Saturday, 20 March, 2021

लघुकथा की विकास-यात्रा में उ.प्र. का योगदान-2 / डॉ. उमेश महादोषी

(पहली कड़ी दिनांक 19-3-2021 के बाद)

लम्बे लेख की दूसरी कड़ी

      स्व. जगदीश कश्यप (01.12.1949-17.08.2004) समकालीन लघकथा के पुरोधाओं में अग्रणी

डॉ. उमेश महादोषी
थे। उन्होंने न केवल महत्वपूर्ण लघुकथाओं का सृजन किया, लघुकथा के इतिहास एवं विकास यात्रा के सूत्रों की खोज एवं उसके संरचनात्मक स्वरूप पर भी पर्याप्त काम किया। समीक्षात्मक-समालोचनात्मक कार्य एवं संपादन के माध्यम से लघुकथा के प्रचार-प्रसार एवं स्वीकार्यता के लिए उनका समर्पण स्मरणीय है। उन्होंने नई पीढ़ी के अनेकानेक साहित्यकारों को लघुकथा-सृजन से जोड़ने का प्रयास भी किया। अंतिम गरीब, ब्लैक हार्स, साँपों के बीच, सरस्वती-पुत्र, सीढ़ी से उतरते हुए, उपकृत, दूसरा सुदामा आदि उनकी महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैं। वह पहले लघुकथा संकलन ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ (1974/संपादक: रमेश जैन व भगीरथ) में भी शामिल हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं के साथ इण्टरनेट पर कई साइट्स पर उनकी लघुकथाएँ सहज उपलब्ध हैं। ‘कोहरे से गुजरते हुए’ उनका लघुकथा संग्रह है। उनके परिचय में कुछ जगह उनके ‘नागरिक’ एवं ‘कदम-कदम पर हादसे’ संग्रहों की भी चर्चा की गई है। ‘छोटी-बड़ी बातें’ (महावीर प्रसाद जैन के साथ) एवं ‘विरासत’ तथा उनकी मृत्योपरान्त प्रकाशित ‘बीसवीं सदी की चर्चित हिन्दी लघुकथाएँ’ उनके द्वारा संपादित लघुकथा संकलन हैं। लघुकथा की अनियतकालिक पत्रिका ‘मिनी युग’ का 1972-73 से प्रकाशन एवं संपादन भी उन्होंने किया। वह अखिल भारतीय लघुकथा मंच के महासचिव भी रहे। माना जाता है कि खलील जिब्रान में उनकी अटूट आस्था थी। कथाकार सुरंजन द्वारा संपादित पत्रिका ‘कथा संसार’ (गाजियाबाद) ने मरणोपरान्त उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर लघुकथा विशेषांक-2005 में विस्तृत चर्चा की है।

      उ.प्र. में अनवरत रूप से साधनारत लघुकथा के दूसरे पुरोधा हैं सुकेश साहनी, जिन्होंने लघुकथा के विकास में अविस्मरणीय योगदान किया है। उनका लघुकथा सृजन कुछ अलग तरह से देखा जाता है। नये विषय, अद्यतन शब्दावली, नई दृष्टि के साथ बिम्बों एवं प्रतीकों का व्यंजनात्मक एवं कुछ जगह अतिरंजनात्मक प्रयोग देखने को मिलता है। गोश्त की गंध, ठंडी रजाई, चादर, आइसबर्ग, ओए बबली, खेल, वायरस, साइबरमैन, चिड़िया आदि उनकी महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैं। डरे हुए लोग, ठंडी रजाई, सुकेश साहनी की 66 लघुकथाएँ और उनकी पड़ताल (पड़ाव और पड़ताल, खण्ड-25, संपादक मधुदीप) एवं साइबरमैन साहनी जी के लघुकथा संग्रह हैं। आपकी ठंडी रजाई, दादाजी एवं कुत्ते से सावधान लघुकथाओं पर लघु फिल्में भी बनी हैं। महानगर की लघुकथाएँ, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की लघुकथाएँ, देह व्यापार की लघुकथाएँ, बीसवीं सदी: प्रतिनिधि लघुकथाएँ, समकालीन भारतीय लघुकथाएँ, दस्तक, गहरे पानी पैठ, मास्टर स्ट्रोक आपके द्वारा संपादित लघुकथा संकलन हैं। कई अन्य लघुकथा संकलनों- मानवमूल्यों की लघुकथाएँ, बालमनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ, लघुकथाएँ जीवनमूल्यों की, लघुकथाएँ देश-देशान्तर, मेरी पसंद (3 खण्ड), लघुकथा अनवरत (2 खण्ड) आदि का संपादन रामेश्वर काम्बोज हिमांशु के साथ किया है। लघुकथा की प्रथम वेबपत्रिका ‘लघुकथा डॉट काम’ का वर्ष 2000 से रामेश्वर काम्बोज हिमांशु के साथ संपादन-प्रकाशन कर रहे हैं। ‘खलील जिब्रान की लघुकथाएँ’ तथा ‘पागल एवं अन्य लघुकथाएँ’ आपके द्वारा अनूदित लघुकथा पुस्तकें हैं। आपके लघुकथा संग्रहों का अनुवाद पंजाबी, मराठी, उर्दू, गुजराती व अंग्रेजी में हुआ है। ‘लघुकथा: सृजन और रचना कौशल’ लघुकथा पर आपके समालोचनात्मक आलेखों का संग्रह है। साहनी जी के लघुकथा रचनाकर्म पर वरिष्ठ लघुकथाकार भगीरथ परिहार ने ‘कथाशिल्पी सुकेश साहनी की सृजन संचेतना’ नामक समालोचनात्मक पुस्तक भी लिखी है। बरेली शहर में आयोजित दो अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलनों के वह आयोजक रहे हैं, जिसमें रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, अरविन्द बेलवाल एवं अन्य लघुकथाकारों का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। ‘हिन्दी चेतना’ (कनाडा) एवं अभिनव इमरोज (रा.का.‘हिमांशु’ के साथ) के एक-एक लघुकथा विशेषांक का संपादन भी किया है। साहनी जी की प्रेरणा व सहयोग से कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है, जिसके माध्यम से युवा लघुकथाकारों को श्रेष्ठ लघुकथा सृजन हेतु प्रेरित किया जाता है। इस प्रकार साहनी जी ने लघुकथा के सभी पक्षों पर विस्तार से काम किया है, जो निरंतर जारी है।

      रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ उन महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में से हैं, जिन्होंने अन्य विधाओं में सक्रिय रहते हुए लघुकथा में सृजन, संपादन एवं समालोचनात्मक- सभी स्तरों पर लघुकथा के विकास में योगदान किया है। ‘ऊँचाई’, पिघलती हुई वर्फ, कमीज, नवजन्मा, चक्रव्यूह, छोटे-बड़े सपने हिमांशु जी की महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैं। ‘असभ्य नगर एवं अन्य लघुकथाएँ’ हिमांशु जी का लघुकथा संग्रह है। ‘लघुकथा का वर्तमान परिदृश्य’ आपकी समालोचनात्मक पुस्तक है। मानवमूल्यों की लघुकथाएँ, बालमनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ, लघुकथाएँ जीवनमूल्यों की, लघुकथाएँ देश-देशान्तर, मेरी पसंद (3 खण्ड), लघुकथा अनवरत (2 खण्ड) लघुकथा संकलनो एवं लघुकथा की प्रथम वेबपत्रिका ‘लघुकथा डॉट काम’ का वर्ष 2000 से सुकेश साहनी के साथ संपादन कर रहे हैं। कनाडा की पत्रिका ‘हिन्दी चेतना’ के सह-संपादक हैं। अभिनव इमरोज (सुकेश साहनी के साथ) एवं शोध दिशा के लघुकथा विशेषांक-2015 व 2017 का संपादन भी किया है। आपकी लघुकथा ‘ऊँचाई’ पर बोझ नाम से लघुफिल्म बनी है।

      विष्णु सक्सेना पहले लघुकथा संकलन ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ (1974/संपादक: रमेश जैन व भगीरथ) में सम्मिलित लघुकथाकार हैं। उनके प्रकाशित लघुकथा संग्रह ‘एक कतरा सच’ की जानकारी प्राप्त है।

      वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र परदेसी से प्राप्त सूचनानुसार उनके कथा लेखन का आरम्भ लघुकथा से ही हुआ था। ‘दूर होता गाँव’ उनका प्रकाशित लघुकथा संग्रह है। परदेसी जी की लघुकथा ‘अपनी धरती’ सीबीएसई से सम्बद्ध कक्षा सात की पुस्तक ‘अनुपम भारती’ में लग चुकी है।

      राजेन्द्रमोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’ लघुकथा की विकास यात्रा में निरंतर सक्रिय रहे हैं। उनके दो लघुकथा संग्रह ‘कागज के रिश्ते’ व ‘रेत का सफर’ प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने दो लघुकथा संकलनों- ‘जिन्दगी के आसपास’ व ‘पतझड़ के बाद’ का संपादन किया है। लघुकथा पोस्टर ‘ललकार’ का संपादन पुष्करणा जी के साथ किया है।

      नंदल हितैषी के तीन लघुकथा संग्रह- डायरी के पन्ने, दर्द अपना-पराया एवं यंत्रवत् तथा एक संपादित लघुकथा संकलन ‘आतंक’ प्रकाशित हुआ। नंदल जी का लघुकथा की विकास यात्रा में स्मणीय योगदान रहा है।

      भगवती प्रसाद द्विवेदी का एक लघुकथा संग्रह ‘भविष्य का वर्तमान’ प्रकाशित हुआ है। उन्होंने पुष्करणा जी के साथ ‘युवा रश्मि’ के लघुकथा विशेषांक (जून 1985) का संपादन भी किया है।

