Saturday, 26 January 2019

लघुकथा : मैदान से वितान की ओर-19


[रमेश जैन के साथ मिलकर भगीरथ ने 1974 में एक लघुकथा संकलन संपादित किया था—‘गुफाओं से मैदान की ओर’, जिसका आज ऐतिहासिक महत्व है। तब से अब तक, लगभग 45 वर्ष की अवधि में लिखी-छपी हजारों हिन्दी लघुकथाओं में से उन्होंने 100+ लघुकथाएँ  चुनी, जिन्हें मेरे अनुरोध पर उपलब्ध कराया है। उनके इस चुनाव को मैं अपनी ओर से फिलहाल ‘लघुकथा : मैदान से वितान की ओर’ नाम दे रहा हूँ और वरिष्ठ या कनिष्ठ के आग्रह से अलग, इन्हें लेखकों के नाम को अकारादि क्रम में रखकर प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसकी प्रथम  11 किश्तों का प्रकाशन क्रमश: 17 नवम्वर 2018, 24 नवम्बर 2018, 1 दिसम्बर 2018,  4 दिसम्बर 2018, 8 दिसम्बर 2018, 12 दिसम्बर 2018, 15 दिसम्बर 2018, 17 दिसम्बर 2018, 20 दिसम्बर 2018, 24 दिसम्बर 2018, 27 दिसम्बर 2018, 30 दिसम्बर 2018, 2 जनवरी, 2019, 6 जनवरी 2019, 12 जनवरी 2019, 16 जनवरी 2019, 19 जनवरी 2019  तथा 22 जनवरी 2019 को  ‘जनगाथा’ ब्लाग पर ही किया जा चुका है। यह इसकी उन्नीसवीं किश्त है। 
            टिप्पणी बॉक्स में कृपया ‘पहले भी पढ़ रखी है’ जैसा अभिजात्य वाक्य न लिखें, क्योंकि इन सभी लघुकथाओं का चुनाव पूर्व-प्रकाशित संग्रहों/संकलनों/विशेषांकों/सामान्य अंकों से ही किया गया है। इन  लघुकथाओं पर आपकी  बेबाक टिप्पणियों और सुझावों का इंतजार रहेगा।  साथ ही, किसी भी समय यदि आपको लगे कि अमुक लघुकथा को भी इस संग्रह में चुना जाना चाहिए था, तो यूनिकोड में टाइप की हुई उसकी प्रति आप  भगीरथ जी के अथवा मेरे संदेश बॉक्स में भेज सकते हैं। उस पर विचार अवश्य किया जाएगा—बलराम अग्रवाल]
धारावाहिक प्रकाशन की  उन्नीसवीं कड़ी में शामिल लघुकथाकारों के नाम और उनकी लघुकथा का शीर्षक…

91 सपना मांगलिक—अपना घर

92 साधना सोलंकी--मृगतृष्णा

93 सिमर सदोष

94 सीमा जैन—पानी

95 स्नेह गोस्वामी—वह जो नहीं कहा
91

सपना मांगलिक

अपना घर
मीठी माँ–पापा से उसे चित्रकारी प्रतियोगिता में लखनऊ भेजने के जिद कर रही थी। उसके चित्र को स्कूल लेवल प्रतियोगिता में सराहना मिली थी और अब उसे अंतर्राज्यीय प्रतियोगिता के लिए चुना गया है.मगर माँ –पापा हमेशा की तरह से उसे डाँटते हुए बोले, “जो करना है, अपने घर जाकर करना। दो महीने बाद शादी है और इसकी मनमानियाँ खत्म नहीं हो रही हैं।”
मीठी मन में सोच रही थी कि जिस घर में जन्म लिया, क्या वहाँ वह मनमानी नहीं कर सकती? खैर, ससुराल ही उसका घर है तो वह अपना ख्वाब ससुराल जाकर ही पूरा कर लेगी। शादी के बाद उसने हर लड़की की तरह साजन के घर और परिवारजनों को सहज ही अपना लिया, और अपने विनम्र एवं जिम्मेदार व्यवहार से सभी ससुराली जनों का दिल जीत लिया। एक दिन प्रेम के लम्हों में उसने पतिदेव को अपनी चित्रकारी के शौक और उसमे अपनी पहचान बनाने के ख्वाब का जिक्र किया। मगर उम्मीद के विपरीत पतिदेव भड़क उठे, “पागल हो क्या शादी के बाद एक स्त्री का धर्म घर गृहस्थी सँभालना होता है ,अगर यह सब ही करना था तो अपने घर में क्यों नहीं किया ?” और मीठी आँखों में आँसू भर यह सोचती रह गयी कि आखिर उसका अपना घर है कौनसा ?

