Saturday, 27 March 2021

राजस्थान की लघुकथा:पृष्ठभूमि और परिदृश्य-2 / माधव नागदा

 

दिनांक 26-3-2021 से आगे दूसरी किस्त

 2 संपादित लघुकथा संग्रहभगीरथ परिहार-गुफाओं से मैदान की ओर (1974), राजस्थान की चर्चित लघुकथाएँ (2004), पंजाबी की चर्चित लघुकथाएँ (2004), पड़ाव और पड़ताल खंड-4 (2014), मैदान से वितान की ओर (2020), प्रभाकर आर्य-युगदाह(1979), नंदकिशोर नंद-प्रेरणा ( 1983), महेंद्रसिंह महलान, मोहन योगी-सबूत-दर-सबूत (1984), स्नेह इन्द्र गोयल-वकील साहब (1985), दर्पण (1988), माधव नागदा-पहचान (1986), मोहन सोनी अनंत सागर’-यथार्थ (1988), मूलवर्द्धन राजवंशी-विश्वगंधा (1989), महेंद्रसिंह महलान, अंजना अनिल-राजस्थान का लघुकथा संसार (1998), राजस्थान की महिला लघुकथाकार (2004), इमारत (2007),  

   डॉ.रामकुमार घोटड़-प्रतीकात्मक लघुकथाएँ (2006), पौराणिक संदर्भ की लघुकथाएँ (2006), अपठनीय लघुकथाएँ (2006), दलित समाज की लघुकथाएँ (2008), भारतीय हिन्दी लघुकथाएँ (2010), देश-विदेश की लघुकथाएँ (2010), राजस्थान के लघुकथाकार (2010), भारत का हिन्दी लघुकथा संसार (2011), कुखी पुकारे (2011), एक सौ इक्कीस लघुकथाएँ (2011), हिन्दी की समकालीन लघुकथाएँ (2012), किसको पुकारूँ (2012), आज़ाद भारत की लघुकथाएँ (2012), गुलाम भारत की लघुकथाएँ (2014), पड़ाव और पड़ताल खंड-12 (2015), हिन्दी की प्रतिनिधि लघुकथाएँ (2016), दलित जीवन की लघुकथाएँ (2017), लघुकथा सप्तक (2018), लघुकथा सप्तक-दो (2019), लघुकथा सप्तक भाग तीन से सात (2020), दलित संदर्भ की लघुकथाएँ (2020), आधुनिक हिन्दी लघुकथा का पूर्वार्द्ध काल (2020), आनंद प्रकाश त्रिपाठी रत्नेश’-वतन के लिए (2009), रचना निगम, अंजना अनिल-यही सच है (2011), अंजीव अंजुम-लहर और लहर (2011), शब्द और नाद (2011), त्रिलोक सिंह ठकुरेला-आधुनिक हिन्दी लघुकथाएँ (2012), समसामयिक हिन्दी लघुकथाएँ (2016), प्रबोधकुमार गोविल-पड़ाव और पड़ताल खंड-8 (2014), कीर्ति शर्मा-आधुनिक हिन्दी साहित्य की चयनित लघुकथाएँ (2017), डॉ.रामकुमार घोटड़, डॉ.लता अग्रवाल-किन्नर समाज की लघुकथाएँ (2019)

3 लघुकथा विमर्शइस श्रेणी में वे पुस्तकें ले सकते हैं जो लघुकथा विधा के  सैद्धान्तिक अथवा आलोचना पक्ष पर प्रकाश डालती हैं । इस दिशा में अभी तक अधिक कार्य नहीं हुआ है । फिर भी जो पुस्तकें आई हैं वे इस प्रकार हैं :

 ( i ) डॉ.रामकुमार घोटड़ द्वारा संपादित लघुकथा विमर्श । 2009 में प्रकाशित इस पुस्तक में लघुकथा मनीषियों द्वारा लघुकथा के विभिन्न आयामों को उजागर करने वाले 23 महत्वपूर्ण साक्षात्कार संकलित किए गए हैं।

( ii ) हिन्दी लघुकथा के सिद्धान्तभगीरथ परिहार-2018

      लघुकथा समीक्षाभगीरथ परिहार-2018

     कथाशिल्पी सुकेश साहनी की सृजन-संचेतनाभगीरथ परिहार-2019 । इस पुस्तक में भगीरथ ने सुकेश साहनी की 40 लघुकथाओं की वस्तुपरक समीक्षा की है । साथ में वे लघुकथाएँ भी संकलित हैं जिनका पुस्तक में विवेचन किया गया है ।

