Monday, 25 February 2019

कथाकार सुधा भार्गव की ओर से…1

कथाकार सुधा भार्गव की ओर से…
 
अविराम साहित्यिकी का अक्तूबर-दिसंबर 2018 का अंक पुराने अंकों के साथ रख रही थी कि एकाएक ध्यान आया पहले अंकों को भी जरा खँगाल लूँ—कहीं ये  अलमारी की शोभा बनकर न रह जाएँ । 2015 का अंक पकड़ में आते ही उसे खोला।  पृष्ठ 4-5 में चंद्रा सायता जी की लघुकथा‘अकेलापन‘ पर नजर पड़ते ही वह मेरे दिल में उतर गई।
आजकल की आपाधापी ज़िंदगी में हर कोई अकेलेपन का शिकार नजर आता है। बुजुर्ग तो बुजुर्ग बच्चे भी इसकी चपेट में हैं। चन्द्रा जी ने इस समस्या को बहुत खूबसूरती व दक्षता से अपनी लघुकथा में उभारा है। इसके बारे मेँ कुछ और कहूँ इससे पहले आप इसे पढ़ लीजिये ----

 अकेलापन / चंद्रा सायता

गुलाब के पौधे की दो टहनियों आपस में इस तरह उलझ गईं की एक पर खिले सफेद फूल दूसरी पर खिले गुलाबी फूल के बीच की दूरी नहीं के बराबर रह गई थी।
सौम्या आँगन में खड़ी अपने इकलौते बेटे अबीर को उन दोनों की ओर संकेत करती बोली,“देखो–देखो अबीर, दोनों कितने सुंदर लग रहे हैं, जैसे भाई-भाई हों ।”
अबीर ने  देखकर भी ऐसा जताया मानो वह देख नहीं रहा हो। माँ के कथन पर उसने किसी प्रकार की मौखिक प्रतिक्रिया भी व्यक्त नहीं की।
मोबाइल पर आ रहे कॉल को सुनने के लिए सौम्या वहाँ से हट गई। बात पूरी  करके वह पुन: उधर पलटी। देखा, कि दोनों में से एक, गुलाबी रंग का फूल, टहनी पर नहीं था! जमीन पर उसकी पत्तियाँ बिखरी पड़ी थीं!!
उसने देखा कि घर के अंदर जाने वाली सीढ़ियों पर अबीर चेहरे को दोनों हथेलियों के बीच थामे, कोहनियाँ घुटनों पर टिकाये उदास मुद्रा में बैठा है।
“यह हरकत तुमने की अबीर?” गुस्से से लाल होती सौम्या ने पूछा।
अबीर ने कोई जबाब नहीं दिया। जस का तस गुमसुम बैठा रहा।
“मैं तुमसे पूछ रही हूँ---।” वह पुन: चीखी।
“हाँ—हाँ—मैंने ही तोड़ा है उसे। जब मेरा कोई भाई नहीं है तो इसका क्यों हो?” उसकी नजर अब सफेद गुलाब की ओर थी और चेहरे पर तनाव।
“अरे भाभी आप यहाँ हो?” कहती हुई सौम्या की छोटी नन्द अपने तीन वर्षीय  बेटे अंकित को गोद में लिए आँगन तक पहुँच चुकी थी। सौम्या उसे अचानक आया देख ठगी—सी रह गई। कुछ पल बाद वह बोली, “अरे लवीला तुम कब आईं?… अरे, हमारा छोटा-सा गोलू गुलाबी ड्रेस में कितना प्यारा लग रहा है” अंकित के गाल चूमते हुए सौम्य बोली। मौके का फायदा उठाते हुए उसने अबीर की ओर देखते हुए कहा, “लो तुम्हारा छोटा भाई आ गया अबीर।”

संपर्क : चन्द्रा सायता, 19,श्रीनगर कॉलोनी (मेन), इंदौर-452018 (म॰प्र॰)
मोबाइल : ॰09329637679
 

