Monday, 16 September 2024

मंटो की चुनी हुई लघुकथाएँ

'सियाह हाशिए' (1955) से चुनी हुई कुछ लघुकथाएँ। प्रस्तुति : बलराम अग्रवाल 


'सियाह हाशिए' का समर्पण पृष्ठ

             उस आदमी के नाम जिसने 

                अपनी खूंरेज़ियों

            का जिक्र करते हुए कहा : 

            जब मैंने एक बुढ़िया को मारा 

             तो मुझे ऐसा लगा--

            'मुझसे क़त्ल हो गया...!!'

।।1।।

करामात

लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किए।

लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अंधेरे में बाहर फेंकने लगे। कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौक़ा पाकर अपने से अलग कर दिया ताकि क़ानूनी गिरफ़्त से बचे रहें।

एक आदमी को बहुत दिक़्क़त पेश आई। उसके पास चीनी की दो बोरियां थीं जो उसने पंसारी की दूकान से लूटी थीं। एक को तो वह जैसे-तैसे रात के अंधेरे में पास वाले कुंए में फेंक आया; लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा तो ख़ुद भी साथ चला गया।

शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गए। कुएं में रस्सियां डाली गईं।

जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया। लेकिन वह चंद घंटों बाद मर गया।

दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए उस कुएं में से पानी निकाला तो वह मीठा था।

उसी रात उस आदमी की कब्र पर दीए जल रहे थे।

।।2।।

ग़लती का सुधार

'कौन हो तुम ?'

'तुम कौन हो ?'

'हर-हर महादेव... हर-हर महादेव!'

'हर-हर महादेव!'

'सुबूत क्या है ?'

'सुबूत...? मेरा नाम धरमचंद है।'

'यह कोई सुबूत नहीं।'

'चार वेदों में से कोई भी बात मुझसे पूछ लो।'

'हम वेदों को नहीं जानते... सुबूत दो।'

'क्या ?'

'पायजामा ढीला करो।'

पायजामा ढीला हुआ तो शोर मच गया- 'मार डालो... मार डालो।'

'ठहरो... ठहरो... मैं तुम्हारा भाई हूं... भगवान की क़सम, तुम्हारा भाई हूं।'

'तो यह क्या सिलसिला है ?'

'जिस इलाक़े से मैं आ रहा हूं, वह हमारे दुश्मनों का है... इसीलिए मजबूरन मुझे ऐसा करना पड़ा, सिर्फ़ अपनी जान बचाने के लिए... एक यही चीज ग़लत हो गई है, बाक़ी मैं बिल्कुल ठीक हूं...'

'उड़ा दो ग़लती को...'

गलती उड़ा दी गई... धरमचंद भी साथ ही उड़ गया।

।।3।।

हलाल और झटका

'मैंने उसकी शहरग (हृदय से मिलने वाली सबसे बड़ी नस) पर छुरी रखी, हौले-हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया।'

'यह तुमने क्या किया ?'

'क्यों?'

'इसको हलाल क्यों किया ?'

'मज़ा आता है इस तरह।'

'मजा आता है के बच्चे... तुझे झटका करना चाहिए था... इस तरह।'

और हलाल करने वाले की गरदन का झटका हो गया।

।।4।।

घाटे का सौदा

दो दोस्तों ने मिलकर दस-बीस लड़कियों में से एक लड़की चुनी और बयालीस रुपए देकर उसे खरीद लिया। रात गुज़ार कर एक दोस्त ने उससे पूछा- 'तुम्हारा नाम क्या है?'

लड़की ने अपना नाम बताया तो वह भिन्ना गया- 'हमसे तो कहा गया था कि तुम दूसरे मजहब की हो...!'

लड़की ने जवाब दिया- 'उसने झूठ बोला था।'

यह सुन कर वह दौड़ा-दौड़ा अपने दोस्त के पास गया और कहने लगा--"उस हरामजादे ने हमारे साथ धोखा किया है। हमारे ही मजहब की लड़की थमा दी चलो, वापस कर आएँ।'

।।5।।

बंटवारा

एक आदमी ने अपने लिए लकड़ी का एक बड़ा संदूक़ चुना। जब उसे उठाने लगा तो वह अपनी जगह से एक इंच भी न हिला।

एक शख़्स ने, जिसे अपने मतलब की शायद कोई चीज़ मिल ही नहीं रही थी, संदूक़ उठाने की कोशिश करने वाले से कहा- 'मैं तुम्हारी मदद करूं ?'

संदूक़ उठाने की कोशिश करने वाला मदद लेने को राजी हो गया।

उस शख़्स ने जिसे अपने मतलब की कोई चीज़ नहीं मिल रही थी, अपने मज़बूत हाथों से संदूक़ को हिलाया और उठा कर पीठ पर धर लिया। दूसरे ने सहारा दिया; और दोनों बाहर निकले।

संदूक़ बहुत भारी था। उसके वज़न के नीचे, उठाने वाले की पीठ चटख रही थी और टांगें दोहरी होती जा रही थीं। मगर इनाम की उम्मीद ने उसके शारीरिक श्रम के अहसास को आधा कर दिया था।

संदूक़ उठाने वाले के मुक़ाबले में संदूक़ को चुनने वाला बहुत कमज़ोर था। सारे रास्ते सिर्फ़ एक हाथ से संदूक़ को सहारा देकर वह अपना हक़ बनाए रखता रहा।

जब दोनों सुरक्षित जगह पर पहुंच गए तो संदूक़ को एक तरक़ रख कर सारा श्रम करने वाले ने कहा- 'बोलो, इस संदूक़ के माल में से मुझे कितना मिलेगा ?'

संदूक़ पर पहली नज़र डालने वाले ने जवाब दिया, 'एक चौथाई।'

'यह तो बहुत कम है!'

'कम बिल्कुल नहीं, ज़्यादा है... इसलिए कि सबसे पहले मैंने ही इस माल पर हाथ डाला था।'

'ठीक है, लेकिन यहां तक इस कमरतोड़ बोझ को उठा के लाया कौन है?'

'अच्छा, आधे-आधे पर राजी होते हो ?'

'ठीक है, खोलो संदूक़।'

संदूक़ खोला गया तो उसमें से एक आदमी बाहर निकला। उसके हाथ में तलवार थी। उसने दोनों हिस्सेदारों को चार हिस्सों में काट डाला।

।।6।।

बेख़बरी का फ़ायदा

लबलबी दबी। पिस्तौल से झुंझलाकर गोली बाहर निकली। खिड़की में से बाहर झांकने वाला आदमी उसी जगह दोहरा हो गया।

लबलबी थोड़ी देर बाद फिर दबी। दूसरी गोली भिनभिनाती हुई बाहर निकली।

सड़क पर भिश्ती की मश्क फटी। वह औंधे मुंह गिरा और उसका लहू मश्क के पानी में घुल कर बहने लगा। लबलबी तीसरी बार दबी। निशाना चूक गया। गोली एक गीली दीवार में जज़्ब हो गई।

चौथी गोली एक बूढ़ी औरत की पीठ में लगी। वह चीख़ भी न सकी और वहीं ढेर हो गई। 

पांचवीं और छठी गोली बेकार गई। कोई हलाक हुआ न जख़्मी।

गोलियां चलाने वाला भिन्ना गया।

अचानक सड़क पर एक छोटा-सा बच्चा दौड़ता हुआ दिखाई दिया।

गोलियां चलाने वाले ने पिस्तौल का मुंह उसकी ओर मोड़ा। उसके साथी ने कहा, 'यह क्या करते हो?' गोलियां चलाने वाले ने पूछा, 'क्यों?' ' गोलियां तो ख़त्म हो चुकी हैं!' ' तुम ख़ामोश रहो... इतने से बच्चे को क्या मालूम ?'

।।7।।

मुनासिब कार्रवाई

जब हमला हुआ तो मुहल्ले में कुछ अल्पसंख्यक लोग क त्ल हो गए। जो बाक़ी बचे, जानें बचाकर भाग निकले। एक आदमी और उसकी बीवी अलबत्ता अपने घर के तहखाने में छिप गए।

छिपे हुए मियां-बीवी ने दो दिन और दो रातें हमलावरों के आने की आशंका में गुज़ार दी, मगर कोई नहीं आया। दो दिन और गुजर गए। मौत का डर कम होने लगा। भूख और प्यास ने ज़्यादा सताना शुरू किया। चार दिन और बीत गए। मियां-बीवी को जिंदगी और मौत से कोई दिलचस्पी न रही। दोनों उस शरणस्थली से बाहर निकल आए।

पति ने बड़ी धीमी आवाज में लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ आकृष्ट किया और कहा, 'हम दोनों अपना-आप तुम्हारे हवाले करते हैं। हमें मार डालो।' जिनका ध्यान आकर्षित किया था, वे सोच में पड़ गए-

'हमारे धरम में तो जीव-हत्या पाप है...' उन्होंने आपस में मशविरा किया और मियां-बीवी को मुनासिब कार्रवाई के लिए दूसरे मुहल्ले के आदमियों के सुपुर्द कर दिया।


(प्रकाशित : 'सनद', अक्टूबर-दिसम्बर, 2013/संस्थापक सम्पादक : फ़ज़ल इमाम मलिक)

Saturday, 7 September 2024

विभिन्न शैली प्रयोगों से युक्त ‘पीठ पर टिका घर’ / बलराम अग्रवाल



सुधा गोयल हिन्दी की जानी-मानी वरिष्ठ कथाकार हैं। अनेक उपन्यासों, कहानी संग्रहों, व्यंग्य संग्रहों, काव्य संग्रहों और बालगीत संग्रहों के प्रकाशन के उपरांत ‘पीठ पर टिका घर’ उनकी 94 लघुकथाओं का पहला संग्रह है जो लघुकथा साहित्य क्षेत्र के लिए प्रसन्नता का विषय है। लेखिका के अनुसार, इस संग्रह में उनकी सन् 1986 से लेकर अब (यानी 2024) तक लिखी लघुकथाएँ संग्रहीत हैं।

