फूलचन्द्र मानव, डॉ. शंकर प्रसाद, डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा, प्रियंका गुप्ता, प्रो. रामसजन पाण्डेय, डॉ. सत्यवीर मानव, डॉ. हृदयनारायण, भावना सक्सेनाऋ इनके अतिरिक्त पड़ाव और पड़ताल में बी.एल. आच्छा आलोचना-कर्म में सक्रिय रहे हैं, किन्तु ये लघुकथाएँ भी लिखते हैं। ‘पड़ाव और पड़ताल’ के ही 30वें खण्ड में इनकी लघुकथा प्रकाशित है। इनके अतिरिक्त कृष्णानंद कृष्ण, राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’, डॉ. मिथिलेशकुमारी मिश्र, डॉ. वीरेन्द्रकुमार भारद्वाज, डॉ. शिवनारायण, डॉ. पुष्पा जमुआर, डॉ. उमेश महादोषी, अनीता ललित, डॉ. अनीता राकेश इत्यादि ऐसे समीक्षक हैं, जो ‘पड़ाव और पड़ताल’ में आलोचक की भूमिका में हैं, यों इन आलोचकों ने पर्याप्त लघुकथा-सृजन भी किया है।

इन सभी आलोचकों ने प्रायः व्यावहारिक समीक्षाएँ ही लिखी हैं।

                                   शेष आगामी अंक में…………

Tuesday, 13 October 2020

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-4 / डॉ॰ सतीशराज पुष्करणा

 दिनांक 12-10-2020 से आगे

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-4

चौथी कड़ी

शिल्प के छह उपतत्त्वों की चर्चा उफपर की गई है किन्तु इसके अतिरिक्त कुछ अन्य कारक एवं विशेषताएँ भी हैं जो लघुकथा के शिल्प में अपेक्षाकृत अधिक चमक लाने में सहयोग देते हैं। वे क्रमशः इस प्रकार हैं—1. संवेदनशीलता, 2. संघर्ष, अर्न्द्वन्द्व, 3. अनकहे का कहना, 4. विराम-चिह्न, 5. कालत्व दोष और 6. काल-दोष।

1. संवेदनशीलता—साहित्य-जगत में संवेदना का अर्थ ज्ञान या ज्ञानेन्द्रियों का अनुभव है। जब हम कोई लघुकथा पढ़ते हैं तो कुछ लघुकथाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें पढ़कर मन भावुकता के शिखर का स्पर्श करने लगता है, तो ऐसी स्थिति को संवेदना और ऐसी रचना को संवेदनशील रचना कहते हैं। प्रायः लघुकथाकारों द्वारा ऐसी लघुकथाओं की रचना सम्भव हुई है, वस्तुतः जो लघुकथा हृदय का स्पर्श पूरी गहराई तक जाकर कर लेती है, वह लघुकथा संवेदनशील मानी जाती है। उदाहरणस्वरूप चित्रा मुद्गल की लघुकथा ‘दूध’ देखी जा सकती है। (पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-2)

एक ऐसी बेटी का दर्द जिसे सयाने होने पर दूध नहीं दिया जाता और इच्छा होने पर उसे चुराकर पीना पड़ता है। ऐसी स्थिति में उसे अपनी माँ से डाँट खानी पड़ती है।

तात्पर्य यह है कि लघुकथाकार को प्रयास करना चाहिए, जब जहाँ भावुकता उत्पन्न करने का अवसर आए, उसका पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहिए, प्रत्येक लघुकथा में तो ऐसा सम्भव नहीं है, यह सही है।

2. संघर्ष—कथावस्तु को जो निर्णयात्मक क्षण प्रदान करती है वो स्थिति संघर्ष कहलाती है। व्यक्ति के मन में होनेवाले अन्तर्द्वन्द्व को भी संघर्ष कहते हैं। लघुकथा में संघर्ष की उपस्थिति रचना को श्रेष्ठ बनाने में भरपूर सहयोग प्रदान करती है। जाने-अनजाने प्रायः यानी अधिकांश लघुकथाओं में स्वाभाविक रूप से संघर्ष की उपस्थिति हो ही जाती है। लघुकथा में संघर्ष प्रायः नायक/नायिका अथवा दोनों का प्रत्यक्ष होता है

