Sunday, 25 October, 2020

डॉ. पुरुषोत्तम दुबे से संतोष सुपेकर की बातचीत

 ख्यात लघुकथाकार एवं समीक्षक डॉ. पुरुषोत्तम दुबे से संतोष सुपेकर की बातचीत

 लघुकथा कभी भी जल्दबाजी की उपज नहीं होती

डॉ॰ पुरुषोत्तम दुबे 


 

    [किसी भी विधा की समृद्धि के लिए उसमें उत्कृष्ट सृजन तो आवश्यक है ही, उसके मूल्यांकन हेतु, विधा के उज्ज्वल भविष्य के लिए, उसके लेखकों को आईना दिखाने हेतु उस विधा में किये गए सृजन की समीक्षा, समालोचना भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है। पिछले कई वर्षों से लघुकथा की समालोचना, सम्पादन, समीक्षा में रत वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर पुरुषोत्तम दुबेजी से लघुकथा को लेकर कुछ ऐसे प्रश्नों पर मैंने चर्चा की जो आज के लेखक को अक्सर दुविधा में डालते हैं-संतोष सुपेकर ]


संतोष सुपेकर : कहा जाता है कि कथ्य अपना शिल्प खुद तय करता है
, लघुकथा लेखक इससे क्या आशय समझे? कृपया किसी उदाहरण से समझाएं तो बेहतर।

डॉ. दुबे : लघुकथा का प्राणतत्त्व लघुकथा का कण्टेण्ट होता है। यह लघुकथाकार पर निर्भर है कि वह लघुकथा के लिए हाथ आए कथ्य को किस तरह सम्प्रेषित कर कथ्य को लघुकथा का आकार दे। लघुकथा में शिल्प का आगमन कथ्य की कलात्मक अभिव्यक्ति से सम्भव है। लघुकथा लेखन में सर्वप्रथम शिल्प पर नहीं, प्रत्युत कथ्य पर विचार किया जाता है। शिल्प तो उस नदी के समान है जो टेढ़े-मेढ़े पथ से गुजरते हुए समुद्र की थाह पा लेती है। लघुकथा में कथ्य को विवेचित करने में शिल्प की सहज उपस्थिति को एक उदाहरण से हल करता हूँ। 'विवेक की आर्थिक समृद्धि और तरक्की दिन-ब-दिन ऐसे बढ़ रही थी मानो गमले का मनी प्लाण्ट।'

प्रश्न २ : क्या सम्प्रेषण की तीव्रता लघुकथा में हमेशा आवश्यक है?

डॉ. दुबे : लघुकथा कभी भी जल्दबाजी की उपज नहीं होती। लघुकथाकार उसके विचारों की भट्टी में कण्टेण्ट को जितना पकाएगा, लघुकथा का कथ्य उतना प्रभावी होकर सामने आएगा। जब कण्टेण्ट विचारों में उबलने लगेगा, तब लघुकथा लेखन की तीव्रता स्वमेव लघुकथाकार में पैदा होगी।

प्रश्न 3. : कहते हैं कि एक लेखक को अपने अंदर के आलोचक को हमेशा जीवित रखना चाहिए, लघुकथाकार इस उलझन में पड़ जाते हैं कि वे पाठक के लिए लिखें या आलोचक के लिए? दूसरे शब्दों में, लघुकथा में क्लिष्टता और शुष्कता को प्राथमिकता दी जाए या सहज सरल लेखन को?

डॉ. दुबे : प्रथमत: लेखक ही आलोचक होता है। वह रचना के लिए विषय वस्तु का चयन आलोचनात्मक दृष्टि को आजमा कर ही करता है। किसी भी लघुकथाकार को लघुकथा लिखते समय यही विचार करना चाहिए कि वह लघुकथा के लिए लघुकथा लिख रहा है। पहले लघुकथा है, फिर पाठक, तदन्तर आलोचक। लघुकथा जितनी सहज और सरल होगी, उतना ही वह पाठकीय तादात्म्य प्राप्त कर सकेगी। आलोचना का काल्पनिक भय लघुकथा की रचना प्रक्रिया को सृजनात्मक साँसें कभी नहीं लेने देता है।

प्रश्न ४ : संवाद आधारित लघुकथा में कथा तत्व का अभाव हो जाता है, इसको लेकर आपका दृष्टिकोण?