अब मैं भी कुछ कह लेती हूँ।  

इस लघुकथा में माँ सौम्या  सफेद और गुलाबी फूलों की ओर इशारा करते कहती है--–“देखो-देखो अबीर, दोनों कित
ने सुंदर लग रहे हैं जैसे भाई-भाई हों।”
वह चुप रहा; पर माँ के जाते ही गुलाबी फूल को टहनी से तोड़ उसे तहस–नहस कर डाला। 
अबीर की यह क्रिया उसकी मानसिक अवस्था को दर्शाती है। वह अकेलेपन से घबरा गया था। उसे अपना एक भाई चाहिए था, जिसके साथ खेल सके–मन की बात कह सके। साथ–साथ जाए-आए। माँ के मुँह से भाई शब्द सुनते  ही उसको ठेस पहुँची । उसे अपना भाई न होने का अभाव खटकने लगा। उससे पैदा हुई खीझ व आक्रोश उसके व्यवहार में आ गया।
जमीन पर बिखरी पट्टियों को देख गुस्से से लाल सौम्या ने पूछा, “यह हरकत तुमने की अबीर।”
“हाँ—हाँ –मैंने ही तोड़ा है  उसे। जब मेरा कोई छोटा भाई नहीं है तो इसका क्यों हो?” उसकी नजर अब सफेद गुलाब की ओर थी और चेहरे पर तनाव।
अबीर के जबाब से स्पष्ट है कि अकेलेपन ने उसे कितना तोड़कर रख दिया था।अकेले ही अकेले घुट रहा था; इसी कारण वह मासूम असमय ही ईर्ष्या, बदले की भावना, क्रोध, तनाव का शिकार हो गया। ऐसे बच्चे अपने मनोभावों को शब्दों का जामा नहीं पहना पाते, केवल महसूस करते हैं।  खुद की लड़ाई अकेले ही लड़ते हैं। यदि माँ–बाप ने अपने बच्चे के असामान्य व्यवहार को ताड़ लिया और समय होते समाधान निकाल लिया तो उस बच्चे को बहुत भाग्यवान समझो।
चन्द्रा जी ने इसी यथार्थ की ओर इशारा करते हुए अपनी लघुकथा का अंत बहुत ही सुंदर ढंग से किया है।
“अरे भाभी आप यहाँ हो?” कहती हुई सौम्या की छोटी ननद अपने  तीन वर्षीय बेटे अंकित को गोद में लिए आंगन तक पहुँच चुकी थी। ---मौके का फायदा उठाते हुये उसने अबीर की ओर देखते हुए कहा, ”लो,तुम्हारा छोटा भाई आ गया अबीर।” अबीर की आँखें खुशी से चमक उठीं।
यह तो होना ही था क्योंकि वह अकेलेपन के अभिशाप से मुक्त हो चुका था।
यह संकेतात्मक लघुकथा अति सहजता से नई पीढ़ी के लिए बहुत कुछ कह गई है। हाँ, उस पीढ़ी के लिए, जो अपने कैरियर की चिंता से ग्रस्त केवल एक बच्चे के माँ-बाप बनने के पक्ष में है। एक बच्चा प्रोब्लम चाइल्ड बनकर रह जाता है। अपने लिए भी और अपने माँ-बाप के लिए भी।
 आशा है भविष्य में बालजगत व उनके मनोविज्ञान से संबन्धित लघुकथाएं और भी पढ़ने को मिलेंगी। 

सुधा भार्गव : 9731552847

Friday, 1 February 2019

तैरती है पत्तियाँ : कुछ प्रतिक्रियाएँ


ओमप्रकाश कश्यप
13 जनवरी 2019 को मैसेंजर पर
बलराम अग्रवाल के ‘तैरती हैं पत्तियाँ’ शीर्षक से आए लघुकथा संग्रह का पीला मुखपृष्ठ देखकर लगा कि कवर बनाने में चूक हुई है। पत्तियों का जिक्र है तो कवर को हरियाला होना चाहिए था। लेकिन पहली कहानी पढ़ते ही संशय दूर हो गया। जिन पत्तियों को मनस् में रखकर शीर्षक का गठन किया गया है, वे हरी न होकर अपना जीवन पूरा कर पीली हो, पेड़ से स्वतः छिटक गई पत्तियाँ हैं। छोटी-सी भूमिका में लेखक ने स्वयं कवित्वमय भाषा में इसका उल्लेख किया है। लेकिन भूमिका से गुजरकर पाठक जैसे ही पहली लघुकथा तक पहुँचता तो उसका रहा-सहा संशय भी गायब हो जाता है। संग्रह की पहली ही लघुकथा ‘समंदर: एक प्रेमकथा’ अद्भुत है। इस लघुकथा में भरपूर जीवन जी चुकी एक दादी है। साथ में है उसकी पोती। दोनों के बीच संवाद है। भरपूर जीवन अनेक लोगों के लिए पहेलीनुमा हो सकता है, लेकिन इस लघुकथा को पढ़ेंगे तो इस पहेली का अर्थ भी समझ में आएगा और पीली हो चुकी पत्तियों के प्लावन का रहस्य भी। यह वह अवस्था है जब आदमी उम्रदराज होकर भी बूढ़ा नहीं होता, पत्तियाँ पीली होने, डाल से छूट जाने के बाद भी मिट्टी में नहीं मिलतीं, उनमें उल्लास बना रहता है। इस कारण वे जलप्रवाह में प्लावन करती नजर आती हैं। प्लेटो ने इसे जीवन की दार्शनिक अवस्था कहा है। अध्यात्मवादी इसके दूसरे अर्थ भी निकाल सकते हैं, लेकिन मैं बस इतना कहूँगा कि ‘समंदर: एक प्रेमकथा’ अनुभवसिद्ध कथा है। अभी संग्रह को पूरा नहीं पढ़ा है। शुरुआत से मात्र पंद्रह-सोलह लघुकथाएँ ही पढ़ी हैं। इतनी कहानियों में ‘अपने-अपने आग्रह’, ‘अजंता में एक दिन’, ‘उजालों का मालिक’, ‘इमरान’, ‘अपने-अपने मुहाने’, ‘अपूर्णता का त्रास’ अविस्मरणीय लघुकथाएँ हैं। इतनी प्रभावी कि इनका असर कम न हो, इसलिए बाकी को छोड़ देना पड़ा। ‘अपने-अपने मुहाने’, ‘अपूर्णता का त्रास’, ‘उजालों का मालिक’ में कहानीपन के साथ-साथ प्रतीकात्मक भी है, वही इन्हें बेजोड़ बनाती है। प्रतीकात्मकता के बल पर ही किसी एक पात्र का सच पूरे समाज का सच नजर आने लगा है। प्रतीकात्मकता की जरूरत व्यंग्य में भी पड़ती है। मगर इन दिनों वह प्रतीकात्मकता से कटा है। इसलिए वह अवसान की ओर अग्रसर भी है। बलराम अग्रवाल वरिष्ठ लघुकथाकार हैं। लघुकथा को समर्पित। यूँ तो बच्चों के नाटक और बड़ों के लिए कहानियाँ भी लिखी हैं, लेकिन इन दिनों वे लघुकथा-एक्टीविस्ट की तरह काम कर रहे हैं। अपनी विधा के प्रति ऐसा समर्पण विरलों में ही देखा जाता है.... जैसा कि ऊपर बताया गया है, पुस्तक की अभी कुछ ही लघुकथाएँ पढ़ी हैं। जैसे-जैसे पुस्तक आगे पढ़ी जाएगी, यह टिप्पणी भी विस्तार लेती जाएगी।

