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Saturday, 6 June 2009

लघुकथा-लेखन में राजस्थान का योगदान

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महेन्द्र सिंह महलान
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(मई 2009 से आगे का अंश)
एकल लघुकथा-संग्रह
सन 1966 में सुगनचंद्र ‘मुक्तेश’ का लघुकथा-संग्रह ‘स्वाति बूँद’ प्रकाशित हुआ। इसकी अधिकांश रचनाएँ उपदेशात्मक हैं। सन 1979 में दुर्गेश की पचास लघुकथाओं का संग्रह ‘कालपात्र’ प्रकाशित हुआ, जिसका मुख्य-स्वर व्यंग्य है। वर्ष 1963 में प्रकाशित ‘अनमोल सीपियाँ’ नाम से कृष्णा भटनागर का संग्रह प्रकाशित हुआ जिसकी अधिकांश लघुकथाएँ उपदेशात्मक हैं। 1984 में पुष्पलता कश्यप की 62 चुनिंदा लघुकथाओं का संग्रह ‘अहसासों के बीच’ प्रकाश में आया। इनकी लघुकथाएँ इस विधा को सही दिशा देने में सक्षम हैं। 1985 में योगेन्द्र दवे की लघुकथाओं का संग्रह ‘विषमता’ आया तथा इसी वर्ष मुकेश जे रावल का संग्रह ‘मुट्ठी भर आक्रोश’ भी प्रकाश में आया। अंजना अनिल का लघुकथा-संग्रह ‘साक्षात्कार’ 1986 में प्रकाशित हुआ। इसके उपरांत डॉ राम कुमार घोटड़ का पहला लघुकथा-संग्रह ‘तिनके-तिनके’ सन 1989 में व दूसरा लघुकथा-संग्रह ‘क्रमश:’ वर्ष 2000 में प्रकाशित हुआ। वर्ष 1993 में महेन्द्र सिंह महलान की लघुकथाओं का संग्रह ‘सिलसिला’ प्रकाशित हुआ जिसमें 69 लघुकथाएँ हैं। आम-आदमी से जुड़ी ये लघुकथाएँ विसंगतियों पर प्रहार करती हैं। वर्ष 1996 में तीन महत्वपूर्ण लघुकथा-संग्रह प्रकाश में आए। ये हैं— गोविंद गौड़ का ‘प्रहार’, रत्नकुमार साँभरिया का ‘बाँग और अन्य लघुकथाएँ’ तथा भगीरथ का ‘पेट सबके हैं’। 1998 में माधव नागदा का लघुकथा-संग्रह ‘आग’ प्रकाशित हुआ।
इस तरह राजस्थान के लघुकथाकार लघुकथा-साहित्य को निरन्तर समृद्ध करते आ रहे हैं।
संपादित लघुकथा-संकलन
सन 1974 में भगीरथ व रमेश जैन के संयुक्त संपादन में ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ लघुकथा-संकलन प्रकाश में आया। इसमें 31 कथाकारों की 42 लघुकथाएँ तथा भूमिका ‘लघुकथा:गुफाओं से मैदान की ओर’ के अलावा लघुकथापरक 5 टिप्पणियाँ भी संकलित हैं। इस संकलन ने लघुकथा को अँधेरे दायरों से निकालकर जन-साधारण के संघर्ष, त्रासदी, भीषण यथार्थ को भोगने की यातनापूर्ण विडम्बना आदि के बहुआयामी धरातल से जोड़ा है। इसमें कैलाश जायसवाल की ‘पुल बोलते हैं’ एक अनूठी लघुकथा है। ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ को देश में समकालीन हिन्दी लघुकथा-आन्दोलन का पहला संकलन होने का गौरव प्राप्त है।
