॥एक॥
मेले का उद्घाटन / मौना कौशिक
वे चुनाव जीत चुके थे।
शपथ भी ले चुके थे।
पार्टी बदलने के भी पूरे लाभ उन्हें मिल चुके थे। सत्ता, पद, गाड़ी, बंगला—सब कुछ हाथ में था। जीवन सफल माना जा रहा था। अब हालत यह थी कि रोज़ कोई न कोई बुलावा आता—
“सर, इस मकान का उद्घाटन करना है…”
“सर, नए ऑफिस का फीता काटना है…”
“सर, पुल तैयार है…”
“सर, सभागार का लोकार्पण है…”
तालियाँ, मालाएँ, फोटो, अख़बारों की सुर्खियाँ—यही उनका नया प्राणवायु था।
पर उस दिन सुबह अजीब सन्नाटा था।
उन्होंने घंटी बजाई—“सेक्रेटरी! आज कहाँ जाना है?”
सचिव घबराया-सा आया— “सर… आज कहीं कार्यक्रम नहीं है। बस कुछ फाइलें हैं, उन पर हस्ताक्षर करने हैं।”
नेताजी का चेहरा उतर गया।
“क्या मतलब? आज कोई उद्घाटन नहीं? नहीं भाई, मुझे आज भी उद्घाटन करना है!” उनके कानों में फिर तालियों की गूँज बजने लगी। गले की मालाएँ याद आने लगीं। कैमरों की फ्लैश, अख़बारों में छपी तस्वीरें, बड़े-बड़े शीर्षक—सब सामने तैरने लगा।
उन्होंने कुर्सी पर अधीर होकर करवट बदली— “जल्दी पता करो! आज फीता कहाँ कटेगा?”
सचिव बाहर निकला। माथा खुजलाया, इधर-उधर फोन घुमाया। कोई कार्यक्रम नहीं। कोई बुलावा नहीं। तभी उसे याद आया—कल एक निमंत्रण आया था। उसने लिफाफा खोला, पढ़ा, और चेहरे पर चमक आ गई। वह दौड़ता हुआ भीतर पहुँचा—“सर! एक जगह है। अभी चलना है। उद्घाटन आपका इंतज़ार कर रहा है!”
नेताजी उछल पड़े। तुरंत गाड़ी निकली। चेले-चमाटे साथ हुए। पत्रकार बुला लिए गए। कैमरे सज गए। काफिला सायरन बजाता हुआ पहुँचा। वहाँ भीड़ तो थी ही…पर साथ में बहुत सारे गधे भी खड़े थे। नेताजी ठिठक गए— “यह क्या है?”
सचिव ने विनम्रता से कहा— “सर, यह गधों का मेला है…और आज इसका उद्घाटन आपको ही करना है।”
सजी हुई थाली में रखी कैंची नेताजी के सामने कर दी गई। क्षणभर को नेताजी ने सामने खड़े गधों को देखा… फिर अपने साथ खड़े लोगों को देखा… और पहली बार समझ नहीं पाए कि फीता किसका कटना है—मेले का या गधों का!
॥दो॥
दो किलो केले / मौना कौशिक
ठंडी रात थी और गर्म कोट में लिपटी माँ का इंतज़ार हो रहा था।
नए साल छुट्टियाँ पड़ चुकी थीं और घर में रोज़ ही कुछ नया बन रहा था। पर मन कुछ फल खाने का हो रहा था।.सर्दियों में फल किसी जादू की छड़ी की तरह होते थे—किसी के पास भरपूर होते, किसी को मिलते ही नहीं थे। माँ आज उसी जादू की छड़ी की जगह जादू का थैला लेकर निकल पड़ी थी।
घंटी बजी और हम सोफे से उछल पड़े।
दरवाज़े पर माँ खड़ी थी—हाथ में जादू का थैला और चेहरे पर विजय की मुस्कान लिए।
घर के भीतर तो गर्मी थी। माँ ने कोट, टोपी और दस्ताने उतारे।
लेकिन हमसे चुप बैठा नहीं जा रहा था।
आख़िर थैले का मुँह खुला और उसमें से निकले—पीले-पीले, हरे-हरे केले।
घर में शोर मच गया।
माँ ने इशारे से बताया—पूरे दो किलो हैं। वह बोल और सुन नहीं पाती थीं।
हम दोनों उनसे लिपट गए।
वे दो किलो केले और उनका वह इंतज़ार—चालीस साल बाद भी आज, जस का तस बना हुआ है।
माँ हमेशा बराबर बाँटती थीं—हम दोनों के बीच। न कम, न ज़्यादा।
आज सब कुछ सामने है—फल हैं, बाज़ार हैं, साधन हैं, चाहें तो केले भी कई किलो खरीदे जा सकते हैं। पर जादू के उस थैले से निकली हुई वह मिठास... वह आज भी नहीं भूली।
(लघुकथा में 1980 के दशक का बुल्गारिया है। उस समय सर्दियों में फल बाहर से आते थे और केला और संतरा विशेष रूप से लोकप्रिय थे। दो किलो से अधिक किसी को नहीं मिलते थे।)
डॉ.
