Wednesday, 16 September 2020

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में…4 / डॉ॰ उमेश महादोषी

दिनांक 15-9-2020 से आगे

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में आत्मिक और दैहिक अस्तित्व का तात्विक विवेचन

चौथी कड़ी

03. सामाजिक दायित्वों के सन्दर्भ में

मानवीय जीवन का व्यावहारिक रूप समाज होता है, जो यथार्थतः विभिन्न वर्गों में बँटा होता है। प्रत्येक वर्ग के अपने हित होते हैं, जिनके सन्दर्भ में उनका पारस्परिक व्यवहार एक दूसरे को प्रभावित करता 

है। समय के साथ संसाधनों के विकास, आवश्यकताओं के सापेक्ष उनकी पूर्ति के समीकरण, परिवेश का विकास और परिवर्द्धन आदि का भी प्रभाव सामाजिक वर्गों के आचरण और पारस्परिक व्यवहार आदि पर पड़ता है। इसके साथ मानवीय जीवन से इतर, परिवेश एवं भौतिक वातावरण से जुड़े कारक भी होते हैं, जो मानवीय जीवन के व्यक्तिगत और सामाजिक- दोनों रूपों को प्रभावित करते हैं। इनमें पर्यावरण के संरक्षण से जुड़े कारक बेहद महत्वपूर्ण हैं। इनकी सापेक्षिक और सामयिक पड़ताल
साहित्यिक रचना/समकालीन लघुकथा सृजन में कैसे होती है, इसे समझना समीक्षा का आधार अवश्य बनेगा। हमें यह बात अपने अन्तर्मन में रखकर चलना होगा कि प्रत्येक लेखक एक ही मन्तव्य से लेखन नहीं करता है। किसी का उद्देश्य सामाजिक विसंगतियों पर चोट करना होता है, तो किसी दूसरे का मन्तव्य किसी मानव समूह के हितों को पोषित करना। ढेरों उद्देश्य हैं, जिन्हें अलग-अलग लेखक लेकर चलते हैं। सामाजिक समीक्षा (इसके माध्यम से हम वृहद स्तर पर लघुकथा सृजन के वास्तविक परिणामों तक भी पहुँच सकते हैं) का ध्येय लेकर हम चलेंगे तो हमें लेखक के मन्तव्य का नोटिस लेना ही होगा। हमें देखना होगा कि लेखक ने जिस उद्देश्य को चुना है, क्या वह समग्रतः सामाजिक और जीवन की सहजता-निर्वाधता की दृष्टि से उचित और उपयुक्त है? यदि लेखक के वास्तविक मन्तव्य को समझने में समीक्षक चूकेगा तो वह रचना के प्रति अपनी जिम्मेवारी से ही नहीं चूकेगा, सामाजिक जिम्मेवारी से भी चूकेगा। यह संभव है कि एक सामाजिक समूह के हित-पोषण की बात करते हुए लेखक किसी दूसरे समूह के हितों के खिलाफ या फिर विभिन्न समूहों के मध्य अवांछित/अतार्किक संघर्ष को प्रेरित करने की दिशा में अग्रसर हो जाये। इसकी पड़ताल समीक्षा के दायरे में होनी चाहिए। मैं यहाँ अभिव्यक्ति की आजादी का न तो विरोध कर रहा हूँ और न ही जीवन की आलोचना के सन्दर्भ की अनदेखी। अपितु आजादी की सीमाओं के सन्दर्भ में लेखकीय उद्देश की अनुशासनात्मक परिधि और जीवन की आलोचना को मानवीय अनुभव-प्रक्रिया से गुजारने के सामान्य रचनात्मक यथार्थ के प्रति लेखकीय दायित्व को पड़ताल की सीमा में लाने की आवश्यकता जता रहा हूँ। 

      समकालीन लघुकथा के उदय की पृष्ठभूमि में ऐसी कई चीजें विद्यमान हैं जो उसके यथार्थ को सूक्ष्म किन्तु व्यापक चिंतन के दायरे में ले जाती हैं। इसलिए पड़ताल का यह आधार बनता है कि लघुकथाकार अपने सृजन में जीवन के यथार्थ की वास्तविक समझ के प्रति कितना सजग है। समकालीन लघुकथा की पृष्ठभूमि में शामिल राजनैतिक दमन, भ्रष्टाचार जनित उत्पीड़न, धोखाधड़ी और षणयंत्र, सामाजिक वर्ग-भेद से जनित उपेक्षा, अनादर और उत्पीड़न (नारी विमर्श, दलित विमर्श, सम्प्रदायिक विमर्श, गरीबी एवं वृद्धावस्था से जुड़ी चर्चाओं, वैयक्तिक आजादी और जीवन की विभिन्न स्थितियों से जुड़ी चर्चाओं, सामाजिक एवं वैयक्तिक जीवन की विसंगतियों पर चर्चा आदि को उत्प्रेरित करने वाले कारकों के रूप में) आदि की उपस्थिति उसके उदय का विशेष कारण रहे हैं। समकालीन लघुकथा इन विषयों और उनसे उद्भूत कथ्यों को पूरी तीव्रता के साथ सामने लाती है। लेकिन समीक्षात्मक दृष्टि से प्रश्न यह है कि रचनात्मक विमर्श या चर्चा में वास्तविकता के साथ तार्किकता व समग्रता आ पाती है या नहीं। उदाहरण के लिए महिला विमर्श के तहत लघुकथा में कई बार महिला और पुरुष दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति में लघुकथाकार तभी सफल माना जा सकता है, जब उसके उद्देश्य में महिलाओं की सुरक्षा, समानता और सम्मान का प्रश्न शामिल हो। इसके विपरीत भूतकाल की कुछ चीजों को लेकर महिला और पुरुष को दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ा करने या उनके मध्य अनपेक्षित संघर्ष को प्रेरित करने के उद्देश्य से कोई रचना लिखी जाती है तो उसे उचित नहीं माना जा सकता। यही स्थिति दलित विमर्श और साम्प्रदायिक विमर्श के सन्दर्भ में भी है। समाज का कोई वर्ग पीड़ित रहा है, उसके प्रति संवेदनात्मक दृष्टि और उसको बराबरी का सम्मान और समान अवसर देने का समर्थन निसंदेह न्यायसंगत है। लेकिन जिन वर्गों को शोषण के लिए जिम्मेवार माना गया, उनकी वर्तमान पीढ़ियों के साथ अकारण सामाजिक संघर्ष को प्रेरित करना ठीक नहीं हो सकता। लघुकथा (साहित्य) समाज में उपस्थित विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को उजागर करे और विध्वंसात्मक शक्तियों को हतोत्साहित करे, यह उसके उद्देश्य में निहित है। लेकिन रचना में सामाजिक विध्वंस को प्रेरित करने को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

