Thursday, 1 July, 2021

शरद आलोक की लघुकथाएँ/बलराम अग्रवाल

कबीर का दर्शन है कि मनुष्य का शरीर, 'पानी केरा बुदबुदा' यानी पानी के बुलबुले की तरह  क्षणभंगुर है। लेकिन बुलबुले का स्वयं की उत्पत्ति का दर्शन कबीर के दर्शन से भिन्न क्षणभर में मिट जाने वाला नहीं है। बुलबुले का जन्म पानी के भीतर की अशान्ति से होता है। अधिक समय तक जीवित रहने के लिए वह जन्मता ही नहीं है। वह तो मात्र इतना बताने के लिए जन्मता है कि पानी की सतह के नीचे घोर हलचल है। बुलबुले को पकड़ा नहीं जा सकता लेकिन उसे देखकर पानी के नीचे की हलचल को, उसके कारण को पकड़ा जा सकता है। समकालीन लघुकथाएँ भी पानी के नीचे की हलचल को पहचानने और पकड़ने का प्रयास हुआ करती हैं। उनके कथानक के, शिल्प,  शैली और  शब्द-चातुर्य के आकर्षण में बँधकर रह जाना बुलबुले के सौंदर्य-आकर्षण में बँधकर रह जाने के समान क्षणभर का सुख देने वाला हो सकता है, गहन सुख तो कथ्य की गहराई में, तलहटी तक ही जाने पर मिलता है। इस परिप्रेक्ष्य में आइए, शरद आलोक जी की कुछ लघुकथाओं पर विचार करते हैं। शरद जी गत अनेक वर्षों से साधनारत  साहित्यकार हैं। उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन किया है। समाज की गतिविधियों पर उनकी कथा-दृष्टि का पैनापन उनकी लघुकथाओं में भी उभरकर आया है। उनकी ‘इंटरव्यू’ शीर्षक लघुकथा समाज में सामान्यत: व्याप्त आस्था की कथा बयान करती है जिसे धर्मभीरुता भी कहा जा सकता है। इसके माध्यम से यह संदेश देने का अच्छा प्रयास है कि धर्मभीरुता मनुष्य की सफलता के मार्ग की सबसे बड़ी रुकावट है। अंत में रोहन का अपने आप पर गुस्सा उतारना उसका अपनी धर्मभीरुता पर ही क्षोभ प्रकट करना है।

लघुकथा ‘लोकलाज’ की अम्मा भी समाज के उसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, जो शैक्षिक रूप से पिछड़ा हुआ और मानसिक रूप से अत्यंत कमजोर है। अम्मा का बेटी से यह कहना कि—‘हम गरीबी से तो एक बार फिर लड़ सकते हैं परन्तु धार्मिक लोकलाज के दिखावे को नजरअंदाज नहीं कर सकते।’ इस तथ्य का द्योतक है कि  हमारी अधिसंख्य आबादी आज भी धर्म का आडम्बर देखने-करने वाली, उसके व्यापार में संलिप्त है। इस लघुकथा में बेटी आधुनिक, प्रगतिशील विचारों की प्रतिनिधि है जो अम्मा जैसी सुप्त और पिछड़ी मानसिकता को जगाने का लगातार प्रयास करती है।