, संघर्ष का सटीक चित्राण लघुकथा को श्रेष्ठ बनाने में उल्लेखनीय योगदान प्रदान करता है। उदाहरणस्वरूप रूप देवगुण की ‘जगमगाहट’ लघुकथा का अध्ययन किया जा सकता है। (पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-3)

इस लघुकथा में इन पंक्तियों में ‘संघर्ष’ को देखें—

‘‘अबकी बार उसने सोच लिया था, वह नौकरी नहीं छोड़ेगी, वह मुकाबला करेगी। उसी दिन दोपहर बाद बॉस ने उसे अपने साथ अकेले में उस कमरे में जाने के लिए कहा, जहाँ पुरानी पफाइलें पड़ी थीं। उन्हें उन पफाइलों की चेकिंग करनी थी। उसे सापफ लग रहा था कि आज उसके साथ गड़बड़ी होगी।

एक बार तो उसके मन में आया कि कह दे कि मैं नहीं जा सकती। किन्तु नौकरी का खयाल करते हुए वह इन्कार न कर सकी। कुछ देर में ही वह तीन कमरे पार कर चौथे कमरे में थी। वह और बॉस पफाइलों की चेकिंग करने लगे। उसे लगा, जैसे उसका बॉस पफाइलों की आड़ में केवल उसे घूरे जा रहा है। उसने सोच लिया था कि ज्योंही वह छुएगा वह शोर मचा देगी। दस मिनट हो गए, लेकिन बॉस की ओर से कोई हरकत न हुई।

अचानक बिजली गुल हो गई। यह बॉस की साजिश हो सकती है—यह सोचते ही वह काँपने लगी।’’

यह नायिका का अन्तर्द्वन्द्व/संघर्ष है जो इस लघुकथा की पृष्ठभूमि को शक्ति प्रदान करते हुए मन्तव्य की ओर त्वरा से आगे बढ़ाता है।

3. अनकहे की मुखरता—श्रेष्ठ लघुकथाओं के अनेक गुणों में से एक यह गुण भी बहुत महत्त्वपूर्ण है कि जो बात लघुकथा में शब्दों में न लिखी हो, वह बात भी स्वयं को प्रत्यक्ष करे। वस्तुतः यही वह कला है जिससे लघुकथा अपनी पूर्णता बरकरार रखते हुए शब्दों की मितव्ययिता बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत कर देती है। लघुकथा को लघु आकार देने में इस गुण का बड़ा महत्त्व हो जाता है। उदाहरणस्वरूप सुभाष नीरव की ‘दर्द’ लघुकथा देखें। (पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-30

इस लघुकथा में ‘आईना’ या ‘दर्पण’ शब्द का कहीं लिखित उपयोग नहीं हुआ, और वह पूरी लघुकथा में एक मुख्य सह-पात्रा के रूप में अपनी धमाकेदार उपस्थिति प्रत्यक्ष करता रहा। यह अनकहे शब्दों का कहना या मुखर होना है, जो कलात्मक दृष्टि से लघुकथा को श्रेष्ठ बनाने में बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। ये पंक्तियाँ देखें, जहाँ अनकहा मुखर होता है—‘‘वह किरच-किरच हो गया। अब वहाँ एक नहीं, अनेक चेहरे मेरा मुँह चिढ़ा रहे थे। कमाल यह था कि वह क्षत-विक्षत होकर भी बेहया-सा मुस्करा रहा था।’’ इस प्रकार की लघुकथाएँ प्रबुद्धों द्वारा विशेष रूप से सराही जाती हैं।

4. विराम-चिह्न—विराम-चिह्न मुख्यतः छह होते हैं जो वाक्य संरचना को शुद्ध ढंग से पाठकों तक हू-ब-हू भाव में सम्प्रेषित करते हैं। इनमें पूर्ण विराम-चिह्न (।) उपयोग में आता है, उसके बाद ‘अर्द्धविराम’ (;), ‘अल्प विराम’ (,), ‘उपविराम’ (:), ‘प्रश्नवाचक चिह्न’ (?) और विस्मयसूचक-चिह्न (!) — इन विराम-चिह्नों के अतिरिक्त लघुकथा में जिन चिह्नों का पर्याप्त मात्रा में उपयोग होता है, वे हैं डॉट-डॉट-डॉट (...), हाईफन (-), डैश (—), इनवर्टेड कोमा (‘’) आदि।