( iii ) समकालीन हिन्दी लघुकथा और आज का यथार्थमाधव नागदा-2019 । यह आलोचनात्मक पुस्तक तीन खंडों में विभक्त है- आलेख, समीक्षा और साक्षात्कार ।

लघुकथा कार्यक्रमों का आयोजनराजस्थान के लघुकथाकार लघुकथा गोष्ठियाँ, समारोह और सम्मेलन का निरंतर आयोजन करते रहे हैं । स्वयं भी प्रदेश के बाहर इस प्रकार के आयोजनों में भाग लेकर राजस्थान का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं ।

  राजस्थान की प्रथम लघुकथा संगोष्ठी 1975 में ब्यावर शहर में आयोजित हुई । इस संगोष्ठी में मोहन राजेश ने लघुकथा के शिल्प और विन्यास विषय पर पत्रवाचन किया तथा सत्य शुचि, डॉ.एस.के.रावत, रामप्रसाद कुमावत ने अपने विचार रखे । 1971 से 1977 तक ब्यावर में प्रतिमाह लघुकथा विचार गोष्ठियाँ आयोजित होती रही थी । इसी प्रकार अजमेर और नसीराबाद में भी लघुकथा विषयक आयोजन होते रहते थे जिसका श्रेय मोहन राजेश, सत्य शुचि, विष्णु जिंदल, राजेश जागेरिया, डॉ. के.एस. रावत, राम प्रसाद कुमावत, अर्जुन कृपलानी प्रभृति लघुकथा प्रेमियों को जाता है ।

   24 अप्रेल 1977 को रावतभाटा (चित्तौड़गढ़) में रावतभाटा शिक्षा समिति और अतिरिक्त पत्रिका के संयुक्त तत्वावधान में समकालीन लघुकथा विषय पर प्रो.कृष्ण कमलेश की अध्यक्षता में गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें भगीरथ, रमेश जैन, श्याम विजय और वरुण परिहार ने पत्रवाचन किया ।

   श्रीगंगानगर में मदन अरोड़ा की पहल पर 1983 से 1995 तक लगातार लघुकथा विचार गोष्ठियाँ आयोजित होती रही थी जिसकी रिपोर्टिंग स्थानीय समाचार पत्र लोकमत, दैनिक प्रताप और सीमा संदेश में प्रकाशित होती थी ।

  अक्तूबर 1996 में कोटा की विकल्प संस्था द्वारा शचीन्द्र उपाध्याय की अध्यक्षता में गोविंद गौड़ के लघुकथा संग्रह प्रहार का लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया । इस अवसर पर लघुकथा:विकास एवं संभावना विषय पर चर्चा गोष्ठी भी रखी गई । समारोह में अशोक भाटिया, बलराम, मधुदीप, भगीरथ, महेंद्र नेह और हितेश व्यास ने समीक्षात्मक आलेख पढ़ते हुए निर्धारित विषय पर भी अपने विचार  व्यक्त किए । संस्था के अध्यक्ष शिवराम ने उद्बोधन दिया । इसी प्रकार 3 जून 1997 को विकल्प संस्था द्वारा ही भगीरथ के प्रथम लघुकथा संग्रह पेट सबके हैं का लोकार्पण किया गया । पुस्तक का लोकार्पण करते हुए वरिष्ठ कथाकार हेतु भारद्वाज ने लघुकथा विधा को बीसवीं सदी के उत्तरार्ध की नए अंदाज़ की विधा की संज्ञा देते हुए इसकी संभावनाओं पर प्रकाश डाला । भगीरथ ने लघुकथा:विकास, परंपरा एवं सामयिक महत्व विषय पर अपना वक्तव्य दिया । गोष्ठी में गोविंद गौड़, सरला अग्रवाल, राधेश्याम मेहर, कृष्णाकुमारी, विजय जोशी तथा विकल्प संस्था के अध्यक्ष शिवराम उपस्थित थे । 16 अक्तूबर 2002 को कोटा की ही एक और साहित्यिक संस्था समर समागम मंच गोरधनपुरा एवं समरलोक पत्रिका, भोपाल के संयुक्त तत्वावधान में एक चर्चा गोष्ठी का आयोजन किया गया । इसमें कोटा अंचल से भगीरथ, गोविंद गौड़, विजय जोशी, पुरुषोत्तम यकीन एवं कृष्णाकुमारी तथा राज्य से बाहर के लघुकथाकार आलोक कुमार सत्पुते, राजकमल सक्सेना और ओमप्रकाश काद्यान की लघुकथाओं पर चर्चा की गई । साथ ही गोष्ठी में समकालीन लघुकथा:औचित्य और संभावना विषय पर पत्रवाचन भी हुए । 16-17 मई 2003 को रावतभाटा की पलाश संस्था द्वारा कोटा में लघुकथा केंदित दो दिवसीय कथावार्ता कार्यक्रम आयोजित किया गया । इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में बलराम अग्रवाल, अशोक भाटिया, जसवीर चावला, सतीश राठी, सुकेश साहनी जैसे देश के नामचीन लघुकथाकारों ने भाग लिया ।  पाँच सत्रों में आयोजित इस दो दिवसीय कार्यक्रम में स्थानीय लघुकथाकार एवं साहित्यकार भगीरथ, गोविंद गौड़, शिवराम, रमेश जैन, राधेश्याम मेहर, क्षमा चतुर्वेदी, बृजेन्द्र कौशिक, महेंद्र नेह, दिनेश राय, शचीन्द्र उपाध्याय, अंबिकादत्त, शांति भारद्वाज राकेश भी उपस्थित थे ।