राजेश आहूजा  
31 जनवरी 2019 को मैसेंजर पर
पुस्तक मेले में तैरती हैं पत्तियाँ बलराम अग्रवाल जी के सामने ही ख़रीदी लेकिन न तो इनके साथ चित्र खिंचवाया और न ही पुस्तक पर हस्ताक्षर लिए। चलिए कोई बात नहीं, आशा करता हूँ भविष्य में भेंट होती रहेगी।
पुस्तकें कम ही ख़रीदता हूँ। कारण यह कि अधिकतर को पढ़ने के बाद अफ़सोस होता है कि क्यों ख़रीदी। इस पुस्तक को देख कर कुछ निराशा ज़रूर हुई कि पूरा कवर पीला क्यों बना दिया। लेकिन जब पढ़ना शुरू किया तो अहसास हुआ कि कवर भले ही केवल पीला है लेकिन अंदर तरह-तरह के रंग बिखरे हुए हैं। फ़ेसबुक पर बलराम जी द्वार पोस्ट की गई ओमप्रकाश जी की प्रतिक्रिया को पढ़ रहा था तो उसमें पीले कवर की बात आई और मुझे लगा कि अब रहस्योद्घाटन होने लगा है। मैंने तुरंत उस प्रतिक्रिया को पढ़ना बंद कर दिया।
किताब अगर कहानियों, कविताओं या लघुकथाओं की हो तो मैं उसे शुरूआत से पढ़ना प्रारंभ नहीं करता। कभी कोई पन्ना खोल लेता हूँ, कभी कोई। पत्तियों को मैंने अंत से पढ़ना शुरू किया। अब तक बीस से अधिक लघुकथाएँ पढ़ी हैं और उन्हें खरा पाया है। उम्मीद तो यही है कि अंत तक, या यूँ कहिए की शुरूआत तक सभी लघुकथाएँ इसी स्तर की होंगी। यानी यह पुस्तक मुझे बलराम जी की दूसरी पुस्तक ख़रीदने पर विवश कर देगी। लेकिन दूसरी तभी ख़रीदूँगा जब वे सामने होंगे ताकि उसके पहले पन्ने पर अपने लिए कुछ लिखवा सकूँ।


सुधा भार्गव 
31 जनवरी 2019 को अपनी फेसबुक वॉल पर
मित्रो, बलराम अग्रवाल जी का नया लघुकथा संग्रह है—'तैरती हैं पत्तियाँ’। इन दिनों यह चर्चा में है। जैसे-जैसे इसकी रचनाओं के बारे में सुनती या पढ़ती इस संग्रह को पढ़ने की लालसा बलवती होती गई। बलराम भाई जी ने अंतत: मुझे भी इसे उपलब्ध करा ही दिया। इसके लिए मैं उनकी आभारी हूँ।
संग्रह की भूमिका सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखी है। उनकी इस बात से मैं शत-प्रतिशत सहमत हूँ कि इस संग्रह की लघुकथाएँ जीवन को आधुनिक व्यापक दृष्टि से देखने वाले कथाकार की रचनाएँ हैं। इन पत्तियों को पढ़कर हम कहानी नहीं, जीवन पढ़ते हैं।  बलराम जी ने भी अपने मन की बात इस संग्रह में बड़ी बेबाकी से लिखी है, “आने वाले समय में कहानी ‘कहानीपरक लघुकथा’ की तरफ खिंच जाएगी। ‘कहानी’ आकार बढ़ाने के लिए रेत-सा बिखरना छोड़ देगी और ‘लघुकथा’ आकार को संकुचित रखने की शास्त्रीय शर्तों से विद्रोह कर देगी।”
थोड़ी-बहुत मैं भी कहानियाँ लिखती रहती हूँ। मैंने अनुभव किया है कि समय की रफ्तार और समकालीन परिस्थितियों के कारण बड़ा कथानक, लंबे-लंबे संवाद और पात्रों की भीड़ देखकर पाठक जल्दी-जल्दी पृष्ठ पलटते हुए अंत जानने की कोशिश में रहता है। धैर्य से खुद को कहानी से जोड़ने में वह अपने को असमर्थ पाता है। इसलिए कहानी के फैलाव को रोकना ही होगा। ऐसा मेरा भी सोचना है।
लघुकथा संग्रह मिलते ही मैंने पढ़ना तो शुरू कर दिया; पर पहली लघुकथा पर ही अटककर रह गई हूँ। वह है ही ऐसी! पहले आप भी उसे पढ़ लीजिये फिर मैंने उस पर जो कहा है, वह पढ़िए—
समंदर : एक प्रेमकथा
“उधर से तेरे दादा निकलते थे और इधर से मैं… ”
दादी ने सुनाना शुरू किया। किशोर पौत्री आँखें फाड़कर उनकी ओर देखती रही…… एकदम निश्चल; गोया कहानी सुनने की बजाय कोई फिल्म देख रही हो।
“लंबे कदम बढ़ाते, करीब-करीब भागते-से, हम एक-दूसरे की ओर बढ़ते… बड़ा रोमांच होता था।”
यों कहकर एक पल को वह चुप हो गयीं और आँखें बंद करके बैठ गयीं।
बच्ची ने पूछा—“फिर?”
“फिर क्या! बीच में समंदर होता था—गहरा और काला…।”
“समंदर!”
“हाँ… दिल ठाठें मारता था न, उसी को कह रही हूँ।”
“दिल था, तो गहरा और काला क्यों?”
“चोर रहता था न दिल में… घरवालों से छिपकर निकलते थे!”
“ओ…s…आप भी?”
“…और तेरे दादा भी।”
“फिर?”
“फिर, इधर से मैं समंदर को पीना शुरू करती थी, उधर से तेरे दादा…! सारा समंदर सोख जाते थे हम और एक जगह जा मिलते थे।”
“सारा समंदर!! कैसे?”
“कैसे क्या…s…जवान थे भई, एक क्या सात समंदर पी सकते थे!”
“मतलब क्या हुआ इसका?”
“हर बात मैं ही बतलाऊँ! तुम भी तो दिमाग के घोड़ों को दौड़ाओ कुछ।” दादी ने हल्की-सी चपत उसके सिर पर लगाई और हँस दी।