डॉ. दुबे : संवाद लघुकथा की अन्त:वस्तु को विस्तार देता है। मेरी दृष्टि में कथा का एक तत्त्व संवाद है। प्राय: संवाद, कथा में निहित चरित्रों के मध्य घटता है। संवाद कथा के अंश हैं, अंशी नहीं।

प्रश्न ५ : सोशल मीडिया में आने से लघुकथा का भला हुआ है या बुरा?

डॉ. दुबे : अब सोशल मीडिया प्रासंगिक हो चुका है। नए लघुकथाकारों के लिए सोशल मीडिया वरदान साबित हो रहा है। देखा जाए तो नए लघुकथाकार फेसबुक या व्हाट्सएप पर अपनी लघुकथाएँ भेज कर अपनी लघुकथाओं पर पाठकीय प्रमाण-पत्र प्राप्त करने में जुटे हुए हैं। एक प्रकार से सोशल मीडिया किसी रचना की सृजनात्मकता को पारित करने में 'क्लियरिंग विण्डो' का काम करता है।

प्रश्न ६ : लघुकथा को लेकर अब भी बहुत सारी 'फ्रेम' हैं। कोई 'लघु' पर जोर देता है तो कोई 'कथा' पर! मशहूर लेखक चार-पाँच पंक्ति की रचना लिखे तो प्रशस्ति पाती है पर कोई नया लेखक ऐसा प्रयास करे तो उसे कमजोर रचना, कथातत्व का अभाव, अधूरी लघुकथा, पंच नहीं है, बताकर नकार दिया जाता है, इस पर आपके विचार?

डॉ. दुबे : यह लघुकथाकार को समझना है कि कथा के जिस कण्टेण्ट को लेकर वह चल रहा है, उसकी गति क्या है, कैसी है और उसका कथ्य कहाँ जाकर समाप्त होता है, यही एक लघुकथा के लिए उसकी 'फ्रेम' कही जाएगी। कथ्य को सम्प्रेषित करने में अनावश्यक बातों से बचकर चलना ही कथ्य की सटीकता पैदा करता है। लघुकथा अर्थ देने लगे यही लघुकथा का 'पंच' है। कोई आलोचक केवल हवा में बात कर लघुकथा की मीमांसा करे, तो ऐसे धमकीले स्वरों को नजरअंदाज कर चलते हुए लघुकथाकार 'लघु' और 'कथा' में सामंजस्य पैदा कर लेगा।

प्रश्न ७ : प्रथम पुरुष में कोई लघुकथा रची जाए तो क्या सावधानी रखी जाए कि वह संस्मरण न लगे?

डॉ. दुबे : सही कहा आपने। प्रथम पुरुष में लघुकथा लिखने के दौरान प्राय: लघुकथाकार पर संस्मरण रचने का आरोप मढ़ा जाता है। 'मैं' की संज्ञा को 'वह' के सर्वनाम की तरह उपयोग में लाकर लघुकथा को संस्मरण के आरोप से बचाया जा सकता है।

प्रश्न ८ : लघुकथा में कालखण्ड दोष और लेखकीय प्रवेश पर आपका दृष्टिकोण?

डॉ. दुबे : कोई एक घटते क्षण का सिरा ही एक संवेदनशील लघुकथाकार को लघुकथा रचना का प्रेरक आधार देता है। अत: समय के उसी एक क्षण की लगाम पकड़कर लघुकथाकार क्षण की बलिहारी से हल आये कथानक को विवेचित करता चलेगा, तो ऐसे में जनित लघुकथा कालदोष के कुचक्र से सर्वथा वंचित रहेगी। कभी-कभी ऐसी दशा में कि लघुकथा का कथ्य लेखक के चरित्र से साम्य खाता हुआ लघुकथाकार की स्मृति पटल पर छाप छोड़ने लगता है, तब लघुकथाकार लघुकथा के प्रणयन में लेखकीय प्रवेश पा लेता है, तो कोई हर्ज की बात नहीं है।

प्रश्न ९ : अब तक लघुकथा सम्मेलन हुए हैं जिसमें लघुकथाएँ पढ़ी जाती हैं आलोचक उन पर चर्चा करते हैं। विधा की सशक्तता के लिए क्या कोई लघुकथा पाठक सम्मेलन भी होना चाहिए?

