Wednesday, 1 October 2008

जनगाथा अक्टूबर, 2008

हरियाणा का हिंदी लघुकथा-लेखन
डा अशोक भाटिया
सितम्बर, 2008 से आगे का अंश…
हरियाणा-आधारित कथाकारों के लघुकथा-संग्रह
सन 2008 तक हरियाणा के लघुकथाकारों के लगभग 70 लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। लघुकथा के संग्रह प्रकाशन का यह सिलसिला 1963 में प्रतिनिधि साहित्यकार विष्णु प्रभाकर के लघुकथा-संग्रह ‘जीवन पराग’ के प्रकाशन से प्रारंभ होता है। इसके पश्चात सन 1966 में सुगनचंद मुक्तेश की 66 लघुकथाओं का संग्रह ‘स्वाति बूँद’ आया। यद्यपि इसी संग्रह का संशोधित संस्करण सन 1996 में आया, तथापि चौंकाने वाला एक सच यह भी है कि हरियाणा के कथाकारों द्वारा लगातार लिखी जाने के बावजूद भी सन 1967 से 1981 तक यानी 15 वर्षों की लम्बी कालावधि में हरियाणा के कथाकारों का कोई भी एकल या संपादित लघुकथा-संग्रह देखने में नहीं आता है। सन 1966 के बाद सीधे सन 1982 में पूरन मुद्गल का लघुकथा-संग्रह ‘निरंतर इतिहास’ प्रकाशित हुआ। 1982 में ही रामनिवास मानव व दर्शन दीप के संयुक्त प्रयास के रूप में ‘ताकि सनद रहे’ प्रकाश में आया जिसमें दोनों कथाकारों की बारह-बारह लघुकथाएँ शामिल थीं; और यहीं से हरियाणा-आधारित कथाकारों के एकल व संपादित लघुकथा-संग्रहों के लगातार प्रकाशित होते रहने का जैसे श्रीगणेश हो जाता है। इसके बाद सन 1983 में विष्णु प्रभाकर का दूसरा लघुकथा-संग्रह ‘आपकी कृपा है’ तथा सुरेन्द्र वर्मा का लघुकथा-संग्रह ‘दो टाँगोंवाला जानवर’ प्रकाश में आये। अगले ही वर्ष सन 1984 में कमलेश भारतीय का ‘मस्तराम जिंदाबाद’ और मधुकांत का ‘तरकश’ संग्रह प्रकाश में आये। सन 1985 में अनिल शूर ‘आजाद’ का लघुकथा-संग्रह ‘सरहद के इस ओर’ प्रकाशित हुआ। सन 1988 में सुरेन्द्र वर्मा का दूसरा लघुकथा-संग्रह ‘आदमी से आदमी तक’ तथा रामनिवास मानव का ‘घर लौटते कदम’ छपे। सन 1989 में विष्णु प्रभाकर के तीसरे लघुकथा-संग्रह ‘कौन जीता कौन हारा’ के अतिरिक्त, प्रेमसिंह बरनालवी का ‘बहुत बड़ा सवाल’ और सुरेश जांगिड़ ‘उदय’ का ‘यहीं कहीं’ प्रकाशित हुए। सन 1990 में अशोक भाटिया का ‘जंगल में आदमी’ और रूप देवगुण का ‘दूसरा सच’ लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुए, जो खासे चचित रहे । सन 1991 में मधुदीप का ‘हिस्से का दूध’ व बीजेंद्र कुमार जैमिनी का ‘प्रात:काल’; सन 1992 में कमलेश भारतीय का दूसरा लघुकथा-संग्रह ‘इस बार’ व रूप देवगुण का दूसरा लघुकथा-संग्रह ‘कटा हुआ सूरज’ प्रकाशित हुए। सन 1993 में हरियाणा के चार कथाकारों के लघुकथा-संग्रह प्रकाश में आए—रामकुमार आत्रेय का ‘इक्कीस जूते’, प्रेमसिंह बरनालवी का ‘देवता बीमार है’, अनिल शूर ‘आज़ाद’ का ‘क्रान्ति मर गया’ तथा दर्शनलाल कपूर का ‘पर्दे के पीछे’। इनमें प्रेमसिंह बरनालवी और अनिल शूर ‘आज़ाद’ के ये दूसरे लघुकथा-संग्रह थे। सन 1994 में विकेश निझावन का ‘दुपट्टा’ और प्रभुलाल मंढ़इया ‘विकल’ का ‘तरकश’ संग्रह प्रकाशित हुए। सन 1995 में हरियाणा के किसी भी कथाकार के किसी लघुकथा-संग्रह के प्रकाशित होने का प्रमाण नहीं मिला; अलबत्ता अगले ही वर्ष सन 1996 में रामनिवास मानव का दूसरा लघुकथा-संग्रह ‘इतिहास गवाह है’ प्रकाश में आया। सन 1997 में हरियाणा के एक और महत्वपूर्ण हस्ताक्षर पृथ्वीराज अरोड़ा का ‘तीन न तेरह’ और सुश्री इंदिरा खुराना का ‘औरत होने का दर्द’ लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुए; जबकि 1998 पुन: जैसे तैयारियों में ही चला गया। परन्तु इसकी खानापूर्ति सन 1999 में आए पूरे 5 लघुकथा-संग्रहों ने कर दी। ये थे—रामकुमार आत्रेय का दूसरा संग्रह ‘आँखों वाले अंधे’, सत्यवीर मानव का ‘केक्टस की छाँव तले’, रोहित यादव का ‘सब चुप हैं’, कृष्णलता यादव का ‘अमूल्य धरोहर’ तथा मधुदीप का ‘मेरी बात तेरी बात’। सन 2000 में बंसीराम शर्मा का ‘खेल ही खेल में’ और रमेश सिद्धार्थ का ‘कालचक्र’ लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुए।
इस प्रकार समकालीन हिंदी लघुकथा के सृजन की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण माने जाने वाले सन 1971 से सन 2000 यानी बीसवीं सदी के अवसान-वर्ष के अंत तक हिंदी लघुकथा साहित्य को अकेले हरियाणा ने लगभग 34 लघुकथा-संग्रहों का योगदान किया। प्रसन्नता और संतोष की बात यह है कि हरियाणा के कई कथाकारों ने संख्यापरक-लेखन की बजाय गुणात्मक-लेखन पर लगातार अपना ध्यान केन्द्रित रखा है और वे इसमें सफल भी रहे हैं।
इक्कीसवीं सदी में भी हरियाणा-आधारित कथाकारों के लघुकथा-संग्रह सन 2001 से ही लगातार प्रकाश में आ रहे हैं और सन 2008 तक ही लगभग 14 लघुकथा-संग्रहों की सूचि हमें प्राप्त होती है। इनके नाम हैं—‘सलीब पर टँगे चेहरे’(सुरेन्द्र कुमार अंशुल, 2001), ‘इधर उधर से’(बीजेन्द्र कुमार जैमिनी, 2001), ‘अपनी अपनी सोच’(संतोष गर्ग, 2001), ‘लुटेरे छोटे छोटे’(सत्यप्रकाश भारद्वाज, 2002), ‘ब्लैक बोर्ड’(मधुकांत, 2002), ‘रोटी का निशान’(सुखचैन सिंह भंडारी, 2002), ‘एक और एकलव्य’(मदनलाल वर्मा, 2002), ‘लघुदंश’(प्रद्युम्न भल्ला, 2003), ‘यह मत पूछो’(रूप देवगुण, 2003), ‘सफेद होता खून’(प्रदीप शर्मा ‘स्नेही’, 2004), ‘उसी पगडंडी पर पाँव’(शील कौशिक, 2004) तथा ‘अपना अपना दुख’(शिवनाथ राय, 2004)। संख्यात्मक दृष्टि से सन 2005, 2006 और 2007 के वर्ष अलग से उभरकर आते हैं। 2005 में ‘आस्था के फूल’(कमल कपूर), ‘फूल मत तोड़ो’(रघुवीर अनाम), ‘प्रसाद’(सुरेन्द्र गुप्त), ‘आज का सच’(जितेन्द्र सूद), ‘हवा के खिलाफ’(सुरेन्द्र कुमार अंशुल), ‘रोशनी की किरचें’(सुधा जैन) और ‘बेदर्द माँ’(विनोद खनगवाल) यानी कुल 7 संग्रह आए; जबकि 2006 में ‘छोटी-सी बात’(रामकुमार आत्रेय), ‘बाज़ार’(अरुण कुमार), ‘कानून के फूल’(पवन चौधरी ‘मनमौजी’), ‘गुलाब के काँटे’(अशोक माधव), ‘सुख की साँस’(शिवनाथ राय) और ‘मानस गंध’(रमेश सिद्धार्थ) सहित कुल 6 संग्रह प्रकाशित हुए। सन 2007 में ‘आओ इंसान बनाएँ’(पृथ्वीराज अरोड़ा), ‘अपने देश में’(हरनाम शर्मा), ‘शुद्धिपत्र’(सुशील शील), ‘भविष्य से साक्षात्कार’(इन्दु गुप्ता), ‘नाविक के तीर’(श्याम सखा श्याम), ‘गांधारी की पीड़ा’(इंदिरा खुराना), ‘चेतना के रंग’(कृष्णलता यादव), ‘मेरी प्रिय लघुकथाएँ’(सुरेन्द्र कृष्ण), ‘पागल कौन’(सुशील डाबर ‘साथी’)—कुल 9 लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुए। सन 2008 में सितम्बर के अंत तक, ‘नींद टूटने के बाद’(मधुकांत), ‘किरचें’(प्रदीप शर्मा ‘स्नेही’), ‘चुप मत रहो’(भारत नरेश) तथा ‘दृष्टि’(उर्मि कृष्ण) प्रकाश में आ चुके थे।
हरियाणा के सत्यपाल सक्सेना, यश खन्ना ‘नीर’, अमृतलाल मदान, महावीर प्रसाद जैन, तरुण जैन, राजकुमार निजात, भगवान प्रियभाषी, तारा पांचाल, कमला चमोला आदि बहुत-से अन्य कथाकार भी लघुकथाएँ लिखते रहे हैं, जिनके एकल लघुकथा-संग्रह अभी तक प्रतीक्षित हैं।
यद्यपि, संख्यात्मक दृष्टि से बहुत-से संग्रहों का आ जाना, किसी साहित्यिक विधा की उपलब्धि नहीं होती; तथापि उपर्युक्त सूचि हरियाणा में लघुकथा-साहित्य के प्रति नवयुवा वर्ग का आकर्षण तो जाहिर करती ही है।
हरियाणा से संपादित प्रमुख लघुकथा-संकलन
लघुकथा-क्षेत्र में लेखन के साथ-साथ हरियाणा राज्य से अखिल भारतीय स्तर पर कुछ ऐसे संकलनों का संपादन भी किया गया, जिन्होंने हिंदी लघुकथा के स्वरूप को निर्धारित करने में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाई।
इस क्रम में, सर्वप्रथम, सुशील राजेश द्वारा सन 1981 में संपादित ‘अक्षरों का विद्रोह’ का नाम लिया जा सकता है। इस संकलन की सबसे बड़ी विशेषता है—रचनाओं का सजगता से चयन और हरियाणा-राज्य के कथाकारों को प्राथमिकता देना। पृथ्वीराज अरोड़ा, महावीर प्रसाद जैन, अशोक जैन, भगवान प्रियभाषी, मधुकांत, अशोक भारती, हरनाम शर्मा, अशोक भाटिया, मधुदीप आदि हरियाणा के अनेक कथाकारों को इस संकलन में प्रमुखता से छापा गया है।
लघुकथा संबंधी अपने शोध-हेतु सामग्री जुटाने के क्रम में शमीम शर्मा द्वारा सन 1982 में लघुकथा-संकलन हस्ताक्षर’ का संपादन किया गया। अपनी काया में यह संकलन—रचना, आलोचना और कोश—तीनों आयामों को समेटे हुए है। इसमें जहाँ 194 कथाकारों की लघुकथाएँ संकलित हैं, वहीं डा पुष्पा बंसल व शमीम शर्मा के उपयोगी लेख भी हैं। इसके परिशिष्टों में 620 लघुकथा-लेखकों की सूचि उनकी एक-एक प्रतिनिधि-लघुकथा के उल्लेख के साथ दर्ज है। इसमें 1982 तक प्रकाशित लघुकथा-संग्रहों की सूचि के साथ-साथ 330 ऐसी पत्रिकाओं की सूचि भी है, जिनमें लघुकथाएँ छपती रही हों।
सन 1988 में रूप देवगुण व राजकुमार निजात के संपादन में ‘हरियाणा का लघुकथा-संसार’ नामक लघुकथा का बहु-आयामी ग्रंथ प्रकाशित हुआ। दस आलेखों, परिचर्चाओं, साक्षात्कारों, प्रतिनिधि व पुरस्कृत लघुकथाओं से सुसज्जित यह संकलन हरियाणा में लघुकथा-लेखन को शिद्दत से रेखांकित करता अपने समय का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
वर्ष 1993 में मुकेश शर्मा द्वारा संपादित ‘लघुकथा : रचना और समीक्षा-दृष्टि’ प्रकाशित हुआ। इस संकलन की सबसे बड़ी विशेषता है—लघुकथा पर विष्णु प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, रामनारायण उपाध्याय, डा कमल किशोर गोयनका व डा हरिश्चंद्र वर्मा जैसे उच्च-स्तरीय लेखकों-आलोचकों से संपादक द्वारा लिया गया साक्षात्कार। रचना-स्तर पर इस संकलन में हरियाणा का प्रतिनिधित्व महावीर प्रसाद जैन, पृथ्वीराज अरोड़ा, कमलेश भारतीय, अशोक भाटिया व मुकेश शर्मा ने किया है।
वर्ष 2005 में अशोक भाटिया द्वारा संपादित ‘निर्वाचित लघुकथाएँ’ संकलन प्रकाशित हुआ। इसमें सन 1876 से 2003 तक के 110 हिंदी कथाकारों की 150 प्रतिनिधि लघुकथाएँ प्रकाशित हुई हैं। रचना-चयन का आधार, संपादक के शब्दों में—‘उस(रचना) का विज़न, संघर्ष और विडंबनाओं के उभार की उसकी क्षमता’ रहा है। पूरे संकलन की रचनाओं को—‘नींव के नायक’, ‘झूठी औरत’, ‘कोई अकेला नहीं’ और ‘खुलता बंद घर’—कुल चार उपशीर्षकों में विभक्त रखा गया है।
अन्य प्रमुख लघुकथा-संकलनों में—‘कितनी आवाज़ें’(सं विकेश निझावन व हीरालाल नागर, 1982), ‘पड़ाव और पड़ताल’(सं मधुदीप, 1988), ‘पेंसठ हिंदी लघुकथाएँ’(सं अशोक भाटिया, 2001) को गिनाया जा सकता है।
(शेष आगामी अंक में)………
लघुकथाएँ
जेबकतरा
ज्ञानप्रकाश विवेक
बस से उतरकर जेब में हाथ डाला। मैं चौंक पड़ा। जेब कट चुकी थी। जेब में था भी क्या? कुल नौ रुपए और एक खत, जो मैंने माँ को लिखा था कि—मेरी नौकरी छूट गई है; अभी पैसे नहीं भेज पाऊँगा…। तीन दिनों से वह पोस्टकार्ड जेब में पड़ा था। पोस्ट करने को मन ही नहीं कर रहा था।
नौ रुपए जा चुके थे। यूँ नौ रुपए कोई बड़ी रकम नहीं थी, लेकिन जिसकी नौकरी छूट चुकी हो, उसके लिए नौ रुपए नौ सौ से कम नहीं होते।
कुछ दिन गुजरे। माँ का खत मिला। पढ़ने से पूर्व मैं सहम गया। जरूर पैसे भेजने को लिखा होगा।…लेकिन, खत पढ़कर मैं हैरान रह गया। माँ ने लिखा था—“बेटा, तेरा पचास रुपए का भेजा हुआ मनीआर्डर मिल गया है। तू कितना अच्छा है रे!…पैसे भेजने में कभी लापरवाही नहीं बरतता।”
मैं इसी उधेड़-बुन में लग गया कि आखिर माँ को मनीआर्डर किसने भेजा होगा?
कुछ दिन बाद, एक और पत्र मिला। चंद लाइनें थीं—आड़ी-तिरछी। बड़ी मुश्किल से खत पढ़ पाया। लिखा था—“भाई, नौ रुपए तुम्हारे और इकतालीस रुपए अपनी ओर से मिलाकर मैंने तुम्हारी माँ को मनीआर्डर भेज दिया है। फिकर न करना।…माँ तो सबकी एक-जैसी होती है न। वह क्यों भूखी रहे?…तुम्हारा—जेबकतरा!
हाथ वाले
महावीर प्रसाद जैन
शो शुरू होने में अभी देर है; और इस तरह के खाली समय का उपयोग भी वह सार्थक ढंग से करता है यानी—फुटपाथ पर बिखरी किताबों के ढेरों को देखना-टटोलना। उसका अनुभव है कि इन फुटपाथी ढेरों में कभी-कभार बड़ी उम्दा किस्म की किताबें हाथ लग जाती हैं। उसके कदम उस परिचित दुकान पर जाकर रुक गए। यह बहुत पुरानी फुटपाथी दुकान है…और इसके मालिक के दोनों हाथ कटे हुए हैं।
दुकानदार उसे देखकर हल्के-से मुसकराया और उसने एक तरफ इशारा किया, जिसका मतलब था कि इस ढेर से आपको कुछ न कुछ मिल जाएगा। वह किताबें देखने लगा। तभी उसकी बगल में एक युवक आकर खड़ा हो गया। उसने उसे एक नजर देखा। वह युवक किताबें छाँटने में लग गया। कुछ देर बाद उसकी नजरें फिर उस युवक की ओर उठीं, और उसने देखा कि एक किताब को बगल में दबाए वह अभी-भी किताबों को उलट-पलट रहा था।
दुकानदार अन्य ग्राहकों को निपटाने में लगा हुआ था कि वह युवक चल दिया। उसने देखा—उसकी बगल में पुस्तक दबी है। बिन पैसे दिये…यानी…ऐसे ही…चोरी? और उसके मुँह से निकल पड़ा—“वह तुम्हारी किताब ले गया है…बिना पैसे दिये…!” उसने जाते युवक की ओर इशारा भी किया।
“मुझे मालूम है भैयाजी…!”
“यार, बड़े अहमक हो!…जब मालूम है, तो रोका क्यों नहीं?”
कुछ देर वह चुप रहा और फिर उसके सवाल का जवाब देते हुए बोला,“हाथ वाले ही तो चोरी कर सकते हैं भैयाजी!”
हिस्से का दूध
मधुदीप
उनींदी आँखों को मलती हुई वह अपने पति के करीब जाकर बैठ गई। वह दीवार का सहारा लिए बीड़ी के कश ले रहा था।
“सो गया मुन्ना?”
“जी,…लो, दूध पी लो।” सिल्वर(एल्यूमीनियम) का पुराना गिलास उसने बढ़ाया।
“नहीं, मुन्ने के लिए रख दो। उठेगा तो…” वह गिलास को माप रहा था।
“मैं उसे अपना दूध पिला दूँगी।” वह आश्वस्त थी।
“पगली, बीड़ी के ऊपर दूध नहीं पीते। तू पी ले।” उसने बहाना बनाकर दूध को उसके और करीब कर दिया।
तभी, बाहर से हवा के साथ एक स्वर उसके कानों में टकराया।
उसकी आँखें खूँटी पर टँगे कुर्ते की खाली जेब में घुस गईं।
“सुनो, जरा चाय रख देना।” पत्नी से कहते हुए उसका गला बैठ गया।
बू
रामकुमार आत्रेय
“एक बात पूछूँ?” युवक ने युवती से पूछा।
“पूछो।” युवती ने उत्तर दिया।
“बुरा मत मानना।”
“नहीं।”
“तुम मुझसे प्यार करती हो न?”
“हाँ, करती हूँ। मगर, यही प्रश्न न जाने कितनी बार तुम मुझसे पूछ चुके हो। क्या तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं होता?”
“होता तो है, पर…”
“पर क्या? साफ-साफ कहो न।”
“तुमने आज तक, कभी मुझे प्यार से ‘राजा’ नहीं कहा। यही बात मुझे परेशान करती है।”
“राजा! मैं समझी नहीं?” युवती ने जानना चाहा।
“हाँ-हाँ, राजा। जैसे हर लड़की अपने प्रेमी को ‘मेरे राजा’ कहकर बुलाया करती है।” युवक भावुक हो उठा था।
“क्या तुम्हारे पूर्वज किसी रियासत की राजगद्दी के मालिक थे,जिनसे उत्तराधिकार के रूप में वहाँ की गद्दी तुम्हें मिल गई हो?” युवती की भौहें कमान का रूप धारण कर चुकी थीं। उसके स्वर में व्यंग्य था।
“नहीं तो; लेकिन, तुम्हारे दिल की रियासत का राजा तो हूँ ही न। मैंने तुम्हें कभी भी रानी से कम नहीं माना। समझी?”
“समझ गई। आज सब-कुछ समझ गई। मुझे तुम्हारे पास आते ही, एक विशेष प्रकार की बू आने लगती थी; लेकिन वह बू किस चीज की है, समझ नहीं पा रही थी। अब मालूम हुआ कि बू तुम्हारे भीतर बैठे निरंकुश स्वामित्व के विचार की है!”
“मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि तुम क्या कह रही हो?” अबकी बार युवक उलझन में था।
“सुनो, पुरुष आज भी उसी सामन्ती-युग में जी रहा है, जहाँ वह हर वस्तु पर अपना एकमात्र अधिकार समझता था। औरत भी उसके लिए एक वस्तु-मात्र होती थी। इसलिए प्यार के मामले में वह अपने आपको ‘राजा’ कहलाना पसंद करता था। औरत को ‘रानी’ कहकर लूटता रहता था। मैं तुम्हें ऐसे पुरुषों से भिन्न समझती थी, लेकिन मेरे लिए न तो कोई ‘राजा’ है, और न ही मैं किसी की रानी हूँ। सभी बूओं में यदि कोई खतरनाक है, तो वह है—सब-कुछ पर स्वामित्व पा लेने की बू।… मैं तो इस बू को कभी सहन नहीं कर सकती।”
युवक हतप्रभ-सा वहीं बैठ गया। युवती अपने घर लौट चुकी थी।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
अशोक भाटिया
उसके पिता ने उसे पढ़ाया नहीं था।
उसने सोचा—मैं अपने बच्चों को जरूर पढ़ाऊँगा।
उसने अपने बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिलाया।
एक दिन बच्चे ने किताबों की माँग की।
दूसरे दिन बच्चे ने स्कूल-ड्रेस की माँग की।
तीसरे दिन बच्चे ने फीस की माँग की।
वे फसल की कटाई के दिन थे। पिता ने कहा—बेटा, फसल मंडी में बिकेगी, तभी मजूरी मिल पायेगी।
मजबूर बेटा पिता का हाथ बँटाने लगा।
एक दिन पाठ याद न होने पर बच्चे को सज़ा मिली।
दूसरे दिन स्कूल-ड्रेस न होने पर बच्चे को घर भेज दिया गया।
तीसरे दिन फीस न भरने पर उसका नाम काट दिया गया।
वह बच्चा फिर कभी स्कूल नहीं गया।
जब वह बड़ा हुआ, तो उसने सोचा—मैं अपने बच्चों को जरूर पढ़ाऊँगा।
डर
अशोक जैन
वह कभी काफी सालिड रहा है, किन्तु अब?
दिल्ली महानगर:
भीड़-भरे इलाके के चौराहे पर जब तीन ओर से आ रही बसों से कुचले जाने का उसका प्रयास असफल रहा, तो वह बौखला उठा। उसने मौत को एक भद्दी-सी गाली दी थी—हरामजादी! जिसे जरूरत है, उसके पास फटकती नहीं; और जो इसके साये से दूर-दूर रहता है, उसे खट-से दबोच लेती है।
अगले रोज़:
अखबार में, शहर में चल रही सर्कस का विज्ञापन पढ़कर उसे लगा कि अब वह मर सकेगा। विज्ञापन था—मौत के कुएँ में मोटर-साइकिल चलाने के लिए ट्रेनीज़ की आवश्यकता है।
…आज वह एक सिद्धहस्त चालक माना जाने लगा है। कई कम्पनियों ने उसे पुरस्कृत भी किया है। वह अब मरना नहीं चाहता। मौत उसकी दहलीज़ पर डेरा डाले बैठी है।
वह डरा-डरा-सा रहने लगा है।
कराहटें
विकेश निझावन
बूढ़ी सास बार-बार कराह रही थी—“अरे, कोई है…एक गिलास पानी ही दे दो…।”
सास की आवाज़ को अनसुना कर बहू ने बेटे को पढ़ाना शुरू कर दिया—“टू वन्ज़ आर टू, टू टूज़ आर फ़ोर…।”
सास के कराहने की आवाज़ पुन: आई तो बहू ने अपना स्वर और ऊँचा कर लिया—“टू वन्ज़ आर टू, टू टूज़ आर फ़ोर!”
बार-बार दादी की कराहटें सुन पोता बोल उठा,“मम्मी, दादी…!”
“तो तुम्हारा ध्यान टेबल्ज़ की तरफ़ है ही नहीं! अगर इस बार तेरे नाइन्टी परसेंट नम्बर न आए तो देख…मैं तेरी जान ले लूँगी।” कहते हुए मम्मी ने कसकर उसका कान मरोड़ा।
पोते की चीख सुनकर दादी ने कराहना बंद कर दिया था।

