Friday, 16 May 2008

जनगाथा मई 2008


लघुकथा की रचना-प्रक्रिया
बलराम अग्रवाल
(पिछले अंक से जारी)


यह कहना कि उपन्यास और कहानी से लघुकथा की भिन्नता कथानक के स्तर पर होती है—सरासर भ्रामक हो तब भी प्रशंसनीय ही माना जाएगा क्योंकि इसमें भिन्नता के सूत्र को पकड़ लेने का प्रयास परिलक्षित होता है। परन्तु, यह भिन्नता के मूल से भटका हुआ वक्तव्य है। पहली बात तो यह कि उपन्यास से लघुकथा की भिन्नता के बिन्दु तलाश करने की चेष्टा ही अपने आप में विडम्बनापूर्ण मूर्खता है, क्योंकि उपन्यास में कथा के विस्तार का फलक, कहानी और लघुकथा दोनों में, कथा के विस्तार-फलक से पूरी तरह भिन्न होता है। दूसरी बात यह कि कथा-साहित्य की विधाओं में (आकार की दृष्टि से भी) जितना भ्रम कहानी और लघुकथा के बीच उत्पन्न होता है, उतना उपन्यास और लघुकथा या उपन्यास और (सामान्य लम्बाई की) कहानी के बीच नहीं। उपन्यास और कहानी के बीच भ्रम की स्थिति लम्बी-कहानी तथा उपन्यासिका को लेकर तो गाहे-बगाहे उत्पन्न होती रहती है, सामान्यतः नहीं। बिल्कुल वैसे, जैसे छोटी कहानी और (अपेक्षाकृत लम्बे आकार की) लघुकथा के बीच वर्तमान में बनी हुई है। हालाँकि प्रस्तुतिकरण के कुछ बिन्दुओं पर कड़ी नजर डालें तो यह भ्रम ज्यादा टिकता नहीं है। एक मुख्य बात, जो अब तक देखने में आई है, वह है—लघुकथा और कहानी, दोनों के कथानकों का अपने समापन अथवा अन्त की ओर भिन्न गति से बढ़ना। कहानी का कथानक अक्सर किसी उपालम्ब के सहारे समापन की ओर बढ़ता है, जबकि लघुकथा का कथानक बिना किसी अवलम्ब या उपालम्ब के। लघुकथा का कथानक स्वयं ही अपना अवलम्ब होता है तथा कहानी की तुलना में अधिक त्वरण वाला होता है। कह सकते हैं कि समापन की ओर बढ़ते कथानक के मामले में गतिज-ऊर्जा की दृष्टि से कहानी की तुलना में लघुकथा अधिक स्वाबलम्बी कथा-रचना है। कहानी से लघुकथा की भिन्नता का इसे एक-और बिन्दु माना जा सकता है।
आज, जिस समाज में हम रहते हैं, उसमें सूचनाओं को प्राप्त और प्रदान करने के माध्यम और साधन सभी के पास लगभग समान हैं—पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएँ, रेडियो, टीवी, टेलीफोन, इंटरनेट, बाजार और संगति। इसलिए यह अवश्य माना जा सकता है कि लघुकथा में दो या अधिक लेखक एक ही घटना को अपने लेखन का आधार बना सकते हैं। परन्तु, उन सबकी संवेदनाएँ भी उस घटना से समान रूप में ही प्रभावित होंगी और निष्कर्षतः भी वे समान रचनाएँ ही लिखेंगे—यह असंभव है। कथानक की बात हम छोड़ भी दें तो वस्तु और निष्कर्ष के स्तर पर समान लघुकथाएँ भिन्न शीर्षकों के रहते भी अमौलिक तथा किसी पूर्व-प्रकाशित रचना से प्रभावित ही कही जायेंगी।
किसी भी माध्यम से प्राप्त समाचार मनुष्य के बाह्य-जगत का लेखा है, अन्तःजगत का नहीं। इसलिए अनेक बार कथात्मक प्रस्तुति के रहते भी, समाचार-लेखक समाचार ही प्रस्तुत कर पाता है, लघुकथा नहीं। समाचारों के माध्यम से अगर अपनी संवेदनाओं को कथारूप दिया जा सकता होता तो प्रभावशाली लघुकथा-लेखकों की कम-से-कम एक ऐसी जमात जरूर हमारे पास होती जिसने(अखबारी समाचारों के आधार पर) बहुत-सी देशी-विदेशी समस्याओं के सर्वमान्य समाधान प्रस्तुत करती या आदमी के संवेदन-तन्तुओं को जगाती कितनी ही लघुकथाएँ लिख मारी होतीं। समाचार ही अगर संवेदनाओं के मानक वाहक होते तो टीवी, अखबार आदि ‘लघुकथा’ के मुकाबले कम-से-कम इस अर्थ में तो प्रभावशाली माने ही जाते कि समाचार को इनमें से कुछ में हम एक घटना को रूप में जीवन्त घटित होते देखते-सुनते हैं। लेकिन हमारी सुप्त या कहें कि मृत संवेदन-ग्रंथियों का यह हाल है बताने की शायद जरूरत नहीं है कि ‘भोपाल गैस काण्ड’ में मारे गए और पीड़ित लोगों के बारे में टीवी रिव्यू हो या किसी और काण्ड में सताए-मारे गए लोगों के बारे में, टीवी रिव्यू देखते समय हमारे हँसी-ठट्ठों और खान-पान में कोई बदलाव दृष्टिगोचर नहीं होता। उधर खून-खराबा, लाशें और रोते-बिलखते स्त्री-पुरुष-बच्चे दिखाई दे रहे हैं; इधर डाइनिंग-टेबल पर फ्रूट-क्रीम के कप से उठकर चम्मच हमारे मुँह की ओर घूम रही होती है। समाचारों और संवेदनाओं के बीच वर्तमान में यह रिश्ता हमारे सामने है। जब तक कोई लेखक समाज से रू-ब-रू नहीं होगा, संवाद का कोई भी माध्यम उसकी संवेदना को जगाए नहीं रख सकता। साहित्य अगर समाज का दर्पण है तो सिर्फ इसलिए कि उसका रचयिता समाज के अन्तर्विरोधों को उसके बीच अपनी उपस्थिति बनाकर झेलता-महसूसता है, न कि समाचार माध्यमों द्वारा फेंके गये टुकड़ों को लपक-लपक कर संवेदनाओं की जुगाली करता फिरता है।
लेखक का धर्म है कि वह अन्त:जगत से जुड़े। जितना गहरा वह पैठेगा, उतना ही गहरा वह प्रस्तुत करेगा। अन्त:जगत से जुड़े बिना बाहर की हर यात्रा व्यर्थ और निरर्थक है। अन्त:जगत से जुड़ाव ही आदमी को सामान्य की तुलना में विशेष बनाता और सिद्ध करता है। यही वह विशेष कारण है जिसके चलते ‘लेखक’ विशेषणधारी व्यक्ति केवल सुन या देखकर ‘अन्य’ की संवेदनाओं के साथ अपनी संवेदनाओं को जोड़कर उन्हें उनकी सम्पूर्णता में पा लेता है। लेकिन इसको ‘साधना’ न तो इतना आसान है और न ही आम। इसलिए जब तक यह सध न जाए, तब तक समाज से सीधे संवाद निर्विवादित है। हाँ, लेखक के तौर पर किसी को अल्पायु एवं रुग्ण जीवन भी स्वीकार्य हो तो समाचारों को माध्यम बनाकर कुछ काल तक बाह्यजगत में विचरण का सुख भोग लेना कोई बुरी बात नहीं है।...(शेष आगामी अंक में)