   17 नवंबर से 20 नवंबर 2005 तक कहानी लेखन महाविद्यालय अंबाला द्वारा अजमेर में आयोजित चार दिवसीय लेखक मिलन शिविर के अंतिम दिन एक सत्र लघुकथा पर चर्चा का भी रखा गया जिसकी अध्यक्षता महाविद्यालय की संचालिका उर्मी कृष्ण ने की । कार्यक्रम का संचालन विकेश निझावन ने किया । चर्चा में प्रबोध कुमार गोविल, अशोक कुमार निराला, सत्यनारायण सत्य तथा डॉ.सूरज मृदुल ने भाग लिया । इस अवसर पर प्रसिद्ध लघुकथाकार डॉ.रामकुमार घोटड़ ने लघुकथा:काल विभाजन आलेख का वाचन किया ।

   27-28 जुलाई 2007 को हिन्दी पुस्तकालय समिति, डीग(भरतपुर) के स्थापना दिवस पर डीग में ही दो दिवसीय साहित्यिक आयोजन किया गया जिसमें एक सत्र लघुकथा चर्चा पर केन्द्रित था । इस सत्र की अध्यक्षता रामनिवास मानव ने की और संयोजन गोपालप्रसाद मुद्गल ने किया । इस अवसर पर दौसा के युवा लघुकथाकार अंजीव अंजुम ने लघुकथा के पक्ष में ओजपूर्ण भाषा में अपने विचार व्यक्त किए ।

   राजस्थान साहित्यकार परिषद, कांकरोली की स्थापना मधुसूदन पाण्ड्या और क़मर मेवाड़ी की पहल पर 1985 में हुई थी । तब से आज तक इसकी मासिक गोष्ठियों में अन्य रचनाओं के साथ लघुकथा पाठ भी होता आ रहा है । प्रस्तुत लघुकथाओं पर समालोचनात्मक चर्चा भी की जाती है । लघुकथा पाठ करने वालों में प्रमुख होते हैंमाधव नागदा, भँवर बॉस’, मधुसूदन पाण्ड्या, जवानसिंह सिसोदिया, किशन कबीरा और नगेन्द्र मेहता । प्रायः चर्चा में भाग लेते हैंक़मर मेवाड़ी, त्रिलोकी मोहन पुरोहित, मुरलीधर कनेरिया, शेख अब्दुल हमीद, नरेंद्र निर्मल’, ईश्वरचन्द्र शर्मा आदि ।

  राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर(राजस्थान) लघुकथा विधा को बराबर महत्व देती रही है । जब डॉ.अजित गुप्ता अकादमी की अध्यक्ष थी तो लघुकथा विधा पर एक पुरस्कार भी आरंभ हुआ था परंतु बाद में किसी कारणवश यह पुरस्कर बंद कर देना पड़ा । अकादमी की पत्रिका मधुमती लघुकथाएँ प्रकाशित करती रही है । अक्तूबर 2013 में मधुमती का लघुकथा विशेषांक निकला था जिसका सम्पादन लब्धप्रतिष्ठ लघुकथाकार डॉ.रामकुमार घोटड़ ने किया था । उस समय वेदव्यास अकादमी अध्यक्ष थे । अकादमी समय-समय पर लघुकथा केन्द्रित कार्यक्रम भी आयोजित करती है जो पर्याप्त चर्चित होते हैं । 22 और 23 सितंबर 2007 को अकादमी ने अजमेर में दो दिवसीय लघुकथा सम्मेलन रखा था जिसका उद्घाटन अकादमी अध्यक्ष डॉ.अजित गुप्ता ने किया तथा अजमेर जिला प्रमुख श्रीमती सरिता गैना ने दीप प्रज्ज्वलन किया । सुलोचना रांगेय राघव, गोपाल प्रसाद मुद्गल, भगवान अटलानी विशिष्ट अतिथि थे । डॉ.नरेंद्र सिंह, डॉ.रामकुमार घोटड़, रत्नकुमार सांभरिया, उमेश चोरसिया, बद्रीप्रसाद पंचौली, अभिजीत कुमावत ने लघुकथा के विभिन्न पहलुओं पर गंभीर चर्चा की । डॉ. रामकुमार घोटड़ ने लघुकथा:विकास, परंपरा और संभावनाविषयक आलेख का वाचन किया ।

   5 मार्च 2018 को राजस्थान साहित्य अकादमी और मरुदेश संस्थान, चूरू के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी साहित्य में लघुकथा का वर्तमान विषय पर एक साहित्य संगोष्ठी चूरू में रखी गई । तीन सत्रों में सम्पन्न इस संगोष्ठी के प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ.घनश्यामनाथ कच्छावा ने की । इस सत्र के मुख्य अतिथि कन्हैयालाल डूंगरवाल तथा मुख्य वक्ता अकादमी के सदस्य डॉ.सुरेन्द्र डी. सोनी थे । द्वितीय सत्र की अध्यक्षता डॉ.रामकुमार घोटड़ ने की तथा पत्रवाचन किया राजेन्द्र शर्मा और डॉ.वीरेन्द्र भाटी ने । तृतीय सत्र चर्चा सत्र था जो भंवरसिंह सामौर की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ । चर्चा में पंडित मोहन चैतन्य शास्त्री, हीरालाल गोदारा, मोहन सुराणा, ओंकार पारीक, मधुसूदन अग्रवाल सहित कई साहित्यकारों ने भाग लिया ।

   7 अगस्त 2018 को राजस्थान साहित्य अकादमी और साहित्य मण्डल, नाथद्वारा के संयुक्त तत्वावधान में लघुकथा संगोष्ठी आयोजित की गई जो दो सत्रों में चली । प्रथम सत्र की अध्यक्षता अकादमी अध्यक्ष डॉ.इंदुशेखर तत्पुरुष ने की । अशोक भाटिया ने बीज वक्तव्य देते हुए लघुकथा क्या, क्यों, कहाँ इन तीन बिन्दुओं की विस्तृत विवेचना की । उन्होंने राजस्थान के लघुकथा परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए माधव नागदा की लघुकथा आग का वाचन किया । इसी सत्र में माधव नागदा ने राजस्थान की हिन्दी लघुकथा में सामाजिक सरोकार और अंजीव अंजुम ने कैसे बढ़े युवा पीढ़ी में लघुकथा के प्रति रुझान विषयक पत्र वाचन किए । जितेंद्र सनाढ्य(नाथद्वारा) एवं परितोष पालीवाल(कांकरोली) ने लघुकथा पाठ किया ।  विशिष्ट अतिथि आकाशवाणी के पूर्व निदेशक डॉ.इंद्रप्रकाश श्रीमाली थे । द्वितीय सत्र की अध्यक्षता प्रखर वक्ता और शिक्षाविद जयदेव गुरजरगौड ने की । सत्र के मुख्य अतिथि रामेश्वर शर्मा तथा विशिष्ट अतिथि समालोचक डॉ.मंजु चतुर्वेदी एवं पंडित मदनमोहन अविचल थे । इस सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए बलराम अग्रवाल ने लघुकथा के उद्भव, विकास तथा महत्व पर प्रकाश डाला । इसके पश्चात रेखा लोढ़ा स्मित ने समकालीन हिन्दी साहित्य में लघुकथा का बढ़ता प्रभाव पर पत्र वाचन किया एवं नारायणसिंह राव निराकार ने लघुकथा पाठ किया ।

                                        शेष आगामी अंक में…     'लघुकथा कलश' आलेख महाविशेषांक-1 (सं॰ योगराज प्रभाकर से साभार)

