Wednesday, 7 October 2026

दो हिन्दी लघुकथाएँ बल्गारिया से / डॉ. मौना कौशिक

 ॥एक॥

मेले का उद्घाटन / मौना कौशिक

वे चुनाव जीत चुके थे।

शपथ भी ले चुके थे।

पार्टी बदलने के भी पूरे लाभ उन्हें मिल चुके थे। सत्ता, पद, गाड़ी, बंगला—सब कुछ हाथ में था। जीवन सफल माना जा रहा था। अब हालत यह थी कि रोज़ कोई न कोई बुलावा आता—

“सर, इस मकान का उद्घाटन करना है…”

“सर, नए ऑफिस का फीता काटना है…”

“सर, पुल तैयार है…”

“सर, सभागार का लोकार्पण है…”

तालियाँ, मालाएँ, फोटो, अख़बारों की सुर्खियाँ—यही उनका नया प्राणवायु था।

पर उस दिन सुबह अजीब सन्नाटा था।

उन्होंने घंटी बजाई—“सेक्रेटरी! आज कहाँ जाना है?”

सचिव घबराया-सा आया— “सर… आज कहीं कार्यक्रम नहीं है। बस कुछ फाइलें हैं, उन पर हस्ताक्षर करने हैं।”

नेताजी का चेहरा उतर गया।

“क्या मतलब? आज कोई उद्घाटन नहीं? नहीं भाई, मुझे आज भी उद्घाटन करना है!” उनके कानों में फिर तालियों की गूँज बजने लगी। गले की मालाएँ याद आने लगीं। कैमरों की फ्लैश, अख़बारों में छपी तस्वीरें, बड़े-बड़े शीर्षक—सब सामने तैरने लगा।

उन्होंने कुर्सी पर अधीर होकर करवट बदली— “जल्दी पता करो! आज फीता कहाँ कटेगा?”

सचिव बाहर निकला। माथा खुजलाया, इधर-उधर फोन घुमाया। कोई कार्यक्रम नहीं। कोई बुलावा नहीं। तभी उसे याद आया—कल एक निमंत्रण आया था। उसने लिफाफा खोला, पढ़ा, और चेहरे पर चमक आ गई। वह दौड़ता हुआ भीतर पहुँचा—“सर! एक जगह है। अभी चलना है। उद्घाटन आपका इंतज़ार कर रहा है!”

नेताजी उछल पड़े। तुरंत गाड़ी निकली। चेले-चमाटे साथ हुए। पत्रकार बुला लिए गए। कैमरे सज गए। काफिला सायरन बजाता हुआ पहुँचा। वहाँ भीड़ तो थी ही…पर साथ में बहुत सारे गधे भी खड़े थे। नेताजी ठिठक गए— “यह क्या है?”

सचिव ने विनम्रता से कहा— “सर, यह गधों का मेला है…और आज इसका उद्घाटन आपको ही करना है।”

सजी हुई थाली में रखी कैंची नेताजी के सामने कर दी गई। क्षणभर को नेताजी ने सामने खड़े गधों को देखा… फिर अपने साथ खड़े लोगों को देखा… और पहली बार समझ नहीं पाए कि फीता किसका कटना है—मेले का या गधों का!

॥दो॥

दो किलो केले / मौना कौशिक

ठंडी रात थी और गर्म कोट में लिपटी माँ का इंतज़ार हो रहा था।

नए साल छुट्टियाँ पड़ चुकी थीं और घर में रोज़ ही कुछ नया बन रहा था। पर मन कुछ फल खाने का हो रहा था।.सर्दियों में फल किसी जादू की छड़ी की तरह होते थे—किसी के पास भरपूर होते, किसी को मिलते ही नहीं थे। माँ आज उसी जादू की छड़ी की जगह जादू का थैला लेकर निकल पड़ी थी।

