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Tuesday, 15 September 2020

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में…3 / डॉ॰ उमेश महादोषी

 दिनांक 14-9-2020 से आगे

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में आत्मिक और दैहिक अस्तित्व का तात्विक विवेचन

तीसरी कड़ी

इस स्थिति के पीछे सृजन को प्रभावित करने वाला एक बड़ा इतर कारक भी महत्वपूर्ण है। यह है लेखक-पाठक का व्यावहारिक और व्यक्त रिश्ता। आज न तो लेखक पर्दे के पीछे है और न ही पाठक पर्दे (दर्पण) के आगे। व्यावहारिक जीवन में लेखक-पाठक आपस में गलबहियाँ डाले हुए हैं। पाठक जानता है कि जिस कार्यालय में उसे जीवन के अनेक कामों के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं, उसका मुखिया लेखक है तो क्या हुआ, है तो भ्रष्ट या भ्रष्टाचार पर मौन। कार्यालय में बैठा कार्पोरेटी लेखक जानता है कि यह जो बन्दा मेरे सामने खड़ा है, यह कोई दूध का धुला नहीं है। इसलिए मैं इसे अपनी दाल-रोटी और सुख-सुविधाओं का स्रोत क्यों न मानूँ! यदि कुछ संवेदनात्मक स्थितियों-परिस्थितियों से सामना हो भी जाये तो भी सामने वाला बन्दा अधिक से अधिक एक भावी रचना का प्लॉट हो सकता है। मैं इस बात से इनकार नहीं करता कि कई लेखक/रचनाकार आज भी वास्तव में संवेदनशील और दूसरों के दुःख-दर्द को समझने वाले हैं, लेकिन उनकी संख्या समाज को सकारात्मक संदेश देने के लिए पर्याप्त नहीं है। भाषा और संस्कृति के स्तर पर सडांध फैलाने वाले भीे साहित्यिक सड़कों पर सरेआम खंजर लिए घूम रहे हैं। ऐसे में रचनात्मकता का संप्रेषण कितना वास्तविक और प्रभावोत्पादक हो सकता है, लघुकथा के वर्तमान समकाल की प्रवृत्तियों में यह चीज दूर से चमकती है। या तो आज लेखक जिम्मेवारियों से विमुख हो चुका है या फिर लघुकथा से जुड़ी शार्टकट प्रसिद्धि की आभासी धारणा ने अनेक संवेदनहीन लोगों को लघुकथा (और दूसरी लघ्वाकारीय/समधर्मा विधाओं) के आँगन में लाकर खड़ा कर दिया है। यह बहुत पुरानी और वास्तविक मान्यता है कि कथनी और करनी (सिद्धांत और व्यवहार के स्तर पर संवेदना) में अंतर रहेगा तो आपके शब्दों के प्रभाव का वास्तविक सम्प्रेषण नहीं होगा। ‘छोड़ो भी यार!’’, ‘सिद्धान्तो को मारो गोली’ या ‘सिद्धान्तों से पेट नहीं भरता है’ जैसी धारणाओं के जंगल में आज आम आदमी ही नहीं विचर रहा है, साहित्यकार, बुद्धिजीवी और कथित जिम्मेवार लोग भी वहाँ के सुहावने परिवेश में अपने घर बनवा रहे हैं। सृजन से इतर होते हुए भी यह समकालीन परिदृश्य से जुड़ा एक बड़ा और महत्वपूर्ण तथ्य है। मैं जानता हूँ कि ऐसी चीजें समीक्षा का आधार नहीं हो सकतीं और ऐसा मेरा उद्देश्य भी नहीं है। मैं केवल इस तथ्य को रेखांकित करना चाहता हूँ कि समकालीन लघुकथा (और दूसरी लघ्वाकारीय/समधर्मा विधाओं) में जो लेखन हो रहा है, उसमें किसी प्रकार के सुधार की प्रेरणाओं के लक्ष्य समाहित नहीं हैं। संवेदनाओं की उपस्थिति और विचार-निर्माण की प्रक्रिया के बावजूद समकालीन लघुकथा (रचना) प्रमुखतः जीवन की आलोचना के रूप में रची जा रही है। सामयिक परिवर्तनों के माध्यम से आने वाली चीजें विचार-निर्माण की प्रंिक्रया के तहत समकाल की प्रवृत्तियों में अपनी जगह बनाती हैं और समकालीन लघुकथा में मनुष्य के यथार्थ सत्य की तरह प्रतिबिम्बित होती हैं। 

