Tuesday, 5 October, 2021

लघुकथा के पुरोधा : डॉ.सतीशराज पुष्करणा / रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

(स्व.) डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी के 75वें जन्मदिन  पर  विशेष आलेख : 

लघुकथा नगर, महेन्द्रू पटना-800006 : यह पता रहा एक लम्बे अर्से तक। कोई मकान नम्बर नहीं , गली नम्बर नहीं, बस लघुकथा नगर। यह एक ऐसे आदमी का पता रहा है, जो लघुकथा में ही जागता, लघुकथा में ही स्वप्न देखता। यह लघुकथा का वह सूत्रधार रहा , जिससे भारत भर के लघुकथाकार, समीक्षक, समर्थक, स्थापित साहित्यकार, नवोदित रचनाकार, राजनेता, पत्रकार, विरोधी सभी जुड़े हुए रहे। जोड़ने का मंच था--अखिल भारतीय लघुकथा मंच। यहाँ दिए जाने वाले सम्मान के लिए हवाई यात्रा करके जाना भी लेखक सौभाग्य समझते थे। इनका आवास देश भर के लेखकों का एकमात्र अड्डा था, जहाँ बैठकर लघुकथा के प्रचार- प्रसार की योजनाएँ बनतीं, क्रियान्वित होतीं, वार्षिक सम्मेलन में देश भर के प्रतिष्ठित, नवोदित लेखक आते, सम्मान पाते। बहुत से नवोदित जुड़ते, अपने को धन्य समझते। कुछ ऐसे भी थे जो सीख लेते, तो धरती पर पैर नहीं टिकते और कुछ दिनों में उड़न छू हो जाते। वे बहुत जल्दी ही भूल जाते कि किसी ने नन्हे-से पौधे को सींचकर पल्ल्वित -पुष्पित किया है। अवसरवादी लेखक दूर होते ही विरोधी बन जाते। साहित्य में ऐसे अहसान फ़रामशों की संख्या न तब कम थी और न अब कम है। कमज़ोर व्यक्ति अगर कुछ नहीं करेगा, तो विरोध तो ज़रूर करेगा। पुनः इस बात पर बल दूँगा कि अपने लेखकीय समय की आहुति देकर कितने लोग दूसरों का हित सोचेंगे! यह प्रश्न विचारणीय है। लगातार धोखा खाने पर भी, अपनी ढलती उम्र और कमज़ोर स्वास्थ्य के साथ भी पुष्करणा जी नए लोगों को प्रोत्साहित करने में लगे हैं। पुराने लोगों को आज भी अपने साथ जोड़े हुए हैं। मैं इनको केवल लेखक नहीं कहूँगा, केवल सम्पादक नहीं कहूँगा। ये लेखकों के लेखक और सम्पादकों के भी सम्पादक हैं। अपने सम्पादन में नवोदितों की साधारण रचनाएँ भी इसलिए छापीं कि आज जैसा लिख रहे हैं, कल नए अनुभव अर्जित करके उससे बेहतर लिखेंगे। मैं ऐसे नवोदितों का साक्षी हूँ, जिन्होंने लघुकथा का बेसिक इनसे सीखा, आज अच्छा लिख रहे हैं।

वर्ष 1983 में आपने ‘लघुकथा : बहस के चौराहे

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
 पर’ विभिन्न साहित्यकारों के लेखों का संग्रह प्रकाशित किया। इस ग्रन्थ में 37 वर्ष पूर्व लघुकथा के विभिन्न पक्षों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। जानकारी के अभाव में बहुत से लेखक आज भी उन विषयों पर उलझते पाए गए हैं, जिनका ‘अखिल भारतीय लघुकथा मंच’ से भी स्थापित लेखक निराकरण कर चुके हैं। सन् 1990 में ‘कथादेश’ ( वृहद् लघुकथा-संकलन) के माध्यम से 700 पृष्ठों का बड़ा लघुकथा संग्रह प्रस्तुत कर चुके हैं, जिसमें सम्पादक का 12 पृष्ठीय सम्पादकीय, 26 लेखकों की 25-25 यानी कुल 650 लघुकथाएँ सभी लेखकों के 26 परिचय, 26 आत्मकथ्य, 5 लेखकों के 68 पृष्ठीय लेख। जहाँ तक मेरी जानकारी है, अभी तक कोई भी लघुकथा-सम्पादक एक खण्ड में इतनी सामग्री नहीं जुटा सका। इतने बड़े कार्य को करके भी कोई उल्लेख करना नहीं भूलेगा जबकि पुष्करणा जी ने अपने एक लेख में बस एक शब्द ‘कथादेश’ लिखकर नाम गणना कर दी। वह व्यक्ति है-डॉ सतीशराज पुष्करणा। अपने नाम और विकास के लिए सब काम करते हैं। बड़े-बड़े लेखक हैं। खूब बढ़िया लिखने वाले भी हैं, लेकिन उनकी उड़ान केवल उन्हीं तक है। पुष्करणा जी उनमें से नहीं हैं। वे बड़े-बड़े कार्यक्रमों के आयोजक हैं, सबको साथ लेकर चलने वाले, प्रकाशन से लेकर विमोचन, समीक्षा तक जोड़ने वाले हैं, यानी सब कुछ लघुकथा के लिए। इस कड़ी में दो नाम और हैं--श्याम सुन्दर अग्रवाल और श्याम सुन्दर ‘दीप्ति’। ये सब लम्बी पारी के खिलाड़ी रहे हैं। पुष्करणा जी के हस्तलिखित कार्ड आज भी सैंकड़ों लोगों की फ़ाइलों में होंगे।

इनकी बहुत-सी लघुकथाओं पर बहुत सारे लेखक चर्चा-परिचर्चा, समीक्षा कर चुके हैं। मेरा आशय इस लेख में न उनका पिष्ट-पेषण करना है, न कोई परिणाम प्रस्तुत करना है। कुछ लघुकथाओं का स्पर्श मात्र करना है, ताकि उनकी अन्तर्वस्तु का संकेत भर कर सकूँ। पुष्करणा जी किसी सम्भ्रान्त वर्ग क्रे प्रतिनिधि लेखक नहीं हैं। वे सामान्य या मध्यम वर्ग के लेखक हैं। यही उनका मुख्य परिवेश है। मध्यम वर्ग सपने उच्च वर्ग के देखता है, उन सपनों को पूरा करने के लिए रात-दिन मरता-खपता है, झगड़ता है, बेईमानी भी करता है, लेकिन ईमानदारी की आश्रयस्थ्ली भी यही बनता है। त्याग करने में भी पीछे नहीं रहता। इनकी लघुकथाओं में घर-परिवार, पत्नी-पुत्र, पुत्री आदि, दफ़्तर के अधिकारी, बाबू, वह सामान्य व्यक्ति भी है,जो केवल भीड़ का एक हिस्सा भर है। इस सामान्य व्यक्ति का सपना सिर्फ़ दो जून की रोटी, सिर ढकने को जैसी-तैसी छत, गुज़ारे के लिए कोई भी काम। कोई काम इसके लिए छोटा नहीं है। अपने काम को ईमानदारी से निभाना इसका संस्कार है। यह उस पूँजीपति वर्ग की तरह नहीं है, जो सरकार से भारी-भरकम ॠण लेकर हज़म कर जाता है और बाद में किसी तिकड़म से दिवालिया होने का स्वाँग करता है। यह उन नेताओं में से भी नहीं है, जो सत्ता की खेती को साँड बनकर चरते रहते हैं; जिन्हें सत्ता केवल चारा नज़र आती है।

सबसे पहले मानवता की पोषक लघुकथाओं का जिक्र करना चाहूँगा। ‘सहानुभूति’ वर्कशॉप के अधिकारी और कर्मचारी रामू दादा पर केन्द्रित है। अधिकारी कड़क है, तो कर्मचारी रामू दादा भी कम नहीं। वह अधिकारी की डाँट के प्रत्युत्तर में कहता है कि जो कहना हो वह लिखकर कहें या पूछें। लिखित कार्यवाही करके कर्मचारी के बीवी-बच्चों के पेट पर लात मारना अधिकारी का आशय नहीं है, वह कर्मचारी को ही खरी-खोटी सुनाना उचित समझता है। अधिकारी को सबक सिखाने की बजाय अधिकारी ने ही रामू दादा को सबक सिखा दिया। इस तरह की एक लघुकथा है ‘वापसी’। कैसी वापसी, कहाँ से वापसी? जेबकतरे ने पर्स चुराया। उसे पुलिस का भी संरक्षण प्राप्त है। जेबकतरे ने पैसे सहेज लिये। पर्स को और उस पर्स में पड़े कागज को फेंक दिया। फिर न जाने क्या सोचकर कागज़ को उठा लिया। वह एक पत्र था। पढ़ा तो पता चला कि उस पत्र में माँ को पैसे भेजने की बात लिखी है। पत्र पढ़कर जेबकतरा प्रभावित हुआ और उस राशि को जिसकी जेब काटी थी, उसकी माँ तक पहुँचाने की व्यवस्था में जुट गया। यह मानवीय संवेदना की अच्छी लघुकथा है। इसके साथ लेखक का यह सन्देश भी निहित है कि हर बुरा आदमी हर समय बुरा नहीं होता। विषम परिस्थितियाँ उसे बुंरा बनाने के लिए बाध्य करती हैं। यह व्यावहारिक सत्य है कि परिस्थितिवश अच्छा आदमी भी बुरा कार्य कर सकता है। ‘माँ’ लघुकथा में अनजान वृद्धा द्वारा ठिठुरते हुए व्यक्ति को अपना शॉल दे देना उसके ममत्व को एक नई ऊँचाई प्रदान करता है। माँ का यह ममत्व अनेक रूप में सामने आ सकता हैं ; क्योंकि उसका एक चेहरा नहीं होता।

समाज का चौथा स्तम्भ कहलाने वाले मीडिया का असली रूप ‘भीतर की आग’ में दिखाई देता है। समाचार -पत्र जिस पवित्रता की दुहाई देकर अच्छा बनना चाहते हैं, उसके भीतर का सच कुछ और ही है। जिसमें सही काम करने की आग है, उसका जीवन कुछ और ही है। सुदीप को अखबार का सम्पादक व्यावहारिक होने के लिए कहता है। यही व्यावहारिकता दुनियादारी है। सुदीप को यह दुनियादारी स्वीकार नहीं है। ‘ऊँचाई’ में एक बूढ़े , गरीब अध्यापक की कथा है, जो सहायता की आशा से अपने पुराने शिष्य के पास जाते हैं। शिष्य गुरु जी का आशय समझकर अपनी आर्थिक तंगी का रोना शुरू कर देता है। गुरु सहज आत्मीयतावश शिष्य की सहायता के लिए तत्पर हो जाता है। गुरु का आत्मीय अग्रह देखकर शिष्य लज्जित हो उठता है। ‘उपहार’ लघुकथा में गुरु का आदर्श रूप सामने आता है। शिष्या के उत्तीर्ण होने पर ट्यूशन के रूप में ली गई राशि वापस करते हुए शिक्षक कहते हैं-इन पैसों से तुम आगे की पढ़ाई जारी रख सकती हो।

पारिवारिक जीवन की लघुकथाओं में आत्मिक सम्बन्ध, परिवार के सदस्यों के बीच आपसी समझ, वैचारिक असन्तुलन, दो पीढ़ियों में अन्तर , बड़ों की उपेक्षा आदि कई मुद्दे सामने आते हैं। इन लघुकथाओं में भावनाओं का यथार्थ, भविष्य निधि, आत्मिक बन्धन, दीप जल उठे, बीती विभावरी, आकांक्षा, नई पीढ़ी, पिघलती बर्फ़, चूक, विश्वास आदि प्रमुख हैं। ‘भावनाओं का यथार्थ’ का बेटा जिस खण्डहर होते मकान को बेचना चाहता है, उस मकान से पिता की भावनाएँ जुड़ी हैं। पिता अपनी बुढ़ापे की स्थिति और मन:स्थिति बतातकर पुत्र को निरुत्तर कर देता है। ‘भविष्य निधि’ जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है-हमारे वर्त्तमान के कर्म ही हमारी भविष्य-निधि है। इस भविष्य-निधि में हम जितने सुकर्म मिलाएँगे , हमारे सुख-सन्तोष का कोश उतना ही बढ़ता जाएगा। आत्मिक बन्धन , बीती विभावरी,आकांक्षा, विश्वास दाम्पत्य जीवन की सधी हुई कथाएँ हैं , जिनमें पति-पत्नी के बीच में आए भावनात्मक उतार -चढ़ाव का सहज चित्रण किया है। इन लघुकथाओं का मूल स्वर है- विश्वास और आपसी समझ। आपसी समझ में जब दरार आती है , तो रिश्ते दरकने लगते हैं। इन जुड़ाव को बनाए रखने के लिए अहं का त्याग और समर्पण -भाव अनिवार्य कारक है।

पुष्करणा जी ने लघुकथाओं में मानसिक उथल -पुथल और भाव के स्तर पर होने वाले परिवर्तन पर गहनता से विचार करके रचनाओं को आगे बढ़ाया है। मन की पर्तें खुलने पर मनुष्य का क्या स्वरूप सामने आता है, वह अलग से मनोविश्लेषण का और अध्ययन का विषय है। काम प्रवृत्ति मनुष्य की सहज वृत्ति है। इसे पाप-भावना न समझकर संयम के द्वारा, जहाँ उदात्त रूप दिया जा सकता है, वहीं असन्तोष और असंयम से इसी विकृति की ओर भी मोड़ा जा सकता है। आग में अविवाहित युवती का नौकर के प्रति काम भावना से भरना उसे बहुत उद्वेलित कर जाता है। पुष्करणा जी ने उसके अन्तर्द्वन्द्व का बहुत सूक्ष्मता से चित्रण किया है। मृगतृष्णा लघुकथा में धनाढ्य विधुर मित्र अपने मित्र के द्वारा एक सुन्दर युवती फोटो दिखाने पर कामुकता में घिर जाते हैं , जबकि मित्र वह रिश्ता उनके बेटे के लिए लेकर आए हैं। सत्यता का आभास होते ही वे खुद को सँभाल लेते हैं। पुरुष में मार्कण्डेय जी पीछे की सीट से आते दो नारी स्वर से आकर्षित होते हैं , लेकिन मुड़कर पीछे देखने का साहस नहीं जुटा पाते हैं। उनकी कल्पना में वे केवल युवा नारियाँ हैं, जिनसे वे मन ही मन जुड़ रहे हैं। उनकी मधुर कल्पना को उस समय झटका लगता है जब-‘अंकल प्लीज खिड़की बन्द कर दीजिए न!’ का स्वर उनके कानों से टकराता है। ‘अच्छा बेटा’ कहकर वे स्वयं को उस काम-कुण्डली से मुक्त कर लेते हैं।