संग्रह की पहली लघुकथा ‘सप्तपदी का वायदा’ एक बड़े सिनेरियो की कथा है जिसमें से अनगिनत कोंपलें फूटती प्रतीत हो रही हैं; समर्थ कथाकार उसमें से जितनी चाहें कथाएँ निकाल सकते हैं, इसी का विस्तार कर लम्बी कहानी बना सकते हैं। अक्सर कहा जाता है कि लघुकथा अपने अन्त के साथ पाठक-मन-मस्तिष्क में विस्तार पाती है। ‘सप्तपदी का वायदा’ सरीखी अनेक लघुकथाओं के पठन से महसूस होता है कि एक अच्छी लघुकथा अपनी समूची काया में इस गुण को समेटे होती है। विचार, कल्पना और विस्तार के उसमें अनेक बिंदु होते हैं।

फ्रायड ने मन की तीन परतें निर्धारित की हैं; लेकिन उससे बहुत पहले जैन दर्शन मन को छ: प्रकार का बता चुका था। दृष्टिमोह और मिथ्याचार से ग्रसित मोह को जैनाचार्यों ने ‘मूढ़ मन’ माना है। मिथ्याचारों में से एक यह कि ‘लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे!’। यह विचार अनेक सही-गलत भावनाओं को रुद्ध करता है। लेकिन ‘वेलेन्टाइन डे’ के वर्माजी  प्रेम प्रकट करने के दबाव को साथ नहीं ले जाते, अन्तिम समय में व्यक्त कर ही देते हैं। सवाल यह पैदा होता है कि वर्माजी अगर कहकर निकल न लिए होते तो उनकी क्या गत होती? लेकिन लेखिका ने कथा के अन्तिम पैरा को कुछ इस तरह बुना है कि इसका ट्रीटमेंट पहले पैरा की तरह रोषात्मक न रहकर कोमल भावात्मक हो गया है।

कुछ लोग लघुकथा को ‘पंचलाइन’ में सीमित बताते हैं; जबकि सत्य यह है कि लघुकथा का कथ्य अपनी पूरी काया में फैला होता है। उसकी पूरी काया से गुजरे बिना कोई भी सुधी पाठक-आलोचक मात्र अन्तिम लाइनें ही पढ़कर किसी परिणाम पर नहीं  पहुँचना चाहेगा। ‘भगवान की पोशाक’ ऐसी ही लघुकथा है। ‘पंचलाइन’ के पैरोकार इसकी मात्र अन्तिम लाइनें पढ़कर यथार्थ संवेदन बिंदु तक पहुँचने का प्रयास करें।

लघुकथा ‘लक्ष्मी आई है’ पाठक को एक सकारात्मक विचार, कि—समस्त देवियों में मात्र ‘लक्ष्मी’ ही हैं जो बिना भगवान विष्णु (यानी पति) के ही पूजी जाती हैं। वहीं, ‘ये मेरी बेटी है’ भी पाठक को कन्याओं के प्रति लेखिका के भावों के समक्ष नत कर देता है। लघुकथा ‘ब्लैक फंगस’ दाम्पत्य प्रेम और परस्पर सहयोग का अनुपम चित्र प्रस्तुत करती है। ‘वारियर्स’ जीवन के लिए जूझते शरीरों को जूझने के टूल्स मुहैया कराने की कहानी प्रस्तुत करती है और सुकून प्रदान करती है कि धरती और समाज में सभी कुछ अभी मरा नहीं है। ‘पहल’ तथा ‘माँ का अधिकार’ भी स्त्री-सम्मान और स्वाभिमान की दिशा में नयी पहल प्रस्तुत करती हैं। ‘राहें ऐसी भी’ में एक ओर जहाँ कोरोना की विभीषिका का चित्रण है वहीं इन्सानियत के रंग भी हैं जो सिद्ध करते हैं कि दुनिया पूरी की पूरी बदरंग नहीं है। ‘स्मृति शेष’ बताती है कि एक रचनाकार को वास्तविक श्रद्धांजलि देना क्या होता है। ‘छत’ में लेखिका द्वारा श्लेष के प्रयोग से कथा की भावात्मकता को आयाम मिला है; इस प्रयोग ने रचना को अधिक सुन्दर, सम्प्रेषक और कलात्मक बना दिया है।

‘तमाचा’ एक शानदार-जानदार लघुकथा है। बेशक स्त्री विमर्श के खाने में रखकर भी इसका आकलन किया जा सकता है। जानबूझकर इसके कथानक का खुलासा यहाँ कर रहा हूँ, पाठकीय जिज्ञासा को बनाये रखने की दृष्टि से। ‘सौदा’ बताती है कि आतंकी घटनाओं की सफलता के पीछे कई बार पुलिस-आतंकी सहयोग भी काम करता है।

‘दया’ तथा ‘कोट और बीस रुपये’ जैसे कथ्यों पर कई लघुकथाएँ कई लघुकथाकारों द्वारा पूर्व में भी लिखी जाती रही हैं। कमल चोपड़ा की ‘साँसों के विक्रेता’ और चित्रा मुद्गल की ‘व्यवहारिकता’ के केन्द्र में यही कथ्य है। दरअसल दान अथवा दया का प्रारूप और पात्रता हम परम्परा से ग्रहण करते आये हैं, पात्र की आवश्यकता से न हम दान को जोड़ते हैं न उसके प्रति दया को। ‘आशीर्वाद’ बताती है कि धूर्तता की किस हद तक चालाक लोग  जरूरतमंद नौजवानों के श्रम का दोहन करते हैं।

लघुकथा ‘बँटवारा’ में चारों बेटों को ‘बेरोजगार’ दर्शाने का उद्देश्य समझ में नहीं आया। कथा में सम्पत्ति का बँटवारा करते समय चारों बेटे परस्पर झगड़े भले ही न हों, माँ के प्रति गैर-जिम्मेदारी का भाव अवश्य प्रकट कर देते हैं। लघुकथा का अन्तिम वाक्य—‘सामान उतारकर चारों बेटे क्षोभ और घृणा से थूककर चले गये’ भी यही दर्शाता है कि उन्हें पिता द्वारा छोड़ी गयी धन-सम्पत्ति को पाने का लालच नहीं था। ‘घड़ियाल’ बताती है कि ‘नारी चेतना मंच’ नारी के प्रति वस्तुत: कितने हृदयहीन हैं; लेकिन सवाल यहाँ भी पैदा होता है कि ‘घड़ियाल’ जैसी कथाएँ कहीं वंचित नारी के पक्ष में ईमानदारी से कार्य कर रही संस्थाओं को निरर्थक ही हतोत्साहित करने का कार्य तो नहीं कर रही हैं?  

‘पीठ पर घर’ में लेखिका ने बिम्ब का तथा ‘निर्णय’ में भाषा की सांकेतिक शक्ति का बहुत सुदर और सफल प्रयोग किया है। ‘दुहिता’ बेटी के प्रति पारम्परिक भाव, शिक्षा और शब्दावली के मुँह पर करारा तमाचा मारती है। ‘दो नोटों की कहानी’ तथा ‘विषबीज’ आदि कुछ लघुकथाएँ मानवेतर पात्रों को लेकर रची गयी हैं। ‘देवी उवाच’ बोध-शैली की कथा है तो ‘प्रैक्टीकल’ और ‘तथास्तु’ में पौराणिक कथा-पात्रों को आधार बनाया गया है तथा ‘चाणक्य’ के रूप में एक किंवदन्ती को प्रश्रय दिया गया है । ‘माटी की गुड़िया’ में लेखिका ने दृष्टांत शैली को अपनाया है।  तात्पर्य यह कि लेखिका ने ‘पीठ पर टिका घर’ में लघुकथाओं को विभिन्न शैलियों में प्रस्तुत करने के प्रयोगों का सार्थक निर्वाह किया है।

‘टिफिन’ अल्प समय में पनप गये विश्वास और अपनेपन की ओर से सावधान रहने की शिक्षा देती कथा है तो ‘प्रार्थना’ ईश्वरीय न्याय की पुष्टि करती है। ‘खोटे सिक्के’ एक ओर बहू-बेटों की ओर पारम्परिक मोह की तस्वीर पेश करती है तो दूसरी ओर विवाहित महिलाओं के प्रति एक सवाल भी पेश करती है; यह कि बहू भी यथार्थत: किसी परिवार से आयी बेटी ही होती है, तब (सास से सब-कुछ मिल जाने के बावजूद) बहू के रूप में उसका चरित्र नकारात्मक क्यों हो जाता है और (कुछ भी न मिल पाने के बावजूद) माँ को वह साथ किस तरह रख लेती है? ‘तमाशा’ गरीबी और मुफलिसी से लड़ते नट परिवारों की दुखद गाथा है। ‘विकल्प’ और ‘समाधान’ जीवन के कटु यथार्थ को हमारे सामने रखती हैं। ‘सेहरा या पगड़ी’ बदल चुकी समाज व्यवस्था में एक सार्थक विकल्प सम्मुख रखती है। ‘हकीकत’ लुटेरों की न सही, आम परिवारों की हकीकत प्रस्तुत करने में अवश्य सफल रही है। लघुकथा ‘मन्त्र’ डेरों, पीठों और गद्दियों का सच व्यक्त करती है। पुलिस की लोक-प्रचलित छवि पर मुहर लगाती है लघुकथा ‘गश्त’। ‘जनवाद’ के खोखलेपन को उजागर करती है—‘वास्तविक जनवाद’। कथ्य में नयापन न होने के बावजूद ‘अनुभव’ एक आवश्यक-सा पैगाम वरिष्ठ नागरिकों को देती है। वरिष्ठों की चिंताजनक हालत के ही एक अन्य यथार्थ को प्रस्तुत करती है लघुकथा ‘अपनों से हारी’। ‘उपचार’ का कथानक पाठक को वितृष्णा से भर देती है। ‘शिक्षा का दर्द’ शिक्षित बेरोजगारों की दुर्दशा का कच्चा चिट्ठा खोलती है। ‘कारोबार’ कोरोना काल में कोरोना की नहीं, व्यवसायियों की आसुरी वृत्ति का चित्र प्रस्तुत करती है।