इन विराम-चिह्नों को निम्न उदाहरणों से भली-भाँति समझा जा सकता है। जहाँ वाक्य पूर्ण हो जाता है, वहाँ पूर्ण विराम (।) का चिह्न लगाया जाता है। जैसे—मैं पटना से मधुबनी जा रहा था। मैंने उसे बहुत समझाने का प्रयत्न किया किन्तु वह नहीं माना आदि।

अ(र्विराम चिह्न (;)—पूर्ण विराम से कम समय के ठहराव में अर्द्धविराम चिह्न का प्रयोग किया जाता है। यथा—परिश्रम आवश्यक है; इसी से सफलता मिलती है। आदि।

विरोधपूर्ण कथनों को पृथक् करने हेतु भी अर्द्धविराम चिह्न का प्रयोग किया जाता है। यथा—मनुष्य सोचता है कु्छ; और हो जाता है कुछ। आदि।

विभिन्न उपवाक्यों पर जोर देने हेतु भी अर्द्धविराम का चिह्न अनिवार्य है। यथा—

खूब मेहनत करो; परीक्षा निकट है।

आगे बढ़ते रहो; सपफलता इसी में है। आदि।

एक ही विषय से सम्बन्धित दो या अधिक उपवाक्यों को जोड़ने हेतु भी अर्द्धविराम का उपयोग अनिवार्य है। यथा—सूर्यास्त हुआ; शाम हुईऋ तारे उगे और चाँद हँस पड़ा।

जहाँ मुख्य वाक्य तथा उपमुख्य वाक्य का आपस में अधिक सम्बन्ध न हो; वहाँ अर्द्धविराम का उपयोग होता है। यथा—सुबह उठते ही टहलना है; स्नान करना है; भोजन बनाना है; बीस मिनट में ये सब नहीं हो सकता। आदि।

यदि दो से अधिक उपवाक्यों में एक ही कर्त्ता का प्रयोग हो तो अन्तिम वाक्य छोड़कर, प्रत्येक में अर्द्धविराम चिह्न का प्रयोग होता है। यथा—कभी वह हँसती है; कभी वह नाचती है; कभी वह रोती है; कभी वह मौन हो जाती है; कभी पत्थर पफेंकने लगती है। आदि।

अल्प विराम—अर्थ में सुबोधता तथा स्पष्टता लाने हेतु अल्प विराम का प्रयोग आवश्यक है। यथा—

मारो, मत जाने दो।

मारो मत, जाने दो। आदि।

यहाँ अल्प विराम से इतना बड़ा अर्थान्तर हुआ है।

दो से अधिक, समान महत्त्व वाले शब्द या वाक्यऋ जो और/तथा/एवं से जुड़ा हो, तो अन्तिम दो शब्दों या वाक्यों को छोड़कर अन्य सभी के पहले अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग होता है। यथा—

शब्द-विलगाव में—

छात्रा को परिश्रमी, कर्मठ, सुशील तथा ईमानदार होना चाहिए। दुकान में लाल, पीले, हरे, नीले और नारंगी कपड़े हैं। आदि।

वाक्य-विलगाव में—

तुलसीदास ने स्वान्तः सुखमय लिखा, केशव ने विद्वानों के लिए लिखा, रत्नाकर ने काव्यशास्त्रियों के लिए लिखा तथा कबीर ने मूलतः जनता के लिए लिखा। आदि।

संयुक्त तथा मिश्रित वाक्यों के उपवाक्यों को अलग करते हेतु अल्प विराम का प्रयोग होता है। यथा—

जब तक बिजली रही, मैं पढ़ता रहा।

राम अवश्य आता, पर उसके पास साधन नहीं थे। आदि।

आवृत्ति या शब्दों पर बल देने हेतु अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग होता है। यथा—हाँ, हाँ, वह अवश्य जाएगा। आदि।

पर, परन्तु, अतः, किन्तु, इसलिए, नहीं तो, और जिससे कि से प्रारम्भ होनेवाले उपवाक्यों से पहले अल्प विराम का प्रयोग होता है। यथा—