घंटी बजी और हम सोफे से उछल पड़े।

दरवाज़े पर माँ खड़ी थी—हाथ में जादू का थैला और चेहरे पर विजय की मुस्कान लिए।

घर के भीतर तो गर्मी थी। माँ ने कोट, टोपी और दस्ताने उतारे।

लेकिन हमसे चुप बैठा नहीं जा रहा था।

आख़िर थैले का मुँह खुला और उसमें से निकले—पीले-पीले, हरे-हरे केले।

घर में शोर मच गया।

माँ ने इशारे से बताया—पूरे दो किलो हैं। वह बोल और सुन नहीं पाती थीं।

हम दोनों उनसे लिपट गए।

वे दो किलो केले और उनका वह इंतज़ार—चालीस साल बाद भी आज, जस का तस बना हुआ है।

माँ हमेशा बराबर बाँटती थीं—हम दोनों के बीच। न कम, न ज़्यादा।

आज सब कुछ सामने है—फल हैं, बाज़ार हैं, साधन हैं, चाहें तो केले भी कई किलो खरीदे जा सकते हैं। पर जादू के उस थैले से निकली हुई वह मिठास... वह आज भी नहीं भूली।

(लघुकथा में 1980 के दशक का बुल्गारिया है। उस समय सर्दियों में फल बाहर से आते थे और केला और संतरा विशेष रूप से लोकप्रिय थे। दो किलो से अधिक किसी को नहीं मिलते थे।) 

 

डॉ. मौना कौशिक बल्गारिया में रहने वाली लगभग पहली भारतीय लेखिका, कवियत्री हैं। उनकी रुचि और विशेषज्ञता भारत और बल्गारिया की भाषाओं, संस्कृति, अनुवाद, लोककथाओं और पौराणिक कथाओं के क्षेत्र में है। उन्होंने कई बल्गेरियाई कहानियों तथा कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया है।

·         उनकी पुस्तक 'माया बादल की छाया' बल्गेरियाई में अनूदित हिंदी मुहावरों का संकलन है।

·         डॉ. कौशिक अपने पिता, प्रोफेसर डॉ. राम कृष्ण द्वारा संपादित प्रथम संस्कृत-बल्गेरियाई शब्दकोश के संपादक मंडल में हैं।

·         उनके सहयोग से “हनुमान चालीसा” का बल्गेरियाई अनुवाद भी बुल्गारिया में प्रकाशित हुआ है।

·         उन्होंने कई भारतीय और बल्गेरियाई वृत्तचित्र फिल्म परियोजनाओं के लिए एक सलाहकार के रूप में भी काम किया है।

·         डॉ. कौशिक वर्तमान में सोफिया विश्वविद्यालय में इंडोलॉजी विभाग में पढ़ा रही हैं। नृत्य और धर्म, भारतीय संस्कृति, अनुष्ठान और त्योहार, भारत में पारसी समुदाय, डॉ कौशिक द्वारा सोफिया विश्वविद्यालय के लिए तैयार किए गए कुछ वैकल्पिक पाठ्यक्रम हैं।

·         उन्हें पूर्व में दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, जम्मू विश्वविद्यालय, सीसीएस विश्वविद्यालय-मेरठ और कई अन्य विश्वविद्यालयों में "विदेशी भाषा के रूप में हिंदी-शिक्षण तथा अन्य सांस्कृतिक विषयों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जा चुका है।

·         वह देवम, इंडो बल्गेरियाई सोसाइटी फॉर आर्ट्स एंड कल्चर की संस्थापिका भी हैं, जो पिछले दो दशकों से भारत और बल्गारिया के बीच सांस्कृतिक संबंधों के निर्माण में सक्रिय रूप से शामिल है।

·         डॉ. कौशिक को अक्षरम इंटरनेशनल हिंदी सोसाइटी, आजाद भवन, आईसीसीआर, दिल्ली 2010 द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।

·         वह हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित हैं।

·         हंसराज कॉलेज, नई दिल्ली द्वारा, विज्ञान भवन में आयोजित "विश्व हिन्दी दिवस" समारोह में सम्मानित।

·         मॉरीशस में, हिन्दी दिवस पर रेडियो एवं टेलीविजन पर साक्षात्कार-2026,

·         आर्य समाज द्वारा सम्मानित।

·        डॉ. कौशिक आयुर्वेद एसोसिएशन, सोफिया, बल्गारिया की एकमात्र भारतीय बोर्ड-सदस्य हैं। भारतीय राष्ट्रपति की बल्गारिया यात्रा के अवसर पर वे प्रथम महिला श्रीमती सविता कोविंद जी के साथ थीं तथा प्रवासी भारतीयों एवं भारत के मित्रों के लिए राष्ट्रपति माननीय रामनाथ कोविंद जी के आधिकारिक कार्यक्रम की संचालक एवं उद्घोषिका थीं।