‘मोनोग्राम’,‘कारण’, ‘सप्तपदी’, ‘नई गेंद’, ‘हलो-हलो’, ‘विचाराधीन’, ‘व्यंजन विशेषांक’, ‘काले सिर वाली’, ‘चित्र’, ‘तूफान क्यों आते हैं’, ‘कनीज़ की अर्ज’, ‘लौकी’,  ‘कब होगा सर्कस’ को हल्के-फुल्के पलों हेतु चुहल की संज्ञा भी दी जा सकती है। कथाकार को ऐसे पलों को भी शब्द देने की क्षमता और साहस से लैस होना चाहिए, भारतेंदु हरिश्चन्द्र और हरिशंकर परसाई की परम्परा से हमने यह जाना है। ‘कवि और दिया’, ‘दीया और बिजली’ गद्य-काव्य परम्परा की रचना है। ‘टिप’, ‘रिटर्न गिफ्ट’, ‘परीक्षा भवन में’, ‘अनाम रिश्ते’, ‘पुन: जीवन मिला’ जैसी कुछ रचनाएँ संस्मरण शैली में लिखी गयी हैं या कहें कि निजी संस्मरणों को ही लेखिका ने इन कथाओं के रूप में कलमबद्ध किया है। लघुकथा ‘साक्षात्कार’ भले ही एक यथार्थ की ओर संकेत करती हो, लेकिन एक गलतबयानी भी करती-सी लगती है। ‘अब वह भी फैशनपरस्त आधुनिका है’ कहकर लेखिका ने समस्त फैशनपरस्त आधुनिकाओं को लांछित कर दिया है। कुछेक शाब्दिक बदलावों के साथ असावधानीवश यही लघुकथा ‘इन्टरव्यू’ शीर्षक से पृष्ठ 100 पर पुन: स्थान पा गयी है।

पुस्तक को पढ़ते हुए लगातार यह लगता रहा कि हिन्दी प्रकाशन क्षेत्र से प्रूफ रीडिंग का शायद जनाजा ही उठ गया है। इसमें ‘ढ़ंग’, ‘आर्विभाव’, ‘प्रवृति’, ‘आलिफ’, ‘घारस’, ‘सामारिक’, ‘द्रश्यांकन’, ‘चर्तुवेदी’, ‘र्मूधन्य’, ‘हतप्रथ’, ‘होगें’, ‘आस्मिता’, ‘ढ़ोता’, ‘व्रद्धा’, ‘लेगें’, ‘उदंड’, ‘बाबर्चियों’, ‘माद्धिम’, ‘रूक’, ‘बीबी’ (सही शब्द ‘बीवी’), ‘टिपिन’, ‘आर्शीवाद’, ‘हिफिनों’(सही शब्द ‘टिफिनों’), ‘र्गुराते’, ‘शारिरिक’, ‘ख्वाव’, ‘हितैबी’, ‘ढ़ीली’, ‘सीड़ी’, ‘रूपया’, ‘आधिक’, ‘एडजस्ट मेंट’, ‘र्निणय’, ‘ग्रहणियां’, ‘करूण’, ‘र्निधारित’, ‘लहुलुहान’, ‘सिद्धी’, ‘र्दीघ’, ‘नि:विश्वास’, ‘सौंपों’, ‘र्निधन’, ‘र्निबल’, ‘बिमारियों’, ‘र्बोड’, ‘बच्चे-बढ़े’  (सही शब्द ‘बच्चे-बूढ़े’), ‘ढ़ाई’, ‘माक्स’, ‘जरुरत’, ‘स्वंय’, ‘सम्बन्धि’ सरीखे शब्द आसानी से मिलते जा रहे हैं जो सिद्ध करते हैं कि प्रकाशक ने संग्रह के प्रकाशन का दायित्व गम्भीरतापूर्वक नहीं निभाया है। एक ही शब्द की वर्तनी एक जगह कुछ तो दूसरी जगह कुछ और नजर आ रही है। उदाहरण के लिए, ‘दीया’ को एक जगह ‘दीया’ तो दूसरी जगह ‘दिया’ तथा उसके बहुवचन को ‘दीये’ के स्थान पर ‘दिए’ लिखा गया है। जरा सोचिए कि किसी पुस्तकालय की शोभा बनकर यह पुस्तक हिन्दी वर्तनी का क्या रूप देशी-विदेशी पाठकों के सम्मुख रखेगी।

और अन्त में एक बात और…

सुधा गोयल जी को उनके बेहतरीन लघुकथा लेखन के लिए बार-बार बधाई; लेकिन पुस्तक का नाम उनके द्वारा लिखित ‘चिन्तन’ में कुछ और गया है और मुखपृष्ठ तथा फोलियो पर कुछ और!!! प्रकाशक द्वारा आखिर किस आपाधापी में इस लघुकथा संग्रह को छापा गया है।

पुस्तक—पीठ पर टिका घर (लघुकथा संग्रह); कथाकार—सुधा गोयल;                      प्रकाशक—नमन प्रकाशन, नई दिल्ली-110002;        प्रथम संस्करण—2024;           आईएसबीएन—978-93-95356-40-4; कुल पृष्ठ—132; मूल्य—रुपये 350/- (हार्डबाउंड)

Sunday, 4 August 2024

लघुकथा पर सुरेश जांगिड़ उदय की सुस्थापित लघुकथा लेखकों से बातचीत-3

इस बार  श्री युगल  



सुरेश जांगिड 'उदय' प्रारंभिक दौर में लघुकथा के संवेदनशील रचनाकार और प्रकाशक रहे हैं। वर्षों तक 'अक्षर खबर' नामक मासिक पत्रिका का संपादन-प्रकाशन करते रहे हैं। यहाँ उक्त पत्रिका के जुलाई २००३ अंक से साभार प्रस्तुत है एक लम्बी परिचर्चा का तीसरा अंश।

लघुकथा को लेकर कई साथी बेहतर और गम्भीर काम कर रहे हैं। खूब अच्छी-अच्छी लघुकथाएं लिखी जा रही हैं। लेकिन लघुकथा के वैचारिक पक्ष को लेकर पहले भी बहुत ही कम काम हुआ है और आज भी इस पक्ष पर कोई बहुत अधिक काम नहीं हो रहा है। जिस कारण विधा का यह पक्ष काफी कमजोर साबित हो रहा है। हालाकि पिछले दिनों लघुकथा के प्रबल समर्थक और वरिष्ठ साहित्यकार श्री कमल किशोर गोयनका की एक बेहतर और सार्थक पुस्तक 'लघुकथा का व्याकरण' एक मील का पत्थर साबित हुई है। लेकिन लघुकथा के वैचारिक पक्ष पर बहुत काम करने की आवश्कता है। हम इस बारे बहुत अधिक गम्भीर है। लघुकथा पर कई रूपों में पुस्तकों पर काम चल रहा, जिसके बारे में समय समय पर घोषणाएं होती रहेगी।

इस प्रश्नावली का उद्देश्य किसी विवाद को जन्म देना नहीं, न ही किसी की भावना को ठेस पहुंचाना है। इसका मूल उद्देश्य पाठकों को लघुकथा के बारे में विस्तृत जानकारी देना है। लघुकथा लेखक इन प्रश्तों के उत्तर अपनी सोच और अनुभव के आधार पर देते हैं। इस बार पंजाबी लघुकथा पर बहुत ही विशिष्ट काम करने वाले लघुकथा के आधार स्तंभ श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल तथा एक लम्बे समय से लघुकथा के विकास में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराने वाले श्री कृष्ण मनु जी से निम्न प्रश्न पूछे गए :

१. आपकी की दृष्टि में लघुकथा क्या है ?

२ लघुकथा के आवश्यक तत्व कौन-कौन से हैं . आज भी लघुकथा की सर्वमान्य परिभाषा क्यों नहीं उभर कर आ रही है ?

३. क्या लघुकथा को शब्दों की सीमा में बांधना उचित है ? यदि हां तो अधिकतम कितने शब्द एक लघुकथा में होने चाहिए ?

४. लघुकथा और छोटी कहानी में मूलतः क्या अन्तर है ?

५. आज की लघुकथा और पुरानी जातक कथा, नीति कथा तथा प्रेरक प्रसंग में क्या अन्तर है? ६. आपकी की दृष्टि में प्रथम लघुकथा कौन सी है ? 

७. लघुकथा में वैचारिकता का क्या स्थान है?

८. आज की लघु‌कथा का केन्द्रीय स्वर क्या है?

९. क्या आप लघुकथा के वर्तमान स्वरूप से संतुष्ट हैं?

१०. आपको आजकल प्रकाशित हो रही लघुकथाओं में क्या और कौन-कौन सी कमियां दिखाई देती हैं ?

११. आज भी जाने कितने साहित्यकार हैं जो लघुकथा को नकार रहे हैं। आपके विचार से इसका क्या कारण है ?

१२. आपकी दृष्टि में कौन-कौन से लेखक हैं जिन्होंने इस विधा को स्थापित करने में विशेष योगदान दिया है ?

१३. लघुकथा की वर्तमान स्थित क्या है ? 

१४. लघुकथा का क्या भविष्य है ?

१५. आज लघुकथा के क्षेत्र में जो सृजन हो रहा है क्या आप उससे संतुष्ट हैं ?

१६. लघुकथा की उन्नति और श्रीवृद्धि के लिए आप क्या सुझाव देना चाहेंगे ?

१७. आपकी दृष्टि में वर्तमान समय के महत्वपूर्ण लघुकथाएं लिखने वाले कौन-कौन से साहित्यकार है?

