Thursday, 17 September, 2020

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में…5 / डॉ॰ उमेश महादोषी

दिनांक 17-9-2020 से आगे

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में आत्मिक और दैहिक अस्तित्व का तात्विक विवेचन

पाँचवीं कड़ी

05. विधागत स्वभाव

प्रत्येक विधा का एक (विधागत) स्वभाव होता है, जो उसके रूपाकार और परिणामी प्रभाव को निर्धारित करता है। विशेषतः लघ्वाकारीय विधाओं का स्वभाव एक बड़ी सीमा तक अनुभूति की प्रकृति (तीक्ष्णता) और अभिव्यक्ति व सम्प्रेषण की गति (त्वरित) के संयुक्त प्रभाव से निर्धारित होता है और अन्ततः उस विधा के लघ्वाकार, अर्थ-व्यापकता जैसी विशेषताओं का कारण बनता है। क्षणिका की तरह लघुकथा के लघ्वाकार के बारे में भी ‘समय की कमी’ जैसे जुमले को उछाला जाता रहा है। इस बात को न तो क्षणिका के सन्दर्भ में स्वीकार किया जा सकता है और न ही लघुकथा के सन्दर्भ में। वास्तविकता यह है कि लघुकथा का (और क्षणिका का भी) लघ्वाकार किसी भौतिक प्रयास अथवा आवश्यकता का परिणाम नहीं, उसके स्वभाव से जनित और पूर्णतः स्वाभाविक है। सूक्ष्म रचनात्मक तथ्य की पूर्ण अनुभूति की तीक्ष्णता सदैव अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण की त्वरित गति (सतत रूप से गुणित होने वाली) की माँग करती है। यदि रचनाकार की सृजन-क्षमता और हृदयस्थ ऊर्जा का प्रवाह इसके अनुरूप है तो इसका परिणाम रचना के लघ्वाकार के रूप में ही सामने आयेगा। क्षणिका के विपरीत लघुकथा का रूपाकार कुछ बड़ा इसलिए होता है कि यहाँ भाव-विचार का वाहक रूप कथा होती है, जिसके कई दूसरे तत्व भी होते हैं। फिर भी मुझे लगता है कि लघुकथा में हम जिस ‘कथ्य’ नामक प्रमुख तत्व की बात करते हैं, वह क्षणिका के समकक्ष ही होता है। ‘कथ्य’ की शक्ति भी काव्यात्मक होती है, इसीलिए उसका अस्तित्वतीव्र प्रवाह’ के रूप में होता है, जो कभी शाब्दिक अभिव्यक्ति पा जाता है तो कभी लघुकथा के समापन तक पहुँचते-पहुँचते अप्रकट भाव की तरह सम्प्रेषित हो जाता है। 

     जब लघुकथाकार से अपेक्षा की जाती है कि वह किसी कहानी के सार-संक्षेप की तरह लघुकथा को प्रस्तुत न करे तो इसका यही अर्थ है कि वह समस्यात्मक स्थिति से ग्रहीत अनुभूति की तीक्ष्णता को उसकी सम्पूर्णता में अनुभूत करे और उसे परिपक्वता तक पहुँचने दे।  

      एक बात और। लघुकथा का विधागत स्वभाव शिल्प में भी कुछ विशेष अपेक्षा करता है। यह अपेक्षा होती है ‘आवश्यक का स्वीकार, अनावश्यक का अस्वीकार।’ लघुकथा का सम्प्रेष्य कथ्य और पूरा सौन्दर्य उसके स्वभाव और ‘स्वीकार्य आवश्यक’ से ऊर्जा ग्रहण करता है। एक तरह से स्वाभाविक और स्वभावगत अभिव्यक्ति ही लघुकथा के यथार्थ और मर्म की वास्तविक वाहक है। इसके परीक्षण के बिना लघुकथा की समीक्षा अपूर्ण ही होगी और उसका आकार अनपेक्षित होगा।

 06. रचनागत और रचनात्मक चिंतन की पड़ताल

      देखे, सुने और जाने की प्रस्तुति तब तक साहित्यिक नहीं होती, जब तक उसे समझ न लिया जाये। यह जो ‘समझना’ तत्व है, यह चिंतन और विमर्श को निमंत्रण देता है और उचित-अनुचित के निर्धारण को तय करता है। चिंतन में दार्शनिकता और रचनात्मकता- दोनों तत्व शामिल होते है। दार्शनिकता का सैद्धान्तिक महत्व होता है और रचनात्मकता का व्यावहारिक। विमर्श दोनों के परीक्षण के साथ उनके मध्य समन्वय का रास्ता भी दिखाता है। विमर्श एकाधिक लोगों के मध्य होने वाली भौतिक चर्चा ही नहीं होती है, अपितु चिंतनशील व्यक्ति (लेखक) के अन्दर होने वाले अन्तर्द्वन्द्व के रूप में भी विमर्श की प्रक्रिया चलती है। एक सजग रचनाकार अपने अन्तर्मन में चीजों को अपनी दृष्टि के साथ दूसरों की दृष्टि से भी देखता-परखता है, उनमें तुलना करता है, बहस करता है। बहुत बार वह विभिन्न भौतिक रूपों में दूसरों के विचार जानने का प्रयास भी करता है। तब कहीं अपनी बात (रचना) को अंतिम रूप देता है। समीक्षक के लिए यह देखना जरूरी है कि रचनाकार ने ‘देखे, सुने और जाने’ को ‘समझने’ की प्रक्रिया से कितना (और किस तरह) गुजरने दिया है। अनेक ऐसे लघुकथा संग्रह और संकलन प्रकाश में आते रहे हैं, जिनमें 5-10 प्रतिशत रचनाएँ भी वास्तव में लघुकथा नहीं होतीं, तो इसका कारण यही है कि उनमें से बहुसंख्यक रचनाओं में ‘देखे, सुने और जाने’ को लिखा गया है, उसे ‘समझने’ का प्रयास नहीं हुआ है।