92   

साधना सोलंकी 

मृगतृष्णा
स्त्री अकेली थी और प्यासी भी । यह जनम-जनम की प्यास थी और आज तक नहीं बुझ पाई थी । कहीं दो घूँट पानी मिलता भी...मुगालता होता कि प्यास बुझ रही है, पर यह भ्रम बरसात के बाद तीखी धूप से पपड़ाई धरती-सा जल्द ही चटख जाता। एक बियाबान रेगिस्तान फिर सामने होता, रेत के बगूले उठते और स्त्री को नज़र आता कहीं कोई सरोवर और उल्टे पेड़ की छाया ! हाँफती देह लिए फिर वह भागती... बस पानी मिल जाए! बस एक बार! फिर तो वह ख़ुद ही मन के इस छलकते कलश को उस नीर सरिता में उडेल देगी......कभी सूखने न देगी! उसी के किनारे बना लेगी,छोटी-सी कुटिया! बांध लेगी जनम-जन्मान्तर के बंधन!
स्त्री बंधना चाहती थी मुक्त होकर! अजीब विडम्बना...अनोखी चाहत और निरंकुश मन की उडानें! प्यास तो लगनी ही थी!
``तुम्हारे होठ गुलाब की पँखुरियों जैसे कोमल और गुलाबी हैं!' पुरुष ने स्त्री से कहा।
स्त्री एकाएक रुक गई ।
'हूँ!' वह कुनमुनाई!
`तुम्हारे गाल सेब की तरह हैं...सुर्ख!' स्त्री आत्म मुग्धा हुई और बार-बार दर्पण देखती रही!
`तुम्हारी आँखे झील-सी गहरी हैं!'
स्त्री एक अंधे मोहपाश में उतरती चली गयी । वह अपना सर्वस्व भूल गयी! उसे अपना जनम सार्थक लगा! रूप के पुजारी पर वह न्योछावर हो मर मिटी। उसे लगा सच में वह तृप्त हुई। तन-मन सब सौंप दिया!
यह स्त्री-पुरुष के बीच का शाश्वत संवाद था। एक मोह मंत्र जो पुरुष सदियों से औरत के कान में धीरे-धीरे कहता आया है और वह कभी नहीं बच पाई इस मारक मंत्र के पाश से! वह सदा ही उसके रूप सौंदर्य का पान करता रहा । गुलाब की पंखुरियों को मुरझाकर सूखना ही था....सूख गयीं! सेब का रस सुखा तो वहां झुर्रियां पड़ गयीं! झील को जैसे किसी ने उलीच कर सुखा डाला। जिस तृप्ति की तलाश में स्त्री ने कभी सीता, कभी अहिल्या और कभी द्रोपदी को जिया था, वह अपना सर्वस्व देकर फिर जैसे युगों से संचित प्यास लिए तट पर अकेली खड़ी है! सीता का रुदन, अहिल्या का श्राप और द्रोपदी के यक्ष प्रश्न लिए!
युग दर युग बीते। स्त्री देह का जादू आज उसी के सिर चढ़ कर बोल रहा है। दहलीज  से निकलकर व्यवसाई दुनिया के हर विज्ञापन में वह बिकाऊ है। हर माल चाहे वे पुरुष के मोजे हों या शेविंग क्रीम...स्त्री आकर्षक देह के साथ मौजूद है!दरअसल विज्ञापनों में स्त्री काम नहीं कर रही...वह इस्तेमाल हो रही है। देह को चिरयुवा बनाये रखने के भ्रम में वह अपने अंगों की चीर फाड़ करवा रही है...पर प्यास नहीं बुझती उसकी! दरअसल वह उस नेह कलश को भुला बैठी है, जो उसके भीतर ही है!
पुरुष उससे कहे तो सही...तुम्हारा मन बहुत सुन्दर है...तुम्हारे भीतर सूख का निर्मल झरना बहता है! नेह का सागर है... बर्बाद होती दुनिया को बचाने के लिए...सच में तुम्हारे भीतर बहुत कुछ है...ओ! बौराई स्त्री!!