युगल

१ लघुकथा समय की मांग के फलस्वरूप उपजी छोटे कलेवर की कथात्मक रचना है, जो उद्देश्य-साधित होती है। कथ्य को सटीक सीधे तौर से सामने लाने के लिए शब्दाडंबर की जरूरत नहीं होती। वाक्य-जाल में कथ्य का प्रभाव उलझ जाता है, इसलिए शब्द यहां कम, लेकिन शब्दों के तासीर अलग होते है। यहां डिटेल्स की जरूरत नहीं। गाथा नहीं। कथा-बंद मुट्टी की तरह कसी हुई कथा। रसोद्रेक और उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्ध।

दरअसल आजादी के बाद हमारे जनतंत्र ने हिपोक्रीट नेताओं के कारण जो रूप लिया और जिस के फलस्वरूप राजनीति में औपचारिकता आई और उस ने सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक तथा व्यक्ति के संवेदनात्मक संबंधों को प्रभावित करना शुरू किया, उसी की पड़ताल करने और उसे उजागर करने और उसके विरोध में बोध जगाने के लिए ही वर्तमान लघुकथा 'स्वरूप' में आयी। यह मात्र लेखन ही नहीं, विद्रुपताओं और असंगतियों के खिलाफ आवाज भी रही।

शास्त्रीय दृष्टि से लघुकथा के जो तत्व निरूपित किये गये हैं, उन्हीं के अनुसार कहानी के भी प्रमुख तत्वों को निर्दिष्ट किया गया है। कथ्य, उद्देश्य, आकार और शिल्प, भाषा, शीर्षक आदि तत्वों पर काफी चर्चा की जा चुकी है। इन पर और कुछ कहने की मैं आवश्यकता नहीं समझता।

२ लघुकथा अपनी प्रारंभिक स्थितियों से वाहर आ चुकी है। दो ढ़ाई दशकों में इसके रूप, आकार, परिभाषा आदि पर बहुत बार बहुविध विचार किये जा चुके हैं और एक मान्य परिभाषा भी गृहीत हुई है। अव परिभाषा विमर्श का विषय नहीं रह गयी। कुछ लोग अपनी डफली अलग बजावें, तो विद्वानों की मतिर्भिन्नता की स्वतंत्रता तो है ही।

३ लघुकथा का आकार सामान्यतः छोटा तो होना चाहिए ही। शब्दों की संख्या निर्धारित करना फॉर्म के शिकंजे में कसना होगा, जो कथात्मकता और अपेक्षित चित्रण के लिए निरापद नहीं होगा।

४ इधर बड़े आकार की भी लघुकथाएं लिखी जाने लगी हैं, जो कभी-कभी दो से तीन पन्नों तक फैली हुई होती हैं। भी प्रायः यही होता है। छोटी कहानियों का आकार इसलिए लघुकथा में छोटी कहानी का भ्रम होने लगता है। छोटी कहानियां भी लघुकथा के नाम पर छप जाती हैं। स्वयं लघुकथाकार भी अपनी रचना में साफ नहीं होते कि वह जो लिख रहे हैं, वह लघुकथा है या कहानी। यह स्थिति उन लेखकों के साथ पैदा होती है, जो कहानी की विधा से लघुकथा-लेखन में आए हैं। उनके द्वारा लघुकथा के मानक टूटते रहते हैं और बहक में कहानी की पटरी पर चले जाते हैं। संतुलन नहीं रह जाता। लघुकथा की मर्यादा डिटेल्स में नहीं त्वरा में हैं। चिड़िया अभिप्रेत और दृष्ट खाद्य पदार्थ के लिए आकाश का चक्कर नहीं काटती। वह पंख की कम उड़ान में ही खाद्य की तरफ झपटती है। यह झपट, यह त्वरा ही लघुकथा को लघुकहानी से अलग करती है। लघुकथा में जादू होता है और छोटी कहानी में इन्द्रजाल।

५ यह स्वतंत्र लेख का विषय बनता है।सामान्यतः जातक कथा में महात्मा बुद्ध के विभिन्न पूर्व जन्म की कथाएं हैं। किस योनि में उन्होंने क्या कर्म किए, इसी का वर्णन है। ये सामान्य कथाएं हैं।

नीति कथा का संबंध नैतिक भावों और आचारों से है। कथा के मार्फत नैतिक मूल्यों का निथ् रिण किया जाता है। अमुक राजा, ऋषि, ब्राह्मण या अमुक व्यक्ति ने अपने आचरण अथवा कार्यों एवं कृतियों से किस प्रकार नैतिक और मानवीय मूल्यों को कायम रखा, जो समाज के हित के लिए आदर्श और आचरणीय था।

किसी व्यक्ति के आदर्श आचरण, मानवीय संवेदना-पूरित व्यवहार, त्याग आदि के वर्णन जब मनुष्य की भावनाओं को ऊंचे आदर्श की ओर प्रेरित करते हैं, तो ऐसे चित्रण प्रसंग कहलाते हैं।

६ इस संबंध में मेरा व्यक्गित शोध नहीं है। अतः इस संबंध में कुछ कहना समीचीन नहीं होगा। वैसे लघुकथा का इतिहास ढूंढने वालों में से कुछ लोगों का मानना है कि लघुकथा का आरंभिक स्वर माधव राव सप्रे की 'टोकरी भर मिट्टी' में मुखरित हुआ है। दरअसल लघुकथा का वर्तमान भाषित रूप तो १९६० के बाद सामने आया है।

७ कथ्य सामान्यतः लेखक के विचार और तत्संबंधी दृष्टि का ही निरूपण करते हैं। लेकिन लघुकथा की मर्यादा है कि विचार यहां उदग्र न हो। विचार उचक कर शब्द रूप में लोगों के सामने आवें। विचार, ध्येय और उद्देश्य कथा में ही संगुंफित हौं। शब्दों के मार्फत जब लेखक रचना में आ बैठता है, तो निष्पक्षता और तटस्थता और निस्संगता बाधित हो जाती है। कोई भी कथात्मक रचना इय वाचालता को अनपेक्षित ही मानती है। वैसे ही रचना विचार के लिए ही उद्देश्य गर्भित होती है।

८ लघुकथा में केंद्रीय स्वर की बात करना, स्वर को नाहक केंद्रित करना होगा अपनी आरंभिक स्थितियों में राजनीतिक कल्मष, क्षुद्रता, औपचारिकता, व्यवस्था की निरंकुशता एवं सामाजिक विसंगतियां एवं विडंबनाओं को केन्द्र में रखकर  । लघुकथा पाठकों तक पहुंची थी। इस पर बहुत लिखा में गया। कथ्य का बहुत दुहराव हुआ। इससे हटते हुए लघुकथाकारों ने आयामों और स्थापनाओं पर ध्यान दिया। फलक का विस्तार हुआ। कथ्य में विविधता आयी। राजनीति, समाज, धर्म, अर्थ, काम, प्रेम, भूख, पीड़न, अत्याचार मानवीय मूल्यों का विघटन, व्यक्तिगत संबंधों का स्खलन, भूमंडलीयकरण, बाजारवाद, सांस्कृतिक विद्रूपन, जीवन पर बढ़ते संश्लिष्ट दबाव ये सब लघुकथा के वर्ण्य विषय बने। जहां आरम्भ में लघुकथा का केन्द्रीय स्वर असंगत विरोध था। कालांतर में जब उसका विकेंद्रीकरण हुआ। अब पोजीटिव एप्रोच और संवेदनात्मकता आदि की भाषिक विविधता आयी है।

९ संतोष गत्यात्मकता का, प्रगति का, सक्रियता का बाधक होता है। दृष्टि के विस्तार और फैलाव का रोधक होता है। संतोष आया कि सक्रियता गयी। रचनात्मकता बाधित हुई। लघुकथा अभी जुम्मा-जुम्मा आठ दिनों की है। संतुष्ट होना पालथी मारकर बैठ जाना होगा। पिछले तीन दशकों में इसने कई केंचुल छोड़े हैं। वर्तमान जो है इतना संतोष तो जरूर है कि अभी यह वर्तमान रूप में साहित्य की सम्मानित विधाओं में अपनी पैठ बना चुकी है।

१० व्यावसायिक पत्रिकाओं के ट्रेंड बदल गये हैं। इसलिए रुझान भी बदले हैं। सूचना के साथ-साथ वे जनता तक ऐसी चीजें पहुंचा रहे हैं, जो उनके व्यावसायिक लाभ के लिए अपेक्षित हैं। उनकी मान्यता है कि साहित्य कोई नहीं पढ़ता। टी. वी., सी.डी. से वे अपनी हल्की-फुल्की प्यास की जरूरतें पूरी कर लेते हैं। इसलिए बड़े घरानों और प्रतिष्ठानों से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिकाएं बंद कर दी गयी हैं। समाचार पत्रों में जो साहित्य का पन्ना होता था, उसे सीमित कर दिया गया। वहां खेल के पन्ने हैं, सिनेमा के पन्ने हैं। व्यापार और शेयर के पन्ने हैं। नहीं है, तो रचनात्मक साहित्य का पन्ना। अतः वहां कभी कभार ही लघुकथाएं छप पाती है, तो वे नामलेवा ही होती हैं। मुख्यतः छोटी पत्रिकाएं ही लघुकथाएं छाप रही हैं। छोटी पत्रिकाओं के संपादक बंधुओं में कम ही ऐसे लोग हैं, जो लघुकथा के शास्त्रीय एवं कलात्मक पक्ष की कसौटी पर ध्यान देते हैं। फलतः उनमें निम्नलिखित कमियां रह जाती है--(क) समुचित और नव्य कथ्य का अभाव (ख) दृष्टि विस्तार का अभाव (ग) विचारों का पिष्टपेषण (घ)। अनगढ़ शिल्प (ङ) निष्प्राण और त्रुटिपूर्ण भाषा (च) संदर्भ-गर्भित शीर्षक के चुनाव में असावधानी; यही सब।

