Tuesday, 1 March 2016

उपमा शर्मा की लघुकथाएँ



'जनगाथा' में इस बार प्रस्तुत हैं डॉ॰ उपमा शर्मा की लघुकथाएँ। डॉ॰ उपमा दन्तरोग विशेषज्ञ हैं। वह मृदुभाषिणी हैं। दो चंचल और खूबसूरत बच्चियों की माँ हैं। कुशल गृहिणी हैं। …और इस सब के साथ-साथ बेहद संवेदनशील भी। यहाँ प्रकाशित उनकी ये लघुकथाएँ भाई श्याम सुन्दर अग्रवाल के सौजन्य से प्राप्त हुई हैं। उन्हें धन्यवाद।

॥1॥ आकांक्षा
“नन्हीं रुचिका का अभिनय बहुत दमदार रहा। फिल्म में बड़े-बड़े कलाकारों के रहते भी उसने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। दर्शकों का मन मोह लिया। उसके नाम की बड़ी चर्चा है। आपको कैसा लग रहा है?” एक टी.वी चैनल का संवाददाता रुचिका की माँ से पूछ रहा था।
“बेटी की कामयाबी से जो खुशी मिली, उसे बयाँ करना कठिन है। माता-पिता जब बेटा-बेटी के नाम से पहचाने जाते हैं तो उन्हें बहुत गर्व होता है।” शैली ने खुश होते हुए जवाब दिया।  
“अभी रुचिका बहुत छोटी है। वह अपना ध्यान पढ़ाई में लगाएगी या फिर अभिनय जारी रखेगी?”
“पढ़ाई भी करेगी, लेकिन अगर कहीं अच्छी फिल्म में रोल मिला तो जरूर करेगी।”
“शैली जी, क्या मैं रुचिका से बात कर सकता हूँ?”
“हाँ, क्यों नहीं…रुचिका बेटे, जरा इधर आना।”
दूसरे कमरे से रुचिका आई तो संवाददाता बोला, “रुचिका बेटे, कैसी हो?”
“ठीक हूँ अंकल।”
“अच्छा यह बताओ, आपको क्या-क्या अच्छा लगता है?”
“मुझे…रिया, दिया के साथ खेलना, पार्क में जाना और साइकिल चलाना…और खूब सारा पिज्जा खाना बहुत अच्छा लगता है।”
“और आप बड़ी होकर क्या बनना चाहती हो?” संवाददाता ने मुस्कराते हुए पूछा।
“मैं तो टीचर बनूंगी, टीचर न सबको डाँट सकती है…” बोलते हुए उसकी नज़र अपनी माँ की ओर गई तो वह सकपका गई, “…नहीं अंकल…मैं तो न…बड़ी कलाकार बनूँगी, दीपिका जैसी।” घबराते हुए रुचिका अटक-अटक कर बोली।
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॥2॥ धर्म 
"बहुत प्यास लगी है बेटी, क्या थोड़ा पानी मिलेगा?" रहमान ने स्कूल से लौट घर में प्रवेश कर रही एक लड़की से कहा।
"जी अवश्य बाबा। आज तो वैसे भी निर्जला एकादशी है। माँ ने कहा है, किसी को पानी के लिए मना मत करना। प्यासे को पानी पिलाने से पुण्य मिलता है।”
“ठीक कह रही हो बेटी, प्यासे को पानी पिलाना तो अच्छा काम है।" रहमान बोला।
"हाँ जी, आप बिल्कुल सही कह रहे हो, यह तो धर्म का काम है।” पीछे दरवाजे पर खड़ी लड़की की माँ भी बोली।
लड़की पानी का गिलास ला रहमान को पकड़ाने लगी तो वह बोला, "बेटी, मैं मुसलमान हूँ, कहीं मुसलमान को पानी पिलाने से तुम्हारा धर्म खराब न हो जाये।"
 "बेटी का दिया पानी पी लो बाबा। ‘धर्म’ से मेरा भाव पुण्य से ही था। वैसे न पानी का कोई धर्म होता है, न प्यासे का।"
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 ॥3॥ भविष्य
"प्रोफेसर साहब, जल्दी ही मेडिकल-काउंसिल की इंस्पैक्शन होने वाली है। आपके विभाग में मरीजों की संख्या काफी कम है। कालेज काउंसिल के स्टैंड्रड पर खरा नहीं उतरा तो मान्यता रद्द हो जायेगी। हम सबका भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।" विभाग प्रमुख से कालेज के डीन ने कहा।
"जी सर, लेकिन करें क्या? मैडीकल-कैंप भी लगवाये, पर खास लाभ नहीं हुआ। अब मरीज समझदार हो गया है, स्टूडैंट्स से इलाज नहीं करवाना चाहता।"
"तो इलाज डॉक्टरज से करवाइये।"
"डॉक्टर स्ट्रैंथ तो पहले ही कम है, वे भी इलाज में लगे रहेंगे तो स्टूडैंट्स को पढ़ायेगा कौन?"
“फिर क्या हल है?”
"कालेज मैनेजमैंट से कहिए, नए डाक्टर भर्ती करें। अच्छे डाक्टर होंगे तो ही मरीज आएँगे।
"लेकिन इससे तो बजट बिगड़ जायेगा।"
"बजट बढ़ाने के लिए स्टूडेंट्स पर नए चार्जिज लगाएँ। आखिर सब उन्ही के भविष्य के लिए ही तो कर रहे हैं।"
“आपकी बात मैनेजमैंट तक पहुँचा दूँगा। फिर भी मरीज बढ़ाने का कोई और उपाय?”
“रोजाना पाँच-सात फर्जी मरीज दाखिल हुए दिखा देते हैं। इसी तरह कागजों में बैड भर देते हैं। काउंसिल को सत्तर परसेंट बैड-आकुपेंसी ही तो चाहिए।”
“इंस्पैक्शन के वक्त क्या करेंगे?”
“तब मज़दूरों, भिखारियों, रिक्शावालों को दिहाड़ी पर लाकर लेटा देंगे।” प्रोफैसर ने मुस्कराते हुए कहा।
                                     