वर्ष 1983 में आदर्श भारतीय साहित्यकार परिषद, जयपुर द्वारा आयोजित अखिल भरतीय लघुकथा प्रतियोगिता की पुरस्कृत लघुकथाओं का संकलन ‘प्रेरणा’(संपादक: नंदकिशोर ‘नंद’) प्रकाशित हुआ। इसमें श्रीराम ठाकुर ‘दादा’ की लघुकथा ‘सुरसा की विजय’, कमलेश भारतीय की लघुकथा ‘पूछताछ’, रामनिवास ‘मानव’ की ‘एक ही रास्ता’, महेन्द्र सिंह महलान की ‘कटखना भय’, विक्रम सोनी की ‘बनैले सुअर’ तथा मधुकांत की ‘इंटरव्यू’ श्रेष्ठ रचनाएँ हैं।
सन 1984 में महेन्द्र सिंह महलान और मोहन योगी के संपादन में युवा रचनाकार सोसाइटी, फेफाना द्वारा वर्ष 1981, 1982 व 1983 में आयोजित अखिलभारतीय लघुकथा प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत 31 लघुकथाओं के साथ अन्य श्रेष्ठ रचनाओं को शामिल कर कुल 94 लघुकथाओं का संकलन ‘सबूत-दर-सबूत’ प्रकाशित हुआ। मानवीय मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में इस संग्रह को एक सार्थक प्रयास माना गया। इसमें जेबकतरा, अंधी दौड़, सब राजी-खुशी, प्रश्नहीन, ईद मुबारक, पहचान, भूख, धर्मयुद्ध, पागल, सच्ची गवाही आदि प्रथम श्रेणी की लघुअकथाओं के साथ डॉ पांडुरंग भोपले, पारस दासोत, सतीशराज पुष्करणा, सत्यवीर मानव, मदन मोहन ‘उपेन्द्र’, निहाल हाश्मी, शराफत अली खान, बलराम अग्रवाल, विक्रम सोनी, विष्णु प्रभाकर तथा महेन्द्र सिंह महलान की रचनाएँ विशेषत: सराही गईं।
1985 में महेश संतुष्ट, ओम पुरोहित ‘कागद’, राजेश चड्ढा, नरेश विद्यार्थी के संपादन में मरुधरा साहित्य परिषद, हनुमानगढ़ संगम का काव्य व लघुकथा-संकलन ‘मरुधरा’ छपा। इसी वर्ष वकील साहेब(स्नेह इन्द्र गोयल), प्रमोद कुमार शर्मा, संदीप डूमरा ‘गंभीर’, गुरमीत सोहल के संपादन में युवा लेखक संघ, हनुमानगढ़ का काव्य एवं लघुकथा-संकलन ‘साहित्य प्रसव’ प्रकाशित हुआ। नन्दकिशोर ‘नन्द’ पारीक द्वारा संपादित ‘अंजलिभर धूप’ में भी कविताएँ और लघुकथाएँ संकलित हैं।
वर्ष 1986 में माधव नागदा के संपादन में ‘पहचान’ लघुकथा-संकलन संबोधन प्रकाशन, कांकरोली से प्रकाशित हुआ। इसमें संकलित लघुकथाएँ अपने कथ्य एवं शिल्प के ताजेपन के कारण अपनी सशक्त पहचान बनाती हैं। ये लघुकथाएँ मनुष्य के सुखद भविष्य के प्रति तो आश्वस्त करती ही हैं, उन षड्यंत्रों को भी बेनकाब करती हैं जो लगातार आदमी के खिलाफ किए जा रहे हैं। डॉ वेद प्रकाश अमिताभ, कमल चोपड़ा, बलराम अग्रवाल, यश खन्ना ‘नीर’ और पारस दासोत के महतवपूर्ण लेख इस संग्रह में उपलब्ध हैं।