‘निष्ठा’ का विषय नया है। पत्नी के मन में फ़िल्म के सन्दर्भ में उभरी आशंका का निवारण किया गया है। ‘उधेड़बुन’ लघुकथा की मानवती वर्षा और भीगने की ठिठुरन से पीड़ित की सहायता करना चाहती है; लेकिन उसका मन तरह -तरह की आशंकाओं में घिरने लगता है। इस तरह के प्लाट पर लघुकथा लिखना बड़ी चुनौती है। आत्मसंघर्ष और अन्तर्द्वन्द्व के बीच झूलती हुई मानवती किसी काम भावना से पीड़ित नहीं है, लेकिन उस समय के एकान्त में अकेली नारी को अपने अस्तित्व की भी चिन्ता है, जिसे प्रौढ़ तार-तार कर सकता है। इन सभी उद्वेगों से उद्वेलित होते हुए भी वह पति के कपडे देकर सहायता करती है, चाय भी पिलाती है। इस अवधि में उसका मन तरह -तरह की आशंकाओं के बीच आन्दोलित होता रहता है। ‘रक्तबीज’ में आपने भ्रष्ट नेता की वासना का चित्रण किया है, जिनके लिए हर औरत केवल भोग्या है। ‘नेता कभी बूढ़े नहीं होते’- यह संवाद वासना के मकड़जाल का पर्दाफ़ाश कर देता है। मदद के नाम पर ये कितनी ही महिलाओं को अपना शिकार बनाते हैं। इस लघुकथा का शीर्षक ‘रक्तबीज’ बहुत सार्थक है। शुम्भ-निशुम्भ के साथी रक्तबीज को शिव से वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की जितनी बूँदें धरती पर गिरेंगी , उनसे उतने ही राक्षस पैदा हो जाएँगे। इस सन्दर्भ में लघुकथा का यह शीर्षक पूरी लघुकथा की कुंजी के रूप में काम करता है। इसी कड़ी में मन के साँप के नायक को पत्नी की अनुपस्थिति में कभी ऑफ़िस की मिसेज सिन्हा का सौन्दर्य विचलित करता है, कभी वह नौकरानी को आवेगभरी दृष्टि से निहारता है। सब काम निपटाकर वह दूसरे कमरे में सोने चली जाती है, तो निद्रामग्न होने पर चुपके से उसे निहारता है। पुष्करणा जी ने मालिक के मन में उभरती हुई वासना को ‘मन के साँप’ द्वारा बड़ी कुशलता से रूपायित किया है।

आपने अपने लघुकथा-विषयक लेखों से, विभिन्न सम्मेलनों में अपने चिन्तन से लघुकथा -जगत् को एक दिशा दी है और आज भी दे रहे हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि उसी तत्परता से आप कारुय करते रहेंगे। एक बात और जोड़ना चाहूँगा कि इनकी कर्मठता से सभी नए-पुराने साथियों को कुछ सीखना चाहिए।

(साभार : लघुकथा डॉट कॉम, अक्टूबर 2021)

लघुकथा की बहुकोणीय परख का प्रयास : उत्कण्ठा के चलते / सतीश राठी

सतीश राठी
लघुकथा की पड़ताल करने के उद्देश्य से लघुकथा की गुणवत्ता की समालोचना करने का बहुत सारा काम सारे देश में हुआ है, फिर भी लघुकथा की अपेक्षित गुणवत्ता अधिकांश लघुकथाओं में नहीं आई है और शायद इसके पीछे कारण यह है कि उस सारे कार्य को बमुश्किल देखा गया है। लघुकथा को जीवित रखने के लिए उसकी समालोचना के कार्य को लघुकथा लेखक के द्वारा देखा जाना बड़ा जरूरी काम है। 

लघुकथा के परिंदे के माध्यम से कांता राय ने और परिंदे पूछते हैं के माध्यम से डॉ अशोक भाटिया ने बहुत सारा काम किया है। डॉ॰ राम कुमार घोटड ,बलराम अग्रवाल ,कल्पना भट्ट ने भी अपने स्तर पर इस क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण कार्य प्रस्तुत किया है। श्री बी एल आच्छा जी, माधव नागदा, सुकेश साहनी, जितेंद्र जीतू और बहुत सारे नाम इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। मध्यप्रदेश से क्षितिज संस्था ने तो लघुकथाओं की विवेचना करते हुए सार्थक लघुकथाएं पुस्तक प्रकाशित की है। इसी क्रम में उज्जैन के प्रतिष्ठित लघुकथाकार संतोष सुपेकर ने लघुकथा पर साक्षात्कार और विमर्श के जरिए एक महत्वपूर्ण पुस्तक का प्रकाशन किया है। इस पुस्तक का शीर्षक है 'उत्कंठा के चलते'। यह पुस्तक डॉक्टर सतीशराज पुष्करना एवं रवि प्रभाकर को समर्पित की गई है। इस पुस्तक में डॉ॰ योगेंद्र नाथ शुक्ल ने साक्षात्कारों के माध्यम से लघुकथा का परिदृश्य बदलने की उम्मीद जताई है। डॉ॰ उमेश महादोषी ने लघुकथा के संदर्भ में लेखक और पाठक के मध्य संवाद के महत्व पर अपनी बातचीत की है। लघुकथा में लेखक का परकाया प्रवेश जरूरी है, यह बात साक्षात्कार के विभिन्न प्रश्नों के माध्यम से सतीश राठी ने स्थापित करने की सफल कोशिश की है। प्रो॰ शैलेंद्र कुमार शर्मा ने लघुकथाकार को यह जिम्मेदारी बताई है कि उसे थोड़े में बहुत-कुछ कहना होता है। लघुकथा के अनुवाद परिदृश्य पर अंतरा करवड़े का साक्षात्कार महत्वपूर्ण है। कांता राय लंबे अरसे से लघुकथा में लेखक, समालोचक और संपादक के रूप में बहुत सारा महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं । उनसे लिया गया साक्षात्कार इस विधा के भीतर तक उतरकर बहुत सारे प्रश्नों के जवाब खोजने में कामयाब हुआ है। समालोचक श्री पुरुषोत्तम दुबे आलोचना के संदर्भ में अपने साक्षात्कार में कुछ महत्वपूर्ण बातों को स्थापित करने में सफल हुए हैं। स्त्री विमर्श पर लघुकथा के संदर्भ में श्रीमती वसुधा गाडगिल ने अपने साक्षात्कार में महत्वपूर्ण चर्चा की है। वरिष्ठ लघुकथाकार श्री सूर्यकांत नागर अपने साक्षात्कार में एक पूरे कालखंड को समेटेकर अनुभवजन्य रचना को सार्वलौकिक बनाना आवश्यक मानते हैं और इस संदर्भ में उनका विचार पक्ष बड़ा प्रबल है। व्यंगकार पिलकेन्द्र अरोड़ा ने भी लघुकथा के सोशल मीडिया के साथ संबंध में अपनी बात कही है। प्रसिद्ध चित्रकार श्री संदीप राशिनकर ने अभिव्यक्ति में निहित संवेदनशीलता पर अपनी बात प्रस्तुत की है। अमेरिका निवासी श्रीमती वर्षा हळवे ने लघुकथा में साइंस फिक्शन के बाबत बात कही है । एक पाठक के रूप में श्रीसंजय जोहरी के विचार भी पुस्तक में समाविष्ट किए गए हैं । 

इस प्रकार इस पुस्तक को लेखक, पाठक, संपादक, समालोचक, व्यंग्यकार, चित्रकार आदि व्यक्तित्व के माध्यम से

संतोष सुपेकर

एक समग्र स्वरूप में प्रस्तुत करने की ईमानदार कोशिश श्री संतोष सुपेकर ने की है जिसमें वह सफल रहे हैं। पुस्तक का मूल्य सिर्फ ₹100 है और इस तरह ₹100 की गागर में बड़ा-सा सागर प्रस्तुत किया गया है। 

प्रत्येक लघुकथा लेखक और पाठक को यह पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए।

समीक्ष्य पुस्तक : उत्कण्ठा के चलते (लघुकथा साक्षात्कार एवं विमर्श)

सम्पादन, संयोजन : सन्तोष सुपेकर 

प्रथम संस्करण : 2021

मूल्य- ₹100/-

प्रकाशक : एचआई पब्लिकेशन, 

302-303, तीसरी मंजिल, शान्ति प्लाजा, होटल समय के सामने, 

फ्रीगंज, उज्जैन (म.प्र.)- 456007 / 

मो. 9754131415

Friday, 1 October, 2021

अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है लघुकथा : राम मूरत 'राही'

बचपन में कहानी, उपन्यास पढ़ने का बहुत शौक था।  तभी मेरे मन में कहानीकार बनने की इच्छा जाग्रत हुई थी। मैंने 1980 यानी उन्नीस वर्ष की उम्र में एक कहानी लिखी थी, जिसे इंदौर के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में प्रकाशनार्थ भेजी थी। जब एक महीने बाद भी कहानी प्रकाशित नहीं हुई, तब मैं एक दिन समाचार पत्र के दफ्तर जा पहुँचा और साहित्य संपादक से कहानी के प्रकाशन के बारे में पूछा। तब उन्होंने मुझसे कहा, 'बेटा! पहले तुम पंद्रह सौ कहानी पढ़ो, फिर लिखना।' मैं उनका जवाब सुनकर, मायूस होकर लौट आया और जब यह बात मैंने अपने एक मित्र को बताई, तो उसने मुझे सुझाव दिया कि तुम पहले बच्चों के लिए छोटी-छोटी कहानियां लिखो, फिर बड़ो के लिए लिखना। मित्र के पर मैंने एक हास्य कहानी लिखी जो दिल्ली से प्रकाशित होने वाली बाल पत्रिका 'लोटपोट' में वर्ष 1980 में ही प्रकाशित हुई थी। इसके बाद मैं बाल कहानियों के साथ-साथ ही बाल कविताएं भी लिखने लगा।

लघुकथा लिखने की प्रेरणा मुझे जिन दो लघुकथाओं से मिली थी, उसमें से एक थी 'नपुंसक' जो सारिका • पत्रिका में प्रकाशित हुई थी और दूसरी लघुकथा थी स्व. रामनारायण उपाध्याय जी की 'फूट के बीज' जो नईदुनिया में प्रकाशित हुई थी। 1984 से मैंने लघुकथा लेखन की शुरुआत की थी।

आज के पाठक लघुकथा केवल इसलिए नहीं पढ़ते हैं कि वह आकार में छोटी होती है, वरन इसलिए भी पढ़ते हैं कि उनकी सुप्त चेतना को एकदम जाग्रत कर देती है। इस संदर्भ में वरिष्ठ लघुकथाकार श्री संतोष सुपेकर जी का यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है कि 'सुप्त समाज के लिए इंजेक्शन की सुई है लघुकथा, जिसकी थोड़ी सी दवा विशाल स्तर पर जागृति फैला सकती है।'

लघुकथा आज के समय की सबसे लोकप्रिय विधा है। लघुकथा समाज में फैली विसंगतियों, संवेदनाओं से पाठकों को रूबरू करवाती है। मेरा मानना है कि एक सार्थक लघुकथा वह होती है, जो अनुभव, संवेदना के साथ रची जाती है और पाठकों के दिलो-दिमाग को झकझोर कर रख देती है।

वैसे तो मैंने कविताएं, गजलें, व्यंग्य, बाल कहानियां, संस्मरण, समीक्षाएं भी लिखीं हैं और कुछ व्यंग्य चित्र भी बनाये हैं, लेकिन लघुकथा सृजन से जितनी संतुष्टि मुझे मिलती है, उतनी इन विधाओं से नहीं। क्योंकि लघुकथा के माध्यम से मैं जीवन के यथार्थ को बड़ी सहजता सरलता से व्यक्त कर पाता हूं। लघुकथा अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है। इसके द्वारा कम शब्दों में बड़ा संदेश दिया जाता है। लघुकथा 'देखन में छोटे लगें, घाव करैं गंभीर' बिहारी के इस दोहे को चरितार्थ करती है।

क्लिष्ट भाषा के बजाय मैं सरल सहज भाषा में लिखता हूं, ताकि आम पाठकों को शब्दकोश में या गूगल पर क्लिष्ट शब्द का अर्थ ढूंढना न पड़े और वे बड़ी आसानी से समझ जायें।

आज काफी संख्या में रोजाना लघुकथाएं लिखीं जा रही हैं, लेकिन उन्हीं लघुकथाओं/लघुकथाकारों को पहचान मिलती है, जिनके कथानक में विविधता होती है, नवीनता होती है, जिसे पढ़कर एक-दो दिन नहीं, वर्षों तक पाठकों के जहन में घूमती रहती है। लघुकथा में संवेदना का होना बहुत जरूरी है। इस संबंध में इंदौर के वरिष्ठ लघुकथाकार श्री सतीश राठी जी ने वर्ष 2018 में हुए क्षितिज साहित्य मंच के अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन में 'सृजन' विषय पर कहा था कि 'पाठक की आंख का आंसू बने, वही लघुकथा की गुणवत्ता और लोकप्रियता का साक्ष्य है।'

कुछ लघुकथाएं सुधी पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं :

टिप

वे महीने में तीन-चार बार परिवार सहित शहर की एक होटल में खाना खाने जाया करते थे। वेटर को टिप में कभी सौ रुपये, तो कभी और ज्यादा देते थे। एक बार पत्नी ने वेटर के जाते ही उनसे पूछा- आप वेटर को पाँच-दस रुपये टिप देने के बजाय, सौ या सौ से ज्यादा रुपये क्यों देतें हैं?'

'इन बेचारों को तनख्वाह बहुत कम मिलती है।' उन्होंने जवाब दिया। 

‘आपको कैसे पता कि इनको तनख्वाह कम मिलती है?'

'क्योंकि बेरोजगारी के दिनों में मैंने भी कुछ महीने वेटर का काम किया था।'

बोहनी

एक गरीब-से दिखने वाले वृद्ध से जनरल कोच में

एक पुलिस वाले ने पूछा- 'टिकट दिखाओ।'

'नहीं है साहब...'

'तो चलो थाने...' इतना कहकर पुलिस वाले ने उस वृद्ध की बाँह पकड़ी और कोच के एक कोने में ले गया, जहां पर कोई नहीं था। फिर बांह छोड़ते हुए धीमी आवाज में बोला--'लाओ दो सौ रुपये निकालो, नहीं तो थाने चलना पड़ेगा।'

'साब... दो सौ रुपये नहीं है।'

"ठीक है... सौ रुपये निकालो।'

'साब... सौ रुपये भी नहीं है।'

'अबे कुछ तो होगा? वही दे दे।' पुलिस वाले ने खीझकर कहा।

बुजुर्ग ने अपने हाथ में पकड़ी छड़ी एक तरफ रखते हुए, अपने कुरते की जेब में हाथ डालकर एक पांच रुपये का सिक्का निकालकर पुलिस वाले को देते हुए कहा- 'लो साब....'

पुलिस वाले ने जब पांच रुपये का सिक्का देखा, तो वह गुस्से में भर उठा और बोला- 'अबे स्साले... भिखारी समझ रखा है क्या?'

वह बुजुर्ग डरता हुआ बोला--'नहीं साब... भिखारी तो मैं हूं... अभी हाल ही में डिब्बे में भीख मांगने आया था कि आपने मुझे पकड़ लिया। थोड़ी देर बाद पकड़ते तो शायद मैं आपको दो सौ रुपये दे देता। अभी तो मेरी बोहनी भी नहीं हुई है। ये पांच रुपये का सिक्का तो कल का बचा हुआ है। इसे आप रख लो, आपकी बोहनी हो जाएगी।' 

जंगल की ओर

शहर की एक कॉलोनी में लगे मोबाइल टॉवर के पास, नीम के पेड़ पर बैठा एक चिड़ा अचानक धरती पर आ गिरा और थोड़ी देर तड़पने के बाद उसने दम तोड़ दिया। तभी एक चिड़िया अपने दो नन्हे बच्चों के साथ वहां आई और चिड़ा को मृत पड़ा देखकर विलाप करने लगी। दोनों नन्हे बच्चे भी अपनी माँ को रोता देखकर, जोर-जोर से रोने लगे। कुछ देर बाद उन में से एक बच्चे ने अपनी माँ से सिसकते हुए पूछा--'माँ! पिताजी को क्या हो गया है, और आप रो क्यों रही हैं?'

