Monday, 28 September, 2020

लघुकथा के समीक्षा-बिन्दु-7 / डॉ॰ पुरुषोत्तम दुबे

दिनांक 27-9-2020 से आगे

लघुकथा  : वीक्षा-समीक्षा के आधारभूत सूत्र

7वीं समापन कड़ी

 

अक्सर एक ही लघुकथा कई-कई पाठकों के सामने से गुजरती है और विभिन्न पाठकों की रायशुमारियाँ उस लघुकथा पर शनैःशनैः सामने आती हैंऋ इन और ऐसी आयातित रायशुमारियों को संचित कर उनमें से लघुकथा को श्रेष्ठ या प्रभावी ज्ञापित करनेवाले विचारों की एक पेफहरिस्त तैयार कर पिफर उस लघुकथा पर अन्तिम विचार देने के लिए यदि समीक्षक आगे आता है
, तो वास्तव में वह समीक्षक उस लघुकथा के प्रभाव को सौ-टंच विश्लेषित कर आलोचकों के मध्य अपने कद को बढ़ा हुआ पाएगा।

एक प्रभावी लघुकथा में कतिपय महत्त्वपूर्ण बातों का होना जरूरी है जो लघुकथा के समीक्षक का ध्यान बरबस खींचने में सहायक हों। मसलन, समीक्षकों को चाहिए कि सर्वप्रथम यह देखें कि लघुकथा में वस्तु-रचना अथवा कथावस्तु का विकास कैसे सम्पादित हुआ है। लघुकथा में यथार्थवाद अर्थात् गुण-दोषमय इस संसार में लघुकथाकारों को जो वस्तुएँ जिस रूप में प्राप्त हुई हैं, उनका उसी रूप में वह कहाँ तक चित्राण कर पाया है। लघुकथा में विषय के प्रतिपादन में विषयानुरूप शैली का अनुसरण कहाँ तक हुआ है। इन्हीं जरूरी कारकों के कारण एक लघुकथा में प्रभावशीलता पैदा होती हैऋ जो समान रूप से पाठक और आलोचक दोनों पर अपना प्रभाव छोड़ती है।

लघुकथा : शब्द सीमा और वीक्षा-समीक्षा

लघुकथा के समीक्षक की बात करें तो वह भी हिन्दी की मान्य विधाओं के समीक्षकों की तरह पहले दृष्टा होता है, पिफर सृष्टा। दृष्टा से मेरा गहन तात्पर्य यही है कि उसकी अन्वेषी दृष्टि केवल आलोच्य लघुकथा के इर्द-गिर्द केन्द्रित न रहकर लघुकथा के अन्यान्य सर्जकों, लेखकों और समय-समय पर लघुकथा के सन्दर्भ में अपनी रायशुमारियाँ ज्ञापित करनेवाले विचारकों के प्रसारित वक्तव्यों से भी जुड़ी होनी चाहिए।

ताकि लघुकथाओं के पैरोकारों की लघुकथा-विषयक बनावट और बुनावट जैसी घोषणाओं का दोहन किया जाकर आलोच्य लघुकथा की रचना-प्रक्रिया के साथ लघुकथा को उसकी सीमा-रेखा, उसका आदर्श विधान और अन्यान्य मतवादों से उपजे लघुकथा-विषयक तात्त्विक सुधारों को अंगीकृत करते हुए, ऐसे ही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों के मध्य से लघुकथा का रचनात्मक मान स्थिर किया जा सके।

प्रायः लघुकथा के प्रत्येक समीक्षक के दोहरे दायित्व होते हैं। प्रथमतः लघुकथा की तत्त्वगत समीक्षा करना, द्वैतीयक, निष्कर्ष रूप में लघुकथा के आकार-प्रकार पर अपने अभिमत देते हुए लघुकथा की सृजनावस्था पर अब तक मिले पाठकीय निष्कर्षों के समुच्चय; कॉम्बिनेशन में से लघुकथा-विषयक उचित/अनुचित विचारों का छिद्रान्वेषण करते हुए लघुकथा के रचना-विधान-विषयक कोई उपयोगी और विश्वसनीय आख्यान लिख देना।