‘दोहरा दान’ को पढ़कर मुझे एक लोककथा याद हो आयी। सारी की सारी लोककथाएँ रोचक और जीवनदायिनी हैं, यह कहने में मुझे लेशमात्र भी संकोच नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि समय की आँच में तपकर रोचक और जीवनदायिनी लोककथाएँ ही जीवित बची हैं, शेष सब राख हो गयीं। नि:संदेह, आज की लघुकथाओं के साथ भी समय की आँच यही बर्ताव करने वाली है। बहरहाल, उक्त लोककथा क्योंकि ‘दोहरा दान’ के रहस्य को उजागर करती एक संगत रचना है, इसलिए उसे उद्धृत करना भी समीचीन ही है। हुआ यों कि निरीह-सा एक मंगता सड़क पर भीख माँगता घूम रहा था। संयोगवश उसी समय आकाश-मार्ग से शिव-पार्वती उसके ऊपर से गुजर रहे थे। उसकी दीनता से द्रवित होकर पार्वती शंकर से बोलीं—“आप तो भोले भंडारी हैं। इस गरीब को भी कुछ दे दो।” शिव ने कहा—“इसके भाग्य में ब्रह्मा ने सम्पत्ति की रेखा नहीं बनायी है। मैं दूँगा, तब भी इसे नहीं मिल पायेगी।” पार्वती ने कहा—“आप दें तो सही। देखते हैं।” पार्वती की बात मानकर भगवान शंकर ने सोने के सिक्कों से भरी एक थैली उस रास्ते पर डाल दी, जिस पर वह भिखारी आगे बढ़ रहा था। चलते-चलते एकाएक उसके मन में विचार आया—‘दुर्भाग्य से, अगर मैं अंधा हो गया, तब कैसे भीख माँगूँगा!’ बस, यह विचार मन में आते ही, उसने आँखें बंद कीं और अंधे का अभिनय करते हुए भीख माँगने लगा। अंधेपन के इस अभिनय में वह शिवजी द्वारा सड़क पर डाली थैली को लाँघकर आगे बढ़ गया। भोले बाबा ने मुस्कुराते हुए माँ पार्वती से कहा—“देखा?” पार्वती ने कहा—“देखा भी और समझा भी।”

यह लोककथा इतनी ही है, जिज्ञासा का तन्तु पाठक-मन में छोड़ती हुई कि भोले बाबा द्वारा सड़क पर डाली गयी सोने के सिक्कों से भरी उस थैली का क्या हुआ!। कोई कथाकार चाहें तो इसका विस्तार करते हुए बता सकते हैं कि क्या हुआ। शुक्ल जी ने अपने ढंग से बताया भी है।

‘गाय के वास्ते’ का केन्द्रीय कथ्य यह है कि—‘आदमी भावना का पुतला होता है और आसानी से किसी के कहने-सुनने से भावना में बह जाता है।’ जो पाठक कथा के इस केन्द्रीय कथ्य को नहीं पकड़ेंगे, वे कथा के मूल उद्देश्य को भी बामुश्किल ही पकड़ पायेंगे। दया-भाव छोड़कर मनुष्य आखिरकार एक नये व्यवसाय से जुड़ जाता है, यह इन्सानी फितरत है । इसी ओर संकेत करते हुए शुक्ल जी ने लिखा है—‘मैने गोहार लगाना बंद नहीं किया था। मेरे साथ सब्जी वाला भी गोहार लगा रहा था, “गाय के वास्ते।” कल्पना कीजिए कि बाजार में खड़े दो लोग एक ही गोहार 'गाय के वास्ते' लगा रहे हैं लेकिन दोनों की मानसिकता और मन्तव्य भिन्न हैं। यहाँ सब्जी वाले की गोहार में गाय के प्रति श्रद्धा-भाव है जबकि कथा-पात्र ‘मैं’ की गोहार श्रद्धा-भाव से इतर कहीं और इशारा कर रही है।

‘आम आदमी’ एक उत्कृष्ट कथ्य है, लेकिन इसकी कसावट में कमी है। इस कमी को इस दृष्टि से कि लेखक दशकों से सुदूर विदेश में रहकर भी हिन्दी साहित्य की सेवा में जुटा है, कुछ हद तक नजरअंदाज किया जाना चाहिए; हालाँकि नजरअंदाज करने का यह कोई तार्किक और  मजबूत आधार सिद्ध नहीं होता है। बहरहाल, कथ्य की उत्कृष्टता पर बात करते हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि अपनी अथवा अपने क्षेत्र की किसी समस्या से पीड़ित आम आदमी अपने क्षेत्र के एम एल ए, एम पी आदि के पास जाकर बड़ी आशा से  गुहार लगाता है। बदले में विधायक और सांसद यहाँ तक कि उनके चपरासी द्वारा बदस्तूर अपनी अवहेलना, अपना अपमान झेलता है। कथा के माध्यम से कथाकार कहता है कि भावी स्थिति यह होगी कि आम आदमी उनकी ओर से पीठ फेर चुका होगा। न तो वह मुड़कर पीछे ही देखेगा और न कभी उनके हाथ ही आयेगा।

