Tuesday, 9 March, 2021

लघुकथा का इतिहास : समझो आगे-आगे, पीछे-पीछे इतिहास / बालकृष्ण गुप्त ‘गुरु’

इतिहास शब्द में ‘पुराना’ समाहित है। इतिहास खोदने, खोजने, और सबसे महत्वपूर्ण, ज्यादा से ज्यादा समझने की चीज है। यह खोदने वाले की योग्यता पर निर्भर करता है कि वह कितना खोद सकता है और कितना प्राप्त कर सकता है। खोदने में ‘समय’ समाया है। समय के साथ अनुभव बढ़ता जाता है। अनुभव प्राप्त करने की मात्रा भी व्यक्ति की योग्यता, समय और कर्म के साथ ही उसके शैली से जुड़ी होती है। महत्वपूर्ण यह भी है- खुदाई किस साधन से की जा रही है। लघुकथा के इतिहास में भी यही सब बातें लागू होती हैं। यदि हम लघुकथा की स्थूल परिभाषा को लेकर खुदाई करेंगे तो बहुत, वृहद् इतिहास मिलेगासूक्ष्म (संगठित) परिभाषा को लेकर, तो छोटा परंतु खुला इतिहास मिलेगा। वैसे, पहले स्थूल परिभाषा को लेकर ही खुदाई की गई क्योंकि शुरू में परिभाषा स्थूल ही होती है। दूसरी बात- खुदाई विस्तृत क्षेत्र में ऊपर ही ऊपर कर रहे हैं या गहराई में, यह भी महत्वपूर्ण है। पहले दो शब्द- लघु और कथा। रचना लघु हो और कथा हो। इसलिए हर कथा जो छोटी थी, लघुकथा मान ली गई। बाद में एक शब्द बना- लघुकथा। दूध और शक्कर यानी दूध के अणुओं के बीच शक्कर के अणु। शक्कर के अणु यानी- सिर्फ शैली, भाषा जो संगठित हो यानी वह सबकुछ जो मिठास, उपयोगिता, उद्देश्य बढ़ा दे और समय का भी ख्याल रखे।

गुड़ में गोबर मिलाया, हिंदी शब्द लघुकथा को अँग्रेजी में शॅार्ट स्टोरी कहकर। लघु कहानी के लिए भी शॉर्ट स्टोरी। मतलब अँग्रेजी समर्थकों ने, सोच-विचार वालों ने अपनी परिभाषा बनाकर भ्रम पैदा किया। लघुकथा की सूक्ष्म, सटीक, संगठित, गूढ़ अर्थ वाली परंतु स्पष्ट परिभाषा बनने में भी कई विचारवाद, समूहवाद और अधभर गगरी छलकत जाए विचार, जैसे कई रोड़े बन गए। ऐसे लोग ही लघुकथा को लुढ़काने और अपने-आप को उछालने में लगे हैं। यह बात अलग है कि सभी विषयों की परिभाषाओं में अनुभव के साथ परिवर्तन, परिवर्धन अनिवार्य रुप से होता है। परिभाषाएँ लगातार गूढ़ार्थ होकर परिष्कृत होती रहती हैं। भीड़ समूह के अनुसार बँटने लगती है, लाइन में लगने लगती है। ऊँचाई के अनुसार व्यवस्थित होती जाती है। उपयोगिता के अनुसार व्यवस्थित होती जाती है। सुंदर, स्पष्ट, उपयोगी बनती जाती है। काट-छाँट होती रहती है, रूप निखरता रहता है। यही बातें परिभाषा बनने की प्रक्रिया में भी होती हैं। ज्ञान पहले सामान्य ज्ञान में, फिर सामान्य विज्ञान, विज्ञान, फिर विशिष्ट विज्ञान में बदलता है। परंतु जब सब अपनी-अपनी ओर खींचने लगते हैं तो व्यवस्था और सुधरने के स्थान पर क्रमशः बिगड़ती जाती है।