११ कुछ वरिष्ठ कथाकार तथा मठाधीश समालोचक यह मानते हैं कि लघुकथा एक मेहमान विधा है। आयी है, तो कुछ मनोरंजन कर और उछल-कूद मचाकर चली जाएगी। कुछ बुजुर्गों को नये के प्रति ग्रंथिजन्य कुंठा होती है। इस लोकप्रिय हो चली विधा के अस्वीकार के अन्य कोई कारण तो मेरी समझ में नहीं आते। हो सकता है कुछ कचरा लघुकथाओं ने उनकी यह मानसिकता तैयार की हो।

१२ लघुकथा पर अपनी कलम चलाने वाले बहुत लेखक रहे हैं। मैंने ऐसे लेखकों के बारे में भी सुना है, जो प्रतिदिन नियमित रूप से लेखन के लिए सिटिंग देते हैं और एक बैठक में चार-पांच लघुकथाएं लिख मारते हैं। इस तरह उन्होंने हजारों लघुकथाएं लिख मारी हैं। ऐसे में ही बहुत-कुछ कचरा निकल आता है। संख्या की दृष्टि से अधिक लिखना ज्यादा सरहानीय नहीं कहा जा सकता। प्रतिबद्ध रूप से निरत रहकर अच्छी रचनाएं देना ही महत्वपूर्ण होता है। वैसे लघुकथा के प्रणयन, विकास और प्रचार तथा रचनाशीतलता के लिए सन्नद्ध रहने वालों में कुछ नाम अवश्य लेखनीय हैं। जगदीश कश्यप, सतीशराज पुषकरणा, सुकेश साहनी, सतीश दुवे, कलम चोपड़ा, अशोक लव, बलराम, बलराम अग्रवाल, राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी 'बंधु', रामयतन प्रसाद यादव, मराठी और हिन्दी के साथ साथ लिखने वाले शंकर पुणतांबेकर, मैं अपना नाम लूं तो आप और पाठक क्या सोचेंगे? दूसरों द्वारा उल्लिखित नाम ही नाम होते हैं। और भी बहुत सारे नाम हैं, जो लघुकथा के समर्पित लेखक हैं। उनके योगदान को भी सम्मान की दृष्टि से ही देखा जाएगा। श्यामसुंदर दीप्ति, कृष्णानंद, अब्ज, रूप देक्गुण, इंदिरा खुराना, मीरा दीक्षित, नरेंद्र प्रसाद, निजात, तारिक असलम तस्नीम आदि के कार्यों को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता।

१३ उत्कर्षपूर्ण ही कहा जा सकता है। यदि कचरा लेखक अपने को सम्भाल लें। वैसे नहीं छप पाने के कारण कुछ लेखकों का उत्साह घटता दिख रहा है।

१४ मैंने तो दर्ज किया है कि लघुकथा एक नयी विधा है। इसके जीवन और नियति के संबंध में कोई भविष्यवाणी देना समय सम्मत नहीं होगा। लेकिन लेखकों का उत्साह कायम रहे और उन्हें प्रोत्साहन मिलता रहे, इसकी योजना हमें मिल बैठकर सोचनी है।

१५ कुछ लोग तो अच्छा लिख रहे हैं। नये लोग भी अपने को मांज रहे हैं। इसे संतोष की स्थिति कहा जा सकता है। गुणात्मक और अपने प्रभावों की छाप और याद छोड़ जाने वाली लघुकथाएं ही इस विधा को संपुष्ट और समुन्नत करेंगी।

१६ राजनीति, व्यवस्था, और रूढ़िवादी समाज द्वारा जो उत्पीड़न की स्थिति पैदा की गयी है, विसंगतियों और विद्रूपताओं का जो दबाव विविध दिशाओं से व्यक्ति पर बढ़ता गया है और आदमी को निरुपाय करता गया है, उन्हें उजागर उनके प्रति पाठक के मन में बोध पैदा करना और अवांछनीय स्थितियों के प्रति चिन्ता ओर बेचैन आक्रोश पैदा करना ही लघुकथा का उद्देश्य रहा है। व लघुकथा के कलेवर को देखते हुए लोगों ने इससे अधिक इसमें गुंजाइश भी नहीं मानी थी। इधर लघुकथा ने अपने वर्ण्य विषय को स्फालित किया है, उसमें विविधता आयी है। यह शुभ है। और भी विधियां ढूंढी जाएं और ईमानदारी से प्रतिबद्ध होकर व उन्हें रचनात्मक रूप दिया जाए, लघुकथा के भविष्य के लिए और इसकी प्रवृद्धि के लिए स्वस्थ सोपान होंगे। लघुकथा लेखक इसे ऐयाश लेखन के रूप में न लेकर उद्देश्यमूलक मिशनरी भावना से लिखने में जुटें यही कल्याणप्रद होगा।

युगल जी


जन्म : 1925 की दीपावली (17-10-1925)

देहावसान : 26 अगस्त,  2016)

लघुकथा पर सुरेश जांगिड़ उदय की सुस्थापित लघुकथा लेखकों से बातचीत-2

इस बार श्री कृष्ण मनु


सुरेश जांगिड 'उदय' प्रारंभिक दौर में लघुकथा के संवेदनशील रचनाकार और प्रकाशक रहे हैं। वर्षों तक 'अक्षर खबर' नामक मासिक पत्रिका का संपादन-प्रकाशन करते रहे हैं। यहाँ उक्त पत्रिका के जुलाई २००३ अंक से साभार प्रस्तुत है एक लम्बी परिचर्चा का दूसरा अंश।

लघुकथा को लेकर कई साथी बेहतर और गम्भीर काम कर रहे हैं। खूब अच्छी-अच्छी लघुकथाएं लिखी जा रही हैं। लेकिन लघुकथा के वैचारिक पक्ष को लेकर पहले भी बहुत ही कम काम हुआ है और आज भी इस पक्ष पर कोई बहुत अधिक काम नहीं हो रहा है। जिस कारण विधा का यह पक्ष काफी कमजोर साबित हो रहा है। हालाकि पिछले दिनों लघुकथा के प्रबल समर्थक और वरिष्ठ साहित्यकार श्री कमल किशोर गोयनका की एक बेहतर और सार्थक पुस्तक 'लघुकथा का व्याकरण' एक मील का पत्थर साबित हुई है। लेकिन लघुकथा के वैचारिक पक्ष पर बहुत काम करने की आवश्कता है। हम इस बारे बहुत अधिक गम्भीर है। लघुकथा पर कई रूपों में पुस्तकों पर काम चल रहा, जिसके बारे में समय समय पर घोषणाएं होती रहेगी।

इस प्रश्नावली का उद्देश्य किसी विवाद को जन्म देना नहीं, न ही किसी की भावना को ठेस पहुंचाना है। इसका मूल उद्देश्य पाठकों को लघुकथा के बारे में विस्तृत जानकारी देना है। लघुकथा लेखक इन प्रश्तों के उत्तर अपनी सोच और अनुभव के आधार पर देते हैं। इस बार पंजाबी लघुकथा पर बहुत ही विशिष्ट काम करने वाले लघुकथा के आधार स्तंभ श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल तथा एक लम्बे समय से लघुकथा के विकास में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराने वाले श्री कृष्ण मनु जी से निम्न प्रश्न पूछे गए :

१. आपकी की दृष्टि में लघुकथा क्या है ?

२ लघुकथा के आवश्यक तत्व कौन-कौन से हैं . आज भी लघुकथा की सर्वमान्य परिभाषा क्यों नहीं उभर कर आ रही है ?

३. क्या लघुकथा को शब्दों की सीमा में बांधना उचित है ? यदि हां तो अधिकतम कितने शब्द एक लघुकथा में होने चाहिए ?

४. लघुकथा और छोटी कहानी में मूलतः क्या अन्तर है ?

५. आज की लघुकथा और पुरानी जातक कथा, नीति कथा तथा प्रेरक प्रसंग में क्या अन्तर है? ६. आपकी की दृष्टि में प्रथम लघुकथा कौन सी है ? 

७. लघुकथा में वैचारिकता का क्या स्थान है?

८. आज की लघु‌कथा का केन्द्रीय स्वर क्या है?

९. क्या आप लघुकथा के वर्तमान स्वरूप से संतुष्ट हैं?

१०. आपको आजकल प्रकाशित हो रही लघुकथाओं में क्या और कौन-कौन सी कमियां दिखाई देती हैं ?

११. आज भी जाने कितने साहित्यकार हैं जो लघुकथा को नकार रहे हैं। आपके विचार से इसका क्या कारण है ?

१२. आपकी दृष्टि में कौन-कौन से लेखक हैं जिन्होंने इस विधा को स्थापित करने में विशेष योगदान दिया है ?

१३. लघुकथा की वर्तमान स्थित क्या है ? १४. लघुकथा का क्या भविष्य है ?

१५. आज लघुकथा के क्षेत्र में जो सृजन हो रहा है क्या आप उससे संतुष्ट हैं ?

१६. लघुकथा की उन्नति और श्रीवृद्धि के लिए आप क्या सुझाव देना चाहेंगे ?

१७. आपकी दृष्टि में वर्तमान समय के महत्वपूर्ण लघुकथाएं लिखने वाले कौन-कौन से साहित्यकार है?

