Friday, 19 March, 2021

लघुकथा की विकास-यात्रा में उ.प्र. का योगदान / डॉ. उमेश महादोषी

 चार कड़ियों में समाप्य  लम्बे लेख की पहली कड़ी

      समकालीन लघुकथा का औपचारिक आरम्भ 1971 से माना जाता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि

डॉ॰ उमेश महादोषी
लघुकथा का जन्म 1971 में हुआ है। लघ्वाकारीय कथात्मक रचनाओं से हमारा पुरातन साहित्य भरा पड़ा है। प्राप्त जानकारियों के अनुसार बीसवीं सदी के चौथे दशक तक, स्वभाव से प्राचीन लघ्वाकारीय कथात्मक रचनाओं से कुछ अलग लघ्वाकारीय कथा रचनाएँ सामने आना आरम्भ हो जाती हैं। साहित्य के अन्य रूपों के मध्य कुछेक रचनाएँ उससे पहले भी देखने को मिल जाती हैं। पाँचवें दशक में लघुकथा शब्द प्रचलन में आ जाता है। इसी के साथ इन रचनाओं की स्वभावगत भिन्नताएँ, विशेषतः छठे दशक में क्रमशः और स्पष्ट होना आरम्भ हो जाती हैं। यह प्रक्रिया सातवें दशक के अंत तक चलती है, जब नई पीढ़ी के अनेक कथाकार इन भिन्नताओं के स्वरूप को अपने समय की आवश्यकताओं के साथ जोड़कर देखना आरम्भ करते हैं और उनके आधार पर एक भिन्न कथारूप की पहचान करके उसकी स्थापना, विकास और स्वीकार्यता के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयास आरम्भ कर देते हैं। इस प्रकार 1971 से समकालीन लघुकथा का युग आरम्भ होता है। यहाँ दो बातें स्पष्ट हैं, लघुकथा का वास्तविक युग समकालीन लघुकथा के आन्दोलनबद्ध होने से लगभग तीन दशक पहले ही आरम्भ हो चुका था और कुछ लघुकथाएँ कथा से भिन्न रूपाकारों एवं विधागत संज्ञाओं से विभूषित होकर भी रची जा रही थीं, जिनमें समकालीन लघुकथा के बीज विद्यमान मिलते हैं। भारतेन्दु हरिश्चंद्र की परिहासिनी (1876) में शामिल ‘अंगहीन धनी’ जैसी रचनाएँ एवं रामवृक्ष बेनीपुरी के शब्दचित्रों के संग्रहों- ‘लाल तारा’ (रचनाकाल 1938-39) में शामिल ‘कुदाल’ जैसी एवं ‘गेहूँ और गुलाब’ (रचनाकाल 1948-50) में शामिल ‘पनिहारिन’ जैसी रचनाएँ उदाहरण हैं। इस (1971 के पूर्ववर्ती) कालखण्ड की लघुकथाएँ सामूहिक रूप से समकालीन लघुकथा की विशिष्टताओं को एक साथ, एक रूपाकार में प्रदर्शित नहीं कर सकीं। सामान्यतः लेखकों द्वारा अपने समय की आवश्यकताओं, भाषा-शैली एवं जीवन-मूल्यों व उनसे जुड़ी आस्थाओं के अनुरूप लघुकथाओं को रचा गया, जबकि उनके कुछ समकालीनों ने भविष्य के पदचिह्नों को पहचानकर तदनुरूप कुछ ऐसी लघुकथाओं की रचना की, जिनमें कथ्य ही नहीं, भाषा-शैली और अन्य तकनीक के स्तर पर 1971 के बाद जैसी समकालीनता देखने को मिल जाती है।

