Thursday, 29 March, 2018

झमेला 'झलमला' का / बलराम अग्रवाल









पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव के खैरागढ़ नामक कस्बे में 27 मई 1894 को जन्मे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का नाम हिन्दी साहित्य के निर्माताओं में गिना जाता है। सन् 1916 में  'सरस्वती' में छपी उनकी लघ्वाकारीय कथा-रचना 'झलमला' को हिन्दी की प्रारम्भिक 'लघुकथाओं' में गिना जाता है; हालाँकि लघ्वाकारीय होने के बावजूद इस रचना का शिल्प 'लघुकथा' की बजाय 'कहानी' का ही है। लेकिन बीसवीं सदी के उन प्रारम्भिक वर्षों में कथा-साहित्य के बीच क्योंकि 'लघुकथा' की अवधारणा ने जन्म नहीं लिया था, इसलिए तब की अधिकतर (यह भी कहा जा सकता है कि लगभग सभी) लघ्वाकारीय कहानियों का शुमार 'लघुकथा' में किया जाता रहा है। आगे, जैसे-जैसे लघुकथा-साहित्य समृद्ध होगा, वैसे-वैसे बहुत सम्भव है कि वह पूर्वकालीन बहुत-सी लघ्वाकारीय कहानियों से पल्ला झाड़ ले।

इधर, सन् 2007 में वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से ।8 भारी-भरकम खण्डों में 'बख्शी रचनावली' सामने आई है। इसके खण्ड 2 में बख्शी जी द्वारा लिखित 'कथा-साहित्य और बाल-कथाएँ'  संकलित हैं। इसमें प्रकाशित कथा रचनाओं से पता चलता है कि 'झलमला' नाम से ही बख्शी जी ने अपनी प्रारम्भिक कहानियों का संग्रह भी प्रकाशित कराया था। लेकिन कहानी संग्रह में संग्रहीत 'झलमला' का पाठ 'सरस्वती' में प्रकाशित 'झलमला' के पाठ की तुलना में काफी विस्तार पाया हुआ है। रचनाओं का ऐसा विस्तार बख्शी जी से पहले भी किया जाता रहा है। स्वयं बंकिमचंद्र चटोपाध्याय का 'आनंदमठ' इसका उदाहरण है। एक छोटी कहानी से चलता हुआ 'आनंदमठ' पहले बड़ी कहानी बना, उसके बाद छोटा उपन्यास और आज वह एक बड़े और महान उपन्यास के रूप में हमारे सामने है।  से॰ रा॰ यात्री तो खुलकर कहते ही रहे हैं कि उनके सभी उपन्यास उनकी किसी न किसी कहानी का विस्तार हैं। हमारे युग में भी कुछेक कथाकार अवश्य मिल जायेंगे जिन्होंने अपनी लघुकथाओं को कहानी का अथवा/और कहानियों को लघुकथा का रूप देकर दोनों विधाओं में पैठने का सुख भोगा हो।

क्या 'झलमला' के ये पाठ हमें 'सही लघुकथा वह है जिसे प्रयास करके भी कहानी जितना विस्तार न दिया जा सके' जैसे अपने पूर्व वक्तव्यों पर विचार करने का बाध्य कर रहें हैं? या फिर अभी, कुछ ही दिन पहले अपनी फेसबुक वॉल पर लिखी भाई श्याम सुन्दर अग्रवाल की चिंता को साक्षात् हमारे सामने ला खड़ा कर रहे हैं कि देखो, लघुकथा की काया में लिखी कहानी कभी भी कहानी की ओर पलटी मार सकती है।

जो भी हो, 'झलमला' के ये दोनों ही पाठ यहाँ प्रस्तुत हैं ताकि लघुकथा के चिंतक, विचारक, आलोचक, शोधार्थी  तथा शोध-आचार्य इस रचना के 'लघु' और 'विस्तृत' दोनों पाठों से परिचित हो, उस पर अपनी राय प्रकट कर सकें।

'झलमला' का 'सरस्वती' 1916 में प्रकाशित पाठ, चित्र-1

'झलमला' का 'सरस्वती' 1916 में प्रकाशित पाठ, चित्र-2
 
'झलमला' का कहानी संग्रह 'झलमला' में प्रकाशित पाठ, चित्र-1

'झलमला' का कहानी संग्रह 'झलमला' में प्रकाशित पाठ, चित्र-2

 
'झलमला' का कहानी संग्रह 'झलमला' में प्रकाशित पाठ, चित्र-3
 ई-मेल:2611ableram@gmail.com

2 comments:

ओमप्रकाश कश्यप said...