चिड़िया ने सिसकते हुए बताया--'बेटा! अब तुम्हारे पिता की मृत्यु हो चुकी है।'

'माँ! पिता जी की मृत्यु कैसे हुई?' दूसरे बच्चे ने सिसकते हुए पूछा।

'बेटा! मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडिएशन की वजह से।'

'माँ! क्या रेडिएशन से एक दिन हम भी मर जाएंगे?' पहले बच्चे ने मासूमियत से पूछा।

'नहीं बेटा ! इससे पहले कि हम पर भी मोबाइल टॉवर से निकलने वाले रेडिएशन का दुष्प्रभाव पड़े, हम ये शहर छोड़कर ऐसे गांव में जाएंगे, जहां मोबाइल के टावर न हो।'

चिड़िया इतना कहकर चिड़ा को आखरी बार देखकर, फिर अपने दोनों बच्चों को साथ लेकर गांव की तरफ उड़ गई।

गांव में एक पेड़ पर घोंसला बनाकर रहते हुए अभी उसे कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन चिड़िया बहुत ज्यादा बीमार पड़ गई। तब उसके एक बच्चे ने माँ को बीमार देखकर पूछा- 'माँ! आपको क्या हो गया है?'

'बेटा! शहर छोड़कर हम गांव इसलिए आए थे कि यहां हमारी जान को कोई खतरा नहीं होगा, लेकिन हम यहां भी सुरक्षित नहीं हैं।' 

‘कैसे माँ? यहां तो मोबाइल टावर भी नहीं है।' एक बच्चे ने पूछा।

'बेटा! यहां गांव में मनुष्य ज्यादा फसल की पैदावार लेने के लालच में साग-सब्जी के खेतों में रासायनिक खाद डाल रहा है और फसलों में अधिक मात्रा में कीटनाशको का छिड़काव भी कर रहा है, जिससे साग सब्जियां जहरीली हो रही है। हम पंछी इसे खाकर बीमार पड़ते है और फिर अपनी जान गवां देते है?'

'माँ! अब हम कहां जाएंगे?' दूसरे बच्चे ने चिंतित होकर पूछा।

'बेटा! मैं तो अब कहीं नहीं जा पाऊंगी। क्योंकि मेरा अंत निकट आ गया है। हां... अब तुम दोनो यहाँ से दूर जंगल में चले जाओ, जहां मनुष्य की छाया नहीं पड़ी हो ।'

नपुंसक

पश्चिमी संस्कृति में रची बसी किरण की शादी, उसके माता-पिता किसी भारतीय लड़के से करना चाहते थे। जब इसी सिलसिले में किरण अपने माता-पिता के साथ अमेरिका से भारत आई और कुछ दिनो बाद जब वह अपनी एक भारतीय सहेली सुधा से मिलने उसके घर गई, तो उसकी सहेली ने उससे पूछा- 'किरण ! मुझे आज तेरी मम्मी ने फोन पर बताया था कि तूने अभिषेक के साथ शादी करने से इंकार कर दिया है। तूने ऐसा क्यों किया? जबकि वह तो बहुत ही अच्छा लड़का है।'

'क्योंकि वह नपुंसक है।'

'नपुंसक है! तुझे कैसे मालूम पड़ा यार कि वह नपुंसक है?'

'क्योंकि मैं उसके साथ चार दिन पहले एक गार्डन में घूमने गई थी, तीन दिन पहले नाइट शो मूवी देखने गई थी और दो दिन पहले ही उसके साथ उसके बेडरूम में एक घंटे तक अकेली भी थी। लेकिन उस शख्स ने मेरे साथ इन तीनों जगहों पर ऐसी कोई हरकत नहीं की कि जिससे मुझे ये पता चल सके कि वह मर्द है।'

'किरण! ये भारत है, तेरा अमेरिका नहीं। भारतीय संस्कृति में शादी से पहले... ।'

मेरा तीर्थ

'सुना है कि तुम तीर्थ पर गये थे?'

'सही सुना है तुमने।'

'कौन से तीर्थ पर गये थे?"

'गांव।'

'गांव! गांव कोई तीर्थ होता है क्या?'

'हां...'

'वो कैसे?'

'क्योंकि वहां मेरे माता-पिता रहते हैं।'

लेखक संपर्क : राम मूरत 'राही', 168- बी, सूर्यदेव नगर, इन्दौर 452009 (म.प्र.)

मो. 9424594873

(वीणा, अक्टूबर 2021 से साभार)


Wednesday, 14 July, 2021

स्मृति : रवि प्रभाकर

(रचनाशील व्यक्ति को उसकी रचनाशीलता के माध्यम से याद करने से बेहतर अन्य कोई माध्यम नहीं। प्रिय रवि प्रभाकर को (लेखक रूप में उनके जनक) योगराज जी ने उसी सम्माजनक तरीके से याद किया है। हाल-फिलहाल लघुकथा ने डॉ. शकुन्तला किरण (23 मई 2021) और डॉ. सतीशराज पुष्करणा (28 जून 2021) को भी खोया है; लेकिन (मेरा मानना है कि) ये दोनों ही महानुभाव लघुकथा को अपना best दे चुके थे जबकि रवि बहुत-कुछ देने की प्रक्रिया में विकसित हो रहे थे। इस दृष्टि से इस युवा का असमय चले जाना लघुकथा की अकल्पनीय क्षति है।)

वर्ष 2014-15 में रवि भाई मेरे कहने पर बहुत ही हिचकिचाहट के बाद सोशल मीडिया पर सक्रिय हुए। मैंने उनके अंदर एक गंभीर आलोचक देखा था, इसलिए मैंने उन्हें कहा कि आप विभिन्न समूहों में हो रही गतिविधियाँ देखें और प्रतिभाशाली लेखकों की खोज करें उनकी रचनाएं देखें ताकि आपके ज्ञान में भी वृद्धि हो। गतिविधियाँ देखने वाली बात उनको पसंद नहीं आई लेकिन दूसरी बात पर वे सहमत हो गए। पढ़ने का तो उन्हें जनून की हद तक शौक़ था ही, इसलिए वे सोशल मीडिया के समूहों से अच्छी रचनाएं पढ़ते और मुझसे उनपर चर्चा करते। 'ये बंदा बहुत तरक्की करेगा', 'इसकी रचनाओं में दम है', 'इसको थोड़ा मार्गदर्शन की जरूरत है'. 'ये बंदा कई सालों से वहीं-का-वहीं खड़ा है, इसपर मत्था मरना वक़्त की बर्बादी है', 'अगर ये अपनी भाषा सुधार ले तो कमाल का लिखेगा',- अक्सर वे ऐसी बातें मुझसे किया करते थे, और अपनी राय तर्कपूर्ण तरीके से दिया करते थे। बहरहाल, उन्होंने एक बार किसी पुस्तक की समीक्षा लिखी और मुझे भेजी। मुझे समीक्षा पसंद नहीं आई।' क्योंकि वह 'इस लघुकथा में पुलसिया अत्याचार दिखाया गया है', 'इसमें दहेज़ की मारी एक महिला का दर्द दर्शाया गया है', 'ये बताया गया है, वह दिखाया गया है' टाइप की समीक्षा थी। उन्होंने मुझसे पूछा कि आखिर इसमें कमी क्या है? मैंने कहा भाई! जो दिखाया, दर्शाया या बताया गया है वह तो सभी को दिखाई देता है। इसमें आपकी क्या कलाकारी है? यह तो स्थूल-सी पाठकीय प्रतिक्रिया है जो कोई नौसीखिया भी दे देगा। आप वह बताएं जो दिखाई नहीं दे रहा है, गहराई में उतरें और कुछ अलग-सा लिखें। यह बात उनके दिल को जँची; उन्होंने झट से कहा कि इस समीक्षा को मैं निरस्त करता हूँ। मुझे दो वर्ष का समय दें, मैं ऐसी समीक्षा लिखूंगा किआपको पढ़कर निराशा नहीं होगी। कुछ महीने बाद उनके घर जाने का संयोग बना, तो मैंने देखा कि उनकी टेबल पर दर्जनभर आलोचना से संबंधित पुस्तकें रखीं हुई थी, उन में महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को बाकायदा 'हाईलाईट' किया हुआ था। उन्होंने बताया कि वे आचार्य शुक्ल, बाबू गुलाब राय और मुक्तिबोध को घोलकर पी रहे हैं। वर्ष 2017 में उन्होंने राजेश कुमारी के लघुकथा संग्रह 'गुल्लक' की समीक्षा लिखी, और लिखी भी बाकमाल।


मेल भेजने के दो दिन बाद उन्होंने मुझे फोन किया और पूछा- "क्यूँ जनाब! बणी कुश गल्ल?" (क्यों जनाब, कुछ बात बनी?)... मैं केवल इतना ही कह पाया, "जिंदाबाद!" 

4 अक्टूबर 2017 को ओबीओ पर प्रकाशित रवि भाई द्वारा की गई वह समीक्षा प्रस्तुत है।

पुस्तक- ‘गुल्लक’ (लघुकथा संग्रह)

लेखिका- राजेश कुमारी

प्रकाशक- अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद

मूल्य- 140-00 रू.

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आधुनिकीकरण के दौर में रिश्तों के बीच एक अजनबीपन बढ़ता जा रहा है। सहज मानवीय संबंधों की ऊष्णता तेज़ी से उदासीनता में बदल रही है। आपाधापी के इस माहौल में एकाकीपन और परायापन आज के जीवन की अनिवार्यता सी बन गई है। जीवन की यह अनिवार्यता वैयक्तिक, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में सर्वत्र व्याप्त है। धीरे-धीरे संवेदन शून्यता निःसंगता और जड़ता बढ़ रही है जो ‘गुल्लक’ लघुकथा में सहज ही परिलक्षित हो रही है। देखो पापा, मैंने आपको ये पहले भी कहा था कि हमारे पास अभी इतनी बचत नहीं है; मुश्किल से गुज़ारा होता है, फिर हवाई जहाज़ से हर साल यहाँ आने-जाने में ही कितना ख़र्च हो जाता है। ऊपर से मिंटू की पढ़ाई का ख़र्च, छोटी बेटी का ख़र्च; बस आप भी न... फ़ालतू की चिंता करते हो। जब लड़के वाले कुछ माँग नहीं रहे तो जितना है उसमें से ही सिम्पल शादी कर दो।‘ कहकर चन्दन फ़ोन में व्यस्त हो गया।’नन्हे मिंटू का अपनी गुल्लक दादा के सामने फोड़ कर ‘ये लो दादा जी! बुआ की शादी के लिए जितने पैसे आपको चाहिए सारे ले लो’ का प्रसंग इस लघुकथा को भावनाओं के शिखर पर ले जाता है। इस प्रकार ‘गुल्लक’ एक भावपूर्ण और मार्मिक लघुकथा है जो हृदयरूपी वीणा के तारों को झंकृत कर देती है और पाठक मानवीय संबंधों की मार्मिकता के द्वंद्व और तनाव के बीच उसकी सहजता को अनुभव करने लगता है।

राजेश कुमारी ने अपनी लघुकथाओं की पृष्ठभूमि और कथानक अपने आसपास से रोज़ाना घटित होने वाली बिल्कुल साधारण-सी चीज़ों, स्थितिओं और घटनाओं से उठाए हैं। जिससे उनकी लघुकथाएँ सहज-सरल एवं अनायास रचित जान पड़ती हैं। जैसे कि ‘तितलियाँ’ के मुन्ना का कॉलेज में अपनी छोटी बहन की ऐडमिशन के बाद अन्य लड़कियों को देखने का नज़रिया बदल जाना। ‘प्रतिउत्तर’ में नीतू का मामा की लड़की को चश्मा लगने के बाद ‘मामा फिर तो अब दो-दो चश्मिश, दो-दो चश्मेबद्दूर हो गई घर में।’ तसल्ली करना। राजेश कुमारी की लघुकथाओं के पात्र जीवन की समस्याओं से घिरे हुए हैं, तनाव से गुज़र रहे हैं। निराशा और हताशा उन्हें जड़ बना देने की हद तक ले जाती है लेकिन वे इससे बाहर निकलने का प्रयास करते रहते हैं। उनका रवैया जीवन से भागने का नहीं बल्कि जीवन की ओर भागने का है। ‘और वो चुपचाप उसी आसमान, जिसके नीचे उसकी बेबसी तार-तार हुई थी को साक्षी मानकर रुक जाती है, और अपनी विदीर्ण छाती से मजबूरियों और बदनामी का बोझ उतार झाड़ियों में रखकर दिन के उजाले में फिर से सभ्य समाज की जिस्मभेदी नज़रों का सामना करने लिए हिम्मत जुटाती हुई वहाँ से चल देती है।’ (बदनामी का बोझ) ‘आँखों के गीलेपन को छुपाते हुए रामलाल उठ खड़ा हुआ, बोला, ‘बदरी, तेरे यहाँ जो अख़बार आता है उसका मेट्रीमोनियल वाला पेज देना।’ (सूखे गमले) ‘मुक्तिबोध’ लघुकथा को इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ लघुकथा कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस लघुकथा में किडनैप से छूटे बालक की मनःस्थिती का मनोवैज्ञानिक चित्रण बहुत कुशलता से उकेरा गया है।"उड़ते हुए तोते को देखकर रोहित के चेहरे की ख़ुशी देखने लायक़ थी। वो पहले की तरह ताली पीट-पीटकर हँस रहा था।’ शिल्प की दृष्टि से देखा जाए तो लघुकथा का अंत बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। अंत के विषय में यह ध्यान देना आवश्यक है कि वह कथा के उद्देश्य को भली प्रकार से व्यक्त करता हो। अंत का उद्देश्य ही कथा के लक्ष्य को स्पष्ट करना होता है। यहीं लेखक को पात्रों के संबंध में अंतर्निहित समस्त रहस्यों को खोलना होता है और साथ ही अपनी विचारधारा का भी अप्रत्यक्ष ढंग से पाठको को एक संदेश देना होता है। कथान्त पाठकों के मनमस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ने वाला होना चाहिए। इस कथा का अंत ‘किडनैपर्स की क़ैद से रिहा हुए, क़रीब एक महीने बाद, आज उनका लाड़ला हँस रहा था।’ जिससे रोहित की मनःस्थिती का सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यह पाठकीय चेतना को गहन झटका देता है।

‘गजरा’ लघुकथा भी एक अर्थगर्भी व गहन लघुकथा है जिसमें ट्रैफ़िक सिग्नल पर गजरा बेचने वाले बच्चों का ज़िक्र किया गया है। ‘साहब’ को रोज़ाना गजरा बेचने वाला बच्चा गजरे का भाव बीस से चालीस कर देता है और साहब के इस बारे में पूछने पर ‘साहब ! जब एक दिन में मेमसाहब बदल जाती है तो भाव नहीं बदल सकते क्या?’- जवाब देता है। ‘अभी मज़े देखना गप्पू; यदि ये मेमसाब इनकी घरवाली हुई, तो गजरा अभी बाहर आएगा।’ बच्चों का वक़्त से पहले ही ‘मेच्योर’ हो जाने और बच्चों का बचपन छिन जाने की गंभीर समस्या को इस लघुकथा में कुशलता से चित्रित किया गया है।भूमण्डलीकारण, वैश्वीकरण, बाज़ारवाद और उपभोगतावाद संस्कृति ने इनसान को आत्मकेन्द्री बना दिया है। इनके चलते अपनों से ही निर्वाह करना मुश्किल होता जा रहा है। संबधों के विघटन के कारण आपसी रागात्मकता भी प्रभावित हुई है। आज के दौर में बहुतिकता के कारण आपसी रिश्ते टूट रहे हैं। स्वार्थपरकता बढ़ती जा रही है जिससे मनुष्य के भीतर की संवेदनाएँ ख़त्म होती जा रही है। राजेश कुमारी की बहुचर्चित लघुकथा ‘राखी’ दरकते रिश्तों और स्वार्थपरकता की बेजोड़ उदाहरण है। इस लघुकथा में ननद अपनी भाभी को फ़ोन पर कहती है कि उसने राखी पोस्ट कर दी है यदि राखी न पहुँची तो वो स्वयं परसों तक उनके यहाँ पहुँच जाएगी। अगले दिन भाभी ननद को फ़ोन पर सूचित करती है कि उसकी राखी पहुँच गई है। इस लघुकथा की अंतिम पंक्ति है:‘पर भाभी, मैंने तो इस बार राखी पोस्ट ही नहीं की थी....।’