अब मुझे भी कहना है कुछ…
प्रेम शिखा हमेशा प्रज़्जलित रहती है चाहे वह अतीत हो या वर्तमान। भविष्य में भी इसकी कड़ियाँ जुड़ी रहेगी इसका अहसास जब शिराओं में स्पंदित होता है तो अंग-अंग उजाले से भर उठता है। और प्रेम… दुगुन वेग से महकने लगता है। तभी तो दादी मुग्धा की तरह पोती के सामने अपना दिल खोल बैठी- “लंबे कदम बढ़ाते, करीब भागते-से, हम एक दूसरे की ओर बढ़ते—बड़ा रोमांच होता था।… बीच में समंदर होता था—गहरा और काला…। …इधर से मैं समंदर को पीना शुरू करती थी, उधर से तेरे दादा…! सारा समंदर सोख जाते थे हम और एक जगह जा मिलते थे।”
‘समंदर’ शब्द में भी कितना गूढ रहस्य छिपा है। यह समंदर नदियों के विलयन वाला नील समंदर नहीं, बल्कि प्रेमियों के बीच लहराता गहरा काला दिल । काला दिल ! चौंकाने वाली बात ! इससे पर्दा उठाते हुए दादी की जुबान से ही सुनिए—“चोर रहता था न दिल में… घरवालों से छिपकर निकलते थे।”
बहुत ही खूबसूरती से काले दिल को परिभाषित किया है। अति मर्यादित रूप में युवावस्था के प्रेम की असीम शक्ति को उजागर करते उसे एक ही वाक्य में सांकेतिक भाषा में पिरो दिया गया है जब बच्ची ने आश्चर्य से पूछा—“सारा समंदर !! कैसे?”
“जवान थे भई, एक क्या सात समंदर पी सकते थे।”
इसका मतलब पूछने पर दादी सुनहरे अतीत की घाटियों में अवश्य प्रेम, प्रणय और समर्पण की स्निग्ध बौछारों में भीग गई होगी। तभी तो उससे केवल इतना कहते बना—“तुम भी तो दिमाग के घोड़ों को दौड़ाओ कुछ।”
अपने कथ्य, भाषा, गठन और संप्रेषण की दृष्टि से प्रेमकथाओं में यह एक श्रेष्ठ लघुकथा है। इसमें निहित गूढ़ संवादों ने इसका कद बहुत ऊँचा कर दिया है। बलराम जी ने एक-एक शब्द का सावधानी से चयन कर लघुकथा की दीवार पर सुंदरता से उन्हें टंकित किया है। न कहीं अनर्गल अलाप न अनावश्यक विस्तार। लघुकथा के अंतिम छोर पर पहुँचते-पहुँचते तो लगा—इर्द-गिर्द प्यार भरी फूल की पत्तियाँ झरझरा कर झर रही हैं।

सुभाष नीरव
04 फरवरी 2019  को अपनी फेसबुक वॉल पर

मित्र बलराम अग्रवाल का सद्य प्रकाशित लघुकथा संग्रह ' तैरती हैं पत्तियाँ ' कल देर रात तक पढ़ता रहा। मैं तो कहीं भी नहीं खड़ा हूं। मैंने तो इसके पासंग भर भी नहीं लिखा। यार बलराम, मुझे तुमसे ईर्ष्या हो रही है, इस संग्रह की एक एक लघुकथा तुम्हारी सोच और रचनात्मकता की गवाही तो भर ही रही है, बल्कि लघुकथा में प्रभाव की अन्विति क्या होती है, ये लघुकथाएं उसका उदाहरण हैं।
बधाई तुम्हें ! 