डॉ. दुबे : लघुकथा सम्मेलन के आयोजन, लघुकथा विधा की बढ़ोतरी तथा विद्या को आयाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लघुकथा पर सम्मेलनों के आयोजन सदैव ही लघुकथा की दशा, दिशा और सम्भावनाओं के पक्षों को उजागर करते हैं। अत: ऐसे सम्मेलनों के आयोजन चलते रहने चाहिए। जहाँ तक लघुकथा पाठक सम्मेलन की बात है उसका निदान इसी में छुपा है कि अक्सर लघुकथा सम्मेलनों में भाग लेने के अर्थ में बहुधा लघुकथा में रुचि रखने वाले पाठक भी जुड़ जाया करते हैं। असल में लघुकथा के सम्मेलनों में उपस्थित लघुकथाकार स्वयं पहले लघुकथा के पाठक होते हैं, तदन्तर लघुकथाकार।

प्रश्न १० : कई बार लघुकथा पर सतही और घटनाप्रधान होने के आरोप लगते रहे हैं, इससे कैसे बचा जाए?

डॉ. दुबे : किसी लघुकथा पर सतही होने का आरोप तब ही लग जाता है कि ऐसी लघुकथा या तो जल्दबाजी में लिखी गई है या फिर लघुकथाकार की मानसिकता में लघुकथा की रचना-प्रक्रिया की समझ पैदा नहीं हुई है। घटना के आलोढ़न यदि नहीं होंगे तो लघुकथा कभी सजीव और अर्थवान नहीं हो सकेगी। सवाल यह कि लघुकथाकार अपनी अनुभूति में वासित घटना को सार्वभौमिक रूप दे पाता है अथवा नहीं? व्यक्ति से समष्टि की ओर पहुँचना ही एक लघुकथा की विजय यात्रा है।

प्रश्न ११ : आपकी नजर में लघुकथा में ऐसा कुछ शेष है जो अब तक नहीं रचा गया?

डॉ. दुबे : वैश्विकवाद, बाजारवाद तथा उदारवाद की धारणाओं ने अन्तराष्ट्रीय स्तर पर जहाँ एक ओर दुनिया को एक गाँव बना दिया है वहाँ मनुष्य की पहचान अन्तराष्ट्रीय बना दी है। ऐसी दृष्टि में एक बड़ा 'विजन' खुल गया है। मानवीय सभ्यता कहाँ से चली है और वर्तमान में किस रूप में परिलक्षित हो रही है। इसी विकासक्रम को आज तक का साहित्य रेखांकित करता है। जब तक सृष्टि पर मानवीय हलचल है, लेखन के लिए नए-नए आयामों के परिशिष्ट खुलते मिलेंगे।

सम्पर्क : *डॉ. पुरुषोत्तम दुबे, 'शशीपुष्प', ७४ जे/ए स्कीम न. ७१, इन्दौर-

मो. : ९३२९५८१४१४

             *संतोष सुपेकर, ३१, सुदामा नगर, उज्जैन- / मो. : ९४२४८१६०९६

Thursday, 15 October, 2020

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-7 / डॉ॰ सतीशराज पुष्करणा

 

दिनांक 15-10-2020 से आगे

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-7

7वीं समापन कड़ी

 

प्रत्येक लघुकथा की भाषा एवं उसकी शैली संवादों में उसके पात्रों के परिवेश, अवस्था एवं उनके चरित्रानुसार