वर्ष 1987 में पूरे देश में कुल ग्यारह लघुकथा-संकलन प्रकाशित हुए। विद्वान समीक्षकों की राय में इनमें महेन्द्र सिंह महलान व अंजना अनिल द्वारा संपादित ‘संघर्ष’ के अतिरिक्त कोई अन्य संकलन ऐसा नहीं है, जिसे उल्लेखनीय कहा जा सके। इस दृष्टिकोण से 1987 का वर्ष पूर्णत: राजस्थान के खाते में दर्ज होता है। इस संग्रह की लघुकथाओं में तकनीक को लेकर सजगता का भान स्पष्ट दिखाई देता है। राजकुमार सिंह की ‘कुत्ता पाठ-एक’ में फैंटेसी का उपयोग हुआ है तो डॉ शंकर पुणतांबेकर की ‘अवैध संतान’ में प्रतीकात्मकता मुखर है। सुशील राजेश की ‘अलगाव’ में अभिप्राय को सिर्फ संवादों के माध्यम से कहा गया है। सुकेश साहनी की ‘वापसी’ में पूर्वदीप्ति का इस्तेमाल सार्थक ढंग से हुआ है। आनन्द बिल्थरे की ‘इनसे कहना’ में मिथक को आधुनिक रूप दिया गया है। अशोक मिश्र की ‘आँखें’ में व्यंग्य का प्रभाव रेज़र की छुअन जैसा है। इस प्रकार इस संग्रह की लघुकथाओं में शिल्पगत सुन्दरता एवं वैविध्य पर्याप्त मात्रा में है और ये रचनाएँ पाठकों को वैचारिक खुराक देकर बहुत-से मुद्दों पर सोचने-विचारने की प्रेरणा देने के लिहाज-से बहुत महत्वपूर्ण हैं।
पुस्तक में लघुकथा के सफल एवं चर्चित हस्ताक्षर कमल चोपड़ा से अंजना अनिल द्वारा लिया गया साक्षात्कार है जिसमें लघुकथा पर उठ रहे विभिन्न प्रकार के प्रश्नों के समुचित उत्तर दिए गए हैं। महेन्द्र सिंह महलान ने अपने लेख ‘लघुकथा प्रतियोगिताएँ : दशा एवं दिशा’ में प्रतियोगिताओं के आयोजन के कारणों पर प्रकाश डालते हुए इस कार्य की विस्तृत समीक्षा की है। भविष्य में प्रतियोगिता आयोजित करने वाले महानुभावों के लिए यह लेख एक मार्गदर्शक का कार्य कर सकता है। मुद्रण, साज-सज्जा व कागज के दृष्टिकोण से यह पुस्तक अत्यंत सुन्दर है। जालंधर दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम में इसे स्क्रीन पर दिखाया गया। ‘हालात’ व ‘हस्ताक्षर’ की भाँति यह पुस्तक व्यापक स्तर पर अत्यन्त चर्चित हुई।
मोहन सोनी ‘अनन्त सागर’ के सम्पादन एवं प्रकाश पंकज के संयोजन में गुलजस्ता रचना मंच, लोढ़सर द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में पुरस्कृत तथा अन्य विशिष्ट लघुकथाओं को लेकर वर्ष 1988 में ‘यथार्थ’ नामक संकलन आकर्षक साज-सज्जा के साथ छपा। संपादकीय, संयोजकीय एवं निर्णायकीय(विक्रम सोनी व लतीफ घोंघी) की औपचारिकता के बाद प्रतियोगी लघुकथाएँ साभार ली गई हैं। तरुण जैन, डॉ सतीशराज पुष्करणा, डॉ उषा माहेश्वरी, माधव नागदा, सतीश राठी, कर्मेन्द मणि ‘भारतीय’ तथा धीरेन्द्र शर्मा के लेख हैं जो अपने-अपने स्थान पर उपयोगी हैं। यह पुस्तक युवा संपादकों के परिश्रम की एक सफल कोशिश है।