      चूँकि सृजनात्मक रचनाएँ (लघुकथा भी) व्यावहारिक सत्य के अधिक निकट होती है, इसलिए यहाँ रचनात्मक चिंतन का महत्व सापेक्षिक रूप से अधिक होता है। दार्शनिकता तथ्यों के सही-गलत और उचित-अनुचित की पड़ताल करती है जबकि रचनात्मकता पाठक के सन्दर्भ में सृजन को ग्राह्यता और स्वीकार्यता, दोनों के निकट ले जाती है। लघुकथा में रचनागत और रचनात्मक चिंतन का अभाव प्रायः उसे दृश्य यथार्थ की रिपोर्टिंग तक सीमित कर देता है।

      एक घटना को देखने वाले सामान्य दर्शक, मीडिया रिपोर्टर और राजनेता- सभी अपनी-अपनी तरह से देखते हैं। घटना के सम्बन्ध में इन सबकी अपनी-अपनी दृष्टि होती है। उनकी प्रतिक्रिया भी अपने-अपने दृष्टिकोंण तक सीमित होती है। लेकिन एक साहित्यकार/लघुकथाकार को सामान्य दर्शक, मीडिया रिपोर्टर और राजनेता- सभी से अलग भूमिका का निर्वाह करना होता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि मानवीय और सामाजिक सन्दर्भ में वह घटना को समदृष्टा की तरह देखे, संवेदनात्मक यथार्थ सत्य की तरह समझे और मनुष्यता और सामाजिकता के हित में रचनात्मक सृजन करे। विशेष उद्देश्यों के साथ नियोजित और संगठित विचारधाराओं को पुष्ट करने वाली दृष्टि प्रायः रचनात्मक सृजन में सफल नहीं हो पाती है। क्योंकि तब रचनाकार अपने रचनात्मक दायित्व का नहीं, संगठनात्मक दायित्व का निर्वाह (यहाँ तक कि संगठन के निर्देशों का पालन) कर रहा होता है। रचनात्मक सृजन के लिए विचारधारा के स्तर पर रचनाकार का स्वतंत्र और पूर्वाग्रह से रहित होना आवश्यक है। 

      समीक्षा के स्तर पर इस तथ्य के साथ लेखन के उद्देश्य को उसके वास्तविक मूल में समझने का प्रयास होना चाहिए। अभिव्यक्तिगत तथ्यों एवं निष्कर्षों को अपने विश्वास वाली विचारधारा को जबरन सम्पुष्ट करने वाले अस्त्र की तरह उपयोग करने से समीक्षक को भी बचना चाहिए। 

     इस प्रकार लघुकथा-सृजन की प्रेरणाओं, परिवेश की सानुरूपता, समकालीन प्रवृत्ति, सामाजिक दायित्वबद्धता, सामयिक परिवर्तनों को आत्मसात करने की क्षमता एवं अनुकूलता, विधागत कसौटी और रचनात्मक चिंतन की उपस्थिति के संयुक्त प्रभाव समकालीन लघुकथा को परिपक्व रचना के रूप में स्थापित करते हैं। इसलिए इन बिन्दुओं के आधार पर समकालीन लघुकथा की पड़ताल आवश्यक हो जाती है। यद्यपि कई विद्वान इनमें से कई तत्वों का ऐतिहासिकता के सन्दर्भो में भी परीक्षण करने एवं परम्पराओं को खोजने और रेखांकित करने पर भी जोर देते हैं। इसके लिए वे प्रायः बहुत पीछे तक चले जाते हैं। मुझे लगता है इस कार्य में ऊर्जा का आवश्यकता से अधिक और अनपेक्षित व्यय हो रहा है। इससे कोई बड़ी उपलब्धि हासिल होने वाली नहीं है। लघुकथा समकालीन परिस्थितियों और उनसे जनित समस्याओं एवं संवेदनात्मक अनुभूतियों को रेखांकित करने के लिए जन्मी है। लघुकथा के सन्दर्भ में ऐतिहासिकता और परम्परा से अधिक समकालीनता को समझने की आवश्यकता है। यदि तलाशना है तो समकालीनता के सूत्रों को तलाशिए। महान कहानीकारों/उपन्यासकारों के बस्ते टटोलने की बजाय समकालीनता के सन्दर्भ में अपने समय की लघुकथा को समझना ही हमारे लिए वास्तविक महत्व का कार्य होगा। समकालीन लघुकथा की संपूर्ण उर्वरता यहीं मिलेगी। जो रचनाएँ लघुकथा नहीं हैं, उन्हें किसी की महानता या वरिष्ठता का सम्मान या उनके नाम का उपयोग करने के लिए जबरन लघुकथा बनाने की प्रवृत्ति का मैं समर्थन नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए मंटो की ‘सियाह हाशिये’ की सभी रचनाएँ लघुकथा नहीं हैं। उसमें शामिल अनेक रचनाओं को प्रभावी टिप्पणी तो माना जा सकता है, लघुकथा नहीं। 

                                                                        शेष आगामी अंक में जारी…

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