एक परिचयात्मक टिप्प्णी हिन्दी लघुकथा : सोच के नये आयामडा0 सतीश दुबे

हिन्दी कथा-साहित्य के बीच लघुकथा ने हर दृष्टि से आज जो विशिष्ट स्थान प्राप्त है, उसका श्रेय अस्सी के दशक में युवा-रचनाकारों द्वारा किये गये विभिन्न सृजनात्मक प्रयासों को दिया जाना चाहिए।
आन्दोलन का आकार लिये इन प्रयासों की पृष्ठभूमि में ‘सारिका’ के माध्यम से कमलेश्वर जी की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इस बहु-प्रसारित व्यावसायिक पत्रिका में लघुकथाएँ, उससे सम्बन्धित आलेख, चर्चा-गोष्ठियाँ, रपट जैसी सामग्री प्रकाशित होने के कारण बहुल-पाठक-वर्ग ने लघुकथा की शक्ति को पहचाना। सहमति-असहमति के उभरे स्वरों ने अनेक तेज-तर्रार युवा-समीक्षकों को मुखरित किया। रचना-प्रक्रिया, विधागत मान्यता, लेखन-प्रकाशन जैसे विभिन्न मुद्दों पर साहित्यिक-चेतना का प्रतिध्वनित माहौल नये-पुराने रचनाकारों का ध्यान लघुकथा की ओर आकृष्ट करने लगा।
इसे अजीब विरोधाभास या संयोग ही माना जाना चाहिए कि उसी दशक के दौरान लघुकथा को लेकर बहस-मुबाहिसों की इस हलचल से परे एक ऐसा कार्य हो रहा था जिसने इस विधा में सृजन के सकारात्मक पक्ष की मिसाल ही कायम नहीं की, प्रत्युत भविष्य में बनने वाली लघुकथा-इमारत को जाँचने-परखने, उसका आकलन करने का ठोस आधार भी प्रदान किया। यह कार्य था—राजस्थान के अजमेर जिले की निवासी शकुन्तला किरण द्वारा जयपुर विश्वविद्यालय से आठवें दशक की ‘हिन्दी लघुकथा’ पर केन्द्रित शोध-कार्य। किसी भी भारतीय अथवा विदेशी विश्वविद्यालय द्वारा लघुकथा को केन्द्र में रखकर शोध-हेतु पंजीकृत तथा शोधोपरांत सम्मानोपाधि(पी-एच0 डी0) प्राप्त ‘हिन्दी लघुकथा’ पहली कृति है।
डा0 शकुन ने शोध-दृष्टि और सूक्ष्म अध्ययन को चिंतन का आधार बनाकर सटीक तथ्यात्मक टिप्पणियों के माध्यम से लघुकथा-लेखन की सामाजिक सरोकारों के वृहद फलक पर साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में पैरवी की है।
पाँच अध्यायों में, तकरीबन तीन सौ पृष्ठों पर विदुषी शोधार्थी ने आठवें दशक की तमाम ऐसी सृजनात्मक गतिविधियों को सोच के नये आयाम दिये हैं, जो लघुकथा की पहचान और उसके उज्ज्वल पक्ष को उजागर करने के लिए साहित्यिक-जगत में जारी थे।
हिन्दी लघुकथा की रचनात्मक-पड़ताल के लिये डा0 शकुन के दृष्टि-पटल पर देश ही नहीं, विदेश की परम्परा भी बीज-रूप में विद्यमान रही है। और इसीलिए, खलील जिब्रान का उल्लेख करते हुए वह उन प्रसंगों को विशेष रूप से रेखांकित करती हैं जो लघुकथा के रचनात्मक-तेवर की वजह से तात्कालिक-व्यवस्था के लिए खतरनाक साबित हुए।
लम्बे अरसे तक निरन्तर जद्दोजहद के बाद साहित्य-जगत में अपना विधागत मुकाम हासिल करने में लघुकथा भले ही अब कामयाब हो सकी हो, किन्तु डा0 शकुन्तला किरण आठवें दशक में उपलब्ध साहित्य के साक्ष्य में एक पारखी शोधार्थी के नाते ऐसी स्थापना को बहुत पहले शब्द दे चुकी थीं---“आठवें दशक में उदित आधुनिक हिन्दी लघुकथा ने अपनी विशिष्टताओं, क्षमताओं एवं उपयोगिताओं के कारण अभिव्यक्ति के एक नये व प्रभावशाली माध्यम के रूप में अपनी स्वतन्त्र पहचान दी…।”
प्रस्तुत आलोचनात्मक कृति विषय के प्रति न्याय ही नहीं शोध के समर्पण और निष्ठा का आदर्श भी प्रस्तुत करती है। साहित्य की विधा-विशेष पर किए जाने वाले अन्य कार्यों की अपेक्षा यह कार्य विशिष्ट दर्जा हासिल करने का हकदार इसलिए भी है कि इसमें शोध-सामग्री संकलन के प्रयास एकाकी की अपेक्षा बहुआयामी तथा समाज-वैज्ञानिक हैं।
आठवें दशक जैसे अति-महत्वपूर्ण कालखण्ड-विशेष पर केन्द्रित होने के कारण यह कृति लघुकथा की विधागत अंतरकथाओं एवं आलोचना-दृष्टि के संदर्भ में रामायण-महाभारत के प्रसंगों की तरह कालातीत साबित होगी,ऐसा मेरा विश्वास है।
लघुकथाएँ
धरम की बातविमल किशोर
अंगूरी तो बस यही समझती थी कि उसका आदमी कल्लू जब भी शराब पीकर आता है, उसे मारता-पीटता है। बल्कि, अब तो वह यह समझने लगी थी कि कल्लू को जब भी उसे पीटना होता है, तभी वह शराब पीकर आता है, अन्यथा नहीं।
मुहल्ले में नयी आयी रामकली को यह बात कुछ अजीब-सी और आतंकित करती-सी लगी। उस दिन उसने अंगूरी के चीखने-चिल्लाने की आवाज सुनी तो अपनी पड़ोसन चंपा के पास गयी। चंपा ने कल्लू को एक लम्बी-सी गाली देते हुए जो कुछ कहा उसका आशय रामकली को यही समझ में आया कि यह तो हमेशा ही होता आया है –कोई कहाँ तक बीच-बचाव करे……और वह वहाँ से चली आयी; लेकिन ध्यान उसका अंगूरी की ओर ही लगा रहा।
अंगूरी चीखती-चिल्लाती बेबस, कल्लू को गालियाँ दे रही थी, उसकी मौत भगवान से माँग रही थी। सुन-सुन कर रामकली भी चाह रही थी कि यह हत्यारा मर जाये और बेचारी की जान बचे।
चार दिन बाद महालक्ष्मी का व्रत आया। मुहल्ले की सभी स्त्रियों ने अपने पति और पुत्रों की दीर्घायु के लिए व्रत किया। रात को अंगूरी पूजा करने रामकली के घर आयी। पूजा करते समय रामकली ने लक्ष्मीजी की मूर्ति के सामने माथा टेकते हुए अपने पुत्र और पति के कल्याण एवं लम्बी आयु की कामना की।
अंगूरी ने भी ऐसा ही किया तो रामकली ने आश्चर्य से पूछा,”अभी उस दिन तो तू मना रही थी कि लल्लू के कक्का अभी मर जायें और आज…”
अंगूरी ने बीच में ही टोकते हुए कहा,”ऐसी बात मत कहो बाई…वा और बात हती… जा धरम की बात है…करम में वोई बदो है, धरम में जे है…”


