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Thursday, 26 January 2017

पृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथाओं का मनोविज्ञान / बलराम अग्रवाल


पृथ्वीराज अरोड़ा (10-10-1939--20-12-2015)
कथाकार पृथ्वीराज अरोड़ा की कुछ लघुकथाओं पर शोध के दौरान लिखे गएकुछ नोट्स आज एक रजिस्टर में मिल गए। इधर-उधर बिखरे होने के कारण या फिर प्रस्तुति की योजना में बदलाव के कारण बहुत-से नोट्स शोध में शामिल नहीं पाए। उन नोट्स को अब आपके समक्ष पेश हैं।  सभी लघुकथाओं के स्रोत कोष्ठक में दिए गए हैं तथापि ये सभी पृथ्वीराज अरोड़ा के लघुकथा संग्रह 'तीन न तेरह' में संकलित है।  सन्दर्भ के लिए आप उस संग्रह को देख सकते हैं।          --बलराम अग्रवाल

अहसास (साहित्य निर्झर, 1974) : बाह्य यथार्थ की कठोरता व्यक्ति के 'इगो' को कमजोर करती है। इससे कमजोर अहम् के कारण व्यक्ति-मन चिन्तित हो उठता है। ‘अहसास’ का जो बॉस कुछ पल पहले दिवाकर को कामचोर कह रहा था, वही अपने भाई की नौकरी छूट जाने की खबर सुनकर ‘परेशान-सा अपने सामने पड़े कागज समेटने लगता है’।
रामबाण (साहित्य निर्झर, 1974) : भारतीय दर्शन के अनुसार, कामना की पूर्ति हो जाए तो व्यक्ति ‘लोभ’ का शिकार होता है और अगर उसकी पूर्ति न हो तो ‘क्रोध’ व ‘चिन्ता’ का शिकार होता है। ‘रामबाण’ का ‘वह’ चिन्तित था कि आखिर भतीजे की जायदाद को किस प्रकार हथियाया जाए।
धूल-धुआँ (सारिका, 1978) : पिता को दूध से भरा बड़ा गिलास गटकते देखकर ‘मैंने आगे बढ़कर खिड़की’ बन्द कर दी, मानो अपने अभावों से नजर चुरा ली हो’।  इस नैरेशन में ‘दमन’ दृष्टिगोचर हो रहा है। कभी-कभी आत्महीनता भी दमन का कारण बनती है। इसी रचना में  ‘समंजन’ अथवा ‘औचित्य स्थापन’ की प्रवृत्ति को भी इन पंक्तियों में देखा जा सकता है—
“ऐ, तुमने दूध क्यों नहीं पिया?”
उसने भोला-सा मुँह बना दिया, “बच्चे दूध नहीं पीते।”
विकार (छोटी-बड़ी बातें, 1974) : इच्छा के विरुद्ध कार्य किया जाए तो व्यक्ति के अहम् को आघात पहुँचता है जोकि ‘क्रोध’ की उत्पत्ति का कारण बनता है। देखें—
“अगर मेरी इतनी-सी बात भी नहीं मान सकते, तो भाड़ में जाओ। मैं इतनी तेजी से नहीं चल सकता। मैं तो लौट रहा हूँ।” वह क्रोध में फुंकारता हुआ लौट गया।
दस पैसे (सारिका, 1979) : कभी-कभी व्यक्ति का अपना व्यवहार ही उसे मुँह चिढ़ाता हुआ उसके सामने आ खड़ा होता है। मनोविश्लेषण की अवधारणा में ‘अचेतन’ को व्यक्ति के व्यवहार का मुख्य प्रेरक अवयव माना जाता है। फ्रायड ने ‘अचेतन’ को दमित और निषिद्ध भावनाओं के संग्रह-स्थान के रूप में चिह्नित किया है। युंग ने उसी सिद्धांत को विकसित करके ‘सामूहिक अचेतन’ और ‘वैयक्तिक अचेतन’ की अवधारणा प्रस्तुत की। समकालीन हिन्दी लघुकथा ने अचेतन को मानव-व्यवहार के प्रमुख सूत्र के रूप में स्वीकारा और अपनाया है। दो राय नहीं कि मनुष्य का व्यवहार चेतन की तुलना में अचेतन से अधिक प्रभावित होता है। ‘दस पैसे’ का नायक एक जरूरतमंद यात्री के ‘पैसे बड़ी बेरहमी से’ उसके सामने पटक देता है; लेकिन वही नायक मिट्टी का तेल खरीदने के बाद लाला से दस पैसे वापस नहीं ले पाता। यहीं, इसी बिन्दु पर उसका ‘वैयक्तिक अचेतन’ ‘सामूहिक अचेतन’ बन जाता है जो उसे सोने नहीं देता।