सटीक, सही, सर्वमान्य परिभाषा बनेगी नहीं तो लघुकथा का सही इतिहास कैसे खोजा जा सकता है, उसको वांछित गति कैसे मिल सकती है? आधुनिक लघुकथा के इतिहास को अभी हम मोटे तौर पर पचास साल का मान लें तो भी कुछ लघुकथाकारों द्वारा अच्छा कार्य करने के बावजूद किसी लघुकथाकार को कोई पद्म पुरस्कार भी नहीं मिला। शायद कोई नाम भी प्रस्तावित नहीं हुआ। कोई बड़ा प्रकाशक नहीं मिला। साहित्य का कोई बड़ा सम्मान नहीं मिला। समग्र हिंदी साहित्य में कोई स्थान निर्धारित नहीं हुआ।

पहली लघुकथा के दौड़ में कई लघुकथाएँ शामिल हो गईं—1900-1901 के आसपास माधवराव सप्रे की ‘सुभाषित रत्न’ और ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ शामिल हैं। पहली लघुकथा के समर्थक इक्का-दुक्का हैं, वहीं दूसरी लघुकथा के कुछ हैं। इसी समय प्रकाशित माखनलाल चतुर्वेदी की ‘बिल्ली और बुखार’ को कुछ ज्यादा समर्थन मिला है। कुछ लघुकथाकार भारतेंदु हरिश्चंद्र की ‘अंगहीन धनी’ (1876) जो परिहासनी में ‘अद्‌भुत संवाद’ के साथ संकलित है, के समर्थन में खड़े हैं। ‘सरस्वती’ में 1916 में प्रकाशित पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की लघुकथा ‘झलमला’ को भी अधिकांश लघुकथाकार पहली लघुकथा मानने लगे हैं। लगभग 650 शब्दों की यह लघुकथा, आधुनिक लघुकथा की अवधारणा में सबसे ज्यादा समर्थन प्राप्त लघुकथा है। पहली लघुकथा शीर्षक के साथ सबसे पहले यह गाजियाबाद की मासिक पत्रिका ‘सर्वोदय विश्ववाणी’ (संपादक:जगदीश बत्रा) में और उसके बाद ‘कथाबिम्ब’ (लघुकथा विशेषांक, अतिथि संपादक:कृष्ण कमलेश) के लघुकथा विशेषांक में पुनः प्रकाशित हुई।

दूसरी बात- कुछ लघुकथाकारों ने माधवराव सप्रे की ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को पहली लघुकथा घोषित कर सप्रे जी की जन्मतिथि 19 जून को लघुकथा दिवस के रुप में मनाना शुरू कर दिया है। हालाँकि शासकीय स्तर पर लघुकथा दिवस मनाने की कोई घोषणा नहीं हुई है। काफी साहित्यकार तो इसे कहानी/लघुकहानी ही मानते हैं। पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर की पुस्तक में तो यह पहली लघुकहानी यानी कहानी के रूप में उल्लेखित है। ऐसी स्थिति में कहानीकार इस तिथि (19 जून) को कहानी दिवस के रूप में मनाने लगें तो क्या होगा?

लघुकथा के इतिहास में पूर्णतया समर्पित पहली रजिस्टर्ड लघुपत्रिका ‘लघुकथा चौमासिक’- 1974-75 (संपादक:अश्विनी कुमार द्विवेदी) का प्रायः जिक्र ही नहीं किया जाता। विश्व हिंदी सचिवालय मॉरीशस द्वारा 2014 में विश्वस्तरीय लघुकथा प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। पाँच भागों में विभाजित इस प्रतियोगिता में कुल 18 प्रतियोगियों को पुरस्कृत किया गया। इसमें तीन मॉरीशस के और तीन भारत के लघुकथाकार सम्मिलित हैं।

बहरहाल, लघुकथा की स्थूल परिभाषा को लेकर चलें तो लघुकथा का इतिहास वेदों के काल से ही खोजा जा सकता है।

आज तक के लघुकथा-इतिहास को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं—

अ. प्राचीनकालीन लघुकथाएँ—सन् 1000 से पूर्व की लघुकथाएँ

ब. मध्यकालीन लघुकथाएँ—सन् 1000 से 1970 तक की लघुकथाएँ

स. आधुनिक लघुकथाएँ—सन् 1971 से अद्यतन।

पुनः प्राचीनकाल की लघुकथाओं को दो भागों में विभाजित कर सकते हैं—

1-  ब्राह्मण साहित्य- वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत।

2-  ब्राह्मणेतर साहित्य- जैन और बौद्ध ग्रंथ।

वेद, उपनिषद, पुराण आदि की कथाएँ- वेद दुनिया का सबसे पुराना लिखित दस्तावेज है- हॉग, व्हिटनी, विल्सन, ग्रिफिथ आदि इन्हें 1400 ईसापूर्व का तो जेकोबी 4000 ईसापूर्व का मानते हैं। ऋग्वेद के छोटे बीज संवादसूत्र संहिता से आरम्भ होकर उपनिषदों (800-500 ईसापूर्व), पुराणों (चौथी-पाँचवी शताब्दी ईसापूर्व) तक चला जाते हैं।

रामायण, महाभारत की लघुकथाएँ- राम और कृष्ण के जन्म में लगभग दो हजार वर्ष का अंतर है। इनमें कथाओं का उद्गम एक होने के बावजूद लघुकथाएँ स्वतंत्र-स्वतंत्र हैं। रामायण के उत्तरकाण्ड के सर्ग 72 में गिद्ध, उल्लू के झगड़े की कथा है तो महाभारत में चिड़िया की आँख वाली कथा, लघुकथाओं के उदहारण हैं।

जैन और बौद्ध ग्रंथों की लघुकथाएँ- जैन ग्रंथों की लघुकथाओं में तीर्थंकरों की कथाएँ हैं। देश-वैकालिक टीका में लगभग सत्तर प्राकृत कथाएँ हैं। वृति टिप्पण की प्राकृत कथाओं में सौन्दर्य वर्णन हैं।

बौद्धकालीन लघुकथाएँ- इति बुद्धक में बुद्ध के कथन हैं और दूसरी ओर राजा, भिक्षु, योद्धा आदि की लघुकथाएँ हैं।

जातक कथाएँ- इसमें लगभग 600 कहानियाँ हैं जो विश्व की प्राचीनतम (लगभग 300 ईसापूर्व) लिखित कहानियाँ हैं। इनमें गौतम बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएँ हैं, जिनके बारे में दो मत हैं- 1. स्वयं गौतम बुद्ध ने कही थीं। 2. गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद उनके शिष्यों द्वारा कही गईं।

पंचतंत्र, हितोपदेश की कथाएँ- सरल पंचतंत्र की भूमिका के लेखक विष्णु प्रभाकर के अनुसार- पंचतंत्र की मूल कथा गुणाढ्य द्वारा रचित (वृहत कथा) नामक ग्रंथ पर आधारित है। पंचतंत्र की मूल प्रति अभी तक अप्राप्त है। इसके रचयिता विष्णु शर्मा, कहीं इसे विष्णु गुप्त भी कहा गया है (चाणक्य) मौर्यकालीन युग के (322 से 185 ईसापूर्व) के माने जाते हैं। हितोपदेश की रचना का आधार भी पंचतंत्र ही है। अंतिम तथ्यों के आधार पर हितोपदेश के रचयिता नारायण भट्टराय का कार्यकाल तीसरी शताब्दी के आस-पास माना जाता है।

मध्यकाल की लघुकथाएँ (सन् 1000-1970 तक)- कथासरित्सागर मूल ग्रंथ की रचना लगभग 11वीं शताब्दी में हुई। विष्णु प्रभाकर द्वारा हिंदी में भावानुवाद किए जाने वाले इस ग्रंथ की रचना सोमदेव भट्ट ने की थी। इसमें 124 मुख्य कथाएं हैं।

भक्तिकाल (सन् 1375-1700)- भक्तिकाल में लिखित ‘252 वैष्णवन की वार्ता’ तथा ‘84 वैष्णवन की वार्ता’ में लघुकथाएँ उदाहरणों के रूप में मिलती हैं। कथात्मक दृष्टिकोण से 1799 में लल्लूलाल द्वारा संस्कृत में लिखित सिंहासन बत्तीसी का हिंदुस्तानी भाषा (खड़ी बोली) में मुद्रण 1802 में हुआ। 1805 में मिर्जा कशमिश अली ने इसका हिंदी संस्करण तैयार किया गया। लल्लूलाल द्वारा ही अंतिम तथ्यों के आधार पर नारायण भट्ट राय द्वारा रचित ‘वेताल विंशतिका’ का मुद्रण 1806 में हुआ। ‘वेताल पच्चीसी’ के नाम से पहले कवीश्वर द्वारा ब्रज भाषा में फिर हिंदी में रूपांतरण मिर्जा लुत्फ अली और तारणीचरण द्वारा किया गया।

1832 में कलकत्ता स्कूल बुक सोसाइटी द्वारा ‘हिन्दवी में कथाएँ’ नामक प्रकाशित पुस्तक में भी कुछ नीतिपरक लोककथाएँ हैं।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की लघुकथाओं में प्रकृति, जीवनदर्शन बोध आदि प्रतीकात्मक रूप से दिखाई देते हैं (प्रेम, आभूषण लघुकथाएँ आदि)।

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की लघुकथाएँ क्रमशः ‘झलमला’ (लगभग 650 शब्द) ‘सरस्वती’ में 1916 और ‘विमाता’ (लगभग 700 शब्द) 1918 में प्रकाशित हुई।

1926 में जयशंकर प्रसाद की कई लघुकथाएँ, गुदरसाईं या गुदड़ी के लाल, पत्थर की पुकार, खंडहर, बेड़ी, शिक्षा करुणा की विजय, कलावती आदि ‘प्रतिध्वनि’ में प्रकाशित हुई। इन रचनाओं में गम्भीरता के दर्शन हुए।

उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ के 1929 में प्रकाशित कहानी संग्रह ‘सत्तर श्रेष्ठ कहानियाँ’ में कुछ लघुकथाएँ संगृहीत हैं।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने भी 1929 में सेठजी, सलाम आदि लघुकथाएँ लिखीं। इनके ‘आकाश के तारे धरती के फूल’ संग्रह में 72 लघुकथाएँ हैं।

प्रेमचंद की लघुकथाओं में आदर्श और व्यंग्य का मिलाजुला स्वर मिलता है। (जादू, कश्मीरी सेब आदि लघुकथाएँ)।

छबीलेलाल गोस्वामी, सुदर्शन (‘झरोखे’ कथा संग्रह में 48 लघुकथाएँ), अयोध्या प्रसाद गोयलीय (गहरे पानी पैठ, 1951, एवं जिन खोजा तिन पाइयाँ, 1955 लघुकथा संग्रह), जानकीवल्ल्भ शास्त्री, बनफूल, रमेशचन्द्र श्रीवास्तव, श्यामसुंदर व्यास, विष्णु प्रभाकर, रामवृक्ष बेनीपुरी (कथा संग्रह ‘गेहूँ और गुलाब’), आनंदमोहन अवस्थी (कथा संग्रह ‘बंधनों की रक्षा’), शांति मेहरोत्रा (कथा संग्रह ‘खुला आकाश मेरे पंख’), भवभूति मिश्र (कथा संग्रह ‘बची हुई संपत्ति’), रामनारायण उपाध्याय (कथा संग्रह ‘अनजाने जाने पहचाने’), रावी ‘रामप्रसाद विद्यार्थी’ (कथा संग्रह ‘मेरे कथा गुरु का कहना है भाग एक’ 1958 तथा ‘मेरे कथा गुरु का कहना है भाग दो’ 1961)।

नीलाभ प्रकाशन प्रयाग से 1956 में प्रकाशित संकलन ‘संकेत’ में रामधारी सिंह दिनकर की दो, सुदर्शन की दो एवं शांति मेहरोत्रा एम.ए. की एक लघुकथा शामिल हैं।

1956 में ही प्रकाशित भृंग तुपकरी के लघुकथा संग्रह ‘पंखुडियां’ में 28 लघुकथाएँ हैं।

1957 में शरद कुमार मिश्र ‘शरद’ के प्रकाशित लघुकथा संग्रह ‘धूप और धुआँ’ में उनकी 37 लघुकथाएँ संगृहीत हैं।

इसके साथ ही प्रवचन के रूप में विनोबा भावे की ‘कल्पतरु’, ‘पाखाना’, राकेश भारती की ‘नीड़ की पीर’, ‘अंतर’, ’सैलाब’ आदि, यशपाल की ‘संतोष का क्षण’, ‘सीख’ आदि, काशीनाथ सिंह की ‘अकाल’, ‘पानी और प्रदर्शनी’ आदि, कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’ की ‘चौधरी’, ‘काम का आदमी’ आदि, राजेन्द्र यादव की ‘अपने पार’ आदि लघुकथाएँ भी चर्चित रही हैं। सारिका 1969 के सभी अंकों में लघुकथाएँ छपती रही हैं। सारिका में 1970 में प्रकाशित अधिकतर लघुकथाएँ विदेशी या अन्य प्रान्तों की लघुकथाओं का अनुवाद रही हैं।

आधुनिक काल की लघुकथाएँ (1971 से अद्यतन)- आठवें दशक की अधिकांश लघुकथाओं में विषय का रिपीटीशन है तथा व्यंग्य शैली में लिखी गई हैं। इस दशक में तो कुछ लघुकथाकार लघुकथा में व्यंग्य की अनिवार्यता मानने लगे थे। आठवें दशक डॉ. सतीश दुबे, बलराम अग्रवाल, कमलेश भारतीय, भगीरथ परिहार, जगदीश कश्यप, कृष्ण कमलेश, लक्ष्यमेंद्र चोपड़ा, शकुंतला किरण, श्रीकांत चौधरी, पूर्णिमा श्रीवास्तव, अशोक विश्वकर्मा, मोहन राजेश, नीलम कुलश्रेष्ठ, वर्षा अय्यर, के पी सक्सेना, शिवानी, रमेश बतरा, जगदीश किंजल्क, सिमर सदोष, कृष्ण गंभीर, मधुप मगधशाही, प्रभु जोशी, सत्यशुचि, सूर्यकांत नागर, महावीर प्रसाद जैन, पृथ्वीराज अरोड़ा, निशा व्यास, बलराम, ध्रुव जायसवाल, विलास गुप्ते, सरोज द्विवेदी, हरिशंकर परसाई, रामनारायण उपाध्याय, हरिमोहन, मनीष राय यादव, चित्रा मुद्गल, नरेंद्र निर्मोही, अशोकवीर (अशोक भाटिया), बैकुंठनाथ मेहरोत्रा, राजेन्द्र सिंह बेदी, यशपाल, सुदर्शन, भारत यायावर, मोहन राजेश, श्रीराम मीणा और इन पंक्तियों का लेखक आदि सक्रिय रहे।

नौवें एवं सदी के अंतिम दशक में लघुकथा गोष्ठियों, सम्मेलनों की संख्या बढ़ती गई। पत्र-पत्रिकाओं में भी इसको उचित मात्रा में स्थान मिलना शुरू हो गया। नौवें- दसवें दशक में वरिष्ठ लघुकथाकारों ने इस विधा के विकास हेतु इसके शास्त्रीय और ऐतिहासिक पक्ष को सामने लाते शोध परख लेख और उस समय प्रकाशित रचनाओं पर समालोचक टिप्पणी भी करने लगे। फलस्वरूप लघुकथा को समझने और लिखने में पर्याप्त सहायता मिली। शायद यही कारण है कि बीसवीं सदी के अंत तक प्रकाशित लघुकथा संग्रहों एवं संकलनों की संख्या सीमित रही है, वहीं इक्कीसवीं सदी के इन दो दशकों में ही लघुकथा संकलनों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि नहीं हुई है परंतु लघुकथा संग्रहों की संख्या चार सौ से ऊपर पहुँच चुकी है। लघुकथा विधा पर शोध पत्र, शोध ग्रंथ लिखकर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाले भी दो दर्जन से अधिक हो चुके हैं।                                                                  बीसवीं शताब्दी तक प्रकाशित होने वाले चर्चित लघुकथा संग्रहों की सूची इस प्रकार है—