      इस सन्दर्भ में डॉ. संध्या तिवारी की लघुकथा ‘चप्पल के बहाने’ (अविराम साहित्यिकी: अप्रैल-जून 2017) रेखांकित करने योग्य है। लघुकथा में एक फैक्ट्री कर्मी, मनोज, एक मोची को लंच टाइम में अपनी चप्पल गाँठने को देता है। मोची सामान निकालने के लिए अपना जूता-चप्पल गाँठने वाला सामान रखने का डिब्बा खोलता है तो मनोज डिब्बे के ढक्कन के ऊपरी हिस्से में रामकृष्ण परमहंस, उनकी पत्नी शारदा देवी और देवी काली के चित्र देखकर भड़क उठता है। वह भगवान को ऐसे स्थान पर रखने के लिए मोची को हड़काता है। तब तक मोची अपना काम कर चुका होता है और मेहनताने के दस रुपये माँगता है। मनोज पैसे देने की बजाय उसे आदेश देता है- ‘‘हटाओ अभी के अभी। हटाओ ये चित्र इस डिब्बे से।’’ लेकिन मोची हड़काने में आने की बजाय बड़े इत्मीनान से अपना डिब्बा बन्द करते हुए अपनी जाति के गौरवपूर्ण इतिहास और आस्था के बारे में शालीन और साहसिक टिप्पणी करता है। मोची का मनोज से न डरना और न ही उसके हड़काऊ व्यवहार के प्रति उत्तेजित होना, साथ ही अपने व्यवहार में इत्मीनान का प्रदर्शन करना उसके परिपक्व और निडर आचरण को दर्शाता है, जिस पर गर्व किया जा सकता है। साथ ही रैदास का उदाहरण सामने रखते हुए उसका यह कहना- ‘‘और महाराज सच्च पूछौ, तो इहे कौम ठीक से समुझि पाई कि ईसुर कहाँ नहीं है।’’ उसके आत्मगौरव को दर्शाता है। यह आत्मगौरव ही किसी कौम और व्यक्ति को ऊपर उठाता है। मुझे लगता है कि कोई भी विमर्श ऐसे ही विश्वास भरे तत्वों से पूर्णता प्राप्त कर सकता है। इस लघुकथा के नेपथ्य में झाँककर देखिए, मनोज मोची को अपमानित करके भी क्या अपमानित कर पाया? क्या मोची के आचरण के सम्मुख बौना होकर स्वयं अपमानित नहीं हुआ? इस लघुकथा में कथ्यात्मक विचार की स्थापना बेहद महत्वपूर्ण है। 

      यहाँ एक और स्थिति को देखें। एक ओर दलित और पिछड़ा वर्ग के विमर्श के नाम पर जातिवाद का उन्माद उभारा जा रहा है और कथित निम्न और उच्च जातियों के मध्य वैमनस्य को बढ़ाया जा रहा है। दूसरी ओर अन्तर्जातीय (कथित निम्न और उच्च जातियों के मध्य) सम्बन्धों (वैवाहिक) पर बलात् स्थिति तक जाकर जोर दिया जा रहा है। तीसरी ओर नारी सशक्तीकरण का उभार समय की आवश्यकता बन गया है। चूँकि समकालीन लघुकथा इस स्थिति के मूल में बैठे तथ्यों का समर्थन करती है, इसलिए प्रश्न उठता है कि इन तीनों के मध्य जो काम्प्लेक्स उभरकर सामने आ रहा है या आने वाले समय में आयेगा, क्या उस पर विचार नहीं होना चाहिए? थोड़ा और स्पष्ट करते हैं। मान लीजिए एक हरिजन का बेटा एक ब्राह्मण की बेटी से विवाह करता है। वह हरिजन परिवार ब्राह्मणों को अपनी जाति के शोषण का जिम्मेवार मानकर उनसे नफरत करता है। यह नफरत समय-समय पर परिवार में शब्दवाणों के रूप में उफनती रहती है। ऐसे में क्या होगा? घर में बहू/पत्नी बनी ब्राह्मण की बेटी इस स्थिति को वास्तव में तथा कितना बर्दास्त करेगी? लघुकथाकार किसके पक्ष में खड़ा होगा- पुरुष विरुद्ध महिला के या ब्राह्मण विरुद्ध दलित के? समाज में ऐसी स्थितियाँ आने लगी हैं। दलित या महिला विमर्श के नाम पर सृजनात्मक चिंतन हमेशा दलित के पक्ष में जाये या महिला के, यह हमेशा आवश्यक और उचित नहीं हो सकता। लेखक ऐसी स्थितियों में सृजन करते हुए किस तरह परिस्थिति सापेक्ष दृष्टिकोंण अपनाता है, यह चीज समीक्षक को देखनी होगी। 

 04. सामयिक परिवर्तनों के प्रभाव: नई सदी की लघुकथा

      समकालीन लघुकथा जिस पृष्ठभूमि पर उदित हुई है, उसके दृष्टिगत उसकी बहुत बड़ी आवश्यकता यह है कि वह स्वयं को अद्यतन रखे। किसी भी रचना एवं विचार के अद्यतन होने की समान्य प्रक्रिया सामयिक परिवर्तनों के प्रतिबिम्बों को आत्मसात करते हुए चलती है। समकालीन लघुकथा का यह मानक होना चाहिए कि लघुकथा अपने समय से कितना करीबी रिश्ता बनाकर चल रही है। यदि वह ऐसा नहीं कर पाती है तो समकालीन होने के बावजूद उसमें ठहराव आ जायेगा। सामयिक परिवर्तन सामान्य जीवन में पैठ बनाते हुए समकालीनता का हिस्सा बनते हैं, इसलिए सृजन में उनके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। परिवर्तन अल्पजीवी हैं या दीर्घजीवी, इससे अन्तर नहीं पड़ता। कोई परिवर्तन दीर्घजीवी नहीं होगा, इसलिए उसको प्रतिबिम्बित करने वाली रचना भी स्थाई या सार्वकालिक महत्व की नहीं होगी, ऐसा सोचकर सृजन करना उचित नहीं। सृजन परिवर्तनों का परीक्षण करता है, उस पर चिंतन और चर्चा को प्रेरित करता है। इस सन्दर्भ में सृजन का महत्व इस बात में होता है कि वह परिवर्तनों को प्रतिबिम्बित करने के अपने उद्देश्य में कितना सफल है। यदि अन्य तात्विक चीजें ठीक हैं तो तात्कालिक परिवर्तनों को प्रतिबिम्बित करने वाली रचना सार्वकालिक हो न हो, रचनात्मकता को प्रतिपादित करने में अवश्य सफल हो सकती है।