लघुकथा पर बहस-मुबाहिसों अथवा चर्चा-परिचर्चाओं की मजलिसें; सभाएँ आयोजित करना आजकल की फैशन बन गई है और यह बुरी बात नहीं है। लेकिन मिथ्या बात यह है कि लघुकथा के आकार-प्रकार, उसके रूप-स्वरूप का निर्धारण लघुकथा-लेखन के समष्टिगत रूप को लेकर नहीं हो पा रहा है अपितु अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग के आधार पर अथवा स्पष्ट कहूँ तो अपनी-अपनी लघुकथाओं को ही मानक मानकर लघुकथाओं के आकार के पक्ष में पुरजोर दलीलों के साथ अपना मन्तव्य, एक प्रकार से कहें तो थोपा जा रहा है। ऐसे में लघुकथा के समीक्षक को सँभलना होगा। लघुकथा-विषयक व्यक्तिगत वैचारिक ज्यादतियों को सही जवाब देना होगा और यह काम एक सच्चा तथा निष्ठावान समीक्षक, अपनी लिखी लघुकथाओं को ;गो कि यदि समीक्षक खुद भी लघुकथा-लेखक है तो?द्ध एकमात्रा आधार बनाकर लघुकथा के आकार-प्रकार को नियोजित करने के वास्ते उन तमाम-तमाम लघुकथाओं का मजमा अपनी निगाहों के मध्य से गुजारना होगा, जिनको सानी मानते हुए लघुकथा की सीमा का एक विश्वसनीय और सर्वमान्य रेखांकन किया जा सके।

प्रसंगवसात् यहाँ कविवर बाबू जयशंकर प्रसाद की कही काव्यात्मक पंक्तियाँ प्रेषित कर रहा हूँ जिसमें ‘सीमा’ के अन्तस् के साथ ‘ससीम’ और ‘असीम’ एकाकार होकर दृष्टव्य है

माना रूप सीमा है

जीवन के चिर यौवन में

पर समा गई थीं तुम

मन के निस्सीम गगन में।

भाव यह कि लघुकथा-लेखन तो गागर में सागर भर देनेवाली बात है। जिस प्रकार किसी अपठित गद्यांश का सारांश एक तिहाई शब्दों में लिखकर सम्बन्धित सवाल को छुड़ाया जाता है; ठीक वैसे ही सीमित शब्दों की आसन्दी पर लघुकथा स्थापित की जा सकती है।

जो सवाल आजकल लघुकथा के आकार-प्रकार पर ज्वलन्त होकर सामने आ रहा है, वह यह कि लघुकथा का आकार-प्रकार अथवा सीमा निर्धारण अधिकतम कितने शब्दों में होना चाहिए? हजार, पन्द्रह सौ या फिर पाँच सौ शब्दों में?

लघुकथा की समीक्षा का एक प्रबल प्रश्न यह भी है कि समीक्षक देखें कि जिन लघुकथाओं को वह आलोचना-दृष्टि में उतार रहा है, उन लघुकथाओं के आकार-प्रकार के साथ उन लघुकथाओं की सीमागत स्थिति पर भी समीक्षक को अपने विचार रखते चलना चाहिए। किसी भी लघुकथा की समीक्षा का एक आधारभूत तत्त्व यह भी है कि समीक्षक केवल और केवल लघुकथा के कथ्य, भाषा-शिल्प, सांकेतिकता आदि पर ही अपने विचार केन्द्रित न रखे प्रत्युत् लघुकथा की सीमा-रेखा पर भी उसे अपनी ओर से कोई जरूरी सुझावनुमा विचार रखना चाहिए।

लघुकथा की सीमा निर्धारण के तारतम्य में लघुकथाकार मधुदीप की ओर से ‘उनकी पफेसबुक’ वॉल पर उनकी ओर से तीन महत्त्वपूर्ण बिन्दु रखे गए हैं

         1.      लघुकथा में लघु शब्द की मर्यादा का पालन अवश्य करना चाहिए।

         2.      1000 से अधिक शब्दों की रचना को लघुकथा मानना अतिवाद होगा।

         3.      लघुकथा की आदर्श शब्द सीमा 500-550 शब्दों से अधिक नहीं होनी चाहिए।

यहाँ मैं मधुदीप की कही बात से सहमत होकर मेरी ओर से मधुदीप के कथनों की पुष्टि में तीन बातें रखना चाहता हूँ