ही होनी चाहिए, चाहे उसमें शाब्दिक एवं व्याकरणिक दोष भी क्यों न आ जाएँ। पूरी लघुकथा में एक शब्द तक कम या अधिक नहीं होना चाहिए। फालतूपन से लघुकथा प्रायः बोझिलता का शिकार हो जाती है, अतः बचना चाहिए। कारण, इसी पफालतूपन के कारण ही ‘कालत्व दोष’ उत्पन्न होता है और कालत्व दोष लघुकथा का एक बड़ा दोष है जो लघुकथा को कहानी होने का अहसास कराने लगता है। इस दोष से युक्त मैं चितरंजन गोप की लघुकथा ‘सिन्दूर का सामर्थ्य’ उदाहरणस्वरूप रखना चाहूँगा, ताकि कालत्व दोष को समझने में सुविधा हो सके। ;पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-30द्ध

इस लघुकथा में देखें प्रथम अनुच्छेद के पश्चात् ‘दस वर्ष बाद...’ लिखा है। यानी एक छोटी-सी लघुकथा में इतना बड़ा अन्तराल? लघुकथा ऐसा अन्तराल सहन नहीं करती है। अतः ‘कालत्व दोष’ के कारण यह लघुकथा समीक्षक द्वारा खारिज कर दी जा सकती है। हाँ, कभी-कभी लघुकथा में यह दोष लघुकथाकार के कुशल सृजन से इस प्रकार आता है कि पाठक को सहज इसका अहसास तक नहीं होता, तो ऐसे प्रवाह में यह दोष प्रत्यक्ष होते हुए विलुप्त-सा प्रतीत होता है, तो ऐसी स्थिति में यह दोष, दोष न रहकर सृजनकर्त्ता का कौशल बन जाता है। ऐसी स्थिति हेतु कल्पना मिश्र की लघुकथा ‘आलू-टमाटर की सब्जी’ का उदाहरणस्वरूप अध्ययन किया जा सकता है। ;पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-30द्ध

इस लघुकथा में यों तो ‘कालत्व दोष’ दो स्थान पर आया है। ‘‘अभी बीस दिन पहले ही की तो बात है। वह रक्षाबन्धन पर आई थी।’’

‘अभी बीस दिन पहले ही की तो बात है।’ यहाँ कालत्व दोष होते हुए भी रचनाकार के कौशल से इसका सहज अहसास नहीं होता। अतः इसे ‘कालत्व दोष’ की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। पुनः इसी लघुकथा में देखें

इसके पाँच दिन बाद ही खबर मिली कि बाबूजी की हालत ठीक नहीं है, अस्पताल में हैं। वह छटपटा उठी और दूसरे दिन ही हॉस्पीटल पहुँच गई।

इसी लघुकथा में यह दुबारा ‘कालत्व दोष’—‘इसके पाँच दिन बाद ही खबर मिली...’ आया है किन्तु यहाँ भी कल्पना मिश्र के रचना-कौशल से वह अपने होने का अहसास तक नहीं होने देता। अतः यह भी कालत्व दोष में नहीं माना जाएगा।

यहीं यह भी स्पष्ट कर देना प्रासंगिक होगा कि कभी-कभी जाने-अनजाने या अज्ञानतावश ‘काल-दोषयुक्त’ लघुकथाएँ भी लघुकथाकार लिख देते हैं। यहाँ यह जान लेना जरूरी है कि ‘काल-दोष’ होता क्या है? ‘काल-दोष’ से तात्पर्य यह है कि मान लीजिए किसी ने मुगलकाल का वर्णन करती लघुकथा लिखी तो तय बात है वहाँ लघुकथा में मुगल काल की भाषा एवं संवाद उसी शैली में होंगे, न कि वर्तमान हिन्दी या अंग्रेजीयुक्त शब्दों में। इसी प्रकार यदि हमने वेश-भूषा दिखानी है तो उसी काल की दिखानी होगी, न कि कुर्त्ता-धोती या पायजामा या पिफर पैण्ट-शर्ट आदि। यदि ऐसा करते हैं तो यह ‘काल-दोष’ कहलाएगा। यों यह अच्छी बात है, अब लघुकथाओं में ‘काल-दोष’ की जैसी भूल दिखाई नहीं देती, अब लघुकथाकार इस मामले में सतर्क हैं। अब जरूरत है उन्हें ‘कालत्व दोष’ से बचने की।