दु:ख (सारिका, 1980) : शारीरिक या मानसिक दु:ख से बचने के नकारात्मक प्रयास को ‘पलायन’ की संज्ञा दी जा सकती है। विलियम मैक्डूगल के अनुसार—‘भय का भाव किसी वस्तु से बच निकलने या भागने की सहज वृत्ति से सम्बन्धित है।’ ‘दु:ख’ में, बेटे के इस प्रश्न के उत्तर में कि उसके पिता तो कहीं के राजकुमार नहीं थे, फिर सिद्धार्थ की तरह घर छोड़कर संन्यासी क्यों हो गये; माँ उत्तर देती है—‘लगता है बेटा, दोनों ही दु:खों से डर गए।’
महानता (सारिका, 1980) : इस लघुकथा की छात्रा अपने इतिहास-शिक्षक द्वारा सुनाए गये दृष्टांत के सन्त डायोजिनीज महान को महान मानने से इंकार कर देती है—‘मैं उस गै-जिम्मेदार संत को महान नहीं मानती’। क्योंकि उसकी दृष्टि में भी ‘सन्त’ बन जाना सामाजिक दायित्वों से पलायन कर जाना ही है।
पढ़ाई (सारिका, 1980) : आजादी और रोटी की जरूरत एक-जैसी है—यह इस लघुकथा का केन्द्रीय कथ्य है। पुलिस के हाथों में पड़ा नौजवान इस प्रश्न के कि  वह ‘हर रोज खान मजदूरों की झोपड़ियों में क्या करने जाता है?’ वह उत्तर देता है—‘…मैं उन्हें पढ़ाता हूँ कि जब तुम्हारा बच्चा भूख से कुलबुला रहा हो और पूरी मेहनत के बावजूद उसके वास्ते रोटी का इन्तजाम न हो सके तो उसकी भूख का इन्तजाम कैसे किया जाना चाहिए।’
यह ‘दमित’ अहम् को जागृत करने की मुहिम का मात्र एक पहलू है। मजदूर जनता के मानसिक-ह्रास को ऊपर उठाने की एक कोशिश है। यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि जीवन के स्वस्थ विकास के लिए अनुचित दमन से बचना अति आवश्यक है।
नपुंसक (सारिका, 1980) : समकालीन हिन्दी लघुकथा में कथाकारों ने काम की विकृति, अतृप्ति, अल्प-विकास और अति-विकास आदि विभिन्न रूपों को अपने कथ्य का आधार बनाया है। ‘नपुंसक’ लघुकथा में पृथ्वीराज अरोड़ा ने दिखाया है कि ‘हॉस्टल के एक कमरे में छात्रों के दोनों दलों के लड़के   (लड़कियों पर टूट पड़ने के बाद) शराब की झोंक में बतिया रहे थे’।  किसी को होठों का रसपान कर लेने पर गर्व था तो किसी को प्रेमा को बाँहों में भर लेने का। परन्तु इन सब के बीच एक ऐसा लड़का भी है जो चुप बैठा है और उस सारे हादसे पर अपनी साँस घुटती महसूस कर रहा है। ‘साला… नपुंसक !’ एक जुमला उसके लिए आता है ‘और कई ठहाके एक-साथ मिलकर’ कमरे में फैल जाते हैं।
                 ये सिर्फ नोट्स हैं। बहुत सम्भव है कि भविष्य में इन नोट्स को विस्तार दिया जा सके; बहुत सम्भव है, अब कुछ भी काम इन पर न किया जा सके। बहरहाल, आपके मन्तव्य के लिए ये प्रस्तुत हैं।
                                                                               ई-मेल : 2611ableram@gmail.com