93

सिमर सदोष

देश
वहां पानी की बहुत तंगी रहती थी। बाल्टी भर पानी के लिये लोगों को मीलों तक चलना पडता था। वहां आदमी नहीं, मिलों ऊंट बसते थे !
एक बार सैलानियों का एक दल उस क्षेत्र में जा पहुंचा। उनके पास पानी का काफ़ी भंडार था, जो कम से कम दो साल चल सकता था।
गांव के लोग आश्चर्य चकित से आते और दूर खडे उन्हें  टुकुर-टुकुर ताका करते।
एक दिन एक सैलानी ने गांव वालों की भीड में सबसे पीछे एक संगमरमरी बुत खडा देखा। उसे गौर से देखने के लिये वह उसके नजदीक जा खडा हुआ। उसकी नज़र भांप कर बुत के समीप खडे एक बूढे ने खींसे निपोरते हुए कहा-मेरी बेटी है हजूर!
सैलानी ने उन्हें साथ ले जाकर एक मटका पानी दिया। बूढा बहुत खुश हुआ! उस दिन बाप -बेटी कोई तीन महीने पश्चात नहाए। रात को अन्य सैलानियों ने देखा कि उस सैलानी के खेमे में हल्की रोशनी जल रही है। उन्होंने खेमे में से आती कुछ आवाजें भी सुनी, जैसे वह किसी बुत के साथ खेल रहा हो।
धीरे-धीरे रात भर हल्की-हल्की रोशनी में नहाये खेमों की संख्या बढती गई और सैलानियों का पानी का भंडार निश्चित समय से पहले ही खत्म होने लगा।
अतः एक रात मुँह अंधेरे ही वहां से कूच कर गये। प्रातः किसी अनजाने भय के कारण कोई भी अपने घर से बाहर नहीं निकला। दोपहर तक हर कोई जान चुका था कि प्रायः हर घर में से एक-एक संगमरमरी बुत गायब है। सब एक दूसरे से  मुँह चुरा रहे थे।
                                                           


94 


सीमा जैन


पानी
मेरी माँ ससुराल में पानी भरने के लिए ही लाई गई थी। राजस्थान के गाँवों में जो व्यक्ति थोड़ा खर्च उठा सकते है; वे दो शादियाँ कर लेते हैं। एक पत्नी अच्छे परिवार से, घर में राज करने के लिए और दूसरी गरीब घर से, पानी लाने के लिए। ऐसा करना नौकर रखने से सस्ता जो पड़ता है। माँ सुबह तीन बजे उठती, कोसों दूर से पानी लाती और फिर दिन भर घर के काम में लगी रहती।
माँ के सुबह अँधेरे उठ जाने के कारण, मैं भी जल्दी ही उठ जाता था। तभी परिश्रम कर मैं पढ़-लिख गया। कार में बैठे माँ की बार-बार कही बात दिमाग में आ रहीं थी, “लाला, मन लगाकर पढ़ ले, पढाई तेरे काम आएगी।"
दो साल बाद गाँव जा रहा हूँ, माँ को लेने। अब माँ शहर में मेरे साथ ही रहेगी। सुबह चार बजे घर पहुँचा। माँ घर पर नहीं थी। ध्यान आया, वह तो पानी लेने गई होगी। हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड थी। शीत भरे अँधेरे में कार पानी वाले रास्ते पर दौड़ा ली। पिछले पच्चीस सालों से माँ कितना कठिन जीवन जी रही है! सोच लिया था, आज के बाद माँ कभी इस सूने रास्ते से पानी लेने नहीं जाएगी।
मुझे देखकर माँ ने गले से लगा लिया, बोली -"यहाँ क्यों आया लालता? कितनी ठण्ड है। चल, घर चल, मैं पानी ले कर आती हूँ।"
मैने माँ का हाथ थाम कर कहा- "माँ, घड़ा यहीं छोड़ और मेरे साथ घर चल।"
माँ के लिए पानी छोड़ना किसी आश्चर्य से कम नही था, वह बोली, "बेटा, फिर दिन भर...?”
मैने माँ को बीच में ही रोक कर कहा- "उनको एक दिन बिना पानी के भी रहने दे न माँ!"
विधवा माँ को अपने साथ लेकर शहर आ गया। सोसायटी में मेरा फ्लैट है, सारी सुविधाओं से युक्त। सायंकाल माँ को स्विमिंग पूल पर ले गया। वहाँ माँ उदास हो गई। मुझे तैरता देख वह रोने लगी। घर पहुँचकर माँ से पूछा- "क्या बात माँ, तुम उदास क्यों हो गई?"
माँ ने दर्द भरे स्वर में कहा- "जिन चार घड़े पानी ने पूरी ज़िन्दगी का सुख ले लिया, उस पानी का ये हाल...!"