वह आता, पर वह बीमार हो गया।

वह आया, परन्तु खाली हाथ।

आज हड़ताल है, अतः दुकानें बन्द हैं।

वह घबराया, किन्तु बात समझ में आ गई।

वह लंगड़ा था, इसलिए समय पर नहीं पहुँच सका।

उसके हाथ बँधे थे, नहीं तो वह अवश्य लड़ता। आदि।

अव्ययों से प्रारम्भ होनेवाले वाक्यों में—

हाँ, वह कर्मठ था।

नहीं, मैं नहीं जाऊँगा।

बस, अब अधिक नहीं खाउफँगा।

अब, माथा पकड़ने से क्या लाभ।

तो, उसने शादी कर ही ली। आदि।

वस्तुतः, कर्त्ता का अर्थ करनेवाला होता है।

सम्बोधन को शेष वाक्यों से अलग करने हेतु कभी-कभी अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग हो जाता है। यथा—भाइयो, यह राजतन्त्रा नहीं, प्रजातन्त्रा है। आदि।

वाक्य में उद्धरण-चिह्न से पूर्व अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग होता है। यथा—श्याम ने कहा, ‘‘मैं कल अवश्य आऊँगा।’’ आदि।

एक ही पंक्ति में नाम, ग्राम आदि पता लिखने पर उनमें से प्रत्येक के बाद अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग होता है। यथा—दिशा प्रकाशन, त्रिनगर, दिल्ली-110 035। आदि।

मुख्य बातें—

1. सबसे कम देर के ठहराव में अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग होता है।

2. विराम-चिह्नों में सर्वाधिक प्रयोग अल्प विराम का ही होता है।

3. अर्थ के स्पष्टता को ध्यान में रखकर अल्प विराम-चिह्न का प्रयोग अनिवार्य है।

उपविराम—हाईफन यानी रेखिका से कुछ अधिक ठहराव में इस चिह्न का प्रयोग होता है। जैसे—

गांधीजी के बारे में कुछ विचार इस प्रकार हैं—

हिन्दी में तीन शैलियाँ प्रचलित हैं—हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी। आदि।

मुख्य शीर्षक के अन्तर्गत छोटे-छोटे शीर्षकों के बाद उप विराम-चिह्न का प्रयोग होता है। यथा—

भाषा के विविध रूप हैं :

सीमित भाषा :

कामचलाऊ भाषा :

परिनिष्ठ भाषा : आदि।

किसी महत्त्वपूर्ण विषय या कार्य पर विशेष बल देने हेतु इस चिह्न का प्रयोग होता है। यथा—

फणीश्वरनाथ रेणु : कर्तव्य और कृतियाँ

हिन्दी के शोधग्रन्थ : प्रक्रिया और परम्परा

आजकल रेखिका के स्थान पर भी उप विराम का प्रयोग चल पड़ा है। यथा—

अध्यापक : रिश्वत लेना अन्याय है। इसे दूसरे रूप में बताओ।

छात्रा : रिश्वत लेना एक अन्य आय है। आदि।

प्रश्नवाचक चिह्न—सामान्यतः प्रश्नसूचक शब्दों ;क्या, क्यों, कैसे, कौन, कहाँ, कबद्ध के प्रयोग से जब प्रश्न का भाव सूचित होता है, तब प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग होता है। यथा—

तुम कहाँ जा रहे हो?

तुम्हारे साथ कौन खड़ा है?

मोहन कैसे बीमार पड़ा?

तुम कब आओगे? आदि।

कभी-कभी प्रश्नवाचक शब्दों के अभाव में भी वाक् ध्वनि के चलते प्रश्नवाचकता आ जाती है। यथा—

तुम पटना जाओगे?

तुम पुस्तक नहीं खरीदोगे?

आप जा रहे हैं? आदि।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहीं-कहीं निषेधात्मक स्थिति हेतु प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग किया है। यथा—

आँखें खोले रहना भी कोई तुक की बात है?

देखा जाए तो सूरदास की साधना से उसका क्या सम्बन्ध था?

