Thursday, 21 June, 2018

'परिंदों के दरमियां' मेरी नजर में / पवन जैन


'परिंदों के दरमियां' : 2018
पवन जैन, जबलपुर

28 सितंबर 2017 के दिन आदरणीय बलराम अग्रवाल, लघुकथा के परिंदों के साथ अनवरत सात घंटे तक रहे। इस दौरान चले विमर्श को उन्होंने पुस्तक का रूप दिया, और पुस्तक का नाम रखा 'परिंदों के दरमियां'
इस किताब का किस्सा बतौर भूमिका उन्होंने चार पृष्ठों में दिया है। जब भी इस पुस्तक को उठाता हूँ, स्मृतियों में खो जाता हूँ। वास्तव में यह पुस्तक नहीं है, बडे भाई की मित्रवत् सीख है, जहाँ न गुरुता है न ही इस आयोजन हेतु कोई पूर्व तैयारी। वे सवालों, जिज्ञासाओं का समाधान सरल सहज भाषा में करते गये। इस आयोजन के समापन के तुरंत बाद ही एक दस्तावेज तैयार होकर सामने आ गया, यह कैसे हुआ भूमिका में स्पष्ट किया गया है। देश-विदेश में बैठे सैंतीस लघुकथाकार कहें या नवोदित, शायद जिज्ञासु ज्यादा उचित शब्द होगा, ने अपने सवाल रखे और सवालों से सवाल निकलते गये तथा कुल एक सौ एक सवालों के पूर्ण रूप से परिवर्द्धित समाधान इस पुस्तक में संजोये गये हैं। समझने में किंचित भ्रांति न रहे इसलिए चौंतीस लघुकथाकारों की अड़तीस लघुकथाएं उदाहरण स्वरूप समाविष्ट की गई हैं तथा छः लेखों, लेखांशों को संदर्भित किया गया है। इस पुस्तक में पूछे गये सवालों को उसी क्रम में संग्रहित किया गया है, जो इसकी स्वाभाविकता है। इस दौरान आई बारह टिप्पणियों को भी ज्यों का त्यों समाहित किया गया है।
लघुकथा विधा पर विभिन्न जिज्ञासाओं, तकनीक से जुड़े सवालों, जैसे—क्षण विशेष, कालखण्ड दोष, सपाट बयानी, भूमिकाविहीनता, लेखकीय प्रवेश एवं लेखन के दौरान आ रही व्यवहारिक समस्याओं, जैसे—कथानक चयन, शैली, कथातत्व, पुराने विषय, नकारात्मक - सकारात्मक अंत, आंचलिक भाषा का प्रयोग, कथा में काव्य एवं श्रृंगार का मिश्रण, दृश्य चित्रण, पात्रों की संख्या, पात्रों के नाम, अपवादों पर लेखन, आदि विभिन्न जिज्ञासाओं का निराकरण इस पुस्तक में किया गया है। समीक्षक बनने हेतु सुझाव,सार्थक लघुकथा की परिभाषा, लघुकथा के संदर्भ में संतोषजनक स्थिति कैसे आये? लघुकथा लेखन का और रचना का उद्देश्य क्या है?  यथार्थवाद पर ही चलना या सत्य को उजागर करना जैसे महत्वपूर्ण सवालों के जबाव भी इस पुस्तक में समाहित हैं। इस दौरान किया गया सवाल—‘गर मंटो सबका ही प्रिय लघुकथाकार है तो फिर पचास साल बाद भी दूसरा मंटो पैदा क्यों नहीं हुआ? या मंटो जैसा।’ का भी बहुत खूबसूरती से जबाव दिया गया है। बलराम अग्रवाल जी से किये गये व्यक्तिगत सवाल कि ‘वह कौन सी कथा है जिसे आप सबसे अच्छी मानते हैं’ का जवाब भी समाहित है; तथा ‘आपकी वह कौन-सी कथा है जो अभी तक प्रकाशित नहीं हो पाई है’ का जवाब भी।  पुस्तक के दूसरे भाग 'समीक्षक की कसौटी' के अंतर्गत लघुकथा समीक्षा पर केंद्रित कुछ बिंदुओं पर डॉ॰ लता अग्रवाल से बातचीत को जोड़ा गया है। तीसरे भाग में ‘इक्सवी सदी की बाईस लघुकथाएँ’ संग्रहित की गई हैं। मुझे लगता है कि यह एक प्रतीकात्मक शीर्षक है यह दर्शाने का कि इक्कीसवीं सदी के लघुकथाकार कुछ कम नहीं हैं। नवोदितों में उनका यह विश्वास प्रणम्य है। नवोदित समीक्षकों को इन लघुकथाओं की समीक्षा में हाथ अजमाने का आह्वान भी समाहित है।  
अन्तर्राष्ट्रीय चित्रकार के.रवीन्द्र का सुंदर आवरण चित्र पुस्तक के नाम को सार्थक अभिव्यक्ति देता है। पुस्तक के अंत में गोस्वामी तुलसीदास की एक चौपाई के माध्यम से उसको व्याख्यायित करने का भी प्रयोग किया गया है जो सुन्दर लगता है।
लघुकथा विधा से जुडाव रखने वाले हर रचनाकार को यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी।
पवन जैन,जबलपुर
 jainpawan9954@gmail.com

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