अरेखित त्रिकोण
उदय प्रकाश

-कुत्ते, कमीने… बाप से मुँह बड़ाता है! इसी दिन के लिए क्या तुझे पाल-पोस कर बड़ा किया था?
-चुप रह तू, बाप होने का हक जताता है, पर बाप की जिम्मेदारियाँ निभानी आती हैं तुझे? जितना तूने मुझ पर खर्च किया है, उससे दुगुना तुझे कमा-कमा कर खिला चुका हूँ मैं, समझा!
-क्यों बे बूढ़े, मौत आयी है क्या तेरी, जो अपने बेटे से जबान लड़ा रहा है।--–पुत्र का एक हितैषी बोला।
-स्साले, कमीने, हमको उपदेश देता है! हरामी की औलाद!!---कहते हुए अगले ही क्षण पिता-पुत्र दोनों उसकी छाती पर सवार थे।



अंधेःखुदा के बंदेरमेश बतरा

-इस आदमी को क्यों नहीं चढ़ने दे रहे आप…इसे भी तो जाना है।
-यह तो कहीं भी चढ़ जायेगा। रह भी गया तो अगली गाड़ी से आ जायेगा। मगर तुम्हें तकलीफ होगी।
-मुझ पर इतना तरस क्यों खा रहे हैं आप?
-तुम अंधे जो हो…अपाहिज।
-मैं ही क्यों, आप भी तो अपाहिज हैं।
-सूरदास, भगवान ने आँखें नहीं दीं, कम-से-कम जुबान का तो सही इस्तेमाल कर… मीठा बोलना सीख।
-आपको तो भगवान ने सब-कुछ दिया है; पर क्या दुनिया का कोई भी काम ऐसा नहीं जो आप नहीं कर सकते?
-बहुत-से काम हैं।
-फिर उन कामों को लेकर तो आप भी अपाहिज ही हुए। और तो और, भगवान ने आपको आँखें दी हैं और आप उनका भी सही इस्तेमाल नहीं कर रहे।
-यह तो फिलोसफर लगता है।
-कैसे भई कैसे?
-आपकी आँखें यह नहीं देख रहीं कि दो आदमी हैं और आपका इंसानी फर्ज है कि आपकी तरह वे भी अपनी मंजिल पर पहुँच जायें, बल्कि आपकी आँखें अंधे और सुजाखे को देख रही हैं। जो आदमी होकर आदमी को नहीं पहचानता, उससे ज्यादा अपाहिज कोई नहीं होता।
-अच्छा-अच्छा, भाषण मत दे। चढ़ना है तो चढ़ गाड़ी में, वरना भाड़ में जा…हमें क्या पड़ी है!
-मुझे मालूम था, आप यही कहेंगे। आपकी तकलीफ मैं समझता हूँ…आप एक अंधे को गाड़ी पर चढ़ाकर पुण्य कमाना चाहते थे, किन्तु धर्मराज की बही में आपके नाम एक पुण्य चढ़ता-चढ़ता रह गया।
-पुण्य कमाने के लिए एक तू ही रह गया है बे?…मैं तो इसलिए कह रहा था कि अंधे बेचारों की हालत तो दो-तीन साल के बच्चों से भी बुरी हुई रहती है।
-वाह! दो-तीन साल का बच्चा इस तरह गाड़ी पकड़ सकता है क्या?
-बच्चा भला क्या गाड़ी पकड़ेगा अपने आप!
-मैं अकेला आया हूँ स्टेशन पर…कोई लाया नहीं मुझे।
-पुलिस से बचकर भाग रहा होगा…आजकल खूब ठुकाई कर रही है तुम्हारी।
-अजी, अपना हक माँगने गये थे, भीख माँगने नहीं…लाठी पड़ गयी तो क्या हुआ। आप जाइए तो आप पर भी पड़ सकती हैं लाठियाँ तो।
-हम तो कैसे भी बचाव कर सकते हैं अपना…मगर तुम…!
-देख लीजिए, जीता-जागता खड़ा है यह अविनाश कुमार आपके सामने।
उस आदमी के पास कोई जवाब नहीं बन पड़ा। गाड़ी, जो सीटी दे चुकी थी, अब चल पड़ी। अविनाश कुमार ने लपककर डंडा पकड़ते हुए अपने पाँव फुटबोर्ड पर जमा दिए। लोग उसका हाथ थामकर उसे डब्बे के अंदर लेने की कोशिश करने लगे…और अविनाश कुमार बड़ी मजबूती-से डंडा थामे कहता रहा—इंसान को सँभालना इंसान का फर्ज है…इस नाते मैं आपकी तारीफ करता हूँ…पर मुझे अंधा समझकर मुझ पर दया मत कीजिए…मुझे अपने लायक बनने दीजिए…अंधा हो चुका…मोहताज नहीं होना चाहता…!
गाड़ी तेज होती चली जा रही थी।


धूल-धुआँ
पृथ्वीराज अरोड़ा

खेलते-खेलते अचानक बच्चों के हाथ रुक गये। मेरा ध्यान भी टूटा। मैंने पूछा,”क्या हुआ, तुम लोगों ने खेलना क्यों बंद कर दिया?”
उनसे कोई जवाब न मिला तो मैंने निगाहें उठाकर देखा। बच्चों की आँखों का अनुकरण करते हुए मैं सन्न रह गया। अपने अन्दर एक कमजोरी के अहसास को महसूसा। मेरे साठ वर्षीय पिता दूध से भरा बड़ा गिलास गटागट पी रहे थे। मैंने आगे बढ़कर खिड़की बन्द कर दी, मानो अपने अभावों से नजर चुरा ली हो।
बच्चे मेज के इर्द-गिर्द बैठ गये। तीनों बच्चों ने चाय के गिलास जल्दी-जल्दी उठाकर खाली कर दिये और फटाफट बस्ते उठाकर स्कूल जाने लगे। पत्नी की नजर दूध के भरे गिलास पर पड़ी तो चौंक गयी…छोटा तो दूध बिना पिये मानता नहीं… आज दूध छोड़कर चाय कैसे पी गया! उसने जाते-जाते छोटे को डाँटा, “ए, तुमने दूध क्यों नहीं पिया?”
उसने भोला-सा मुँह बना दिया, “बच्चे दूध नहीं पीते।“
“और कौन पीते हैं?”
“बूढ़े पीते हैं।”
“यहाँ कौन बूढ़ा बैठा है। चल, जल्दी-से गिलास खाली कर और जा।”
“नहीं मम्मा, मैं नहीं पियूँगा।”
“कौन पियेगा फिर!”
“तुम पापा को पिला दो, मम्मी।” कहते हुए बच्चा भागकर आगे निकल चुके भाइयों में जा मिला।
क्रियात्मक कामसूत्र
शंकरदयाल सिंह