      इस तथ्य को हम इस तरह भी समझ सकते हैं। जब कोई लघुकथा किसी व्यक्ति (लक्ष्य) के आचरण को बेपर्दा करती है तो प्रायः वह व्यक्ति तिलमिलाता अवश्य है, लेकिन तिलमिलाने के बाद अपने आचरण को या तो सामान्य और स्वीकार्य सिद्ध करने का या उसके लिए किसी अन्य को जिम्मेवार ठहराने का प्रयास करता है। समाज की प्रतिक्रिया भी थोड़ी देर के लिए तो वास्तविक रूप में आती है, फिर लोग भूल जाते हैं। एक रिश्वतखोर की रिश्वत लेने की प्रवृत्ति चर्चा का विषय तो बनती है, उसके सामाजिक बहिष्कार का नहीं। उसका आर्थिक स्तर उसकी रिश्वतखोरी की प्रवृत्ति की आलोचनात्मक चर्चा के बावजूद उसकी प्रतिष्ठा को बढ़ाता है। आज मनुष्य का यही यथार्थ सत्य है। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि लघुकथा अपूर्ण या उद्देश्यविहीन है। आज हमारा जैविक (मानवीय) परिवेश तमाम क्रिया-प्रतिक्रियाओं और जटिलताओं से गुजरता एवं अवकुंचित होता हुआ जिस रूप-स्वरूप में हमारे सामने खड़ा है, उसमें सामान्यतः आदर्शों की स्थापना या प्रेरणाओं की अपेक्षा संभव नहीं है। इसके दो बड़े कारण हैं, एक- मनुष्य की सामान्य मनोवृत्ति का पारम्परिक आदर्श की अवधारणा और विश्वास से मुक्त हो जाना। दूसरा- संवेदना के रूप में बदलाव और प्रतिसंवेदना की संभावना का क्षीण होना। इन दोनों कारणों के पीछे भी व्यापक पृष्ठभूमि है। यह तथ्य विचारणीय है कि पचास वर्ष पूर्व जिन चीजों से व्यक्तियों के मन में संवेदना जाग जाती थी, आज उन या उनके तरह की चीजों को बहुत सहजता के साथ नकार दिया जाता है? इसलिए पचास वर्ष पूर्व के आधार पर आज की रचनात्मकता नहींे सधेगी। दूसरी बात, यह भी आवश्यक नहीं कि जिस बात से एक व्यक्ति के अंतर्मन में संवेदना जाग जाये, उसी समय उसी बात से प्रभावित होकर दूसरा व्यक्ति भी संवेदना प्रदर्शित कर सके। लेकिन इस यथार्थ सत्य के बावजूद कई ऐसी चीजें हैं, जिन पर विचारों का रचनात्मक सृजन भी होता है। विभिन्न मानव समूहों के मध्य समानता को मान्यता आदि जैसे विचार दीर्घकाल में रचनात्मक सृजन से प्रभावित होते हैं। लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने और सामाजिक सक्रियता का पाठ प्रसारित करने का कार्य आज का साहित्य (समकालीन लघुकथा) बखूबी कर रहा है।

      ऐसे में यदि समकालीन लघुकथा जीवन की आलोचना को मानवीय अनुभव-प्रक्रिया से गुजारना चाहती है, तो इसे उसके लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। यहाँ रचनात्मक स्तर पर संवेदनात्मक स्थितियों की पड़ताल भी आलोचना के वास्तविक अर्थ में निहित है।

      निश्चित रूप से समकालीन लघुकथा जीवन की आलोचना करते हुए सीधे-सीधे समस्यात्मक स्थितियों से टकराती हुई निकलती है, यही उसका ल़क्ष्य भी होता है। इसलिए समकालीन लघुकथा नायकत्व की पक्षधर नहीं है। अपितु एक सीमा तक वह नायकत्व की अवधारणा को खण्डित करती है। समस्या ही उसके लिए प्रमुख है। वास्तविकता तो यह है कि लघुकथा का समकाल ही नायकत्व को स्वीकार नहीं करता। जहाँ जीवन के अंतरंग क्षणों की अनुभूतियों पर लघुकथा सृजित की जाती है, वहाँ भी अनुभूति या स्थिति ही प्रमुख होती है; व्यक्तित्व या नायकत्व नहीं। समकालीनता के इस परिदृश्य में लघुकथा को परखा जाना चाहिए।

      जीवन की आलोचना यानी समस्यात्मक स्थिति के आधार पर लघुकथा का सृजन हो और उसके केन्द्र में समस्या अथवा अनुभूति से जुड़ी स्थिति ही रहे, यह समकालीन लघुकथा की पहली परिधि है। लेकिन जैसे हम रचना (लघुकथा) की समीक्षा/समालोचना के आधार तलाशने का प्रयास करते हैं, वैसे ही रचनाकार के स्तर पर जीवन की आलोचना के आधार को तलाशना यानी जीवन को उसकी अद्यतन समग्रता में समझना भी आवश्यक है। समय के साथ जीवन में आने वाले परिवर्तन अन्ततः जीवन का हिस्सा बन जाते हैं लेकिन हर परिवर्तन की यात्रा में कुछ समय ऐसा अवश्य आता है, जब उसकी स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। वर्तमान साहित्य (समकालीन लघुकथा) में इन परिवर्तनों की स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता के प्रश्न का परीक्षण समय रहते करना किस रूप में होता है, इसकी पड़ताल समीक्षा में होनी चाहिए। 

                                                                 शेष आगामी अंक में जारी…