कृष्ण मनु

१. लघुकथा शब्दों में संतुलित ढंग से अभिव्यक्ति सम्प्रेषित करने की एक विधा है। चूंकि यह कथा कुल की विधा है, अतएव कथानक, कथ्य, कथोपकथन आदि कथा के सारे तत्य इसमें मौजूद हैं। हो लघुकलेवर के कारण कथानक का विस्तार सम्भव नहीं होता है।

२. आधुनिक लघुकथा का सर्वमान्य परिभाषा एक है। हाँ उसे व्यक्त करने के तरीके अलग-अलग है।

३. क्या उपन्यास, कहानी को सीमा में बाँधा गया है? फिर लघुकथा के शब्दों की सीमा में क्यों बांधा जाए? लघुकथा एक विशेष घटनाक्रम के केन्द्र में एक दृश्य फलक पर लिखी जाती है। अतएव यह स्वयं सीमित शब्दों में समाप्त जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो लघुकथा लेखक अयोग्य है।

४. वस्तुतः छोटी कहानी कोई विधा नहीं, यह कहानी है, छोटे कथानक वाली कहानी। लघुकथा और कहानी में संरचानत्मक स्तर पर कई अन्तर है। 

५. आज की लघुकथा परिभाषित है, नियमों में बंधी है और जीवन मूल्यों से सीधे जुड़ी है। जबकि जातक कथा, नीति कथा और प्रेरक प्रसंग विशेष नियम से बंधे नहीं है। घटना पर घटना को जोड़कर बनी एक कथा जिसके माध्यम से धर्म, अध्यात्म, आदर्श, लोकाचार आदि नीतिगत बातें अभिव्यक्त की जाती हैं। इनका मूल स्वर आचरण परिष्कृत करना, आदर्श स्थापित करना है। जबकि लघुकथा आम जनता कि समस्याओं की आवाज है।

६. मेरी दृष्टि में वर्तमान लघुकथा का पूर्ण स्वरूप सातवें दशक के उत्तरार्द्ध और आठवें दशक के पूवार्द्ध में विकसित हुआ। पहली लघुकथा कौन सी है, यह शोचाथियों को ढूंढना चाहिए।

७. वैचारिकता बिना अभिव्यक्ति का कोई अर्थ नहीं है। अभिव्यक्ति के पहले वैचारिकता जन्म लेती है और वैचारिकता का जो स्थान साहित्य की दूसरी विधाओं में है वही लघुकथा में भी है।

८. आज की लघुकथा का केन्द्रीय स्वर विरोधात्मक है। गिरते मानव मूल्यों, क्षरित चरित्रों, अन्याय, अत्याचारों के विरोध का स्वर लघुकथा का स्वर है।

६. लघुकथा के वर्तमान स्वरूप से तभी संतुष्ट हुआ जा सकता है जब तमाम लघुकथाओं के स्वरूप में समानता हो। वे निर्धारित फार्म में लिखी गई है यहा अनियमितता अभी भी बनी हुई हो। लघुकथा शीर्षकों से कई चीजें ऐसी छप रही है जो लघुक्या है ही नहीं। गद्योज, चुटकले, कहानी, लोककया आदि को लघुकथा शीर्षक तले छापा जा रहा है। यहां तक की लघुकथा (एक शब्द) को 'लघु-कथा' या लघु कथा (दो शब्द) में छापी जाती हैं जिससे अर्थ का अनर्थ हो जाता है।

१०. प्रश्न क्रमांक ९ में उत्तर निहित है।

११. हर नये प्रयास का विरोध किया जाता है। इसमें नई बात नहीं है। परम्परावादि साहित्यकार नई चीजों से परहेज करते रहते हैं। लेकिन किसी के नकारने से कुछ नहीं होता। पाठक जिसे अपना ले वह स्थापित हो जाता है। जैसा कि लघुकथा के साथ हुआ। देर सवेरे वे भी अपनी जिद परित्याग पर इसे अपना लेगे।

१२. कई लेखक हैं केवल चन्द लेखकों का नाम लेकर में दूसरों को नाराज नहीं करना चाहता। १३. लघुकथा की वर्तमान स्थिति तो ठीक है लेकिन भविष्य के प्रति अनिश्चितता बनी हुई है। जो चुस्ती आठवें दशक में देखने को मिली और लेखकों ने जिस निष्ठा, लगन और आत्मसमर्पण द्वारा अच्छी-अच्छी लघुकथाएं सृजित की, वैसी ही चुस्ती, निष्ठा और लग्न की जरूरत है। अभी लघुकथा में लेखकों की बाढ़ है। बाढ़ में गंदगी, कचरे जमा होते ही हैं लेकिन एक दिन बाड़ थमेगी तब गंदगी, कचरे से लघुकथा भी मुक्त होगी।

१४. प्रश्न १३ में उत्तर देखा सकता है। 

१५. मैं संतुष्ट नहीं हूँ।

१६. लघुकथा खेमे बाजी, गुट बाजी से हो। लघुकथा लेखको को उचित (भेदभाव प्रोत्साहन दिया जाए। निष्पक्ष समीक्षाएं लिखी मुक्त बिना) जाएं। सहयोग स्तर पर निकलने वाले सतही संग्रहों को बंद किया जाएं। गोष्ठियां हो लेकिन एक दूसरे की पीठ ठोकने, एक दूसरे को सम्मानित करने की हास्यस्पद प्रथा की भरपूर भर्त्सना की जाए। सग्रहों की ब्रिकी की व्यवस्था की जाएं।

१७.बहुत सारे आएंगे। हैं। नाम दिए गए तो कई पृष्ट रंग केवल चंद साहित्यकारों के नामोल्लेख उचित नहीं।


मोबाइल:99393 15925


Saturday, 3 August 2024

लघुकथा पर सुरेश जांगिड़ उदय की सुस्थापित लघुकथा लेखकों से बातचीत-1

इस बार श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल 

सुरेश जांगिड 'उदय' 
जांगिड 'उदय' प्रारंभिक दौर में लघुकथा के संवेदनशील रचनाकार और प्रकाशक रहे हैं। वर्षों तक 'अक्षर खबर' नामक मासिक पत्रिका का संपादन-प्रकाशन करते रहे हैं। यहाँ उक्त पत्रिका के जुलाई २००३ अंक से साभार प्रस्तुत है एक लम्बी परिचर्चा का पहला अंश।

लघुकथा को लेकर कई साथी बेहतर और गम्भीर काम कर रहे हैं। खूब अच्छी-अच्छी लघुकथाएं लिखी जा रही हैं। लेकिन लघुकथा के वैचारिक पक्ष को लेकर पहले भी बहुत ही कम काम हुआ है और आज भी इस पक्ष पर कोई बहुत अधिक काम नहीं हो रहा है। जिस कारण विधा का यह पक्ष काफी कमजोर साबित हो रहा है। हालाकि पिछले दिनों लघुकथा के प्रबल समर्थक और वरिष्ठ साहित्यकार श्री कमल किशोर गोयनका की एक बेहतर और सार्थक पुस्तक 'लघुकथा का व्याकरण' एक मील का पत्थर साबित हुई है। लेकिन लघुकथा के वैचारिक पक्ष पर बहुत काम करने की आवश्कता है। हम इस बारे बहुत अधिक गम्भीर है। लघुकथा पर कई रूपों में पुस्तकों पर काम चल रहा, जिसके बारे में समय समय पर घोषणाएं होती रहेगी।

इस प्रश्नावली का उद्देश्य किसी विवाद को जन्म देना नहीं, न ही किसी की भावना को ठेस पहुंचाना है। इसका मूल उद्देश्य पाठकों को लघुकथा के बारे में विस्तृत जानकारी देना है। लघुकथा लेखक इन प्रश्तों के उत्तर अपनी सोच और अनुभव के आधार पर देते हैं। इस बार पंजाबी लघुकथा पर बहुत ही विशिष्ट काम करने वाले लघुकथा के आधार स्तंभ श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल तथा एक लम्बे समय से लघुकथा के विकास में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराने वाले श्री कृष्ण मनु जी से निम्न प्रश्न पूछे गए :

१. आपकी की दृष्टि में लघुकथा क्या है ?

२ लघुकथा के आवश्यक तत्व कौन-कौन से हैं . आज भी लघुकथा की सर्वमान्य परिभाषा क्यों नहीं उभर कर आ रही है ?

३. क्या लघुकथा को शब्दों की सीमा में बांधना उचित है ? यदि हां तो अधिकतम कितने शब्द एक लघुकथा में होने चाहिए ?

४. लघुकथा और छोटी कहानी में मूलतः क्या अन्तर है ?

५. आज की लघुकथा और पुरानी जातक कथा, नीति कथा तथा प्रेरक प्रसंग में क्या अन्तर है? ६. आपकी की दृष्टि में प्रथम लघुकथा कौन सी है ? 

७. लघुकथा में वैचारिकता का क्या स्थान है?

८. आज की लघु‌कथा का केन्द्रीय स्वर क्या है?

९. क्या आप लघुकथा के वर्तमान स्वरूप से संतुष्ट हैं?

१०. आपको आजकल प्रकाशित हो रही लघुकथाओं में क्या और कौन-कौन सी कमियां दिखाई देती हैं ?

११. आज भी जाने कितने साहित्यकार हैं जो लघुकथा को नकार रहे हैं। आपके विचार से इसका क्या कारण है ?

१२. आपकी दृष्टि में कौन-कौन से लेखक हैं जिन्होंने इस विधा को स्थापित करने में विशेष योगदान दिया है ?

१३. लघुकथा की वर्तमान स्थित क्या है ? १४. लघुकथा का क्या भविष्य है ?

१५. आज लघुकथा के क्षेत्र में जो सृजन हो रहा है क्या आप उससे संतुष्ट हैं ?

१६. लघुकथा की उन्नति और श्रीवृद्धि के लिए आप क्या सुझाव देना चाहेंगे ?

१७. आपकी दृष्टि में वर्तमान समय के महत्वपूर्ण लघुकथाएं लिखने वाले कौन-कौन से साहित्यकार है?