स   सम्पर्क  : maunakaushik@gmail.com

Tuesday, 24 June 2025

चरित्र-रचना की सूक्ष्मता : काले दिन / डॉ. शोभा जैन


इंदौर से प्रकाशित साप्ताहिक ‘अग्निधर्मा’ (अंक 25जून-1जुलाई 2025, पृष्ठ 5) के 'अग्निधर्मा:पुस्तक चर्चा' स्तम्भ में डॉ॰ शोभा जैन द्वारा लिखित ‘काले दिन’ की विस्तृत समीक्षा प्रकाशित हुई है; तथापि डॉ॰ शोभा जैन ने अपनी ओर इसे 'संक्षिप्त चर्चा' कहा है। उनके आभार सहित प्रस्तुत है उक्त समीक्षा :  

बदलते सामाजिक परिदृश्य के मध्य चेहरे की सच्चाइयों के बरअक्स मुखौटे  भी बदले हैं।  इस बदलाव में समाज की देहरी से  उठाए कथानक अपनी लघुता में अर्थवत्ता की गहरी  छाप छोड़ देते हैं।  लघुकथा की छोटी सी जमीन पर संग्रह  'काले दिन' का क्षेत्रफल अपनी  सांकेतिकता के टेप से नपा तुला होकर अपनी व्यंजना में पोषित होता है ।  व्यंजना का यह आचरण ही देश ,काल परिस्थिति का सही-सही उद्घाटन करने में निः सृत हुआ लघुकथा संग्रह  'काले दिन'  में ।

वैचारिक संबद्धता इन लघुकथाओं का सारतत्व है। समाज के षट्कोणीय ज्वलंत हालातों  का मिला जुला मसौदा तैयार करती इन लघुकथाओं में लेखक बलराम अग्रवाल  किसी चमत्कारिक स्वर में आलंबन नहीं खोलते बल्कि ‘संप्रेषण’ के ‘नुकीले’ घेराव से अपनी  सर्जना को ठोस जमीन देते हैं।

कुल जमा 67 लघुकथाओं में एक लघुकथा 'दिवार से पीठ टिकाए बैठा वह बूढ़ा’ (पृ 92 )' आंतरिक जीवन का ऐसा परिशिष्ट खोलती है जो पाठक को घंटों सोचने पर विवश करती है ।

कथा विन्यास का कौशल  शीर्षकों पर भी प्रतिबिंबित होता है।  यह मनोवैज्ञानिक स्पर्श बारीक़ बुनावट का संकेतक है।  कथ्य को बुनने के लिए लेखक ने बाह्य दृश्य-पटल को जितना थिरकन-भरा बनाया है उसी पर उदासी के स्याह रंगों से संवेदना को गहरा दिया है। मसलन : 

''अकेला हूँ बेटा।'' बुजुर्ग ने कहा, इधर -उधर से भीख मांग ,पेट भरकर यहाँ आ पड़ता हूँ। बतियाने के लिए पांच -सात मिनट निकाल लोगे तो मेहरबानी होगी। ''

''देख लेना ,अगर कर सको .. '' दुविधा में पाकर उन्होंने कहा ,''आपका बहुत समय ले लिया ,अब जाइये।'' और विदा कर दिया।

और उस दिन के बाद ,अनायास, घर-वापसी का मेरा रास्ता ही बदल गया।

इस लघुकथा  में घटना की विशिष्टता नहीं है।  जीवन की विवशता को सामने रखकर कथाक्रम संजोने की कला  है जिसमें रचनाकार भाषा को ऐंद्रिय बनाता है।  कुछ अबाध्य अभावों के बावजूद वह स्पर्श कर जाती है।

शब्दाधिक्य की मार से पूरी सुरक्षित  लघुतम संवादों के  गढ़ी गई ये लघुकथाएं अपनी लघुता  में एक लम्बी यात्रा तय करती हैं।  इनमें हिंसक संचय की प्रवृतियों और घनघोर आत्मकेन्द्रीयता का विस्तार है तो गहराव भी।  संस्था और संसाधनों पर एकाधिकार कायम करने के  तिकड़मी संस्कार ,पूँजीतंत्र और बाज़ारतंत्र  के  साथ जो   मूल्यहीन जीवन-विवेक  अस्तित्व में आया है, जातिवाद के विषाणु हों या वर्गीय विषमता लघुकथाओं की मुखर अभिव्यक्तियाँ बनी हैं । मसलन :