Thursday, 25 September 2008

हरियाणा का हिंदी लघुकथा लेखन / डा॰ अशोक भाटिया


मित्रो,
‘जनगाथा’ के इस सितम्बर, 2008 अंक से हिंदी लघुकथा के समर्थ हस्ताक्षर डा अशोक भाटिया के शोधपरक लम्बे लेख ‘हरियाणा का हिंदी लघुकथा-लेखन’ को प्रकाशित किया जा रहा है। लेख के समापन तक तदनुरूप लघुकथाओं का चयन भी हरियाणा-केन्द्रित ही रखने का प्रयास रहेगा। -बलराम अग्रवाल

हरियाणा का हिंदी लघुकथा-लेखनडा अशोक भाटिया
‘लघुकथा’ एक ऐसी कथा-रचना है, जिसका फलक और आकार ‘कहानी’ से छोटा है। भारत सहित विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में लघुकथाएँ लिखी गई हैं और लिखी जा रही हैं। अरबी में खलील जिब्रान और फारसी में शेख सादी की लघुकथाएँ विश्व-प्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार जर्मन में बर्तोल्त ब्रेख्त, रूसी में इवान तुर्गनेव, अंग्रेजी में कार्ल सैंडबर्ग, चीनी में लू शुन और उर्दू में इब्ने इंशा व सआदत हसन मंटो की लघुकथाएँ विशेष रूप से चर्चित हैं। भारतीय भाषाओं में बांग्ला में रवीन्द्रनाथ टैगोर व बनफूल, मलयालम में एस के पोट्टेक्काट, मराठी में वि स खांडेकर, पंजाबी में श्याम सुंदर अग्रवाल व श्याम सुंदर दीप्ति, उर्दू में जोगिन्दर पाल और गुजराती में मोहनलाल पटेल की लघुकथाएँ महत्वपूर्ण हैं। किंतु हिंदी लघुकथा-साहित्य भारतीय भाषाओं में सबसे अधिक ध्यान खींचता है। डा लक्ष्मीनारायण लाल ने ‘हिंदी साहित्य कोश’(भाग 1) में लिखा है: “आधुनिक कहानी के संदर्भ में लघुकथा का अपना स्वतंत्र महत्व एवं अस्तित्व है। प्रेमचंद, प्रसाद से लेकर जैनेन्द्र, अज्ञेय तक इस धारा की शक्तिशाली गति है।”
हरियाणा के ख्याति-प्राप्त लेखक विष्णु प्रभाकर अपने लघुकथा-संग्रह ‘कौन जीता कौन हारा’(1989) की भूमिका में लिखते हैं—“जब मैंने लिखना शुरू किया था तो सर्वश्री जयशंकर प्रसाद, सुदर्शन, माखनलाल चतुर्वेदी, उपेन्द्रनाथ अश्क, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, जगदीश चन्द्र मिश्र, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, रावी और रामनारायण उपाध्याय आदि सुप्रसिद्ध सर्जक इस क्षेत्र में भी सक्रिय थे।” आदरणीय विष्णु जी के इस कथन से हिंदी लघुकथा की मजबूत पृष्ठभूमि का पता चलता है।