      1971 के बाद की लघुकथा अपनी पूर्ववर्ती लघुकथा से पूर्णतः भिन्न है, जिसमें आजादी के बाद भारतीय समाज में आये परिवर्तनों का प्रतिबिम्ब देखने को मिलता है। आजादी के बाद की पीढ़ी ने न तो आजादी का संघर्ष देखा, न ही गुलामी के अपमान और पीड़ा से भरी परिस्थितियों को। दूसरे, सत्ता का लालच, राजनैतिक दाँव-पेंच, आजादी के बाद स्वशासित व्यवस्था से आकांक्षाओं की पूर्ति न होने से जनित निराशा, सामाजिक-आर्थिक भेदभाव, जीवन-स्तर एवं आर्थिक संप्रभुता की होड़ और उनसे जनित परिस्थितियों के उभार के साथ बाबुओं और इंसपेक्टरों के राज की बुनी हुई परिस्थितियों ने मनुष्य के चरित्र और आकांक्षाओं के ताने-बाने को बदलकर रख दिया। वैचारिक स्तर पर आम आदमी की पक्षधरता के नाम पर उसे अपने जबड़ो में दबोचकर रखने वाली एक नई कौम का उदय भी हुआ। इस तरह की तमाम चीजों और उनके परिणामों के प्रभाव से जनित समकालीनता ने लेखन की भाषा-शैली और व्यंजनात्मक कथ्यों को नव्यता की कोंपलों से आच्छादित करना आरम्भ कर दिया। अनुभति की प्रकृति व सान्द्रता और उसके सम्प्रेषण की तीव्रता में अभूतपूर्व परिवर्तन आया। ये परिवर्तन कविता और कथा साहित्य- दोनों में प्रतिबिम्बित हुए। लम्बी कविताएँ और लम्बी कहानियाँ लिखी अवश्य गईं, किन्तु अभिव्यक्ति की छटपटाहट जीवन के हर पक्ष से जुड़ी अलग-अलग संवेदना और अलग-अलग अनुभूति में निहित दिखाई देने लगी। परिणामस्वरूप कविता और कहानी- दोनों में घनीभूत अभिव्यक्ति के तीव्र सम्प्रेषण ने नए विधागत स्वभावों के संयोग उत्पन्न किये। इसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप लघुकथा का नया अवतार नयी पीढ़ी की नई ऊर्जा के साथ एक नये युग के निर्माण की आकांक्षा लेकर सामने आया। समकालीन लघुकथा के रूप में कथा साहित्य की रचनात्मक नव्यता का यह आन्दोलन यूँ तो किसी न किसी रूप में पूरे देश में चला, किन्तु हिन्दीभाषी प्रान्तों में कुछ अधिक स्फूर्तिवान बना, शायद इसलिए कि हिन्दी बोलने-समझने वालों का क्षेत्रीय दायरा अधिक बड़ा है। दूसरा कारण मेरी दृष्टि में यह रहा होगा कि सत्ता और राजनीति के केन्द्र के सर्वाधिक निकट होने के कारण लघुकथा की विषयवस्तु बनी स्थितियों-परिस्थितियों के सबसे निकट और सबसे अधिक भोक्ता बने लोगों का संकेन्द्रण इसी क्षेत्र में रहा है।

      यद्यपि लघुकथा के विकास में समस्त हिन्दीभाषी प्रान्तों ने एक इकाई की तरह काम किया, किन्तु स्थानीय सहभागिता की दृष्टि से उत्तर प्रदेश ने सबसे बड़ा प्रदेश होने के सानुरूप लघुकथा के आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। भले ही उ.प्र. से पत्र-पत्रिकाओं के लघुकथा विशेषांक अपेक्षित संख्या में नहीं आ पाये हों किन्तु पर्याप्त संख्या में लघुकथा लेखन की ओर आकृष्ट युवा लेखकों की टीम व लघुपत्रिकाओं ने लघुकथा लेखन, उसके फुटकर प्रकाशन, विमर्श एवं अन्य गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