राजेश कुमारी ने अपनी लघुकथाओं के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य का तीखा नश्तर लगाया है। इन लघुकथाओं के कथ्य में एक ऐसी तीव्र प्रभावन्विति है कि वे पाठकीय चेतना को सामाजिक चेतना के प्रति झकझोर देती है। ‘लक्ष्मी’, ‘तितलियाँ’, ‘चश्मा’, ‘महिला उत्थान’, ‘शातिर’, ‘साइकल वाला’ इत्यादि लघुकथाएँ इसकी सशक्त उदाहरण हैं।

पुरानी पीढ़ी के प्रति आदर और सम्मान के भाव का लगभग नष्ट हो जाना बदलते आधुनिक युग का एक भयानक यथार्थ है। संत्रास, क्षणवादिता, अकेलापन, लाचारी, बेचारगी आदि वृद्ध जीवन की नियति का मानो अनिवार्य फल बन गया है। इस समस्या को राजेश कुमारी ने अपनी लघुकथा ‘बंधन‘ में बुजुर्ग ससुर की दयनीय स्थिति के रूप में चित्रित किया है। अमेरिका शिफ़्ट हो रहे परिवार में कुत्ते टॉमी की देखभाल के सबंध में जब छोटा मिंटू पापा से पूछता है तो जवाब मिलता है कि उसे चाचा के पास छोड़ देंगे। और पालतू मिट्ठू के बारे में पूछने पर ‘उसको आज़ाद कर देंगे; बहुत दिनों से क़ैद में है बेचारा।’ ‘कैसे जाएँगे जी, इतना आसान है क्या! हमारे साथ एक-दो बंधन थोड़े ही हैं।’ तिरछी नजरो से कोने में बैड पर लेटे ससुर को देखते हुए धीमी से कहती हुई सीमा अंदर चली गई। ‘अचानक सहस्त्रों लंबे-लंबे काँटे ससुर के बिस्तर में उग आए।’ यह लघुकथा बुजुर्गों के प्रति असंवेदनशीलता को मुखरता से अभिव्यक्त करने में पूरी तरह सफल रही है।आधुनिकता की रंगीनियों में आज व्यक्ति अनभिज्ञ और अपरिचित की भाँति दिग्भ्रमित सा घूम रहा है। अपनों के बीच भी उसे परायापन महसूस होता है क्योंकि आधुनिक युग की इस भाग-दौड़ में किसी के पास किसी के लिए समय ही नहीं है। सभी अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हैं। एक ही परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे के कार्यों से अनजान हैं। इन सब का बुरा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। राजेश कुमारी लघुकथाएँ ‘परिभाषा’ व ‘कॉमन’ में वैयक्तिक चेतना, व्यष्टिवाद, सूक्ष्मता और एकरसता की अभिव्यक्ति हैं। कुछ रुक कर प्रियांक आगे बोला, ‘क्योंकि झूठ बोलना पाप है इसलिए मैं सच कहता हूँ, ये आदर्श परिवार मेरे दोस्त गोलू, जो हमारे ड्राइवर का बेटा है उसका है; उसी ने मेरी ये स्पीच तैयार करवाई। मेरे अपने परिवार की परिभाषा क्या है वो मुझे नहीं आती।’ (परिभाषा) ‘हाँ पापा! है न एक चीज़ कॉमन; उसके पापा भी रोज़ ड्रिंक करके इतनी रात गए घर में आते हैं और उसकी मम्मी पर इसी तरह चिल्लाते हैं;’ (कॉमन) बाल यौनशोषण एक जघन्य समस्या है। कामान्ध भेड़ियों के इस पाशविक कृत्य से पीड़ित का मात्र शारीरिक शोषण ही नहीं होता अपितु मानसिक दृष्टि से भी उसपर बुरा असर पड़ता है। इस समस्या का हर स्तर पर प्रतिकार होना चाहिए। यौनशोषण पीड़ित को केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से इतना बेबस बना देता है कि वह जीवन पर्यांत उस पीड़ा से मानसिक रूप से उबर नहीं पाता। इसका यथार्थ चित्रण राजेश कुमारी ने अपनी लघुकथा ‘दोपाये’ में मासूम गुड़िया के माध्यम से बहुत मार्मिक ढंग से किया है।‘लेकिन एक बात झूठ निकली आपकी कहानी की दादा, आप तो भेड़ियों को चैपाये कहते थे, पर वो भेड़िये तो दो पाए थे।’ कहते हुए गुड़िया शून्य में अस्पताल के उस कमरे की छत को अपलक देखने लगी।

समाज में लिंग के आधार पर किया जाने वाला भेदभाव आम-सी बात है। पुत्र की कामना में कन्या भ्रूणहत्या इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। गर्भ में हत्या न भी की जाए तो भी आम जीवन में भी मात्र स्त्री होने के आधार पर किया जाने वाला भेदभाव भली-भाँति देखा जा सकता है। जीवन के हरेक क्षेत्र चाहे शिक्षा, खेलकूद, व्यवसाय आदि सभी में पुरुष को स़्त्री से अधिक प्रधानता दिए जाने के असंख्य उदाहरण दिखाई देते हैं। यह एक चिन्तनीय समस्या है जिसके चलते स्त्रियों को पुरुषों के मुक़ाबले सही अवसर प्रदान नहीं किए जाते और उनकी प्रगति के मार्ग निरंतर अवरुद्ध किए जाते हैं। स्त्रियों को इसका आभास छोटी उम्र से ही करवा दिया जाता है। राजेश कुमारी ने इस सामाजिक बुराई पर अपनी लघुकथा ‘बुनियाद’ के माध्यम से दृष्टिपात किया है जहाँ शिलान्यास पूजा में कलावा बाँधने के लिए छह वर्षीय पोती चारू के स्थान पर आठ महीने के पोते को प्राथमिकता दी जाती है।

चंद स्वार्थी धर्मान्ध लोग अपने धर्म और उसकी मान्यताओं को अन्य धर्मों से श्रेष्ठ तथा उन्हें निकृष्ठ मानते हैं और उनके प्रति द्वेष भी भावना रखते हुए उनका निरादर करते है जिससे सांप्रदायिकता जैसी विकट समस्या उत्पन्न हो जाती है जो किसी भी सभ्य समाज के विघटन का मूल बन जाती है। दूसरे धर्मों की अपवर्जिता के कारण सामाजिक एकता विखंडित होती है तथा धार्मिक कट्टड़ता एवं अंधविश्वास के कारण साम्प्रदायिक हिंसा तथा दंगों का जन्म होता है। साम्प्रदायिक दंगों की विभीषका पर राजेश कुमारी की सशक्त लघुकथा ‘दीवार’ एक तीक्ष्ण तंज़ कसती है । प्रतीकात्मक शैली में लिखी इस लघुकथा का संवाद देखें:‘चल मुन्नी बाई के कोठे की छत पर गुटरगूँ करेंगे; सुना है वहाँ धर्म-वर्म का कोई चक्कर नहीं है, वहीं अपना आशियाना बनाएँगे।’ जाति व्यवस्था समाज में एक अभिशाप है। आदमी-आदमी के बीच गहरे भेदभाव के रूप में जाति-पाँति की बुराई हमारे सामाजिक परिवेश में रच-बस चुकी है। जातिवाद और धर्म के मिश्रण की गोली जिसमें नसीब, क़िस्मत का घोल चढ़ाकर चंद स्वार्थी लोगों ने ऐसी गोली बनाई जिससे मेहनतकश लोगों ने इस ग़ुलामी की व्यवस्था को अपना भाग्य मान लिया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी ग़ुलामी करते आए। हमारे समाज की यह विडंबना है कि जातियों का वर्गीकरण उनके व्यवसायों के अनुसार किया जाता है। व्यक्तिगत बौद्धिकता को मापने का पैमाना भी जातिवाद ही हो गया। जाति-पाँति के इस कलंक से मुक्ति का प्रयास राजेश कुमारी ने अपनी लघुकथा ‘मोची की लड़की‘ और ‘पट्टी’ के माध्यम से सफलतापूर्वक किया है। ‘मोची की लड़की’ के कुछ संवाद देखें:मैंने उनको फ़ोटो दिखाया तो पढ़कर अचानक वे बोली- ‘अरे एक मोची की बेटी आई.ए.एस. टॉपर?’अ‘हाँ माँ ! एक स्वाभिमानी बाप की स्वाभिमानी बेटी आई.ए.एस. टॉपर।’ कहते हुए मैं रसोई में पड़े बर्तनों को माँजने चल पड़ी। बच्चों का अपना ही एक संसार होता है, उस संसार में उनके अपने ही सपनों का कलवर होता है, उनके अपने व्यक्तित्त्व और अस्मिता की ज्योतिर्मय छटा है। आज का बच्चा सिर्फ़ देखता नहीं सोचता भी है। वह जो कुछ सुन लिया उसे ही सच नहीं मान लेता वरन् उसकी सच्चाई की तह तक जाने की चेष्टा भी करते हैं। आज का बच्चा उम्र, वय, स्वभाव, अनुभव एवं रूचियों की दृष्टि से भले ही बच्चा लगता हो मगर वह अपने आसपास के माहौल के प्रति सजग दृष्टि रखता है। इसका यथार्थ चित्रण ‘फटफटिया’ में आठ वर्षीय बेटे के रूप में नज़र आता है। घर में माँ-बाप के वार्तालाप से बच्चे के बालमन पर ऐसा असर होता है कि वो पड़ोसी की मोटरसाइकिल को आग लगा देता है। ‘अम्मी अम्मी, अ.. अ.. अब तो आ.. आप ख़ुश हैं न... शकील भाईजान की फटफटिया जल गई... अब तो.. दद्दू को तकलीफ़ नहीं होगी न‘? आ...प अब्बू से लड़ाई नहीं करोगी न?’ ‘अम्मी मैं वहाँ खेलने नहीं गया था... मैं घर से माचिस लेकर गया था...।’ और बोलते-बोलते बच्चे का सिर अम्मी की गोद में लुढ़क गया। डॉ. अनूप सिंह के अनुसार, ‘लघुकथा में वर्णित घटना या व्यवहार की समयावधि अल्प होनी चाहिए। यह समयावधि दिनों, हफ़्तों, महीनों या सालों में फैली हुई नहीं होनी चाहिए। कम-से-कम प्रस्तुत किया जाने वाला या फोक्स किए जाने वाला घटनाक्रम सेकैंडों, मिनटों या ज़्यादा से ज़्यादा कुछ घंटों तक ही सीमित होना चाहिए।’ यानी उसमें कालांतर न आ जाए। इस बिंदु को ध्यान में रखते हुए राजेश कुमारी की कई लघुकथाओं में कालखंड दोष नज़र आता है जैसे, ‘राखी’, ‘किराए की कोख’, ‘समझौता’, ‘शक़’, ‘प्रायश्चित’, ‘संवासिनी’, ‘एक था भेंडर’ और ‘अंगदान’।

इस लघुकथा संकलन में कुछ लघुकथाएँ ऐसी भी हैं जो लघुकथा के मूलभूत नियमों का अतिक्रमण करती नज़र आ रहीं है, कुछ अपने आकार की वजह से और कुछ घटनाओं की बहुलता की वजह से । लघुकथा और कहानी में फ़र्क़ समझने के लिए डॉ. पुष्पा बंसल के वक्तव्य को ग़ौर से देखना और समझना चाहिए। उनके अनुसार, ‘लघुकथा कहानी की सजातीय है किंतु व्यक्तित्त्व में इससे भिन्न है। यह मात्र घटना है, परिवेश निर्माण को पूर्णतया छोड़कर, पात्र चरित्र-चित्रण को भी पूर्णतया त्यागकर विश्लेषण से अछूती रहकर मात्र घटना (चरम सीमा) की प्रस्तुति ही लघुकथा है। कहानी में प्रेरणा के बिंदु का विस्तार होता है। लघुकथा में विस्तार नहीं संकोच होता है, केवल एक बिंदु ही होता है, अपने घनीभूत रूप में। कहानी का उद्देश्य मनोरंजन करना भी माना जाता रहा है, कुछ अंशों में आज भी माना जाता है। परंतु लघुकथा मनोरंजन नहीं करती मन पर आघात करती है, चेतना पर ठोकर मारती है और आँखों में उँगली घुसाकर यथार्थ दिखाती है।’ इसके आधार पर ‘शक़’, ‘हेप्पी टीचर्स डे’, ‘ज्योति से ज्योति’, ‘एक था भेंडर’ और ‘अंगदान’ लघुकथा की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं।

इस संग्रह की कुछ लघुकथाएँ जैसे ‘पहिए’, ‘एक ही चिप’, ‘जो कहते न बने’ व्यंग्य की महीन रेखा पार करके हास्य की ओर झुकी नज़र आतीं है। हास्य और व्यंग्य में प्रधान अंतर उसके उद्देश्य की भिन्नता के कारण होता है। पहले का प्रयोजन मनोविनोद होता है तो दूसरे का विकृति। डॉ. शेरजंग गर्ग के अनुसार, ‘हास्य और व्यंग्य का सबसे बड़ा अंतर यही है कि हास्य निष्प्रयोजन होता है यदि उसका कोई प्रयोजन होता भी है तो वह निश्चय ही विशिष्ट नहीं होता, जबकि व्यंग्य निष्प्रयोजन नहीं होता और उसका प्रयोजन वास्तव में गूढ़ और मार्मिक होता है।’‘हाँ हाँ, क्यों नहीं, लो इसमें मेरा फ़ोटो भी छपा है वो भी देख लो।’ वो कह ही रहे थे कि महिला ने तुरत-फुरत में एक पेज फाड़ा और अपने बच्चे की पोट्टी साफ़ करने लगी। कविवर के मुँह से एक बार तो चीख़ ही निकल पड़ी। अख़बार के उस पेज में पीले रंग के बीच उनका चेहरा मुस्कुरा रहा था वो मैंने भी देख लिया था।‘फिर भी मैंने चुटकी लेते हुए कहा‘‘कविवर जी अपना फोट दिखाइये न?’जवाब में कविवर की आँखें वो सब कह रही थी जो न कहते न बने। (जो कहते न बने)कुछ लघुकथाएँ जैसे कि ‘महिला उत्थान’, ‘जीवन गठरिया’ और ‘गर्भ’ यथार्थ से दूर नज़र आईं।

