महेंद्र कुमार |
जिस तरह से दर्शन की कोई सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन है उसी तरह से लघुकथा की भी। हरिशंकर परसाई के अनुसार, "लघुकथा कथात्मक अभिव्यक्ति का लघुत्तम रूप है।" यह परिभाषा काफ़ी हद तक लघुकथा को परिभाषित करती है, पर क्या एक ही कथ्य को दो अलग-अलग तरीकों से प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता? यदि एक अभिव्यक्ति दूसरी अभिव्यक्ति से एक शब्द ज़्यादा ले रही हो तो क्या उसे लघुकथा नहीं कहा जाएगा? लघुकथा की लघुता शब्दों में मापी जाती है पर ऐसा करने पर क्या हम उसके न्यूनतम अथवा अधिकतम शब्दों को निर्धारित कर सकते हैं? यदि किसी बालू के ढेर में रेत के हजार कण हों तो क्या उसमें से बालू का एक कण कम कर देने से वह बालू का ढेर नहीं रह जाएगा? यदि नहीं, तो एक-एक कर रेत के कितने कणों को ढेर से निकाला जा सकता है? यदि एक-एक कण निकालने की प्रक्रिया को जारी रखा जाए और अंत में सिर्फ़ एक ही कण बचे तो क्या उसे ढेर कहा जा सकता है? यही स्थिति लघुकथा की भी है। अस्पष्टता का यह दोष लघुकथा अथवा बालू के ढेर का न होकर हमारी भाषा का है। भाषा में कई ऐसे शब्द होते हैं जो अस्पष्ट होते हैं जैसे, ठंडा, गर्म, लंबा, चौड़ा, पतला, मीठा, रंग, खेल, ढेर आदि। लघुकथा के साथ जुड़ा हुआ 'लघु' भी एक ऐसा ही शब्द है। यदि हमें 'खेल' की परिभाषा देनी हो तो हम क्या देंगे? क्या खेल वह है जिसमें जीत-हार होती है? अगर आप चाबी के गुच्छे को उँगलियों से घुमाकर उसके साथ खेल रहे हों तो उसमें किसकी जीत हो रही है और कौन हार रहा है? क्या खुशी अथवा आनंद प्राप्त होने को खेल कहा जा सकता है? यदि हाँ, तो फिर सफल सर्जरी के बाद एक चिकित्सक को मिलने वाली खुशी को क्या कहेंगे? सच तो यह है कि खेल को समझने के लिए हमें उसकी परिभाषा देने की नहीं बल्कि अलग-अलग खेलों को देखने की ज़रूरत है। जब हम इन खेलों को अलग-अलग देखेंगे तो समझेंगे कि ये सभी मिलकर एक परिवार का निर्माण करते हैं। किसी सामाजिक समारोह में एकत्र होने वाले परिवार में दादी दादा, नानी-नाना, मौसी-मौसा, चाची- चाचा, बुआ-फूफा, दीदी-जीजा और माता-पिता आदि अनेक लोग हो सकते हैं। इनमें से कोई लंबा होगा तो कोई छोटा, कोई मोटा होगा तो कोई पतला, कोई बूढ़ा होगा तो कोई जवान। इन लोगों में ऐसा कुछ भी न होगा जो सभी में समान हो फिर भी ये सभी एक-दूसरे से संबंधित होंगे। इस संबंध को देखने के लिए हमें किसी 'समान तत्त्व' को देखने की नहीं बल्कि विट्गेन्स्टाइन के शब्दों में 'पारिवारिक साम्य'' को देखने की ज़रूरत है। यही बात 'लघुकथा' के ऊपर भी लागू होती है।
भाषा की इस अस्पष्टता से बचने के लिए दर्शन में एक नई धारा का विकास होता है जिसे विश्लेषणाक दर्शन कहते हैं। विश्लेषणात्मक दर्शन में सारा ज़ोर अनर्गल बातों को हटा (विश्लेषित) कर निष्कर्ष और उसे स्थापित करने वाले तर्कों पर होता है। ठीक इसी तरह से लघुकथा में भी सारा ध्यान अनावश्यक विवरण से बचते हुए कथ्य को प्रभावी तरीके से न्यूनतम शब्दों में अभिव्यक्त करने पर होता है। यहाँ भी लघुकथा का दर्शन से संबंध स्पष्ट है। इसी तरह से लघुकथा में क्या कहना है, क्यों कहना है और कैसे कहना है, के प्रश्न भी दर्शन से ही संबंधित हैं। इन्हें हम 'लघुकथा का दर्शनशास्त्र' कह सकते हैं।
शेष आगामी अंक में...
'लघुकथा कलश' (जुलाई-दिसंबर 2021; अप्रकाशित लघुकथा विशेषांक-1)पृष्ठ 130 से साभार
संपादक : योगराज प्रभाकर
3 comments:
लघुकथा में दर्शनशास्त्र की महत्वपूर्ण जानकारी।
बहुत ही सारगर्भित जानकारी👏👏
आपका बहुत बहुत धन्यवाद सर,आपके लेखन से मेरी चिंतन करने की क्षमता में सुधार हुआ। लेखन मुझे बहुत अच्छा लगा।
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