Saturday, 20 March 2010

पृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथाएँ


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करनाल से भाई अशोक भाटिया ने बातचीत के दौरान सूचना दी थी कि श्रीयुत पृथ्वीराज अरोड़ा के मस्तिष्क के किसी हिस्से में फ्लूड्स के रिसाव की वजह से उनके दायें अंगों पर आंशिक पक्षाघात का आक्रमण हुआ था और 18 मार्च को उनका ऑप्रेशन भी करना पड़ा। आज 20 मार्च को आदरणीया भाभीजी से बात करके पता चला कि हॉस्पिटल से रिलीव होकर वे आज ही घर पहुँचे हैं और डॉक्टर ने अधिक बात करने के लिए मना किया है। फिर भी, अरोड़ा जी ने शायद जिद करके मोबाइल उनसे माँगा और मुझसे बात की। मुझे अच्छा लगा कि वे इस सब के बावजूद भी दिलेर रवैया अपनाये हुए हैं। उनके शीघ्र स्वस्थ होने शुभकामनाओं के साथ इस माह भी प्रस्तुत हैं उनकी तीन लघुकथाएँ—



शिकार
आकाश बादलों से ढँका था। पहले टुपुर-टापर बूँदें गिर रही थीं, फिर उन्होंने विकराल रूप ले लिया था। ऐसे में स्ट्रीट लाइटें धुँधली-धुँधली रोशनी दे रही थीं। चोरी के लिए सही समय समझते हुए दोनों पॉलिथीन की बरसातियाँ सिर पर ओढ़े खोलियों से निकल पड़े।
पहला चौकस था,“तूने सभी औजार ले लिए हैं न ?”
दूसरा आश्वस्त था,“हाँ, और तुमने?”
पहला भी आश्वस्त लगा,“मैंने भी।”
थोड़ी दूर चलने के बाद दूसरा रुक गया।
पहले ने पूछा,“रुक क्यों गये?”
मन में उठ रहे बवंडर को उसने उगल दिया,“मन नहीं मानता।”
पहले को उपहास सूझा,“डर गए क्या?”
“डर! कभी डरा हूँ मैं ?” उसने अपने अंदाज़ में उत्तर दिया।
पहला चौंका,“फिर!”
दूसरा आहत-सा बोला,“हमारा शिकार हमेशा गरीब या कम पैसे वाला ही रहा है। कहीं न कहीं हम अमीर आदमी पर हाथ डालते डरते नहीं हैं क्या?”
यह कड़वा सच पहले को गंभीर बना गया,“हाँ, तुम सही कह रहे हो।”
अचानक दूसरा बोला,“तो लौट चलें?”
“हाँ, मैं भी यही सोचता हूँ। हमें किसी मोटी मुर्गी पर हाथ डालना चाहिए। चलो, सोचते हैं।”
सचमुच दोनों लौट पड़े—
-->हाथों में हाथ डाले।