"जिनकी कोई एक विचारधारा नहीं होती, वे नष्ट हो जाते हैं।" उन्होंने कहा ।

"कबीर की तरह ?” मैंने पूछा ।

"नहीं..." अचानक मिले जवाबभरे इस सवाल पर वे सकपका गये ।

कुछ देर बाद सँभले और कहा, "उन हजारों-लाखों की तरह, जिनका नाम न तुम जानते हो न मैं ।''

"वही तो कबीर की जड़ों में पड़े हैं... !" मैंने कहा तो 'लाहौल-विला-कूवत' बकते वे मुझे छोड़कर इधर-उधर हो गये।

अनचीन्हे लोग (पृ 29 ) चंद पंक्तियों में लघुकथा कितनी बड़ी हलचल पैदा कर देती है। 

सांकेतिकता के आधार पर बुनी  लघुकथाएं  आतंकी (69 ), फासीवाद (68), दॉंव ,पेंच और पैंतरा (67 ) कैनवास में   सीमित होकर व्यापक अर्थ प्रदान करती है। 'दरख्त’, नया रेट, मल्टीलाइनर, शाहीन से मुलाकात : शुरूआती तीन सवाल जैसी लघुकथा में नैतिक संकेत, आदर्श बुनावट की निचली परत में समाए हुए हैं। कथांत उसकी प्रतिध्वनि देते हैं।  कथा  की लय  अबाधित रूप से लक्ष्यगामी है। आवरणविहीन शिल्प आम आदमी  का सहकार लघुकथाओं को व्यापक फलक देता है।

पात्रों की ‘चरित्र-रचना की सूक्ष्मता’ इस संग्रह की खासियत है।  'काले दिन' अपने पूरे कलेवर में जिन मूल्यों के लिए विपथगामिता और भ्रष्टताओं से टकराती है,  छोटे-छोटे कथानक में उपन्यास रचा जा सकता है।

पुस्तक : काले दिन; कथाकार : बलराम अग्रवाल; प्रकाशक : मेधा बुक्स, एक्स-11, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032; फोन : 98910 22477; आईएसबीएन : 978-81-8166-21-5; कुल पृष्ठ : 100; मूल्य : रुपये 100 पेपरबैक संस्करण; वर्ष : 2023 द्वितीय संस्करण

Saturday, 14 June 2025

जबलपुर (म.प्र.) निवासी कथाकार पवन जैन की 7 लघुकथाएँ

       

॥1॥

स्वर्ग का पता

बहुत दिनों बाद आज अर्चना का फोन आया।

मैंने झट से उठाया और रोष में बोलने लगी, “याद आ गई मेरी! कहाँ थी इतने दिन? किसी गोष्ठी में भी नहीं दिख रही!”

उसने शांति से जबाब दिया, “हाँ यार, आजकल बहुत व्यस्त रहने लगी हूँ।”

“कहाँ व्यस्त रहती हो?”

“सुबह-सुबह पूजा-पाठ, फिर भोग लगाकर फ्री होती हूँ तो बच्चों की देखभाल। शाम को सत्संग, पता ही नहीं चलता, कब दिन गुजर जाता है।”

“ओहो, तू कब से इतनी धार्मिक बन गई कि सुबह-शाम मंदिरों के चक्कर लगाती रहती है!”

“मंदिर, वंदिर नहीं; मेरा घर ही मंदिर है।”

“क्या मतलब?”

“तुझे तो मालूम है, सास-ससुर मेरे साथ ही रहते हैं। ससुर जी 98 साल के हैं और सासु माँ 95 की। अब दोनों अशक्त हो गए हैं। सुबह दोनों को उठाना, चाय-पानी कराना, नहलाना- धुलाना, यही पूजा-पाठ है मेरा। मैं पत्थरों की मूर्तियों को नहीं सजाती, इन जिंदा मूर्तियों की ही साज-सम्हाल करती रहती हूँ।”

“तेरी देवरानी भी तो है, वह कुछ नहीं करती क्या?”

“वह भी करती है। सारा किचिन तो उसने ही सम्हाल रखा है—बच्चों के टिफिन, पूरे परिवार का नाश्ता, भोजन, रात का खाना, वही तो करती है।”

“और वह क्या बता रही थी, शाम को सत्संग?”

“हाँ, रात्रि-भोजन के बाद पूरा परिवार माँ-बाबू जी के कमरे में बैठता है। सभी अपनी- अपनी बातें बताते हैं। कोई समस्या हो तो समाधान हो जाता है। बच्चों की फरमाइशों पर भी गौर हो जाता है।”

“फिर तो बढ़िया है, तेरा घर तो स्वर्ग है बिल्कुल!”