1. लघुकथा में यथार्थ को अभिव्यक्त करने के लिए लघुकथा का ‘स्पेस’ बढ़ाने की जरूरत नहीं है क्योंकि लघुकथा में ‘स्पेस’ का होना महत्त्व नहीं रखता है, प्रत्युत् लघुकथा में ‘यथार्थ’ भाषा से उद्घाटित होता है। अतएव लघुकथा में ‘स्पेस’ बढ़ाने का नहीं भाषा का महत्त्व है। ‘स्पेस’ को बढ़ाना कहानी की सीमा को छूना होगा।

2. शब्द संख्या के हिसाब से न तो लघुकथा का कण्टैण्ट सोचा जा सकता है और न ही निर्धारित शब्दों में लघुकथा लिखी जा सकती है। लेकिन लघुकथा का रचनाकार लघुकथा लिखते समय लघुकथा में ‘लघु’ शब्द का अंकुश अपनी लेखनी पर बराबर बनाए रखता है। दरअसल लघुकथा-लेखन का माहात्म्य हमारे पूर्वज लघुकथाकारों की जागीर है। हमको विशद शब्द-संख्या का बारम्बार दोहन करते हुए, तपे हुए कुन्दन की तरह अँगूठी में ‘पिफटवाले नगीने की तरह लघुकथा लिखनी चाहिए। यह तब ही सम्भव है, जब हम लघुकथा में आए हुए लम्बे-लम्बे वाक्यों को एक शब्द में लिखकर ऐसे ही शब्दों का ‘सेतु’ बनाते हुए लघुकथा का ‘लघु’ रूप गढ़ते चले जाएँ। मसलन, ‘अपने धर्म को श्रेष्ठ बतलाते हुए औरों के धर्म की निन्दा करने, जैसा बड़ा वाक्य न लिखकर इस वाक्य में से प्रकट होनेवाले भाव को, लघुकथा के सम्पादन में एक शब्द ‘साम्प्रदायिकता’ लिखकर लघुकथा के ‘लघु’ रूप को शाब्दिक छैनी से गढ़ सकते हैं।

3. मधुदीप का यह कथन शतशः सही है कि लघुकथा की आदर्श शब्द सीमा 500-550 से अधिक नहीं होनी चाहिए। उनकी सीमा-सूचकांक-संख्या से इस अर्थ में सहमत हुआ जा सकता है कि लघुकथाकार मधुदीप ने यह बात मुस्तैदी से इस कारण कह दी है कि मधुदीप वेवल लघुकथाकार ही नहीं हैं वरन् हिन्दी लघुकथा के तारतम्य में अपनी प्रकाशन संस्था ‘दिशा प्रकाशन’ से ‘पड़ाव और पड़ताल’ शीर्षक से लघुकथाओं के सिलसिले में लघुकथाओं का  शृंखलाबद्ध प्रकाशन किया हैऋ यही मधुदीप के लघुकथा-विषयक शब्द सीमा निर्धारण का अनुभवी पैमाना है। यानी 500-550 की अधिकतम सीमा लघुकथा की रचनाभूमि के लिए आवंटित की जानी चाहिए।

मैं व्यक्ति रूप में लघुकथा की शब्द सीमा को 500-550 के इंच टेप से थोड़ा और इधर यानी 300-350 शब्दों का दायरा देना चाहता हूँ। गो कि लघुकथा का पाठक लघुकथा के नितान्त सीमित शब्द संख्यावाले आकार से प्रभावित होकर ही लघुकथा-वाचन के समीप आया है। निष्कर्ष रूप में इस बात को इस तरीके से कह सकता हूँ कि, लघुकथा से जुड़ा ‘लघु’ शब्द का ‘इंजन’ लघुकथा की रचनात्मकता को उस पटरी से कदापि नहीं उतरने देगा, जो पटरी लघुकथा को उचित शब्द सीमा के निमित्त बिछाई हुई है।           

सम्पर्क : ‘शशीपुष्प’, 74 जे/ए, स्कीम नं. 71, इन्दौर-452 009  म.प्र.
               मो. : 093295 81414

No comments: