Sunday, 13 September, 2020

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में…2 / डॉ॰ उमेश महादोषी

दिनांक 13-9-2020 से आगे

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में आत्मिक और दैहिक अस्तित्व का तात्विक विवेचन

दूसरी कड़ी

01. सृजन का प्रेरक परिवेश और रचना का सम्बन्ध

जिस वातावरण में हम रहते हैं, वह जैविक, विशेषतः मानवीय दृष्टि से अनेक घटनाओं, दृश्यों, क्रिया-प्रतिक्रियाओं, आवश्यकताओं-पूर्तियों तथा इन सबके मध्य के विचलनों और विसंगतियों से परिपूर्ण है। इन तमाम घटनाओं, दृश्यों, क्रिया-प्रतिक्रियाओं, आवश्यकताओं-पूर्तियों के साथ उनसे जुड़े विचलनों और विसंगतियों की प्रतिध्वनियाँ वातावरण में गूँजती है और मनुष्य को अनुभूति के स्तर पर तरह-तरह से प्रभावित करती हैं। यही वातावरण रचनात्मकता का प्रेरक होता है, जहाँ से रचना का सृजन आरम्भ होता है। समय के साथ इन प्रतिध्वनियों के रूप-स्वरूप और प्रभाव में अन्तर हो सकता है क्योंकि मनुष्य की आवश्यकताएँ और उनकी पूर्ति के लिए संसाधनों की उपलब्धता व प्रकृति अन्ततः रचनात्मक वातावरण के पूरे परिदृश्य को प्रभावित करती है और ये चीजें समय के साथ परिवर्तनशील होती हैं। यह अन्तर रचना-सृजन की प्रेरणाओं और परिणामों को प्रभावित करता है और सृजनात्मक कालान्तर के दृश्य स्थापित करता है।

      यहाँ दो प्रमुख बातें निकलकर आती हैं- प्रत्येक रचना-सृजन के पीछे कोई न कोई प्रेरक कारण और उसका एक स्वाभाविक उद्देश्य होता है। दूसरी बात, समय के साथ एक प्रक्रिया के रूप में सृजन के कारण और उद्देश्य परिवर्तित/परिवर्द्धित होते हैं। ऐसे में किसी भी रचना को समझने में उसकी काल और परिस्थिति सापेक्षता का प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। अक्सर हम समीक्षा के बदलते मापदण्डों की चर्चा करते हैं, वास्तविकता यह है कि समीक्षा के मापदण्ड उस तरह नहीं बदलते, बदलती है रचनात्मकता और उसका सृजन। यहीं पर यह बात उठती है कि ‘सम्यक दृष्टि’ के सन्दर्भ में समीक्षक अपने विवेक और रचनात्मक तत्वों की निजी मान्यता तक सीमित रहकर बदली हुई रचनात्मकता और उसके सृजन को नहीं समझ सकता। उसे रचना के सृजन-सन्दर्भों से जुड़े समग्र कारणों और परिणामों तक जाना ही पड़ेगा! यह पूरी तरह वास्तविकता के निकट जाने और चिंतन के स्थितिसापेक्ष परिवर्द्धन को समझने का मामला है। इसीलिए समीक्षा द्वितीय पायदान पर खड़ी होकर भी प्राथमिक अभिव्यक्ति का आकलन करती है। बदलते परिवेश के अनुरूप रचनात्मकता सृजन में कितना ढल पाई है और किस तरह से प्रतिबिम्बित हो पाई है, इसके आकलन की आवश्यकता ही ‘‘किसी रचना की समीक्षा क्यों?’’ का वास्तविक उत्तर हो सकती है। 

      लघुकथाकार (लेखक) जिस परिवेशगत स्थिति से सृजन के लिए प्रेरित होता है, उसे और उसके समग्र परिवेश को किस तरह समझता है और उसका सृजनपूर्व विश्लेषण करता है, लघुकथा (रचना) की पूरी बुनियाद उसी पर रखी होती है। समीक्षा में इस स्थिति को परखना आवश्यक है। मुझे लगता है कि समीक्षक को लेखक के यात्रा-पथ को समझना और उसके समान्तर यात्रा करनी चाहिए।