वर्ष 1989 में व 1990 में मार्च तक देश में कुल 18 संपादित लघुकथा-संकलन प्रकाशित हुए। समीक्षकों की राय में इनमें मात्र 5 ऐसे संकलन थे जो लघुकथा की यात्रा को विकास देते हैं। इनमें महेन्द्र सिंह महलान व अंजना अनिल द्वारा संपादित वर्ष 1989 में प्रकाशित लघुकथा-संकलन ‘मंथन’ का एक महत्वपूर्ण स्थान है। मुद्रण, साज-सज्जा व कागज के दृष्टिकोण से यह पुस्तक ‘संघर्ष’ की तरह अत्यंत सुन्दर बन पड़ी है। इसमें एकल लघुकथा-संग्रहों पर देश में पहली बार एक अद्भुत कार्य हुआ है। संग्रह में डॉ सतीशराज पुष्करणा, मधुकांत, कमलेश भारतीय, डॉ किशोर काबरा, पूरन मुद्गल, डॉ सुरेन्द्र मंथन, पुष्कर द्विवेदी, मुकेश जैन ‘पारस’, अमरनाथ चौधरी ‘अब्ज’, चन्द्रभूषण सिंह ‘चन्द्र’, डॉ राजेन्द्र भारती, बृजेन्द्र सिंह ‘वैरागी’, अतुल मोहन प्रसाद, पारस दासोत, सिन्हा वीरेन्द्र, डॉ राम निवास मानव, अंजना अनिल, लखन स्वर्णिक, कृष्णा भटनागर, डॉ सतीश दुबे के निजी लघुकथा-संग्रहों की विस्तृत समिक्षाएँ की गई हैं तथा इनकी दो से छह तक चुनिंदा लघुकथाओं को लेकर 89 लघुकथाएँ संकलन में संजोई गई हैं। इसमें महेन्द्र सिंह महलान का एक लेख ‘एकल लघुकथा संग्रह:स्थिति और मूल्यांकन’ है जो पुस्तक को अतिरिक्त गरिमा प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त अंजना अनिल द्वारा डॉ सतीश दुबे से लिया गया साक्षात्कार है जो लघुकथा को एक दिशा प्रदान करता है। वर्ष 1989 में ही डॉ स्नेह इन्द्र गोयल द्वारा संपादित संकलन ‘दर्पण’ श्रीगंगानगर से प्रकाशित हुआ।
राजस्थान शिक्षा विभाग सन 1967 से लगातार महत्वपूर्ण संकलन देश के ख्यातिलब्ध साहित्यकारों के संपादन में प्रकाशित कराता आ रहा है। इन संकलनों में साहित्य की अन्य विधाओं के साथ लघुकथाओं को पर्याप्त सम्मान के साथ स्थान दिया जाता रहा है। इसमें राजस्थानी भाषा के संग्रह भी सम्मिलित हैं। शिक्षा विभाग, राजस्थान, बीकानेर का यह देश में पहला और अनूठा प्रयोग है। शिक्षक दिवस, माह सितम्बर में प्रकाशित इन संग्रहों में कुछेक के नाम इस प्रकार हैं—प्रयास(सं शिवानी) वर्ष 1980, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे(सं मृणाल पाण्डे) वर्ष 1982, कूँपल(सं कल्याण सिंह शेखावत) वर्ष 1982, हिबरैड़ो उजास(सं श्रीलाल नथमल जोशी) वर्ष 1983, रास्ते अपने-अपने(सं राजेन्द्र अवस्थी) वर्ष 1985, प्रतिभा के पंख(सं क्षेमचन्द्र ‘सुमन’, पद्मश्री) वर्ष 1992, सुनो कहानी(सं स्वयं प्रकाश) वर्ष 1993, महकते अक्षरों का आकाश(सं डॉ मदन केवलिया) वर्ष 1995 इत्यादि।
वर्ष 1994 में बलराम के संपादन में ‘थार की धार’ लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हुआ। इसमें सिंध, गुजरात और राजस्थान की लघुकथाएँ दी गई हैं। संपादकीय में बलराम ने राजस्थान के लघुकथा परिदृश्य पर संक्षिप्त किन्तु सटीक प्रकाश डाला है। इस संग्रह में विजयदान देथा, यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’, सांवर दइया, हरदर्शन सहगल, मोहरसिंह यादव, योगेन्द्र दवे, हसन जमाल, भगीरथ, अंजना अनिल, उषा महेश्वरी, मालचंद तिवाड़ी, शकुंतला किरण तथा विभा रश्मि की कई चुनिंदा लघुकथाएँ इसमे संकलित हैं। ‘विश्व लघुकथा कोश’ के अंतर्गत बलराम द्वारा किए कार्यों में यह पुस्तक काफी महत्वपूर्ण है।(समाप्त)