Friday, 26 March 2021

राजस्थान की लघुकथा : पृष्ठभूमि और परिदृश्य-1 / माधव नागदा

              तीन किस्तों में समाप्य लंबे लेख की पहली कड़ी 

सन् 1974 में रावतभाटा राजस्थान के लघुकथाकार भगीरथ ने रमेश जैन के साथ

एक लघुकथा संकलन का सम्पादन किया था-गुफ़ाओं से मैदान की ओर | यह हिन्दी लघुकथा का प्रथम संपादित लघुकथा संग्रह था | अब 2020 में उनके द्वारा संपादित एक और लघुकथा संग्रह आया है, नाम है-मैदान से वितान की ओर | दोनों ही नाम प्रतीकात्मक हैं | जो लघुकथा गुमनामी के दौर से गुजर रही थी उसने आठवें दशक के आरंभ से ही संघर्ष के मैदान में उतरकर पाठकों और साहित्यकारों का ध्यान आकर्षित करना आरंभ कर दिया था | और अब 2020 आते-आते वह मैदान से आकाश की ओर अपने पंख पसारने लगी है | पचास वर्षों की यह अप्रतिम यात्रा यों तो सम्पूर्ण हिन्दी जगत की लघुकथाओं की गौरव पूर्ण उपलब्धि बयान करती है परंतु राजस्थान के विषय में भी यह बात शत-प्रतिशत सही है | राजस्थान की लघुकथा भी जो कभी गुफ़ाओं में गुमनाम थी वह भगीरथ के साथ ही मैदानों में निकल पड़ी |

    राजस्थान के कई लघुकथाकार अपने लेखन के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर विशेष रूप से पहचाने जाते हैं | इनमें से प्रमुख हैं डॉ.शकुंतला किरण, भगीरथ, मोहन राजेश, डॉ.रामकुमार घोटड़, महेंद्रसिंह महलान(स्व.), अंजना अनिल, पुष्पलता कश्यप, प्रबोध कुमार गोविल, प्रो.बी.एल.आच्छा, पारस दासोत(स्व.), मुरलीधर वैष्णव, रत्नकुमार सांभरिया, माधव नागदा आदि | राजस्थान के लघुकथा रचना कर्म को मुकम्मल रूप से सामने लाने का जिन साथियों ने महत्वपूर्ण कार्य किया है उनमें प्रमुख हैं -महेंद्रसिंह महलान, अंजना अनिल, भगीरथ और डॉ.रामकुमार घोटड़ | महेन्द्रसिंह महलान और अंजना अनिल द्वारा संपादित राजस्थान का लघुकथा संसार(1998), राजस्थान की महिला लघुकथाकार(2004), भगीरथ द्वारा संपादित राजस्थान की चर्चित लघुकथाएँ(2004) और डॉ.रामकुमार घोटड़ दवारा संपादित राजस्थान के लघुकथाकार(2010) तथा मधुमती का अक्तूबर 2013  अंक इस क्षेत्र में विशेष रूप से उल्लेखनीय है | राजस्थान के लघुकथाकार पुस्तक में डॉ.घोटड़ ने लगभग 300 लघुकथाकारों का नामोल्लेख किया है तथा 60 लघुकथाकारों की 180 लघुकथाएँ प्रकाशित की हैं जिसमें राजस्थान के प्रत्येक जिले से लघुकथाकारों को प्रतिनिधित्व दिया गया है | इसी पुस्तक में डॉ.घोटड़ का एक लंबा आलेख राजस्थान का लघुकथा संसार पठनीय है जिसमें राजस्थान के लघुकथा परिदृश्य का विस्तृत लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है | भगीरथ ने राजस्थान की चर्चित लघुकथाओ में न केवल उस समय(2004) के 19 उल्लेखनीय रचनाकारों की लघुकथाएँ दी हैं वरन प्रत्येक लघुकथाकार पर आलोचनात्मक आलेख दिए हैं जिनसे पुस्तक का महत्व बढ़ गया है | डॉ.अनिल शूर आज़ाद (दिल्ली) ने भी राजस्थान के ग्यारह महत्वपूर्ण लघुकथाकारों को लेकर राजस्थान की लघुकथाएँ (2014) पुस्तक संपादित की है जिसमें प्रत्येक लेखक की ग्यारह-ग्यारह लघुकथाएँ ली गई हैं | मधुदीप ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना पड़ाव और पड़ताल के कई खंडों में राजस्थान के लघुकथाकारों और समालोचकों को सम्मिलित किया है | दो खंडों का सम्पादन तो राजस्थान के लेखकों को ही दिया गया है | खंड 8 के संपादक हैं प्रबोधकुमार गोविल तथा खंड 12 के संपादक हैं डॉ.रामकुमार डॉ.घोटड़ | खंड 8 (2015) तो एक प्रकार से राजस्थान के लघुकथाकारों को ही समर्पित है | यहाँ सभी 66 लघुकथाएँ राजस्थान के लघुकथाकारों की हैं | ये लघुकथाकार हैं- गोविंद शर्मा, पारस दासोत, महेंद्रसिंह महलान, मुरलीधर वैष्णव, रत्नकुमार सांभरिया और रामकुमार घोटड़ | आलेख रमेश खत्री(जयपुर) एवं इन सभी लघुकथाओं पर समालोचना जयपुर के ही हरदान हर्ष की है | यही नहीं धरोहर स्तम्भ में विजयदान देथा और यादवेन्द्र शर्मा चंद्र की लघुकथाएँ दी गई हैं |