      इस सन्दर्भ में एक और बात की चर्चा आवश्यक है, लेखन और लेखकीय निष्कर्ष परिस्थिति सापेक्ष भी होते हैं। अलग-अलग परिस्थितियों में समान सन्दर्भ में अलग-अलग निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी को भिक्षा देना एक परिस्थिति में ठीक हो सकता है, दूसरी परिस्थिति में गलत। यहाँ रचनागत परिस्थिति को समझना भी समीक्षक का दायित्व है।

 02. समकालीनता के सन्दर्भ में

      साहित्य में समकालीनता कालखण्ड विशेष की प्रवृत्तियों के साथ उस कालखण्ड के सृजन और उसकी रचनात्मकता को उनकी सम्पूर्णता में सम्बद्ध करने की प्रक्रिया है। इसमें परिवर्तनों का निरंतर प्रवाह समाहित हो भी सकता है और नहीं भी लेकिन भाव प्रवाह और प्रतिबद्धता- दोनों किसी न किसी स्तर पर शामिल होते हैं। यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो यह सापे़िक्षक प्रक्रिया है, इसलिए एक ही कालखण्ड में सृजनरत दो अलग-अलग रचनाकारों का समकालीन होना आवश्यक नहीं। जहाँ तक मापक इकाईयों (वर्षों या महीनांे) के सन्दर्भ में कालखण्ड की सीमा-निर्धारण का प्रश्न है, इसे समस्तरीय प्रवृत्तियों के साथ जोड़कर देखना होगा, न कि मापक इकाईयों (वर्षों या महीनांे) के सन्दर्भ में। जितने कालखण्ड में समस्तरीय जीवन-प्रवृत्तियाँ देखने को मिलती हैं, वह एक समकाल का कालखण्ड होता है। समकालीनता सामयिकता से अलग प्रक्रिया है। सामयिकता छोटे-छोटे समयान्तरों में घटने वाली घटनाओं और परिवर्तनों से जुड़ी प्रक्रिया है और एक छोटा परिदृश्य प्रस्तुत करती है। जबकि समकालीनता सामान्य जीवन में पैठ बना चुके या बनाने योग्य परिवर्तनों से जुड़ी प्रक्रिया है और वृहद परिदृश्य प्रस्तुत करती है। सामयिक परिवर्तन समकालीनता के परिदृश्य में आते-जाते रहते हैं। अनेक सामयिक परिवर्तन ऐसे हो सकते हैं जो किसी समकाल की प्रवृत्तियों में शामिल न हो पायें। समकाल में सामयिक परिवर्तनों के परिवर्द्धन की प्रक्रिया भी शामिल होती है, जिसके कारण बहुत सारे परिवर्तन अन्ततः भिन्न रूपों में समकाल की प्रवृत्तियों का हिस्सा बनते हैं। प्रायः बड़े और प्रभावशाली सामयिक परिवर्तनों को वरिष्ठ पीढ़ी आत्मसात नहीं कर पाती और नई पीढ़ी उन्हें छोड़ नहीं पाती तो बड़ा कालान्तर पैदा हो जाता है, जो नए समकाल का कारण बनता है।

      लघुकथा पर जब हम वर्तमान में बात करते हैं तो हमारी चर्चा ‘समकालीन लघुकथा’ यानी 1970 के आसपास उद्भूत लघुकथा पर केन्द्रित होती है। यह वह समय था जो मानवीय परिवेश में आमूलचूल परिवर्तनों के व्यापक परिदृश्य से गुजर रहा था। विशेषतः भारत में। एक ओर जनतांत्रिक युग की तमाम कमजोरियाँ मानव-चरित्र में अवतरित होना आरम्भ हो चुकी थीं तो दूसरी ओर तकनीक आधारित सुविधाभोगी संस्कृति- कुछ अंग्रेजी संस्कृति के अवशिष्ट प्रभाव के रूप में और कुछ आयातित होकर अपनी जड़ों को तेजी से फैलाने लगी थी। अन्तर्राष्ट्रीयता के व्यापक प्रवेश से वैचारिक स्तर पर एक ऐसा वर्ग पैदा हो चुका था, जो एक ओर अधिकाधिक सुविधाओं को हथियाने का अभ्यस्त हो रहा था तो दूसरी ओर अन्तर्राष्ट्रीय प्रभावों में हमारी मूल संस्कृति पर आक्रमण के साथ वैचारिक संक्रमण फैलाने की दिशा में मजबूती के साथ तेज गति से आगे बढ़ रहा था। इस वर्ग ने ‘विरोध के माध्यम से दबाव’ और ‘वंचितों के हितपोषण के आभासी दर्शन’ के शक्तिशाली अस्त्र तैयार कर लिये थे। परिणामस्वरूप एक ओर अपने स्वार्थ में गले तक डूब चुके सत्तापिपाशु लोग अपना विरोध झेलकर भी इस वर्ग के तुष्टिकरण के लिए विवश थे। दूसरी ओर आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से निचले स्तर का व्यक्ति एक ओर भ्रष्टाचार का शिकार होने लगा था, दूसरी ओर संसाधनों में अपने हिस्से से वंचित रहने का अभिशाप झेलने को निरंतर विवश हो रहा था (क्योंकि उसके हिस्से के संसाधनों का प्रवाह राजनेताओं एवं चालाक वर्ग की ओर था)। इस स्थिति का लाभ उठाकर ‘वंचितों के हितपोषण के आभासी दर्शन’ के माध्यम से चालाक तीसरा वर्ग आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से निचले स्तर के वर्ग को उसके हितपोषण की झूठी उम्मीदों के सहारे अपने षणयंत्र में व्यापक स्तर पर शामिल करने लगा था। इस सबके मध्य पूँजीवादी शक्तियाँ भी परिवर्तित रूप में अपने पैर फैला रहीं थीं। इन तमाम वस्तु-स्थितियों का परिणाम मानवीय ही नहीं समूचे जैविक परिवेश को प्रभावित करता दिखाई दिया। विसंगतियाँ और दुष्प्रवृत्तियाँ परिवेश का अभिन्न हिस्सा बन गईं। साहित्य, विशेषतः कविता, कथा और कुछ व्यंग्य में इन चीजों के परिणामी प्रतिबिम्ब आये लेकिन अपरिहार्य कारणों से उस रूप में नहीं आ सके, जिसमें मनुष्य को झकझोरने के लिए आना आवश्यक था। उस समय के कुछ नए रचनाकारों ने उन प्रतिबिम्बों को पकड़ा और अपने तरह से कथात्मक रूप में अभिव्यक्त किया, भले उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। 

      1970 के आसपास का वह समय एक बड़ा काल-विभाजक बिन्दु है। जिसके एक ओर आदर्श, आस्थाओं-विश्वासों और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा परिवेश स्थित है तो दूसरी ओर इनको खण्डित करता और नकारात्मक वृतितयों के साथ निरंतर विस्तारित और व्यापक होता परिवेश। आज तक हम इसी समकाल की विभिन्न स्थितियों से गुजर रहे हैं। ‘समकालीन लघुकथा’ की यह पृष्ठभूमि उसको समझने के आधार को उसकी पूर्ववर्ती लघुकथात्मक रचनाओं को समझने के आधार से भिन्न जताने के लिए पर्याप्त है।

      चूँकि ‘समकालीन लघुकथा’ अपनी पूर्ववर्ती लघुकथा से कई मायनों में भिन्न है और आगे भी, विशेषतः इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते सामयिक परिवर्तनों को आत्मसात करते हुए अपनी भिन्नताओं के सन्दर्भ में अद्यतन होती दिखाई देती है, इसलिए उसे समझने के लिए जैविक (विशेषतः मानवीय) परिवेश और उसे प्रभावित करने वाले कारकों में आए परिवर्तनों के सापेक्ष लघुकथा में आये परिवर्तनों का नोट लेना पड़ेगा। चूँकि समकालीन लघुकथा की नींव ही जैविक (विशेषतः मानवीय) परिवेश में आए परिवर्तनों पर पड़ी है, इसलिए समकालीन लघुकथा में इन परिवर्तनों के प्रतिबिम्ब देखना और यह समझना आवश्यक है कि इन परिवर्तनों की गति और व्यापकता जैसे-जैसे बढ़ेगी (संभव है कि आगामी कुछ वर्षों में किसी बड़े काल-विभाजक समय-बिन्दु से हमारा साक्षात्कार हो), समकालीन लघुकथा स्वयं को अद्यतन करेगी या किसी नए रूप-स्वरूप में सामने होगी। 

      इस सन्दर्भ से जुड़ी एक और बात। बहुत सारे लोग आज भी ‘साहित्य को समाज का दर्पण’ मानते हैं किन्तु मुझे लगता है कि आजाद भारत में धीमे-धीमे यह धारणा कालातीत होती चली गई है। इसकी गति में 1965-70 के बाद तीव्र और इक्कीसवीं सदी (विशेषतः दूसरे दशक) तक आते-आते आशातीत वृद्धि हुई है। इसके प्रमुख कारण हैं- जैविक/मानवीय परिवेश में आए परिवर्तनों से झाँकती व्यावसायिक मानसिकता एवं लोकतंत्र जनित आजादी एवं शिक्षा के प्रसार से जनित तार्किकता- दोनों की शक्ति में निरंतर वृद्धि और उसके परिणामी प्रभावों की व्यापकता। आज सामाजिक, यहाँ तक कि पारिवारिक स्तर पर भी हम देख सकते हैं कि समस्याओं को रेखांकित करने और उन पर बहस/चर्चा करने की प्रवृत्ति प्रमुखता प्राप्त कर चुकी है। निष्कर्ष और समाधान या सुधार की प्रवृत्ति आदर्श की परिभाषा के ब्लैक-होल की परिधि में जा चुकी है। समकालीन लघुकथा का भी मूलतः यही रास्ता है। सुधारने की नियति से चीजों को देखने और सुधार की आकांक्षा जगाने की वृत्ति (दर्पण का मूल कार्य) समकालीन लघुकथा के समकाल में प्रायः नहीं है। इसका प्रभाव लघुकथा के सामान्य चरित्र पर पड़ना स्वाभाविक है। बहुतायत में समकालीन लघुकथा यथार्थ को रेखांकित करती है, मनुष्य को झकझोरती-तिलमिलाती है। उससे आगे मनुष्य को क्या करना है, यह मनुष्य पर छोड़ देती है। इसलिए वह ‘समाज का दर्पण’ वाले साहित्य के नहीं, जीवन की आलोचना के निकट है। ऐसा कहने का यह अर्थ नहीं है कि समकालीन लघुकथा प्रभाव-सम्प्रेषण से मुक्त हो गई है या लघुकथा रचनात्मकता से रहित है। प्रभाव-सम्प्रेषण का गन्तव्य बदल चुका है। हृदय का स्थान मस्तिष्क ले चुका है, जहाँ बहुत सारे ‘किन्तु-परन्तु’ जीवन विषयक निर्णयों को प्रभावित करने के लिए उपस्थित होते हैं। दूसरी बात, जीवनालोचना की प्रक्रिया में निष्कर्ष और समाधान या सुधार की प्रवृत्ति की प्रत्यक्ष प्रेरणा निहित न होने पर भी कुछ सीमाओं के अन्तर्गत विचार निर्माण की प्रक्रिया अवश्य निहित होती है, जो रचनात्मकता का आधार बनती है और दीर्घकाल में बहुत-सी चीजों के प्रति स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता का आधार तैयार करती है। 

                                                               शेष आगामी अंक में जारी…

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