95 

स्नेह गोस्वामी

वह जो नहीं कहा
सुबह 6 बजे
सुनो जानू! आज तुम टूर पर हो तो लग रहा है आज यह घर पूरा का पूरा मेरा है। लग रहा है मैं आज सच्चे अर्थो में घरवाली हूँ, वर्ना तो शाम के समय पूरे घर में तुम्हारी ही आवाजें सुनाई देती हैं, "सुनती हो चाय बनाओ, जल्दी से खाना लाओ, चादर नहीं झाड़ी अब तक भई! तुम तो सारा दिन सोयी रहती हो और अब आधी रात तक बर्तन बजाती रहोगी। अब दूध क्या एक बजे रात को दोगी।" पूरा दिन यही सब सुनते बीतता है। पर आज कितनी शान्ति है। आज मैंने शादी के बाद पहली बार अदरक डली चाय बनाई है। अब आराम से अपना मनपसन्द कोई
नॉवल पढ़ना चाहती हूँ। तुम तो अपनी मीटिंग की फाइलों में उलझे होगे, फिर भी बाय!
सुबह, 10 बजे
सुनो जानू, मीटिंग शुरू हो गई क्या? पक्का हो गई होगी। मैंने भी मन्नू भंडारी का ‘आपका बंटी’ खत्म कर लिया।
बेचारा बंटी! पर बंटी को बेचारा होने से बचाने के चक्कर में कितनी शकुन हर रोज़ बेचारी होती है। तुम मर्द कैसे समझोगे। खैर जाने दो। मैंने आज अपने लिए सैंडविच और पोहा बनाया, चटखारे ले कर खाया। रोज-रोज आलू के पराँठे खा के उब गयी थी। तुम तो कभी ऊबते ही नहीं पराँठों से। मन में संतुष्टि हो रही है। अब कुछ देर टी.वी. पर कोई सीरियल देखूंगी। जब तुम घर होते हो तब तो टी. वी. पर या तो न्यूज चलती हैं या फिर कोई मैच; वह
भी तब तक जब तक तुम्हारा मन करे वरना टी.वी. बंद। अरे, कोई अच्छा सा सीरियल शुरू हो गया है, इसलिए बाय!
दोपहर, 3 बजे
जानू, आज मैंने कई दिनों बाद फिल्म देखी। लगा था, जिन्दगी मशीन हो गई है। पर नहीं दिल अभी धड़क रहा है। पुरानी फिल्म थी, साहिब बीबी और गुलाम। मीना कुमारी छोटी बहू बनी है; गरीब घर की बेटी और बड़े जमींदार की पत्नी। पति को नाचने वाली, और शराब से फुर्सत नहीं है। बीवी बेचारी सारी ज़िन्दगी उसे खुश करने के चक्कर में पागल हुई रहती है। सुनो! ये हसबैंड लोगों को बाहर वालियाँ क्यों अच्छी लगती हैं? बेशक कोई बाहर वाली घास भी न डाले, पर ये लट्टू हुए आगे-पीछे घूमते रहेंगे। घरवाली को सिर्फ कामवाली बाई बनाए रखेंगे। अरे, आज सफाई तो की ही नहीं। चलो, अब थोड़ी सफाई कर ली जाय, फिर खाना सोचूंगी। बाय!
शाम, 7 बजे
जानू, शाम को सफाई में ही तीन घंटे लग गए। आज मैंने घर रगड़-रगड़ कर साफ़ किया। एक-एक खिड़की दरवाजा, रोशनदान झाड़ कर चमकाये। इस घर पर सच में बहुत प्यार आया। फिर सारी चादरें बदलीं, सोफा-कवर बदले। पूरा घर अलग ही लुक दे रहा है। कपड़े धोने के लिए मशीन में डाले। फिर अपने लिए रोटी बनाई। सब्जी तो वही पड़ी थी जो रात तुम्हारे लिए बनाई थी, उसी के साथ खा ली। अब कुछ देर गाने सुने जाएँ, ठीक! बाय !
रात, 11 बजे
सुनो जानू, शाम को खाना तो बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। खाया ही आठ बजे था, पर कॉफ़ी का एक कप बनाया। एक तुम्हारा भी बन गया था सो दोनों कप मुझे ही पीने पड़े। फिर सास-बहू के सीरियल देखे। बहुत दिनों से देखे नहीं थे, पर लगा नहीं कि एक साल के अंतर के बाद देखे हैं। वही कहानी, वही करेक्टर, वही उनके षड्यन्त्र। फिर भी अच्छा समय बीत गया। अब सोने जा रही हूँ। अच्छा अब गुड नाईट!
रात, दो बजे
सुनो जानू, तुम तो सो चुके होगे, पर मुझे नींद नहीं आ रही। तुम्हारे चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुबह से अब तक नहीं सुनी। शायद इसलिए या इस समय पूरे कमरे में गूँजते खर्राटों के बिना सोने की आदत नहीं रही इसलिए। कारण जो भी हो पर नींद तो सचमुच ही नहीं आ रही। इतना अच्छा दिन बीता फिर तो निश्चिंत होकर सोना चाहिये था न, फिर भी नहीं सोई। तुम से पूरी तरह से न जुड़ पाने के बावजूद तुम्हारे बिना नींद नहीं आ रही। पर तुम यह सब कैसे जानोगे। तुम खुद कभी ये समझोगे नहीं और मैं तो शायद कभी कह ही नहीं पाऊँगी।
क्योंकि जब तुम घर में रहोगे तो यह घर तुम्हारा ही होगा। तुम ही बोलोगे, तुम ही हुक्म दोगे। मैं तो सिर्फ, ‘जी, आई जी, जी लाई जी,’ ही कह पाती हूँ। पर फिर भी तुम्हें मिस कर रही हूँ। अपनी मीटिंग जल्दी से खत्म करो और आ जाओ। मुझे नींद नहीं आ रही है।