हिंदी लघुकथा : पृष्ठभूमिजब कोई साहित्य-रूप अपने समय की सच्चाइयों का जीवंत दस्तावेज़ होने के साथ ही अपनी स्वतंत्र शैली भी विकसित कर लेता है, तो उसकी स्वतंत्र पहचान स्वयं बन जाती है। हिंदी लघुकथा ने भी अपनी एक संक्षिप्त ही सही, सुदृढ़ यात्रा तय की है तथा वस्तु और शिल्प—दोनों दृष्टियों से अपनी साहित्यिक-उपयोगिता का अनुभव कराया है।
‘छत्तीसगढ़ मित्र’(वर्ष 2, अंक 4, सन 1901) में प्रकाशित पं माधवराव सप्रे(1871-1926) की रचना ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को हिंदी की पहली लघुकथा माना जाता है। इसके बाद प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, सुदर्शन, उपेन्द्रनाथ अश्क आदि की लघुकथाएँ मिलती हैं। 1947 के बाद और आठवें दशक से पहले हिंदी में ‘समकालीन तेवर वाली लघुकथा’ की एक धारा बननी प्रारम्भ हो गई थी। इस अवधि में आनंद मोहन अवस्थी, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, रामनारायण उपाध्याय, अयोध्या प्रसाद गोयलीय, रामप्रसाद विद्यार्थी ‘रावी’ और श्यामनंदन शास्त्री, भृंग तुपकरी आदि द्वारा रचित प्राय: बोध-वृत्ति से युक्त ‘लघुकथात्मक’ संग्रह प्रकाशित हुए। इसी अवधि में हरियाणा के लब्ध-प्रतिष्ठ रचनाकार विष्णु प्रभाकर का लघुकथा-संग्रह ‘जीवन पराग’(1963) प्रकाशित हुआ।
आठवें दशक में हिंदी लघुकथा एक सहज आंदोलन के रूप में सामने आई, जिसमें मुख्य रूप से तत्कालीन युवा-पीढ़ी के आक्रोश को सशक्त अभिव्यक्ति मिली। इसमें हरियाणा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। कमलेश्वर के संपादन में जुलाई 1973 का ‘सारिका’ का लघुकथा-विशेषांक लघुकथा के इतिहास में मील का पत्थर सिद्ध हुआ; लेकिन इसके आसपास हरियाणा से लघुकथा के दो अति-महत्वपूर्ण विशेषांक आ चुके थे। पहला, इससे पहले मई 1973 में महावीर प्रसाद जैन के संपादन में ‘दीपशिखा’ का लघुकथा-विशेषांक कैथल से; तथा दूसरा, इसके तुरंत बाद अगस्त 1973 में रमेश बतरा के संपादन में कहानी लेखन महाविद्यालय, अंबाला छावनी की मासिक पत्रिका ‘तारिका’ का लघुकथा-विशेषांक। इस प्रकार समकालीन तेवर के लघुकथा-लेखन की स्थापना में हरियाणा का योगदान ऐतिहासिक महत्व का रहा है। तब से अब तक लघुकथा के लेखन, संपादन और समीक्षण—तीनों ही क्षेत्रों में हरियाणा निरंतर सक्रिय है। इन दिनों प्रमुखत: ‘हरिगंधा’(पंचकूला), ‘हरियाणा संवाद’(चंडीगढ़) और ‘शुभ तारिका’(अम्बाला छावनी) पत्रिकाएँ लघुकथा के विकास में अपनी भूमिका सकारात्मक रूप में निभा रही हैं। हरियाणा साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका ‘हरिगंधा’ का प्रवेशांक 1987 में आया था, जिसमें अशोक भाटिया(करनाल) की लघुकथाएँ और नंदलाल मेहता(गुड़गाँव) का ‘लघुकथा का शिल्प’ शीर्षक लेख शामिल था। तब से अब तक, अपने लगभग हर अंक में यह पत्रिका लघुकथा को समुचित सम्मान दे रही है। ‘हरिगंधा’ का जुलाई 2007 अंक लघुकथा-विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ। ‘तारिका’(पिछले काफी समय से ‘शुभ तारिका’) नियमित रूप से लघुकथाएँ प्रकाशित करती आ रही है। लघुकथाओं को प्रमुखता के साथ प्रकाशित करने वाले, किंतु अब स्थगित हो चुके पत्र-पत्रिकाओं में ‘पींग’(रोहतक, संपादक: डी आर चौधरी), विश्वमानव(करनाल, संपादक: ---), ‘आगमन’(रेवाड़ी, संपादक: तरुण जैन) और ‘राही’(गुड़गाँव, संपादक: मुकेश शर्मा) प्रमुख हैं। इनमें ‘आगमन’ का 1985 में प्रकाशित लघुकथा-विशेषांक और ‘राही’ का 1986 में प्रकाशित लघुकथा-समीक्षा अंक ध्यान आकर्षित करते हैं। कुरुक्षेत्र से प्रकाशित ‘कुरुशंख’ पत्रिका का 1980 में, शमीम शर्मा के अतिथि-संपादन में लघुकथा-विशेषांक आया और अपने अखिल भारतीय स्वरूप के कारण देशभर में चर्चित रहा। अंबाला छावनी से अगस्त 2002 व सितंबर 2005 में उर्मि कृष्ण के संपादन में ‘तारिका’ के अंक भी लघुकथा-विशेषांक के रूप में सामने आए। (शेष आगामी अंक में)………

लघुकथाएँ

अमरतापूरन मुद्गल
इमली का वह पेड़ कब और किसने लगाया था, किसी को मालूम नहीं है। स्कूल के आँगन में खड़ा वह पेड़ बच्चों के लिए विशेष आकर्षण बना रहता था। जब इमली की फलियाँ लगतीं, तो बच्चे उन्हें तोड़ने के लिए उस पर चढ़ जाते और चटखारे लेकर उनकी खटाई का आनन्द लेते। चपरासी ने पेड़ के साथ घण्टी बाँध रखी थी। जब किसी लड़के को घण्टी बजाने के लिए कहा जाता तो वह घण्टी बजाने से पहले पेड़ के नीचे चारों ओर नजर घुमाता और उसे कहीं कोई फली नजर आ जाती, तो मुँह में डाल लेता।
हर वर्ष स्कूल में नए बालक प्रवेश लेते और पुराने परीक्षा पास करके स्कूल छोड़ जाते। इमली के पेड़ से नए बच्चों का रिश्ता स्थापित हो जाता और पुरानों का टूट जाता।
इस बार गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुला, तो मैंने देखा कि इमली का पेड़ सूख गया है। माली ने छोटी-बड़ी सब टहनियाँ काट दी हैं और केवल तना शेष रह गया है। कुछ ही दिनों में उसे भी काटकर गिरा दिया जाएगा। चपरासी ने तने से बँधी घण्टी उतार ली थी और उसे बरामदे में कील के सहारे लटका दिया था।
रविवार को छुट्टी थी, लेकिन मैं किसी कार्यवश स्कूल गया था। सूखे तने के पास ही इमली का एक बीज अंकुरित हो गया था। माली उसके चारों ओर बड़ी सावधानी से ईंटों की बाड़ खड़ी कर रहा था। मैं उस अंकुर को टकटकी बाँधकर देख रहा था। मुझे लगा, जैसे वह अंकुर बड़ा पेड़ बन गया है…चपरासी ने उसके तने के साथ घण्टी बाँध दी है और लड़के उस पर चढ़ गये हैं और असंख्य हरी-पीली पत्तियों में लटकी फलियों को तोड़ रहे हैं।…अचानक, एक दिन वह पेड़ ठूँठ में बदल जाता है। पास ही उस पेड़ से गिरा एक बीज अंकुरित हो रहा है।…और फिर पेड़…और फिर अंकुर…

दयापृथ्वीराज अरोड़ा
दसवीं क्लास का हिंदी का अध्यापक, जो अपने रहन-सहन, उच्च-आचरण और दयाभाव के लिए स्कूल-भर में विख्यात था, नयी क्लास को संबोधित कर रहा था—
“जीवन में सादे रहन-सहन और उच्च-आचरण से दयाभाव का महत्व कहीं ज्यादा है। असल में, जिसमें दयाभाव नहीं है, वह आदमी कहलाने का हकदार नहीं है। राजकुमार गौतम एक दिन घूमते हुए दूर तक निकल गये। एक जगह एक मछुआ मछलियों को जाल में फाँसकर किनारे पर रखे बरतन में फेंक रहा था। वह कुछ पल मछुए द्वारा पकड़ी गई मछलियों को, जो बिना पानी के तड़प रही थीं, देखते रहे; फिर मछुए से पूछा, “इन मछ्लियों का क्या करोगे?”
मछुए ने जवाब दिया, “बाजार में बेचूँगा।”
“कितने की बिक जायेंगी?” राजकुमार का अगला प्रश्न था।
“यही कोई चार या पाँच रुपये की।”
राजकुमार ने सोने की अपनी अँगूठी मछुए को देकर सारी मछलियाँ ले लीं और उन्हें दोबारा पानी में फेंक दिया। राजकुमार के दयाभाव से हमें सीख लेनी चाहिए।”
एक लड़का उठा।
“कुछ कहना चाहते हो?”
“हाँ श्रीमान!”
“कहो!”
“मैं एक मछुए का बेटा हूँ। मेरा बाप हर रोज मछलियाँ पकड़कर बेचता है। लगभग हर रोज, कुछ मछ्लियाँ बच जाती हैं और किसी अन्य सब्जी के स्थान पर हमें मछली खानी पड़ती है। जब मछलियों को छीला जाता है, तो मेरे मन में कुछ होने लगता है। कल रात मैंने खाना खाने से इंकार कर दिया, क्योंकि मैंने मछली के बजाय किसी दूसरी सब्जी की माँग की थी; परन्तु मेरे माँ-बाप ने मेरी प्रार्थना पर कोई ध्यान नहीं दिया और उल्टे डाँट दिया। मैं भूखा ही सो गया। आधी रात को मेरी नींद खुली। मुझे बेहद भूख लगी थी। ऐसा लग रहा था कि अगर मैंने खाना नहीं खाया तो प्राण निकल जायेंगे। मेरे लिए उन मछलियों को खाने के सिवा कोई चारा न था।”
लड़के का कंठ भारी हो गया। उसने अध्यापक की ओर रुआँसी आँखों से देखा।
अध्यापक ने लड़के द्वारा कही गई सच्चाई पर सोचा। फिर अपनी मोटी-मोटी किताबों को बगल में दबाए, लड़के के पास आया…और उसके कंधे थपथपाकर कक्षा के बाहर हो गया!

चेतनामधुकांत

हल्का होना भी तो अनिवार्य है। पत्नी पर बस न चले, तो नौकर पर…चाहे किसी पर भी।
गोदाम में आए, तो सेठ जी ने पल्लेदार पर ही हल्का हो लेना चाहा—
“अरे हरामजादे हरकू…अकल मारी गई तेरी…देखता नहीं, सारा अनाज धरती में गिरता जा रहा है!”
“क्या करूँ सेठ जी, बोरी फटी हुई है।” नम्रता से उत्तर दिया गया।
“अबे गधे, हाथ क्यों नहीं लगा लेता? गल जाएगा क्या। शाम को चार रुपये के लिए तो हाथ बड़ी जल्दी फैला देगा और काम धेले का नहीं…” स्वर पहले से अधिक कर्कश हो गया था।
जमीन ही कम थी जो पल्लेदारी करनी पड़ती थी। बोझ से निकलकर नजर सेठ की तोंद का परिमाप नापने लगी…हर साल बढ़ता है, लेकिन वह अनाज पैदा करके, सिर पर उठाकर भी अपने अन्दर सिकुड़ता जा रहा है।
“अरे, रुक क्यों गया पाजी, देखता नहीं—बादल चढ़ आये हैं। जल्दी माल उतार।” बादलों की गरज से सेठ का स्वर दब गया था।
“अब मुझसे नहीं उठती बोरी, सेठ जी।”
वहीं उतार दिया हरकू ने बोझ को।
“नहीं उठती…क्यों? क्या हुआ? मेरा सारा माल खराब हो जाएगा…चल, तुझे शाम को एक रुपया फालतू दूँगा…जल्दी कर।” लालच फेंका सेठ ने।
“नहीं सेठ जी, मुझे भी जाकर अपनी छत को ठीक करना है। सारी चूती है।”
“अबे, रोटी कहाँ से खाएगा…?”
“रोटी तो मैं ही पैदा करता हूँ।” कहकर हरकू बाहर निकल गया। पानी गिरने लगा। सेठ ने बहुत लालच दिया, पर कोई मजदूर काम पर नहीं आया।
सामने, गरीब बस्ती में, मजदूर अपनी छतों पर मिट्टी चढ़ा रहे थे।
वर्षा तीव्र होती जा रही थी।