मौना कौशिक बल्गारिया में रहने वाली लगभग पहली भारतीय लेखिका, कवियत्री हैं। उनकी रुचि और विशेषज्ञता भारत और बल्गारिया की भाषाओं,
संस्कृति, अनुवाद, लोककथाओं
और पौराणिक कथाओं के क्षेत्र में है। उन्होंने कई बल्गेरियाई कहानियों तथा कविताओं
का हिन्दी में अनुवाद किया है।
· उनकी पुस्तक 'माया बादल की छाया' बल्गेरियाई में अनूदित हिंदी मुहावरों का संकलन है।
· डॉ. कौशिक अपने पिता, प्रोफेसर डॉ. राम कृष्ण द्वारा संपादित प्रथम संस्कृत-बल्गेरियाई शब्दकोश के संपादक मंडल में हैं।
· उनके सहयोग से “हनुमान चालीसा” का बल्गेरियाई अनुवाद भी बुल्गारिया में प्रकाशित हुआ है।
· उन्होंने कई भारतीय और बल्गेरियाई वृत्तचित्र फिल्म परियोजनाओं के लिए एक सलाहकार के रूप में भी काम किया है।
· डॉ. कौशिक वर्तमान में सोफिया विश्वविद्यालय में इंडोलॉजी विभाग में पढ़ा रही हैं। नृत्य और धर्म, भारतीय संस्कृति, अनुष्ठान और त्योहार, भारत में पारसी समुदाय, डॉ कौशिक द्वारा सोफिया विश्वविद्यालय के लिए तैयार किए गए कुछ वैकल्पिक पाठ्यक्रम हैं।
· उन्हें पूर्व में दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, जम्मू विश्वविद्यालय, सीसीएस विश्वविद्यालय-मेरठ और कई अन्य विश्वविद्यालयों में "विदेशी भाषा के रूप में हिंदी-शिक्षण तथा अन्य सांस्कृतिक विषयों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जा चुका है।
· वह देवम, इंडो बल्गेरियाई सोसाइटी फॉर आर्ट्स एंड कल्चर की संस्थापिका भी हैं, जो पिछले दो दशकों से भारत और बल्गारिया के बीच सांस्कृतिक संबंधों के निर्माण में सक्रिय रूप से शामिल है।
· डॉ. कौशिक को अक्षरम इंटरनेशनल हिंदी सोसाइटी, आजाद भवन, आईसीसीआर, दिल्ली 2010 द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
· वह हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित हैं।
· हंसराज कॉलेज, नई दिल्ली द्वारा, विज्ञान भवन में आयोजित "विश्व हिन्दी दिवस" समारोह में सम्मानित।
· मॉरीशस में, हिन्दी दिवस पर रेडियो एवं टेलीविजन पर साक्षात्कार-2026,
· आर्य समाज द्वारा सम्मानित।
· डॉ. कौशिक आयुर्वेद एसोसिएशन, सोफिया, बल्गारिया की एकमात्र भारतीय बोर्ड-सदस्य हैं। भारतीय राष्ट्रपति की बल्गारिया यात्रा के अवसर पर वे प्रथम महिला श्रीमती सविता कोविंद जी के साथ थीं तथा प्रवासी भारतीयों एवं भारत के मित्रों के लिए राष्ट्रपति माननीय रामनाथ कोविंद जी के आधिकारिक कार्यक्रम की संचालक एवं उद्घोषिका थीं।
स सम्पर्क : maunakaushik@gmail.com