Tuesday, 22 January 2019

लघुकथा : मैदान से वितान की ओर-18

[रमेश जैन के साथ मिलकर भगीरथ ने 1974 में एक लघुकथा संकलन संपादित किया था—‘गुफाओं से मैदान की ओर’, जिसका आज ऐतिहासिक महत्व है। तब से अब तक, लगभग 45 वर्ष की अवधि में लिखी-छपी हजारों हिन्दी लघुकथाओं में से उन्होंने 100+ लघुकथाएँ  चुनी, जिन्हें मेरे अनुरोध पर उपलब्ध कराया है। उनके इस चुनाव को मैं अपनी ओर से फिलहाल ‘लघुकथा : मैदान से वितान की ओर’ नाम दे रहा हूँ और वरिष्ठ या कनिष्ठ के आग्रह से अलग, इन्हें लेखकों के नाम को अकारादि क्रम में रखकर प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसकी प्रथम  11 किश्तों का प्रकाशन क्रमश: 17 नवम्वर 2018, 24 नवम्बर 2018, 1 दिसम्बर 2018,  4 दिसम्बर 2018, 8 दिसम्बर 2018, 12 दिसम्बर 2018, 15 दिसम्बर 2018, 17 दिसम्बर 2018, 20 दिसम्बर 2018, 24 दिसम्बर 2018, 27 दिसम्बर 2018, 30 दिसम्बर 2018, 2 जनवरी, 2019, 6 जनवरी 2019, 12 जनवरी 2019, 16 जनवरी 2019 तथा 19 जनवरी 2019 को  ‘जनगाथा’ ब्लाग पर ही किया जा चुका है। यह इसकी अठारहवीं किश्त है। 
            टिप्पणी बॉक्स में कृपया ‘पहले भी पढ़ रखी है’ जैसा अभिजात्य वाक्य न लिखें, क्योंकि इन सभी लघुकथाओं का चुनाव पूर्व-प्रकाशित संग्रहों/संकलनों/विशेषांकों/सामान्य अंकों से ही किया गया है। इन  लघुकथाओं पर आपकी  बेबाक टिप्पणियों और सुझावों का इंतजार रहेगा।  साथ ही, किसी भी समय यदि आपको लगे कि अमुक लघुकथा को भी इस संग्रह में चुना जाना चाहिए था, तो यूनिकोड में टाइप की हुई उसकी प्रति आप  भगीरथ जी के अथवा मेरे संदेश बॉक्स में भेज सकते हैं। उस पर विचार अवश्य किया जाएगा—बलराम अग्रवाल]
धारावाहिक प्रकाशन की  अठारहवीं कड़ी में शामिल लघुकथाकारों के नाम और उनकी लघुकथा का शीर्षक…
18…
86 शरद जोशी—मैं वही भगीरथ हूँ
87 संध्या तिवारी--कविता
88 सतीश दुबे—चौखट
89 सतीश राठी—जिस्मों का तिलिस्म
90 सतीशराज पुष्करणा—मन के साँप



