Wednesday, 23 September, 2020

लघुकथा के समीक्षा-बिन्दु-3 / डॉ॰ पुरुषोत्तम दुबे

 दिनांक 23-9-2020 से आगे

आलोचना-दृष्टि में परम्पराबोध बुनियादी मूल्य

तीसरी कड़ी

कहा जाता रहा है कि  ‘आलोचना परम्परा का रूढ़ अर्थों में अनुगमन करते हुए विकसित होती रही है।’ पारम्परिक रूप में आलोचना शब्द का अभिप्राय किसी रचना में दोष अथवा कमियाँ निकालना है। आलोचना का एकमेव अर्थ यह है कि अपनी रचना के माध्यम से रचनाकार क्या कहना चाहता है। हिन्दी साहित्यकोश
(खण्ड 1-ए. पृ. 122) में कहा गया है कि ‘आलोचना स्वस्थ मन से साहित्य या कला का अध्ययन करना और उसके सौन्दर्य को परखना सिखाती है।’ यही उसका परम कर्तव्य है। इसी तरह आलोचना के सन्दर्भ में मानविकी पारिभाषिकी कोश, साहित्य खण्ड, पृ. 65 पर डॉ. नगेन्द्र की यह टिप्पणी दर्ज है कि ‘आलोचना के माध्यम से हम यह देखने का प्रयास करते हैं कि जो मूल्य रचनाकार ने रचना में मूर्तिमान किए हैं, उनका मानव जगत के साथ क्या सम्बन्ध है अथवा लोक-चेतना के सन्दर्भ में किसी भी कृति की चेतना का क्या मूल्य है।
 

आलोचना : काल-महाकालदर्शी

एक लघुकथा अपनी रचनात्मकता में उस घटना का अनुप्रवेश अवश्य कराती है जिस घटना से आहत अथवा संश्लिष्ट होकर लघुकथाकार ने लघुकथा को जन्म

दिया है। यानी घटना लघुकथा का वह ‘एंगल’ है जिससे लघुकथा की रचनात्मकता निःसृत होती है।

लघुकथा के कथ्य में जब किसी घटना का अभिलेखन होता है तब लघुकथा में देश-काल की उपस्थिति स्वयमेव दर्ज होती मिलती है। यानी लघुकथा में Time Spirit की साँस आती-जाती अनुभव होती है। लघुकथा में देश-काल की उपस्थिति ही एक लघुकथा को ऐतिहासिकता के साथ जोड़ती है। यही कारण है कि लघुकथा के समीक्षक के पास लघुकथा की समीक्षा साधने में ऐतिहासिक दृष्टि का होना परम आवश्यक है। जिस समय अथवा काल से अभिप्रेरित होकर कोई लघुकथा जन्म लेती है, उस लघुकथा के रचना-सन्दर्भ को समझने के लिए समीक्षक को भी लघुकथा की निर्मिति अथवा संरचना के पार्श्व में झाँकने की अन्वेषी दृष्टि स्वयं में पैदा करनी होगी। क्योंकि ‘साहित्य में अभिव्यक्त समय-सत्य का महत्त्व तो है ही, पर समय-सत्य को हासिल करने के लिए किया गया रचनाकार का संघर्ष भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होता।’ (भास्कर न्यूज नेटवर्क, नवम्बर 16, 2017, 03.00 am IST) यही वह बात है जो किसी रचना की आलोचना को भी काल अथवा महाकालदर्शी आलोचना घोषित करती है।

आलोचक को तटस्थ भाव से प्रचार करना चाहिए

तटस्थ यानी उदासीन। तटस्थता यानी उदासीनता; नवलेखन में प्रचलित वह स्थिति जिसमें साहित्यकार किसी मतवाद या दबाव को स्वीकार न करे। अर्थात् जिस विचारोन्मुक्तता के साथ कोई लघुकथाकार साहसपूर्वक या बिना किसी भय के सामाजिक बदलाव के पक्ष में अपनी लघुकथा का संरचनात्मक प्रारूप तैयार करता है; और लघुकथा के कथानक के रूप में अपने कथ्य को यथार्थ की जमीन पर उतारकर उसमें सामाजिक, भदेस की पारदर्शिता को जिलाता हैऋ ऐसी लघुकथा की आलोचना करने में आलोचक को भी लघुकथा की आलोचना करने में अपनी तटस्थता व्यक्त करनी चाहिए। तात्पर्य यह कि लघुकथाकार ने अभिव्यक्ति के तमाम खतरे उठाते हुए जिस लघुकथा को जन्म दिया है, ऐसी लघुकथा की समीक्षा में समीक्षक को आलोच्य लघुकथा के कथ्य को स्पष्ट करने में किसी तीसरे रास्ते को अख्तियार करने की तुलना में लघुकथाकार की दृष्टि को प्रमुखता देनी चाहिए जिससे रचना और आलोचना में वैचारिक एकरसता दिखाई पड़े।