   पुष्पलता कश्यप ऐसी लेखिका हैं जिन्होंने राजस्थान में लघुकथा को घर-घर पहुँचाया | आठवें दशक में राजस्थान पत्रिका के सहयोगी प्रकाशन साप्ताहिक इतवारी पत्रिका के कई अंकों में उनकी एक साथ  ग्यारह-ग्यारह लघुकथाएँ प्रकाशित हुई जिससे यहाँ के पाठकों में लघुकथा के प्रति गहन रुझान उत्पन्न हुआ | इससे कई नए लेखकों को भी लिखने की प्रेरणा प्राप्त हुई | उस समय इतवारी पत्रिका के संपादक श्रीगोपाल पुरोहित थे |

    उक्त स्थापित लघुकथाकारों के अलावा आज कई ऐसे लघुकथाकार हैं जो या तो राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके हैं अथवा जिनकी लघुकथाएँ पर्याप्त ध्यान आकर्षित कर रही हैं | ये हैं सत्य शुचि, गोविंद शर्मा, गोविंद भारद्वाज, मुकुट सक्सेना, गोविंद गौड़, कृष्णकुमार आशु, अखिलेश पालरिया, आभा सिंह, रेणुका माथुर चंद्रा’, नीलिमा टिक्कू, ऋतु सरस्वत, करुणा श्री, उमेश कुमार चौरसिया, मोहन राजेश, सरला अग्रवाल, भरतचंद्र शर्मा, जनकराज पारीक, सत्यनारायण सत्य, नदीम अहमद नदीम, प्रमोद कुमार चमोली, दिनेश विजयवर्गीय, मधुसूदन पाण्ड्या, चंद्रेश कुमार छतलानी, प्रकाश तातेड़, दिलीप भाटिया, भारत दोसी, पीयूष पाण्डिया, श्याम सुंदर सुमन, भगवती प्रसाद गौतम, घनश्याम कच्छावा, सांवला राम नामा, अंजीव अंजुम, जितेंद्र शंकर बजाड़, दिनेश कुमार छाजेड़, सीमा भट्ट, हनुमान तमनाशक’, दीनदयाल शर्मा, हरदान हर्ष, अनिल चौरसिया, अपर्णा चतुर्वेदी प्रीता’, सावित्री चौधरी, पद्मजा शर्मा, मीठालाल खत्री, ओमप्रकाश भाटिया, मदन अरोड़ा, उषा माहेश्वरी, डॉ.नरेंद्र सिंह, नीरज दइया, संजय पुरोहित, सुदर्शन राघव, शिवचरण सेन शिवा’, राधेश्याम मेहर, विजय जोशी, नीना छिब्बर, सत्यदेव संवितेंद्र, नमोनाथ अवस्थी, कृष्णा भटनागर, उमेश अपराधी, रंजना गौड़ भारती’, लीला मोदी, आशा मेहता, अनिता वर्मा, डॉ.आनंद प्रकाश त्रिपाठी, अनंत भटनागर, माणक तुलसीराम गौड़, उर्मिला माणक गौड़, बजरंग लाल जेठू, शिवनारायण शर्मा, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, साधना ठकुरेला, परितोष पालीवाल, नीलप्रभा भारद्वाज, विभा रश्मि, लक्ष्मी रूपल, वीरबाला भावसार, पुष्पा रघु, मोहन सोनी, अनीता वर्मा, अब्दुल समद राही आदि |