‘ऐतिहासिक लघुकथाएँ’/आचार्य जगदीशचंद्र मिश्र, ‘नया पंचतंत्र’/रामनारायण उपाध्याय, ‘सिसकता उजास’, प्रेक्षागृह’, ‘भीड़ में खोया आदमी’/डॉ. सतीश दुबे, ‘मोहभंग’/प्रोफेसर कृष्ण कमलेश, ‘छोटी-बड़ी बातें’/महावीर प्रसाद जैन-जगदीश कश्यप, ‘नीम चढ़ी गुरबेल’/श्रीराम वीणा, ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’/हरिशंकर परसाई, ‘आपकी कृपा है’, ‘कौन जीता कौन हारा’/ विष्णु प्रभाकर, ‘काँकर-पाथर’/श्याम सुंदर व्यास, ‘प्रसंगवश’, ‘बदलती हवा के साथ’, जहर के खिलाफ’/सतीशराज पुष्करणा, ‘अभिप्राय’/कमल चोपड़ा, ‘हिस्से का दूध’, ‘मेरी बात, तेरी बात’/मधुदीप, ‘डरे हुए लोग’/सुकेश साहनी, ‘अतीत का प्रश्न’/मालती महावर, ‘इस बार’/ कमलेश भारतीय, ‘मृगजल’, ‘रुकी हुई हंसिनी’/बलराम, ‘सरसों के फूल’/बलराम अग्रवाल, ‘कोहरे से गुजरते हुए’/जगदीश कश्यप, ‘इक्कीस जूते’, ‘आँखों वाले अंधे’/ रामकुमार आत्रेय, ‘तीन न तेरह’/पृथ्वीराज अरोड़ा, ‘असभ्य नगर’/रामेश्वर कांबोज ‘हिमांशु’, ‘जंग लगी कीलें’/पवन शर्मा, ‘आग’/माधव नागदा, ‘अँधेरे के विरुद्ध’/ डॉ. मिथलेश कुमारी मिश्र।

इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ होते ही लगता है, साहित्य में लघुकथा का युग आ गया। लघुकथा दौड़ ही नहीं रही है, कहा जा सकता है, छलाँग लगा रही है। पहले और दूसरे दशक में प्रकाशित लघुकथा संग्रहों की सूची एक-दो नहीं तीन सैकड़े के आसपास है। कुछ महत्वपूर्ण लघुकथा संग्रहों की सूची इस प्रकार है—‘अन्यथा’/कमल चोपड़ा, ‘राजा नंगा हो गया’/सुनीता सिंह, ‘ब्लैक बोर्ड’/मधुकांत, ‘शब्द साक्षी है’/सतीश राठी, ‘गुस्ताखी माफ़’/सुदर्शन भाटिया, ‘यह भी सच है’/डॉ. शैल रस्तोगी, ‘लपटें’/चित्रा मुद्गल, ‘कदम-कदम पर हादसे’/जगदीश कश्यप, ‘पूजा’/पृथ्वीराज अरोड़ा, ‘भूखे पेट की डकार’/हरिशंकर परसाई, ‘जुबैदा’, ‘पीले पंखोंवाली तितलियाँ’, ‘तैरती हैं पत्तियाँ’, ‘काले दिन’/बलराम अग्रवाल, ‘अपना हाथ जगन्नाथ’/सुदर्शन भाटिया, ‘कीकर के पत्ते’/शराफ़त अली खान, ‘आस्था के फूल’/ कमल कपूर, ‘भोर होते तक’/कृष्णलता यादव, ‘गर्म रेत’/युगल, ‘बच्चा और गेंद’/विष्णु नागर, ‘सुविधा शुल्क’/सुदर्शन भाटिया, ‘कूरियर’/मनोज सोनकर, ‘छोटी सी बात’/रामकुमार आत्रेय, ‘विडंबना’/शैल चंद्रा, ‘मैं हिंदू हूं’, ‘मुश्किल सवाल’/असग़र वजाहत, ‘समकालीन सौ लघुकथाएँ’/डॉ. सतीश दुबे, ‘दृष्टि’/उर्मिकृष्ण, ‘तुम क्या जानो’/अशोक गुजराती, ‘लघुकथाओं का पिटारा’/डॉ. योगेन्द्रनाथ शुक्ल, ‘विषकन्या’/सुरेन्द्र अरोड़ा, ‘दुपट्टा’/विकेश निझावन, ‘अपने-अपने सपने’/घनश्याम अग्रवाल, ‘अक्षय तूणीर’/मुरलीधर वैष्णव, ‘अँधेरे में आँख’/अशोक भाटिया, ‘सिर्फ तुम’/पंकज शर्मा, ‘बॉस का डिनर’/महेश राजा, ‘एक मुट्ठी आसमान’/सिमर सदोष, ‘रामदीन का चिराग’/ गोविंद शर्मा, ‘गुरु-ज्ञान’/बालकृष्ण गुप्ता ‘गुरु’, ‘गैरहाजिर रिश्ता’/श्यामसुंदर दीप्ति, ‘बेटी का हिस्सा’/श्यामसुंदर अग्रवाल, ‘माटी कहे’/आभा सिंह, ‘घाट पर ठहराव कहां’/कांता राय, ‘आँगन से राजपथ’/पवित्रा अग्रवाल, ‘एक पेग जिंदगी’/पूनम डोंगरा, ‘सिलवटें’/इंदौर लेखिका संघ, ‘निन्यानवे के फेर में’/ज्योति जैन, ‘सायबर मैन’/सुकेश साहनी आदि।