शिल्प की दृष्टि से एक नजर : डस्टोन का कथन है कि लेखक समाज से जो कुछ वाष्प रूप में ग्रहण करता है उसे वर्षा के रूप में वापस कर देता है। सरल शब्दों में कहा जाए तो साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब होता है। समाज में जो कुछ घटता है तथा जो घटनाएँ लेखक के मन को झंकझोरती है उसी की अभिव्यक्ति साहित्य में प्रतिबिम्बित होती है। सृजन-प्रक्रिया के दौरान लेखक के सोचने व महसूस करने के अदृश्य भाव भाषा का आवरण लेकर ही प्रस्तुत होते हैं। हमारे विचार भाषा से बँधे होते है। बिना भाषा के विचारों का कोई अस्तित्त्व नहीं होता । चिंतन से लेकर अभिव्यक्ति तक भाषा ही माध्यम रहती है। अभिव्यक्त होकर यही भाषा पाठक तक भी उस अनुभूति को सम्प्रेषति करती है। भाषा जब लेखक या वक्ता से छूटकर पाठक या व श्रोता तक पहुँचती है तो वह जो प्रभाव उत्पन्न करती है वह उसकी रचनात्मक शक्ति का ही इज़हार है । 

राजेश कुमारी के लघुकथा संग्रह ‘गुल्लक’ में प्रकाशित लघुकथाओं की भाषा आधुनिक जीवन की विडंबनाओं का जीवंत चित्र प्रस्तुत करती हैं। राजेश कुमारी की भाषा सीधी, सहज व प्रवाहमयी है। भाषा पा़त्रों एवं भावों के अनुरूप तथा कथा को सहज बनाने में सक्षम है। उनकी लघुकथाओं की शिल्पगत विशेषता यह है कि वे अपने पात्रों के चारो ओर जिस परिवेश की रचना करती हैं वह उनके पात्रों के समांतर मुखर होता है। वह घटना(ओं) और पात्रों को आलोकित करता है। इन लघुकथाओं के पात्र विविध जातियों, समुदायों, वर्गों तथा भिन्न-भिन्न संस्कारों वाले हैं। उनकी भाषा का सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर पता चलता है कि राजेश कुमारी में पात्रानुकूल भाषा प्रयोग की अद्भुत क्षमता है। पा़त्रों के अनुसार तत्सम-तद्भव, संस्कुतनिष्ठ, उर्दू-मिश्रित तथा अँग्रेज़ी शब्दों से युक्त भाषा की विविधता लघुकथाओं में देखी जा सकती है। जैसे:‘इस संडे कहाँ पार्टी करें कोमल?’ नील ने पूछा‘ यू लाइक, मॉल चलते हैं।’ (आस्थाः शॉपिंग मॉल)‘तीन किलोमीटर होई।’‘तुम पैदल ही....।’‘हाँ उसमें कौनु बड़ी बात है?’ (जीवन गठरिया)‘भाई एक बेरी और सोच ले, कहीं लेने के देने न पड़ जांवे, छोरी के चाच्चा को तू जाणे सः बड़ा आदमी सः कुछ.....’‘भाई तन्ने पता नहीं है, दोनों भाई एक-दूसरे की सूरत भी देखना नी चाहते। सारे गाम कू पता सः और उसे तो ब्याह का न्योता भी नी दिया मुँह फुलाए बैठ्ठा घर में।’ (चाब्बी)

लघुकथा की असफलता-असफलता का गुरुतर दायित्त्व भाषा-शैली की साम्‍थर्य पर ही निर्भर है । भाषा एवं शैली का संबंध अन्योन्याश्रित है। वस्तुतः शैली शिल्प का ही एक अंग है जिसका संबंध भाषा में होने वाले प्रयोगों से है। लेखक की शब्द योजना, शब्द चयन और वाक्य को गठित करने की पद्धति शैली के अंतर्गत आती है यानी रचनाकार अपनी अनुभूतियों को किस शैली द्वारा अभिव्यक्त करता है। प्रतीक विधान लघुकथाओं की शिल्पगत विशेषता है। लेखक जब कम-से-कम शब्दों का प्रयोग करके अधिकाधिक अर्थ को अभिव्यक्त करना चाहता है तो वह प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग करता है। प्रतीक विस्तार को संक्षेप में कहने का सशक्त माध्यम है। कथ्य को अल्प शब्दों में अधिक प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्ति देने के लिए प्रतीकात्मक शैली को अपनाया जाता है। 

राजेश कुमारी ने अपनी लघुकथाओं में प्रतीकों का प्रयोग इतनी सरलता, सजगता एवं दक्षता से किया है कि उसके अभिप्रेत अर्थ को पाठक सहजता से ग्रहण करता है।‘आत्मग्लानि के घड़ों पानी में भीगा-सा शेखर तुरंत अंदर वापस आया....’ (शो आफ़)‘अंबर ने भी अश्रुओं की झड़ी लगा दी.....’ (बदनामी का बोझ)‘सुनते ही उसके आक्रोश के ज्वालामुखी का लावा आँखों से आँसू बनकर बहने लगा।’ (किंकर्तव्यविमूढ़)राजेश कुमारी जी की भाषा अलंकारिक है। उपमा रूपक दृष्टांत आदि अलंकारो का प्रयोग उन्होनें भाषा के बाह्य रूप को सजाने के लिए ही नहीं बल्कि अभिव्यक्ति को अधिक सशक्त बनने के लिए किए हैं-‘बोला आज तो बिना सींगो की गाय है तुम भी मज़े से.......’ (ज़हरीले चूहे) ‘हाँ भेड़िया बकरी की खाल में नज़र आ रहा है.....’ (तितलियाँ)‘अब इसके तस्में ढीले होएँगे.....’ (बेटी को बचा लो)‘अचानक सहस्त्रों लंबे-लंबे काँटे ससुर के बिस्तर में उग आए।’ (बंधन)परिवेश के चित्रण में भी राजेश कुमारी भाषा पर बहुत अच्छी क्षमता रखती हैं। 

भाषा की सजावट के कारण लघुकथा को एक जीवंतता मिलती है। दृश्य चित्रण की कुशलता उनकी लघुकथाओं में बाखूबी परिलक्षित होती है। जैसेः‘घुप अँधेरा। उफनता तूफ़ान, कर्कश हवाओं की साँय-साँय, पागल चरमराते दरख़्त।’ (बदनामी का बोझ) ‘सूखे गमले’ में घर की उदासी का शानदार चित्रणः‘डेढ़ साल हो चुका थे नकुल को गए। आज भी उस घर की दीवारों, चौखटों से सिसकियों की आवाज़ सुनाई देती है। बाग़ीचे के हरे, सफैद, लाल फूल उस तिरंगे झंडे की याद दिलाते हैं जिसमें लिपटा हुआ उस घर का चिराग़ कुछ वक़्त के लिए रुका था। नई दुल्हन की कुछ चूड़ियाँ आज भी तुलसी के पौधे ने पहन रखी हैं। बीमार माँ की खाँसी की आवाज़ें कराह में बदलती हुई सुनाई देती हैं।’ या फिर ‘बस-यात्रा’ में मई की उमस भरी गर्मी का परिवेश चित्रण जिसे पढ़ते वक़्त पाठक स्वयं भी उमस भरी दोपहर में यात्रियों से ठूसी बस के यात्रियों के पसीने के बदबू को महसूस करता हैः‘मई का महीना। आग बरसाता हुआ सूरज। ऊपर से साम्‍र्थ्‍य से ज़्यादा भरी हुई खचाखच बस। पसीने से बेहाल लोग... रास्ता भी ऐसा कि कहीं छाया या हवा का नाम-निशान नहीं।’राजेश कुमारी ने अपनी भाषा में ध्वनियों के सूक्ष्म, सटीक तथा सार्थक ध्वन्यानुकरणात्मक शब्दों के प्रयोग किए है। आई है। जैसे-- ‘ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग़.....!‘ , ‘छन्न...छन्न...छनाकऽऽ!‘ , ‘क्लिक ! क्लिक ! क्लिक !‘, ‘पीं.. पीं.. पीं.. !‘ घुर्र-घर्र.. फट...फट... फट...!’ इससे भाषा की अर्थवत्ता बढ़ी है। इन शब्दों के प्रयोग से भाव उभरकर सामने आए हैं और अनुभूति में तीव्रता आई है!

शीर्षक को यदि लघुकथा की आत्मा कह दिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। शीर्षक के माध्यम से ही लेखक की योग्यता के प्रथम दर्शन होते हैं। अच्छे शीर्षक की विशेषता उसकी उचितता, उपयुक्तता, संक्षिप्तता, औत्सुक्यता और नवीनता होती है। लघुकथा जीवन के किसी मार्मिक पक्ष का रहस्योद्घाटन करती है। उसके शीर्षक में उसकी प्रतिछाया अवश्य रहनी चाहिए। प्रतिपाद्य के अनुरूप शीर्षक का होना अत्यंत आवश्यक है। शीर्षक लघुकथा में व्यक्त विचार, भाव, तथ्य तथा मर्म की सामूहिक ध्वनि का संदेशवाहन होना चाहिए। बेशक अच्छा शीर्षक आवश्यक है परंतु इसका अर्थ कदापि नहीं लेना कि शीर्षक में सनसनी या चौंका देने का तत्त्व सम्मिलित करना आवश्यक है । शीर्षक लघुकथा की प्रकृति और रोचकता के अनुरूप ही होना चाहिए। तथ्य की गूढ़ व्यंजना करने वाले शीर्षक कल्पना और भावुकता पर आघृत होने के कारण अधिक कलात्मक और सौष्ठवपूर्ण होते हैं। साधारणत: शीर्षक रखने के लिए केंद्रीय पात्र, किसी घटना, किसी भावना या विचार को बुनियाद बनाया जाता है। यह भी देखने में आया है कि अंतिम जिज्ञासा को शीर्षक बना दिया जाता है। अंत के भाव पर आघृत शीर्षक लघुकथा की रोचकता को कम करते हैं। शीर्षक संक्षिप्त, कौतूहलजनक, अर्थगर्भी, बहुआयामी, रोचक और नवीन होना चाहिए। 

इस आधार पर राजेश कुमारी की लघुकथाओं के कुछ शीर्षक जैसे- ‘राखी’, ‘मुक्तिबोध’, ‘गुल्लक’, ‘दोपाये’, ‘बुनियाद’, ‘थप्पड़’, ‘सूखे गमले’, ‘अधखिले’, ‘मगरमच्छ’ एकदम शीर्षक सटीक चयन है। राजेश कुमारी की लघुकथाओं में प्रतिभा, प्रज्ञा और सामर्थ्यमयी अभिव्यक्ति का जो समन्वय दिखाई देता है वह सचमुच अभूतपूर्व है। मानवीय चेतना, जीवन की क्रियाशीलता, अपेक्षित संवेदना, हृदयग्राही मनोविशलेषण, आत्मिक सत्य, पारिवारिक समस्याओं के समाधान, द्वंद्वात्मक परिस्थितियों में से छुटकारा, मर्मस्थलों की पहचान, अभिव्यक्ति में काव्यात्मकता और बोधात्मक चित्रण की झांकिया उनकी लघुकथाओं में यत्र-तत्र देखी जा सकती है। उनकी लघुकथाएँ भाषा और अभिव्यक्ति में, कथावस्तु और किरदार के गठन में, संवेदना और सरोकार में ज़िंदगी के बहुत नज़दीक है। लघुकथा जगत् में उनके प्रथम लघुकथा संग्रह ‘गुल्लक’ का दिल खोलकर स्वागत होना चाहिए।




योगराज  प्रभाकर 

संपर्क : 98725 68228

Monday, 12 July, 2021

लघुकथा-टाइम्स/मई 2018/कांता रॉय (सं.)

मासिक लघुकथा टाइम्स (भोपाल) मई –२०१८ (बारह पृष्ठ)

लघुकथा शोध केंद्र भोपाल म.प्र. (वर्ष:१, अंक:१ )

समीक्षा मेरी कलम से --- मिन्नी मिश्रा

सम्पादकीय—(कान्ता रॉय)

लघुकथा को हमें आकाश–कुसुम नहीं बनाना है ---

जागरूकता के अभाव में भारत की अधिकाँश आबादी, अंधविश्वास एवं कुरीतियों से जकड़ी हुई है। रूढ़ता पर कुठाराघात करने के लिए लघुकथा औषधि के समान है। लघुकथा टाइम्स , समाचार पत्र, केवल लघुकथा हितों की साधना करना के लिए प्रतिबद्ध होकर काम करेगी |बलराम अग्रवाल अक्सर कहते हैं कि “नये प्रयोग होने चाहिए ताकि विधा विकासशील रहे। हमें क्लोन नहीं बनने देना है।”

लघुकथा में मेरे प्रयासों को संबल देने के लिए जो दो मजबूत हाथ सामने आगे बढ़कर आये थे वो, दोनों हाथ डॉ. मालती वसंत जी के थे। लघुकथा शोध-केंद्र का पहला प्रकाशन ‘परिंदे पूछते हैं’ लघुकथा विमर्श, (लेखक-अशोक भाटिया) के प्रकाशन दौरान प्रेस काम्प्लेक्स में एक दैनिक अखवार को अपनी सामने छपते देखना ... .....मन को हठात जैसे दिशा मिल गयी थी। अब लघुकथा एवं इसकी महत्ता को जनसामान्य तक पहुंचाना होगा। लघुकथा को हमें आकाश कुसुम नहीं बनाना है, बल्कि हर आंगन में उगने वाली तुलसी बनाना है जो समाज के लिए गुणकारी एवं हितकारी है।

मध्य प्रदेश की लघुकथाएं ---

१.हमारे आगे हिन्दुस्तान (सतीश दुबे )---“कुछ भी खाते हैं तो कोई नहीं देखता, पर कुछ भी पहनते हैं तो सब देखते हैं।” सड़क पर चल रहे पति-पत्नी के बीच की बातें, इस लघुकथा में बहुत कुछ कह गई।

२.उसका अट्टहास –(संतोष सुपेकर )—गीता-कुरान पर हाथ रखकर, जब शपथ ली जाती है तो सत्य को किसतरह से हमेशा अपमानित होना पड़ता है ... इस लघुकथा के माध्यम से यही बताया गया है।

३.पीली शर्ट वाला—( डॉ. रामबल्लभ आचार्य ), ४. हिस्सा (कविता वर्मा ), ५.अंतहीन सिलसिला (विक्रम सोनी), ६.पेट (पारस दासोत), ७.त्याग (अरुण अर्णव खरे ) ८. केक्टस में फूल (नयना कानिटकर), ९. समाज का प्रायश्चित्य (संजीव बर्मा सलिल )—इस कथा में स्वगोत्री प्रेम विवाह करने के चलते... नव दम्पति ने गांव वालों से डरकर गाँव छोड़ दिया। अंतर्राष्ट्रीय खेल स्पर्धा में चयनित होने के कारण, उनदोनों का उसी गाँव में भव्य स्वागत किया गया ...जहाँ कभी, वही गाँव वाले उन दम्पति के जान के दुश्मन बने थे।

यहाँ मैं, मिन्नी मिश्रा, क्षमा सहित ... लेखक से कहना चाहूंगी, सकारात्मक संदेश होने के बावजूद , कथा में स्वगोत्री (सगोत्री ) विवाह को किसी भी कीमत पर मान्य नहीं दिखाना चाहिए। स्वगोत्री विवाह वैज्ञानिक तथ्य के आधार पर ...स्वास्थ के लिए हानिकारक है।

लघुकथा के विशिष्ट परिंदे ---आ.सुनील वर्मा की उत्कृष्ट लघुकथाएं ---

१.रिटायरमेंट २. मर्दानी ३. छिलके ४.चुभन ५. चतुर्भुज ६. कोई अपना सा।

आदरणीय, “छिलके”—कई बार पढने का बाद भी... मुझे इस लघुकथा के शीर्षक का सही अर्थ समझ में नहीं आया।