ज्योति चौकप्रेमसिंह बरनालवी

“कमाल करती हो जी! रात का मतलब यह तो नहीं कि मुँह-माँगे पैसे दे दूँ!! शहर अपना है। कल तक हम यहाँ कच्छे-बनियान में घूमने आ जाते थे।”
“अब तुम बच्चे नहीं, बल्कि एक बच्चे के बाप हो।”
“हमारे पास कौन सा सामान है जो…। बस, पाँच-सात मिनट का रास्ता है।”
“आधी रात के उस सन्नाटे में थोड़ी दूर चलने के बाद उसे लगा—जान बड़ी और पैसा छोटा। शहर उसका नहीं, पुलिस वालों का(नहीं, वे लोग तो खुद जान बचाते नजर आते हैं), आतंकवादियों का या अपने ही बनाए अँधेरे से भयभीत भगवान का।”
शास्त्री मार्किट के चौराहे से करीब सौ गज पहले उन्हें किसी के तेज कदमों की आहट सुनाई दी।
“अजी, दो पगड़ी वाले!” पत्नी ने भयातुर स्वर में कहा।
“रुको मत…और तेज…” कहते पति का जैसे कण्ठ सूख गया। पाँवों में जैसे किसी ने अचानक बेड़ियाँ डाल दी हों।
“अजी, वो आवाज दे रहे हैं!”
“चुप!”
“यदि गोली मार दी?”
क्षण सोच पुरुष ने कहा, “ऐसे मरने से क्यों न अपनी बात कहकर…शायद उन्हें तरस आ जाए। अच्छा…रुक ही जाएँ।”
पीछा करने वाले करीब पहुँच चुके थे।
एक—“भाईसाहब, आप घबराइये मत्। हमें एन बी चौक तक जाना है। आजकल सी आर पी तैनात है…सोचा, आप लोग रहेंगे तो हमें…”
उनकी जैसे जान में जान आई। पुरुष ने कहा,“हमे भी ज्योति चौक तक जाना है। अपनी पुलिस से हमें भी डर लगने लगा है। आप लोगों को…”

आगरामनिवास मानव
मौहल्ले में आग लग गई थी।
वह यह सोचकर निश्चिन्त था कि आग बहुत दूर है तथा उसका घर पूर्णतया सुरक्षित है।
आग कुछ नज़दीक आ गई तो वह थोड़ा चिन्तित हुआ; लेकिन कुछ करने की आवश्यकता उसने अब भी नहीं समझी।
आग उसके पड़ोसी के घर तक आ गई, तब भी वह हाथ-पर-हाथ धरे बैठा रहा।
‘पड़ोसी के लिए वह अपने हाथ क्यों झुलसाए?’—मन-ही-मन वह सोचता है।
अब जलने की बारी उसके घर की थी। आग बुझाने के लिए वह कुछ कर पाता, इससे पूर्व ही, आग उसके घर को राख में बदलकर अगले घर तक जा पहुँची थी।



धर्म की लपेटसुरेन्द्र वर्मा

एक बाप के चार लड़के थे। वे बड़े भोले, ईमानदार और सच्चे थे। उनका पिता उन्हें विद्वान बनाना चाहता था, इसलिए उसने अपने लड़कों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए अलग-अलग जगह भेजा—
पहला—मन्दिर में।
दूसरा—मस्जिद में।
तीसरा—गिरजे में।
चौथा—गुरुद्वारे में।
शिक्षा लेने के बाद वे अपने-अपने धर्म के विद्वान बन गये। विद्या लेने के बाद चारों अपने घर वापस आ गये और अपने पिता को अपने-अपने धर्म के बारे में बताकर पूछने लगे—“बोलो बापू, कौन-सा धर्म अच्छा है?”
बापू ने कहा, “सभी धर्म अच्छे हैं बच्चो!”
“नहीं, तुम्हें एक धर्म को अच्छा बताना ही पड़ेगा। नहीं तो…”
“नहीं तो…क्या?”
“नहीं तो… हम तुम्हें मार देंगे।“
और फिर, चारों ने अपने बापू का खून कर दिया।

दूसरा सचरूप देवगुण
घर के सभी सदस्य कमरे में बैठे गप्प-शप्प मार रहे थे। अचानक, पड़ोसी जवान लड़के—सुजीत का प्रसंग छिड़ गया।
पिता ने कहा, “कितना अच्छा है सुजीत! हमारे घर के सारे काम-काज सहर्ष कर देता है।”
माँ बोली, “कितना भला है सुजीत, कई बार जेब से पैसे लगा देता है और बहुत कहने पर भी वापिस नहीं लेता।”
मुन्ना भी रह न सका,“सचमुच, सुजीत बहुत ही प्यारा है। मुझे कई बार खिलौने भी ला देता है।”
बड़ी बेटी, जो पास बैठी चुपचाप सारी बातें सुन रही थी, उठकर कमरे से बाहर चली गई। वह जानती थी कि इन सब कामों के बदले में वह उससे बहुत-कुछ प्राप्त करने की कोशिश करता रहता है।

Friday, 15 August 2008

जनगाथा अगस्त 2008


‘जनगाथा’ की ओर से समस्त भारत-प्रेमियों को भारतीय-स्वाधीनता के 62वें पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
लघुकथा-समीक्षा के मानदण्ड
उमेश महादोषी

कथा-साहित्य में लघुकथा, जो कि विकासशील सम्भावनाओं के कारण एक विशिष्ट कथा-विधा के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है, सम्पूर्ण समीक्षा के मानदण्डों के अभाव से अभी भी जूझ रही लगती है। लघुकथा की अपनी विशेष पहचान है, अपना स्वभाव, अपनी प्रवृत्ति है जो कहानी से सर्वथा भिन्न है। परन्तु उसकी समीक्षा के जो मानदण्ड अब तक सामने आये हैं वे या तो प्रमुखत: कहानी के हैं या मात्र संरचनात्मक तत्वों की समीक्षा तक सीमित होने के कारण आधे-अधूरे हैं। इसलिए जरूरी है कि लघुकथा की सम्पूर्ण समीक्षा के मानदण्ड निर्धारित हों।
एक रचना-विधा की समीक्षा के मानदण्ड दूसरी रचना-विधा के मानदण्डों से अलग होते हैं। अत: विधा-विशेष की समीक्षा के मानदण्डों को अलग से पहचानने के लिए उन्हें रचना-सृजन की कसौटी को दृष्टिगत रखते हुए तीन विभागों में रेखांकित किया जा सकता है:
(1) रचना का विधागत-स्वभाव
(2) उसके संरचनात्मक तत्व, तथा
(3) रचना की वैचारिक यात्रा
यद्यपि उपर्युक्त तीनों विभागों के अन्तर्गत किसी न किसी अर्थ में रचना के संरचनात्मक तत्वों की ही समीक्षा होती है, क्योंकि विधागत स्वभाव और वैचारिक यात्रा को रचना के संरचनात्मक तत्वों से पूर्णत: अलग नहीं किया जा सकता। तथापि रचना को इन तीनों समीक्षा-विभागों में रखकर उसकी सम्पूर्ण विशिष्टता के साथ अधिक गहराई तक परखा जा सकता है।
हर विधा का अपना स्वभाव-विशेष होता है जिसके आधार पर रचना-विशेष को विधा-विशेष की श्रेणी में रखा जाता है। यह स्वभाव रचना की मान्य विशिष्ट प्रवृत्तियों, उसके आकार एवं शिल्पगत तत्वों आदि से सम्बन्धित हो सकता है। समीक्षक को विधा-विशेष की रचना में इन सबकी उपस्थिति की समीक्षा करनी होती है। दूसरे विभाग के अन्तर्गत संरचनात्मक तत्वों के निर्धारण, संयोजन, समन्वयन और उनकी प्रकृति की समीक्षा शामिल है। समीक्षक को देखना चाहिए कि समस्त आवश्यक संरचनात्मक तत्वों का समुचित निर्धारण व संयोजन तथा उनमें परस्पर उपयुक्त समन्वय है या नहीं। उन तत्वों की प्रकृति क्या है? अर्थात वे स्वाभाविक, प्रभावोत्पादक, मान्य व ग्राह्य हैं या नहीं। तीसरी समीक्षा रचना की वैचारिक यात्रा की करनी होती है। देखना होता है कि रचना की वैचारिक जमीन क्या है? वह जीवन के कितनी निकट है। रचना की वैचारिक-यात्रा काल और स्थान के परिप्रेक्ष्य में गतिशील होती है। एक अच्छी रचना से अभिजात्यता से इतर हर हाल में सृजनात्मकता की अपेक्षा की जाती है।
जहाँ तक यथार्थ का प्रश्न है, वह दो प्रकार का है। एक वह, जो है और दूसरा वह, जो होना चाहिए। प्रत्येक विवेकशील समीक्षक को रचना-समीक्षा के दौरान ‘जो है’ से ‘जो होना चाहिए’ तक की यात्रा अनिवार्यत: तय करनी चाहिए।

लघुकथाएँ

हलराजगोपाल सिंह

“ओफ्फोह, तुम्हें कितनी बार समझाया है कि जब दो बड़े लोग आपस में बातें कर रहे हों तो…ठहरो, लो तुम इन टुकड़ों को जोड़कर लाओ। ये टुकड़े भारतवर्ष के नक्शे के हैं, समझी।”
रामप्रसाद ने चैन की साँस ली, हमने भी। चलो, कुछ देर के लिए बला टली। न टुकड़े जुड़ेंगे और न…। हम फिर सांप्रदायिकता की समस्या को सुलझाने में जुट गये।
लेकिन हमें आश्चर्यचकित हो जाना पड़ा, जब मात्र दस मिनट बाद ही रामप्रसाद की बिटिया ने मानचित्र के उन टुकड़ों को जोड़कर हमारे सामने रख दिया।
“अरे, तुमने इतनी जल्दी इन टुकड़ों को कैसे जोड़ लिया?” रामप्रसाद ने पूछा।
“देखिए पापा, इस नक्शे के पीछे एक आदमी की फोटो बनी है…हम उसके नाक, कान, हाथ, पैर जोड़ते गये और बस्…नक्शा बन गया।”
बिटिया की मासूम हँसी हमारे भीतर पैठ रही थी और हम दोनों एक दूसरे को विस्मय से देख रहे थे।

अंतिम गरीब
जगदीश कश्यप

दरबान ने आकर बताया कि कोई फरियादी उनसे जरूर मिलना चाहता है। उन्होंने मेहरबानी करके भीतर बुलवा लिया। फरियादी झिझकता-झिझकता उनके दरबार में पेश हुआ तो वे चौंक पड़े। उन्हें आश्चर्य हुआ कि वह वहाँ कैसे आ गया! फिर यह सोचकर कि उन्हें भ्रम हुआ है, उन्होंने पूछ लिया—“कौन हो?”
“मैं गरीबदास हूँ सरकार।”
“गरीबदास! तुम? तुम्हें तो मैंने दफन कर दिया था!!”
“भूखे पेट रहा नहीं गया माई-बाप। इसलिए उठकर चला आया।”
“अब क्या चाहते हो?”
“कुछ खाने को मिल जाए हुजूर्।”
“अभी देता हूँ।” उसे आश्वासन देकर उन्होंने सामने दीवार पर टँगी अपनी दुनाली उतार ली,“यह लो खाओ…!”
दुनाली ने दो बार आग उगल दी। गरीबदास वहीं ढेर हो गया।
“दरबान, इसे लेजाकर दफना दो। इस कमीने ने तो तंग ही कर दिया है…।”

दूसरे दिन जब वह गरीबी-उन्मूलन के प्रारूप को अंतिम रूप दे रहे थे तो दरबान हड़बड़ाया हुआ-सा उनके कमरे में जा घुसा। उसकी घिग्घी बँधी हुई थी।
“मरे क्यों जा रहे हो?” उन्होंने डाँटा।
“हुजूर-हुजूर…” दरबान ने भयभीत आँखों से बाहर द्वार की ओर संकेत करते हुए कहा, “वही फरियादी फिर आ पहुँचा है…!!!”

मैं वही भगीरथ हूँ
शरद जोशी
मेरे मोहल्ले के एक ठेकेदार महोदय अपनी माता को गंगा-स्नान कराने हरिद्वार ले गये। गंगा के सामने एक धर्मशाला में ठहरे। सोचा, किनारे तक टहल आएँ। वे आये और गंगा-किनारे खड़े हो गये। तभी उन्होंने देखा कि एक दिव्य-पुरुष वहीं खड़ा एकटक गंगा को निहार रहा है। ठेकेदार महोदय उस दिव्य व्यक्तित्व से बड़े प्रभावित हुए। पास गये और पूछने लगे—“आपका शुभ नाम?”
“मेरा नाम भगीरथ है।” उस दिव्य पुरुष ने कहा।
“मेरे स्टाफ में ही चार भट भगीरथ हैं। जरा अपना विस्तार से परिचय दीजिए।”
“मैं वही भगीरथ हूँ जो वर्षों पूर्व इस गंगा को यहाँ लाया था। उसे लाने के बाद ही मेरे पुरखे तर सके।”
“वाहवा, कितना बड़ा प्रोजेक्ट रहा होगा! अगर ऐसा प्रोजेक्ट मिल जाए तो पुरखे क्या, पीढ़ियाँ तर जाएँ।”

गरीबा
आनंद बिल्थरे

“तुम कौन हो?” सरपंच ने पूछा।
“गरीबा।” उसने उत्तर दिया।
“तुम कैसे हो सकते हो? उसकी तो मौत नहर में डूबने से हो चुकी है!” सरपंच ने अचरज-से कहा।
“सरपंच जी, मैं गरीबा ही हूँ। इसी गाँव का जन्मा। मैं यहाँ हर एक को जानता हूँ।”
“हर एक को जानने से तो साबित नहीं होता कि तुम ही गरीबा हो।”
“हुजूर, मैं तीरथ यात्रा पर गया था। रास्ते में रेल दुर्घटना हो गयी। मैं कई दिनों तक जिन्दगी और मौत की लड़ाई देखता रहा। इसी में मेरी आँख और टाँग जाती रहीं।”
“लेकिन तेरी लाश की शिनाख्त चारों पंचों ने मिलकर की है…इसलिए तू सरकारी रिकार्ड के मरा जान लिया गया है।”
“माई-बाप मेरा घर, मेरे खेत…।”
“तुम्हारा नहीं, उस गरीबा का, जो तीर्थ जाने से पूर्व अपना सब-कुछ पंचायत को दान कर गया था।”
“हुजूर, मुझे मरा मान लिया जावे, लेकिन मेरी जायदाद को तो वापिस लौटा दिया जाए।”
“यह कैसे हो सकता है? उस घर में अब बालबाड़ी लगती है…खेत पंचायत की मिल्कियत हैं।”
“मैं बेमौत मर जाऊँगा सरकार!”
“देखो, हमें गरीबा की मौत का दुख है। उसका क्रिया-कर्म भी हमने निपटा दिया है। पंचायत को दान करने वाले गरीबा का फोटो मँढ़वाकर पंचायत-भवन में टाँग दिया है। तुम न जाने कौन हो, जो अपने को गरीबा बताकर उसके पुण्य को कम करना चाहते हो?”
“साहब, मैं ही गरीबा हूँ और मैंने कोई दान नहीं दिया है।”
“तुम जरूर बहुरूपिये हो। गरीबा के भेष में हमें डराना चाहते हो।”
“तुम सब अंधे युग के दुर्योधन हो…जब भगवान कृष्ण तुमको नहीं समझा सके तो मैं तो एक साधारण आदमी हूँ…।”
सरपंच के हुक्म से उसे खदेड़कर गाँव से बाहर कर दिया गया। दूसरे दिन उन्हें खबर मिली कि नामालूम आदमी ने पहाड़ी वाले कुएँ में कूदकर जान दे दी। उन्होंने जाकर देखा। लाश देखकर वे होठों ही होठों में मुस्कराये और घर आकर वारदात की तहरीर के साथ सौ-सौ के पाँच नोट नत्थी कर कोतवाली भिजवा दिये।