दिल्ली से जब गाड़ी चली, तो हम लोग—तीन सवारियाँ—प्रथम श्रेणी के उस डिब्बे में थे—दो महिलाएँ और एक पुरुष-यात्री मैं। गाड़ी छूटने के कुछ ही देर बाद एक महिला-यात्री दूसरे डिब्बे में चली गयी और उसके बाद हम दो ही बच गये। मेरे साथ वाली सहयात्री ने भी कंडक्टर गार्ड के आते ही महिलाओं वाले डब्बे में चले जाने की इच्छा व्यक्त की।
कंडक्टर गार्ड ने ‘सी’ कम्पार्टमेंट मे जगह देने की बात कही, लेकिन अलीगढ़ से। महिला सहयात्री ने अपना आधा सामान ‘सी’ में जा कर रख भी दिया। मैं खामोश सब देखता-सुनता रहा।
‘डीलक्स-गाड़ी’ में 'डायनिंग कार’ की सुविधा रहती है, अतः बेयरा को चाय लाने का आदेश दिया और चाय आने पर स्वाभाविक रूप में अपने सामने बैठी और खोयी संभ्रांत महिला से चाय पीने का आग्रह किया। पहले तो एक-दो बार उन्होंने ‘ना-नो’ की, लेकिन मेरे जोर देने पर वह तैयार हो गयीं। चाय की चुस्की के साथ कुछ बातों का क्रम भी चला और मुझे पता चला कि वह एक आर्मी-आफीसर की पत्नी हैं तथा उन्हें यह पता चला कि मैं संसद सदस्य हूँ। वे कलकत्ता जा रही हैं और मैं पटना जा रहा हूँ।
अलीगढ़ में कंडक्टर-गार्ड ने आकर डब्बा बदलने की बात कही तो उन्होंने अरुचिपूर्ण स्वर में कहा—“आगे देखा जाएगा।”
गाड़ी आगे बढ़ी तो मैंने उनसे कहा—“चेंज ही करना है तो बदल लें। चलिए, मैं आपका सामान वहाँ तक पहुँचा देता हूँ।”
उन्होंने बड़ी संभ्रांत एवं संकोचशील आवाज में कहा—“आपको बुरा नहीं लगेगा?”
“भला मुझे बुरा क्यों लगेगा? आप अकेली हैं, महिला हैं, दूर का सफर है; फिर किसी अपरिचित पुरुष के साथ यात्रा में झिझक स्वाभाविक है। आप डब्बा बदल लें और शांतिपूर्वक सो जायें।”
“सब लोग एक तरह के नहीं होते और अब आप अपरिचित भी नहीं हैं।” एक छोटी-सी मुस्कान के साथ उन्होंने कहा और अपना सामान लाने चली गयीं।
हम दोनों बहुत देर तक व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन के संबंध में बातें करते रहे। करीब साढ़े आठ बजे रात में गाड़ी टूँडला पहुँची और वहाँ हमारे डब्बे में दो विदेशी—युवक-युवती—आ गये तथा ऊपर की दोनों बर्थों पर कब्जा कर लिया।
दस बजे के करीब मैंने सबों से अनुमति लेकर डब्बे की उजली बत्तियाँ बुझा दीं और दरवाजा भी बंद कर दिया। बारह बजे रात के करीब अपनी संभ्रांत-सहयात्री के खाँसने की आवाज से मेरी नींद टूट गयी और नीले प्रकाश में उनकी आँखों में चमक और बेचैनी तथा हास्य की आभा देखी। उन्होंने अपनी उँगलियों से ऊपर की ओर इशारा किया। मेरी नजर सामने गयी, तो देखा कि वात्स्यायन के कामसूत्र का क्रियात्मक पाठ दोनों विदेशी—युवक-युवती—धड़ल्ले से कर रहे थे।


चाँदनी
डा0 जाकिर हुसैन
हिमालय की वादियों में स्थित अल्मोड़ा के एक बड़े मियाँ—अब्बू खाँ—अकेले होने के कारण सदा एक-दो बकरियाँ पाले रखते थे। दिनभर उन्हें बड़े प्यार से चराने के बाद रात को घर में बंद कर देते थे। पहाड़ी नस्ल की बकरियाँ बँधे-बँधे घबरा जाती थीं और अवसर पाने पर रस्सी तुड़ाकर पहाड़ में चली जाती थीं। वहाँ एक भेड़िया उन्हें खा जाता था।
जब कई बकरियाँ भाग निकलीं तो अब्बू खाँ ने सोचा कि यदि उन्होंने एक कम-उम्र बकरी ली और उसे पहले से ही अच्छे चारे-दाने की आदत डाल दी तो वह पहाड़ का रुख न करेगी। वे एक नन्हीं-सी सुंदर, बकरी ले आये, चाँदनी नाम रखा और अधिक स्नेह से उसका पोषण करने लगे। उन्होंने चाँदनी को अपने खेत में बाँध दिया जिसे काँटों से घेर दिया गया था और रस्सी भी खूब लम्बी कर दी।
स्वतंत्र प्राणियों का दम खुली चारदीवारी में घुटता है और काँटों से घिरे खेत में भी। एक सुबह जब चाँदनी ने पर्वतों की ओर दृष्टि की तो सुन्दर शिखरों ने उसे पुकारा। उसे उछलने, कूदने और ठोकरें खाने की इच्छा हुई। सो, उसने एक दिन अब्बू खाँ से कहा—“अब्बू मियाँ, मुझे पहाड़ में चला जाने दो।”
अब्बू खाँ बकरियों की भाषा जानते थे। चाँदनी की बात सुनकर उन्होंने छाती पीट ली। फिर, मनाने लगे। बेहतर चारे-दाने की आस दिलायी। भेड़िये का डर बताया। मगर चाँदनी ने कहा— “अल्लाह ने दो सींग दिये हैं, इनसे उसे मारूँगी।”
अब्बू खाँ झुँझलाये। उन्होंने उसे एक कोठरी में बंद कर दिया। मगर वह उसकी खिड़की बंद करना भूल गये और चाँदनी खिड़की फलाँगकर भाग गयी।
पहाड़ पर पहुँचकर चाँदनी की खुशी का ठिकाना कहाँ! उछली, कूदी, फाँदी, फिसली और सँभली! वहाँ उसे बकरियों का एक रेवड़ भी मिला। उसमें एक जवान बकरा पसंद भी आया। लेकिन, वह उसके साथ न गयी। आजादी की आरजू प्रबल थी।
अँधेरा उतर आया। एक ओर से भेड़िये की खूँ-खूँ की आवाज आने लगी, दूसरी ओर से अब्बू खाँ की प्यारभरी पुकार—“लौट आ…लौट आ!”
पलभर को लौटने की इच्छा हुई; पर खूँटा, रस्सी और काँटों का घेर नजरों के सामने घूमने लगे। उसने सोचा—वहाँ की जिन्दगी से यहाँ की मौत अच्छी।
होठों पर जीभ फेरते भेड़िये को देखकर चाँदनी लड़ने को तैयार हो गयी। वह जानती थी कि बकरियाँ भेड़िये को नहीं मार सकतीं। वह तो बस यह चाहती थी कि सामर्थ्यानुसार मुकाबला करे। जीत-हार तो अल्लाह के हाथ है। भेड़िया आगे बढ़ा तो चाँदनी ने भी सींग सम्हाल लिये और वो हमले हुए कि भेड़िये का जी जानता है। तारे एक-एक करके गायब हो गये। चाँदनी ने आखिरी समय में अपना जोर दुगुना कर दिया, लेकिन वह बेदम होकर गिर गयी।
भेड़िये ने उसे दबोच लिया।