समीक्षा करते समय लघुकथा में विशेष रूप से ‘शीर्षक’ पर भी गम्भीरता से ध्यान देना चाहिए। लघुकथा का शीर्षक उसके एक महत्त्वपूर्ण अंग की भाँति होना चाहिए, न कि मात्रा औपचारिकतावश। लघुकथा, लघुकथा ही होनी चाहिए, समाचार की कतरन, दृश्यग्रापफी, वक्तव्य, गद्य-काव्य, चुटकुला या कहानी में प्रवेश-सा नहीं। कथ्य प्रासंगिक एवं मानवोत्थानिक होना चाहिए। लघुकथा किसी अन्य कथा-रचना से प्रभावित नहीं है, यह देखना भी अनिवार्य है। समीक्ष्य रचना में यदि कोई प्रयोग किया गया है, तो यह देखना चाहिए कि वह कितना सार्थक/उपयोगी है और लघुकथा को समृ( करता है या नहीं? प्रयोग सदैव ऐसा होना चाहिए जो लघुकथा को लघुकथा ही रहने दे, उसे अन्य किसी विधा में प्रवेश न करा दे।

यहाँ यह बता देना भी जरूरी है कि लघुकथा को ‘लघुकथा’ यानी लघु कथा एक साथ मिलाकर लिखना चाहिए कि लघुकथा वस्तुतः अपने आपमें एक पूर्ण संज्ञा है। यों भी यह बात स्पष्ट है जब भी किसी विधा या किसी अन्य का कोई नाम होगा तो वह संज्ञा ही होगा। ‘लघुकथा’ अलग-अलग लिखते ही ‘लघु’ विशेषण हो जाएगा और ‘कथा’ संज्ञा। ऐसी  स्थिति में यह किसी विधा का नाम तो हो ही नहीं पाएगा। जैसे किसी व्यक्ति का नाम छोटेराम है। यह संज्ञा है। इसे ‘छोटे राम’ ऐसे लिखने पर छोटे विशेषण और राम संज्ञा बन जाएगा। किन्तु किसी व्यक्ति का नाम-विशेष अलग करके नहीं बोला जा सकता। अतः नाम कोई भी हो, वह संज्ञा ही कहलाएगी। संज्ञा को खण्ड-खण्ड करके एक शब्द को विशेषण और दूसरे को संज्ञा के रूप में नहीं लिखा जा सकता। अतः ‘लघुकथा’ भी चूँकि एक विधा का नाम है, अतः उसे अलग नहीं लिखा जा सकता। अतः उसे लघुकथा ही लिखा जाएगा।

लघुकथा के आकार पर चर्चा करें, इससे पूर्व यह जान लेना चाहिए, साहित्य गणित नहीं है जो सूत्रों के बल पर काम करता हो। सूत्रा रूढ़ होते हैं, उन्हें बदला नहीं जा सकता और साहित्य बदलते समय के साथ-साथ बदलता है। यही कारण है लघुकथा 1874 या 1875 ई. में कैसी लिखी जा रही थी, और उसमें क्रमशः बदलाव आते-आते आज किस रूप में हमारे समक्ष उपस्थित है। बदलाव में कथानक, शिल्प आदि सब बदलते जाते हैं। इनके बदलाव से इनके आकार में भी बदलाव आया है।

हसन मुन्शी अली, भारतेन्दु और पिफर सातवें-आठवें दशक की लघुकथाएँ अवलोकित करें और देखें, आकारगत दृष्टि से कितने छोटे आकार में थीं। मात्र कुछ पंक्तियाँ या आधा-पौन पृष्ठ तक सीमित थीं और आज इनकी सीमा डेढ़-दो पृष्ठ भी हो जाती है। अतः कथानक के अनुसार शिल्प ढलता है और शिल्प ही कथानक के अनुसार उसे सही आकार देता है। अतः अब आकार को लेकर बहस करना, अपना एवं दूसरों का समय नष्ट करना ही है।