संंध्या  तिवारी
अपनी फेसबुक वॉल पर 08-02-2019 को

आदरणीय डॉ बलराम अग्रवाल सर के सौजन्य से मुझे उनका लघुकथा संग्रह 'तैरती हैं पत्तियाँ ' दिनांक 05/02/19 को प्राप्त हुआ, समयाभाव के चलते मैं इसकी कुछ ही लघुकथाएं अभी पढ़ पाई हूँ परंतु 'इन पत्तियों में जीवन है' आदरणीय 'विश्वनाथ त्रिपाठी जी' एवं 'ये पत्तियाँ ' 'डॉ बलराम अग्रवाल जी' के द्वारा लिखे आमुख मैंने सबसे पहले पढ़े। और इन दोनों महानुभावों की बातों से मैं काफी हद तक इत्तेफाक रखती हूँ। 

अब बात करते हैं किताब के आवरण की, किताब का पीला आवरण और पीली कत्थई पत्तियाँ यूं तो पतझड़ तथा जर्जरता का एहसास कराती हैं परन्तु रंगो का अपना विज्ञान है और उसमें पीला रंग आशा विश्वास का प्रतीक हैं तथा ये टूटी हवा में तैरती पत्तियाँ मानो - "हवा पे रखे सूखे पत्ते, पांव ज़मी पर रखते ही उड़ लेते हैं दोबारा" वाली बात कहती ज्यादा प्रतीत होती हैं। 
बलराम अग्रवाल सर ने अपनी भूमिका में खुद ही कहा है कि उनकी कुछेक लघुकथाएं कहानी के कलेवर में लिपटी हुई हैं और मैं भी उनकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ। 
  1. "तैरती हैं पत्तियाँ" लघुकथा संग्रह की अभी मैंने जितनी लघुकथाएं पढ़ीं हैं उन को देखते हुए मैं कहना चाहती हूं कि अभी तक संग्रह की एक भी कथा अभिधात्मक शैली की नहीं मिली। लक्षणा और व्यंजना से पूरित कोमलकांत पदावली सी लघुकथाएं अन्तस्थल में ऐसे धस जातीं हैं जैसे सीमेंटेड दीवार में ड्रिल मशीन। 
अभी के लिए बस इतना ही कहना चाहूंगी कि ये कथायें जैसे स्वतःस्फूर्त होकर नया आसमान खोज रही हों लेकिन यह तो समय पर छोड़ना ही पड़ेगा कि कितनी सफलता मिली।
 s

वरिष्ठ साहित्यकार, पूर्व संपादक 'गगनांचल' और वर्तमान संपादक/प्रकाशक 'समहुत' बड़े भाई अमरेन्द्र मिश्र की नजर में 'तैरती हैं पत्तियाँ' ।
15 मार्च 2019  को अपनी फेसबुक वॉल पर 

लघुकथा की कथा
----------------------
हिंदी कथा-साहित्य में जब कभी किसी विधा ने आंदोलन का रूप लिया है तो उसने महज़ महत्वाकांक्षा की पूर्ति और स्वकेंद्रित प्रचार-प्रसार और आत्ममुग्धता के अलावा रचे जा रहे साहित्य के लिए कोई सार्थक योगदान नहीं दिया है। हिंदी भाषा स्वयं भी किसी आंदोलन की उपज नहीं है।यह देश-विदेश में जहां-जहां भी पहुंची है वह आपसी प्यार और सद्भाव के द्वारा ही पहुंची है। लेकिन हिंदी में लिखने वाले विभिन्न गुटों में बंटकर बेमतलब का वाद-प्रतिवाद करते रहे जिससे साहित्य का तो कोई भला नहीं हुआ,उनका कुछ भला हुआ या नहीं यह तो उनका लेखन ही बता सकता है। साहित्य में कथा और लघुकथा का वर्चस्व बस इतना सा है कि वह हिंदी के पाठकों तक सहज-सुलभ रूप में पहुंचती रहे और इस तरह सृजन कार्य चलता रहे।यह सहजता स्वाभाविक रूप से सृजेता के लेखकीय व्यक्तित्व को भी प्रतिबिंबित करे तो रचना और अधिक उम्दा बनती है। हिंदी कथा-साहित्य में लघुकथा एक विशिष्ट विधा है और यह विधा,सच पूछिए तो एक कलात्मक शिल्प की मांग करती है।
लघुकथा,जो पाठक को अपने मूल कथानक से कहीं भटकाये नहीं.. एक छोटी सी कहानी में वह सबकुछ आ जाये जिसे शुरू में लेकर कथाकार चला था।यह अपने मूल थीम से शुरू होकर एक ऐसे निष्कर्ष पर छोड़ जाये जो पाठक को अपील करे।इस रूप में लघुकथा लेखन एक कठिन रचना कर्म है जिसमें रचनात्मक अनुशासन अपरिहार्य होता है। एक समय जब हम प्रेमचंद शताब्दी वर्ष मना रहे थे,तब एक पत्रिका की तैयारी के सिलसिले में मैंने अमृत राय जी से एक साक्षात्कार के दौरान पूछा था कि-"आप प्रेमचंद के रचनाकार के किस रूप को अधिक पसंद करते हैं ?"बिना पलक झपकाये अमृत राय ने तपाक से जवाब दिया-"मैं प्रेमचंद के कहानीकार रूप को श्रेष्ठ मानता हूं।छोटी कहानियों के प्रणेता के रूप में प्रेमचंद श्रेष्ठ हैं।"
बलराम अग्रवाल का लघुकथा संग्रह 'तैरती हैं पत्तियां'कुल एक सौ तीन लघु कथाओं का संग्रह है और इस किताब की सभी लघुकथाएं मैंने देख ली हैं... बलराम का लेखन पिछले चालीस वर्षों से निरंतर चलता रहा है और परिमार्जित होता रहा है। उनके सीधे सादे अंतर्मुखी व्यक्तित्व की झलक उनकी कहानियों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।उन कहानियों के पात्र भी कुछ वैसे ही होते हैं... घटनाएं और कथा की अन्विति भी। बलराम लघुकथा के सुपरिचित लेखक हैं जिसके प्रमाण के लिए किसी 'बडे़ साहित्यकार या आलोचक' की संस्तुति या प्रशंसा की कोई जरूरत नहीं। क्योंकि रचनाकार की रचना ही उसे चर्चित-अचर्चित बनाती है।इस प्रकरण में बलराम की 'उजालों का मालिक', 'इमरान', 'गांव अभी भी', 'अपने-अपने मुहाने', 'अजंता में एक दिन', 'आदाब', 'समंदर: एक प्रेमकथा', 'रेगिस्तान', 'अपने-अपने सुकून' जैसी कहानियां ली जा सकती हैं और ऐसा शायद इसलिए भी है क्योंकि बलराम उन वरिष्ठ लेखक की उस अमूल्य सलाह को हमेशा याद रखते हैं जिन्होंने एक बार उनसे कहा था-
"साहित्य के क्षेत्र में किसी प्रकार का दावा करने से बचा करो।"
और संभवतः शायद इसलिए भी बलराम अग्रवाल बिलकुल शांत मन से लिखते हुए अपनी एक ख़ास पहचान बना चुके हैं। और यही कारण है कि उनका रचनाकार किसी पब्लिसिटी,महत्वाकांक्षा और बड़बोलेपन का शिकार नहीं। इन्हीं कुछ विशेषताओं की वज़ह से उन्होंने ख़ुद को बचाये रखा है।
'तैरती हैं पत्तियां' शीर्षक से कोई कहानी इस संग्रह में नहीं है। इसका शीर्षक अगर 'तैरती पत्तियां' भी होता तब भी अच्छा ही लगता।
यह संग्रह लघुकथा रचने वाले लेखकों को जरूर पढ़ना चाहिए-खासतौर पर उन लघुकथाकारों को जो लिखना तो ठीक शुरू करते हैं लेकिन निष्कर्ष पर भटक जाते हैं !
---------------------------------------------------------------------------------------
'तैरती हैं पत्तियां', बलराम अग्रवाल, अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली-32,पृ.160, दिल्ली-32
---------------------------------------------------------------------------------------