86    

शरद जोशी

मैं वही भगीरथ हूँ
मेरे मोहल्ले के एक ठेकेदार महोदय अपनी माता को गंगा-स्नान कराने हरिद्वार ले गए। गंगा के सामने एक धर्मशाला में ठहरे। शाम हुई, सोचा—किनारे तक टहल आएँ। वे आए और गंगा किनारे खड़े हो गए। तभी उन्होंने देखा कि एक दिव्यपुरुष वहीं खड़ा एकटक गंगा को निहार रहा है। ठेकेदार महोदय उस समय दिव्य व्यक्तित्व से बड़े प्रभावित हुए। पास गए, और पूछने लगे –“आपका शुभ नाम।”        
“मेरा नाम भगीरथ है।” उस दिव्य पुरुष ने कहा।
“मेरे स्टाफ में ही चार भट भगीरथ हैं। जरा अपना विस्तार से परिचय दीजिए।”                  
“मैं वही भगीरथ हूँ, जो वर्षों पूर्व इस गंगा को यहाँ लाया था। उसे लाने के बाद ही मेरे पुरखे तर सके।”                                                                                
“वाह वाह कितना बड़ा प्रोजेक्ट रहा होगा! अगर ऐसा प्रोजेक्ट मिल जाए तो पुरखे क्या पीढियाँ तर जाएँ।”

87 

संध्या तिवारी

कविता
“सुनो बताती हूँ—मैं घर का आँगन हूँ जहाँ मैं झाड-बुहार करती हूँ।
 मैं कमरा हूँ, जहाँ मैं सबके आराम का खयाल रखती हूँ।
 मैं रसोई हूँ, जहाँ मैं सबका पेट भरती हूँ।
 मैं छत भी हूँ, जिस पर घर का बेटा पतंगें उड़ाता है।
 मैं ड्राइंग-रूम की सज्जा भी हूँ, जहाँ होता है मेरे अच्छे काम का इनाम और अधिक काम।”
“मुबारक हो संजू! कितना सुन्दर घर बना है तेरा।”
कविता की अन्तिम पंक्ति सोचते हुए संजू अपनी सहेली मंजू के कॉम्प्लीमेंट का सहज ही कोई जबाब न दे पाई, बस मुस्करा भर दी।
“क्या लिख रही हो इतनी तन्मयता से?” मंजू ने पूछा।
“कुछ नहीं एक कविता लिख रही थी अन्तिम पंक्ति सूझ ही नहीं रही |”
“चल छोड़, फिर कभी लिख लेना। कम-से-कम नया घर तो दिखा।” मंजू ने आँखें चौड़ी करते हुए कहा।
“ठीक है चल।” संजू कॉपी पेन एक तरफ रखकर उठ गई।
बेडरूम से होते हुए ड्राइंग-रूम तक देखने के बाद दोनों मेन गेट के बाहर का जायजा लेने लगीं।
“वाऊ! तेरा घर तो घर, इसकी नेम-प्लेट तक कितनी स्टाइलिश है, रेडियम की है न? इसमें तेरे छोटे भाई का नाम है।” मंजू नेम-प्लेट पर हाथ फेरते हुए कुछ उत्साह मिश्रित उत्सुकता से एक ही साँस में पूरा वाक्य बोल गई।
   अचानक संजू मंजू को नेम-प्लेट के आकर्षण में वहीं बँधा छोड़, अन्दर आई; और आकर उसने अपनी अन्तिम पंक्ति पूरी की...
“मैं मुख्य द्वार की साँकल, सबकी सुविधा और सुरक्षा के लिए खुलती और बंद होती हूँ
मैं समूचा घर हूँ,
बस घर की नेम-प्लेट नहीं।”  