लघुकथा और शास्त्रीय सवाल ---(डॉ. अशोक भाटिया )

महत्वपूर्ण बातें

वो सिद्धांत जो रचना को बेहतरी की ओर न ले जाएँ या व्यवहारिक न हो व्यर्थ होते हैं | 

लघुकथा में रचना एक हो सकती है, एक से अधिक भी और एक भी नहीं। बिम्ब रचना के सौंदर्य में वृद्धि तो करता है लेकिन कई रचनाओं में इसको लाना उसकी गतिशीलता में बाधक बन जाता है। इसलिए एक घटना और एक बिंब का सिद्धांत कोई मायने नहीं रखता। संवाद स्वंय में रचना का महत्वपूर्ण तत्व है। इससे कई बार बहुत बड़ी बात कही जा सकती है। लेकिन संवादों का होना कोई शर्त नहीं है। संवादों का प्रयोग लेखक व रचना पर निर्भर करता है। लघुकथा में काल को लेकर लेखक पर बंधन नहीं लगाना चाहिए। एक उद्देश्य के हिसाब से लेखक जहाँ जाना चाहेगा जाएगा ही।

श्रेष्ठ रचना तो वो है...जिसमे पाठक की सोच, भावना और संवेदना को सही दिशा में प्रभावित करने की क्षमता हो |

नारी संघर्ष से नारी सशक्तिकरण तक ----( उप-सम्पादक---सुनीता प्रकाश )

समकालीन लघुकथाएं—

भीतर का सच, अस्तित्व की यात्रा, रक्षक भक्षक और पिता (पूनम डोगरा ) कसौटी (सुकेश साहनी)

१.भीतर का सच (अशोक भाटिया )---“अच्छा एक बात बताओ ...अगर हमारा पहला बच्चा लड़का होता , तो भी क्या दूसरे का बारे में सोचते ? “ इस लघुकथा में पति-पत्नी के बीच का साधारण सा संवाद,... सच में दिल को छू गई।

२.अस्तित्व की यात्रा (कान्ता रॉय)---“उसे कहाँ मालुम था कि समय बीतने पर वह इन्हीं बातों के कारण स्त्री कहलाएगी।” इस लघुकथा में...स्त्री को कमजोर एवं हीन मानने के दृष्टिकोण पर कठोर प्रहार किया गया है।

लघुकथा एक विचार (उप-सम्पादक---गोकुल सोनी )

‘लघुकथा’ अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का एक श्रेष्ठ और सफल माध्यम है | इसमें सम्प्रेषणशीलता अत्यधिक तीव्र और आडम्बर-मुक्त होती है | कालान्तर में यह रोपित विचार व्यक्ति की निर्णय-क्षमता पर व्यापक प्रभाव डालता है |

लघुकथाएं विदेश से ---मंटो की लघुकथाएं ---(६)

बंटवारा, करामात, सफाई पसंद, हैवानियत, साम्यवाद, हलाल और झटका |

शशि बंसल (उप-सम्पादक)—

लघुकथा देखने में जितनी छोटी और आसान होती है, लिखने में उतनी ही गंभीरता, समर्पण, पैनापन मांगती है। व्यंग्यात्मक लघुकथा की बात करें तो लेखक की जिम्मेवारी और भी बढ़ जाती है। हास्य , जहाँ मनोरंजन प्रदान करता है, गुदगुदाता है, वहीँ व्यंग्य एक ऐसा नुकीला तीर है जो सीधे हृदय और मस्तिष्क में जाकर चुभता है।

१.अपना-पराया( हरिशंकर परसाई ) २.इंसानियत मरी नहीं (विनोद दवे ) ३. इंटरव्यू (मधुकांत) ४.स्वप्नभंग (अशोक बर्मा )---- सभी व्यंग्य लघुकथाओं पर शशि बंसल की बेबाक टिप्पणी पढने को मिली।

(डॉ. मालती बसंत )---

लघुकथा हिंदी साहित्य में वामन अवतार है। मन की वृहद संवेदनाओं के क्षणों का बृहद रूप है। यह मानव जीवन की क्षणों की व्याख्या है। इसलिए जीवन के यथार्थ का अधिक निकट है। जैसे परमाणु में ब्रह्माण्ड...पानी की एक बूंद में पूरा समुद्र समाया होता है।

पहली हिंदी लघुकथा (बलराम अग्रवाल) 

पहली लघुकथा होने की दौड़ मे बहुत-सी लघुकथाओं को सूचीबद्ध किया गया है...जिसमें--- 

अंगहीन धनी (परिहासिनी,१८७६ )भारतेंदु हरिश्र्चंद्र --का पहला स्थान है |

अद्भुत् संवाद ( परिहासिनी,१८७६ )भारतेंदु हरिश्र्चंद्र --का दूसरा स्थान है |

वस्तुतः ये दोनों ही रचनाएं भारतेंदु की प्रतिभा और देश-काल सापेक्ष जीवन-दृष्टी की गहराई को प्रस्तुत करती हैं| जहाँ ‘अंगहीन धनी’ गंभीर कथा है...वहीं ‘अद्भुत् संवाद’ में मखरेपन है |

जया आर्या (उप-सम्पादक)----लघुकथा पढने वालों के लिए नशा है, लिखने वालों के लिए कर्तव्य बोध। लघुकथा हठात जन्म लेती,अक्सात जन्म लेती है।

आर्यावर्त से --------

लघुकथाएं--- 

संवाद (आभा सिंह), मुक्ति मार्ग (अशोक जैन), तब क्या होगा ? (अशोक शर्मा ‘भारती), अपना-अपना नशा (सुभाष नीरव), बिरादरी का दुख (कुमार नरेंद्र), फटी चुन्नी (सत्या शर्मा कीर्ति मिठाई (डॉ.नीना छिब्बर), घरोंदा (शोभना श्याम), अनावरण (डॉ.उपमा शर्मा), इतनी दूर (डॉ.कमल चोपड़ा), अभावों के रंग (अशोक मनवानी), हिस्से का दूध (मधुदीप), नशे (कमलेश भारतीय ) गिद्ध (श्याम सुंदर अग्रवाल), कीमती पल (प्रेरणा गुप्ता), हवा के विरुद्ध (डॉ. शील कौशिक ), मूल्यांकन (डॉ.सूर्यकांत नागर ), पाप और प्रयाश्चित (बलराम) अप्रत्याशित (डॉ. शकुन्तला किरण), जगमगाहट (डॉ.रूप देवगुण ), ऊंचाई (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, वैशाखियों के पैर (भगीरथ), विश्वास (युगेश शर्मा), अल्टीमेट गोल (चित्रा राणा राघव), देश बिकाऊ है (डॉ. मोहन आनन्द तिवारी), शनिदेव की माँ (डॉ.वर्षा ढोबले), नजरिया (ओम प्रकाश क्षत्रिय प्रकाश), हार-जीत(कपिल शास्त्री), मदर’स डे(अरुण कुमार गुप्ता) , समझ पाने की समझ (चंद्रा सायता), कथनी और करनी (ज्योति शर्मा), फिर आएगा नया साल (पूर्णिमा वर्मन), स्मार्ट (डॉ.कुमकुम गुप्ता )

१.मुक्ति मार्ग (अशोक जैन )---दीपक की लौ के साथ अंधकार की लड़ाई चल रही है... पतिंगे उस लौ के प्रति आकर्षित हो रहा है | आखिरकार , हवा.. पतिंगे को जलने से बचाने में सफल हो जाता है | सरल भाव से लिखी गई बेहद सुंदर लघुकथा है |

२.तब क्या होगा ? (अशोक शर्मा ‘भारती’ ) – जब किसी के बेटी का अपहरण होता है...मोहल्ले वाले सब कुछ देखते हुए भी खामोश रह जाते हैं | समसामयिक घटना पर लिखी गई ... संवेदनशील , बेहद प्रभावशाली लघुकथा है |

लट उलझी सुलझा जा ---(बंधु कुशावर्ती )

“मैं अपना मत समझा दूँ कि लघुकथा का हमारे भारतीय वाकम्यसे नाभि-नाल का सम्बन्ध है। मेरे इस कथन कायह मतलब नहीं कि हिंदी लघुकथा की जड़ों और उत्स को वेदों और पुरानों में ही खोजने का मैं समर्थक हूँ। हाँ, यह भी एक स्रोत है।”

डॉ. सूर्यकांत नागर–लघुकथा में लोक मांगलिक चेतना होना जरूरी है। लघुकथा को किसी नियमावली में नहीं बांधा जा सकता। शिल्प के स्तर पर निरंतर प्रयोग हो रहे हैं, और प्रयोग से ही प्रगति होती है।

मैं नागर जी की इनबातों से बेहद प्रभावित हूँ।

पंजाब का लघुकथा संसार ----(श्याम सुंदर अग्रवाल )

लघुकथा को हिंदी पंजाबी में “मिन्नी कहाणी” के रूप से जाना जाता है | पंजाबी लघुकथा के उन्नयन के लिए वर्ष १९८८ में एक मंच का गठन हुआ | त्रैमासिक पत्रिका “मिन्नी” का प्रकाशन भी इसी वर्ष हुआ है | पत्रिका मिन्नी की और से हर वर्ष “अंतर्राष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन “ का आयोजन किया जाता है | अबतक ऐसे २६ लघुकथा सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं |

लघुकथा और सांझा संकलनों की महत्ता ----(डॉ.उपमा शर्मा )

आने वाला समय निश्चित ही लघुकथा का होगा | ‘दृष्टी’ अर्धवार्षिक लघुकथा पत्रिका में शकुन्तला किरण का साक्षात्कार ---“बहुत उज्ज्वल ! आज लघुकथा को लेकर जगह-जगह प्रतियोगिता हो रही है | ..........भले ही वो किसी धुन में हो रही हो, हलचल तो हो रही है |

पुस्तकों की बातें ---

‘दृष्टि’ (महिला लघुकथाकार अंक ) -–सम्पादक, आ.अशोक जैन ,अतिथि सम्पादक- आ. कान्ता रॉय।

आ. पवन जैन सर-- की समीक्षा पढ़कर, मैं बेहद प्रभावित हुई, सादर आभार | उन्होंने सभी रचनाकारों की कथा पर टिपण्णी करके उनका मनोबल बढ़ाया है, जो काबिलेतारीफ है तथा रचनाकारों के प्रति उनकी उदारता का परिचय भी |

इस पत्रिका में आ. बलराम अग्रवाल जी ने ८८ सन्दर्भ पुस्तकों, संकलनों एवं पत्रिकाओं से खोज ५८९ महिला कथाकारों की सूचि बनाने का श्रम साध्य कार्य किया है |यह शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज़ हो गया है |

आ. डॉ. अशोक भाटिया जी ने ‘हिंदी में लेखिकाओं का लघुकथा संसार’ में १४६ विभिन्न महिला लघुकथाकारों की रचनाओं से परिचित कराया है , जो अपने आप में एक विशद कार्य है। महिला की रचना धर्मिता को देख कर अंततः उन्होंने कहा कि, इक्कीसवीं सदी में महिला लेखन की जोरदार दस्तक एक बड़ी घटना है , जो भविष्य की लघुकथा पर निश्चय ही बड़ा प्रभाव छोड़ेगी।”

लघुकथा के आयाम---(मुकेश शर्मा) लघुकथा साहित्य के लिए बहुत जरूरी किताब 

“मनुष्य अब युगों का सुख क्षणों में पा लेना चाहता है, इसलिए लघुकथा भी समय की मांग है। अतः साहित्य में इसका स्थान स्थायी रूप से रहेगा।”(विष्णु प्रभाकर)

“लघुकथा मानव की संवेदना, उसकी दिकभ्रमिता, उसके टूटन बिखराव आदि को प्रस्तुत करने की सूक्ष्म से सूक्ष्मतर यथार्थवादी कला है।” (पद्मश्री दादा रामनारायण उपाध्याय)

महिमा वर्मा (उप-सम्पादक)---मन को झकझोरती इस नन्हीं-सी विधा को भले ही आज इतनी प्रसिद्धि मिली हो, पर छोटी कथा के रूप में लघुकथा नें भी प्रारम्भ से ही अपना स्वरूप कर लिया था।

धरोहर 

१.एक टोकरी-भर मिटटी (माधवराव सप्रे)--गरीब विधवा और जमींदार के ऊपर लिखी गई बेहद संवेदनशील, लंबी लघुकथा है।

२.बंद दरवाजा (प्रेमचंद)---छोटे बच्चे के मनोभाव को सहजता से दर्शाती अनुपम रचना है। प्रेमचंद हमारे हिंदी साहित्य के अद्भुत सितारे क्यों माने जाते हैं...सच में उनकी रचना को पढने के बाद ही पता चलता है।

३.आम आदमी ( शंकर पुणताम्बेकर ) नेता अपने भाषण के द्वारा आम आदमी को किसतरह से प्रभावित कर लेता है , इस लघुकथा में यही दर्शाया गया है।

४.उंचाई (खलील जिब्रान )---मात्र चार पंक्तियों की बेहद प्रभावशाली लघुकथा है।

इस लघुकथा टाइम्स में प्रकाशित सभी लघुकथाओं को पढकर, मैंने बहुत कुछ सीखा और समझा... उसके लिए सभी रचनाकारों का दिल से आभार। सभी नवोदित लघुकथाकारों को यह लघुकथा समाचार पत्र जरुर पढ़ना चाहिए। खासकर... लघुकथा के लिए समर्पित, आ. कांता रॉय जी ... के अथक परिश्रम व लगन के प्रति मैं तहेदिल से आभार व्यक्त करती हूँ। अभिनंदन और साधुवाद।


समीक्षक : मिन्नी मिश्रा 
+91 79709 31940
 


Monday, 5 July, 2021

लघुकथा में समालोचना का भविष्य-2/ रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु'

दिनांक 04-7-2021 के बाद दूसरी, समापन कड़ी

अच्छा लेखन या संकलनों का प्रकाशन कौन महत्त्वपूर्ण है? रमेश बतरा का कोई लघुकथा-संग्रह नहीं छपा; लेकिन उनके रचनाकर्म का वैविध्य उन्हें हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकारों की श्रेणी में रखता है। दूसरी ओर सुभाष नीरव ने उत्कृष्ट लघुकथाएँ लिखने के साथ-साथ पंजाबी की लघुकथाओं का हिन्दी अनुवाद भी प्रस्तुत किया। इन्होंने ‘प्रयास’ नाम की साइक्लोस्टाइल पत्रिका सन 1980 के आसपास प्रारम्भ की थी। एक लम्बे अर्से के बाद इस वर्ष 2012 में इनका संकलन आया है। इनकी लघुकथाएँ अपने उल्लेखनीय कथ्य, आम आदमी की ज़िन्दगी के सरोकार को बड़ी शिद्दत से पेश करती हैं। इनको केवल अनुवादक तक सीमित करना अनुचित ही कहा जाएगा ।