श्याम सुन्दर अग्रवाल 

१. लघुकथा विशाल जिन्दगी के उन क्षणों वर्णन है जो उपन्यास तथा कहानी में गुम होकर रह जाते हैं। लघुकथा उन क्षणों को तीक्ष्णता के साथ पाठक के सम्मुख पेश करती है तथा उनके महत्व को दर्शाती है। लघुकथा में इसके नाम वाले दो मुल तत्व 'लघु' तथा 'कथा' तो होने ही के चाहिए । 

२. लघुकथा नई विद्या है। इस विधा के अधिकांश लेखक वे है जो मात्र पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लघुकथाओं को ही पढ़कर रचनाएं लिख रहे है। विधा पर श्रेष्ठ आलेखों, आलोचनात्मक पुस्तकों का अभाव है, ऐसे मंच नहीं है जहां लेखक एवं समीक्षक एकत्र होकर सार्थक विचार विमर्श कर सके। न ही अकादमिक स्तर पर प्रयास हो रहे हैं। एक स्थान पर एकत्र हुए बिना सर्वमान्य परिभाषा संभव नहीं है। पंजावी में पिछले पंन्द्रह वर्षों से लघुकथा पर नियमित रूप से एक मंच पर विचार-विमर्श हुआ है तथा एक सर्वमान्य परिभाषा लगभग तय हो गई है।

३. लघुकथा को शब्दों की सीमा में चौथना उचित नहीं हैं। यह तो कथ्य ही है, जिसने शब्द सीमा तय करनी है। देखने में आया है कि एक श्रेष्ठ लघुकथा पाँच-छः सी शब्दों से आगे नहीं जाती। इसमे अधिक शब्दो की रचना अपना प्रभाव खो देता हैं।

४. लघुकथाएं में अधिक घटनाएं एवं पात्र नहीं होने चाहिए। अगर कथ्य को उभारने के लिए आवश्यक हो तो घटनाओं में समय का अंतराल अधिक न हो। ऐसा न हो कि कथा का काल कई वर्षों में फैला हो। लघुकथा की तुलना सौ मीटर की दौड़ से की जा सकती है छोटी कहानी में ऐसी बंदिशे नहीं है। वह आठ सौ मीटर की भी दौड़ भी हो सकती है और दस हजार मीटर की दौड़ भी।

५. जातक कथाओं का संबंध तो है ही धर्म से। नीति कथा नीति की बात करती है तथा प्रसंग का उद्देश्य प्रेरणा देना है। संभव है इन बुद्ध प्रेरक रचनाओं में कहीं लघुकथा विधा का कोई तत्व नजर आ जाए, मगर ये पूर्ण रूप से भिन्न हैं इन रचनाओं का अलग रूप विधान है। लघुकथा कलात्मक ढंग से आधुनिक यथार्थ को प्रस्तुत करती है, सीधे-सीधे उपदेश नहीं देती।

६. आज लघुकथा की जो परिभाषा उभर कर सामने आ रही है। उस लिहाज से तो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचना 'अंगहीन धनी' (वर्ष १८७६) को हिन्दी की प्रथम लघुकथा माना जा सकता है (पह रचना 'भारतेन्दु संग्रह' से हेमन्त शर्मा - प्रकाशक हिन्दी प्रचारक संस्थान, वाराणसी के तृतीय संस्करण के पृष्ट १०६७ पर दर्ज है)

७. रचना किसी भी विधा में हो, लेखक विचार तो उसमें विद्यमान रहते ही हैं। लघुक्या में भी वैचारिकता महत्त्वपूर्ण है, लेकिन वैचारिकता का संप्रेषण सीधे सपाट रूप में न होकर कथा के

८. भौतिक सुख-सुविधाओं की चाह एवं एक दूसरे की टेंगड़ी मार आगे निकल जाने की अंधी दौड़ हमारे समाज की नैतिकता का जो क्षरण कर रही है, वही आज की लघुकथा का मुख्य स्वर है। इसमें राजनैतिक एवं अधिकारियों में घर कर गया दोगलापन एवं भ्रष्टाचार, जनसाधारण की हो रही दुर्गति, परिवारिक एवं सामाजिक रिश्तों का अमानवीकरण एवं व्यक्ति के भीतर से गायब हो रही संवेदना मुख्य है।

९. वर्तमान सामाजिक हालात तथा अन्य विधाओं की स्थिति पर नजर डाले तो लघुकथा सरीखी नई विधा की स्थिति बुरी नहीं है 'सारिका' के जुलाई १९७३ अंक में प्रकाशित सत्तर लघुकथाओं को सामने रख आज की लघुकथाओं का अध्ययन करें तो अन्तर स्पष्ट हो जाता है। पता चलता है कि लघुकथा कितनी आगे निकल गई है। लघुकथा के वर्तमान स्वरूप से मैं तो संतुष्ट हूँ।

१०. लघुकथा का छोटा आकार इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। मगर अकुशल एवं लेखक बनने का शार्टकट जान अधिकांश नए लेखकों ने इसे श्राप में बदल दिया। अनाड़ी संपादक पैसे लेकर ऐसे लेखकों का कूड़ा-कबाड़ संकलनों में छाप रहे हैं। वही नए लेखकों के लिए लघुकथा के मानदंड बन जाते हैं। लघुकथा के उपयुक्त कथ्य और उसके अनुरूप शैली कम ही देखने को ही मिलते हैं। लघुकथा का शीर्षक एवं अंत दोनों अक्सर कमजोर पाये जाते हैं।

११. भारत रुढीवादी लोगों का देश है। लघुकथा ही नहीं प्रत्येक नई विधा को पुरानी पीढ़ी के साहित्यकारों ने नकारा है। लघुकथा लिखना कहानी लिखने से कठिन कार्य है तथा बहुत से कहानी लेखक प्रयास करने के बावजूद श्रेष्ठ लघुकथाएं नहीं लिख पारे। इसलिए भी वे लोग इसका विरोध कर रहे हैं। जब-जब इनसे कुछ सवाल उठाए जाते हैं तो वे निरुत्तर हो जाते हैं। गजल के एक शेर में तो उन्हें सब कुछ नजर आता है मगर लघुकथा में नहीं!

१२. कमलेश्वर, रमेश बतरा, बलराम, विक्रम सोनी, सुकेश साहनी, बलराम अग्रवाल, सतीशराज पुष्करणा, सतीश दुबे, भगीरथ परिहार, शमीम शर्मा, कमल चोपड़ा, सुभाष नीरव, सतीश राठी, रूप देवगण, अशोक भाटिया, महेन्द्र सिंह महलान, अंजना अनिल, सुरेश जांगिड उदय, सुरेश शर्मा, श्यामसुन्दर दीप्ति आदि।

१३. लघुकथा की स्थिति संतोषजनक है समर्पित लोग प्रयत्नशील है तथा अच्छा लिख रहे हैं। 

१४. लघुकथा का भविष्य पूरी तरह से उज्ज्वल है।

१५. लघुकथा के क्षेत्र में जो लेखक १५-२० वर्षों से डटे हुए है, गंभीर हैं, उनका सृजन पूरी तरह संतुष्ट कर रहा है तथा असीम संभावनाएं नजर आ रही हैं।

१६. लघुकथा की उन्नति के लिए व्यक्तिगत प्रयास काफी नहीं हैं। राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसे मंच की आवश्यकता है जिसका संचालन लघुकथा विधा को समर्पित ईमानदार लेखकों के हाथ में हो। लघुकथा विधा को समर्पित एक केंद्रीय पत्रिका हो। यह सब कार्य व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर किया | जाना चाहिए। पंजाबी पत्रिका 'मिन्नी' का उदाहरण सामने है। पिछले पन्द्रह वर्षों से 'मंच' एवं 'पत्रिका' दोनों कार्यों का निर्वाह 'मिन्नी' ने सफलतापूर्वक किया है। आत पंजाबी लघुकथा का स्तर किसी से छिपा नहीं है।

१७. सुकेश साहनी, सतीश दुबे, श्याम सुन्दर दीप्ति, बलराम अग्रवाल, कमल चोपड़ा, भगीरथ परिहार, रामेश्वर काम्बोज हिमाशुं, सूर्यकान्त नागर, पवन शर्मा, पृथ्वीराज अरोड़ा, अशोक भाटिया, बलराम, युगल, धर्मपाल साहिल, सतीश राज पुष्करणा, तारिक असलम तसनीम, सुरेश शर्मा आदि।

पोस्ट बाक्स नं.-४४, 

नजदीक दसमेश पब्लिक स्कूल, कोटकपूरा (पंजाब)-१५१२०४

Saturday, 27 July 2024

सरहद पार से : पंजाबी लघुकथाओं का हिन्दी अनुवाद

सरहद पार से : पाकिस्तानी पंजाबी लघुकथाओं का हिन्दी अनुवाद

सौजन्य : 'लघुकथा कलश' / पंजाबी लघुकथा महाविशेषांक/अंक 12, जुलाई-दिसम्बर 2023

भाषा/ निज़ाम रिज़वी 

खचाखच भरे हाल में एक पाकिस्तानी वक्ता बहुत ही ओजपूर्ण भाषण दे रहा था-- "भाइयो और बहनो! जैसे रहन-सहन और सामाजिक मूल्य किसी क़ौम के ज़िंदा होने का सबूत होते हैं, वैसे ही इतिहास, संस्कृति और मातृभाषा उनके सामाजिक जीवन का आधार होते हैं। दुनिया में कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता। अपनी जिंदा मातृ भाषा की वजह से ही हम एक जिंदा क़ौम हैं।"

एक सिख हँसते-हँसते हॉल से यह कहते हुए बाहर निकल गया :

"तुम भी ख़ुद को जिंदा क़ौम कहते हो? क़ौमी तराना फ़ारसी में और सरकारी काम अँग्रेजी में..?”

फूल चोर / मोहम्मद मुनीर शेरवानी

प्रिंसिपल साहिब का आदेश था कि कॉलेज के लॉन से फूल तोड़ने वाले से दस रुपये जुरमाना वसूल किया जाएगा; लेकिन वे दोनों फूल तोड़ने से बाज़ न आए।

जुर्माना अदा करते रहे और फूल निम्मो को भेंट करते रहे। निम्मो भी फूलों के गजरे बना-बनाकर बालों में सजाती रही।

एक दिन उन दोनों ने हिम्मत जुटाकर निम्मो से कहा, "हम तुझसे प्यार करते हैं।"

निम्मो ने मासूम-सी बनते हुए उत्तर दिया, "लेकिन मैं तो फूलों से प्यार करती हूँ।"

एक मुट्ठी मिट्टी / मोहसिन अराई

"बापू जी, मैं अगले हफ़्ते एक स्पेशल डेलिगेशन के साथ पाकिस्तान जा रहा हूँ. अगर वहाँ से कुछ मैगवाना हो तो मुझे बता दीजिए।" महिंद्र सिंह ने अपने वृद्ध पिता के पास बैठते हुए कहा।

"सब कुछ तो है भारत में बेटा। यहाँ किस चीज़ की कमी है?"