महँगाई
राधेलाल ‘नवचक्र’
राज्य में रोज महँगाई बढ़ रही थी। राजा परेशान, जनता तबाह। आखिर राजा के विरुद्ध आवाज उठी, “महँगाई को कम करो, नहीं तो गद्दी छोड़ दो!”
राजा ने इस संबंध में एक चतुर मंत्री से सलाह ली। मंत्री ने कहा, “यह समस्या तो चुटकी बजाते हल हो सकती है, महाराज!”
“कैसे?” महाराज ने पूछा।
“महँगाई कम करने के लिए महँगाई बढ़ानी पड़ेगी।” मंत्री ने कहा।
“यह आप क्या कह रहे है!”
“पहले महँगाई को डेढ़ गुना बढ़ा दिया जाये…”
“फिर?”
“अगले दिन हर चीज की कीमत एक प्रतिशत घटा दी जाये। फिर कुछ दिनों बाद थोड़ी और घटा दी जाये। फिर थोड़ी और…ऐसा करने से जनता समझेगी कि अब कीमतें धीरे-धीरे घट रही हैं; जबकि वह पहली वाली कीमत से थोड़ा ऊपर रहकर स्थिर हो जायेगी। जब-जब महँगाई के विरुद्ध आवाज उठे, आप यही करें।” मंत्री ने गूढ़ बात कही।
तरीका प्रयोग में लाया गया। राजा ने देखा, जनता पहले से खुश थी—खूब खुश!

Friday, 11 April 2008

जनगाथा-अप्रैल 2008



अन्तरराष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन, रायपुर(छत्तीसगढ़)
रायपुर(छत्तीसगढ़) में 16-17 फरवरी, 2008 को संपन्न अन्तरराष्ट्रीय लघुकथा सम्मेलन के दौरान कुछ ऐसी बातें देखने-सुनने में आयीं, जो इससे पहले के किसी अन्य लघुकथा सम्मेलन में नजर नहीं आयी थीं। इसकी एक वजह इसका ‘अन्तरराष्ट्रीय’ होना भी हो सकती है! उन सभी बातों के बारे में कुछ न कहकर मैं मात्र एक बात पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहा हूँ। उस बात को मंच से उठाया, न्यूजीलैंड से आये श्री हैप्पी ने। उनका मानना था कि ‘दो दिनों के इस सम्मेलन में मुझे ऐसा कुछ नहीं मिल पाया जिसका अनुसरण करके मैं लघुकथा के बारे में कुछ खास जान सकूँ, उसके प्रति अपनी समझ को कुछ बढ़ा हुआ महसूस कर सकूँ।’
उनकी इस बात के जवाब में मंचस्थ श्री सुकेश साहनी ने अपनी बारी आने पर इतना जरूर कहा कि ‘सीखने की नीयत हो तो आदमी हर सम्मेलन से कुछ न कुछ अवश्य सीख सकता है। स्वयं मुझे हर सम्मेलन ने कुछ न कुछ दिया है।‘
लेकिन मुझे नहीं लगता कि हैप्पी जी उनकी इस बात से सहमत हुए होंगे। मैंने पहली बार महसूस किया कि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो स्तरीय लघुकथा लिखने के लिए यथेष्ट अध्ययन अथवा श्रम करने की बजाय कुछ ऐसे जादुई फार्मूलों की तलाश हैं, जो विश्व-साहित्य की दुनिया में उन्हें रातों-रात नायक बना दें। हैप्पी जी तो इंटरनेट की दुनिया से अच्छी तरह वाकिफ़ होंगे। मामूली फीस लेकर कुछेक यानी 1-2-3-4 शब्दों से लेकर फिफ्टी-फाइवर्स, सिक्सटी-नाइनर्स, हण्ड्रेडर्स यानी 55 शब्दों, 69 शब्दों, 100 शब्दों वाली कथा-रचनाएँ(?) सिखाने वाली कितनी वेबसाइट्स वहाँ मौजूद हैं—वे जानते होंगे। हिन्दी लघुकथा-क्षेत्र भी मसीहाओं और उस्तादों से निपट खाली नहीं रहा है। हैप्पी जी थोड़ा लेट चेते, अन्यथा रातों-रात लघुकथाकार बना डालने वालों से उनका साबका जरूर पड़ता।
परन्तु, श्रीयुत हैप्पी जी की हताशा को गंभीर-जिज्ञासा मानते हुए इस अंक में सभी लघुकथा-प्रेमियों के समक्ष ‘लघुकथा की रचना-प्रक्रिया’ शीर्षक एक लेख इस आशय से प्रस्तुत किया जा रहा है कि इसे पढ़-समझकर शायद कुछ बिंदु उन्हें लघुकथा-लेखन के मिल जायें। प्रयास किया जाएगा कि आगामी अंकों में ‘लघुकथा की रचना-प्रक्रिया’ शीर्षक लेख शीर्ष लघुकथाकारों के भी प्रस्तुत किये जायें।
सम्प्रति, ‘जनगाथा’ के अंकों पर आपकी प्रतिक्रियाएँ उत्साहवर्द्धक हैं। यह सहयोग आगे भी जारी रहेगा—विश्वास है।