Thursday, 31 January 2019

लघुकथा : मैदान से वितान की ओर-21

इस धारावाहिक प्रस्तुति की अंतिम कड़ी

[रमेश जैन के साथ मिलकर भगीरथ ने 1974 में एक लघुकथा संकलन संपादित किया था—‘गुफाओं से मैदान की ओर’, जिसका आज ऐतिहासिक महत्व है। तब से अब तक, लगभग 45 वर्ष की अवधि में लिखी-छपी हजारों हिन्दी लघुकथाओं में से उन्होंने 100+ लघुकथाएँ  चुनी, जिन्हें मेरे अनुरोध पर उपलब्ध कराया है। उनके इस चुनाव को मैं अपनी ओर से फिलहाल ‘लघुकथा : मैदान से वितान की ओर’ नाम दे रहा हूँ और वरिष्ठ या कनिष्ठ के आग्रह से अलग, इन्हें लेखकों के नाम को अकारादि क्रम में रखकर प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसकी प्रथम  11 किश्तों का प्रकाशन क्रमश: 17 नवम्वर 2018, 24 नवम्बर 2018, 1 दिसम्बर 2018,  4 दिसम्बर 2018, 8 दिसम्बर 2018, 12 दिसम्बर 2018, 15 दिसम्बर 2018, 17 दिसम्बर 2018, 20 दिसम्बर 2018, 24 दिसम्बर 2018, 27 दिसम्बर 2018, 30 दिसम्बर 2018, 2 जनवरी, 2019, 6 जनवरी 2019, 12 जनवरी 2019, 16 जनवरी 2019, 19 जनवरी 2019, 22 जनवरी 2019, 26 जनवरी 2019 तथा 29 जनवरी 2019 को  ‘जनगाथा’ ब्लाग पर ही किया जा चुका है। यह इसकी इक्कीसवीं किश्त है। 
            टिप्पणी बॉक्स में कृपया ‘पहले भी पढ़ रखी है’ जैसा अभिजात्य वाक्य न लिखें, क्योंकि इन सभी लघुकथाओं का चुनाव पूर्व-प्रकाशित संग्रहों/संकलनों/विशेषांकों/सामान्य अंकों से ही किया गया है। इन  लघुकथाओं पर आपकी  बेबाक टिप्पणियों और सुझावों का इंतजार रहेगा।  साथ ही, किसी भी समय यदि आपको लगे कि अमुक लघुकथा को भी इस संग्रह में चुना जाना चाहिए था, तो यूनिकोड में टाइप की हुई उसकी प्रति आप  भगीरथ जी के अथवा मेरे संदेश बॉक्स में भेज सकते हैं। उस पर विचार अवश्य किया जाएगा—बलराम अग्रवाल]
धारावाहिक प्रकाशन की  इक्कीसवीं कड़ी में शामिल लघुकथाकारों के नाम और उनकी लघुकथा का शीर्षक…
101  सूर्यकांत नागर—फल
102  हरनाम शर्मा—अब नाहीं
103  हरिशंकर परसाई—जाति
104  हसन जमाल—प्रत्याक्रमण
   105  हेमंत राणा—दो टिकट