‘रौब’ को बहुत-सी गम्भीर स्थितियों के योग से आगे बढ़ने वाली हास्य और व्यंग्य कथा कहा जा सकता है। इसका केन्द्रीय भाव ‘लोकलाज’ से भी कहीं न कहीं मिलता है।

‘अंतिम समिधा’  समर्पित लेखन की नियति पर केन्द्रित है। लेखक उम्रभर जिस रचना-कर्म से जुड़ा रहता है, अंत में स्वयं उसकी संतान ही उसको समझ नहीं पाती, हताश हो उठती है। उसका रचना-कर्म चिता की अग्नि के हवाले कर दिया जाता है। साहित्य के पुरातन इतिहास में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब क्षुब्ध रचनाकार ने स्वयं ही अपने समूचे रचना-कर्म की हत्या कर डाली थी और विद्वान रचनाकार के रूप में वे अपने उक्त रचना-कर्म की हत्या के बाद ही पहचाने गये। शरद आलोक ने अपनी लघुकथा ‘अंतिम समिधा’ का कथानक विशुद्ध रूप से आज के समय से उठाया है और हल्की-सी शैल्पिक लापरवाही के बावजूद उसका प्रस्तुतिकरण प्रभावित करता है। 

इन कुछेक लघुकथाओं के आकलन से रचनाकार शरद आलोक की सकारात्मक और प्रगतिशील कथा-दृष्टि का परिचय मिलता है। उनकी लघुकथाओं में विषय वैविध्य तो है ही, शिल्प और शैली में भी मौलिकता है। किसी साहित्यकार ने अगर स्वयं अपने भी शिल्प और शैली को बार-बार नहीं अपनाया है तो इसे उसकी लेखकीय सजगता ही माना जाना चाहिए। इसके लिए भी शरद आलोक जी को बधाई।

प्रस्तुत है उनकी एक लघुकथा 'गाय के वास्ते :

सड़क के एक ओर मंदिर है और दूसरी ओर मस्जिद है।  सड़क के एक किनारे सब्जी की दूकान है और वहां लोग जमा हो रहे हैं. चारो तरह हाहाकार मचा हुआ है. भीड़ अनवरत बढ़ती जा रही है. लोग आश्चर्यचकित  हैं कि आखिर क्या हो गया है. सभी जानना चाहते हैं भीड़ क्यों लग रही है. आने-जाने वाले आपस में संवाद करने की जगह खुद अपनी आँखों से देखना चाहते हैं कि आखिर क्या हुआ है. ताजा समाचार जानने की होड़ में सभी खोजी पत्रकार बनने के चक्कर में  हैं. 

फुटपाथ पर सब्जी की दूकान के अलावा मंदिर और मस्जिद की तरफ भी लोग अलग-अलग समूह में जमा हो रहे हैं, बिना यह जाने हुए कि आखिर क्या बात है? सड़क पर हमेशा एक साथ चलने वाले लोग मंदिर और मस्जिद के नाम पर दो ओर  भी जमा हो रहे हैं,  जैसे पतंगबाजी के दो समूह। पर ये पतंगबाजी वाले नहीं वरन आस्थावान लोग हैं.  आज असल से ज्यादा दिखावे का जमाना है भले ही ढोल में पोल हो, बस ढोल बजना चाहिये। 

मैंने सोचा मैं ही क्यों दूर रहूँ भीड़ से और जानूँ कि आखिर माजरा क्या है?

मैंने पास जाकर देखा तो एक बहुत दुबली-पतली गाय सब्जी की दूकान के आगे अधमरी हालत में पड़ी है. लोगों ने सब्जी वाले को पकड़ रखा है. 