प्रश्न
जब उनके अति गोपनीय सेलफोन की घंटी घनघनायी तो वे तत्काल उस विवाहोत्सव के गहमागहमी-भरे माहौल को छोड़ एक एकांत कोने की ओर लपके—“यस सर!”
उधर से स्वर था,“पांडे, तुम फौरन अपने घर से होते हुए मेरे पास पहुँचो।”
“यस सर।”
वह जानते हैं कि डी आई जी ऐसे आदेश उस समय ही देते हैं जब मामला अत्यन्त गंभीर हो। बिना वक्त गँवाए अपनी ओर देख रहे सिपाही को संकेत से बुलाया और कहा,“तुम मेम साहिबा को ढूँढकर बता दो कि साहिब किसी जरूरी काम के लिए चले गए हैं।” सिपाही सल्यूट मारकर मेम-साहिबा को संदेश देने के लिए आगे बढ़ गया।
वह बाहर निकले। उन्हें देखते ही ड्राईवर गाड़ी लेकर उनके समीप आ गया। गाड़ी चलते ही उनके पीछे-पीछे पुलिस-वैन भी चल पड़ी। कोठी पर पहुँचते ही उन्होंने देखा कि—पुलिस से घिरा, हथकड़ियों से जकड़ा उनका घरेलू नौकर सिर झुकाए जमीण पर बैठा था।
एस एच ओ भागकर उनकी गाड़ी के समीप आया। उनके गाड़ी से बाहर निकलते ही सल्यूट मारकर उनके कान में कुछ फुसफुसाया। और फिर, एक कागज पर हस्ताक्षर करवा, नौकर को गाड़ी में बैठा चला गया।
कपड़े बदलते हुए उनका ध्यान बार-बार विश्वसनीय नौकर को लेकर उचट जाता था। यह कैसे संभव है कि एक एस पी के घरेलू नौकर के तार उग्रवादियों के साथ जुड़े हों? सद्भावनापूरित उनकी आशंका बार-बार बलवती हो उठती कि—कहीं वह अपनी गरीबी से इतना त्रस्त तो नहीं था कि किसी बड़े प्रलोभन में आकर कुछ-भी करने को तैयार हो गया हो?
गाड़ी में बैठते हुए वे लगातार यह सोच रहे थे कि—वे डी आई जी को यह दलील कैसे दे पाएँगे…कैसे?

बुनियाद
उसे दुख हुआ कि पढ़ी-लिखी, समझदार पुत्रवधू ने झूठ बोला था। वह सोचता रहा—क्यों झूठ बोला था उसने? क्या विवशता थी जो उसे झूठ का सहारा लेना पड़ा?
जब उसका बेटा कार्यालय के लिए चला गया और पत्नी स्नान करने के लिए, तब उपयुक्त समय समझते हुए उसने पुत्रवधू को बुलाया।
वह आई,“जी, पापा!”
उसने पुत्रवधू को कुर्सी पर बैठ जाने का इशारा किया। वह बैठ गई। उसने कहा,“तुमसे एक बात पूछनी थी।”
“पूछिए पापा।”
“झिझकना नहीं।”
“पहले कभी झिझकी हूँ! आपने मुझे पूरे अधिकार दे रखे हैं, बेटी से भी बढ़कर।”
“थोड़ी देर पहले तुमने झूठ क्यों बोला? मैंने तो अभी नाश्ता करना है! तुमने मेरे नाश्ता कर लेने की बात कैसे कही?” उसने बिना कोई भूमिका बाँधे पूछा।
उसका झूठ पकड़ा गया है, उसने अपना सिर झुका लिया। फिर गंभीर-सी बोली,“पापा, हम बेटियाँ झूठ बोलने के लिए अभिशप्त हैं। माँएँ भी, गृहस्थी में दरार न पड़े इसलिए हमें ऐसी ही सीख देती हैं।” वह थोड़ा रुकी। भूत को दोहराया,“भाई के लिए नाश्ता बनाने में देर हो रही है, वह नाराज न हो, कोई बहाना बना डालो। पापा का कोई काम वक्त पर न हो पाया हो तो झूठ का सहारा लो। आज भी ऐसा ही हुआ। नाश्ता बनाने में देर हो रही थी। इनके ऑफिस का वक्त हो गया था। ये नाराज होने को थे कि मैंने आपको नाश्ता करवाने की वजह से देर हो जाने की बात कह डाली। आपका जिक्र आते ही ये चुप हो गये।” उसने विराम लिया। फिर निगाह उठाकर ससुर को देखा और कहा,“सुबह-सुबह कलह होने से बच गई।…और मैं क्या करती पापा?”
ससुर मुस्कुराए। उसके सिर पर हाथ फेरकर बोले,“अच्छा किया। जा, मेरे लिए नाश्ता ला। बहुत भूख लगी है।”
वह भी किंचित मुस्कराई,“आभी लायी।”
पुत्रवधू नाश्ता लेने चली गई। ससुर ने एक दीर्घ साँस ली।


पृथ्वीराज अरोड़ा: संक्षिप्त परिचय

जन्म: 10 अक्टूबर, 1939 को बुचेकी(ननकाना साहिब, पाकिस्तान में)