88

सतीश दुबे

चौखट
चौखट-पूजा वाले दिन श्रीफल बदार कर मंत्रबद्ध पूजन सामग्री सहित लाल कपड़े में बांधी गई छोटी-सी पोटली मस्तिष्क में उभरकर आँखों के सामने आ गई। चौखट में दरवाजे का लगना और फिर मंगल प्रवेश।
शादी होने के पूर्व तक का खुशनुमा जीवन जीने तथा स्कूल से कॉलेज तक की शिक्षा के  लिए सब बच्चे इसी चौखट से निकले। बाहर से लाई गई खुशियों को घर में बाँटे जाने वाले मनसूबों से लदे चरण की उल्लासभरी थिरकन इसने महसूस की। देश विदेश से उपलब्धियाँ  प्राप्त कर लौटे बेटों तथा पहली बार आए दामादों का स्वागत भी तो सबसे पहले इसी ने किया। यही नही, शुभ्र वस्त्र पर हल्दी भरे चरण चिह्न अंकित कर छुई-मुई सी लजाती शरमाती लक्ष्मीस्वरूपा बहुओं का आंतरिक हर्ष वाद्यों के साथ प्रवेश हेतु आग्रह कर रही गृह तपस्विनी की छवि को इसने एलबम की तरह अपने में समाए रखा है। यदि मन के सूक्ष्म यंत्रों से देखा जाए, तो बेटियों को बिदा करते वक्त टपकी आँसुओं की ढ़ेर सारी बूँदे भी तो यहाँ दिखाई देगी। इस मायने में खुशी ही नहीं, न जाने कितने दर्द और कोलाहल की प्रतिध्वनियों को इस चौखट ने अपने में ज़ज्ब कर रखा है।
अंकित, प्रेक्षा, प्रीतांशु, पुनर्वसु तथा सूर्यांश अब तो बडों बडों के कान काटने लगे हैं, किन्तु इन्होंने जन्मदात्रियों की गोद में टुकुर- टुकुर आँखें घुमाते हुए इसी चौखट से तो प्रवेश कर जीवन को सँवारने की शुरुआत की।
अकबर महान के ‘बुलंद दरवाजा’ की तरह, जो दक्षिणमुखी प्रवेश द्वार, इतनी उपलब्धियों की नींव पर खड़ा हो, उसे अनिष्टकारी कैसे माना जा सकता है।
मस्तिष्क से अंतिम निर्णायक सूत्र मिलते ही उन्होंने निगाहें घुमाकर सामने बैठे वास्तुशास्त्री तथा भवन निर्माता की ओर देखा तथा दृढ़ता से बोले, “मि. फेन्गशुई, क्षमा कीजिएगा, वास्तु सिद्धांतों को अमल में लाने के  लिए मैं अतीत की सुखद इमारत पर हथौड़ा नही चला सकता…।

89



सतीश राठी

जिस्मों का तिलिस्म
वे सारे सिर झुकाए खड़े थे। उनके काँधे इसतरह झुके हुए थे कि पीठ पर कुबड़-सी निकली लग रही थी। दूर सेउन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे सिरकटे जिस्म पंकिबद्ध खड़े हैं।
मैं उनके नजदीक गया। मैं चकित था कि ये इतनी लम्बी लाइन लगाकर क्यों खड़े हैं?
“क्या मैं इस लम्बी कतार की वजह जान सकता हूँ?” नजदीक खड़े एक जिस्म से मैंने प्रश्न किया।
उसने अपना सिर उठाने की असफल कोशिश की। लेकिन मैं यह देखकर और चौंक गया कि उसकी नाक के नीचे बोलने के लिए कोई स्थान नहीं है।
तभी उसकी पीठ से तकरीबन चिपके हुए पेट से एक धीमी–सी आवाज आई, “हमें पेट भरना है और यह राशन की दुकान है।”
“लेकिन यह दुकान तो बंद है। कब खुलेगी यह दुकान ?” मैंने प्रश्न किया।
“पिछले कई वर्षों से हम ऐसे ही खड़े हैं। इसका मलिक हमें कई बार आश्वासन दे गया कि दुकान शीघ्र खुलेगी और सबको भरपेट राशन मिलेगा।” आसपास खड़े जिस्मों से खोखली-सी आवाजें आई।
“तो तुम लोग ...अपने हाथों से क्यों नहीं खोल लेते यह दुकान ?” पूछते हुए मेरा ध्यान उनके हाथों की ओर गया तो आँखें आश्चर्य से विस्फारित हो गई।
मैंने देखा कि सारे जिस्मों के दोनों हाथ गायब थे।
     