॥4॥ संकल्प
लाल बत्ती पर कार रुकी तो मैले-कुचैले कपड़ों वाली एक बच्ची हथेली फैलाए सामने आन खड़ी हुई। सुमन ने कई बार ‘न’ में सिर हिलाया तथा “परे हटो!” कहा। जब वह ढीठ बनी बार-बार “कुछ दे दो, कुछ दे दो!” कहती-रिरियाती खड़ी रही तो सुमन ने कार का शीशा ऊपर चढ़ा लिया।
"अरे, ये क्या किया सुमन? शीशा क्यों ऊपर कर दिया? लाखों की मालकिन हो, अगर भीख में पांच रुपए  इस बच्ची को दे भी दोगी तो कौन-सा कमी आ जाएगी! तुम इतनी बेदर्द कब से हो गई?" भिखारन बच्ची के प्रति अपनी सखी की इतनी रुखाई देख सारिका से चुप न रहा गया।
"ये बेदर्दी नहीं है, सारिका। इन्हें भीख न देना बच्चों के भले में ही है।”
“बच्चों का भला कैसे?”
“इनमें से अधिकतर गरीब परिवारों के वे बच्चे होते हैं, जिनका इस काम के लिए ही अपहरण हुआ होता है। बेचारे बंधुआ मजदूर जैसे हैं, मात्र दो वक्त का भोजन ही मिलता है इन्हें। इनपर रहम कर जितनी अधिक भीख देंगे, कमाई के लिए उतने ही अधिक बच्चों का अपहरण होगा। मैं नहीं चाहती कि किसी माँ का मासूम बच्चा उससे छिन जाए।”
हरी बत्ती हो गई थी। कार चल पड़ी। सारिका का मन सुमन की बात से सहमत नहीं हो पा रहा था। सुमन भी समझ रही थी। कुछ ही देर बाद कार फिर से एक चौराहे पर रुकी। वैसी ही एक बच्ची फिर कार की खिड़की के सामने थी। अबकी बार सुमन ने पूछा, “तुम्हारी माँ कहाँ है?”
लड़की से कोई जवाब देते न बना। वह सुमन की ओर देखती भर रही। सुमन ने दोबारा पूछा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए।
सुमन ने सारिका की ओर देखा तो वह चुपचाप लड़की की ओर देख रही थी। उस लड़की में वह अपनी काम वाली बाई की गुम हुई लड़की खोज रही थी।
                              