“हाँ, यही बताने को तो फोन किया था। बता, कैसी लगी मेरी यह कहानी—‘स्वर्ग से सुंदर घर’! बिल्कुल मौलिक है।”

तभी उसके बाबू जी की आवाज फोन पर सुनाई दी, “बहू, कब से भूखा बैठा हूँ।”

“अभी फोन रखती हूँ, बाबूजी चिल्ला रहे हैं। एक मिनिट की भी चैन नहीं  पकड़ते।”

तभी उसकी सास की आवाज आई—“तुम ज्यादा न चिल्लाओ जी।”

लम्बी साँस छोड़ने की आवाज...फोन कट गया।

॥2॥

मिराज

माँ और छोटे भाई को ट्रेन में बैठाकर रघु सीधे काम पर आ गया।

“ओहो...अभी तो बारह ही बजे हैं! यह घड़ी आज इतना धीमा क्यों चल रही है!! काश, मेरे पास कोई जादू की छड़ी होती जिसे घुमाकर सीधे शाम बना देता।”

घड़ी को बार-बार देखता वह, मन ही मन कहीं खोया-सा था।

शादी के दो दिन बाद ही पत्नी को गाँव में छोड़कर शहर काम पर आ गया था। महीनों तक उसे याद कर कच्चा-पक्का बना, जैसे-तैसे खाता रहा।...

माँ से मनुहार कर पत्नी को शहर ले आने की उसकी गुहार व्यर्थ न गई।

माँ उसके छोटे भाई के साथ पत्नी को लेकर शहर आ गई। नवविवाहिता बहू को घर-गृहस्थी चलाने के गुण सिखाने के लिए पूरे महीने तक, एक कमरे की खोली में रही। अब, उसकी नवब्याहता सामने तो थी, पर उसके सामीप्य से वह कोसों दूर था।

और आज—

पत्नी के सानिध्य के सुनहरे सपनों में डूबता-उतराता, शाम पाँच बजते ही वह कारखाने से निकल, बाजार की ओर बढ़ गया। वहाँ से, खाने के सामान के साथ, बेला के फूलों का एक गजरा भी लेता गया।

 जैसे ही घर पहुँचा, अपने साले को आया देखकर उसका दिल धक्क-सा रह गया।

 रात, खाना-पीना निपटने के बाद साले ने रघु से कहा, “जीजाजी, आपका काम तो ठीक-ठाक चल रहा है। आपकी गृहस्थी भी यहाँ जम ही गई है। सोचता हूँ, मैं भी शहर आ जाऊँ। आपका इस बारे में क्या ख्याल है?”

"नहीं, कभी नहीं। शहर में आदमी, आदमी नहीं रहता…कोल्हू का बैल बनकर रह जाता है!” कहते हुए रघु का स्वर तल्ख और तेज हो गया।

उसका साला अचरज से उसकी ओर देख उठा। वह उस सीधे-सादे आदमी के मुँह से निकले शब्दों के तीखेपन का कारण खोजने की कोशिश कर रहा था।

एकाएक रघु का हाथ, पहन रखी अपनी पेंट की जेब में चला गया और झटके के साथ ऐसे बाहर निकला जैसे जेब में बैठे साँप ने डस लिया हो। उसमें रखा गजरा मुरझा चुका था!

॥3॥

तलाक

सत्तर से ऊपर हो गया, फिर भी उन जोड़ों का इंतजार करता हूँ।

बचपन में, जब स्कूल के बरामदे में टाट-पट्टी पर दीवार के सहारे बैठकर स्लेट पर लिखने बैठता, तब नजरें उन पर ही रहती। उनके फुदकने के साथ मन भी फुदकता रहता। झुंड के झुण्ड आतीं, लाइन में बैठकर चहचहाहट करती रहतीं। थोड़ी-सी ही आहट पर फुर्र से उड़ जातीं, पर थोड़ी ही देर में लौटकर आ जातीं।

बताया गया—यह गौरैया है। फिर पहचानने लगा था कि उनमें कौन नर है कौन मादा। बैठे-बैठे उनकी कभी थोड़ी बहुत लड़ाई भी होती। देखने में बहुत आनंद आता। चोंचें भिड़ाते दो नर तेज चहचहाहट करते और जीतने वाला अपना जोड़ा बना लेता। उनके प्रणय निवेदन, भाव-भंगिमाओं को भी समझने लगा था। घर बनाने के लिए दोनों साथ-साथ तिनकों को इकट्ठे करते।