      यदि हम समकालीन लघुकथा के पूर्ववर्ती (1971 से पहले) कालखण्ड की लघुकथा सम्बन्धी सक्रियता की बात करें तो हमें काफी पीछे जाना होगा। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (बनारस) की भूमिका को उनकी रचना ‘अंगहीन धनी’ के पहली लघुकथा होने के साथ परिहासिनी (रचनाकाल 1875-80) में शामिल रचनाओं में उपलब्ध प्रभावी कथासूत्रों के लिए जाना जाता है। अन्य प्रमुख साहित्यकारों में प्रेमचंद (बनारस), जयशंकर प्रसाद (बनारस), कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर (सहारनपुर), आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र (सहारनपुर), पाण्डेय बेचैन शर्मा ‘उग्र’ (मिर्जापुर), सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला (प्रयाग), रावी (हमीरपुर/आगरा), विष्णु प्रभाकर (मुजफ्फरनगर/नोएडा), काशीनाथ सिंह (चंदौली/बनारस), विनायक (फैजाबाद), शरदकुमार मिश्र ‘शरद’ (सहारनपुर) आदि की लघुकथाओं की व्यापक चर्चा होती रही है। इन सभी ने कुछ न कुछ लघुकथाएँ अवश्य लिखी हैं। माना जाता है कि इनमें से कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर (आकाश के तारे: धरती के फूल/1957), आचार्य जगदीश चन्द्र मिश्र (पंचतत्व/1857, खाली भरे हाथ/1958, मिट्टी के आदमी/1966, ऐतिहासिक लघुकथाएँ/1971, उड़ने के पंख, धूल के फूल, माणिक मोती, हीरे मोती), रावी (मेरे कथागुरु का कहना है-भाग 01 व भाग02/क्रमशः 1958 व 1961, रावी की परवर्ती लघुकथाएँ/1984), विष्णु प्रभाकर (जीवन पराग, आपकी कृपा है, कौन जीता कौन हारा), विनायक (‘काक्रोची’) एवं शरदकुमार मिश्र ‘शरद’ (‘धूप और धुआँ’/1957) के लघुकथा संग्रह भी प्रकाशित हुए। इन साहित्यकारों की रचनाओं में अलग-अलग प्रकृति की लघुकथाएँ मिलती हैं और कई लघुकथाएँ किसी न किसी रूप में समकालीन लघुकथा के निकट हैं। इनमें प्रेमचंद की रचना ‘राष्ट्र का सेवक’, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ की रचना ‘इन्जीनियर की कोठी’, जयशंकर प्रसाद की रचना ‘गूदड़ साईं’, रावी की रचना ‘भिखारी और चोर’, विष्णु प्रभाकर की लघुकथा ‘फर्क’, शरदकुमार मिश्र ‘शरद’ की लघुकथा ‘स्नेह का स्वाद’ आदि का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