101
  
सूर्यकान्त नागर
 
फल
“अम्माजी ने सुबह से कुछ नहीं खाया है, इन्हें भी कुछ दो।” लम्बी यात्रा के सहयात्री के नाते मैंने अपनी चिन्ता व्यक्त की।
“माँ सफर में अन्न ग्रहण नहीं करती,” बेटे ने बताया।
“कुछ फल-वल ही खरीद दो।” मैंने सुझाया। पता नहीं, बेटे ने सुना भी या नहीं, अथवा सुनकर भी अनसुना कर दिया। अगले स्टेशन पर ट्रेन रुकी तो अम्मा का नन्हा पोता अंगूरवाले को देख अंगूरों के लिए मचल उठा। हारकर पिता ने बेटे की इच्छा पूरी कर दी।
“बेटे, कुछ अंगूर दादी को भी दो।” पिता ने कहा, लेकिन लाडला इसके लिए तैयार नहीं हुआ। माँ-बाप ने डाँटा भी, मगर उस डाँट में प्यार इस तरह लिपटा था कि नन्हे पर कोई असर नहीं हुआ।
कुछ देर बाद “दस के तीन”, “दस के तीन” कहता हुआ सन्तरे बेचने वाला आया तो मुझसे फिर रहा न गया, “अम्माजी के लिए सन्तरे ही खरीद लो।” मैंने अपनी ओर से खरीदने की पहल इसलिए नहीं की कि अपमान मानकर पिता यह न कह बैठे—हमें भिखारी समझ रखा है क्या? बेटे ने कुछ देर विचार किया, फिर माँ से कहा, “अम्मा, जरा दस रुपए देना, मेरे पास छुट्टा नहीं है।”
“अम्मा ने कहा, “रहने दे बेटा, ऐसा भी क्या जरूरी है।”
बेटे ने जिद की तो अम्मा ने गाँठ से निकाल दस का नोट बेटे के हाथ पर धर दिया, लेकिन इस बार भी नन्हे ने सन्तरे की थैली झपट ली, बोला, “मैं किछी को छन्तरे नई दूँगा। अकेले खाऊँगा।”
बाप ने जोर-जबरदस्ती की तो नन्हा जोर-जोर से रोने लगा, हाथ-पैर पटकने लगा। छीना-झपटी में उसने पापा का मुँह भी नोच लिया। दादी अम्मा ने कहा, “रहने दे बेटा! नन्हा खा लेगा तो समझूँगी, मैंने खा लिया।”
नन्हे का पेट भर गया तो एक सन्तरा पापा की ओर बढ़ाते हुए कहा, “पापा, ये तुम खा लो।”
“दादी को दो बेटा!” पापा ने समझाना चाहा, पर नन्हा राजी नहीं हुआ। दादी निरीह भाव से यह सब देख रही थी। आखिर उसने कहा, “आज दे रहा है तो खा ले बेटा, पता नहीं, कल कैसा फल मिले।”

102
 
हरनाम शर्मा 

अब नाहीं
“भगवन कसम मनै नेम है साहब इब मैं यो काम कत्तई नीं करता. कुछ नीं करता. बस कपड़ों पे प्रेस कर गुजर करूँ.”                
“.....” नए दरोगा की आँखें संवादहीन न थीं.
“माई-बाप कदी वर्दी प्रेस करवानी हो तो लेता आऊँगा बस यों ही काम आ सकूँ इब तो मैं.”
“हरामजादे,झूठ तुम्हारे खून में समाया रहेगा जन्मभर .तेरा रिकोर्ड बोल रहा है साले तू अफीम चरस गांजा सारी चीजें बेचता है. मुझे आज इस थाने में पन्दरवां  दिन  हो गया एक बार भी नहीं आया!”
“साहब जब धन्धा छोड़ दिया तो के करूँ आ कै .जब कमाई थी तो थाने की चौथ न्यारी सबसे पहले जावै  थी आपैई. थाने नै मेरे से कोई शिकायत नीं थी. इब बताओ...”
“हाँ-हाँ बताऊंगा। भूतनी के, अपना धन्धा छोडकर हमारा धन्धा चौपट करवा दो। जरा बताइयो, मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है। तेरा धन्धा तब ही बंद हुआ, जब मैं इस थाने में आया। साले तुम लातों के भूत बातों से नहीं मानते। एकाध बार कचैहरी के चक्कर कटवा दूँगा तो सारा धन्धा ख़ूब चल पडेगा, बोल ससुरे... ”                      
“के करूँ साहब, बात यों नहीं है।”
“और क्या है कल से कोई बात नहीं सुनूँगा। चौथ थाने में पहुँच जानी चाहिए हफ्ते बाद समझे धन्धा चालू करो या मरो।”      
“साहब साठ से ऊपर हो गया पोरस थक गे अब नहीं होगा।”
“अरे ससुरे बूढ़े,  भोतई कर्मठोक है तू तो। अरे भई, तेरी कोई औलाद तो होगी।”
“जी, छोरी थी; ब्याह दी।”
“और घरवाली।” बुढिया को इंगित कर नए साहब ने पूछा।                                   
“ना जी, यो तो निरी गऊ है जी। इसने कदी भी मेरे धंधे में साथ नहीं दिया।”
“बस देख लो; और मैं कुछ नहीं सुनना चाहता।  हमें भी आखिर कुछ चाहिए पिछले कागजों का पेटा भरने के लिए। कुछ धन्धा करो, म्हारा भी कुछ हो। समझे!”  आँखें तरेरकर दरोगा गुर्राया। बूढ़े के इंकार करने से पूर्व ही डंडा तन चुका था, मगर जर्जर हाथों ने उस डंडे को हवा में ही थाम लिया।  