90  
        
सतीशराज पुष्करणा

मन के साँप
आज रात खाना खाने के बाद उसका मन कैसा-कैसा तो होने लगा । वह मन-ही-मन बड़बड़ाया, ‘ये पत्नी भी अजीब है, मायके गई तो गई-आज सप्ताह होने को आया, उसे इतना भी ध्यान नहीं कि पति की रातें कैसे कटती होंगी।’ वह आकर अपने बिछावन पर लेट गया। नींद तो जैसे उसकी आँखों से उड़ चुकी थी । आज टीवी देखने को भी उसका मन नहीं हो रहा था। उसे ध्यान आया कि आज ऑफिस में मिसेज़ सिन्हा कितनी खूबसूरत लग रही थीं, क्या हँस-हँसकर बातें कर रही थीं। इस स्मरण ने उसे और बेचैन-सा कर दिया । उसे अपनी पत्नी पर क्रोध आने लगा, ‘यह भी कोई तरीका है? शादी के बाद औरत को अपने घर का ध्यान होना चाहिए।’
वह जैसे-जैसे सोने का प्रयास करता, नींद उसकी आँखों से वैसे-वैसे दूर भागती जाती। इतने में, उसकी दृष्टि सामने अलगनी पर जा टिकी, जहाँ उसकी पत्नी की साड़ी लापरवाही से लटकी हुई थी । उसे लगा, जैसे उसकी पत्नी खड़ी मुस्करा रही है। वह उठा और अलगनी से उस साड़ी को उठा लाया और उसे सीने से लगा लिया। फिर एकाएक उसे चूम लिया। उसे लगा, जैसे वह साड़ी नहीं, उसकी पत्नी है। उसने साड़ी को बहुत प्रेम से सरियाया और तह लगाकर अपने तकिए के बगल में रख लिया ।
“मालिक ! और कोई काम हो, तो बता दीजिए; फिर मैं सोने जाऊँगी।” अपनी युवा नौकरानी के स्वर से वह चौंक उठा। उसने चोर-दृष्टि से उसके यौवन को पहली बार भरपूर दृष्टि से देखा, तो वह दंग रह गया। आज वह उसे बहुत सुन्दर लग रही थी। उसे देखकर फिर न जाने उसका मन कैसा-कैसा तो होने लगा। अभी वह कामुक हो ही रहा था कि नौकरानी ने पुनः पूछा, “मालिक, बता दीजिए न !”
“तुम ऐसा करो, तुम कहाँ उधर दूसरे कमरे में सोने जाओगी। यहीं इसी कमरे में सो जाओ। न जाने कोई काम याद आ ही जाए। ज़रूरत पड़ने पर तुम्हें जगा दूँगा। हाँ ! पीने के लिए पानी का एक जग और एक गिलास ज़रूर रख लेना। फिलहाल तो कोई काम याद नहीं आ रहा है।”
“जी अच्छा !”
आज नींद उसकी आँखों से दूर, कभी पत्नी का ख़्याल, कभी मिसेज़ सिन्हा का ध्यान, कभी नौकरानी के यौवन का नशा। उसने अपने को बहलाने के विचार से कोई पत्रिका सामने अलमारी से निकाली। उसे पढ़ने में मन तो नहीं लगा, बस यों ही उलटने-पलटने लगा । पत्रिका के मध्य में उसे किसी सिने-तारिका का ‘ब्लो-अप’ नज़र आया । उसकी दृष्टि रुक गई। उसे लगा, वह सिने-तारिका हरक़त करने लगी है। वह उसे देखता रहा । उसे लगा, वह मुस्करा रही है। वह भी मुस्कराने लगा। उसने उस ‘ब्लो अप’ को स्पर्श किया, तो यथार्थ के धरातल पर आ गया। उसने पत्रिका बन्द करके एक तरफ रख दी ।
वह पानी के विचार से उठा । उसने देखा, उसकी नौकरानी उसकी नीयत से बेखबर गहरी नींद में सोई हुई है। उसकी आती-जाती साँसों से हिलता उसका बदन उसे बहुत भला लगने लगा । उसका मासूम चेहरा, उसे लगा कि वह उसे चूम ले, किन्तु किसी अज्ञात भय से वह पीछे हट गया। वह सोचने लगा कि वह समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति है। कार्यालय में भी उसको आदर की दृष्टि से देखा जाता है। बाहरी आडम्बरों ने उसके मन को दबाया, किन्तु फिर मन था कि उसकी ओर बढ़ा, किन्तु एकाएक उसकी पत्नी की आकृति उभरती दिखाई दी । अब उसकी पत्नी के चेहरे पर मुस्कराहट के स्थान पर घृणा के भाव थे। वह सिहर गया। पुनः अपने पलंग पर लौट आया। नौकरानी को आवाज़ दी और पानी का गिलास देने को कहा।
उसने पानी पीकर कहा, “देखो ! अब मुझे कोई काम नहीं है। तुम वहीं बगल के कमरे में जाकर सो जाओ। देखो! अन्दर से कमरा ज़रूर बन्द कर लेना।” यह कहकर वह बाथरूम की ओर बढ़ गया। बाथरूम में लटका पत्नी का गाउन उसे ऐसा लगा, पत्नी मुस्करा रही है और इस अर्द्धरात्रि में वह स्नान करने लगा ।