      भारत में 1970 के बाद के मानवीय परिवेश के लिए जिम्मेवार परिवर्तन दो तरह के हैं, एक वे, जो भारत की आजादी के संघर्ष के अंतिम दौर (जिसे असल में ब्रिटिश हुकूमत का अवसान काल कहा जाना चाहिए) के बाद से ही आरम्भ हो गए थे लेकिन उनकी प्रभावी सघनता वर्षों बाद, यहाँ तक कि बीसवीं सदी के अंत या इक्कीसवीं सदी में देखने को मिली। जैसे कि विधवा विवाह की पहल और सामाजिक स्वीकार्यता। जातीय और लैंगिक आधार पर सामाजिक बराबरी के प्रयासों के परिणाम अभी भी धीरे-धीरे आ रहे हैं। दूसरे वे, जो 1970 या उसके बाद के विभिन्न उपकाल खण्डों में ही सामने आए और प्रभावी हो गए। नई सदी के दूसरे दशक तक ऐसे बहुत सारे परिवर्तन परिवेश में आ गए हैं और लघुकथा में प्रतिबिम्बित भी हो रहे हैं। 

      महिला विमर्श, दलित विमर्श, जातीय एवं साम्प्रदायिक विमर्श, मानवीय चरित्र में आये बदलाव, सामाजिक-पारिवारिक जीवन में वृद्धाश्रमों एवं बाल-छात्रावासों आदि का प्रवेश और उनसे जनित परिवर्तन, पारिवारिक विघटन के परिणामस्वरूप एकल परिवारों का अस्तित्व और उनसे जनित परिवर्तन, भौगोलिक परिवर्तन, विज्ञान एवं नव-तकनीक उद्भूत परिवर्तन, मानवीय स्वास्थ्य और मानसिक स्तर से जुड़े परिवर्तन, पीढ़ी अन्तराल और नई पीढ़ियों के चिंतन व सोच में परिवर्तन आदि अनेक चीजें हैं, जो मानवीय जीवन को अनेक प्रकार से प्रभावित कर रही हैं। इनमें कई सकारात्मक यानी जीवन की सहजता और निर्वाधता को बढ़ाने वाली हैं तो कई जीवन के लिए संकट का कारण बनने वाली भी। मनुष्य की स्वार्थपरकता, संवेदनहीनता और चारित्रिक विसंगतियों के अनेक नये रूप सामने आ रहे हैं। पारिवारिक रिश्तों के रूप-स्वरूप के साथ उनकी समझ-स्वीकृति में व्यापक अन्तर आ रहा है। एकाकी जीवन के परिणाम नई सदी में तीव्रता के साथ अनुभव किये जा सकते हैं। इन तमाम परिवर्तनों के पारस्परिक प्रभावस्वरूप जीवन से जुड़ी कई जटिलताएँ भी सामने आ रही हैं। लघुकथा जिस पृष्ठभूमि पर जन्मी है और जैसा चरित्र उसने अपने उद्भव के मूल में पाया है, उसके दृष्टिगत इन परिवर्तनों को आत्मसात करने से वह बच नहीं सकती। इसलिए मानव-मनोविज्ञान के अनुरूप इनके प्रभावपूर्ण प्रतिबिम्बों की उपस्थिति होना समकालीन लघुकथा की समीक्षा का एक आधार बनता है। समीक्षक को देखना होगा कि लघुकथाकार अपनी रचना में इन तमाम परिवर्तनों को कितने प्रभावी और भाव-चिंतन से युक्त रूप-स्वरूप में प्रस्तुत करता है। लेखक अन्ततः रचनात्मक परिवेश का एक प्रेक्षक और मानव-व्यवहार से जुड़े प्रेक्षणों का सृजनात्मक प्रस्तोता होता है। उसका प्रस्तुतीकरण यथार्थ के मर्म का जितना प्रतिनिधित्व कर पाता है, समीक्षा की दृष्टि से वह उतना ही सफल लेखक होता है। 

      यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जो रचनाएँ कुछ आदर्शपरक स्थितियों के सन्दर्भों या रुटीन जीवन का हिस्सा बन चुकी बिडम्बनाओं के सामान्य प्रतिबिम्बन तक सीमित रह जाती हैं, वे लघुकथा होते हुए भी समकालीनता के आकर्षण से रहित हो जाती हैं। उन्हें सामयिक तो कहा ही नहीं जा सकता।

                                                                  शेष आगामी अंक में जारी…

Tuesday, 15 September 2020

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में…3 / डॉ॰ उमेश महादोषी

 दिनांक 14-9-2020 से आगे

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में आत्मिक और दैहिक अस्तित्व का तात्विक विवेचन