वे चेहरेदेवीप्रकाश हेमंत
बेहद शौक है मेरी बेटी दीप्ति को अखबार पढ़ने का। एक दिन वह दौड़ी-दौड़ी आई और बोली—“पापा-पापा, देखिए तो…अखबार में छपा है कि विदेश में एक ऐसा पेड़ होता है जिसके नीचे खड़े हो जाएँ तो उसकी पत्तियाँ हमारा सारा खून चूस लें।”
“अरे बेटी, तू पेड़ की बात करती है! वे तो एक ही बार में पूरा खून चूस लेते हैं। अपने देश में तो ऐसे आदमखोर हैं जिनके पंजे में एक बार कोई फँस जाए तो उसका व उसकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी का खून चूसते रहते हैं। उनके चंगुल में फँसे लोग बेचारे तड़पते रहते हैं, चूँ भी नहीं कर पाते।”
“सच पापा! ऐसे कौन पिशाच हैं?”
“बेटी, गरीब-गुरबों की आँखों में झाँककर देख। वे चेहरे साफ-साफ दिखाई दे जायेंगे।”

घोड़े की संवेदना

संतोष सरस

“कहो दोस्त, गौदोलिया चलोगे?”
“चलूँगा बाबूजी।”
“क्या लोगे?”
“दो रुपये।”
“मित्र, गौदोलिया तक का तो डेढ़ रुपया ही होता है!”
“दो से कम न लूँगा, रात बहुत हो गयी है।”
मैं रिक्शे पर सवार हो गया। मैंने यूँ ही कहा—भाई, सच बताओ, दो रुपया ज्यादा है कि नहीं? वैसे तो मैं दो रुपया दे ही रहा हूँ, दस-पाँच पैसे और भी दे सकता हूँ, लेकिन…।”
“बाबूजी, कभी-क्भी डेढ़ पर भी चला जाता हूँ। मौके-मौके की बात है। इस समय रात बहुत हो गयी है…।”
“यदि मेरे पास डेढ़ ही रुपये होते तो क्या तुम मुझे न ले चलते?”
“ले क्यों नहीं चलता!” थोड़ी देर रुककर उसने कहा,“बाबूजी, घोड़े का काम जरूर करता हूँ, पर घोड़ा थोड़े ही हूँ!”

ममताअन्तरा करवड़े
ऊँ…आँ…।
नवजात-शिशु के रुदन से कमरा गूँज उठा। प्राची ने उनींदी, थकी आँखों से देखा—शाम के पाँच बज रहे थे। घण्टा-भर पहले ही तो इसे दूध पिलाकर सुलाया था। कल रातभर भी रो-रो कर जागता रहा था। प्राची को खीझ हो आई। पन्द्रह-बीस दिन के उस नन्हें जीव को गुड़िया जैसे उठाकर उसने गोदी में ले लिया। माँ का स्पर्श पाते ही वह गुलगोथना शिशु सन्तुष्ट हो गया। अपनी बँधी मुट्ठियों की नन्हीं, मूँगफली के दूधभरे दानों के जैसी उँगलियों को ही मुँह में लेकर चूसने लगा।
तभी प्राची की माँ वहाँ आई।
“उठ गया क्या हमारा राजकुमार? चलो, अब घूँटी पीने का समय हो गया है।”
“क्या माँ! मैं तो परेशान हो गयी हूँ इससे।” प्राची तुनक पड़ी।
“क्या हुआ?”
“क्या क्या हुआ? सोने भी नहीं देता ढंग से। एक तो रात-रात भर जागता रहता है। हर घंटे-दो घंटे में दूध चाहिए। कभी नैपी गन्दा करता है तो कभी गोदी में रहना होता। ऐसा ही रहेगा क्या ये?” प्राची रुआँसी होने लगी।
प्रसव के लिए मायके आई बेटी की इस परेशानी को समझते हुए माँ उसके पलंग पर ही पालथी लगाकर बैठ गयी। नन्हें शिशु को अपनी गोदी में लिया और प्राची का सिर भी अपनी गोदी में रखकर उसे थपथपाने लगी। उनकी आँखों से आँसू बह चले। एक प्राची के गाल पर गिरा। उसने हड़बड़ाकर माँ को देखा। वो बड़बड़ा रही थीं: जब तक इसे माँ चाहिए, तब तक यह सुख भोग ले बेटी। आजकल पराए परदेसों का कोई भरोसा नहीं है। वो धरती निगल जाती है हमारे लाड़लों को।
माँ प्राची के बड़े भैया की सामने ही रखी तस्वीर को देखे जा रही थी जो पिछले दस वर्षों से विदेश से वापस ही नहीं आये थे।
नन्हें शिशु ने प्राची की उँगली अपने मैदे-से हाथ में थाम ली थी। प्राची ने अब उसे नहीं छुड़ाया।

Sunday, 27 July 2008

जनगाथा जुलाई 2008




जनगाथा का यह जुलाई 08 अंक कतिपय तकनीकी खामियों और इंटरनेट संबंधी मेरी अकुशलताओं के चलते काफी देरी से प्रकाशित हो पा रहा है, क्षमाप्रार्थी हूँ। लघुकथा की रचना-प्रकिया पर इस अंक में प्रस्तुत है वरिष्ठ कथाकार भगीरथ का महत्वपूर्ण लेख तथा वरिष्ठ कवि, विचारक व अनुवादक अनिल जनविजय की विचारोत्तेजक टिप्पणी।
—बलराम अग्रवाल

लघुकथा की सृजन-प्रक्रिया का स्वरूप
भगीरथ
नीति एवं बोध कथाएँ जीवन के उत्कट अनुभव को सीधे-सीधे व्यक्त करने की बजाय उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न विचार को रूपक कथाओं के माध्यम से व्यक्त करती हैं। (जबकि) समकालीन लघुकथाएँ अधिकांशतः अनुभव के बाह्य विस्तार में न जाकर अनुभवात्मक संवेदनाओं की पैनी अभिव्यक्ति करती हैं। अतः इन दो प्रकार की रचनाओं की सृजन-प्रक्रिया भी अलग-अलग है।
स्थिति, मनःस्थिति, वार्तालाप, व्यंग्य, मूड, पात्र आदि संबंधी वे अनुभव जो लघु कलेवर एवं कथारूप में व्यक्त हो सकने की संभावना रखते हैं, साथ ही, रचना की संपूर्णता का आभास देते हों, उन्हें लघुकथाकार अपनी सृजनशील कल्पना, विचारधारा, अन्तर्दृष्टि एवं जीवनानुभव की व्यापकता से लघुकथा में अभिव्यक्ति देता है।
जो लघुकथाएँ विचार के स्तर पर रूपायित होती हैं, उनके लिए कथाकार घटना, कथानक, रूपक या फेंटेसी की खोज करता है। प्रस्तुत खोज में अनुभव की व्यापकता के साथ ही सृजनशील कल्पना की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यह खोज विधागत सीमाओं के भीतर ही होती है।
जब रचना एक तरह से मस्तिष्क में मेच्योर हो जाती है और संवेदनाओं के आवेग जब कथाकार के मानस को झकझोरने लगते हैं, तब रचना के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। इस प्रक्रिया के दौरान रचना परिवर्तित होती है। भाषा-शिल्प पर बार-बार मेहनत से भी रचना में बदलाव आता है। यह बदलाव निरंतर रचना के रूप को निखारता है। यह भी संभव है कि मूल कथा ही परिवर्तित हो जाये।
लघुकथा संयमी विधा है। इसके लिए कथाकार को अनावश्यक छपे शब्दों का मोह छोड.ना पड.ता है। लघुता एवं अभिव्यक्ति के पैनेपन को प्राप्त करने के लिए शब्द, प्रतीक, बिंब, लोकोक्ति एवं मुहावरों ज्युडीशियस सलेक्शन(Judicious Selection) करता है और उसे कोहरेन्ट(Coherent) रूप में प्रस्तुत करता है। लघुकथा में कहीं बिखराव का एहसास होते ही लघुकथाकार एक बार फिर कलम उठाता है। अक्सर लघुकथा को आरम्भ करने में काफी कठिनाई होती है। आरंभ बार-बार बदल सकता है क्योंकि कुछ ही वाक्यों में लघुकथा को एक तनावपूर्ण चरमस्थिति तक पहुँचाना होता है। चरमस्थिति पर रचना का फैलाव होता है और वहीं अप्रत्याशित ही, रचना एक झटके से अन्त तक पहुँच जाती है। इससे रचनाकार कथा को प्रभावशाली और संप्रेषणीय बना देता है।
अनेक लघुकथाओं में अन्त अधिक चिन्तन और मेहनत माँगता है, क्योंकि पूरी रचना का अर्थ अन्त में ही स्पष्ट होता है। ऐसा प्रमुखतः धारदार व्यंग्य(हास्य-व्यंग्य नहीं) एवं वार्तालाप शैली में लिखी गई लघुकथाओं में होता है। संवादों को छोटा, चुस्त, स्पष्ट एवं पैना करने में कथाकार की सृजनशक्ति और मानसिक श्रम विशेष महत्व रखते हैं।

अनुभवजगत का नंगा साक्षात्कार
अनिल जनविजय
आज साहित्य में लघुकथा की विधागत स्वतन्त्रता को लेकर जो बहस चल रही है, वह बेमानी है। लघुकथा के अस्तित्व पर कोई भी प्रश्नचिह्न लगाना अपनी नासमझी का परिचय देना है। आज कहानी और कविता से भी ज्यादा संख्या में लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं और छपकर सामने आ रही हैं। ये लघुकथाएँ जीवन के हर पहलू को छूती हैं। आज की जिन्दगी का छोटे से छोटा हर क्षण लघुकथाओं ने पकडा है। सबसे बडी बात तो यह है कि लघुकथा कविता और कहानी दोनों को अपने में समेटकर उभरी है। इसमें मनुष्य की इच्छाओं, स्वप्नों और उनकी यातनाओं का अन्तर्सम्बन्ध भी है और समकालीन बोध के प्रति नैतिक प्रतिबद्धता भी। लघुकथाओं ने प्रखर जनवादी चेतना को अपने सर्जनात्मक संघर्ष के द्वारा एक गम्भीर कलात्मक आधार प्रदान किया है। इनमें मनुष्य की यातनाओं के व्यापक संसार के साथ-साथ उसके प्रतिरोध की बात भी है और इस प्रतिरोध में आज के आदमी का आक्रोश भी झलकता है।
लघुकथा मनुष्य के अनुभव और अनुभव के प्रति सोचने की प्रक्रिया से उपजी है। इनके लेखक स्थितियों और घटनाओं पर पहले सोचते हैं। इसलिए, इनमें एक ठोस और समझ में आने वाला संसार होता है जो पाठक को अनुभव-जगत का नंगा साक्षात्कार कराता है। इस तरह लघुकथा कम्प्रेशन, इन्सपायरेशन, सिंसियरिटी, सेंसेबिलिटी, आब्जेक्टिविटी और इन्वाल्वमेंट की संरचना है, जिसे पढ़ने के बाद पाठक स्थितियों पर विचार करने को मजबूर हो जाता है। यही, लघुकथा की अपनी विशेषता है।


जगमगाहट
रूप देवगुण
वह दो बार नौकरी छोड़ चुकी थी। कारण एक ही था—बास की वासनात्मक दृष्टि! लेकिन नौकरी करना उसकी मजबूरी थी। घर की आर्थिक दशा शोचनीय थी। आखिर उसने एक दूसरे दफ्तर में नौकरी कर ली।
पहले दिन ही उसे उसके बास ने अपने केबिन में काफी देर तक बिठाए रखा और इधर-उधर की बातें करता रहा। अब की बार उसने सोच लिया था—वह नौकरी नहीं छोड़ेगी, बल्कि मुकाबला करेगी। कुछ दिन दफ्तर में सब ठीक-ठाक चलता रहा, लेकिन एक दिन उसके बास ने उसे अकेले में उस कमरे में आने के लिए कहा जिसमें पुरानी फाइलें पड़ी थीं। उन्हें उन फाइलों की चैकिंग करनी थी। उसे साफ लग रहा था कि आज उसके साथ कुछ गड़बड़ होगी। उस दिन बास सजधज कर आया था।
एक बार तो उसके मन में आया कि वह कह दे कि मैं नहीं जा सकती, किन्तु नौकरी का खयाल रखते हुए वह इंकार न कर सकी। कुछ देर में ही वह तीन कमरे पार करके चौथे कमरे में थी। वह और बास फाइलों कि चैकिंग करने लगे। उसे लगा जैसे उसका बास फाइलों की आड़ में उसे घूरे जा रहा है। उसने सोच लिया था कि ज्यों ही वह उसे छुएगा, वह शोर मचा देगी। दस पन्द्रह मिनट हो गये, लेकिन बास की ओर से कोई हरकत न हुई।
अचानक बिजली गुल हो गयी। वह बास की हरकत हो सकती है—यह सोचते हि वह काँपने लगी। लेकिन तभी उसने सुना…बास हँसते-हँसते कह रहा था, “देखो, तुम्हें अँधेरा अच्छ नहीं लगता होगा। तुम्हारी भाभी को भी अच्छा नहीं लगता। जाओ, तुम बाहर चली जाओ।”
अप्रत्याशित बात को सुनकर वह हैरान हो गयी। बास की पत्नी मेरी भाभी यानी मैं बास की बहन!
सहसा उसे लगा, जैसे कमरे में हजार हजार पावर के कई बल्ब जगमगा उठे हैं।