मेरी पढाई पूरी हुई। मैंने भी अपना जोड़ा बना लिया। दोस्तों-मित्रों के भी जोड़े बने। उनके बच्चों की शादी में भी शगुन और शुभकामनाएँ देकर आया।

आज, बहुत दिनों बाद, पेड़ पर गोरैया का जोड़ा आया। देखकर, मन प्रफुल्लित हो गया। पक्षियों की यह प्रजाति खुद विलुप्ति की कगार पर है, पर दिखती हमेशा जोड़े में ही है।

जिन्हें आशीर्वाद देकर आया था, उन्होंने भी काश्मीर, स्विट्जरलैंड में खूब चोंचे लड़ाईं, पर मोबाइल से चिपके रहे।

उन्होंने कभी गौरैया को नहीं देखा।

॥4॥

मानवीय कहर

‘भुखमरी से जूझ रही बच्ची और उसकी मौत का इंतजार करते गिद्ध’ की फोटो से केविन कार्टर को संसार में ख्याति मिली।

वह भी एक ऐसे ही दृश्य की तलाश में रेगिस्तान, नदी, पहाड़ एक कर रहा, गाँवों की, शहरों की खाक छान रहा ।

वह युद्ध में कुपोषण एवं चिकित्सीय अभाव में हड्डियों का ढाँचा बचे बच्चों, बारूदी बरसात से जख्मी, पट्टी बंधे कटे-फटे जिस्म और भूखे बच्चों को देखती माँ की पथरा गई पनीली आँखें, भूख से बिलबिलाती बेघर भीड़ को देख रहा। भूखमरी से निपटने के ऊँट के मुँह में जीरा जैसे होते प्रयास, प्रतिशोध की आग में जल रहे रसद को रोक प्रतिरोध कर रहे परिवारों को देख रहा, पर उसका  कैमरा क्लिक नहीं कर रहा।

तलाश कर रहा ऐसी आँखों को, जिनमें  इंसानियत नजर आये, जिन्हें वह कैमरे में कैद कर सके।

॥5॥

अव्यक्त

पत्नी ने कहा—“संध्या के घर चलना है। पंद्रह दिन पहले उसके पति का स्वर्गवास हो गया था।”

हम दोनों शाम को उसके घर पहुँचे।

वह दरवाज़े पर ही मशीन रखे, गुनगुनाते हुए सिलाई कर रही थी।

पत्नी के मुँह से सांत्वना के दो शब्द निकलते, उसके पहले ही वह बोल पड़ी—

“अच्छा ही हुआ, इनकी गत सुधर गई। चार महीने से खटिया पर पड़े थे। कोई रिश्तेदार झाँकने भी नहीं आया। उनकी देखभाल में ही पूरा दिन खटती रहती थी। ऊपर से दवाइयों का खर्चा अलग। अकेला लड़का क्या-क्या करता बेचारा। उसकी कमाई तो राशन-पानी को भी पूरी नहीं पड़ती।”

पत्नी की नजर उसके चेहरे पर जमी थी। वह थोडा़ रुककर बोली—“अब, सभी का एक-एक पैसा चुका दूँगी।”

पत्नी ने कहा, “हम लोगों ने जो सहयोग किया था संध्या, वह कोई कर्जा नहीं है।"

उसने कहा, “जिसे सहयोग करना चाहिए था, वह तो जिंदगीभर बोझ बना रहा! नहीं तो यह सिलाई का काम क्यों करती? पर अब...अब इसमें मन लगने लगा है। थोड़ी चैन की साँस ले पा रहीं हूँ।”

उसे खुश देखकर हम वापिस चल पड़े। रास्ते में पत्नी बोली, “अब उसकी गृहस्थी की चादर उसके सिर तक पहुँच गई है।”

मैंने कहा, “हुनर कोई भी हो, आड़े वक्त पर काम आता ही है।”

पत्नी बोली, “अपने पैरों पर खड़े होने का सुख उनकी आँखों से झलक रहा था।” और उसने मेरा हाथ जोर से पकड़ लिया।

          ॥6॥

धड़कनें

कब आये, खाना खाया कि नहीं, लेटे हैं या सो रहे हैं!...