तीसरी कड़ी

इस स्थिति के पीछे सृजन को प्रभावित करने वाला एक बड़ा इतर कारक भी महत्वपूर्ण है। यह है लेखक-पाठक का व्यावहारिक और व्यक्त रिश्ता। आज न तो लेखक पर्दे के पीछे है और न ही पाठक पर्दे (दर्पण) के आगे। व्यावहारिक जीवन में लेखक-पाठक आपस में गलबहियाँ डाले हुए हैं। पाठक जानता है कि जिस कार्यालय में उसे जीवन के अनेक कामों के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं, उसका मुखिया लेखक है तो क्या हुआ, है तो भ्रष्ट या भ्रष्टाचार पर मौन। कार्यालय में बैठा कार्पोरेटी लेखक जानता है कि यह जो बन्दा मेरे सामने खड़ा है, यह कोई दूध का धुला नहीं है। इसलिए मैं इसे अपनी दाल-रोटी और सुख-सुविधाओं का स्रोत क्यों न मानूँ! यदि कुछ संवेदनात्मक स्थितियों-परिस्थितियों से सामना हो भी जाये तो भी सामने वाला बन्दा अधिक से अधिक एक भावी रचना का प्लॉट हो सकता है। मैं इस बात से इनकार नहीं करता कि कई लेखक/रचनाकार आज भी वास्तव में संवेदनशील और दूसरों के दुःख-दर्द को समझने वाले हैं, लेकिन उनकी संख्या समाज को सकारात्मक संदेश देने के लिए पर्याप्त नहीं है। भाषा और संस्कृति के स्तर पर सडांध फैलाने वाले भीे साहित्यिक सड़कों पर सरेआम खंजर लिए घूम रहे हैं। ऐसे में रचनात्मकता का संप्रेषण कितना वास्तविक और प्रभावोत्पादक हो सकता है, लघुकथा के वर्तमान समकाल की प्रवृत्तियों में यह चीज दूर से चमकती है। या तो आज लेखक जिम्मेवारियों से विमुख हो चुका है या फिर लघुकथा से जुड़ी शार्टकट प्रसिद्धि की आभासी धारणा ने अनेक संवेदनहीन लोगों को लघुकथा (और दूसरी लघ्वाकारीय/समधर्मा विधाओं) के आँगन में लाकर खड़ा कर दिया है। यह बहुत पुरानी और वास्तविक मान्यता है कि कथनी और करनी (सिद्धांत और व्यवहार के स्तर पर संवेदना) में अंतर रहेगा तो आपके शब्दों के प्रभाव का वास्तविक सम्प्रेषण नहीं होगा। ‘छोड़ो भी यार!’’, ‘सिद्धान्तो को मारो गोली’ यासिद्धान्तों से पेट नहीं भरता है’ जैसी धारणाओं के जंगल में आज आम आदमी ही नहीं विचर रहा है, साहित्यकार, बुद्धिजीवी और कथित जिम्मेवार लोग भी वहाँ के सुहावने परिवेश में अपने घर बनवा रहे हैं। सृजन से इतर होते हुए भी यह समकालीन परिदृश्य से जुड़ा एक बड़ा और महत्वपूर्ण तथ्य है। मैं जानता हूँ कि ऐसी चीजें समीक्षा का आधार नहीं हो सकतीं और ऐसा मेरा उद्देश्य भी नहीं है। मैं केवल इस तथ्य को रेखांकित करना चाहता हूँ कि समकालीन लघुकथा (और दूसरी लघ्वाकारीय/समधर्मा विधाओं) में जो लेखन हो रहा है, उसमें किसी प्रकार के सुधार की प्रेरणाओं के लक्ष्य समाहित नहीं हैं। संवेदनाओं की उपस्थिति और विचार-निर्माण की प्रक्रिया के बावजूद समकालीन लघुकथा (रचना) प्रमुखतः जीवन की आलोचना के रूप में रची जा रही है। सामयिक परिवर्तनों के माध्यम से आने वाली चीजें विचार-निर्माण की प्रंिक्रया के तहत समकाल की प्रवृत्तियों में अपनी जगह बनाती हैं और समकालीन लघुकथा में मनुष्य के यथार्थ सत्य की तरह प्रतिबिम्बित होती हैं। 

      इस तथ्य को हम इस तरह भी समझ सकते हैं। जब कोई लघुकथा किसी व्यक्ति (लक्ष्य) के आचरण को बेपर्दा करती है तो प्रायः वह व्यक्ति तिलमिलाता अवश्य है, लेकिन तिलमिलाने के बाद अपने आचरण को या तो सामान्य और स्वीकार्य सिद्ध करने का या उसके लिए किसी अन्य को जिम्मेवार ठहराने का प्रयास करता है। समाज की प्रतिक्रिया भी थोड़ी देर के लिए तो वास्तविक रूप में आती है, फिर लोग भूल जाते हैं। एक रिश्वतखोर की रिश्वत लेने की प्रवृत्ति चर्चा का विषय तो बनती है, उसके सामाजिक बहिष्कार का नहीं। उसका आर्थिक स्तर उसकी रिश्वतखोरी की प्रवृत्ति की आलोचनात्मक चर्चा के बावजूद उसकी प्रतिष्ठा को बढ़ाता है। आज मनुष्य का यही यथार्थ सत्य है। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि लघुकथा अपूर्ण या उद्देश्यविहीन है। आज हमारा जैविक (मानवीय) परिवेश तमाम क्रिया-प्रतिक्रियाओं और जटिलताओं से गुजरता एवं अवकुंचित होता हुआ जिस रूप-स्वरूप में हमारे सामने खड़ा है, उसमें सामान्यतः आदर्शों की स्थापना या प्रेरणाओं की अपेक्षा संभव नहीं है। इसके दो बड़े कारण हैं, एक- मनुष्य की सामान्य मनोवृत्ति का पारम्परिक आदर्श की अवधारणा और विश्वास से मुक्त हो जाना। दूसरा- संवेदना के रूप में बदलाव और प्रतिसंवेदना की संभावना का क्षीण होना। इन दोनों कारणों के पीछे भी व्यापक पृष्ठभूमि है। यह तथ्य विचारणीय है कि पचास वर्ष पूर्व जिन चीजों से व्यक्तियों के मन में संवेदना जाग जाती थी, आज उन या उनके तरह की चीजों को बहुत सहजता के साथ नकार दिया जाता है? इसलिए पचास वर्ष पूर्व के आधार पर आज की रचनात्मकता नहींे सधेगी। दूसरी बात, यह भी आवश्यक नहीं कि जिस बात से एक व्यक्ति के अंतर्मन में संवेदना जाग जाये, उसी समय उसी बात से प्रभावित होकर दूसरा व्यक्ति भी संवेदना प्रदर्शित कर सके। लेकिन इस यथार्थ सत्य के बावजूद कई ऐसी चीजें हैं, जिन पर विचारों का रचनात्मक सृजन भी होता है। विभिन्न मानव समूहों के मध्य समानता को मान्यता आदि जैसे विचार दीर्घकाल में रचनात्मक सृजन से प्रभावित होते हैं। लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने और सामाजिक सक्रियता का पाठ प्रसारित करने का कार्य आज का साहित्य (समकालीन लघुकथा) बखूबी कर रहा है।

      ऐसे में यदि समकालीन लघुकथा जीवन की आलोचना को मानवीय अनुभव-प्रक्रिया से गुजारना चाहती है, तो इसे उसके लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। यहाँ रचनात्मक स्तर पर संवेदनात्मक स्थितियों की पड़ताल भी आलोचना के वास्तविक अर्थ में निहित है।

      निश्चित रूप से समकालीन लघुकथा जीवन की आलोचना करते हुए सीधे-सीधे समस्यात्मक स्थितियों से टकराती हुई निकलती है, यही उसका ल़क्ष्य भी होता है। इसलिए समकालीन लघुकथा नायकत्व की पक्षधर नहीं है। अपितु एक सीमा तक वह नायकत्व की अवधारणा को खण्डित करती है। समस्या ही उसके लिए प्रमुख है। वास्तविकता तो यह है कि लघुकथा का समकाल ही नायकत्व को स्वीकार नहीं करता। जहाँ जीवन के अंतरंग क्षणों की अनुभूतियों पर लघुकथा सृजित की जाती है, वहाँ भी अनुभूति या स्थिति ही प्रमुख होती है; व्यक्तित्व या नायकत्व नहीं। समकालीनता के इस परिदृश्य में लघुकथा को परखा जाना चाहिए।