Saturday, 30 May 2009

लघुकथा-लेखन में राजस्थान का योगदान

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महेन्द्र सिंह महलान
पत्र-पत्रिकाएँ
जनवरी 1971 में मोहन राजेश ने ब्यावर से प्रकाशित ‘पवित्रा’ में चार लघुकथाएँ प्रकाशित करना आरम्भ किया। रावतभाटा(वाया कोटा) से 1972 में भगीरथ व रमेश जैन ने लघुकथा को समर्पित देश की प्रथम पत्रिका ‘अतिरिक्त’ में न केवल प्रकाशित किया बल्कि एक सार्थक दिशा भी दी। लघुकथा को व्यवस्थित रूप देने में इस पत्रिका का बहुत योगदान रहा। ब्यावर से ही मोहन राजेश के संपादकत्व में 1974 में ‘डिक्टेटर’ साप्ताहिक का दीपावली के अवसर पर अच्छा विशेषांक प्रकाशित हुआ। इससे लघुकथा की पहचान और भी स्पष्ट हो गई। इसी पत्रिका का दूसरा विशेषांक 12 अगस्त, 1976 को भँवर शर्मा और सत्य शुचि के संपादकत्व में आया। यह अंक भी उपयोगी सिद्ध हुआ। जयपुर से प्रकाशित ‘अग्रगामी’(संपादक:जुगल किशोर टकसाली) का एक लघुकथा-विशेषांक जून 1977 में कृष्ण कमलेश के अतिथि-संपादन में प्रकाशित हुआ जो बहुत ही चर्चित व उल्लेखनीय रहा। इसमें 29 लघुकथाएँ थीं तथा लघुकथा विषय पर केन्द्रित 3 लेख भी सम्मिलित थे। इस अंक की प्राय: सभी लघुकथाएँ श्रेष्ठता की गिनती में आती हैं।
प्रभाकर आर्य के संपादन में हिंडौन सिटी से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘युगदाह’ का भारी-भरकम विशेषांक कृष्ण कमलेश के अतिथि-संपादकत्व में सन 1979 में निकला। इसमें मुलम्मा, बड़ा आदमी, संवेदनशील, हिस्से का दूध, स्थगन, नियति, नसीहत आदि लघुकथाएँ विशेष रूप से अपने तेवर के कारण प्रभावित करती हैं। भगीरथ व पुष्पलता कश्यप के लघुकथा-विषयक लेख इस अंक की विशेष उपलब्धि हैं। ये लघुकथा के विकास और स्वरूप पर पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। यह देश का प्रथम लघुकथा-विशेषांक है जिसमें लघुकथारों का सचित्र परिचय प्रकाशित किया गया।
ए हुसैन और क़मर मेवाड़ी के संपादन में कांकरोली से प्रकाशित ‘सम्बोधन’ ने 1982 के अपने अंक में प्रतियोगिता में पुरस्कृत लघुकथाएँ प्रकाशित कीं। भारत, प्रत्याक्रमण, खेल जैसी कालजयी लघुकथाएँ इसी अंक की उपलब्धि हैं। वर्ष 1988 में ‘सम्बोधन’ ने लघुकथा-विशेषांक भी प्रकाशित किया जिसमें मनुष्य के चरित्र-पतन, घनीभूत होती कठिनाइयों, मुखौटाग्रस्त तथा अवसरवादी एवं पलायनवादी प्रवृत्तियों को अनावृत्त करने वाली सशक्त लघुकथाएँ, सटीक समीक्षाएँ, स्तरीय बातचीत व आलेख थे।