अन्त में एक और बात जिसका समीक्षा करते समय ध्यान रखना अनिवार्य है कि सातवें-आठवें दशक की तरह अब लघुकथा में व्यंग्य भी हो तो सकता है, किन्तु अब यह लघुकथा की अनिवार्यता कतई नहीं है। लादा हुआ व्यंग्य लघुकथा को सतही बना देता है।

लघुकथा की समीक्षा करते समय कथानक/विषयवस्तु को केन्द्र मानकर चलना चाहिए। मेरे विचार से इन बातों को ध्यान में रखकर किसी भी लघुकथा की समीक्षा/मूल्यांकन एवं उसके प्रति न्याय आसानी से कर सकते हैं।

सम्पर्क : अध्यक्ष, अ. भा. प्रगतिशील लघुकथा मंच,

‘लघुकथानगर’, महेन्द्रू, पटना-800 006 ;बिहारद्ध

मो.ः 082984 43663, 090064 29311

म.उंपसरू ेंजपेतंरचनेांतंदं/हउंपसण्बवउ

सन्दर्भ

1. डॉ. सतीशराज पुष्करणा (सं.), लघुकथा : बहस के चौराहे पर

2. डॉ. सतीशराज पुष्करणा (सं.), लघुकथा : सर्जना एवं समीक्षा

3. मधुदीप (सं.), हिन्दी की कालजयी लघुकथाएँ

4. डॉ. सतीशराज पुष्करणा (सं.), हिन्दी लघुकथा : संरचना और मूल्यांकन

5. डॉ. सतीशराज पुष्करणा (सं.), तत्पश्चात्

6. योगेन्द्रप्रताप सिंह, हिन्दी आलोचना : इतिहास और सि(ान्त

7. मधुदीप (सं.), पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-20

8. प्रो. (डॉ.) रामदेव प्रसाद, हिन्दी व्याकरण-चिन्तन  

9. डॉ. नगेन्द्र, नई समीक्षा : नए सन्दर्भ

10. धीरेन्द्र वर्मा (प्रधान संपादक),  हिन्दी साहित्य कोश, भाग-1

11. बलराम अग्रवाल (सं.); पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-2

12. मधुदीप (सं.), पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-1, 3, 22, 25, 27, 28, 30

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-6 / डॉ॰ सतीशराज पुष्करणा

 दिनांक 14-10-2020 से आगे

लघुकथा की संरचना एवं समीक्षा-बिन्दु-6

छठी कड़ी

2. वैचारिक समीक्षा

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस प्रकार की समीक्षाओं में समीक्षक प्रायः उस विचारधाराको आधार बनाकर समीक्ष्य लघुकथा को अपने निकष पर कसता है, जिस विचारधारा के प्रति वह प्रतिब( होता है। अपनी-अपनी प्रतिब(ताओं को ध्यान में रखकर कोई भी समीक्षक प्रभाववादी, तुलनात्मक, निर्णयात्मक, ऐतिहासिक, व्याख्यात्मक, चरितात्मक, मनोवैज्ञानिक, प्रगतिवादी, सौन्दर्यवादी, रूपवादी, पाठकीय इत्यादि अपनी-अपनी प्रतिब(ता के अनुसार ही समीक्षाएँ लिखता है।

;पद्ध प्रभाववादी समीक्षाइस प्रकार की समीक्षा में समीक्षक लघुकथा अथवा कृति से जुड़ी अपनी वैचारिक प्रतिब(ता को अभिव्यक्ति प्रदान करता है।

;पपद्ध तुलनात्मक समीक्षाइस प्रकार की समीक्षा का आयाम बड़ा विस्तृत है। एक पंक्ति की लघुकथा से लेकर डेढ़-दो पृष्ठों की लघुकथा तक उसकी तुलना किसी बड़ी कृति से विचारधारा अथवा रचना-कौशल के स्तर पर की जा सकती है।