बहू का सवाल
बलराम
रम्मू काका काफी देर से घर लौटे तो काकी ने जरा तेज आवाज में पूछा,“कहाँ चलेगे
रहब? तुमका घर केरि तनकब चिन्ता-फिकिर नाइ रहति हय।” तो कोट की जेब से हाथ निकालते हुए रम्मू काका ने विलम्ब का कारण बताया,“जरा जोतिसी जी के घर चलेगे रहन। बहू के बारे मा पूछय का रहस।”
रम्मू काका का जवाब सुनकर काकी का चेहरा खिल उठा—सूरज निकल आने पर खिल गये सूरजमुखी के फूल की तरह्। तब आशा-भरे स्वर में काकी ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की,“का बताओ हइनि?”
चारपाई पर बैठते हुए रम्मू काका ने कंपुआइन भाभी को भी अपने पास बुला लिया और बड़े धीरज से समझाते हुए उन्हें बताया, “शादी के आठ साल लग तुम्हरी कोख पर सनीचर देउता क्यार असरु रहो। जोतिसी जी बतावत रहयं। हवन-पूजन कराय कय अब सनीचर देउता का सांत करि दायहयं। तुम्हयं तब आठ संतानन क्यार जोग हय। अगले मंगल का हवन-पूजन होई। हम जोतिसी जी ते कहि आए हनि।” रम्मू काका एक ही साँस में सारी बात कह गये।
कंपुआइन भाभी और भैया चार दिन की छुट्टी पर कानपुर से गाँव आये थे और सोमवार को उन्हें कानपूर जाना था।
रम्मू काका की बात काटते हुए कंपुआइन भाभी ने कहा, “हमने बड़े-बड़े डाक्टरों से चेक-अप करवाया है और मैं कभी भी माँ नहीं बन सकूँगी।”
कंपुआइन भाभी का जवाब सुनकर रम्मू काका सकते में आ गये और अपेक्षाकृत तेज आवाज में बोले, “तब फिर हम अगले साल बबुआ केरि दुसरि सादी करि देव्। अबहिन ओखेरि उमरहय का हय!”
उनकी बात सुनते ही कंपुआइन भाभी को क्रोध आ गया तो उन्होंने बात उगल दी,“कमी मेरी कोख में नहीं, आपके बबुआ के शरीर में है। मैं तो माँ बन सकती हूँ, पर वे बाप नहीं बन सकते। और अब, यह जानने के बाद आप क्या मुझे शादी करने की अनुमति दे सकते हैं?”


कंधा
विपिन जैन
भीड़-भरे डिब्बे में हमने नजरें दौड़ाईं। बैठने की कोई गुंजाइश कहीं नहीं थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि पंजाब की ओर जाने वाली गाड़ी में इतनी भीड़! आतंकवाद तो अभी भी उत्कर्ष पर था। खैर, तराश रखी दाढ़ीवाले एक नौजवान से थोड़ा सरकने का अनुरोध करके मैंने अपनी पत्नी सुधा के बैठने लायक थोड़ी जगह बनवाई और उसे बैठा दिया।
गाड़ी आगे जाने पर वह युवक उठकर ‘टायलेट’ की ओर चला गया। इस बीच पत्नी ने पास बैठाकर मेरे कान में फुसफुसाया,“कहीं यह वही तो नहीं?”
मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
“उसका चेहरा बड़ा डरावना-सा है। अभी लौटते ही धूँ-धूँ न कर दे! कहीं बम छिपाकर न भाग गया हो!!” उसने आगे कहा और अपनी चप्पलें झाँकने के बहाने सीट के नीचे निगाह भी डाल ली।
धीमी आवाज और कठोर मुख-मुद्रा से मैंने उसे डराया,“बेकार की बातें मत करो, चुप बैठी रहो।”
मैं उसके मूर्खतापूर्ण डर के बारे में सोचने लगा: पहले, जब मैं इसको शादी अटैंड करने के लिए मना कर रहा था, तब यह मुझको दब्बू बता रही थी। कह रही थी कि अखबार में आतंक की खबरें पढ़-पढ़कर यहीं बैठे-बैठे भयभीत होते रहना…अरे, घर से निकलोगे तो डर भाग जायेगा…जो होना होगा, हो जायेगा।
“अज्ञानता के अभय से जागरूकता का भय अच्छा रहता है।“ मैंने इससे कहा था।
ट्रेन स्टेशन-दर-स्टेशन दौड़ाती जारही थी। दाढ़ीवाला युवक इस दौरान वापस अपनी जगह पर आकर बैठ गया था। उसके आ जाने पर सामने की सीटों पर बैठे यात्रियों ने मुझे अपने साथ एडजस्ट कर लिया।
आधा-पौना घंटा सफर निकला होगा कि मैं उनींदा-सा हो आया। तभी मैंने सुधा की ओर
निगाह डाली। वह बेसुध-सी उस युवक के कंधे पर सिर टिकाए नींद में डूब चुकी थी; और वह बेचारा परेशानी के बावजूद अपना कंधा स्थिर रखे हुए था।

मूल्यों के लिए
अशोक लव
—पेट भरा हो, आवश्यकता से अधिक धन हो, पंच-तारा होटलों में बिताने के लिए शामें हों तो गरीब और गरीबी ढोंग नजर आते हैं। समाजवाद लाने और वर्ग-भेद मिटाने वाले शत्रु नजर आते हैं।-विश्वेशर ने कहा।
—ऐसी बातें और कौन करता है़। तुम्हीं बताओ, तुम्हें क्या कमी है? डेढ हजार कमाते हो। अच्छी भली नौकरी करते हो। फिर दूसरों को कोसते रहना क्या उचित है?–राजीव ने तर्क देते हुए कहा।
—डेढ. हजार कमाता हूँ—बस डेढ. हजार। छ्ह तो मकान का भाडा देता हूँ। दो सौ का दूध आता है। तीन सौ का राशन। डेढ सौ के करीब की सब्जी, कपडे.-लत्ते, रिश्तेदारी में सौ मरना-जीना, शादी-ब्याह। बच्चों की फीस। कभी पत्नी बीमार तो कभी बच्चे। मेरी चाय-सिगरेट मत गिन। बता क्या बचा? और तू । क्या किया तूने? और मजे कर रहा है।
—तू जब भी आएगा, बस घर-गृहस्थी का रोना-धोना लेकर बैठ जाएगा। सोचा था, काफ़ी पिलाकर तेरी थकावट दूर कर दूँगा। पर तू फिर वही भाषणबाजी पर उतर आया है।–राजीव ने झुँझलाते हुए कहा।
—मैं जिस जिन्दगी को जी रहा हूँ, तू उसे भाषणबाजी ही कहेगा। रो-पीटकर थर्ड-डिवीजन बी.ए. की और पिताजी की गद्दी पर जा बैठा–मैनेजिंग डायरेक्टर राजेश जोशी। और मैं। तेरे साथ बी.ए. में था। फर्स्ट डिवीजन लाया था। क्या बना। फाइलौं में दुबका क्लर्क। चार दिन मेरे साथ रह ले। तू भी मेरी तरह ही बोलेगा। बोल, रहेगा मेरे साथ?–विश्वेश्वर ने चुनौती-भरे स्वर में कहा।
—देख, तू मेरा दोस्त है। इसलिए सब चुपचाप सुन रहा हूँ। तुझे कहा था, मेरी कम्पनी में आ जा। पर, तू तो आदर्शवादी रहेगा। सिद्धान्तवादी रहेगा। तो फिर भुगत। जिसकी किस्मत में झुग्गी-झोंपडी हों, वह वहीं रहेगा और उम्रभर कुढ.ता रहेगा।–गुस्से में भरा राजीव काफी का अंतिम घूँट तेजी से उतार, मारुति में जा बैठा।
विश्वेश्वर ने बीमार पुत्र की दवाई के लिए रखे दस रुपए के नोट को काँपते हाथ से बैरे की ट्रे में रख दिया।
वेतन मिलने में अभी चार दिन बाकी थे।

हमारे आगे हिन्दुस्तान
डा. सतीश दुबे
शाम के उस चिपचिपे वातावरण में वह अपने मित्र के साथ तफरी करने के इरादे से सड़क नाप रहा था।
उनके आगे एक दम्पति चले जा रहे थे। पुरुष ने खादी का कुरता-पाजामा तथा पैरों में मोटे चप्पल डाल रखे थे, तथा स्त्री एक सामान्य भारतीय महिला लग रही थी। उसकी निगाह जैसे ही दम्पति की ओर गई, उसने कुछ अनुभव किया तथा मित्र से कहा—देखो, हमारे आगे हिन्दुस्तान चल रहा है।
—क्या मतलब। क्या ये एम.एल.ए., भूतपूर्व मन्त्री, पूँजीपति या नौकरशाह में से कोई हैं... ?
—ऊँ-हूँ...तुमने जो नाम गिनवाये हैं, उनमें से यदि कोई ऐसे घूमे तो उनकी नाक नहीं कट जायेगी...।
—फिर तुमने कैसे कह दिया कि हमारे आगे हिन्दुस्तान चल रहा है?–मित्र ने तर्क की मुद्रा में आँखें घुमायीं।
—यह तो वो ही बतायेंगे। आओ, मेरे साथ।
वे दोनों कुछ हटकर उनके पीछे-पीछे चलने लगे। उन्होंने सुना, पत्नी पति से कह रही थीः
दोनों बच्चों को कपडे. तो सिलवा ही दो। बाहर जाते हैं तो अच्छा नहीं लगता। कुछ भी खाते हैं तो कोई नहीं देखता, पर कुछ भी पहनते हैं तो सब देखते हैं। इज्जत तो बनाके रखना जरूरी है ना...।
उन्होंने देखा, पत्नी मंद-मंद मुस्करा रहे पति की ओर ताकने लगी है। पति की उस मुस्कराहट में सचमुच हिन्दुस्तान नजर आ रहा था।

प्यासी बुढ़िया
शंकर पुणतांबेकर
—माई, पानी दोगी पीने के लिए।

—कहीं और पी ले, मुझे दफ़्तर की जल्दी है।
—तू दरवाजे को ताला मत लगा। मुझ बूढी पर रहम कर। मैं तेरी दुआ मनाती हूँ...तुझे तेरे दफ्तर में तेरा रूप देखकर बढोत्तरी मिले...।
औरत ने उसे झिड.ककर कहा—तू मेरी योग्यता का अपमान कर रही है?
—बडी अभिमानिनी है तू, तेरे नाम लाटरी खुले...मुझे पानी पिला दे।
—लाटरी कैसे खुलेगी। मैं आदमी को निष्क्रिय और भाग्यवादी बना देने वाली सरकार की जुआगिरी का टिकट कभी नहीं खरीदती।
—मुझे पानी दे माई, तेरा पति विद्वान न होकर भी विद्वान कहलाए...और किसी विश्वविद्यालय का वाइस चांसलर बने।
—चल जा, मेरे पति को मूर्ख राजनीतिग्यों का पिछलग्गू बनाना चाहती है क्या?
—तेरे पूत खोटे काम करें, लोगों पर भारी अत्याचार करें, औरतों के साथ नंगे नाचें, तब भी उनका बाल बाँका न हो। बस, तू पानी पिला दे।
—लगता है, बडी दुनिया देखी है तूने। लेकिन हम लोग जंगली नहीं हैं। सभ्य हैं और हमें अपनी इज्जत प्यारी है। जा, कहीं और जाकर पानी पी।
—तेरा पति बिना संसद के ही प्रधानमंत्री बने। सोच, इससे भी बडी दुआ हो सकती है। चल, दरवाजा खोल और मुझे पानी पिला।
—देती हूँ मैं तुझे पानी...पर मेरे पति को दोगला, विश्वासघाती बनने का शाप मत दे।
बुढिया पानी पीकर चली गयी तो औरत के मुँह से निकल पड़ा—यह बुढिया, बुढिया नहीं, हमारी जर्जर व्यवस्था है जो सस्ती दुआएँ फेंककर हमारा पानी पी रही है...नहीं, पी नहीं रही है बल्कि...हमारा पानी सोख रही है।

कैरियर
शकुन्तला किरण
—सर, आपकी पुस्तकें।
—बैठो। पेपर्स कैसे हुए?
—जी, बहुत अच्छे।
—और नीता, तुम्हारे?
—जी सर, यूँ ही...तीसरा तो बिल्कुल बिगड़ गया।
खैर छोडो, नीता, तुम्हें तो हर चीज का पता है। जरा चाय बना लाओ। और अंशु, सामने वाला बंडल खोलकर जरा नंबरों की टोटलिंग करवा दो। आज ही भेजना है। फिर, बाद में...।

टोटलिंग करते-करते अंशु ने अचानक सिर उठाया तो देखा—सर की नजरें उस पर चिपकी हुई हैं।
—अंशु, तुम साडी मत पहना करो। बैल-बाटम शर्ट में ज्यादा जँचती हो।
—जी सर...।–वह काँप उठी।
—तुम घबरा क्यों रही हो?–सर ने एक चपत थपकी, बिल्कुल करीब आकर।
—नहीं तो।...सर, याद नहीं रहा, मम्मी अस्पताल गयी हैं।...खाना बनाना है घर पर।
—तो चाय पीकर चली जाना।–सर व्यंग्य से मुकराये।
—नहीं सर, फिर कभी।
और वह तेजी से बाहर आ गई। चाय बनाती हुई नीता ने कहा—मुझे एक जरूरी काम याद आ गया है। उठो, घर चलो।
—पर, पर...मुझे तो ऐसी कोई जल्दी नहीं है।...फिर, कापियाँ नहीं जँचवाईं तो सर नाराज हो जायेंगे...। अंशु, रुक ही जाओ तो अच्छा है।
—तुम्हें जाना है तो जाओ, इसे क्यों घसीट रही हो?–अचानक, परदे को चीरती, सर की इस तूफानी डाँट से अंशु चौंक पड़ी और अकेली ही लौट पड़ी।

अब, जब रिजल्ट आया, उसका सारा करियर बिगड़ चुका था और नीता का बन गया था।
वास्तव में, नीता उससे अधिक समझदार थी।

