Sunday 20 December 2015

पृथ्वीराज अरोड़ा को याद करते हुए--बलराम अग्रवाल



10 अक्टूबर, 1939 को पाकिस्तान के बुचेकी (ननकाना साहिब) में जन्मे, हिन्दी लघुकथा के महत्वपूर्ण स्तम्भों में से एक आ॰ पृथ्वीराज अरोड़ा आज 20 दिसम्बर, 2015 को दोपहर 11:40 बजे अपनी नश्वर देह को त्यागकर अनन्त में जा मिले। वे गत लगभग 3 साल से शारीरिक-मानसिक अक्षमता से जूझ रहे थे। उनका इस तरह अक्षम हो जाना हिन्दी लघुकथा की अपूरणीय क्षति थी। उनसे मेरी अन्तिम बातचीत सम्भवत: अक्टूबर 2012 में उस समय हुई थी, जब मैं 'अविराम साहित्यिकी' के लघुकथा विशेषांक में प्रकाशित करने हेतु वरिष्ठ लघुकथा लेखकों से उनकी 'लघुकथा यात्रा' पाने का निवेदन कर रहा था। अरोड़ा जी ने उस समय मुझे बताया था कि उनके डॉक्टर ने उन्हें कोई भी ऐसा काम करने से मना किया है जिसे करने में उन्हें मानसिक श्रम करना पड़े; इसलिए मैं तुम्हारा यह काम करने में असमर्थ हूँ। मैंने उनसे कहा--कोई बात नहीं। मैं स्वयं आपके पास रिकॉर्डर लेकर आ जाऊँगा, आप बोलते रहना, बस। लेकिन उन्होंने इस काम में भी अपनी असमर्थता साफ-साफ व्यक्त कर दी थी। और इस तरह, हिन्दी लघुकथा की शुरुआत का एक हिस्सा हम-सब के हाथ आने से रह गया, एक ऐसा हिस्सा जो जीवंत इतिहास था। उस हिस्से की महत्वपूर्ण कड़ी, रमेश बतरा बहुत पहले जा चुके थे। लेकिन उस दौर की कु महत्वपूर्ण कड़ियाँ अभी भी हमारे पास उपलब्ध हैं, बशर्ते वो इस ओर श्रम करना जरूरी समझें--कमलेश भारतीय और सिमर सदोष और महावीर प्रसाद जैन यद्यपि इन सी ने अपनी-अपनी लघुकथा यात्रा 'अविराम साहित्यिक' को उपलब्ध करा दी, तथापि, मैं समझता हँ कि उसका बहुत-सा हिस्सा अी लिखना बाकी है।
पृथ्वीराज अरोड़ा की रचनाओं के तीन संग्रह मेरे पास हैं--1 तीन न तेरह (1997, लघुकथा संग्रह) 2 पूजा (2003, कहानी संग्रह)  तथा 3 आओ इंसान बनाएँ (2007, लघुकथा संग्रह)। इनके अलावा 'प्यासे पंछी' नाम की एक औपन्यासिक कृति का भी उल्लेख 'आओ इंसान बनाएँ' के पिछले कवर पृष्ठ पर किया है; लेकिन वह मेरे पास नहीं है। 
पृथ्वीराज अरोड़ा जी से मेरी मुलाकातों का सिलसिला बहुत बाद में शुरू हुआ—रमेश बतरा के निधन के बाद। रमेश बतरा के निधन से पृथ्वीराज अरोड़ा बेहद आहत थे। दिल्ली में सम्पन्न रमेश बतरा की लगभग हर शोक सभा में वे सम्मिलित हुए, उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की, दु;ख में डूबे।
उनकी-मेरी मुलाकातें उनके दिल्ली प्रवास के दौरान अनगिनत हुईं। उन्हें जब भी मौका मिलता, वे कश्मीरी गेट स्थित दिल्ली जी॰पी॰ओ॰ की मेरी शाखा में आ बैठते थे। उनके कहानी संग्रह ‘पूजा’ (2003) तथा लघुकथा संग्रह ‘आओ इंसान बनाएँ’ (2007) की रचनाएँ उन्होंने उसी दौर में लिखी थीं। वे लघुकथा लिखकर लाते और मेरी शाखा में आकर उसके कथ्य के बारे में विमर्श करते। उन दिनों मैं उनके अधिकतर कथ्यों से अपने आप को लगभग असहमत पाता था, लेकिन वे विचलित नहीं होते थे। मेरे तर्कों से प्रभावित भी नहीं होते थे। मैं उनकी लघुकथाओं का प्रशंसक था, इस बात से वे परिचित थे; और शायद अचम्भित होते थे कि मैं उनके नवीन कथ्यों से असहमति क्यों जताता हूँ! मैं उन दिनों प्रेमचंद की उन लघु-आकारीय कहानियों पर, जिन्हें लगातार ‘लघुकथा’ शीर्ष तले छापा जा रहा था, विमर्श आयोजित कर रहा था। वे मेरे पास आकर बैठे तो उनसे भी सवाल कर दिया। बोले, ‘लघुकथा का कोई विधान ही जब तय नहीं है बलराम भाई, तब आप किस आधार पर लघुकथापरक विचार आमन्त्रित कर सकते हैं!’ मैं उनकी इस दलील से भी सहमत नहीं था। बहुत तर्क-वितर्क होता, लेकिन वे आदतन गड़ा हुआ खूँटा पकड़े रहते। जो भी हो, मैंने उनसे कहा, ‘आप अपने इन्हीं विचारों को लिखकर मुझे दीजिए, मैं इसी रूप में इन्हें छापूँगा।’ उन्होंने नि;संकोच उन्हें लिखकर दिया और उन्हें पहले मैंने ‘द्वीप लहरी’ (2006) में तथा बाद में “समकालीन लघुकथा और प्रेमचंद” शीर्षक पुस्तक में संकलित किया। यह सब लिखने का आशय सिर्फ यह है कि लघुकथा संबंधी अपने विचार को वे अन्तिम मानकर चलते थे और उनमें सुधार की गुंजाइश को अस्वीकार करते थे। उनका यही रूप हमने ‘मिन्नी’ द्वारा करनाल में आयोजित अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन में भी उस समय देखा था जब वे लघुकथा में “कालदोष” संबंधी अपनी अवधारणा को लेकर अड़ गये थे। यह ‘अड़ जाना’ उनके जुझारू व्यक्तित्व का वह हिस्सा था जिसे उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय की कर्मचारी यूनियन का सक्रिय नेता रहते परिपक्व किया था।
वे बहुत-सी सामाजिक मान्यताओं के तो बहुत-सी न्यायिक स्थापनाओं?निर्णयों से भी अपना विरोध दर्ज करते थे। वे सब विरोध उनके लघुकथा-साहित्य में मौजूद हैं। उनके व्यक्तित्व का आकलन करने के लिए अब उनकी रचनाएँ हमारे सामने हैं जो हू-ब-हू उनके व्यक्तित्व का आईना हैं, बिना किसी बनावट के। उनकी सघुकथाएँ उनके व्यक्तित्व को उनकसम्पूर्णता में व्यक्त करने का दरवाज़ा हैं। उनकी सभी लघुकथाओं में उनका विद्रोही व्यक्तित्व झाँकता है, इसमें सन्देह नहीं है। कल, 19-20 दिसम्बर करात को मैंने उनके दोनों लघुकथा संग्रहों से कुछ लघुकथाओं का चुनाव किया था जो ये हैं--कील/पढ़ाई/दया/घर का ख्वाब/बेटी तो बेटी होती है/सरकार के द्वार/पल/अपनी अपनी सोच/एक गौरैया-सी/शाश्वत रिश्ता/योगाभ्यास/भूख/मिठास-भरा रिश्ता/युग-बोध/मेरा दर्द। अनुमान नहीं था कि अगले दिन ही मुझे उनके निधन की अप्रत्याशित सचना को झेलना होगा। 
कुल मिलाकर, वे बहुत प्यारे इंसान थे--हमेशा मुस्कुराते रहने वाले। जिन बातों का वे बुरा मन जाते थे, उन्हें ी दिल में नहीं रखते थे। याद रखते थे, सिर्दोस्ती। बसूरत इतने थे कि मैं जब ी उन्हें देखता, उनके रूप में मुझे कैनेडी कछाया नजर आत
एक बात और। रचनाओं से अलग अपने आप को प्रदर्शित करने में वे काफी संकोची रहे। इस बात का प्रमाण उनके संग्रहों में दिया गया उनका वह परिचय है जिनमें उन्होंने अपने जन्म की तारीख तक देना जरूरी नहीं समझा…वह परिचय है जिसमें अपनी ताजातरीन फोटो देने की ओर उन्होंने कभी ध्यान नहीं दिया।
बहरहाल, उनकी स्मृति को शत-शत नमन। भावभीनी श्रृद्धांजलि।

7 comments:

Kanta Roy said...

सही कह रहे है आप ,ये हिंदी लघुकथा में अपूरणीय क्षति ही है। आपके द्वारा आज उनका यह आलेख ,उनके लिए अटूट श्रद्धा को रोपित कर गया है। हमारे लिए उनके सन्दर्भ में उनकी वर्तमान स्थितियों को जानकर मन विह्ल हो उठा। हिंदी साहित्य में लघुकथा के लिए उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। विनम्र श्रद्धांजलि

Vibha Rashmi said...

बलराम भाई पृथ्वीराज अरोड़ा जी के चले जाने से लघुकथा जगत की महत्वपूर्ण कड़ी ,सुदृढ स्तम्भ हमारे बीच से हट गया मानो।पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ कर ही उनके व्यक्तित्व को जान पाई। कभी मिलने का सौभाग्य नहीं मिला ।आप जब लघुकथा सम्मेलन से पूर्व उनसे मिलने गये थे तब आपने उनकी असाध्य-रुग्णता विषयक जानकारी साझा की थी। आपसे और भी यादें साझा करने का अनुरोध है। मैं उनकी हमेशा से प्रशंसक रही हूँ।मेरे नमन उन्हें।
क्या उनकी लघुकथा की पुस्तकें पुस्तक मेले में उपलब्ध हो सकेंगी?प्रकाशक का पता मिल जाए तो वहाँ से मँगवा लूँगी ताकि मेरा बुक-शेल्फ़ समृद्ध हो सके ।

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा said...

विभाजन और विस्थापन की त्रासदी को कोई किस प्रकार , सृजन में परिवर्तित कर सकता है , इसका स्थाई एवं अनुकरणीय उदाहरण थे " प्रोफेसर पृथ्वीराज अरोड़ा " . हमने सारिका में उनकी लघुकथाओं को पढ़कर जाना कि इस विधा में भी मानवीय संवेदनाओं को ऐसे स्वर दिए जा सकते हैं जो समस्या को सीधे पाठक के ह्रदय तक पहुंचाते हैं . उन्होंने साहित्य की इस विधा को न केवल पल्ल्वित और पोषित किया , अपितु इसे प्रतिष्ठा भी दिलवाई . नमन उस पवित्र आत्मा को जो हिन्दीं साहित्य में मील का एक पत्थर साबित हुई है . वे अपनी जीवंत रचनाओं के माद्यम से हमेशा जीवित रहेंगे ................सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

Neelima sharma - nivia said...

विनम श्रद्धांजलि

Neelima sharma - nivia said...

विनम्र श्रद्धांजलि

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा said...

विभाजन और विस्थापन की त्रासदी को कोई किस प्रकार , सृजन में परिवर्तित कर सकता है , इसका स्थाई एवं अनुकरणीय उदाहरण थे " प्रोफेसर पृथ्वीराज अरोड़ा " . हमने सारिका में उनकी लघुकथाओं को पढ़कर जाना कि इस विधा में भी मानवीय संवेदनाओं को ऐसे स्वर दिए जा सकते हैं जो समस्या को सीधे पाठक के ह्रदय तक पहुंचाते हैं . उन्होंने साहित्य की इस विधा को न केवल पल्ल्वित और पोषित किया , अपितु इसे प्रतिष्ठा भी दिलवाई . नमन उस पवित्र आत्मा को जो हिन्दीं साहित्य में मील का एक पत्थर साबित हुई है . वे अपनी जीवंत रचनाओं के माद्यम से हमेशा जीवित रहेंगे ................सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

Shyam Bihari Shyamal said...

पृथ्‍वीराज अरोड़ा की लघुकथाएं अलग त्‍वरा की रचनाएं हैं। कथा-तत्‍व का सर्वथा भिन्‍न विन्‍यास। उन्‍होंने इस विधा में कुछ अत्‍यंत विशिष्‍ट जोड़ा है। इस पर बात होनी चाहिए। उनका जाना व्‍यथित कर देने वाली घटना है। ..विनम्र श्रद्धांजलि..