पर जामुन कौन अच्छा है? आदि।

द्विवेदीजी ने कहीं-कहीं बाहुल्यार्थ में प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग किया है। यथा—

पण्डितों से कौन लड़ता पिफरे...?

क्या कहने?

कितना सुन्दर वातावरण उपस्थित है?

कभी-कभी बल देने हेतु इस चिह्न का प्रयोग किया जाता है। यथा—

किस पाप-अभिसन्धि ने इस कुसुम-कलिका को तोड़ दिया था? आदि।

कभी-कभी ‘हाँ’ उत्तर पाने हेतु इस चिह्न का प्रयोग किया जाता है। ऐसी स्थिति में वाक्य के अन्त में ‘न’ का प्रयोग किया जाता है। यथा—

एक बीघा जमीन में बीस कट्ठा जमीन होती है न?

‘साहित्यिक’ तो साहित्य के सम्बन्ध को कहते हैं न? आदि।

कभी-कभी उपेक्षा के अर्थ में भी इस चिह्न का प्रयोग होता है। यथा—

धानुक टोली का तनुकलाल?

छुछुन्दर की तरह तो सूरत है, वह महन्थ होगा? आदि।

कभी-कभी आश्चर्य, विस्मय, विपत्ति के अर्थ में भी प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग होता है। यथा—

इस्स! एक हजार?

सुनते हैं, शुद्ध संस्कृत में बोल रहा है सक्षम।

सच?

विस्मयसूचक चिह्न—हर्ष, विषाद, आश्चर्य, करुणा, भय इत्यादि भावों को विस्मय कहते हैं। इन्हीं भावों के अर्थ-द्योतक में इस चिह्न का प्रयोग होता है।

इस चिह्न का प्रयोग विस्मयादिबोधक पदों, पदबन्धों का वाक्यों के अन्त में होता है। यथा—

शाबाश! तुमने कमाल कर दिया।

वाह! कितना सुन्दर दृश्य है।

कैसी भयंकर रात है! आदि।

सम्बोधन के लिए भी इस चिह्न का प्रयोग किया जाता है—

मित्रो! परोपकार, एक सामाजिक कार्य है।

बन्धुओ! एकता में ही शक्ति है। आदि।

कभी-कभी या वाधिक्य में इस चिह्न का प्रयोग होता है। यथा—

...महन्थ साहेब! महंथ साहेब सुनिए।

दमे से जर्जर शरीर में दम कहाँ! आदि।

कभी-कभी विपत्ति के अर्थ में भी इस चिह्न का प्रयोग होता है। यथा—

खबड्डा! माय बाप, हाय बाप! सपाक्।

इन छह विराम-चिह्नों के अतिरिक्त (...) का भी लघुकथा में भरपूर उपयोग होता है, यों तो इन डॉट-डॉट-डॉट का प्रयोग कहीं-न-कहीं प्रायः सभी लघुकथाकारों ने आवश्यकतानुसार अपनी किसी-न-किसी लघुकथा में अवश्य ही किया है, किन्तु सर्वाधिक उपयोग पारस दासोत एवं कमल चोपड़ा ने अपनी आरम्भिक लघुकथाओं में किया है। बाद की लघुकथाओं में भी उन्होंने इन डॉट-डॉट-डॉट का प्रयोग किया है किन्तु अपेक्षाकृत बहुत कम। इनके अतिरिक्त अन्य वरिष्ठ लघुकथाकारों के साथ-साथ नए लोगों ने भी इन डॉट-डॉट-डॉट का सटीक उपयोग अपनी लघुकथाओं में किया है। कमल चोपड़ा की ‘छोनू’ लघुकथा में यह वाक्य देखें—

‘‘मैं छिक्ख-छुक्ख नईं अूँ...मैं बीज-उफज नईं अूँ...मैं तो छोनू अूँ...।’’

वस्तुतः ये डॉट-डॉट-डॉट उन शब्दों/भावों के स्थान पर दिए जाते हैं जिससे पाठक पढ़ते हुए अनकहे शब्दों को मुखर रूप से पढ़-समझ लेता है।