लघुकथा की रचना-प्रक्रिया
बलराम अग्रवाल

क्या ‘लघुकथा’ कहानी में अपनी जगह न बना पा रहे कुछ कुण्ठित लोगों द्वारा अलापा गया कोई बेहूदा राग है? या फिर इस परिश्रम के पीछे देश के पास कागज का और पाठक के पास समय का अभाव मात्र ही कोई कारण है? ‘कथा’ के शाब्दिक अर्थ—‘कथ’ धातु से इसकी व्युत्पत्ति और सीधे अर्थों में—‘वह जो कहा जाए’ जैसे अकादमिक वाक्यों को हम कहाँ-कहाँ नहीं दोहराते। लघुकथा कथा-साहित्य की विधा है तो ‘कथा’ के अर्थ तो बेशक, हमें जानने ही होंगे। ‘कथा’ के जिन प्रचलित और पुराण-शास्त्रीय अर्थों को हमने कहानी(यानी वह जो कहा जाए) तथा उपन्यास के सन्दर्भ में चाटा है, लघुकथा के सन्दर्भ में भी अगर ज्यों-का-त्यों उन्हें ही चाटना होगा तो कथा-साहित्य की विधा के तौर पर ‘लघुकथा’ में नवीनता क्या है? और, कोई नवीनता अगर उसमें है तो यकीन मानिये, ‘कथा’ की प्रचलित परिभाषायें कहानी व उपन्यास के सन्दर्भ में चाहे जितनी मान्य और स्वीकार्य हों, लघुकथा के सन्दर्भ में वे आधी-अधूरी व भ्रामक ही कही जायेंगी। अगर ‘लघुकथा’ को भी ‘कथा’ की पारम्परिक और शास्त्रीय परिभाषा से ही नपना था तो बोधकथा, नीतिकथा, दृष्टान्तकथा, भावकथा आदि से अलग इसका प्रादुर्भाव ‘समकालीन लघुकथा’ के रूप में क्यों हुआ?
किसी नयी विधा को जन्म देने के लिए, या फिर उसके पुनर्प्रादुर्भाव के लिए ही सही, उससे जुड़े लोगों का संवेदनशील होना ही पर्याप्त नहीं रहता। धर्म, राजनीति और अर्थ का जब पतन होना प्रारम्भ होता है तो वह प्रत्येक सामाजिक की संवेदना को प्रभावित करता है। सारा समाज अपनी-अपनी रुचि और प्रकृति के अनुरूप विभिन्न गुटों में बँट जाता है। धार्मिक प्रकृति के लोग राजनीतिक और आर्थिक पतन को, आर्थिक प्रकृति के लोग धार्मिक और राजनीतिक पतन को तथा राजनीतिक प्रकृति के लोग धार्मिक व आर्थिक पतन को सारे पतन का कारण बताने व सिद्ध करने में जुट जाते हैं। चौपाल हो या घर-बाज़ार, जहाँ चार लोग जुड़े, अपना और देश-समाज का रोना शुरू। यह रोना-धोना शनैः शनैः रोचक व रंजक बनाया जाने लगता है और इस प्रक्रिया में सच के साथ कुछ कल्पना(आम बोलचाल की भाषा में ‘झूठ’) भी आ जुड़ती है। किस्से और अफवाहें इसी तरह जन्मते हैं। ‘कथा’ की व्यापक परिभाषा में रोचक, रंजक या विषादपूर्ण शैली में रोना-धोना कहने वाले ये सारे सामाजिक ‘कथाकार’ हैं। ‘संवेदनशीलता’ इससे अलग किसी अन्य आयाम को प्रकट नहीं करती। समाज के चप्पे-चप्पे, रेशे-रेशे और अच्छी-बुरी हर हरकत पर नजर रखने वाले ये ‘कथाकार’ सब-के-सब लेखक तो नहीं बन जाते। इसलिए ऐसा मानना कि जो कथाकार जितना अधिक संवेदनशील होगा, वह समाज से उतने ही अधिक कथानक अपनी लघुकथाओं के लिए चुन सकता है, तर्कसंगत नहीं है। संवेदनशील होना किसी कथाकार को लघुकथाकार बना देगा, ऐसा नहीं है। समाज के जो-जो अन्तर्विरोध किसी सामाजिक की संवेदना को प्रभावित करके उसकी चेतना को आन्दोलित करते हैं, आधिकारिक रूप से केवल उन-उन पर ही वह बोल या लिख सकता है। अतः ‘लघुकथा’ लिखने के लिए कथाकार को कथानक के चुनाव हेतु संवेदनाओं की चिमटी लेकर अखबारों, जंगलों और बाजारों की खाक छानने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है—चेतना को आन्दोलित, जागृत रखने की। चेतना जितनी अधिक प्रखर होगी, लेखनी उतनी ही मुखर होगी। संवेदनशीलता वैचारिकता को जन्म देती है, जबकि आन्दोलन विचारपूर्ण क्रियाशीलता को। समकालीन लघुकथा विचारपूर्ण क्रियाशीलता की उपज है, न कि वैचारिकता की। अपने संदर्भ में, इसका यह गुण ‘कथा’ की इसी व्याख्या की माँग करता है। उपन्यास और कहानी की भले ही ये अपेक्षाएँ न हों। इन दोनों कथा-विधाओं से लघुकथा के अलगाव का यह एक बिन्दु है।
कथानक और शैली ‘लघुकथा’ के आवश्यक अवयव तो हो सकते हैं, तत्व नहीं। तत्व अपनी चेतना में एक पूर्ण इकाई है। ‘मूलत्व’ इसका गुण (प्रोपर्टी) है। लघुकथा का मूल-तत्व है—‘वस्तु’, जो कि प्रत्येक कथा-विधा का है। ‘वस्तु’ को जनहितार्थ सरल, रोचक, रंजक और संप्रेष्य बनाकर प्रस्तुत करने के लिए कथाकार कथानक की रचना कर उसको माध्यम बनाता है। जैसे, पुराण-कथाओं के पीछे ‘वस्तु’रूप में वेद-ॠचाएँ अथवा वैदिक-सूत्र ही हैं। किसी भी कथा-विधा की तरह ही लघुकथा की भी ‘वस्तु’ आत्मा है, कथानक हृदय, शिल्प शरीर और शैली आचरण, जिसके माध्यम से पाठक को वह अपनी ग्राह्यता के प्रति आकर्षित करती है। तात्पर्य यह कि ‘लघुकथा’ में कथानक, शिल्प और शैली ‘वस्तु’ को सम्प्रेष्य और प्रभावी बनाने वाले अवयव हैं, तत्व नहीं।
जहाँ तक शैली का प्रश्न है, वह सिर्फ ‘स्टाइल’ नहीं, ‘मैनर’ भी है। मैनर यानी शिष्टता। लघुकथा में, शब्दों को उनकी प्रभपणता के अनुरूप प्रयोग करने की शिष्टता का लेखक में विद्यमान रहना उतना ही आवश्यक है जितना किसी जिम्मेदार नागरिक में आचरण की शिष्टता का होना आवश्यक होता है। भाषा को उसकी सहज प्रवहमण्यता और लयबद्धता के साथ प्रस्तुत करने की शिष्टता व ज्ञान का लघुकथाकार में होना अपेक्षित है। यही नहीं, बल्कि यह भी कि लघुकथा का पात्र अपने स्तर, स्थिति और परिवेश से अलग भाषा तो नहीं बोल रहा है; कि उसका आचरण लघुकथा में उसके चरित्र से भिन्न किसी अन्य दिशा में तो अग्रसर नहीं है; कि पात्र के मुख से लेखक स्वयं तो नहीं बोलने लगा है(अर्थात् मानवोत्थानिक सन्देश तो नहीं देने लगा है!); तथा यह भी कि पात्र और कथा दोनों को पीछे धकेलकर अपनी लेखकीय हैसियत/उपस्थिति, अपने अस्तित्व की याद दिलाने के लिए(अर्थात् वही मानवोत्थानिक सन्देश या फिर जनवाद/प्रगतिवाद का आरोपण करने के लिए) वह स्वयं तो नहीं आ धमका है। बहुत-सी बातें हैं, जो शैली के ‘मैनर’ वाले अर्थ की ओर इंगित करती हैं। लघुकथा के संदर्भ में ‘स्टाइल’ की तुलना में शैली का यही तात्पर्य श्रेयस्कर है। ‘स्टाइल’ बघारने का जमाना उपन्यास, कहानी और काव्यादि लेखन का वह जमाना था जब रचना का आम बोलचाल से अलग भारी-भरकम शब्दों/शब्द-युग्मों, अलंकारों व मुहावरों से लदा होना ही उसकी स्तरीयता का प्रमाण हुआ करता था। रचनात्मक हिन्दी-साहित्य ने उस जमाने को काव्य में मुख्यतः गोस्वामी तुलसीदास(‘रामचरित मानस’) तथा कहानी-उपन्यास में प्रेमचंद की रचनाओं के द्वारा तोड़-मरोड़ कर साहित्येतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया है। साहित्य का समकालीन दौर सहजता और (ऊपर बताई गई) शिष्टता का दौर है, ‘स्टाइल’ बघारने का नहीं। (शेष आगामी अंक में)