      जीवन की आलोचना यानी समस्यात्मक स्थिति के आधार पर लघुकथा का सृजन हो और उसके केन्द्र में समस्या अथवा अनुभूति से जुड़ी स्थिति ही रहे, यह समकालीन लघुकथा की पहली परिधि है। लेकिन जैसे हम रचना (लघुकथा) की समीक्षा/समालोचना के आधार तलाशने का प्रयास करते हैं, वैसे ही रचनाकार के स्तर पर जीवन की आलोचना के आधार को तलाशना यानी जीवन को उसकी अद्यतन समग्रता में समझना भी आवश्यक है। समय के साथ जीवन में आने वाले परिवर्तन अन्ततः जीवन का हिस्सा बन जाते हैं लेकिन हर परिवर्तन की यात्रा में कुछ समय ऐसा अवश्य आता है, जब उसकी स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। वर्तमान साहित्य (समकालीन लघुकथा) में इन परिवर्तनों की स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता के प्रश्न का परीक्षण समय रहते करना किस रूप में होता है, इसकी पड़ताल समीक्षा में होनी चाहिए। 

                                                                 शेष आगामी अंक में जारी…

 

Sunday, 13 September 2020

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में…2 / डॉ॰ उमेश महादोषी

दिनांक 13-9-2020 से आगे

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में आत्मिक और दैहिक अस्तित्व का तात्विक विवेचन

दूसरी कड़ी

01. सृजन का प्रेरक परिवेश और रचना का सम्बन्ध

जिस वातावरण में हम रहते हैं, वह जैविक, विशेषतः मानवीय दृष्टि से अनेक घटनाओं, दृश्यों, क्रिया-प्रतिक्रियाओं, आवश्यकताओं-पूर्तियों तथा इन सबके मध्य के विचलनों और विसंगतियों से परिपूर्ण है। इन तमाम घटनाओं, दृश्यों, क्रिया-प्रतिक्रियाओं, आवश्यकताओं-पूर्तियों के साथ उनसे जुड़े विचलनों और विसंगतियों की प्रतिध्वनियाँ वातावरण में गूँजती है और मनुष्य को अनुभूति के स्तर पर तरह-तरह से प्रभावित करती हैं। यही वातावरण रचनात्मकता का प्रेरक होता है, जहाँ से रचना का सृजन आरम्भ होता है। समय के साथ इन प्रतिध्वनियों के रूप-स्वरूप और प्रभाव में अन्तर हो सकता है क्योंकि मनुष्य की आवश्यकताएँ और उनकी पूर्ति के लिए संसाधनों की उपलब्धता व प्रकृति अन्ततः रचनात्मक वातावरण के पूरे परिदृश्य को प्रभावित करती है और ये चीजें समय के साथ परिवर्तनशील होती हैं। यह अन्तर रचना-सृजन की प्रेरणाओं और परिणामों को प्रभावित करता है और सृजनात्मक कालान्तर के दृश्य स्थापित करता है।

      यहाँ दो प्रमुख बातें निकलकर आती हैं- प्रत्येक रचना-सृजन के पीछे कोई न कोई प्रेरक कारण और उसका एक स्वाभाविक उद्देश्य होता है। दूसरी बात, समय के साथ एक प्रक्रिया के रूप में सृजन के कारण और उद्देश्य परिवर्तित/परिवर्द्धित होते हैं। ऐसे में किसी भी रचना को समझने में उसकी काल और परिस्थिति सापेक्षता का प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। अक्सर हम समीक्षा के बदलते मापदण्डों की चर्चा करते हैं, वास्तविकता यह है कि समीक्षा के मापदण्ड उस तरह नहीं बदलते, बदलती है रचनात्मकता और उसका सृजन। यहीं पर यह बात उठती है कि ‘सम्यक दृष्टि’ के सन्दर्भ में समीक्षक अपने विवेक और रचनात्मक तत्वों की निजी मान्यता तक सीमित रहकर बदली हुई रचनात्मकता और उसके सृजन को नहीं समझ सकता। उसे रचना के सृजन-सन्दर्भों से जुड़े समग्र कारणों और परिणामों तक जाना ही पड़ेगा! यह पूरी तरह वास्तविकता के निकट जाने और चिंतन के स्थितिसापेक्ष परिवर्द्धन को समझने का मामला है। इसीलिए समीक्षा द्वितीय पायदान पर खड़ी होकर भी प्राथमिक अभिव्यक्ति का आकलन करती है। बदलते परिवेश के अनुरूप रचनात्मकता सृजन में कितना ढल पाई है और किस तरह से प्रतिबिम्बित हो पाई है, इसके आकलन की आवश्यकता ही ‘‘किसी रचना की समीक्षा क्यों?’’ का वास्तविक उत्तर हो सकती है। 

      लघुकथाकार (लेखक) जिस परिवेशगत स्थिति से सृजन के लिए प्रेरित होता है, उसे और उसके समग्र परिवेश को किस तरह समझता है और उसका सृजनपूर्व विश्लेषण करता है, लघुकथा (रचना) की पूरी बुनियाद उसी पर रखी होती है। समीक्षा में इस स्थिति को परखना आवश्यक है। मुझे लगता है कि समीक्षक को लेखक के यात्रा-पथ को समझना और उसके समान्तर यात्रा करनी चाहिए।

      इस सन्दर्भ में एक और बात की चर्चा आवश्यक है, लेखन और लेखकीय निष्कर्ष परिस्थिति सापेक्ष भी होते हैं। अलग-अलग परिस्थितियों में समान सन्दर्भ में अलग-अलग निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी को भिक्षा देना एक परिस्थिति में ठीक हो सकता है, दूसरी परिस्थिति में गलत। यहाँ रचनागत परिस्थिति को समझना भी समीक्षक का दायित्व है।