एक अन्य उदाहरण महेश शर्मा की ‘डर’ लघुकथा में देखें—‘‘...दोपहर के भोजन के इन्तजार में कुर्सी पर उफँघते बाबूजी पर माँ झुँझलाती है, ‘‘इस कुर्सी पर रहम करो, खाना खाकर सीधे चारपाई ही तोड़ना...थोड़ा सबर कर लो...रोटियाँ सेंककर ला रही हूँ।’’ ...पिफर बिस्तर पर लेटी बहू के सामने से उसी तरह बड़बड़ाती हुई निकल जाती है कि, तंग आ गई हूँ...पेट है या कोठार... अभी दो घण्टे पहले ही तो डटकर नाश्ता किया था...।’’

वस्तुतः मैं कहना यह चाहता हूँ कि लघुकथा में और विशेष रूप से संवादों में डॉट-डॉट-डॉट का सटीक उपयोग संवादों में प्राण डाल देता है।

डॉट-डॉट-डॉट के अतिरिक्त रेखिका, यह चिह्न हाईफन से थोड़ा बड़ा होता है। इसे अंग्रेजी में ‘डैश’ कहते हैं। लघुकथाओं में भी समुचित अभिव्यक्ति हेतु इसका सही एवं सटीक उपयोग किया जाता है जो लघुकथा को श्रेष्ठ बनाने में कापफी सहायक होता है। इसका सही उपयोग कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने ‘इन्जीनियर की कोठी’ में अनेक स्थलों पर किया है। इस वाक्य में डैश (—) का सही उपयोग देखें—‘‘मैं सोच रहा था—तो हमारा वर्तमान ही नहीं हमारा भविष्य भी हमारी मुट्ठी में है—जीवन ही नहीं स्वर्ग भी। वस्तुतः डैश का उपयोग थोड़ा लम्बा पॉज देने हेतु किया जाता है। एक अन्य उदाहरण पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की लघुकथा ‘भगवान्’ के इस वाक्य में अवलोकित करें—‘‘आदमी ने दूसरा मकान तैयार किया—बिलकुल नए ढंग का।’’

इसी प्रकार एक चिह्न छोटी रेखिका यानी हाईपफन ;-द्ध होता है, जो विलुप्त विभक्ति का अर्थ मुखर करता है। जिसे डॉ. शकुन्तला किरण की लघुकथा ‘इमरजेन्सी’ के इस वाक्य में देखें—‘‘तो तू निपटा लेगी गाँव-गिरस्ती के झगड़े?’’ यहाँ गाँव-गिरस्ती के मध्य हाईपफन विलुप्त विभक्ति ‘और’ को मुखर करता है। एक वाक्य डॉ. रामकुमार घोटड़ की लघुकथा ‘ढलते वक्त’ से देखें—‘‘सेवा भाव व छोटे-मोटे काम की तुमसे तो आशा कर ही सकता हूँ।’’ यहाँ छोटे-मोटे के मध्य हाईपफन विलुप्त विभक्ति ‘और’ को मुखर करता है। इसके अतिरिक्त इसके असंख्य उदाहरण दिए जा सकते हैं, किन्तु लेख को अनावश्यक विस्तार देना मेरा उद्देश्य नहीं है।

सभी कथात्मक विधाओं में उद्धरण-चिह्न (Inverted Commas) का उपयोग प्रायः संवादों में किया जाता है या जहाँ कुछ विशेष शब्द या वाक्य को उद्धृत करना होता है, वहाँ इनका उपयोग किया जाता है। उदाहरणस्वरूप कल्पना भट्ट की लघुकथा ‘कठपुतली’ के निम्न संवादों को देखा जा सकता है—‘‘खुद को सँभाल पगली, अब सब-कुछ तुझे ही देखना और करना...तू एक पढ़ी-लिखी स्त्रा है...तू स्वयंसिद्धा है...तुझे इस भँवर से निकलना है...।’’

एक अन्य उदाहरण सीमा जैन की लघुकथा ‘दान’ का यह संवाद भी देखा जा सकता है, ‘‘अरे नहीं, काहे की मेहनत! मुफ्रत में बगीचे से ही तो लाए हैं। देना है तो दो, नहीं तो जाओ यहाँ से।’’ तात्पर्य यह है कि उद्धरण-चिह्न किसी के कथन के आरम्भ और अन्त में उपयोग किए जाते हैं। लघुकथा में इनकी बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

                                           शेष आगामी अंक में…………