   कई साहित्यकार ऐसे हैं जिन्होंने मुख्यतः किसी अन्य विधा में कलम चलाते हुए यदा-कदा लघुकथाएँ भी लिखी हैं जो काफी चर्चित हुई हैं | इनमें से प्रमुख हैं योगेन्द्र दवे, मालचंद तिवाड़ी, बुलाकी शर्मा, हरदर्शन सहगल, हसन जमाल, डॉ.सत्यनारायण, मनोहर सिंह राठौड़ | इनके अलावा स्मृति शेष यादवेन्द्र शर्मा चंद्र’, विजयदान देथा, जनकराज पारीक एवं रघुनंदन त्रिवेदी ने भी कुछ उल्लेखनीय लघुकथाएँ लघुकथा जगत को दी हैं | रघुनंदन की लघुकथाएँ तो आज भी शिल्प की ताज़गी के चलते अलग ही पहचानी जाती हैं |

  राजस्थान के प्रथम लघुकथाकार होने का गौरव अजमेर के साहित्यकार बद्रीप्रसाद पंचौली को जाता है | उनकी लघुकथा सागर चुप हो गया 1963 में गंगानगर से निकलने वाले दैनिक सीमा संदेश में प्रकाशित हुई थी | यदि राजस्थान के प्रथम प्रकाशित एकल लघुकथा संग्रह की बात करें तो वह है सुगनचंद मुक्तेश का स्वाति बूंद’ | यह संग्रह 1966 में प्रकाशित हुआ | मुक्तेश जी ने 1964 से लघुकथाएँ लिखना आरंभ किया | उनकी प्रथम लघुकथा सृष्टिक्रमथी |

   महिला लघुकथाकारों में प्रथम प्रकाशित लघुकथा संग्रह जोधपुर की कृष्णा भटनागर का अनमोल सीपियाँ है | कृष्णा जी का यह संग्रह 1982 में प्रकाशित हुआ था |

  लघुकथा की गुफा से वितान तक की इस यात्रा में राजस्थान के कई लघुकथाकार साथी हमसे सदैव के लिए बिछुड़ गए | इनमें प्रमुख हैं यादवेन्द्र शर्मा चंद्र, बीकानेर (मुख्यतः उपन्यासकार), सुगनचंद मुक्तेश (हनुमान गढ़), दुर्गादत्त सैनी दुर्गेश’, चूरू (जो दुर्गेश के नाम से लिखा  करते थे), मोहन योगी (फैफाना, हनुमानगढ़), गौरीशंकर आर्य (चौमेला, झालावाड़), रघुनंदन त्रिवेदी (मुख्यतः कहानीकार), जनकराज पारीक (कोटा), मन्नालाल परदेशी (प्रतापगढ़), प्रह्लाद नवीन (प्रतापगढ़), मंजुला शर्मा (सादुलपुर), पारस दासोत (जयपुर) |

   अब बात करते हैं राजस्थान से प्रकाशित लघुकथा विषयक पुस्तकों की | यह सूची बहुत लंबी है | इस सूची को हम निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत कर सकते हैं-

1 एकल लघुकथा संग्रह- सुगनचंद मुक्तेश-स्वाति बूंद (1966) दुर्गेश-कालपात्र (1979), कृष्णा भटनागर-अनमोल सीपियाँ (1982), मणियाँ (1996), सुरंगिनी (2002), कसकती बीथियाँ (2005), ओमानन्द सारस्वत- आज का अश्वत्थामा (1984), पुष्पलता कश्यप-अहसासों के बीच (1984), इक्कीसवीं सदी की लघुकथाएँ (2000), आम आदमी से संबन्धित लघुकथाएँ (2010), प्रबोधकुमार गोविल-मेरी सौ लघुकथाएँ (1985), योगेन्द्र दवे-विषमता (1985),

   पारस दासोत-एक और अभिमन्यु(1986), प्रयोग(1988), परसु (1989), क़दम बढ़ाती चूड़ियाँ(1990), समक्ष(1991), पुस्तक की आवाज़(1991), ईश्वर(1953), तेरी मेरे उसकी बात(1996), सीटी वाला रबर का गुड्डा(1998), सीधी है भोली कला(2009), मेरी मानवेतर लघुकथाएँ(2010), मेरी मनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ(2012), यथास्थितिवाद के खिलाफ मेरी लघुकथाएँ(2012), मेरी किन्नर केन्द्रित लघुकथाएँ (2013), मेरी आलंकारिक लघुकथाएँ(2014), नारी-मन-विज्ञान:मेरी लघुकथाएँ(2014), मेरी प्रतीकात्मक लघुकथाएँ(2014), घायल इंकलाब(2014) |