;पपपद्ध निर्णयात्मक समीक्षाइस प्रकार की लघुकथा-समीक्षा में लघुकथा के समस्त गुण-दोषों को निरूपित करते हुए उसका महत्त्व निर्धारित करना होता है, हालाँकि यह समीक्षा-प्रकार परम्परागत है।

;पअद्ध ऐतिहासिक समीक्षायह सर्वमान्य है, प्रत्येक श्रेष्ठ लघुकथा अपने समय का सच होती है। कोई भी लघुकथा देश-काल से निरपेक्ष नहीं होती। अतः ऐतिहासिक से वर्ग एवं परिवेश, समाज-रचना के प्रचलित मूल्य-संस्कार तथा युग-विशेष के आयामों से कृति लघुकथा को बाहर रखना सम्भव नहीं है।

;अद्ध व्याख्यात्मक समीक्षाआचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, ‘‘व्याख्यात्मक समीक्षा किसी पुस्तक में आई हुई बातों को एक व्यवस्थित रूप में सामने रखकर इनका अनेक प्रकार से स्पष्टीकरण करती है। यह मूल्य-निर्धारित करने नहीं जाती है। योगेन्द्रप्रताप सिंह के अनुसार, ‘‘रचना में सन्निहित सर्वनात्मक तत्त्व एवं सामाजिक मूल्य तथा उनको व्यवस्थित अर्थात् क्रमब( तथा तार्किक रूप से प्रस्तुत करके विश्लेषण करना इस प(ति का मुख्य धर्म है।’’

;अपद्ध चरित्रात्मक समीक्षाकिसी लघुकथा की व्याख्या के साथ सर्जक के परिवेश, देश-काल एवं संस्कारों की छानबीन के साथ उसके कर्तृव्व का विश्लेषण ही चरित्रात्मक समीक्षा है।

;अपपद्ध मनोवैज्ञानिक समीक्षायह सर्वमान्य है कि कोई भी लघुकथा लघुकथाकार के मन में उपजी उसकी अवधारणाओं की विशेष अभिव्यक्ति है। यह रचनाकार की मन में उपजी अवधारणा है कि लघुकथा में वर्णित स्वरूप को विषयवस्तु या कथानक के अनुकूल कौन-सा शिल्प प्रदान कर दे। इस सन्दर्भ में मनोवैज्ञानिक समीक्षा रचनाकार की मानसिक समझ एवं रुझान के उन सन्दर्भों की खोज करने हेतु प्रतिब( होती हैजो सृजन के सापेक्ष्य में अपने प्रभाव से उसकी सम्पूर्णता को अपने अनुकूल परिवर्तित करती है। यही मनोवैज्ञानिक समीक्षा है।

;अपपपद्ध प्रगतिवादी समीक्षाकार्ल मार्क्स के भौतिक द्वन्द्ववाद के प्रचार के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्रा में प्रगतिवादी विचारधारा का प्रवेश हुआ और इस विचारधारा के समीक्षक इस प्रगतिवादी समीक्षा को साहित्य के विवेचन के आधार के रूप में स्वीकृति प्रदान करते हैं। यही स्थिति लघुकथा विधा में भी है। इसी को मार्क्सवादी अथवा सामाजिक यथार्थवादी समीक्षा-प(ति भी कहते हैं। तात्पर्य यह है कि मार्क्स के भौतिक द्वन्द्व को निकष मानकर जब किसी लघुकथा की समीक्षा की जाती है तो वह प्रगतिवादी समीक्षा कहलाती है।

;पगद्ध सौन्दर्यवादी समीक्षासटीक शिल्प द्वारा प्रदत्त सौन्दर्य से सजी लघुकथा की कलात्मक अभिव्यक्ति किसी भी पाठक को सहज ही आकर्षित करती है। इस आकर्षण के मूल में सौन्दर्यमूलक सर्जन के उपादान लघुकथा के अनिवार्य धर्म हैं-और उनकी व्याख्या तथा विश्लेषण करना आलोचक का मुख्य कार्य है। इस प्रकार की गई समीक्षा सौन्दर्यवादी समीक्षा कहलाती है।