Saturday, 21 June 2008

लघुकथा की रचना-प्रक्रिया / बलराम अग्रवाल

(पिछले अंक से जारी)

लघुकथा का उद्देश्य पाठक को किसी उथली और सतही कहानी की तरह सिर्फ रंजित, रोमांचित या प्रभावित कर देना मात्र नहीं है। पारम्परिक बोधकथा, नीतिकथा, भावकथा की तरह पाठक के हृदय को पिघलाना या उसकी आत्मा को झकझोरना भी इसका उद्देश्य नहीं है...और हास-परिहास या चुटकुला तो यह है ही नहीं। इसका लेखक सामान्यत: संवेदित/भावविभोर होकर…जौली मूड(Jolly mood)में आकर नहीं, बल्कि परिस्थितियों से आन्दोलित होकर कथा-लेखन में प्रवृत्त होता है। इसलिए लघुकथा-लेखन के माध्यम से उसका उद्देश्य पाठक की चेतना को आन्दोलित करना है। न सिर्फ कहानी से, बल्कि बोधकथा, नीतिकथा, भावकथा, चुटकुला आदि से लघुकथा की भिन्नता का यह तीसरा बिन्दु है।
परन्तु, पाठक की चेतना को आन्दोलित करने से भी आगे कोई लघुकथा-लेखक यदि पाठक को दिशा-निर्देशित करना ‘लघुकथा’ का ‘हेतु’ समझता है तो जरूरी नहीं कि लघुकथा उसे सिर्फ सकारात्मक दिशा ही दे। प्रत्येक सामाजिक अपनी प्रकृति, परिवेश और सामर्थ्य,—इन तीन भावों से प्रभावित रहता है और—नकारात्मक या सकारात्मक—इन्हीं भावों के अनुरूप दिशा-निर्देश ग्रहण करता है। यों भी, लघुकथा में ‘निदान’(डाइग्नोस) किया जाता है, ‘सुझाव’(ट्रीटमेंट) नहीं दिया जाता, क्योंकि ट्रीटमेंट दिये जाने के कुछ विशेष खतरे हैं जिनमें से एक है—लघुकथा में लेखक के स्वयं उपस्थित हो जाने/होते रहने का खतरा तथा दूसरा है—लघुकथा का उसके लेखक के किसी सिद्धान्त-विशेष की ओर घूम जाने का खतरा। ये दोनों खतरे ध्यातव्य हैं क्योंकि सिद्धान्त-विशेष के तहत दिए गए ट्रीटमेंट और तज्जनित परिसीमन के कारण ही अनेक लघुकथाएँ शिल्प और शैली की दृष्टि से पुष्ट होने के बावजूद, समसामयिक साहित्य में मान्य नहीं हैं। अत: लघुकथा के लेखक को हेतु-रचना के माध्यम से उन्मुक्त चिन्तन-मनन की दिशा में पाठक की चेतना को आन्दोलित करना होगा।
शिल्प की दृष्टि से लघुकथा किसी गद्य-गीत जैसी सुगठित होनी चाहिए। शाब्दिक अतिरिक्तता या वैचारिक दोहराव उसे कमजोर कर सकते हैं। लघुकथा की वास्तविक शक्ति वास्तव में उसके व्यंग्य-प्रधान या गाम्भीर्य-प्रधान होने में न होकर उसके सांकेतिक होने निहित है। यहाँ यह समझ लेना भी आवश्यक है कि ‘सांकेतिकता’ लघुकथा का अनिवार्य गुण अवश्य है, परन्तु इसे बहुत क्लिष्ट या गूढ़ न होकर सहज रहना चाहिए। यों भी, लघुकथा में उसका कोई भी गुण, सिद्धान्त या दर्शन बहुत क्लिष्ट या गूढ़ न होकर सहज ही समाविष्ट होना चाहिए। सहज समावेश से तात्पर्य बलात्-आरोपण से लघुकथा को बचाए रखना भी है।
‘लघुकथा’ में संवादों की स्थिति क्या हो? उन्हें होना चाहिए या नहीं? होना चाहिए तो किस अनुशासन के साथ और नहीं तो क्यों? ये सवाल वैसे ही अनर्गल हैं जैसे कि इसके आकार या इसकी शब्द-संख्या के निर्धारण को लेकर अक्सर सामने आते रहते हैं। वस्तुत: लघुकथा ‘लिखी’ या ‘कही जाती’ प्रतीत न होकर ‘घटित होती’ प्रतीत होनी चाहिए। लघुकथा की रचना-प्रक्रिया का मैं समझता हूँ कि यह प्रमुख सूत्र है। क्रियाशीलता, कृतित्व, चरित्र, परिस्थिति और परिवेश के साथ स्वयं उसके पात्रों को पाठक के सम्मुख होना चाहिए न कि उसके लेखक को। लघुकथा में ‘लेखकविहीनता’ की डा0 कमलकिशोर गोयनका इसी रूप में व्याख्या करते हैं। लघुकथा में संवाद और तत्संबंधी अनुशासन के बारे में एक जिज्ञासा को मैं अवश्य यहाँ प्रकट करना चाहूँगा। यह कि लघुकथा में संवादों को ‘कथोपकथन’ या ‘कथनोपकथन’ कहने का आधार क्या है? कथोपकथन यानी कथ+उपकथन तथा कथनोपकथन यानी कथन+उपकथन। अगर विवेकपूर्वक विचार किया जाए तो ‘कथन’ के उत्तर में बोले जाने वाले संवाद को ‘उपकथन’ नहीं बल्कि ‘प्रतिकथन’ कहा जाना चाहिए, क्योंकि कथा में उसका आस्तित्व किसी भी दृष्टि से ‘उप’ नहीं होता। फिर, आवश्यक नहीं कि प्रत्येक ‘कथन’ का उपकथन हो ही। कोई पात्र परिस्थिति-विशेष में किसी पात्र के ‘कथन’ का जवाब अपनी उस चुप्पी से दे सकता है जो उसके ‘प्रतिकथन’ या ‘उपकथन’ की तुलना में कहीं अधिक स्फोटक सिद्ध हो। इसलिए लघुकथा में संवाद के लिए ‘कथन प्रति कथन’ तथा ‘कथनाकथन’ व ‘कथाकथ’ यानी कथन+अकथन व कथ+अकथ शब्द भी बनते हैं। संवाद कैसे हों? इस बारे में मेरी धारणा है कि वे लघुकथा की भाषा में सहजग्राह्य और मन्तव्य को स्पष्ट करने वाले होने चाहिएँ। वे पाठक की चेतना को उद्वेलन और कथानक को अग्रसर गति दे पाने में सक्षम होने चाहिएँ।
अपनी समेकित इकाई में लघुकथा को गद्य-गीत जैसी सुस्पष्ट, सुगठित व भावपूर्ण; कविता जैसी तीक्ष्ण, सांकेतिक, गतिमय और लयबद्ध तथा कथा की ग्राह्य शीर्ष विधाओं—कहानी व उपन्यास—जैसी सम्प्रेषणीय और प्रभावपूर्ण होना चाहिए।
प्रत्येक कहानी में एक ‘सत्व’ होता है और हम इसे ‘कहानी की आत्मा’ कहते हैं। अपनी पुस्तक ‘परिहासिनी’ के इंट्रो में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इसे ‘चीज’ कहा है। ‘लघुकथा’ ‘कहानी की आत्मा’ है, उसका ‘सत्व’ है, ‘चीज’ है। घटना की प्रस्तुति को विस्तार देने की तुलना में कथाकार को जब ‘वस्तु’ का सम्प्रेषण अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होता है तब रचना का विस्तार उसके लिए गौण हो जाता है। अत: हम कह सकते हैं कि ‘लघुकथा’ केवल आकारगत, शिल्पगत, शैलीगत और प्रभावगत ही नहीं, शब्दगत और सम्प्रेषणगत भी सौष्ठव को प्राप्त कथा-रचना है। कहानी और लघुकथा के बीच अन्तर को उनके कथानकों के समापन की ओर बढ़ने में दृष्टिगोचर त्वरणों में अन्तर की माप के द्वारा स्पष्ट रूप से जाना जा सकता है।

हम लघुकथा-लेखकों को उन्मुक्तता और उच्छृंखलता के मध्य अंतर को भली-भाँति जान लेना चाहिए। मन के भावों का अनुशासनहीन, उद्दंडतापूर्वक प्रदर्शन उच्छृंखलता कहलाता है। विदेशी शासन से मुक्ति ने हमें उन्मुक्तता दी है, परन्तु आज वाणी व भाव-स्वातंत्र्य के अधिकारों को पाकर हम अक्सर ही उच्छृंखल व्यवहार करते नजर आ जाते हैं। अति आवश्यक है कि वाणी व भाव के प्रकटीकरण पर हम अनुशासन-विशेष का अंकुश रखें। अनुशासन से अग्रसारण का निश्चय होता है।
लघुकथा के अगर कुछ अनुशासन हैं तो उनके प्रति लेखकों की आबद्धता और प्रतिबद्धता भी अपेक्षित है ही। परन्तु, इन सब अनुशासनों को प्रस्तुत कर देने के बाद इसी लेख के इस अन्तिम पैरा में इन आबद्धताओं व प्रतिबद्धताओं को मैं लघुकथा-लेखन की चौहद्दियाँ या गणितीय-सूत्र बताकर इनके नकार का आह्वान करूँ तो निश्चय ही आप मुझे बेहद भ्रमित व्यक्तित्व मानेंगे; परन्तु लघुकथा ने आज तक वाकई इतने सोपान तय कर लिए हैं कि हर सोपान पर वह पिछले सोपान के अनुशासनों को भंग करती प्रतीत होती है। बुद्धिमान, शूर और प्रगतिगामी लोग सदैव ही पुराने अनुशासन को तोड़ते और नये को जोड़ते आये हैं। यही प्रगति की रूपरेखा है। हिंदी लघुकथा ने अब तक यही किया है और यही वह अब भी कर रही है। यही कारण है कि लघुकथा आज मानव-जीवन के किसी क्षण-विशेष का ही नहीं, उसके किसी पक्ष-विशेष का भी चित्रण करने में पूर्ण सक्षम है। वस्तुत: समकालीन हिंदी लघुकथा उद्वेलन और आन्दोलन से जनित भावों की उन्मुक्त, सम्प्रेषणीय एवं प्रभावकारी कथात्मक प्रस्तुति है। यह उत्तरोत्तर विकासशील विधा है। आज, इस लेख में जो अनुशासन इसकी रचना-प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए किखे गये हैं, वे ही कल को पिछले सोपान के अनुशासन कहे जा सकते हैं। बहरहाल, पिछले समस्त अनुशासनों को भंग करके भी विधाएँ अनुशासनबद्ध ही रहती हैं।
एक बात और, नवीन अनुशासनों के निर्माण और प्रस्तुति का अधिकार उसी को मिल सकता है जो विधा के पक्ष में(स्वयं द्वारा प्रस्तुत) पूर्व अनुशासनों को भंग कर सकने की क्षमता रखता हो; लेकिन इसका यह मतलब कदापि नहीं कि वह एक अनुशासन को प्रस्तुत करता और फिर तोड़ता रहकर नित नये भ्रम पैदा करता रहे।
‘हिंदी लघुकथा’ की लेखिका डा0 शकुन्तला किरण : संक्षिप्त परीचय



बीती सदी के आठवें दशक के मध्य में, समकालीन हिंदी लघुकथा जिन दिनों अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए जूझ रही थी; जिन दिनों समकालीन तेवर की न तो लघुकथाएँ ही यथेष्ट-संख्या में उपलब्ध थीं और न ही तत्संबंधी आलोचनापरक लेख आदि अन्य सामग्री; राजस्थान के अजमेर शहर की निवासी सुश्री शकुन्तला किरण उन दिनों इस विधा में रचनात्मक लेखन के साथ-साथ शोध के स्तर पर भी सक्रिय थीं। देश-विदेश के किसी भी विश्वविद्यालय द्वारा ‘हिंदी लघुकथा’ पर शोध हेतु पंजीकृत, तदुपरांत शोध-उपाधि(पी-एच0 डी0) से अलंकृत वह पहली शख्सियत हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध समकालीन हिंदी लघुकथा की रचनाशीलता व आलोचनापरकता दोनों ही पर अनेक कोणों से एकदम मौलिक चिंतन-दृष्टि प्रस्तुत करने वाली हिंदी की पहली कृति है। इस सबके बावजूद ‘हिंदी लघुकथा का इतिहास-पुरुष’(संदर्भत: महिला) बनने की आपाधापी में वह कभी शामिल नहीं हुईं। हिंदी लघुकथा के तत्कालीन आपाधापी-भरे मसीहाई माहौल से हटकर अपनी रचनात्मक शक्ति का सदुपयोग उन्होंने उससे अलग विभिन्न सांस्कृतिक, सामाजिक व राजनीतिक संगठनों व समितियों में अपनी सक्रियता को बढ़ाकर किया। पहले वह राजस्थान प्रदेश भाजपा कार्य-समिति की सदस्या नामांकित हुईं, तदुपरांत लगभग एक दशक तक राजस्थान महिला मोर्चा की उपाध्यक्षा जैसा महत्वपूर्ण पदभार सँभालने में सफल रहीं। वह नगर परिषद, अजमेर की पार्षद भी निर्वाचित हुईं और वहाँ ‘भूमि एवं भवन निर्माण समिति’ के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया।
बहु-आयामी व्यक्तित्व की धनी सुश्री(डा0) शकुन्तला किरण को परिचितों के बीच ‘शकुन’ नाम से पुकारा जाता है। लेखन की ओर उनका रुझान बचपन से ही रहा है। उनकी पहली रचना ‘माँ की ममता’ शीर्षक कहानी थी जो अजमेर से प्रकाशित उनकी स्कूल-पत्रिका ‘प्रभा’ में तब प्रकाशित हुई थी जब वह मात्र पाँचवी कक्षा की छात्रा थीं। बाद में, ‘प्रज्ञा’ नामक साहित्यिक पत्रिका की वह संपादक भी रहीं। स्कूल व कालेज के दिनों में वह विभिन्न नाटकों व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लगातार सक्रिय बनी रहीं। यह सक्रियता बाद में भी अनेक वर्षों तक बनी रही।
अब तक दो सौ से अधिक लेख,कहानियाँ, लघुकथाएँ, कविताएँ/गीत/गजल आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, विशेषांकों, संकलनों व कोशों में प्रकाशित हो चुकी हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से वह मूलत: सूफी विचारभूमि वाले ‘उवैसिया’ सम्प्रदाय से जुड़ी हैं। उनका मानना है कि सृष्टि में आध्यात्मिक-शक्ति से बढ़कर मनुष्य के पास दूसरी कोई शक्ति नहीं है।
सम्प्रति : मित्तल हास्पिटल, पुष्कर रोड, अजमेर(राजस्थान) की निदेशिका हैं।
लघुकथाएँ
शंकाएखलाक अहमद जेई
एकाएक घोड़ा रुक गया। अरे!…यह तो जालिमसिंह है। वही जालिमसिंह दरोगा, जिसकी आवाज से सारा शहर थरथराता है। जालिमसिंह ने देखा—एक सिपाही किसी को डाँट रहा था।
“क्या बात है?”
सिपाही घूमा और एक जोरदार सैल्यूट मारकर बोला, “सर, रात के एक बजने वाले हैं; पर यह बुड्ढा अभी तक खट-खट कर रहा है। अगर चोर कहीं सेंध लगायें तो सुनाई भी न दे।”
जालिमसिंह ने देखा कि एक टूटी-फूटी छोटी-सी दुकान में लालटेन जल रही थी। दीवार पर इधर-उधर कई लकड़ी की वस्तुएँ बनी टगी थीं तथा जमीन पर भी कोई अधबनी वस्तु पड़ी थी।
उसने बुड्ढे पर नजर डाली। एक दुबला-पतला-सा शरीर, मैले-फटे कपड़े में लिपटा, हाथ जोड़े खड़ा था। दारोगा ने महसूस किया कि बुड्ढे के शरीर में बार-बार डर की ठंडी लहर उठ रही है। उसने दुकान के अंदर से नजरें हटा लीं।
“जिस जगह कोई जाग रहा हो, वहाँ क्या चोरी हो सकती है?” जालिमसिंह ने पूछा।
“सर.…” सिपाही की आवाज गले में ही अटककर रह गयी।
“अगर कोई गरीब मेहनत-मजदूरी करके अपना पेट पालना भी चाहे, तो तुम लोग नहीं करने दोगे…जाओ अपना काम करो, आइंदा ऐसी गलती मत करना।”
उधर बुड्ढा जालिमसिंह को ऐसे देख रहा था, जैसे पहली बार देखा हो।
“बाबा, आप काम कीजिए।” जालिमसिंह ने बड़ी ही शालीनता से कहा तो बुड्ढा भी बेहिचक पूछ बैठा,“साहेब, का आप पुलिस अफसर ना हो?”