एक समीक्षक आलोच्य रचना के पक्ष में जितना तटस्थ होगा उसके द्वारा रचना (लघुकथा) की समीक्षा साहित्य की हितकारी ही सिद्ध होगी। समीक्षा करने के दरम्यान यदि समीक्षक आलोच्य कृति या आलोच्य कृति के कृतिकार से कोई पूर्वाग्रह बनाकर नहीं चलेगा, तो ऐसे में रचना का कथ्य आलोचना के माध्यम से और परिष्कृत होगा तथा समाज के लिए प्रभावशील होकर समाज में अनुकूल परिवर्तन पैदा करने में समर्थ दिखाई पड़ेगा। तात्पर्य यह कि लघुकथा की समीक्षा एक तरपफ और लघुकथा का लघुकथाकार एक तरपफ। दोनों को साथ लेकर समीक्षा का वह रूप कदापि सामने नहीं आ सकेगा, जिस रूप की वजह से समीक्षा पारदर्शी और समीक्षकीय सच्चाई के समीप दृष्टिगोचर होगी।

वर्तमान में लघुकथा की समीक्षा के क्षेत्रा में अधिकतर कार्य ऐसा ही हो रहा है कि रचनाकार और समीक्षक में दोस्ताना अधिकतया देखने में आ रहा है। फलस्वरूप रचना और समीक्षा दोनों की कसौटी भोथरा रही है। कहने का अर्थ यह कि चेहरा देखकर समीक्षा करने की रवायत निकल पड़ी है, जिससे सबसे बड़ा नुकसान समीक्षा पद्धति का तो हो ही रहा है, उससे बड़ा नुकसान रचनाशीलता का भी हो रहा है।

एक तटस्थ समीक्षक समीक्षा का भी भला करता है और रचनाशीलता के मापदण्ड भी निर्मित करता है।

आलोचना : आलोचक की मानसिक प्रतिक्रिया का परिणाम

हाल के दशकों में लघुकथा-लेखन का जितना शोर सुनने में आ रहा है, यह बड़े गजब का शोर है। इसका एक बड़ा कारण है लघुकथा के पक्ष में एक उम्दा और सर्वमान्य समीक्षा के दस्तावेज की कमी। जब लघुकथा के लेखकों के सम्मुख अधिमान्य समीक्षा का दर्पण ही नहीं है, तो भला सार्थक संरचनात्मकता की दृष्टि से कोई श्रेष्ठ लघुकथा फलक पर कैसे अवतरित होगी।

आलोचना रचना पर बौद्धिक कवायद का प्रतिफलन है। लघुकथा अपने आकार में छोटी होती है इसीलिए वह लघुकथा है। लघुकथा में सांकेतिकता नहीं प्रत्युत् सम्पूर्ण लघुकथा सांकेतिकता के आश्रय से लिखी जाती है। अतएव घोर सांकेतिकता के बल पर विरचित लघुकथा रचनाकार के हृदय-पक्ष से निःसृत न होकर लघुकथाकार के मस्तिष्क-पक्ष से प्रस्फुटित होती है। अतएव मस्तिष्क की बदौलत प्रौढ़ विचारों से जन्मी लघुकथा पर वह समीक्षक अपनी समीक्षा का हाथ फेर सकता है जो अपने बुद्धि-कौशल्य से आलोच्य लघुकथा में व्याप्त कथ्यगत जटिलता को रेखांकित कर उस लघुकथा में गुप्त और लुप्त तथ्यों को सहृदय सामाजिकों की समझ में उतार सके।

एक सन्तुलित और सांकेतिक तत्त्वों से संश्लिष्ट लघुकथा रचने में लघुकथाकार का कितना परिश्रम खर्च हुआ है, साथ ही लघुकथा में घटना की उपस्थिति को भाषा और शिल्प के कौन-से वस्त्रों को पहनाकर उसने अपनी लघुकथा में किस अभिप्राय को मूर्त रूप दिया है; लघुकथाकार की लघुकथा में निहित ऐसे विचार तत्त्वों का अनसुन्धान करने में समीक्षक के पास सजग मानसिकता की प्रभविष्णुता होनी चाहिए, जिसके बल पर समीक्षक मानो लघुकथा की उड़ती चिड़िया को भाँप सकता है।

 लघुकथा का सिद्धहस्त समीक्षक बनने में पहली पायदान होती है लघुकथाओं की आमद को बटोरना, लघुकथा के विकास-क्रम से पहचान बढ़ाना और समकालीनता में दृष्टि-सम्पन्नता के साथ झाँकना। इन तीन महत्त्वपूर्ण कारकों की परिलब्धियों से लघुकथा विषय पर चर्चा करने जैसी वैचारिक सक्रियता उत्पन्न होगी, जो लघुकथा के समीक्षक को इतना सहज बना देगी कि वह समीक्षा के लिए सम्मुख आई लघुकथा पर बेबाकी के साथ अपनी वैचारिक टिप्पणी प्रस्तुत कर सकेगा।

                                                                       शेष आगामी अंक में…

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