;गद्ध रूपवादी समीक्षाइस प्रकार की समीक्षा में कोई भी लघुकथा अपने स्वरूप में पहचानी जाती है। इसके स्वरूप की पहचान हेतु उसकी भाषा-शैली, बिम्ब, प्रतीक, रूपक-विधान, मिथकीय सन्दर्भ आदि ऐसे कारक हैं, जो उसके सर्जनात्मक कलेवर का विधान करते हैं, ऐसे कारकों की उपस्थिति का विवेचन ही रूपवादी समीक्षा कहलाती है।

;गपद्ध पाठकीय समीक्षाअनेक विद्वानों का मत है कि कोई रचना भाषा के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति प्राप्त करती है। अतः भाषा के सर्जनात्मक सामर्थ्य की पहचान एवं विश्लेषण ही पाठकीय समीक्षा है। योगेन्द्रप्रताप सिंह के कथनानुसार—‘‘पाठकीय समीक्षा रूपवादी समीक्षा की अन्तिम परिणति है।’’

उपर्युक्त वर्णित सभी ग्यारहों प्रकार भीतर से आपस में जुड़े हैं। लघुकथा की समीक्षा करते समय यदि इन सभी प्रकारों का ध्यान रखा जाए तो किसी भी लघुकथा के साथ समीक्षक पूरा-पूरा एवं सही न्याय कर सकता है। यह सही है प्रत्येक समीक्षक की दृष्टि एवं विचारधारा भिन्न होती है। हो सकती है, किन्तु पिफर भी साहित्य का मूल एवं उद्देश्य तो एक ही रहता है, वह कभी नहीं बदलता है। अतः विचारधारा भिन्न होने के बावजूद तटस्थ समीक्षा किसी भी लघुकथा के साथ न्याय कर सकती है।

सार-संक्षेप में किसी भी लघुकथा की समीक्षा करते समय रचना को प्रथमतः एक पाठक की तरह पढ़ना चाहिए, तत्पश्चात् उसे अनेक बार समीक्षक की दृष्टि से पूरी लघुकथा को पूरी गहराई तक समझकर लेखकीय उद्देश्य तक पहुँचने का प्रयास करना चाहिए, तब यह देखना चाहिए वह लघुकथा समीक्षक को कहाँ तक प्रभावित करती है या कितनी हृदयस्पर्शी यानी संवेदनायुक्त है? इसके पश्चात् उसमें मानवोत्थानिक किन्तु नकारात्मकता रहित सन्देश की तलाश करते हुए उसके शिल्प  को परखना चाहिए कि वह उस लघुकथा के अनुकूल है या नहीं? कारण, अधिकांश लघुकथाएँ प्रतिकूल शिल्प के कारण ही अपना प्रभाव खो देती हैं। ‘कथ्य’ और ‘कथानक’ के अनुसार आकार को भी देखना चाहिए, कारण, आकारगत लघुता और क्षिप्रता किसी भी श्रेष्ठ लघुकथा की बड़ी विशेषताएँ हैं। लघुकथा में जो कहा गया है वह पाठकों तक सम्प्रेषणीय होना अनिवार्य है किन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि पाठक लेखक की पहुँच तक नहीं पहुँच पाता है और उसे ‘दुरूह’ लघुकथा  समझकर नकार देता है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा होगा तो जयशंकर ‘प्रसाद’ की अनेक लघुकथाएँ नकार दी जाएँगी, जबकि वे उत्कृष्ट लघुकथाएँ हैं। ऐसी स्थिति में पाठक को ऐसी दुरूह रचना को बार-बार पढ़कर उस रचना के मर्म तक पहुँचने का पूरा-पूरा प्रयास करना चाहिए। पाठक को अपनी कमी का अहसास करते हुए यह भी सोचना चाहिए कि लघुकथाकार सदैव पाठकों के लिए ही नहीं लिखता, कुछ वह अपनी पसन्द की पहचान भी पाठकों को अति विनम्रता से करवाना चाहता है और पाठकों को भी अपनी कमी का अहसास करते हुए अपनी अध्ययनशीलता को क्रमशः बढ़ाना चाहिए।

                                                शेष आगामी अंक में…………