जिनकी लघुकथा के तात्त्विक विवेचन पर गहरी पकड़ है , वे भी जान-बूझकर अपने समकालीन लेखकों का उल्लेख करने से बचते हैं। वे अपने आलेख की शुरुआत विष्णु नागर या असगर वज़ाहत से करेंगे। शायद समकालीन अन्य लेखकों से बचने का इससे बेहतर कोई संकटापन्न मार्ग नज़र न आता हो। 'नई दुनिया' का सम्पादन करते समय लघुकथाएँ दी गईं, पर ‘लघुकथा’ शब्द से परहेज़ किया गया। यही नहीं, विष्णु प्रभाकर जैसे रचनाकार की लघुकथा से उनका नाम भी हटा दिया गया । फोन पर जब इसका कारण पूछा तो सम्पादक महोदय ने इसे अखबार का नीतिगत मामला बताया। किसी ज़माने में स्तरीय लघुकथा छापने वाला 'हिन्दुस्तान' आज लघुकथा के नाम पर कुछ भी छाप देता है। इण्टरनेट ने तो और भी सुविधा जुटा दी है । 'गद्यकोश' से किसी भी लेखक की लघुकथा उठाओ और छाप दो। न सम्पादन का झमेला, न टाइप कराना, न प्रति भेजना न मानदेय देना। कलकत्ता के 'सन्मार्ग' में लघुकथा के कालम को देखने वाले सज्जन यही काम कर रहे हैं। कभी-कभी तो 'हंस' जैसे मासिक में भी ऐसी रचना लघुकथा के नाम पर छप जाती है, जो कहीं से भी, लघुकथा छोड़िए, चुटकुला भी नहीं होती है ।

आज कमलेश्वर और रमेश बतरा जैसे सम्पादक नहीं हैं ; जिनके चयन और सम्पादन का लेखक लोहा मानते थे । आज कमज़ोर सम्पादकों के चलते अपनी किसी अखबार में छपी रचना को लेकर गलतफ़हमी पालने वाले बहुत से लेखक घटना -लेखन को ही लघुकथा-लेखन समझकर कुछ भी लिखे जा रहे हैं। कुछ तो दो वाक्य लिखकर और उसे सबसे छोटी लघुकथा समझकर खुद ही अपनी पीठ ठोंक रहे हैं, जबकि लघुकथा लेखन सन्तुलित दृष्टि, संयमित भाषा और गम्भीर चिन्तन के बिना सम्भव नहीं है। लघुकथा डॉट कॉम के ‘मेरी पसन्द’ कॉलम के माध्यम से यह प्रयास किया गया था कि लेखक, समीक्षक या प्रबुद्ध पाठक अपनी पसन्द की दो लघुकथाओं की तात्त्विक विवेचना प्रस्तुत करें। कुछ लेखक ऐसे भी सामने आए जो अपने समकालीन लेखकों को न तो पढ़ते हैं और न समझते हैं और न दो वाक्य से ज़्यादा लिखने की स्थिति में खुद को पाते हैं । कुछ विगत चार साल से आग्रह करने पर भी दो पंक्तियाँ लिखने में असमर्थ हैं । कुछ अपने साथ उठने-बैठने वाले को छोड़कर किसी अच्छे लेखक की अच्छी रचना पर नहीं लिखना चाहते। यह लघुकथा के लिए शुभ नहीं है। आज इस दिशा में गम्भीरता से सोचना होगा कि लघुकथा में समालोचना का भविष्य कैसे सँवारा जाए। लघुकथा सम्मेलनों में जो सार्थक चर्चा हो, उसका प्रकाशन ज़रूर किया जाए। पटना के सम्मेलन में प्रो निशान्तकेतु और प्रो रवीन्द्रनाथ ओझा की चर्चाएँ, महत्त्वपूर्ण हुआ करती थीं। उन चर्चाओं का (उनके पठित आलेख के अतिरिक्त) आज अभिलेख उपलब्ध नहीं है। इस दिशा में पंजाब के सम्मेलनों में डॉ अनूपसिंह की चर्चाएँ भी उपयोगी रहीं। इनके कुछ विचार प्रकाशित रूप में उपलब्ध हैं। 'मिन्नी' त्रैमासिक की चर्चाएँ और लघुकथा विषयक चिन्तन आज भी महत्त्वपूर्ण है। आज आवश्यकता है स्वस्थ दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की। अगर हमारे लेखक खुद ही आगे बढ़ना चाहते हैं, तो आने वाली पीढ़ी को कौन प्रोत्साहित करेगा? संकीर्ण विचारधारा के चलते समकालीन लेखकों के रचनाकर्म को अगर हम स्वीकार नहीं करेंगे तो, ऐसा करने से वे लेखक महत्त्वहीन नहीं हो जाएँगे, बल्कि हम ही सिरे से गायब हो जाएँगे ।आने वाला समय किसी का सही मूल्यांकन सही रचना के द्वारा ही करेगा । अत: आज की आवश्यकता है ,अच्छे रचनाकारों को पाठकों तक पहुँचाना । -0-

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

जन्म : 19 मार्च 1949, हरिपुर, जिला-सहारनपुर शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी), बी. एड्.

प्रकाशित रचनाएँ: माटी, पानी और हवा (प्रौढ़ शिक्षा विभाग उ.प्र. द्वारा प्रकाशित) अँजुरी भर आसीस, कुकहूँ कूँ. हुआ सवेरा, मैं घर लौटा, तुम सर्दी की धूप, बनजारा मन (कविता संग्रह) मेरे सात जनम, माटी की नाव, बन्द कर लो द्वार (हाइकु संग्रह) तीसरा पहर (ताँका-सेदोका- चोका संग्रह), मिले किनारे (ताँका और चोका संग्रह संयुक्त रूप से डॉ. हरदीप सन्धु के साथ), झरे हरसिंगार (ताँका संग्रह), धरती के आँसू, (उपन्यास), दीपा, दूसरा सवेरा (लघु उपन्यास) असभ्य नगर (लघुकथा-संग्रह-दो संस्करण). खूँटी पर टंगी आत्मा (व्यंग्य संग्रह 3 संस्करण), बाल भाषा व्याकरण, नूतन भाषा-चन्द्रिका, (व्याकरण) लघुकथा का वर्तमान परिदृश्य (लघुकथा समालोचना), सह-अनुभूति एवं काव्य शिल्प काव्य समालोचना) हाइकु आदि काव्य-धारा (जापानी काव्यविधाओं को समालोचना), फुलिया और मुनिया (बालकथा हिन्दी और अंग्रेजी), राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा प्रकाशित हरियाली और पानी (बालकथा) का 'हो', 'असुरी', उड़िया, पंजाबी और गुजराती में अनुवाद, झरना, सोनमरिया, कुआँ (पोस्टर बाल कविताएँ), रोचक बाल कथाएँ।

सम्पादन : 37 पुस्तकें, विभिन्न पत्रिकाओं के 14 विशेषांकों का संपादन, अनूदित 2 पुस्तकें।

ई-मेल: rdkamboj@gmail.com



Sunday, 4 July, 2021

लघुकथा में समालोचना का भविष्य-1/रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु'

दो कड़ियों में समाप्य लेख की पहली कड़ी

साहित्य की सारी विधाएँ, सभी साहित्यकार निष्पक्ष चिन्तन और तटस्थ मूल्यांकन से ही परखे जा सकते हैं । जिस साहित्य में पक्षपात और संकीर्ण चिन्तन से ग्रस्त होकर साहित्यकार या कृति का मूल्यांकन किया जाएगा, उसका नुकसान सभी को उठाना पड़ा। सैंकड़ों वर्षों से जिस शोशेबाजी की शुरुआत हुई थी, वह कमोबेश आज तक सभी विधाओं में जारी है । किसी ने मूल्यांकन किया यह कहकर--

सूर सूर, तुलसी शशि , उड़गन केशव दास ।

अबके कवि खद्योत सम, जहँ- तहँ करत प्रकास ॥

कुछ इनसे भी आगे निकले कि सूरदास सूर्य कैसे हो सकते हैं; सो बात पलट दी गई--

सूर शशि, तुलसी रवि, उड़गन केशव दास ।

इतना फ़तवा जारी हो गया तो अब अक़्ल से कुछ सोचने के लिए कुछ नहीं बचा । इस हल्लेबाजी में कबीर खो गए। रामचन्द्र शुक्ल ने सूर और तुलसी को आगे बढ़ाया तो खरी-खरी कहने वाले कबीर में मन नहीं रमा । डॉ हज़ारी प्रसाद जी ने कबीर को परखा तो डॉ रामविलास शर्मा जी ने निराला के काव्य की गहनता समझाई। निराला को जीवित रहते हुए उपेक्षा ही सहनी पड़ी थी ।

एक बात सभी विधाओं पर लागू होती है कि यदि समकालीन लेखक मूल्यांकन करें तो किसी भी रचनाकार का जो मूल्यांकन होगा , वह ज़्यादा वस्तुनिष्ठ होगा। प्रश्न है--मूल्यांकन करने वाले की नीयत क्या है ? उसका स्वभाव क्या है ;क्योंकि वह भी आदमी ही है -वैर विरोध से ग्रस्त या आँख मूँदकर केवल वाह ! वाह ! करने वाला । अन्य विधाओं में स्वतन्त्र समीक्षक है पर लघुकथा में स्वतन्त्र समीक्षकों का अभाव रहा है । इसके कई कारण हैं--

1-लघुकथा को महत्त्वहीन समझकर कुछ समीक्षक दूर रहे, तो कुछ को बाहरी कहकर लघुकथा से खदेड़ने का काम किया गया, जिससे अच्छे समीक्षकों ने किनारा किया। कुछ ने लघु कहानी आदि नाम देकर शिगूफ़ा छोड़ा ताकि लेखक और समीक्षक इसी में उलझे रहें। 

2-यदि किसी समीक्षक ने सही बात कही तो उसको असहिष्णु लेखकों का विरोध भी झेलना पड़ा। तब कुछ लघुकथा लेखक ही समीक्षा के क्षेत्र में आगे आए ।कुछ की अपनी सीमाएँ थीं। कुछ के अपने चश्मे थे और मोतियाबिन्द आँखें। उन्हें बहुत दूर का नहीं सूझता था। कुछ चिन्तन की रतौन्धी से ग्रस्त थे ।वे अपने शहर, पड़ोस या घर से बाहर निकलना अपमान समझते रहे। इस संकीर्ण क्षेत्रीयता के कारण उनकी संकीर्ण दृष्टि उनके लेखन पर हावी रही। ‘अन्धा बाँटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को दे’ वाली कहावत यहाँ चरितार्थ होती है । जिन लेखकों के पास कुछ स्पष्ट चिन्तन था और वे अच्छा काम कर सकते थे ,उनकी समस्या थी किसी को अपने से बड़ा या अच्छा लेखक न समझना। भला वे अपने समकालीन के बारे में क्यों लिखें, उसे सिर पर क्यों चढ़ाएँ, उसका महत्त्व क्यों बढ़ाएँ ? ये लेखक इस बात के लिए ज़रूर लालायित रहते थे कि तू मुझ पर लिख ,मैं उस पर लिखूँगा और वह तुम पर लिखेगा ।जीवन चक्र की तरह यह योजना सीधे तौर पर कुछ लेखकों को बाहर का रास्ता दिखाने की ही योजना ज़्यादा नज़र आई; क्योंकि वह नामक लेखक से अपने लिए लिखवाना है ,उस पर लिखकर उसका दिमाग़ खराब नहीं करना ।इस तरह की तिकड़में कभी स्वस्थ मूल्यांकन का आधार नहीं बन सकती। 3- बरेली के 1989 के लघुकथा सम्मेलन में ,मिन्नी द्वारा विभिन्न शहरों में आयोजित 19 सम्मेलनों में हिन्दी और पंजाबी की पढ़ी गई लघुकथाओं पर और अखिल भारतीय प्रगतिशील लघुकथा मंच के विगत 24 सम्मेलनों में हिन्दी की पढ़ी गई लघुकथाओं पर एवं लघुकथा के विभिन्न पक्षों पर पढ़े गए आलेखों और उनके विभिन्न पक्षों पर पर्याप्त चर्चा हुई है । अन्य शहरों में भी बहुत से सम्मेलन हुए हैं। बरेली सम्मेलन के अतिरिक्त किसी भी आयोजन की बहुत सारी सार्थक चर्चा प्रकाशित रूप में सामने नहीं आ सकी। इसका लाभ आने वाली पीढ़ी को दस्तावेज़ के रूप में नहीं मिल सकेगा। बहुत से ऐसे लेखक हैं ,जो इन दोनों सम्मेलनों में भागीदार रहे; लेकिन जब लिखने की बारी आती है तो वे मिन्नी द्वारा किए गए हिन्दी-पंजाबी के ऐतिहासिक कार्यों का उल्लेख तक नहीं करते। यहाँ तक कि दोनों भाषाओं में समान अधिकार से लिखने वालों के नाम का ज़िक्र करने में में भी अपनी तौहीन समझते हैं, जिन लेखकों ने बिना किसी पक्षपात के हिन्दी ही नहीं विश्व भर के लेखकों को पंजाबी पाठकों तक और पंजाबी लेखकों को हिन्दी पाठकों तक पहुँचाने का काम पिछले 24 वर्षों से जारी रखा है । इन सम्मेलनों में जाने वाले कुछ ऐसे भी लेखक हैं, जिन्हें लघुकथा की चिन्ता नहीं है ।चिन्ता है सिर्फ़ इस बात की कि सम्मेलन में उनकी भूमिका क्या है ? यदि सम्मान मिल रहा है, अध्यक्ष बनाया जा रहा है या मुख्य वक्ता के बतौर आमन्त्रित किया गया है तो ज़रूर जाएँगे, सिर के बल चलकर जाएँगे ;अन्यथा नहीं। ये लेखक भूलकर भी इन सम्मेलनों की रचनात्मक भूमिका पर कुछ नहीं लिखेंगे। दूरदर्शन और आकाशवाणी पर चर्चा के लिए बहुत पहले कुछ हिन्दी लेखक अपना नकारात्मक रवैया दिखा चुके हैं। इसके लिए हिन्दी के ही नहीं वरन् कुछ पंजाबी के लेखक भी हैं, जो विगत 24 वर्षों से प्रकाशित मिन्नी का या इन सम्मेलनों का दूरदर्शन पर दिए गए अपने साक्षात्कार में जिक्र करना भी उचित नहीं समझते । इन्हें यह डर सताता होगा कि कहीं हमारा महत्त्व न घट जाए । 'आजकल' और 'हरिगन्धा' मासिक के लघुकथा विशेषांक के समय भी इसी प्रकार की खींचतान हुई ।

जानबूझकर कूपमण्डूक बनने की यह प्रवृत्ति न किसी खुली सोच का उदाहरण है और न विधा के लिए हितकर है। लघुकथा: बहस के चौराहे पर, हरियाणा का लघुकथा -संसार ,विभिन्न लेखकों की लघुकथा विषयक पुस्तकों में तथा बहुत से लेखकों ने अपने संग्रहों और सम्पादित संकलनों में भूमिका के माध्यम से लघुकथा को व्याख्यायित किया है । सुकेश साहनी ने सम्पादित संग्रहों-स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की लघुकथाएँ, महानगर की लघुकथाएँ, देह-व्यापार की लघुकथाएँ में अपनी विस्तृत भूमिकाओं में लघुकथाओं की शक्ति और वैविध्य अहसास कराया है, तो अपने संग्रहों में लघुकथा की रचना-प्रक्रिया आदि पर सार्थक विचार प्रकट किए हैं। कथादेश के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर लघुकथा की आयोजित प्रतियोगिताओं में पुरस्कार देकर भी इस विधा को आगे बढ़ा रहे हैं । लघुकथा के उन्नयन के लिए वर्ष 2000 में लघुकथा डॉट कॉम वेबसाइट शुरू की गई थी। इस पर दी गई सामग्री में से-बाल मनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ, मानव-मूल्यों की लघुकथाएँ और ‘लघुकथा : मेरी पसन्द’ तीन संकलन आ चुके हैं ।

                                            आगे जारी है..........