मैं तो खटती रहती हूँ, दिन भर, सिर दर्द के मारे फटा जा रहा था, पर किससे कहूं।

बच्चे जब से बाहर गये, मेरा तो अब कोई नहीं! इनके पास समय कब होता है, कब मेरी सुनते हैं, मुझे तो अब पता ही नहीं।

हाय राम! झक मार के डाक्टर के पास गई—

“ब्लड प्रेशर 100-140... कोई खास बात नहीं, एक गोली रोज खानी पड़ेगी।…कहाँ हैं सिंग साब! आपका ख्याल नहीं रखते!! बजन भी बढता जा रहा है, अच्छा नहीं है, कुछ कंट्रोल करो।"

मैं कुछ भी नहीं बोली।

जब सब-कुछ बढ़ रहा है, धन दौलत, रुपया-पैसा, मान-सम्मान, शुगर, ब्लड प्रेशर, वजन! मेरा कुछ और भी बढ़ रहा है—अभिमान, स्वाभिमान!

कम हो रही हैं तो दिल की धड़कनें, जो कभी एक-दूसरे के लिए धड़कती थीं...

डॉक्टर उन्हें नहीं नाप पाया!

॥7॥

अनाम

“ऐ, ओय! अरे सुन! क्या नाम है तेरा?”

उसने फावड़ा जमीन पर रखते हुए कहा, “नाम जानकार क्या करेंगे साहब, बुलाना तो आपको ‘ओय’ कहकर ही है।” “!:?”

“ज्यादा बकवास न कर। मालूम है, नगर निगम से मैंने ही बुलाया है तुझे! चल इधर आ जल्दी।”

फावड़ा वहीं छोड़कर, उनके पास आ गया, “जी कहिए।”

“यह नाली अच्छे से साफ कर दे।”

“आपके घर के सामने की ही नही, कालोनी की सारी नाली साफ करने आया हूँ।”

“ज्यादा बकवास न कर; जल्दी काम पर लग जा।”

“जी साब जी, आज कौन-सा दिन है ?”

“आज गांधी जयंती है; पर तुझे क्या ?”

कुछ सोचते हुए, “सुना है गांधी जी अपना संडास खुद साफ करते थे। उनके मन में ऊँच नीच का भाव नहीं था।”

“हाँ, परंतु इससे तुझे क्या करना है?”

 “उन्होंने जिन्हें पाठ पढ़ाया वे तो भूल गए, अब हमें ही तो याद रखना है।”

चौंकते हुए, “क्या याद रखना है?”

“यही कि बाहर की और अंदर की गंदगी हमें ही साफ करना है।”

 

परिचय : पवन जैन

बी एससी, एम ए, एलएल बी।

593 संजीवनी नगर, जबलपुर म प्र

jainpawan9954@gmail.com

Mobile no, 9425324978

पंजाब नैशनल बैंक में विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए प्रबंधक के पद से सेवा निवृत हुए।

वर्तमान में स्वतंत्र लेखन, प्रमुखतः लघुकथा, पुस्तकों की समीक्षा।

विभिन्न साहित्यिक समूहों / पटलों पर लघुकथा की कार्यशाला का आयोजन।

समय-समय पर विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित।

लघुकथा श्री 2019

प्रसंग लघुकथा अलंकरण 2020

प्रसंग लघुकथा सृजन सम्मान 2021

विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर 2021

कादम्बरी सम्मान 2023

क्षितिज लघुकथा समग्र सम्मान 2023

पर्पल पेन संस्था दिल्ली, साहित्य साधक सम्मान 2023

प्रकाशित कृति— ‘फाउण्टेन पेन’ लघुकथा-संग्रह।









इस संग्रह को लघुकथा शोध केंद्र भोपाल द्वारा ‘पारस दासोत स्मृति लघुकथा कृति सम्मान 2022’ प्रदान किया गया।

पंजाब नेशनल बैंक, प्रधान कार्यालय नई दिल्ली द्वारा मौलिक पुस्तक लेखन योजना के अंतर्गत पुरस्कृत।

प्रमुख पत्र, पत्रिकाओं एवं संकलनों में लघुकथाएँ प्रकाशित। कुछ कथाएँ पंजाबी, नेपाली एवं उड़िया भाषा में अनुवादित एवं प्रकाशित।

कुछ सांझा संकलनों में सम्पादन सहयोग।

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