प्रकाशित कृतियाँ:तीन न तेरह(लघुकथा संग्रह), प्यासे पंछी(उपन्यास), पूजा(कहानी संग्रह), आओ इंसान बनाएँ(कहानी संग्रह)

सम्पर्क:द्वारा डॉ सीमा दुआ, 854-3, शहीद विक्रम मार्ग, सुभाष कॉलोनी, करनाल-132001 (हरियाणा)

मोबाइल नं:09255921912

Sunday, 28 February 2010

पृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथाएँ



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पृथ्वीराज अरोड़ा हिन्दी लघुकथा के वरिष्ठ हस्ताक्षर हैं। उनकी लघुकथाओं में मानवीय संवेदना के वे सूत्र छिपे होते हैं जो उन्हें अपने समकालीनों के बीच विशिष्ट दृष्टि संपन्न कथाकार सिद्ध करते है। जनगाथा के इस अंक में उनकी तीन ताजातरीन लघुकथाएँ प्रस्तुत हैं।
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संलग्न पेंटिंग सीमा विश्वास की है जिसे सम्माननीय मित्र शमशेर अहमद खान ने
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रंगों के पर्व होली की शुभकामनाओं के साथ भेजा है।

॥नागरिक॥
शायद वह किसी काम से थोड़ी देर के लिए बाहर गया था। मैंने सिर उठाकर शीशे में देखा। सिर के एक हिस्से के बाल कुछ बड़े थे और दूसरे के छोटे। मैंने हाथ लगाकर जाँचा भी। मैं पिछले कई वर्षों से उससे बाल कटवा रहा था, परंतु ऐसी असावधानी कभी नहीं हुई थी। जैसे ही वह लौटा, मैंने बताया,“एक तरफ के बाल थोड़े बड़े लगते हैं।”
उसने कैंची और कंघा उठाया और बड़े बालों को छोटा कर दिया। फिर धीरे-से बोला,“माफ करना बाबूजी, मैं जानता हूँ कि आप पहले भी आये थे। अब दोबारा आये हैं। मुझे पता है कि आप मेरे अलावा किसी-और से बाल नहीं कटवाते।” फिर उसने स्वयं ही बताया,“बाबूजी, मैं बहुत परेशान हूँ।”
“क्या हुआ?”
“मैं दोपहर को घर गया तो पता चला कि मेरे आठ वर्ष के बच्चे को दो आदमी बहला-फुसला कर ले गए। उसे आइसक्रीम खिलाकर घर के बारे में पूछते रहे। मेरी बेटी के स्कूल में जाकर उसे भी देख आये हैं। मैं…मैं…बहुत तनाव में हूँ…क्या करूँ?”
“बेटे से पूछा कि वे कौन लोग थे?”
“पत्नी से उसे इस हरकत के लिए पीट दिया। वह बुरी तरह-से डर गया है। कुछ बताता नहीं।”
“फिर?” अचानक मेरे मुँह से निकल गया।
वह काफी देर चुप रहा। फिर बोला,“पुलिस पर मुझे भरोसा नहीं। …और ये नेता लोग तो पहचानते तक नहीं। रिश्तेदार नजदीक तक नहीं फटकेंगे। दोस्त सलाह भर देकर पहलू झाड़ लेंगे। बेटी का सवाल है…इज्जत का…” वह पगलाया-सा यही रट लगाये जा रहा था।
॥भ्रष्ट॥
दिनभर खटने के बाद वे शाम को घूमने जाते थे। यह उनकी दिनचर्या का एक अंग था। उनके बीच राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक और अधिकतर दफ्तरी सरोकारों की बातें होती थीं।
आज रवि ने बात शुरु की,“सचमुच, बेईमानी हमारे रगों में समा गई है। जो भ्रष्ट नही होना चाहता, उसे मजबूर किया जाता है।” वह थोड़ा रुका। अपनी बात के प्रभाव को आँकने के लिए उसने अपने साथियों की ओर देखा और आगे कहा,“आज एक आदमी किसी काम के सिलसिले में आया था। वह कानूनन सही था, मैंने काम करने से इंकार कर दिया। उसने कुछ लेने-देने की बात की, परंतु मैं अपने उसूलों पर अड़ा रहा।”