हाथ वाले
महावीर प्रसाद जैन

शो शुरू होने में अभी देर है और इस तरह के खाली समय का उपयोग भी वह सार्थक
ढंग से करता है…यानी फुटपाथ पर बिखरी किताबों के ढेरों को देखना…टटोलना…उसका अनुभव है कि इन फुटपाथी ढेरों में प्राय: बड़ी उम्दा किस्म की किताबें हाथ लग जाती हैं।
उसके कदम उस परिचित दुकान पर जाकर रुक गये। यह बहुत पुरानी फुटपाथी दुकान है और इसके मालिक के दोनों हाथ कटे हुए हैं।
दुकानदार उसे देखकर हल्के-से मुस्कराया और उसने एक तरफ इशारा किया…जिसका मतलब था कि इस ढेर से आपको कुछ न कुछ मिल ही जायेगा। वह किताबें देखने लगा। तभी उसकी बगल में एक युवक आकर खड़ा हो गया। उसने उसे एक नजर देखा…वह युवक भी किताबें छाँटने में लग गया। कुछ देर बाद उसकी नजरें फिर उसी युवक की ओर उठीं, और उसने देखा कि एक किताब को बगल में दबाए वह अभी भी किताबों को उलट-पलट रहा था।
दुकानदार अन्य ग्राहकों को निपटाने में लगा हुआ था, कि वह युवक चल दिया। उसने देखा कि उसकी बगल में पुस्तक दबी है। बिना पैसे दिये…यानी…ऐसे ही…चोरी…और उसके मुँह से निकल पड़ा,“वह तुम्हारी किताब ले गया है…बिना पैसे दिये…!” उसने जाते हुए युवक की ओर इशारा भी किया।
“मुझे मालूम है भैयाजी…”
“यार, बड़े अहमक हो। जब मालूम है तो रोका क्यों नहीं?”
कुछ देर वह चुप रहा और फिर जवाब देते हुए बोला,” चोरी हाथवाले ही तो कर सकते हैं।”

धरमरमेश श्रीवास्तव

जब ट्रेन काशी से कुछ इधर ही थी तो एक भिखमंगा मेरे पास में बैठी एक महिला से कुछ देने के लिए आग्रह कर रहा था। अंत में महिला बिगड़ती हुई बोली,“पैसा क्या पेड़ में फलता है कि तोड़कर लिये हुए चली आ रही हूँ। कुछ करना-धरना है नहीं, भीख माँगने चले आते हैं। भला इन्हें भीख देने से मेरा धरम पूरा हो जायेगा?”
उक्त महिला की डाँट सुनकर बेचारा भिखमंगा आगे बढ़ गया।
कुछ देर बाद जब ट्रेन गंगा नदी का पुल पार करने लगी तो उक्त महिला ने नीचे बह रही गंगा को प्रणाम करते हुए एक अठन्नी उछाल दी। यह देख पास में बैठे एक व्यक्ति से रहा नहीं गया तो सहज भाव से उसने पूछ ही डाला,“बहनजी, इससे आपका धरम पूरा हो गया?”
महिला आँखें तरेरती जरूर रही, बोली कुछ नहीं। गाड़ी गंगा पार हो गयी।

एक और श्रवण
डा0 सतीश दुबे

ममी ने छोटे बेटे को आवाज लगायी और कहा, “बेटे, जरा केमिस्ट के यहाँ से ये दवा ले आओ। मुझे बुखार है। शरीर दर्द कर रहा है।”
पर श्रवण ने इंकार कर दिया और फिर से अपने मित्रों के बीच जाकर खेलने लगा। थोड़ी देर बाद ममी ने फिर आवाज लगायी। वह खीझ गया।
“ममी, ये क्या लगा रखा है! आप जानती नहीं, हमारा गेम चल रहा है।”
“बेटे, इसीलिए तो तुम्हें बुलाया है। अपने दोस्तों के लिए थोड़ा नाश्ता ले आओ और तुम्हारी कापी-बुक भी तो आनी है…”
श्रवण के चेहरे पर चमक आ गयी। वह प्रफुल्लित होकर बोला,“ओह ममी, आप कितनी अच्छी हैं।…और आपकी दवा भी तो लानी है ना! वह चिट मुझे दे दीजिए।”
“अरे, वह तू रहने दे।”
“नहीं-नहीं, वह भी ले आऊँगा।”
और ममी ने कराहते हुए निराश मन से वह चिट उसे थमा दी।

प्रश्नचिह्न
सत्य शुचि

वह मेरा मकान-मालिक था, इसलिए खामोश रहना ही उचित समझा। यदि उसका मन उस ग्राम्य-बाला के गदराये जिस्म पर अटक भी गया तो इसमें मैं कर भी क्या सकता था! यदि जालीदार खिड़की से सभी कुछ स्वत: ही दिख नहीं रहा होता तो देखता भी नहीं।
मैं ऊपर कमरे में पलंग पर खाना खाकर लेटा ही था। शायद उसे इस चीज का आभास नहीं था। तभी तो उसकी इतनी हिम्मत हो गयी थी। इन दिनों उसकी पत्नी और बच्चे भी घर पर नहीं थे।
दोनों परस्पर उलझ रहे थे। उसने करीब-करीब उसे नग्न-सा कर दिया था। यह जबर्दस्ती का कुकृत्य मेरी आखोँ बालकोनी से देखी जा रही किसी फिल्म की रील-सा गुजरता जा रहा था। लड़की मुक्ति के लिए छटपटा रही थी और असफल होने के साथ लगभग समर्पित-सी होती जा रही थी।
मैं गुस्से में भरा अपनी मुट्ठियों को भींचता-खोलता रहा। मैं बिल्कुल असमर्थ था। चाहता तो दरवाजा खोलकर लड़की की सहायता कर सकता था, पर मेरे सामने एक ही प्रश्न था कि यदि मैं इस मामले में पड़ा तो कल ही यह कमरा खाली करना पड़ेगा; और बड़ी मुश्किल से लगातार एक महीने तक प्रयास करने पर हाथ लगा था यह कमरा। यह भी निकल गया तो?

हूण
संजीव

रंगीले का रंग आज उड़ा हुआ था। उस्ताद से उदासी देखी नहीं जा रही थी। पतली वीरान सड़क पर जीप चलाते हुए उन्होंने कई तरह की कोशिशें कीं; चुटकुले सुनाकर देखा, कत्ल की वारदातें बताकर देखा, बलात्कार का चटख चटखारा छोड़ा, लेकिन रंग नहीं जमा तो नहीं जमा।
उस्ताद की उस्तादी के लिए जबर्दस्त चुनौती आ खड़ी हुई थी। तभी उन्हें सामने साइकिल से आता हुआ वह जोड़ा दिखाई दिया। जीप को धीमा करके उन्होंने एक चतुर शिकारी की तरह उस जोड़े का जायजा लिया। युवक देहाती लग रहा था और अपनी जवान बीवी को पीछे बैठाकर मस्ती में कोई गँवई गीत गुनगुनाता हुआ चल रहा था।
उस्ताद ने जीप को थोड़ा दायें किया और तीव्रता से पुन: बायें उनकी बगल में लाकर ब्रेक कस दिया। युवक घबराकर साइकिल लिए-दिए नीचे जा गिरा ऊँची सड़क से। युवती बड़े अटपटे ढंग से गिर पड़ी और उसके कपरे कुछ उघड़ गये। घबड़ाई हुई वह उठने का उपक्रम करने लगी। देहाती युवक ने उसे सहारा दिया और एक बेबस आक्रोश से जीप की ओर देखा।
तभी रंगीले भिलभिलाकर हँस पड़ा। उसका रोम-रोम आह्लाद से भर उठा। उस्ताद ने हँसने की जुगलबंदी निभाई।
जीप ने भी किरकिराकर ताल दिया और खुशी के हिचकोले खाती डकारती खुरों से धूल उलीचती आगे बढ़ गयी।

खेल-खेल मेंरफीक जाफर

अहमद और अनवर गली में गिल्ली-डंडा खेल रहे थे। खेल-खेल में किसी बात पर लड़ाई हो गई। इत्तफाक की बात कि उस समय अनवर की माँ रहमत बी पानी का घड़ा उठाए वहाँ से गुजर रही थी। जब उसने इन दोनों को लड़ते देखा तो पानी का घड़ा जमीन पर रखकर दोनों को एक-दूसरे से अलग करते हुए एक-एक थप्पड़ रसीद कर दिया। दोनों रोते हुए वहाँ से भाग गये।
रहमत बी खाली घड़ा लिए जब अपने घर से लौट रही थी, तो अहमद की माँ करीमुन रास्ता रोके खड़ी हो गयी। उसका पल्लू थामे अहमद सहमा हुआ खड़ा था। रहमत बी मामले को समझ गयी। वह करीमुन के तेवर देखकर खुद भी तैयार होने लगी। पहले तो उसने घड़े को जमीन पर रखा, फिर साड़ी के पल्ले को कमर पर कस लिया और बोली,“क्या है री, लड़ाई हुई बच्चों में और आ गयी तू लड़ने!…बोल क्या बोलती है?”
सुनकर करीमुन बोलने लगी—“अरे वाह, चोरी की चोरी और उस पर सीनाजोरी? मेरे बच्चे को मारा और उस पर मुझे आँखें दिखाती है! हरामजादी, चीर के रख दूँगी, समझती क्या है!”
अहमद ने सोचा कि अब लड़ाई होने वाली है और साथ में उसकी पिटाई भी। इसलिए वह वहाँ से भाग गया और ये दोनों लड़ने लगीं।
करीमुन ने उसके हाथ से घड़ा छीनकर परे फेंक दिया। रहमत बी को बहुत गुस्सा आया। उसने करीमुन को बालों से पकड़कर उसे जमीन पर गिरा दिया और हाथों-लातों से मारना शुरू कर दिया। करीमुन को मौका मिला तो उसने भी रहमत बी को पीटना शुरू कर दिया। फिर लड़ाई-लड़ाई में करीमुन के हाथ एक पत्थर आ गया, जो उसने रहमत बी के सिर पर दे मारा। रहमत बी के सिर से खून निकलने लगा और वह चीखने-चिल्लाने लगी। मुहल्ले की दूसरी औरतें, जो बहुत देर से खड़ी तमाशा देख रही थीं, करीब आ गयीं। इनमें से कुछ तो रहमत बी की ओर हो गयीं और कुछ करीमुन की ओर। फिर क्या था, अच्छी-खासी जंग छिड़ गयी। इसके बाल उसके हाथ और उसका जिस्म इसकी लात। बहरहाल, उस गली में एक हंगामा खड़ा हो गया। सब बोल रही थीं। कुछ मरदों ने बीच-बचाव करना चाहा, पर वे बेचारे औरतों के हाथों पिट गये। न जाने किसने पुलिस स्टेशन में खबर कर दी कि वहाँ पुलिस वाले भी आ गये। उनके आते ही भीड़ छंट गयी। कुछ औरतें तो भाग गयीं। पुलिस वालों जब हकिकत जाननी चाही तो औरतों ने रहमत और करीमुन को सामने कर दिया। पुलिस वालों ने दो-चार औरतों को गवाह रखा और उन दोनों को लेकर आगे बढ़े।
रास्ते में करीमुन और रहमत बी की नजरें अहमद और अनवर पर पड़ीं। दोनों बच्चे गिल्ली-डंडा खेल रहे थे। दोनों औरतें ठिठककर एक-दूसरे को देखने लगीं। फिर दोनों की पलकें शर्म के बोझ से झुक गयीं।