 02. समकालीनता के सन्दर्भ में

      साहित्य में समकालीनता कालखण्ड विशेष की प्रवृत्तियों के साथ उस कालखण्ड के सृजन और उसकी रचनात्मकता को उनकी सम्पूर्णता में सम्बद्ध करने की प्रक्रिया है। इसमें परिवर्तनों का निरंतर प्रवाह समाहित हो भी सकता है और नहीं भी लेकिन भाव प्रवाह और प्रतिबद्धता- दोनों किसी न किसी स्तर पर शामिल होते हैं। यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो यह सापे़िक्षक प्रक्रिया है, इसलिए एक ही कालखण्ड में सृजनरत दो अलग-अलग रचनाकारों का समकालीन होना आवश्यक नहीं। जहाँ तक मापक इकाईयों (वर्षों या महीनांे) के सन्दर्भ में कालखण्ड की सीमा-निर्धारण का प्रश्न है, इसे समस्तरीय प्रवृत्तियों के साथ जोड़कर देखना होगा, न कि मापक इकाईयों (वर्षों या महीनांे) के सन्दर्भ में। जितने कालखण्ड में समस्तरीय जीवन-प्रवृत्तियाँ देखने को मिलती हैं, वह एक समकाल का कालखण्ड होता है। समकालीनता सामयिकता से अलग प्रक्रिया है। सामयिकता छोटे-छोटे समयान्तरों में घटने वाली घटनाओं और परिवर्तनों से जुड़ी प्रक्रिया है और एक छोटा परिदृश्य प्रस्तुत करती है। जबकि समकालीनता सामान्य जीवन में पैठ बना चुके या बनाने योग्य परिवर्तनों से जुड़ी प्रक्रिया है और वृहद परिदृश्य प्रस्तुत करती है। सामयिक परिवर्तन समकालीनता के परिदृश्य में आते-जाते रहते हैं। अनेक सामयिक परिवर्तन ऐसे हो सकते हैं जो किसी समकाल की प्रवृत्तियों में शामिल न हो पायें। समकाल में सामयिक परिवर्तनों के परिवर्द्धन की प्रक्रिया भी शामिल होती है, जिसके कारण बहुत सारे परिवर्तन अन्ततः भिन्न रूपों में समकाल की प्रवृत्तियों का हिस्सा बनते हैं। प्रायः बड़े और प्रभावशाली सामयिक परिवर्तनों को वरिष्ठ पीढ़ी आत्मसात नहीं कर पाती और नई पीढ़ी उन्हें छोड़ नहीं पाती तो बड़ा कालान्तर पैदा हो जाता है, जो नए समकाल का कारण बनता है।

      लघुकथा पर जब हम वर्तमान में बात करते हैं तो हमारी चर्चा ‘समकालीन लघुकथा’ यानी 1970 के आसपास उद्भूत लघुकथा पर केन्द्रित होती है। यह वह समय था जो मानवीय परिवेश में आमूलचूल परिवर्तनों के व्यापक परिदृश्य से गुजर रहा था। विशेषतः भारत में। एक ओर जनतांत्रिक युग की तमाम कमजोरियाँ मानव-चरित्र में अवतरित होना आरम्भ हो चुकी थीं तो दूसरी ओर तकनीक आधारित सुविधाभोगी संस्कृति- कुछ अंग्रेजी संस्कृति के अवशिष्ट प्रभाव के रूप में और कुछ आयातित होकर अपनी जड़ों को तेजी से फैलाने लगी थी। अन्तर्राष्ट्रीयता के व्यापक प्रवेश से वैचारिक स्तर पर एक ऐसा वर्ग पैदा हो चुका था, जो एक ओर अधिकाधिक सुविधाओं को हथियाने का अभ्यस्त हो रहा था तो दूसरी ओर अन्तर्राष्ट्रीय प्रभावों में हमारी मूल संस्कृति पर आक्रमण के साथ वैचारिक संक्रमण फैलाने की दिशा में मजबूती के साथ तेज गति से आगे बढ़ रहा था। इस वर्ग ने ‘विरोध के माध्यम से दबाव’ और ‘वंचितों के हितपोषण के आभासी दर्शन’ के शक्तिशाली अस्त्र तैयार कर लिये थे। परिणामस्वरूप एक ओर अपने स्वार्थ में गले तक डूब चुके सत्तापिपाशु लोग अपना विरोध झेलकर भी इस वर्ग के तुष्टिकरण के लिए विवश थे। दूसरी ओर आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से निचले स्तर का व्यक्ति एक ओर भ्रष्टाचार का शिकार होने लगा था, दूसरी ओर संसाधनों में अपने हिस्से से वंचित रहने का अभिशाप झेलने को निरंतर विवश हो रहा था (क्योंकि उसके हिस्से के संसाधनों का प्रवाह राजनेताओं एवं चालाक वर्ग की ओर था)। इस स्थिति का लाभ उठाकर ‘वंचितों के हितपोषण के आभासी दर्शन’ के माध्यम से चालाक तीसरा वर्ग आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से निचले स्तर के वर्ग को उसके हितपोषण की झूठी उम्मीदों के सहारे अपने षणयंत्र में व्यापक स्तर पर शामिल करने लगा था। इस सबके मध्य पूँजीवादी शक्तियाँ भी परिवर्तित रूप में अपने पैर फैला रहीं थीं। इन तमाम वस्तु-स्थितियों का परिणाम मानवीय ही नहीं समूचे जैविक परिवेश को प्रभावित करता दिखाई दिया। विसंगतियाँ और दुष्प्रवृत्तियाँ परिवेश का अभिन्न हिस्सा बन गईं। साहित्य, विशेषतः कविता, कथा और कुछ व्यंग्य में इन चीजों के परिणामी प्रतिबिम्ब आये लेकिन अपरिहार्य कारणों से उस रूप में नहीं आ सके, जिसमें मनुष्य को झकझोरने के लिए आना आवश्यक था। उस समय के कुछ नए रचनाकारों ने उन प्रतिबिम्बों को पकड़ा और अपने तरह से कथात्मक रूप में अभिव्यक्त किया, भले उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। 

      1970 के आसपास का वह समय एक बड़ा काल-विभाजक बिन्दु है। जिसके एक ओर आदर्श, आस्थाओं-विश्वासों और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा परिवेश स्थित है तो दूसरी ओर इनको खण्डित करता और नकारात्मक वृतितयों के साथ निरंतर विस्तारित और व्यापक होता परिवेश। आज तक हम इसी समकाल की विभिन्न स्थितियों से गुजर रहे हैं। ‘समकालीन लघुकथा’ की यह पृष्ठभूमि उसको समझने के आधार को उसकी पूर्ववर्ती लघुकथात्मक रचनाओं को समझने के आधार से भिन्न जताने के लिए पर्याप्त है।