'तुमने गाय की जान ले ली.' एक व्यक्ति ने कहा.

'साहब मैंने जान नहीं ली. गाय मेरी सब्जी पर जैसे ही टूट पड़ी तो मैंने उसे डंडे से भगाना चाहा और डंडे को सड़क पर जोर-जोर से पटका तो वह गाय घूम कर भागना चाहती थी और मुड़ते ही जमीन पर वह गिर पढ़ी.'

'तुम्हें गोहत्या का पाप चढ़ेगा, जानते हो', एक ने कहा.

'साहब यह अभी मरी नहीं है, देखिये उसकी आँखे खुली हैं और हाँफ रही है.'

'थोड़ी सब्जी खा लेती तो क्या हो जाता?' भीड़ में खड़े दूसरे व्यक्ति ने प्रश्नचिन्ह लगाया।

'साहेब अभी हमारी बोहनी तक नहीं हुई. बची-खुची सब्जियां और पत्ते इन्हीं जानवरों को तो  खिलाते हैं दूकान बंद करने के पहले। 

उस सब्जी वाले ने आगे कहना शुरू किया, 'यह गाय पहले कभी नहीं दिखी बाबूजी! आप रुकिए, हम अभी गाय को पानी पिलाते हैं!'

उसने सब्जियों पर छिड़कने वाला पानी गाय के मुख में डालना शुरू किया, गाय हरकत में आने लगी. गाय के मुख से जबान निकालकर मुख के ऊपर फिरने लगी.

'भीषण गर्मी की वजह से गाय बहुत प्यासी है, बाबूजी! देखो सूखकर दुबली हो गयी है. इसे पानी, भोजन और आराम की जरूरत है.' सब्जी वाले ने गीले टाट को गाय पर ओढ़ा दिया था.  

सब्जी वाले ने गौर से देखा उसे लगा कि गाय को इलाज की जरूरत है.

मैंने भी बीच में कहा, 'शायद तुम ठीक कहते हो, गाय को इलाज की जरूरत है.' मैंने सब्जी वाले की तरफ देखते हुए  सोचा कि कुछ पुण्य-कार्य हो जाये और लगे हाथ सलाह दे डाली, 'भाइयो, इसके इलाज के लिए चन्दा एकत्र करते हैं.… और एक पशु-चिकित्सक को यहाँ बुलाते हैं. गाय इलाज से ठीक हो जाएगी और पुण्य भी मिलेगा।'

मैंने अपना गमछा गाय के बगल में बिछा दिया और लोगों से अपील करने लगा, 'गाय के इलाज के लिए कुछ दे दो'. गाय के वास्ते कुछ दे दो. 

पहले लोग कुछ रुके, कुछ ने अपनी साड़ी और जेब से कुछ सिक्के फेंके और चल दिये। जो भीड़ में खड़े थे उनमें कुछ बिना पैसे दिए ही लौट गये. 

धीरे-धीरे भीड़ छटने लगी. जब मंदिर और मस्जिद की तरफ देखा तो इक्का-दुक्का लोग ही सुनकर आये और सिक्के डालकर चलते बने. जून का महीना था. शाम होने लगी थी. मैं सोचने लगा कि आदमी भावना का पुतला होता है और आसानी से किसी के कहने-सुनने से भावना में बह जाता है. गाय के बेहतर होने से बात आयी-गयी हो गयी थी. 

कुछ पैसे गमछे में और कुछ बाहर बिखरे पड़े थे. मैने गोहार लगना बंद नहीं किया था. मेरे साथ सब्जी वाला भी गोहार लगा रहा था, ''गाय के वास्ते।' 

आने जाने वालों की, मोटरसाइकिल की चिल्ल-पों, रिक्शे, साईकिल की घंटियों की आवाज के बीच आवाज  वातावरण में गूँज रही थी.  'गाय के वास्ते। गाय के वास्ते।'


सुरेश चन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

ओस्लो, नार्वे 

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