॥5॥ सज़ा
केदारनाथ पहुंचकर सुनयना और साकेत ने राहत की सांस ली। लम्बी और दुर्गम यात्रा। लेकिन प्रकृति की गोद में पहुँचते ही सारी थकान उतर गयी। साकेत यहाँ के पहाड़ों व नैसर्गिक सुंदरता की बहुत तारीफ करता था। इसलिए ही सुनयना उसके साथ यहाँ आने से स्वयं को रोक नहीं पाई।
 "साकेत, यहाँ भी इतने ऊँचे-ऊँचे भवन!  मैँ तो सोच रही थी, यहाँ केवल पहाड़ ही होंगे।"
"हां सुनयना। अब बहुत परिवर्तन आ गया है। पहले तो पहाड़ों के बीच से बहती दूधिया मंदाकिनी कितनी सुंदर दिखाई देती थी। नदी के ऊपर नीले पहाड़ ऐसे दिखते थे, जैसे खिले हुए पुष्प की पंखुड़ियाँ। हल्की बूँदा-बाँदी के समय काली घटा यूँ लगती जैसे कोई पहाड़ी स्त्री काली चूनर ओढ़े खड़ी हो। सब कुछ बहुत सुंदर और स्वपनिल…।"
"सुंदर तो अब भी लग ही रही है साकेत।”
“पहाड़ों को काटकर रास्ते बनाने से आना-जाना सुविधाजनक हुआ है…ऊँचे-ऊँचे भवनों से यहाँ की भव्यता बढी है, लेकिन वे कुदरती नज़ारे…”
“तुम्हें ज्यादा पता है, मैं तो पहली बार…”
"सुनयना, तेज बारिश के आसार लग रहे हैं। लग रहा है जैसे पहले भी काफी बारिश हुई है। तभी तो मंदाकिनी में पानी खतरे के निशान तक पहुँच गया है। जल्दी चल, होटल चलते हैं।"
तेज बारिश के साथ पानी का रेला आया और पहाड़ियाँ जलमग्न हो गयीं। मंदाकिनी ने गहरी झील का रूप धार लिया। तेज बहाव में वह सब कुछ बहा ले जा रही थी, ऊँचे-ऊँचे भवनों को भी। हर कोई जान बचाने को सहारा ढूँढ रहा था। चारों ओर तबाही का मंजर था। बहुत संघर्ष के बाद स्वयं को किसी तरह बचा लेने वाले साकेत के मुख से निकला, “सुनयना, प्राकृति से छेड़छाड़ की सजा बहुत भयावह होती है।”
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डॉ॰ उपमा शर्मा
दन्त रोग विशेषज्ञ (बीडीएस)
      बी-1/248, यमुना विहार,दिल्ली-110053