प्रताप सिंह शेखावत के संपादन में जयपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘कर्म चिन्तन’ का जनवरी 1983 में लघुकथा-प्रतियोगितांक प्रकाशित हुआ। इसमें गिरोह का आदमी(कालीचरण ‘प्रेमी’), आउट(कमल चोपड़ा), पेट पर लात(विक्रम सोनी), आटा और जिस्म(सतीश राठी), थूक सने चेहरे(महेन्द्र सिंह महलान), कुत्ता-पाठ एक(राजकुमार सिंह) जैसी यादगार रचनाएँ इस अंक की देन हैं। ‘कर्म चिन्तन’ का जनवरी 1985 का अंक लघुकथा-विशेषांक के रूप में निकला। ‘सम्बोधन’ व ‘कर्म चिन्तन’ के ऊपर लिखित अंक बहुत चर्चित एवं प्रशंसित रहे। इनके साथ ही ‘युवा हस्ताक्षर’(हिण्डौन सिटी) तथा ‘लहर’(अजमेर) के लघुकथांक भी कम महत्वपूर्ण नहीं थे।
वर्ष 1987 में हनुमानगढ़ से महेश संतुष्ट के संपादन में ‘राजस्थान साहित्यिक’ का एक लघुकथा-विशेषांक तथा एक मिला-जुला साहित्यांक छपा। लघुकथांक में राष्ट्रीय व राज्य स्तर के कुछ चोटी के लेखकों की रचनाओं के अलावा श्रीगंगानगर जिले के कई उदीयमान लेखकों की रचनाएँ भी थीं। जिले के लघुकथाकारों को प्रकाश में लाने की दृष्टि से इन दोनों ही अंकों की उपयोगिता विशेष परिलक्षित होती है। वर्ष 1979 में मोहन योगी व महेन्द्र सिंह महलान के संपादकत्व में ‘राजस्थान सावित्री’ के अंकों में रमेश सिंह राणावत व श्रीराम मीणा की व्यंग्य-प्रधान तीखी लघुकथाएँ थीं। श्रीगंगानगर से स्नेह इन्द्र गोयल के संपादन में प्रकाशित होने वाले ‘स्नेहिल संदेश’ में लगातार श्रेष्ठ रचनाएँ देखने में आती रही हैं। श्रीगंगानगर से ही छपने वाले ‘लोक सम्मत’, ‘दैनिक प्रताप’, ‘नियति’ आदि में भी लघुकथा पर उपयोगी सामग्री प्रकाशित होती रही है।
जयपुर से प्रकाशित होने वाली प्रदेश की मुख्य साप्ताहिकी ‘इतवारी पत्रिका’ ने शुरू-शुरू में यद्यपि लघुकथाओं से परहेज किया, लेकिन 1978-79 में पहली बार इस पत्रिका ने पुष्पलता कश्यप की लघुकथाएँ धारावाहिक रूप से 11-11 की संख्या में सचित्र छपीं। ये लघुकथाएँ अत्याधिक चर्चित व प्रशंसित हुईं और इन्होंने राजस्थान प्रदेश के पत्रों में छाई जड़ता को तोड़ने व इस विधा को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण कार्य किया। जयपुर से प्रकाशित ‘दैनिक नवज्योति’ में भी स्तरीय लघुकथाएँ छपती रहीं हैं।
राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर की पत्रिका ‘मधुमती’ में श्रेष्ठ लघुकथाएँ छपती रही हैं। इस अकादमी और ‘युगधारा’ के संयुक्त तत्वावधान में नवन्बर 1992 में अकादमी के सभागार में एक लघुकथा-संगोष्ठी का आयोजन किया गया था।