शामलाल ने इस प्रसंग में जोड़ा,“मैं ऐसी सीट पर हूँ जहाँ आसानी से रुपए ऐंठे जा सकते हैं, आप जानतए ही हैं। मेरे साथ तो हर रोज यही घटता है पर, मैं हराम की कमाई पर विश्वास नहीं करता।”
प्रभुदयाल ने सीने पर हाथ रखते हुए कहा,“आज तो मेरे साथ हद हो गई। काम करवाने के लिए एक आदमी मेरे घर पहुँचा और मिठाई के डिब्बे में रुपए डालकर मु्झे देने लगा। मेरी आत्मा मानी नहीं। मैंने उसे हाथ जोड़ते हुए डिब्बा स्वीकार करने से इंकार कर दिया।”
एक आदमी, जो उनके पीछे-पीछे चल रहा था और ध्यान-से उनकी बातें सुन रहा था, बिल्कुल पास आकर उसने पूछा,“जब हम सभी ईमानदार हैं, कोई भी भ्रष्ट नहीं है, तो भ्रष्टाचार क्यों है? क्या आपने किसी को अपने-आप को भ्रष्ट कहते सुना है? अगर हाँ, तो उसे पेश कर सकते है?”
अचानक पूछे गये इस सवाल से हकबकाए हुए वे तीनों एक-दूसरे को टुकुर-टुकुर ताकने लगे।
॥पति॥
बु्री खबर थी।
पति ने बताया—रज्जू-चाचा नहीं रहे।
पत्नी अलसायी-सी पड़ी रही। पति ने फिर दोहराया। पत्नी धीरे-धीरे उठी। बिखरे बालों को समेटा। जम्हाई ली। अपने गाउन को ठीक किया। आईने के सामने जाकर अपना चेहरा देखा। गुसलखाने गई। मुँह पर छींटे मारे। तौलिये से पौंछा। पानी धीरे-धीरे पिया, खाने की तरह। ब्रश लिया। पेस्ट लगाया। हौले-हौले, इत्मीनान से, ब्रश करती रही। पति कुर्ता-पाजामा पहने तैयार होकर आया और पत्नी को ब्रश करते देख किचन में घुसकर चाय बना लाया। पत्नी ने पति के हाथों बनायी चाय चुस्कियाँ ले पी और थोड़ी देर बाद फिर गुसलखाने में घुस गई। लौटकर आयी और आईने के सामने खड़ी हो साड़ी लपेटने लगी। पति ने घर के सभी दरवाज़े बंद किये और बाहर के दरवाज़े पर ताला टाँग घर से बाहर हो गया।
स्कूटर गली की सड़क पर खड़ा करके उसे स्टार्ट किया। फिर बंद कर दिया। फिर स्टार्ट किया और जोर-जोर से हॉर्न बजाई। फिर स्कूटर बंद कर दिया। मकान के अंदर जाकर देखा—पत्नी बालों को सँवार रही थी।
“जल्दी करो।” उसने कहा। कहकर वह फिर बाहर आ गया। स्कूटर स्टार्ट किया। फिर बंद कर दिया। फिर स्टार्ट किया। तेज-तेज हॉर्न बजाई। एक पड़ोसी ने झाँककर उसकी ओर देखा। जब पत्नी स्कूटर के पास आयी तो पति बोला—“वक्त की नजाकत को समझा करो।”
पत्नी केवल मुस्कराई। उसकी मुस्कराहट से मर्माहत उसे ढोने की बेबसी लिए वह स्कूटर का गियर बदलने लगा।
पृथ्वीराज अरोड़ा: संक्षिप्त परिचय
जन्म: 10 अक्टूबर, 1939 को बुचेकी(ननकाना साहिब, पाकिस्तान में)
प्रकाशित कृतियाँ: तीन न तेरह(लघुकथा संग्रह), प्यासे पंछी(उपन्यास), पूजा(कहानी संग्रह), आओ इंसान बनाएँ(कहानी संग्रह)
सम्पर्क : द्वारा डॉ सीमा दुआ, 854-3, शहीद विक्रम मार्ग, सुभाष कॉलोनी, करनाल-132001 (हरियाणा)
मोबाइल नं:09255921912