      कालीचरण प्रेमी भी अत्यंत सक्रिय लघुकथाकारों में शामिल रहे हैं। ‘कीलें’ एवं ‘तवा’ उनके प्रकाशित लघुकथा संग्रह हैं। सम्पादित लघुकथा संकलन ‘अंधा मोड़’ (पुष्पा रघु के साथ) प्रकाशित हुआ है। अमरीक सिंह दीप ने ‘आजादी की फसल’ लघुकथा संकलन संपादित किया। राजकुमार गौतम निरंतर लघुकथा में सृजनरत रहे हैं। उनकी लघुकथाएँ, पत्र-पत्रिकाओं, पड़ाव और पड़ताल खण्ड-5 के साथ उनके कहानी व लघुकथा के मिश्रित संग्रह ‘दूसरी आत्महत्या’ में प्रकाशित हुई हैं।

      शैल रस्तोगी (मेरठ) ने लघुकथा में पर्याप्त योगदान किया है। उनके तीन लघुकथा संग्रहों की जानकारी उपलब्ध है- ‘यह भी सच है’, ‘मेरा शहर और ये दंगे’ एवं ‘ऐसा भी होता है’। किशनलाल शर्मा लघुकथा की विकास यात्रा के अनवरत सक्रिय सहभागी हैं। उनके तीन लघुकथा संग्रह- पर्दे के पीछे, नीम का पेड़ एवं अनसुलझा प्रश्न प्रकाशित हुए हैं।

      राजेन्द्र कृष्ण श्रीवास्तव की लघुकथाओं का प्रकाशन 1975 से होता रहा है। उन्होंने 1980 में ‘प्रोत्साहन’ नामक पत्रिका का संपादन-प्रकाशन भी लखनऊ से आरम्भ किया था। इस पत्रिका का लघुकथा विशेषांक भी संपादित-प्रकाशित किया।

      शराफत अली खान के दो लघुकथा संग्रह- अक्षरों के आँसू एवं कीकर के पत्ते प्रकाशित हुए हैं। विवशता, मजहब, परिवर्तन, मुहब्बत आदि आपकी महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैं। सुधाकर शर्मा आशावादी ने काफी संख्या में लघुकथाएँ लिखीं हैं। उनके प्रकाशित संग्रह हैं- सरोकार, धूप का टुकड़ा, अपने-अपने अर्थ, मुखौटे, प्रतिनिधि लघुकथाएँ, आँच आदि। सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा के तीन लघुकथा संग्रहों- आजादी, विष कन्या एवं तीसरा पैग की जानकारी प्राप्त है। आपने ‘तैरते पत्थर डूबते कागज’ व ‘दरकते किनारे’ लघुकथा संकलनों का संपादन एवं लघुकथा व काव्य की पत्रिका ‘मृग मरीचिका’ का संपादन-प्रकाशन भी किया है। कमलेश भट्ट कमल समकालीन लघुकथा के आरम्भिक काल में जुड़े रहे, बाद में दूसरी विधाओं की ओर चले गये। उनकी कुछेक लघुकथाओं की ही जानकारी प्राप्त है। ‘शब्द साक्षी’ उनके द्वारा संपादित लघुकथा संकलन है। कमलेश जी की डॉ. कमलकिशोर गोयनका जी के साथ बातचीत ‘साक्षात्’ भी प्रकाशित हुई है।

      वेदप्रकाश अमिताभ (अलीगढ़) ने त्रैमासिकी ‘अभिनव प्रसंगवश’ का संपादन करते हुए लघुकथा को समर्थन दिया। ‘गुलामी तथा अन्य लघुकथाएँ’ आपका प्रकाशित संग्रह है। आपने लघुकथा पर छुटपुट समालोचनात्मक कार्य भी किया है।

      रमेश गौतम ने लघुकथा लिखना 1989 में आरम्भ किया और उसी वर्ष लघुकथा पोस्टर ‘कथा दृष्टि’ का संपादन भी आरम्भ किया। दैनिक ‘विश्वमानव’ के संपादन के दौरान आपने लघुकथा को उसके संघर्ष-काल में पर्याप्त समर्थन दिया। आपकी लघुकथाएँ पत्र-पत्रिकाओं व संकलनों में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। प्रेम गुप्ता ‘मानी’ ने 1986 में लघुकथा संकलन ‘दस्तावेज’ का संपादन किया। उनकी लघुकथाएँ पत्र-पत्रिकाओं व संकलनों में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं।

शेष आगामी अंक में…

‘लघुकथा कलश’ (आलेख महाविशेषांक-1, जुलाई-दिसंबर 2020; संपादक:योगराज प्रभाकर) से साभार

डॉ॰ उमेश महादोषी : ‘अविराम साहित्यिकी’ के संपादक हैं। मोबाइल नं॰ 94589 29004

2 comments:

पवन शर्मा said...

अच्छा आलेख है उत्तर प्रदेश के परिदृश्य में लघुकथा के अवदान को लेकर..

Vibha Rashmi said...

उमेश महादोषी जी का आलेख "लघुकथा की विकास यात्रा में उत्तर प्रदेश के लघुकथाकारों का योगदान " एक सार्थक आलेख है , जिससे विस्तृत जानकारी मिली । बधाई ।