शहर और सहारा
विपिन जैन

हर सप्ताह उसका मनीआर्डर घर पहुँच जाता था। सन्देश के स्थान पर लिखा होता था—माँ, तेरा ही खिलाया-पिलाया काम आ रहा है।
घर पर माँ पढ़ती तो खुशी में डूबकर सोचने लगती—उसने सबका मन मारकर, अपना तन गलाकर उसे यूँ ही गबरू-जवान नहीं बनाया था। मेहनत तो उसके खून की एक-एक बूँद में मिली हुई है।
खून बेचकर जब भी वह अस्पताल से बाहर निकलता, उसकी जेब में सौ रुपए होते थे। कुछ अपने खर्च के लिए रख लेता और बाकी गाँव में घर भेज देता था, जहाँ उसकी माँ व दो छोटे भाई-बहन उसके मनीआर्डर की राह देखते होते थे। पर, इस बार डाक्टर ने कह दिया था कि उसके अन्दर इतना खून ही नहीं है कि कुछ निकाला भी जा सके। एक दिन फिर वह भूख और शहर से लड़ता हुआ हारकर गाँव को लौट आया।
घर पहुँचा, तो माँ की आँखें उसकी पीली-काली छाया वाली सूरत देख विस्मय और भय से उसे पहचानने से मना करती रहीं। आँसुओं ने ही कुछ शब्द बिखेरे—“तू तो काम की खातिर…”
वह खोया-सा उसे देखने लगा था। फिर, मुश्किल-से कह पाया—“तू ठीक कहती थी माँ, शहर खून चूस लेता है।”


चोटमिथलेश कुमारी मिश्र(डा0)

बास ने अपनी स्टेनो को बुलाया। उसके आते ही उसने पूछा, “तुम आज हमारे चैम्बर में क्यों नहीं आईं?”
यह प्रश्न सुनकर उसने कहा, “चूँकि सर, आप अपनी आराम-चेअर पर सो रहे थे, इसलिए…मैं आकर लौट गयी…आपको डिस्टर्ब नहीं किया…।”
“क्यों?”
“सर, किसी सोये हुए को जगाना मैनर एंड एटीकेट्स के विरुद्ध है…फिर, आप तो बास हैं…।”
यह सुनकर बास का सीना चौड़ा हो गया…वह एक बास है। उसने तुरन्त ही अपने को सँभाला…यह उसने कैसे कह दिया…मैं आफिस यानी आन-ड्यूटी सो रहा था…शिकायत यदि ऊपर तक पहुँच गयी, तो क्या होगा? यह प्रश्न दिमाग में आते ही वह सतर्क हो उठा और उसने उसे डपटते हुए कहा, “क्या कह रही हो! मैं और आराम-चेअर पर सो रहा था!…मैं तो जग रहा था, समझी!”
“सर, क्षमा करेंगे… जगे हुए को जगाना तो और-मुश्किल है।” यह कहकर वह जैसे-ही लौटने लगी, बास के स्वर ने उसका पीछा किया और वह रुक गयी।
“सर, आपने कुछ कहा?”
“देख नहीं रही हो…आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है…और तुमने मेरा हाल तक नहीं पूछा।”
यह बात सुनकर वह सोचने लगी कि बास की तबीयत खराब है…या क्या है? दूसरे, यह हाल-चाल पूछना तो ड्यूटी का हिस्सा नहीं है। फिर भी उसने कहा, “सर, मुझे मालूम नहीं था…आपने कहलवा दिया होता…मैं तो कल शाम आप द्वारा डिक्टेट कराए पत्रों का उत्तर ही टाइप कर रही थी।”
“अभी-अभी मुझे मालूम हुआ कि तुम किसी को गले लगाकर रो रही थीं…क्या यह सच है?”
उसने कुछ क्षण सोचा…फिर याद आते ही उसने कहा, “हाँ, सच है। वह हमारे हेड-आफिस के खुराना साहेब की पत्नी थी, जो अपने पिता की चर्चा आने पर उनका स्मरण करके रो रही थी…उन्हें सांत्वना देते हुए…मेरी आँखों में भी आँसू आ गये थे…चूँकि मेरे पिता भी नहीं हैं।…मुझे उनकी स्मृति हो आयी थी…सर, आपको शायद ऐसा दुःख अभी तक कभी झेलना नहीं पड़ा है न?”
बास ग्लानि में धँस गया और वह अपनी सीट की ओर बढ़ गयी।

नीचे वाली चिटकनी
जसबीर चावला

अब बहनजी, क्या बताऊँ, मेरे तो पसीने छूट रहे थे। मैं बार-बार रामजी की आरती पढ़े जाऊँ…बोलूँ—हे भगवान, आज मेरी इज्जत तू ही बचा। तूने द्रोपदी की लाज रखी मुरारी! यह विपदा टाल।…और उधर वे मुए दरवाजा लात-घूसों से पीटे जाएँ…पीटे जाएँ…भला हो उस बहन का जो पटणे उतरने से पहले समझा गयी थी—‘यह इलाका खतरनाक है भेणे! केबिन बंद कर लीजिए। आपने इतने गहने पहन रखे हैं और अकेली मायके जा रही हैं। इधर तो गुण्डे-बदमाश खिड़की से कान की बालियाँ तक नोंचकर ले जाते हैं।’…उसके उतरते ही मैं अकेली रह गयी थी। मैंने खिड़कियाँ गिरा लीं और केबिन की ऊपरली चिटखनी लगा दी। रात हो गयी थी बहनजी, और मेरी छाती रेल के साथ धक-धक मिला रही थी। मैंने चूड़ियाँ और हार उतारके पेटी में बन्द कर दिये और मुँह-सिर लपेटकर पड़ गयी।
अगले स्टेशन पर कोई आया और दरवाजा पीट, बक-झींक कर दफा हो गया। मैंने बहनजी, पानी तक के लिए केबिन नहीं खोला।
हर स्टेशन पर बहनजी, वही ठोंक-पीट…भले लोगो! यही केबिन बचा है…? दूसरे इत्ते हैं, किसी में जगह ले लो! मुझे तो लगे…वो पटणे वाली भैंणजी ही अपने यारों को बता गयी हैं—इस जनानी के पास माल बहुत है…पीछे लग जाओ!
आखिर बहनजी, गयी रात का टैम होगा…ऐसा लगा—वे मुए दरवाजा तोड़ देंगे। बोले—‘हम पुलिसवाले हैं…खोलो!’…और कौन नहीं जाने बहन, डाके पुलिसवालों के भेष में पड़ते हैं…मैं तो थर-थर काँपने लगी। रामजी की सौगंध, आरती पढ़ मैंने तो नीचे वाली चिटखनी भी लगा दी!