Thursday, 1 July, 2021

शरद आलोक की लघुकथाएँ/बलराम अग्रवाल

कबीर का दर्शन है कि मनुष्य का शरीर, 'पानी केरा बुदबुदा' यानी पानी के बुलबुले की तरह  क्षणभंगुर है। लेकिन बुलबुले का स्वयं की उत्पत्ति का दर्शन कबीर के दर्शन से भिन्न क्षणभर में मिट जाने वाला नहीं है। बुलबुले का जन्म पानी के भीतर की अशान्ति से होता है। अधिक समय तक जीवित रहने के लिए वह जन्मता ही नहीं है। वह तो मात्र इतना बताने के लिए जन्मता है कि पानी की सतह के नीचे घोर हलचल है। बुलबुले को पकड़ा नहीं जा सकता लेकिन उसे देखकर पानी के नीचे की हलचल को, उसके कारण को पकड़ा जा सकता है। समकालीन लघुकथाएँ भी पानी के नीचे की हलचल को पहचानने और पकड़ने का प्रयास हुआ करती हैं। उनके कथानक के, शिल्प,  शैली और  शब्द-चातुर्य के आकर्षण में बँधकर रह जाना बुलबुले के सौंदर्य-आकर्षण में बँधकर रह जाने के समान क्षणभर का सुख देने वाला हो सकता है, गहन सुख तो कथ्य की गहराई में, तलहटी तक ही जाने पर मिलता है। इस परिप्रेक्ष्य में आइए, शरद आलोक जी की कुछ लघुकथाओं पर विचार करते हैं। शरद जी गत अनेक वर्षों से साधनारत  साहित्यकार हैं। उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन किया है। समाज की गतिविधियों पर उनकी कथा-दृष्टि का पैनापन उनकी लघुकथाओं में भी उभरकर आया है। उनकी ‘इंटरव्यू’ शीर्षक लघुकथा समाज में सामान्यत: व्याप्त आस्था की कथा बयान करती है जिसे धर्मभीरुता भी कहा जा सकता है। इसके माध्यम से यह संदेश देने का अच्छा प्रयास है कि धर्मभीरुता मनुष्य की सफलता के मार्ग की सबसे बड़ी रुकावट है। अंत में रोहन का अपने आप पर गुस्सा उतारना उसका अपनी धर्मभीरुता पर ही क्षोभ प्रकट करना है।

लघुकथा ‘लोकलाज’ की अम्मा भी समाज के उसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, जो शैक्षिक रूप से पिछड़ा हुआ और मानसिक रूप से अत्यंत कमजोर है। अम्मा का बेटी से यह कहना कि—‘हम गरीबी से तो एक बार फिर लड़ सकते हैं परन्तु धार्मिक लोकलाज के दिखावे को नजरअंदाज नहीं कर सकते।’ इस तथ्य का द्योतक है कि  हमारी अधिसंख्य आबादी आज भी धर्म का आडम्बर देखने-करने वाली, उसके व्यापार में संलिप्त है। इस लघुकथा में बेटी आधुनिक, प्रगतिशील विचारों की प्रतिनिधि है जो अम्मा जैसी सुप्त और पिछड़ी मानसिकता को जगाने का लगातार प्रयास करती है।

‘दोहरा दान’ को पढ़कर मुझे एक लोककथा याद हो आयी। सारी की सारी लोककथाएँ रोचक और जीवनदायिनी हैं, यह कहने में मुझे लेशमात्र भी संकोच नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि समय की आँच में तपकर रोचक और जीवनदायिनी लोककथाएँ ही जीवित बची हैं, शेष सब राख हो गयीं। नि:संदेह, आज की लघुकथाओं के साथ भी समय की आँच यही बर्ताव करने वाली है। बहरहाल, उक्त लोककथा क्योंकि ‘दोहरा दान’ के रहस्य को उजागर करती एक संगत रचना है, इसलिए उसे उद्धृत करना भी समीचीन ही है। हुआ यों कि निरीह-सा एक मंगता सड़क पर भीख माँगता घूम रहा था। संयोगवश उसी समय आकाश-मार्ग से शिव-पार्वती उसके ऊपर से गुजर रहे थे। उसकी दीनता से द्रवित होकर पार्वती शंकर से बोलीं—“आप तो भोले भंडारी हैं। इस गरीब को भी कुछ दे दो।” शिव ने कहा—“इसके भाग्य में ब्रह्मा ने सम्पत्ति की रेखा नहीं बनायी है। मैं दूँगा, तब भी इसे नहीं मिल पायेगी।” पार्वती ने कहा—“आप दें तो सही। देखते हैं।” पार्वती की बात मानकर भगवान शंकर ने सोने के सिक्कों से भरी एक थैली उस रास्ते पर डाल दी, जिस पर वह भिखारी आगे बढ़ रहा था। चलते-चलते एकाएक उसके मन में विचार आया—‘दुर्भाग्य से, अगर मैं अंधा हो गया, तब कैसे भीख माँगूँगा!’ बस, यह विचार मन में आते ही, उसने आँखें बंद कीं और अंधे का अभिनय करते हुए भीख माँगने लगा। अंधेपन के इस अभिनय में वह शिवजी द्वारा सड़क पर डाली थैली को लाँघकर आगे बढ़ गया। भोले बाबा ने मुस्कुराते हुए माँ पार्वती से कहा—“देखा?” पार्वती ने कहा—“देखा भी और समझा भी।”

यह लोककथा इतनी ही है, जिज्ञासा का तन्तु पाठक-मन में छोड़ती हुई कि भोले बाबा द्वारा सड़क पर डाली गयी सोने के सिक्कों से भरी उस थैली का क्या हुआ!। कोई कथाकार चाहें तो इसका विस्तार करते हुए बता सकते हैं कि क्या हुआ। शुक्ल जी ने अपने ढंग से बताया भी है।

‘गाय के वास्ते’ का केन्द्रीय कथ्य यह है कि—‘आदमी भावना का पुतला होता है और आसानी से किसी के कहने-सुनने से भावना में बह जाता है।’ जो पाठक कथा के इस केन्द्रीय कथ्य को नहीं पकड़ेंगे, वे कथा के मूल उद्देश्य को भी बामुश्किल ही पकड़ पायेंगे। दया-भाव छोड़कर मनुष्य आखिरकार एक नये व्यवसाय से जुड़ जाता है, यह इन्सानी फितरत है । इसी ओर संकेत करते हुए शुक्ल जी ने लिखा है—‘मैने गोहार लगाना बंद नहीं किया था। मेरे साथ सब्जी वाला भी गोहार लगा रहा था, “गाय के वास्ते।” कल्पना कीजिए कि बाजार में खड़े दो लोग एक ही गोहार 'गाय के वास्ते' लगा रहे हैं लेकिन दोनों की मानसिकता और मन्तव्य भिन्न हैं। यहाँ सब्जी वाले की गोहार में गाय के प्रति श्रद्धा-भाव है जबकि कथा-पात्र ‘मैं’ की गोहार श्रद्धा-भाव से इतर कहीं और इशारा कर रही है।

‘आम आदमी’ एक उत्कृष्ट कथ्य है, लेकिन इसकी कसावट में कमी है। इस कमी को इस दृष्टि से कि लेखक दशकों से सुदूर विदेश में रहकर भी हिन्दी साहित्य की सेवा में जुटा है, कुछ हद तक नजरअंदाज किया जाना चाहिए; हालाँकि नजरअंदाज करने का यह कोई तार्किक और  मजबूत आधार सिद्ध नहीं होता है। बहरहाल, कथ्य की उत्कृष्टता पर बात करते हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि अपनी अथवा अपने क्षेत्र की किसी समस्या से पीड़ित आम आदमी अपने क्षेत्र के एम एल ए, एम पी आदि के पास जाकर बड़ी आशा से  गुहार लगाता है। बदले में विधायक और सांसद यहाँ तक कि उनके चपरासी द्वारा बदस्तूर अपनी अवहेलना, अपना अपमान झेलता है। कथा के माध्यम से कथाकार कहता है कि भावी स्थिति यह होगी कि आम आदमी उनकी ओर से पीठ फेर चुका होगा। न तो वह मुड़कर पीछे ही देखेगा और न कभी उनके हाथ ही आयेगा।

‘रौब’ को बहुत-सी गम्भीर स्थितियों के योग से आगे बढ़ने वाली हास्य और व्यंग्य कथा कहा जा सकता है। इसका केन्द्रीय भाव ‘लोकलाज’ से भी कहीं न कहीं मिलता है।

‘अंतिम समिधा’  समर्पित लेखन की नियति पर केन्द्रित है। लेखक उम्रभर जिस रचना-कर्म से जुड़ा रहता है, अंत में स्वयं उसकी संतान ही उसको समझ नहीं पाती, हताश हो उठती है। उसका रचना-कर्म चिता की अग्नि के हवाले कर दिया जाता है। साहित्य के पुरातन इतिहास में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब क्षुब्ध रचनाकार ने स्वयं ही अपने समूचे रचना-कर्म की हत्या कर डाली थी और विद्वान रचनाकार के रूप में वे अपने उक्त रचना-कर्म की हत्या के बाद ही पहचाने गये। शरद आलोक ने अपनी लघुकथा ‘अंतिम समिधा’ का कथानक विशुद्ध रूप से आज के समय से उठाया है और हल्की-सी शैल्पिक लापरवाही के बावजूद उसका प्रस्तुतिकरण प्रभावित करता है। 

इन कुछेक लघुकथाओं के आकलन से रचनाकार शरद आलोक की सकारात्मक और प्रगतिशील कथा-दृष्टि का परिचय मिलता है। उनकी लघुकथाओं में विषय वैविध्य तो है ही, शिल्प और शैली में भी मौलिकता है। किसी साहित्यकार ने अगर स्वयं अपने भी शिल्प और शैली को बार-बार नहीं अपनाया है तो इसे उसकी लेखकीय सजगता ही माना जाना चाहिए। इसके लिए भी शरद आलोक जी को बधाई।

प्रस्तुत है उनकी एक लघुकथा 'गाय के वास्ते :

सड़क के एक ओर मंदिर है और दूसरी ओर मस्जिद है।  सड़क के एक किनारे सब्जी की दूकान है और वहां लोग जमा हो रहे हैं. चारो तरह हाहाकार मचा हुआ है. भीड़ अनवरत बढ़ती जा रही है. लोग आश्चर्यचकित  हैं कि आखिर क्या हो गया है. सभी जानना चाहते हैं भीड़ क्यों लग रही है. आने-जाने वाले आपस में संवाद करने की जगह खुद अपनी आँखों से देखना चाहते हैं कि आखिर क्या हुआ है. ताजा समाचार जानने की होड़ में सभी खोजी पत्रकार बनने के चक्कर में  हैं. 

फुटपाथ पर सब्जी की दूकान के अलावा मंदिर और मस्जिद की तरफ भी लोग अलग-अलग समूह में जमा हो रहे हैं, बिना यह जाने हुए कि आखिर क्या बात है? सड़क पर हमेशा एक साथ चलने वाले लोग मंदिर और मस्जिद के नाम पर दो ओर  भी जमा हो रहे हैं,  जैसे पतंगबाजी के दो समूह। पर ये पतंगबाजी वाले नहीं वरन आस्थावान लोग हैं.  आज असल से ज्यादा दिखावे का जमाना है भले ही ढोल में पोल हो, बस ढोल बजना चाहिये। 

मैंने सोचा मैं ही क्यों दूर रहूँ भीड़ से और जानूँ कि आखिर माजरा क्या है?

मैंने पास जाकर देखा तो एक बहुत दुबली-पतली गाय सब्जी की दूकान के आगे अधमरी हालत में पड़ी है. लोगों ने सब्जी वाले को पकड़ रखा है. 

'तुमने गाय की जान ले ली.' एक व्यक्ति ने कहा.

'साहब मैंने जान नहीं ली. गाय मेरी सब्जी पर जैसे ही टूट पड़ी तो मैंने उसे डंडे से भगाना चाहा और डंडे को सड़क पर जोर-जोर से पटका तो वह गाय घूम कर भागना चाहती थी और मुड़ते ही जमीन पर वह गिर पढ़ी.'

'तुम्हें गोहत्या का पाप चढ़ेगा, जानते हो', एक ने कहा.

'साहब यह अभी मरी नहीं है, देखिये उसकी आँखे खुली हैं और हाँफ रही है.'

'थोड़ी सब्जी खा लेती तो क्या हो जाता?' भीड़ में खड़े दूसरे व्यक्ति ने प्रश्नचिन्ह लगाया।

'साहेब अभी हमारी बोहनी तक नहीं हुई. बची-खुची सब्जियां और पत्ते इन्हीं जानवरों को तो  खिलाते हैं दूकान बंद करने के पहले। 

उस सब्जी वाले ने आगे कहना शुरू किया, 'यह गाय पहले कभी नहीं दिखी बाबूजी! आप रुकिए, हम अभी गाय को पानी पिलाते हैं!'

उसने सब्जियों पर छिड़कने वाला पानी गाय के मुख में डालना शुरू किया, गाय हरकत में आने लगी. गाय के मुख से जबान निकालकर मुख के ऊपर फिरने लगी.

'भीषण गर्मी की वजह से गाय बहुत प्यासी है, बाबूजी! देखो सूखकर दुबली हो गयी है. इसे पानी, भोजन और आराम की जरूरत है.' सब्जी वाले ने गीले टाट को गाय पर ओढ़ा दिया था.  

सब्जी वाले ने गौर से देखा उसे लगा कि गाय को इलाज की जरूरत है.

मैंने भी बीच में कहा, 'शायद तुम ठीक कहते हो, गाय को इलाज की जरूरत है.' मैंने सब्जी वाले की तरफ देखते हुए  सोचा कि कुछ पुण्य-कार्य हो जाये और लगे हाथ सलाह दे डाली, 'भाइयो, इसके इलाज के लिए चन्दा एकत्र करते हैं.… और एक पशु-चिकित्सक को यहाँ बुलाते हैं. गाय इलाज से ठीक हो जाएगी और पुण्य भी मिलेगा।'

मैंने अपना गमछा गाय के बगल में बिछा दिया और लोगों से अपील करने लगा, 'गाय के इलाज के लिए कुछ दे दो'. गाय के वास्ते कुछ दे दो. 

पहले लोग कुछ रुके, कुछ ने अपनी साड़ी और जेब से कुछ सिक्के फेंके और चल दिये। जो भीड़ में खड़े थे उनमें कुछ बिना पैसे दिए ही लौट गये. 

धीरे-धीरे भीड़ छटने लगी. जब मंदिर और मस्जिद की तरफ देखा तो इक्का-दुक्का लोग ही सुनकर आये और सिक्के डालकर चलते बने. जून का महीना था. शाम होने लगी थी. मैं सोचने लगा कि आदमी भावना का पुतला होता है और आसानी से किसी के कहने-सुनने से भावना में बह जाता है. गाय के बेहतर होने से बात आयी-गयी हो गयी थी. 

कुछ पैसे गमछे में और कुछ बाहर बिखरे पड़े थे. मैने गोहार लगना बंद नहीं किया था. मेरे साथ सब्जी वाला भी गोहार लगा रहा था, ''गाय के वास्ते।' 

आने जाने वालों की, मोटरसाइकिल की चिल्ल-पों, रिक्शे, साईकिल की घंटियों की आवाज के बीच आवाज  वातावरण में गूँज रही थी.  'गाय के वास्ते। गाय के वास्ते।'


सुरेश चन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

ओस्लो, नार्वे