इन पत्र-पत्रिकाओं के अलावा अलवर विचार टाइम्स, विवेक विकास, सूर्यमुखी, निरन्तर कालबोध, प्रताप केसरी, तटस्थ, आसंगिनी, परिदृष्टा, लोक शासन, प्रभासिका, बात तो चुभेगी, युवादृष्टि, राजस्थान शिक्षक, शिविरा, लोक संपर्क, श्रमोपदेशक, अपूर्ण, राही, जगमग दीप ज्योति, राजस्थान विकास, विश्वम्भरा, वरदा, गुलजस्ता, परिणय संदेश, वातायन, सीमा संदेश, राजस्थान सुजस तथा शेष इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं ने भी लघुकथा के प्रकाशन एवं प्रचार-प्रसार में सहयोग देकर राजस्थान की साहित्यिक एकजुटता का परिचय दिया है।
राजस्थानी भाषा की पत्र-पत्रिकाएँ
राजस्थानी भाषा में लघुकथा का अंकुरण किशोर कल्पनाकांत द्वारा संपादित ‘ओलमो’ के सन 1954 में प्रकाशित प्रवेशांक में छपी मुरलीधर व्यास की ‘प्रभु से धरम’ तथा ललित कुमार की ‘आवाज’ व ‘भेद’ शीर्षक लघुकथाओं के रूप में दिखाई देता है। यद्यपि इन लघुकथाओं में लघुकथा के सभी आधुनिक गुण मौजूद नहीं हैं, फिर भी इन्हें लघुकथा की श्रेणी में रखने से नकारा नहीं जा सकता। इस अंक में ये रचनाएँ ‘नानकड़ी कांणी’ यानी ‘छोटी कहानी’ स्तंभ के अन्तर्गत प्रकाशित हुई थीं। डॉ रावत सारस्वत द्वारा संपादित ‘मरुवाणी’(अंक 2, 1956) में शान्ति शर्मा की रचना ‘बिचारो दिनकर’ लघुकथा के रूप में दृष्टिगत है। 1956 में ही अद्भुत शास्त्री द्वारा संपादित ‘कुरजा-1 में लघुकथा स्तंभ के अन्तर्गत श्रीलाल नथमल जोशी की रचना ‘गोथळी रा लाड’ छपी। अगस्त 1973 में रमेश बतरा के संपादन में ‘तारिका’ का लघुकथा-विशेषाँक प्रकाशित हुआ। विविध भाषाओं के इस विशेषांक में राजस्थानी भाषा की लघुकथाएँ भी थीं।
‘राजस्थली’ त्रैमासिक के सितम्बर-दिसम्बर 1980 अंक को उसके संपादक श्याम महर्षि ने लघुकथांक के रूप में प्रकाशित किया। इसमें हिन्दी और राजस्थानी भाषा की लघुकथाएँ राजस्थानी में छापी गई थीं। इनमें मुकुट सक्सेना की ‘धर्मालु’, श्रीकांत मंजुल की ‘अक्कलवान’ एवं भगीरथ की ‘बगलो भगत’ उल्लेखनीय रहीं। बीकानेर से प्रकाशित होने वाली राजस्थानी भाषा एवं साहित्य संगम की पत्रिका ‘जागती जोत’ में भी लघुकथाएँ छपती रही हैं। रूपराम ‘आशादीप’ के संपादकत्व में श्रीगंगानगर से प्रकाशित त्रैमासिक ‘गोरबंद’ के 1988-89 के संयुक्तांक में प्रदीप नील, सेवासदन मनोज, मदन अरोड़ा, जया नर्गिस, निरंजन जमींदार, शराफत अली खान तथा महेन्द्र सिंह महलान की हिन्दी लघुकथाओं के राजस्थानी भाषा में सुन्दर अनुवाद देखने को मिलते हैं।
जोधपुर से प्रकाशित मासिक ‘माणक’ राजस्थानी भाषा की व्यापक प्रसार-प्रचार वाली एक उत्कृष्टपत्रिका है। इसमें लघुकथा स्तम्भ के अन्तर्गत प्राय: स्तरीय लघुकथाएँ प्रकाशित होती रही हैं।
(शेष आगामी अंक में…)