हनुमान बना जगतार
सुदर्शन वशिष्ठ

पी कर बहुत सच्ची बात करता था जगतार।
रामलीला के समय वह हनुमान बनता था। मोटा-तगड़ा था। दशहरे के दिन जब गदा लिये चलता तो पूरा हनुमान लगता। औरतें और बच्चे उससे बहुत डरते थे।
“माई! मैं एह सारे रावण मार देणे।“ रात को थका-हारा घर आने पर वह बोल उठा।
“मार देईं पुत्तर।” माँ बोली।
“माई! तू नी जाणदी। सेक्रेटरिएट विच सारे रावण, मेघनाद ते कुम्भकर्ण कट्ठे होए हन। रावण लोकां नूं खा रहे। कुम्भकर्ण दिनभर सुत्ते रैंहदे, मेघनाद उधम मचाए रखदे।”
“ठीक है पुत्तरा।” माँ हुंकारा भरती।
“ओए मादर्…मारो इन्हां नूं।” उसने गदा घुमाई।
“जगतरिया! गाला क्यूँ कढ़ दिया। हनुमान बणया है, कुझ तां शरम कर मूरखा। वड्डे अफसर वड्डे ही हुंदे पुत्तर।”
“ओए, चुप कर ओए मादर…।”
“मूरखा गाला न कढ। जय श्रीराम बोल।”
“चुप कर ओए। एह ना बुला मेरे तों। माई! एह ना बुला मेरे तों।” कहता लुढ़क गया जगतार।

नासूर
धीरेन्द्र शर्मा

-सूचना देकर भी कल नहीं आये, मैं दिन-भर इन्तजार करती रही।
-किया होगा।
-कभी तुम्हें करना पड़े तो पता चले।
-यह सब मेरे वश का रोग नहीं, फालतू नहीं हूँ।
-मैं फालतू हूँ क्या?
-मैं नहीं जानता।
-तुम कैसे होते जा रहे हो!
-तुम्हारा बेकार का भ्रम है।
-अब हमारे बीच क्या प्रेम नहीं, भ्रम ही रह गया है?
-मैं कब कहता हूँ, तुम ही कह रही हो।
-आखिर तुम भी तो कुछ कहोगे!
-मेरा सर मत खाओ, कोई और बात करो।
-हम कब तक कुँवारा प्रेम निभायेंगे? तुम्हारे घर के लोगों ने शादी की कौन-सी तारीख निश्चित की?
-अपने पापा-मम्मी से पूछ लो।
-उनसे क्या पूछूँ?
-अपना सर।
-तुम इस तरह के जवाब क्यों देते हो?
-मेरा मन।
-मन के माफिक बोलने का हक़ तुम्हें ही है, मुझे नहीं?
-नहीं।
-क्यों?
-आखिर मैं एक मर्द हूँ, और तुम एक औरत।


परिवर्तनअशोक लव
“तुमने उसका साथ छोड़कर अच्छा नहीं किया।”
“क्यों?”
“वह तुम्हें सच्चे मन से प्यार करता था।”
“मैंने भी उसे सच्चे मन से प्यार किया था।”
“फिर उसे छोड़ क्यों दिया?”
कला-संकाय के पास वाली दुकान आ गयी। सिगरेट लेने रुक गया।
“तुम कौन-सी लोगी?”
“कोई भी ले लो, पर फिल्टर लेना।”
दुकानदार से दो विल्स लीं। साथ टगी जलती रस्सी के सिरे से सिगरेट सुलगाई। उसने मेरी सिगरेट से अपनी सिगरेट सुलगाई। हम मिराँडा हाउस कालेज की ओर बढ़ चले।
“तुमने बताया नहीं?”
“क्या?”
“उसे छोड़ क्यों दिया? उसने तुम्हें लेकर न जाने कितने सपने सजा रखे थे।”
“इसीलिए तो। मैं अभी-से बँधना नहीं चाहती थी।”
“तुम्हारी नजर में प्यार का इतना ही महत्व है? उसने तुम्हें मन की गहराइयों से प्यार किया था। ऐसे मित्र का साथ छोड़ना…”
“मैंने भी उसे प्यार किया था। प्यार का अर्थ सारा जीवन संग-संग जीना नहीं है। मैंने उसके प्यार का बदला तन-मन से दिया था। मेरे पास जो भी था, सब… सब उसे दिया था। तुम क्या इसे कम समझते हो?” उसने मुँह से धुँआ छोड़ते हुए कहा।
“कल मेरे लिए भी तुम इन्ही शब्दों का प्रयोग करोगी?”
“और क्या! कल उसका था, आज तुम्हारा। कल का क्या पता?”
सिगरेट की जलती आँच से अँगुलियाँ झुलस गयीं।

हादसा
गीता डोगरा मीनू
जब उसे अदालत लाया गया तो उसके चेहरे पर न खौफ था, न ही किसी किस्म की कोई घबराहट। हाँ, आँखों में उदासी की झलक जरूर थी।
सवालों के सिलसिले की औपचारिकता के तहत उसने कसम ले ली। वकील आगे बढ़ा, “तुम पर इल्जाम है कि तुमने नवविवाहित जोड़े को ट्रक से कुचल डाला।”
“जी, मैंने तभी मान लिया था, जब अपने आप को कानून के हवाले किया था।”
“क्या यह सही है कि वह नवविवाहित जोड़ा ठीक दिशा में चल रहा था?”
“जी हाँ।”
“और तुम्हारा ट्रक भी?”
“जी…”
“इसका मतलब यह हुआ कि तुमने जान-बूझकर उसे कुचल डाला।”
“जी।”
“तुम बता सकते हो कि तुमने ऐसा क्यों किया?”
“मुझे खुद नहीं मालूम वकील साहब।”
“क्या तुम उन लोगों को जानते थे?”
“हाँ साब, पिछले पाँच महीने सामने से उस लड़की को ठीक एक ही वक्त पर, उसी होटल के सामने से गुजरता देखता रहा था।”
“पर…उस होटल के सामने से हजारों लोग गुजरते हैं…!”
“पर, सब लोगों से तो मैं मुहब्बत नहीं करता। मेरा वो खुदा सब लोगों से अलग था।” वह हाँफने लगा।
“ओह, तो वह लड़की भी तुमसे…?”
“नहीं साब, उसे तो इल्म भी न था कि कोई तपती दोपहरी में, होटल के बाहर सिर्फ इसलिए खड़ा रहता था कि उसे एक झलक देखना था।”
“मगर कोई अपने खुदा को इस तरह तो नहीं मार डालता?…तुमने…।”
“जी हाँ, मैंने उसे मार डाला। पिछले पन्द्रह दिनों से मैं उसे देख नहीं सका; और उस दिन अचानक जब शादी के जोड़े में देखा तो बर्दाश्त न कर पाया और एकाएक मुझे न जाने क्या हुआ कि मैंने उसे…कुचल…।” कहता हुआ वह फूट-फूट कर रो पड़ा।