      चूँकि ‘समकालीन लघुकथा’ अपनी पूर्ववर्ती लघुकथा से कई मायनों में भिन्न है और आगे भी, विशेषतः इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते सामयिक परिवर्तनों को आत्मसात करते हुए अपनी भिन्नताओं के सन्दर्भ में अद्यतन होती दिखाई देती है, इसलिए उसे समझने के लिए जैविक (विशेषतः मानवीय) परिवेश और उसे प्रभावित करने वाले कारकों में आए परिवर्तनों के सापेक्ष लघुकथा में आये परिवर्तनों का नोट लेना पड़ेगा। चूँकि समकालीन लघुकथा की नींव ही जैविक (विशेषतः मानवीय) परिवेश में आए परिवर्तनों पर पड़ी है, इसलिए समकालीन लघुकथा में इन परिवर्तनों के प्रतिबिम्ब देखना और यह समझना आवश्यक है कि इन परिवर्तनों की गति और व्यापकता जैसे-जैसे बढ़ेगी (संभव है कि आगामी कुछ वर्षों में किसी बड़े काल-विभाजक समय-बिन्दु से हमारा साक्षात्कार हो), समकालीन लघुकथा स्वयं को अद्यतन करेगी या किसी नए रूप-स्वरूप में सामने होगी। 

      इस सन्दर्भ से जुड़ी एक और बात। बहुत सारे लोग आज भी ‘साहित्य को समाज का दर्पण’ मानते हैं किन्तु मुझे लगता है कि आजाद भारत में धीमे-धीमे यह धारणा कालातीत होती चली गई है। इसकी गति में 1965-70 के बाद तीव्र और इक्कीसवीं सदी (विशेषतः दूसरे दशक) तक आते-आते आशातीत वृद्धि हुई है। इसके प्रमुख कारण हैं- जैविक/मानवीय परिवेश में आए परिवर्तनों से झाँकती व्यावसायिक मानसिकता एवं लोकतंत्र जनित आजादी एवं शिक्षा के प्रसार से जनित तार्किकता- दोनों की शक्ति में निरंतर वृद्धि और उसके परिणामी प्रभावों की व्यापकता। आज सामाजिक, यहाँ तक कि पारिवारिक स्तर पर भी हम देख सकते हैं कि समस्याओं को रेखांकित करने और उन पर बहस/चर्चा करने की प्रवृत्ति प्रमुखता प्राप्त कर चुकी है। निष्कर्ष और समाधान या सुधार की प्रवृत्ति आदर्श की परिभाषा के ब्लैक-होल की परिधि में जा चुकी है। समकालीन लघुकथा का भी मूलतः यही रास्ता है। सुधारने की नियति से चीजों को देखने और सुधार की आकांक्षा जगाने की वृत्ति (दर्पण का मूल कार्य) समकालीन लघुकथा के समकाल में प्रायः नहीं है। इसका प्रभाव लघुकथा के सामान्य चरित्र पर पड़ना स्वाभाविक है। बहुतायत में समकालीन लघुकथा यथार्थ को रेखांकित करती है, मनुष्य को झकझोरती-तिलमिलाती है। उससे आगे मनुष्य को क्या करना है, यह मनुष्य पर छोड़ देती है। इसलिए वह ‘समाज का दर्पण’ वाले साहित्य के नहीं, जीवन की आलोचना के निकट है। ऐसा कहने का यह अर्थ नहीं है कि समकालीन लघुकथा प्रभाव-सम्प्रेषण से मुक्त हो गई है या लघुकथा रचनात्मकता से रहित है। प्रभाव-सम्प्रेषण का गन्तव्य बदल चुका है। हृदय का स्थान मस्तिष्क ले चुका है, जहाँ बहुत सारे ‘किन्तु-परन्तु’ जीवन विषयक निर्णयों को प्रभावित करने के लिए उपस्थित होते हैं। दूसरी बात, जीवनालोचना की प्रक्रिया में निष्कर्ष और समाधान या सुधार की प्रवृत्ति की प्रत्यक्ष प्रेरणा निहित न होने पर भी कुछ सीमाओं के अन्तर्गत विचार निर्माण की प्रक्रिया अवश्य निहित होती है, जो रचनात्मकता का आधार बनती है और दीर्घकाल में बहुत-सी चीजों के प्रति स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता का आधार तैयार करती है। 

                                                               शेष आगामी अंक में जारी…

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में…1/डॉ॰ उमेश महादोषी,

लघुकथा : समीक्षा के सन्दर्भ में आत्मिक और दैहिक अस्तित्व का तात्विक विवेचन

पहली कड़ी


समकालीन लघुकथा में लेखन और विमर्शदोनों की दृष्टि से यह समय सर्वाधिक व्यस्तताओं से भरा हुआ है। इस व्यस्तता में कुछ अनपेक्षित चीजें शामिल हैं तो कुछ चीजें बेहद अच्छी हैं। इस समय में धूम-धड़ाके का शोर शामिल है तो रचनात्मकता का संगीत भी। एक ओर बेहद सतही लेखन हो रहा है तो दूसरी ओर अत्यंत प्रभावशाली लेखन भी इसी समय में हो रहा है। और भी कई नकारात्मक चीजें एक ओर हैं तो दूसरी ओर बेहद शालीन और इस विधा के जमीनी यथार्थ को सिद्दत से समझने वाले लोग, मनुष्य और मनुष्यता की मौलिक और रचनात्मक पक्षधरता को प्रकाशमान करने की यज्ञार्पण होती संसाधनविहीन आत्मीयता, समर्पण और तपोभावना की उपस्थिति के साथ रचनात्मक संवेदनशीलता का सर्वाधिक उभार भी इसी समय में है। ऐसे समय में लघुकथा के बारे में किये जाने वाले किसी गम्भीर चिंतन के लिए जगह बना पाने में विश्वास की गुंजाइश भले हो लेकिन लघुकथा के बारे में व्यापक दृष्टि से सोचने और समझने के लिए सर्वाधिक उपयोगी समय है यह, जब हमारे सामने सभी तरह की चीजें मौजूद हैं और अन्य विधाओं के सापेक्ष सर्वाधिक सृजन और सम्बन्धित गतिविधियाँ लघुकथा के क्षेत्र में ही हो रही हैं।

      सृजन की दृष्टि से संभव है ऐसे समय में कुछ महत्वपूर्ण लघुकथाओं का मूल स्वर शोरगुल में डूब जाये लेकिन इस परिदृश्य और इसमें व्याप्त चुनौतियों को समझने वाले लेखकों की महत्वपूर्ण रचनाएँ कुछ समय बाद अवश्य दिखाई देंगी। उनमें लघुकथा के मानकों की कुछ नई कलियाँ भी खिलती हुई मिलेंगी। इस चुनौतीपूर्ण समय में समीक्षा की दृष्टि से भी विचार के लिए कई चीजें मिल सकती हैं, जो समकालीन लघुकथा के वर्तमान यथार्थ की तहों को उलटने-पलटने के साहस के साथ आने वाले समय में साक्षात्कृत होने वाली लघुकथाओं की पड़ताल की जमीन भी मुहैया करा सकें। इस आलेख के विषय- समीक्षा के बिन्दुओं पर बात करते हुए सामयिकता का यह सन्दर्भ भी जेहन में रहना चाहिए।