'झलमला' के दोनों पाठ पढ़े. संवेदना की दृष्टि से देखा जाए तो कहानी प्रभावित करती है. मैं इसे कहानी जानबूझकर लिख रहा हूं. क्योंकि आधुनिक लेखक लघुकथा के लिए जो कसौटी निर्धारित करते हैं, उनपर यह खरी नहीं उतरती. हां लघुकथा की परंपरा को समझने के लिए इसे पढ़ा जा सकता है, हालांकि व्यक्तिगत रूप से मैं इसके पक्ष में भी नहीं हूं. कहानी प्रेम के उस रूमानी पक्ष को पेश करती है, जिसे उस दौर के अधिकांश लेखक, ऐसे लेखक जो मानते थे कि 'कला कला के लिए है' लिख रहे थे. कोरी भावुकता, जो जीवन के प्रति आस्था से ज्यादा नियतिबद्ध दिखती है. साहित्यकार को शब्दों का चयन बड़ी सावधानी से करना चाहिए. कहानी का एक पात्र 'विमला' भी है. जो घरेलू नौकरानी के रूप में काम करती है. लेखक ने बिना कुछ सोचे—समझे दासी के रूप में वर्णित किया है. यह कहानी बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में लिखी गई थी, उस समय तक दासप्रथा को लेकर पूरी दुनिया में चेतना पैदा हो चुकी थी और लगभग सभी देश उससे मुक्ति पा चुके थे. भारत में भी औपनिवेशिक सरकार समानता आधारित कानून ला चुकी थी. ऐसे में कोई भी जागरूक लेखक को शब्दों के चयन के मामले में सावधान होना चाहिए. कम से कम इस कहानी में बख्शी ऐसा नहीं करते. कहानी के दोनों संस्करणों में, जबकि बताया गया है कि दूसरा संस्करण बच्चों के लिए है, विमला को दासी ही बताया गया है. क्या इस रूप में यह कहानी बच्चों को पढ़ाई जानी चाहिए? इससे लेखक की मानसिकता को समझा जा सकता है. हो सकता है ऐसे शब्द सहज रूप में आ गए हों, अगर ऐसा है आधुनिक संदर्भ में ऐसी रचनाओं को साहित्य की श्रेणी से हटा देना चाहिए. हां, अतीत के विकारों की स्मृति के रूप में इसे कोई ढोना चाहे तो मुझे कोई आपत्ति् नहीं है.

बलराम अग्रवाल said...

इस पोस्ट पर प्रिय ओमप्रकाश कश्यप जी से पहली टिप्पणी यह थी जो कि बंधु कुशावर्ती जी ने सीधे फेसबुक पर कर दी थी। पाठकों की जानकारी के लिए यहाँ प्रस्तुत है…

Bandhu Kushawarti "झमेला 'झलमला' का" आलेख और संलग्न किये हुए 'झलमला' के दोनों पाठ पढ़ गया। पहले पाठ को,जिसे लघुकथा के अन्तर्गत भी रखा गया है,वह काम चलाने को लघुकथा मानी जा सकती है।
'झलमला' का पाँच पृष्ठों में विस्तारित दूसरे पाठ का रचना-काल अनुल्लिखित है।जा़हिर है,यह 'झलमला'(१९१६)वाले पाठ के बाद का है,भले ही इसके प्रकाशन के वर्ष व अन्य सन्दर्भ का उल्लेख न हो।ऐसे में 'झलमला'के परवर्ती (दूसरे)पाठ का मूल्यांकन हमको सन्१९१५-१६ तक छप चुकी प्रमुख आधुनिक हिन्दी कहानियों को ध्यान में रखते हुए ही करना होगा।
२०वीं शताब्दी में सन् १९१५-'१६तक किशोरीलाल गोस्वामी की कहानी 'इन्दुमती':१९००,माधवराव सप्रे की 'एक टोकरी भर मिट्टी':१९०१,मास्टर भगवानदास की 'प्लेग की चुडै़ल':१९०२,रामचन्द्र शुक्ल की 'ग्यारह वर्ष का समय':सन् १९०३,पं.महावीरप्रसाद द्विवेदी की 'स्वर्ग की झलक':१९०४,इसी दौर में प्रकाशित पं.माधवप्रसाद मिश्र की 'लड़की की बहादुरी', राजेन्द्र बाला घोष(बंगमहिला)की 'कुम्भ में छोटी बहू' तथा 'दुलाईवाली':१९०७,वृन्दावनलाल वर्माजी की 'राखीबन्द भाई':१९०९,जयशंकर प्रसाद की 'ग्राम':१९१०,इसी दौर में आयी राजा राधिकारमण की 'कानों में कँगना',प्रेमचन्द की 'परीक्षा':१९१४,सौत':१९१५; प्रायः इसी समय छपी 'पंच परमेश्वर' तथा चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी 'उसने कहा था' जैसी कितनी ही उत्कृष्ट कहानियाँ हिन्दी में प्रकाशित हो चुकी थीं।पूर्वोक्त एक भी कहानी के मुकाबले में देखें तो बख्शीजी द्वारा विस्तार देकर पाँच पृष्ठों में फैलायी हुई 'झलमला' बहुत ही कमजो़र कहानी ठहरती है।इसमें कहानी के पल्लवन को लेकर कहानीकार में एक प्रकार की भावनात्मक मोहाविष्टता हावी है!