  डॉ.रामकुमार घोटड़-तिनके-तिनके (1989), प्रेरणा (1993), क्रमशः (2000), रू-ब-रू (2006), आधी दुनिया की लघुकथाएँ (2009), मेरी श्रेष्ठ लघुकथाएँ (2009), संसारनामा (2012), रजत कण (2014), दर्पण के उस पार (2015), सामाजिक सरोकार की लघुकथाएँ (2017), प्रजातन्त्र के सारथी (2018), मेरी चुनिन्दा लघुकथाएँ (2019), बुजुर्ग जीवन की लघुकथाएँ (2019), बीसवीं सदी की मेरी लघुकथाएँ (2019) |

   परमेश्वर गोयल-यथार्थ का एहसास (1991), समय का सच (1993), कर्मेन्द्र मणि-भारतीय जीवन का यथार्थ (1993), भगीरथ-पेट सबके हैं (1996), बैसाखियों के पैर (2017), महेंद्रसिंह महलान-सिलसिला (1993), गोविंद गौड़-प्रहार (1996), रत्नकुमार सांभरिया-बांग और अन्य लघुकथाएँ (1996), प्रतिनिधि लघुकथा शतक (2010), माधव नागदा-आग (1998), अपना अपना आकाश (2014), आशा मेहता-सच्चा सुख (2001), सरला अग्रवाल-दिन दहाड़े (2004), सीपी में सागर (2009), दिलीप भाटिया-कड़वे सच (2004), माणक तुलसीराम गौड़-कर्तव्य बोध (2004), माँ की तस्वीर (2008), दायित्व बोध (2017), करूणा श्री-अन्तर्मन की कथाएँ (2005), आस्था के फूल (2010), नदीम अहमद नदीम-समय चक्र (2007), परिंदे (2013), मुस्कान (2018), नरेंद्र सिंह-हौं कहता आँखन देखी (2007), मुकुट सक्सेना-प्रतिप्रहार (2007), वीरबाला भावसार-कथन (2007), उषा माहेश्वरी-रावण ज़िंदा है (2007), मुरलीधर वैष्णव-अक्षय तुणीर (2009), कितना कारावास (2017), लक्ष्मी रूपल-कतरा-कतरा सच (2009), आप ठीक कहते हैं (2013), घरौंदे (2018), देव शर्मा-थाली कैसे बजेगी (2009), प्रकाश तातेड़-दर्पण एक बिम्ब अनेक (2010), राम निवास बायला-हिमायती (2011), संजय जनागल-नई रोशनी (2012), अनिता वर्मा-संजय झूठ ना बोले (2012), आशा पथिक-संवेदना के पथ (2012), अनूप घई-अंतर के भ्रम (2012), गोविंद शर्मा-रामदीन का चिराग (2014), श्रीमती कमलेश माथुर-लघुकथाएँ एवं अन्य कहानियाँ (2012), रचना गौड़ भारती’-दिल ने कुछ कहा (2012), अनिल मुद्गल-कांच के टुकड़े (2012), मन की लघुकथाएँ (2014), हरदान हर्ष-अपने ही खुदा का बंदा (2014), दिलीप भाटिया-भीगी पलकें (2015), महेंद्र नेह-उन्हें नहीं मालूम (2015), आभा सिंह-माटी कहे (2015), रेणु चन्द्रा-छोटी सी आशा (2015), इ.आशा शर्मा-उजले दिन:मटमैली रातें (2016), भैरो सिंह राव क्रान्ति-कुँवारा आँगन (2016), अखिलेश पालारिया-पीर पराई (2017), गोविंद भारद्वाज-रिश्तों की भीड़ (2017), संजय पुरोहित-अंतर्दृष्टि (2018), रचना गौड़ भारती-दहलीज (2018), चंद्रेश कुमार छतलानी-बदलते हुए (2019), कृष्ण कुमार आशु-तृष्णा एवं अन्य लघुकथाएँ (2019), सावित्री चौधरी-परख (2020), विभा रश्मि-साँस लेते लम्हे (2020) |

शेष आगामी अंक में…                                                                        'लघुकथा कलश' आलेख महाविशेषांक-1 (सं॰ योगराज प्रभाकर से साभार)