103
 
हरिशंकर परसाईं
 
जाति          
कारखाना खुला। कर्मचारियों के लिए बस्ती बन गई। ठाकुरपुरा से ठाकुर साहब और ब्राह्मणपुरा से पण्डितजी  कारखाने में काम करने लगे और पास-पास के ब्लॉक में रहने लगे। ठाकुर साहब का लड़का और पण्डितजी की लड़की दोनों जवान थे। उनमें पहचान हुई, पहचान इतनी बढ़ी कि वे शादी करने को तैयार हो गए। 
जब प्रस्ताव उठा, तो पण्डितजी ने कहा, “ऐसा कभी हो सकता है… ब्राह्मण की लडकी ठाकुर से शादी करे। जाति चली जाएगी।’’
ठाकुर साहब ने कहा कि ऐसा हो नहीं सकता परजाति में शादी कारण से हमारी जाति चली जाएगी।
किसी ने उन्हें समझाया कि लड़के–लडकी बड़े हैं, पढ़े–लिखे हैं, समझदार है। उन्हें शादी कर लेने दो। अगर उनकी शादी नहीं हुई तो भी वे चोरी-छिपे मिलेंगे; और तब जो उनका सम्बन्ध होगा वह तो व्यभिचार कहा जाएगा।
इस पर ठाकुर साहब और पण्डितजी ने कहा, “होने दो।  व्यभिचार से जाति नहीं जाती है। शादी से जाती है।

104

हसन जमाल

प्रत्याक्रमण
आक्रमण बलात्कार के लिए ही था।
युवती आक्रमणकारी के चंगुर में असहाय पक्षी की तरह फड़फड़ा रही थी। निजता का रास्ता न था। आक्रमणकारी दाँत भींचकर आँखों की पुतलियों को असामान्य ढंग से बाहर निकालकर नई देखी हुई फिल्म के अनुसार युवती के काबू में न आ सकने वाले चंचल हाथ-पैरों के बाँधने की ताबड़-तोड़ कोशिश कर रहा था। इस कोशिश में उसका सारा शरीर पसीने में नहा गया। बुरी तरह हाँफने लगा था वह। उसकी लस्त-पस्त देख युवती ने पहली बार प्रतिरोध को रोका। हाथ-पैर ढीले छोड़ दिए। एक हल्की-सी मुस्कान के साथ उसने निहायत मुलायम आवाज में आक्रमणकारी को सम्बोधित किया, ‘‘क्या सारा बल तुम इसी काम में लगा दोगे?’’
         स्विच बंद करते ही मशीन जिस तरह स्थिर हो जाती है, आक्रमणकारी जड़वत् हो गया। एक सकते का आमतारी हो गया उस पर। भौंचक्का-सा वह हाथ-आए शिकार को बेबसी से देखने लगा। लगा, सचमुच उसमें बल नहीं रहा।
         और इसी दरमियान अस्त-व्यस्त कपड़ों को सँभालती हुई युवती उसके चंगुल से निकल भागी। आक्रमणकारी प्रत्याक्रमण की चोट तलाशने लगा, लेकिन चोट का निशान कहीं नहीं था।
                                                           
और अंत में एक लघुकथा  बलराम अग्रवाल की ओर से…

105

हेमंत राणा

दो टिकट
जाड़ो के दिन थे, वर्मा जी बालकोनी में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। रिटायरमेंट के बाद, ज़िदगी इतनी बोर ना थी। लेकिन जब से पत्नी साथ छोड़कर गई, एक-एक पल काटना मुश्किल हो गया। अब तो अखबार ही उनका साथी था। तभी अंदर से उनके पोते ने आवाज लगाई, “दादा जी, टेबिल पर आप का फ़ोन बज रहा है…”
वर्मा जी ने वहीं बैठे-बैठे कहा, “देख तो, क्या नाम लिखा आ रहा है?”
“कोई आर जी लिखा आ रहा है…”
“उन्ही का फ़ोन है, जिनकी बेटी की शादी में तू मेरे साथ गया था।” वर्मा जी ने पोते के हाथ से फ़ोन लेते हुए कहा।
“हाँ बोलो ऋचा, कैसी हो?”
“मै ठीक हूँ, तुम कैसे हो?”
“बस अब तो बची खुची जिंदगी गुजारनी ही, सो गुजार रहे है। फ़ोन कैसे किया, कुछ काम था क्या?”
“हाँ, घर से भागना था।”
“इस सत्तर साल की उम्र में, किसके साथ भाग रही हो?”
“तुम्हारे साथ।”
“मेरे साथ भागना होता तो उस बीस साल की उम्र में भाग जातीं। तब तुम आई नहीं और मै सुबह से शाम तक हाथ में ट्रेन के दो टिकट लिए रेलवे स्टेशन पर खड़ा रहा।”
“हाँ, तब नही आ सकी।… फिर शादी, उसके बाद बच्चे। बस उसी में रम के रह गई। गुप्ता जी मेरे लिए यह मकान और बेटी की जिम्मेदारी छोड़ कर गये थे। बेटी अपने घर चली गई और यह मकान मैंने एक संस्था को लाइब्रेरी खोलने के लिए दे दिया, अपने लिए एक कमरा रखा है।"
"यह तो तुमने अच्छा किया। अब इतने बड़े मकान का अकेली करोगी भी क्या?"
"एक बस तीर्थ यात्रा के लिए जा रही है। उसी में दो टिकट बुक कराये हैं। आ जरूर जाना। कहीं ऐसा ना हो, इस बार मैं दो टिकट लिए खड़ी रहूँ।”
“तीर्थ यात्रा पर, अपने दीवाने के साथ भागकर जाओगी। भगवान बहुत पाप देंगे।” इस बार वर्मा जी की आवाज में एक खनक थी।
“अरे कोई पाप-वाप नहीं देंगे। पहले भी तो हम मन्दिर में कौन-सा पूजा करने जाते थे।” अब ऋचा की आवाज भी, वर्मा जी की आवाज के साथ खनखना रही थी।