      समीक्षा और समालोचना शब्दों का शाब्दिक अर्थ अलग-अलग होने के बावजूद आजकल साहित्यिक रचनाओं के सन्दर्भ में इन शब्दों को लगभग समानार्थी समझा जाता है। इसके कारणों में जाने की आवश्यकता मैं नहीं समझता और उससे बहुत अधिक अन्तर भी नहीं पड़ना है। मुख्य बात यह है कि समीक्षा-समालोचना के सामान्य सन्दर्भ में बात करते हुए उन तमाम बिन्दुओं पर बात हो, जो लघुकथा को उसकी समग्र व्यापकता में समझने के लिए आवश्यक हो सकते हैं। प्रायः रचना के दैहिक तत्वों पर बात होकर रह जाती है, जो रचना को भौतिक रूपाकार देने और उसके आकर्षण एवं प्रभाव को बढ़ाने में सहायक तो होते हैं लेकिन उसके आत्मिक स्वरूप और दृष्टि-चिंतन को निर्धारित करने पर मौन रहते हैं। मैं चाहूँगा कि लघुकथा की समीक्षा में इस पक्ष पर प्रमुखता से बात की जाये। इस वस्तुस्थिति को ध्यान में रखते हुए लघुकथा-समीक्षा के तमाम बिन्दुओं को पाँच स्तरों- वैचारिक, दैहिक, कथा-सौंदर्य, शीर्षक और मौलिकता संबंधी तत्वों में विभाजित करते हुए चर्चा करना मुझे आवश्यक और उचित लग रहा है।

क. वैचारिक तत्वों की पड़ताल

  समीक्षा का सामान्य आशय समीक्ष्य रचना या वस्तु को सम्यक दृष्टि से समझना और उसके विभिन्न अवयवों/पक्षों पर गुण-दोष के सन्दर्भ में मन्तव्य रखना माना जाता है। लेकिन समीक्षा के आधार बिन्दुओं पर बात करते हुए रचना पड़ताल के सन्दर्भ में गहनता और व्यापकता, जिनमें रचना के मूल से परिणाम तक के सन्दर्भ समाहित होते हैं, को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। सामान्यतः किसी रचना विशेष की समीक्षा या समालोचना करते हुए हम कुछ बिन्दुओं को आवश्यकता या सुविधानुसार छोड़ देते हैं, इसी तरह चर्चा का स्तर भी चयनित बिन्दुओं पर निर्धारित कर लेते हैं। लेकिन ऐसी समीक्षा या समालोचना को समग्र नहीं माना जा सकता। 

      चूँकि यहाँ प्रश्न लघुकथा की समीक्षा के आधार बिन्दुओं के निर्धारण का रखा गया है, इसलिए हमें समग्रता से सोचना पड़ेगा। लघुकथा हो या कोई अन्य विधा या वस्तु, ये आधार बिन्दु निश्चित रूप से समीक्षा के सामान्य आशय- सम्यक दृष्टि और रचना या वस्तु के विभिन्न अवयवों/पक्षों से ही सम्बन्धित होंगे लेकिन महत्वपूर्ण बात यह होगी कि तथ्यात्मक दृष्टि से हम सम्यक दृष्टि एवं रचना या वस्तु के विभिन्न अवयवों/पक्षों को किस रूप में ग्रहण करते हैं।

      प्रश्न तो यह भी है कि किसी भी रचना की समीक्षा क्यों? यदि इस प्रश्न का वास्तविक उत्तर हमें नहीं मिलेगा तो बाकी प्रश्न और उनके उत्तर भी बेमानी हो जायेंगे। इस प्रश्न का उत्तर सही अर्थों में अन्य सभी प्रश्नों और उनके उत्तरों का यथार्थ प्रस्तुत करेगा। रचना सदैव प्राथमिक होती है। यहाँ मैं समीक्षा या रचना पर अन्य तरह की चर्चा का महत्व नकार नहीं रहा हूँ अपितु ‘सम्यक दृष्टि’ पर विचार का आमंत्रण देना चाहता हूँ। हर रचना के अपने सृजन-सन्दर्भ, उससे जुड़े कारण, उद्देश्य और परिणाम के रूप में होते हैं। ऐसे में यह विचारणीय है कि ‘सम्यक दृष्टि’ समीक्षक के अपने विवेक या रचनात्मक तत्वों की निजी मान्यता तक सीमित है अथवा रचना के सृजन-सन्दर्भों से जुड़े समग्र कारणों और परिणामों तक जाती है! वस्तुतः रचना जहाँ से आरम्भ होती है, समीक्षात्मक विमर्श को वहीं से आरम्भ होना चाहिए। और रचना जहाँ तक जाती है, समीक्षा को भी वहाँ तक जाना चाहिए। दूसरी बात, यदि वास्तव में लेखकीय सृजन मनुष्य और मनुष्यता के कल्याण और विकास के लिए है तो मानवीय न्यायसंगतता का प्रश्न लेखकीय दायित्व में और उसकी पड़ताल समीक्षा के सामान्य आशय, विशेषतः ‘सम्यक दृष्टि’ में निहित होना चाहिए।

      इस दृष्टि से विचार करने पर लघुकथा (और अन्य विधाओं) की समीक्षा/समालोचना दैहिक तत्वों की पड़ताल से पूरी नहीं होती। बात उन वैचारिक तत्वों पर कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, जो लघुकथा-सृजन (अन्य विधाओं में भी रचना-सृजन) के प्रेरक बिन्दु से आरम्भ होकर परिणामी भाव-विचार के सम्प्रेषण तक जाते हैं। लघुकथा एवं समधर्मा विधाओं में इन्हें सृजन के प्रेरक परिवेश, उसकी प्रकृति (लघुकथा के सन्दर्भ में समकालीनता), सृजन के सामाजिक दायित्व, जीवन से जुड़े परिवर्तनों का समायोजन, रचना के विधागत स्वभाव से जुड़े तत्वों, रचनागत और रचनात्मक चिंतन के प्रवाह के रूप में समझा जा सकता है। वास्तविकता तो यह है कि लघुकथा (एवं अन्य समधर्मा विधाओं) के सृजन आधार और परिणाम इन्हीं के संयुग्मन से तय होते हैं। इसलिए लघुकथा की समीक्षा के बिन्दुओं में इनकी पड़ताल प्राथमिकता के आधार पर शामिल होनी चाहिए।


                                                                                                                 (शेष आगामी अंक में...)