      1971 के बाद की लघुकथा पर दृष्टि डालें तो लघुकथा के कई शीर्षस्थ व्यक्तित्व उत्तर प्रदेश से ही आते हैं। इनमें से जगदीश कश्यप (गाजियाबाद) संभवतः 1971 के पूर्व ही लघुकथा से जुड़ चुके थे और 1972-73 तक आते-आते वह लघुकथा की पत्रिका ‘मिनी युग’ का आरम्भ भी कर चुके थे। मूर्धन्य कथाकार बलराम (कानपुर) भी लघुकथा-सृजन से 1970 में ही जुड़ चुके थे और बाद के वर्षो में उन्होंने राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लघुकथा के लिए जो समर्पित प्रयास किये, उनसे साहित्य की दुनिया का हर व्यक्ति परिचित है। यद्यपि रोजी-रोटी के सिलसिले ने लोगों की दृष्टि में उन्हें दिल्ली का बना दिया। 1972 में डॉ. बलराम अग्रवाल (बुलन्दशहर) व रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ (सहारनपुर) तथा 1973 में सुकेश साहनी (लखनऊ/बरेली) जैसे प्रमुख हस्ताक्षर लघुकथा सृजन की कमान सम्हाल चुके थे। बाद में डॉ. बलराम अग्रवाल ने अपनी कर्मभूमि दिल्ली को बना लिया। राजेन्द्र परदेसी (लखनऊ़), राजेन्द्रमोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’ (रायबरेली), नंदल हितैषी (प्रतापगढ़/इलाहाबाद) भी लघुकथा आन्दोलन के आरम्भ काल से ही लघुकथा से जुड़े वरिष्ठ लघुकथाकार हैं। 1977 में लघुकथा सृजन से जुड़े वरिष्ठ लघुकथाकार सतीशराज पुष्करणा कीे कर्मभूमि भले मुख्यतः बिहार रही हो, किन्तु उनकी शिक्षा-दीक्षा एवं अंशतः उनकी कर्मभूमि भी उ.प्र. रही है। जन्मतः एवं सम्पर्क सूत्र की दृष्टि से मूर्धन्य कथाकार असगर वजाहत साहब का सम्बन्ध भी (फतेहपुर/नोएडा) उ.प्र. से है। लघुकथा के समालोचक एवं सिद्धान्तकार के रूप में सुपरिचित मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. कमलकिशोर गोयनका साहब (बुलन्दशहर), डाॅ. रत्नलाल शर्मा (बालका, बुलन्दशहर) तथा डाॅ. ऋषभदेव  शर्मा (खतौली)  भी मूलतः उ.प्र. के हैं। यद्यपि वजाहत साहब व गोयनका साहब- दोनों की कर्मभूमि दिल्ली को माना जाता है। समकालीन लघुकथा सृजन से आन्दोलन काल (बीसवीं सदी के अंत तक) में जुड़ने वाले उ. प्र. के अन्य प्रमुख रचनाकारों में जिनका नाम लिया जा सकता है, अकारादि क्रम में ये इस प्रकार हैं- अखिलेन्द्र पाल सिंह (गाजियाबाद), अखिलेश श्रीवास्तव ‘चमन’ (लखनऊ), अनिल जनविजय (बरेली), अमर गोस्वामी (गाजियाबाद), अमरीक सिंह दीप (कानपुर), उमाशंकर मिश्र (गाजियाबाद), उमेश महादोषी (बरेली), अरविन्द बेलवाल (बरेली), अवधेश श्रीवास्तव (हापुड़), अशोक गुप्ता (गाजियाबाद), ओमप्रकाश कश्यप (गाजियाबाद), कमल गुप्त (वाराणसी), कमलेश भट्ट ‘कमल’ (सुल्तानपुर/गाजियाबाद), कालीचरण प्रेमी (गाजियाबाद, किशन लाल (आगरा), कुँअर बेचैन (गाजियाबाद), के. पी. सक्सेना (लखनऊ), चित्रेश (सुल्तानपुर), दिनेश पाठक ‘शशि’ (मथुरा), दामोदर दत्त दीक्षित (लखनऊ), नीलम जैन (सहारनपुर), निर्मला सिंह (बरेली), प्रमोद कुमार बेअसर (कानपुर), प्रेम गुप्ता ‘मानी’ (कानपुर), पुष्कर द्विवेदी (इटावा), पुष्पा रघु (गाजियाबाद), भगवती प्रसाद द्विवेदी (बलिया), महेश चन्द्र सांख्यधर (बिजनौर), मुद्राराक्षस (लखनऊ), डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव (लखनऊ), रघुनाथ प्यासा (मु.नगर), रमेश सिद्धार्थ (खुर्जा), रमेशचंद्र श्रीवास्तव (मऊ/लखनऊ), रमेश गौतम (बरेली), रमेश राज (अलीगढ़), राजेन्द्रकृष्ण श्रीवास्तव (लखनऊ), राजकुमार गौतम (नोएडा), राजेन्द्र वर्मा (लखनऊ), डॉ. रामबहादुर व्यथित (बदायूँ), विनोद कपाड़ी शान्त (नोएडा), विपिन जैन (गाजियाबाद), विष्णु सक्सेना (गाजियाबाद), वी. के. जौहरी ‘बदायूँनी’ (बरेली), वेदप्रकाश अमिताभ (अलीगढ़), श्याम बिहारी श्यामल (वाराणसी), श्रीराम शुक्ला ‘राम’ (फतेहपुर), श्रीनाथ (कानपुर), शराफत अली खान (बरेली), स्वप्निल श्रीवास्तव (फैजाबाद), सुरंजन (गाजियाबाद), सुरेन्द्र सुकुमार (अलीगढ़), सुधा शर्मा (मेरठ) सुधाकर शर्मा आशावादी (मेरठ), सुनील कौशिश (मु.नगर), सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा (गाजियाबाद),  हरिशंकर शर्मा (बरेली), हरिशंकर सक्सेना (बरेली) आदि। वरिष्ठ लघुकथाकारों में कई और भी ऐसे हैं, जो जन्मतः उ. प्र. के हैं या जिनकी आरम्भिक कर्मभूमि उ.प्र. रही है किन्तु बाद में अन्य राज्यों को उन्होंने अपनी कर्मभूमि बना लिया। इनमें अशोक मिश्रा, अशोक वर्मा, आभा सिंह, रूपसिंह चन्देल, सुभाष नीरव, विभा रश्मि, हीरालाल नागर आदि प्रमुख हैं।

      आलेख की सीमाओं के दृष्टिगत उ.प्र. में अनवरत क्रियाशील लघुकथाकारों में से, जिनकी जितनी जानकारी विभिन्न स्रोतों से प्राप्त करना संभव हो पाया है, उसके अनुरूप यहाँ उनके योगदान की संक्षिप्त चर्चा करना प्रासंगिक होगा।

शेष आगामी अंक में…

‘लघुकथा कलश’ (आलेख महाविशेषांक-1, जुलाई-दिसंबर 2020; संपादक:योगराज प्रभाकर) से साभार

डॉ॰ उमेश महादोषी : ‘अविराम साहित्यिकी’ के संपादक हैं। मोबाइल नं॰ 94589 29004

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