Sunday, 20 December 2015

पृथ्वीराज अरोड़ा को याद करते हुए--बलराम अग्रवाल


पृथ्वीराज अरोड़ा

10 अक्टूबर, 1939 को पाकिस्तान के बुचेकी (ननकाना साहिब) में जन्मे, हिन्दी लघुकथा के महत्वपूर्ण स्तम्भों में से एक आ॰ पृथ्वीराज अरोड़ा आज 20 दिसम्बर, 2015 को दोपहर 11:40 बजे अपनी नश्वर देह को त्यागकर अनन्त में जा मिले। वे गत लगभग 3 साल से शारीरिक-मानसिक अक्षमता से जूझ रहे थे। उनका इस तरह अक्षम हो जाना हिन्दी लघुकथा की अपूरणीय क्षति थी। उनसे मेरी अन्तिम बातचीत सम्भवत: अक्टूबर 2012 में उस समय हुई थी, जब मैं 'अविराम साहित्यिकी' के लघुकथा विशेषांक में प्रकाशित करने हेतु वरिष्ठ लघुकथा लेखकों से उनकी 'लघुकथा यात्रा' पाने का निवेदन कर रहा था। अरोड़ा जी ने उस समय मुझे बताया था कि उनके डॉक्टर ने उन्हें कोई भी ऐसा काम करने से मना किया है जिसे करने में उन्हें मानसिक श्रम करना पड़े; इसलिए मैं तुम्हारा यह काम करने में असमर्थ हूँ। मैंने उनसे कहा--कोई बात नहीं। मैं स्वयं आपके पास रिकॉर्डर लेकर आ जाऊँगा, आप बोलते रहना, बस। लेकिन उन्होंने इस काम में भी अपनी असमर्थता साफ-साफ व्यक्त कर दी थी। और इस तरह, हिन्दी लघुकथा की शुरुआत का एक हिस्सा हम-सब के हाथ आने से रह गया, एक ऐसा हिस्सा जो जीवंत इतिहास था। उस हिस्से की महत्वपूर्ण कड़ी, रमेश बतरा बहुत पहले जा चुके थे। लेकिन उस दौर की कुछ महत्वपूर्ण कड़ियाँ अभी भी हमारे पास उपलब्ध हैं, बशर्ते वो इस ओर श्रम करना जरूरी समझें--कमलेश भारतीय और सिमर सदोष और महावीर प्रसाद जैन। यद्यपि इन सभी ने अपनी-अपनी लघुकथा यात्रा 'अविराम साहित्यिकी' को उपलब्ध करा दी थी, तथापि, मैं समझता हूँ कि उसका बहुत-सा हिस्सा अभी भी लिखना बाकी है।
पृथ्वीराज अरोड़ा की रचनाओं के तीन संग्रह मेरे पास हैं--1 तीन न तेरह (1997, लघुकथा संग्रह) 2 पूजा (2003, कहानी संग्रह)  तथा 3 आओ इंसान बनाएँ (2007, लघुकथा संग्रह)। इनके अलावा 'प्यासे पंछी' नाम की एक औपन्यासिक कृति का भी उल्लेख 'आओ इंसान बनाएँ' के पिछले कवर पृष्ठ पर किया है; लेकिन वह मेरे पास नहीं है। 
पृथ्वीराज अरोड़ा जी से मेरी मुलाकातों का सिलसिला बहुत बाद में शुरू हुआ—रमेश बतरा के निधन के बाद। रमेश बतरा के निधन से पृथ्वीराज अरोड़ा बेहद आहत थे। दिल्ली में सम्पन्न रमेश बतरा की लगभग हर शोक सभा में वे सम्मिलित हुए, उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की, दु;ख में डूबे।
उनकी-मेरी मुलाकातें उनके दिल्ली प्रवास के दौरान अनगिनत हुईं। उन्हें जब भी मौका मिलता, वे कश्मीरी गेट स्थित दिल्ली जी॰पी॰ओ॰ की मेरी शाखा में आ बैठते थे। उनके कहानी संग्रह ‘पूजा’ (2003) तथा लघुकथा संग्रह ‘आओ इंसान बनाएँ’ (2007) की रचनाएँ उन्होंने उसी दौर में लिखी थीं। वे लघुकथा लिखकर लाते और मेरी शाखा में आकर उसके कथ्य के बारे में विमर्श करते। उन दिनों मैं उनके अधिकतर कथ्यों से अपने आप को लगभग असहमत पाता था, लेकिन वे विचलित नहीं होते थे। मेरे तर्कों से प्रभावित भी नहीं होते थे। मैं उनकी लघुकथाओं का प्रशंसक था, इस बात से वे परिचित थे; और शायद अचम्भित होते थे कि मैं उनके नवीन कथ्यों से असहमति क्यों जताता हूँ! मैं उन दिनों प्रेमचंद की उन लघु-आकारीय कहानियों पर, जिन्हें लगातार ‘लघुकथा’ शीर्ष तले छापा जा रहा था, विमर्श आयोजित कर रहा था। वे मेरे पास आकर बैठे तो उनसे भी सवाल कर दिया। बोले, ‘लघुकथा का कोई विधान ही जब तय नहीं है बलराम भाई, तब आप किस आधार पर लघुकथापरक विचार आमन्त्रित कर सकते हैं!’ मैं उनकी इस दलील से भी सहमत नहीं था। बहुत तर्क-वितर्क होता, लेकिन वे आदतन गड़ा हुआ खूँटा पकड़े रहते। जो भी हो, मैंने उनसे कहा, ‘आप अपने इन्हीं विचारों को लिखकर मुझे दीजिए, मैं इसी रूप में इन्हें छापूँगा।’ उन्होंने नि;संकोच उन्हें लिखकर दिया और उन्हें पहले मैंने ‘द्वीप लहरी’ (2006) में तथा बाद में “समकालीन लघुकथा और प्रेमचंद” शीर्षक पुस्तक में संकलित किया। यह सब लिखने का आशय सिर्फ यह है कि लघुकथा संबंधी अपने विचार को वे अन्तिम मानकर चलते थे और उनमें सुधार की गुंजाइश को अस्वीकार करते थे। उनका यही रूप हमने ‘मिन्नी’ द्वारा करनाल में आयोजित अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन में भी उस समय देखा था जब वे लघुकथा में “कालदोष” संबंधी अपनी अवधारणा को लेकर अड़ गये थे। यह ‘अड़ जाना’ उनके जुझारू व्यक्तित्व का वह हिस्सा था जिसे उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की कर्मचारी यूनियन का सक्रिय नेता रहते परिपक्व किया था।
वे बहुत-सी सामाजिक मान्यताओं के तो बहुत-सी न्यायिक स्थापनाओं?निर्णयों से भी अपना विरोध दर्ज करते थे। वे सब विरोध उनके लघुकथा-साहित्य में मौजूद हैं। उनके व्यक्तित्व का आकलन करने के लिए अब उनकी रचनाएँ हमारे सामने हैं जो हू-ब-हू उनके व्यक्तित्व का आईना हैं, बिना किसी बनावट के। उनकी सभी लघुकथाएँ उनके व्यक्तित्व को उनकी सम्पूर्णता में व्यक्त करने का दरवाज़ा हैं। उनकी सभी लघुकथाओं में उनका विद्रोही व्यक्तित्व झाँकता है, इसमें सन्देह नहीं है। कल, 19-20 दिसम्बर की रात को मैंने उनके दोनों लघुकथा संग्रहों से कुछ लघुकथाओं का चुनाव किया था जो ये हैं--कील/पढ़ाई/दया/घर का ख्वाब/बेटी तो बेटी होती है/सरकार के द्वार/पल/अपनी अपनी सोच/एक गौरैया-सी/शाश्वत रिश्ता/योगाभ्यास/भूख/मिठास-भरा रिश्ता/युग-बोध/मेरा दर्द। अनुमान नहीं था कि अगले दिन ही मुझे उनके निधन की अप्रत्याशित सूचना को झेलना होगा। 
कुल मिलाकर, वे बहुत प्यारे इंसान थे--हमेशा मुस्कुराते रहने वाले। जिन बातों का वे बुरा मान जाते थे, उन्हें भी दिल में नहीं रखते थे। याद रखते थे, सिर्फ दोस्ती। खूबसूरत इतने थे कि मैं जब भी उन्हें देखता, उनके रूप में मुझे कैनेडी की छाया नजर आती थी।
एक बात और। रचनाओं से अलग अपने आप को प्रदर्शित करने में वे काफी संकोची रहे। इस बात का प्रमाण उनके संग्रहों में दिया गया उनका वह परिचय है जिनमें उन्होंने अपने जन्म की तारीख तक देना जरूरी नहीं समझा…वह परिचय है जिसमें अपनी ताजातरीन फोटो देने की ओर उन्होंने कभी ध्यान नहीं दिया।
बहरहाल, उनकी स्मृति को शत-शत नमन। भावभीनी श्रृद्धांजलि।