इस विधा को लोकप्रिय बनाने में ‘सारिका’, ‘तारिका’ (बाद में ‘शुभतारिका’), ‘सुपर ब्लेज’, ‘लघुकथा चौमासिक’, ‘शब्द’, ‘आघात’ (बाद में ‘लघुआघात’), ‘दिशा’, ‘अवसर’ आदि पत्रिकाओं का योगदान रेखांकन योग्य है। ‘लघुकथा कलश’ के महाविशेषांकों ने लघुकथाओं को वजन और गरिमा, दोनों दी है।

चलते-चलते- पहली लघुकथा की दौड़ में मुख्यतया तीन लघुकथाएँ शामिल हैं- अ. ‘अंगहीन धनी’ (1876), भारतेन्दु हरिश्चंद्र की इन्क्यावन शब्दों की लघुकथा वास्तव में बोलचाल की व्यंग्यात्मक भाषा के ज्यादा नजदीक है, जिसे संदर्भ का स्पर्श देकर लघुकथा का रूप दिया गया है। ब. ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ (1900-1901), माधवराव सप्रे की लगभग सात सौ शब्दों की यह लघुकथा, लघुकहानी के ज्यादा नजदीक है, क्योंकि इसमें समय अंतराल काफ़ी है। स. ‘झलमला’ (1916), पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की लगभग छह सौ पचास शब्दों की यह लघुकथा, आधुनिक लघुकथा की अवधारणा में सबसे सशक्त है। यह सिर्फ मेरी राय है।

हरि अनंत, हरिकथा अनंता। इतिहास तो इतिहास है, कुछ पन्नों में सहेजना मुश्किल ही नहीं लगभग असंभव है। इस सहेजने के प्रयास में काफी कुछ महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख करने से चूक जाना स्वाभाविक है, पर मेरा प्रयास मोटी-मोटी बातों को सहेजने का रहा है।

 (साभार:'लघुकथा कलश', आलेख महाविशेषांक-1, जुलाई-दिसंबर 2020, संपादक:योगराज प्रभाकर)

बालकृष्ण गुप्ता 'गुरु' : संक्षिप्त परिचय

जन्मतिथि : 31 दिसम्बर, 1948

जन्मस्थान : खैरागढ़ (छत्तीसगढ़)

शिक्षा : बी.एससी. (जीवविज्ञान), एम.ए. (राजनीति विज्ञान)

प्रकाशन : 1. गुरु-ज्ञान; आईना दिखातीं लघुकथाएँ (लघुकथा संग्रह)

2. 'खैरागढ़; यादों का वर्तमान' (गृहनगर पर संस्मरणों के संकलन का संयोजन और सम्पादन)

3. ‘लघुकथा अनवरत’ और 'लहरों का संघर्ष' नामक साझा संकलनों के अतिरिक्त अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथाएँ संगृहीत

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन, अध्ययन और समाजसेवा

सम्प्राप्ति : शासकीय हायर सेकंडरी स्कूल के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त। कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित। पेंतालीस वर्षों से लेखनरत। तमाम राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथाएँ, कविताएँ, व्यंग्य और गीत प्रकाशित होते रहे हैं।

सम्पर्क : डॉ. बख्शी मार्ग, खैरागढ़- 491881, जिला- राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)

मोबाइल : 09424111454 /  E-mail : ggbalkrishna@gmail.com

 

 


1 comment:

poonam chandralekha said...

ज्ञानवर्धक आलेख