"फिर भी बापू, वहाँ सामान सस्ता भी है और क्वालिटी भी बढ़िया है। और वहाँ विदेशी सामान भी कम रेट में मिल जाता है।" जोगिंद्र सिंह ने खुलासा करते हुए कहा।

"पुत्तर! अगर ला सकते हो तो लायलपुर के नज़दीकी गाँव चक जुमरा से मेरे लिए एक मुट्ठी मिट्टी ले आना। वाहेगुरु की क़सम, दिल तरस गया है उस मिट्टी को चूमने के लिए।" वृद्ध पिता ने एक ठंडी-लंबी आह भरते हुए बेटे से कहा और अतीत की यादों में खो गया।

पढ़ा-लिखा / वारिस अली शाह

एस.पी. का पद सँभालते ही सबसे पहले मैं अपना कॉलेज देखने गया। गाड़ी से उतारकर मैं उस जगह जा खड़ा जहाँ मैं फ़ाइनल में पढ़ा करता था।

कई साल पहले भी एक बार मैं इसी जगह पर खड़ा हुआ था।

तभी एक चौदह-पंद्रह वर्षीय लड़का मेरे पास आकर घुटनों के बल बैठ गया। मैले-कुचैले कौर फटे-पुराने कपड़े। टाँगें टेढ़ी-मेढ़ी, आँखें भेंगी और जुबान में तुतलाहट।

उसने पूछा, "तू पास हो गया?"

मैंने हिकारत से कहा, "पास हो जाऊँगा।"

"न न ऐसे नहीं कहते... कहो कि ख़ुदा पास करेगा। मैं दुआ करूँगा कि तू पढ़-लिखकर एस.पी. बन जाए।" और वह आसमान की तरफ़ देखे हुए दुआ करने लगा।

और मैं शर्मिंदगी से उसकी ओर देखे जा रहा था।

दर्द का रिश्ता / हमीद मोहसिन

कॉलेज से वापिस आया तो देखा कि मेरी माँ बहुत उदास थी। उदासी का कारण पूछा तो वह उठकर दूसरे कमरे में चली

गई। मैं भी पीछे हो लिया। चारपाई पर वह किसी गहरी सोच में डूबी हुई दीवार पर दृष्टि गड़ाए बैठी थी। कुछ देर की चुप्पी के बाद मैंने फिर उदासी का कारण पूछा।

माँ उदास-से स्वर में बोली, "मैं अपने दिल की बात किससे करूँ? तेरे अब्बा की मौत के बाद मेरी बात सुनने वाला कोई नहीं... फिर उसकी आँखों से आंसू बहने लगे।

उन्हें प्यार दिलासा देते हुए मैंने कहा, "मुझे बताओ अम्मी अपने दिल की बातें, मैं सुनूँगा।"

मेरी आँखें भी एकाएक छलक गईं।

कुछ देर के लिए मुझे यूँ महसूस हुआ मानो मेरी माँ, मेरी बेटी बन गई हो।

बैरा / जमील अहमद पाल

उस दफ़्तर के चार चक्कर लगाकर जब मैं फ़ारिग हुआ तो दोपहर के दो बज चुके थे। ज़ोरों की भूख लगी हुई थी और घर पहुँचते-पहुँचते चार बज जाते, इसलिए मैं एक होटल में चला गया। रोटी-सब्ज़ी मँगवा ली। होटल क्या था, एक बहुत बड़ा हॉल कमरा था जहाँ बेतहाशा भीड़ थी। हर कोई खाने या शोर मचाने में व्यस्त था। खाना खाते हुए मुझे पानी की ज़रूरत पड़ी, पर मेज़ पर पानी नहीं था। मैंने गिलास से मेज़ ज़ोर से खटखटाया लेकिन कोई न आया। होटल में काम करने वाले चार-पाँच लड़के अपने-अपने काम में मग्न थे। एकाध को पानी देने के लिए कहा भी, मगर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया। मैंने फिर मेज़ खटखटाया, फिर भी कोई न आया। तंग आकर मैंने अपने पास से गुज़र रहे एक लड़के का कॉलर पकड़ते हुए कहा, "अबे सुनता क्यों नहीं? जा पानी लेकर आ!"

लड़के ने एक बार मेरी ओर देखा और चुपचाप कोने में रखे टब से ठंडे पानी का जग भरकर में मेज पर रख दिया। "और कोई हुकम जनाब!"

"बस जा... ग्राहकों की आवाज़ सुन लिया करो।"

लड़का चुपचाप आगे बढ़ गया। मैं उसे जाते हुए देखने लगा। वह काऊंटर पर रुका, जेब से पैसे निकालकर बिल अदा किया और होटल से बाहर निकल गया।

और मैं शर्म से पानी-पानी हो रहा था।

तलाक़ / तबस्सुम मेहताब

"तुम्हारे पति ने तुम्हें तलाक़ दिया, उसका क्या कारण था?"

"उसका स्वाभिमान।"

"क्यों? क्या तुमने उसे धोखा दिया था?"

"नहीं!"

"तो फिर?"

"वह रोज़ मुझे अपने इश्क़ का कोई-न-कोई क़िस्सा सुनाता था। ऐसे हज़ारों क़िस्से थे। एक दिन मैंने यूँ ही मज़ाक में कह दिया कि मैंने भी कभी किसी से प्यार किया था।"

"तो इसमें क्या बड़ी बात है?"

"यही तो बड़ी बात है... अपनी रंगीन मिजाजी की रंग-बिरंगी कहानियाँ सुनाने वाले ने मेरे मज़ाक को बेहयाई, धोखा, फरेब और चरित्रहीनता कहा... और मुझे तलाक़ दे-दिया।"

हमदर्दी / अहमद शहज़ाद ख़ावर

"चौधरी साहिब! आप यहाँ कचहरी में? क्या बात है?"

"नहीं कोई ख़ास बात नहीं। वो आज छोटे बेटे की तारीख़-वारीख थी।”

"कैसी तारीख़?"

“अरे यार, एक दिन पीछे पड़ गया कि बंदूक़ लेकर पार्क में जाऊँगा। वहाँ खेल-खेल में कुछ फ़ायर-वायर दे मारे। उसमें एक विधवा भाटियारन का बेटा और एक दूसरा लौंडा मारा गया।”

"दो लोग मर गए?”

"हाँ! एक के घर वालों को तो चुप करा दिया लेकिन उस भाटियारन बुढ़िया ने केस कर दिया। कहती है कि मेरा इकलौता बेटा था। कोई उससे पूछे कि क्या इकलौता बेटा नहीं मरता? बहुत समझाया कि दूसरे को पचास दिया है तू साठ ले ले। चार दिन की ज़िंदगी बची है, मौज करना। लेकिन मानती ही नहीं। इसलिए तो इन लोगों की गरीबी दूर नहीं होती।”

मनीऑर्डर / अफ़ज़ाल अहमद अनवर

“हैलो सलीम! मैं रशीद बोल रहा हूँ। रुपये तो तुम्हें मिल ही गए होंगे, कल रात भिजवा दिए थे। वो दोस्त ही। क्या जो ज़रूरत के वक़्त काम न आए! कल मैं तुम्हारे सामने वकील से बात कर रहा था न? दरअसल एक पार्टी ने मुझपर मुकद्दमा किया हुआ है, मुझे अपने दो ख़ास बंदों की गवाहियाँ चाहिए।”

"लेकिन रशीद, मैं तो मुकद्दमे के बारे में कुछ भी नहीं जानता।”

"तुम फ़िक्र मत करो, मेरा वकील तुम्हें सब-कुछ समझा देगा।”

अब्बाजान को मनीऑर्डर भेजना बहुत ज़रूरी था, अतः मेरे पाँव तेज़ी से डाकखाने की ओर बढ़ने लगे।

रशीद मुझे झूठी गवाही देने को कह रहा है। असमंजस में हूँ कि गवाही दूँ या नहीं। मेरी अंतरात्मा मुझे कह रही है कि तुम झूठी गवाही दे ही नहीं सकते।

डाकख़ाने पहुँचकर मैं मनीऑर्डर फ़ॉर्म भरने लगा। लेकिन पता लिखते हुए मेरा हाथ रुक गया। मैंने पूरी हम्मत जुटाकर अब्बाजी का पता लिखने की बजाय रशीद के ऑफ़िस का पता लिख दिया और साथ ही लिखा,

"तुमारे रुपये लौटा रहा हूँ, क्योंकि मैं झूठी गवाही नहीं दे सकता।"

मातृभाषा / हाफ़िज़ अब्दुल रहमान 'अदब'

दो वर्ष में यह उसका अट्ठारहवाँ खत था जिसका उसके पिता शर्फ़दीन ने कोई जवाब नहीं दिया था। 

जब वह दो वर्ष  बाद छुट्टी पर आया तो उसने पिता से रोष जताया कि उसके किसी खत का जवाब क्यों नहीं दिया।

शर्फ़दीन ने कहा,

"मैंने तो यहाँ से पंजाबी में ख़त भेजता था, पर तुम अँग्रेज़ी में जवाब देते थे। मैंने समझा कि हमारे बेटे ने हमें भुला दिया है। इसलिए मैंने इस पाँच दरियाओं की धरती से वायदा किया है कि अब मैं अपने किसी बेटे को परदेस नहीं भेजूंगा।"

 ('लघुकथा कलश' की घोषणा ; सभी लघुकथाएँ 'पच्छमी पौणां' से साभार)


संपादक : योगराज प्रभाकर

मोबाइल : 9872568228