Thursday, 29 October 2015

रुटीन विषय अब सामयिक नहीं रहे—सुभाष नीरव



कथाकार-अनुवादक सुभाष नीरव से डॉ (श्रीमती) नीरज शर्मा की बातचीत

कथा साहित्य के बीच लघुकथा की वर्तमान स्थिति, स्थान व उसके उन्नयन  से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर वरिष्ठ कथाकार व पंजाबी-हिन्दी अनुवादक श्री सुभाष नीरव जी से वनिका पब्लिकेशन्स की वरिष्ठ संपादिका डॉ (श्रीमती) नीरज शर्मा ने एक लम्बी बातचीत रिकॉर्ड की। यहाँ प्रस्तुत हैं उस वीडियो रिकॉर्डिंग के कुछ महत्वपूर्ण अंश :

सुभाष नीरव
डॉ॰ नीरज शर्मा
नीरज शर्मा—नीरव जी, आठवें दशक को लघुकथा का स्वर्ण काल कहा जाता है। उस काल की तुलना में आप आज की लघुकथा को कहाँ खड़ा पाते हैं?
सुभाष नीरव—मैं पाता हूँ कि वर्तमान में जो लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं वे अपने नए समाज, नए समय के दबाव के मद्देनज़र लिखी जा रही हैं। जब समय में बदलाव आता है तब समाज और जीवन से जुड़े यथार्थ में भी बदलाव आता है। पहले की तुलना में यथार्थ अब जटिल हुआ है, बल्कि  जटिलतर होता जा रहा है। जब रचनाकार की हैसियत से मुठभेड़ जटिलतर होते जा रहे इस यथार्थ से होती है, तो हमारी रचनाओं में एक दबाव होता है, जो रचना के आकार, प्रकार, सोच, मंतव्य में भी अंतर लाता है। आज के हिसाब से देखेंगी तो उस दौर की लघुकथाओं में से आप कई लघुकथाओं को निकालकर बाहर कर देंगी। आज की विसंगतियाँ चुनौती बनकर खड़ी हैं हमारे सामने। वैश्वीकरण, भौगोलिक परिस्थितियाँ, बाज़ारवाद, आर्थिक मंदी जैसे भीमकाय विषयों का दबाव है आम आदमी पर व एक संवेदनशील लेखक पर भी। अब नए विषय हैं , रुटीन विषय सामयिक नहीं रहे। जटिल यथार्थ को यदि आप पुराने फ्रेम में कहना चाहेंगे तो फ्रेम छोटा पड़ेगा।
नीरज शर्मा—आपने क्या प्रयोग किए हैं इन जटिल विषयों को लघुकथा में ढालने सम्बन्धी…?
सुभाष नीरव—मेरी एक लघुकथा है –‘मकड़ी’ । जब मैंने यह लिखी तब मुझसे कहा गया कि इतने विस्तृत विषय को लघुकथा वहन नहीं कर पाएगी। मैंने कहा प्रयोग करने में क्या हर्ज़ है! मैंने प्रयोग किया व आधुनिक क्रेडिट कार्ड जैसे बड़े बाज़ारवाद के विषय को सफलतापूर्वक लिख पाया लघुकथा के फ्रेम में। तात्पर्य यह है कि आज के जटिल विषयों को लघुकथा में शामिल करने के लिए प्रयोग करने की हिम्मत करना ज़रूरी है। लघुकथा यही प्रयोग आज के समय में माँग रही है। वहाँ यह नहीं देखना है कि लघुकथा अधिक शब्दों में लिखी है या  दो खंडों की बात क्यों आ गई । मैं मानता हूँ कि  लघुकथा—संक्षिप्तता व सूक्ष्मता में बड़ी बात संवेदना के स्तर पर प्रगट करना है। जब नए दबाव आते हैं तब यदि आप इन विषयों  को सहजता से लघुकथा में कह सकते हैं तो अवश्य प्रयोग करना चाहिए।  नए लोग यदि इस काम को करते हैं तो नाक—भौं नहीं सिकोड़ना चाहिए, आलोचना नहीं करनी चाहिए; बल्कि उन्हें स्वीकार करना, प्रोत्साहित करना चाहिए। तभी हम भविष्य की लघुकथा में नया चेहरा, नई शक्ल, व नए अर्थ तलाश पाएँगे।
नीरज शर्मा—आपने पंजाबी व हिन्दी की लघुकथा का तुलनात्मक अध्ययन किया है। पंजाबी लघुकथा के सामने हिन्दी की लघुकथा को आप कहाँ खड़ा पाते हैं?
सुभाष नीरव—मेरी “मां बोली” पंजाबी है। जब मैंने लिखना शुरू किया तब पंजाब में ऐसे समर्पित लेखक थे जो केवल लघुकथा ही लिख रहे थे व लघुकथा के हित की बात ही करते थे। वे स्तंभ कहलाते थे पंजाबी लघुकथा के। डॉ श्याम सुन्दर दीप्ति , श्याम सुन्दर अग्रवाल, हमदर्द वीर नौशहरवी, सुलक्खन मीत, शरण मक्कड़ वगैरह। ये सिरमौर थे लघुकथा विधा के। उन्होंने समर्पित भाव से नई पीढ़ी तैयार की लघुकथा के क्षेत्र में।  वहीं हिन्दी में यदि पिछले दस साल में देखें तो मुझे दो लघुकथाकार बड़ी मुश्किल से मिलते हैं जिनके अपने एकल लघुकथा संग्रह आए हों। यथार्थ के धरातल पर नए लघुकथाकर तैयार करने के लिए कोई खास काम नहीं हो रहा है।
पंजाब में लघुकथा को लेकर राज्य, जिला व शहरी स्तर पर कार्यशालाएँ आयोजित की जाती रही हैं, जिसका हिन्दी में अभाव देखने को मिलता है। यहाँ हिन्दी लघुकथा पंजाबी लघुकथा से कहीं पीछे है।
हिन्दी में नए लेखकों ने पुराना लेखन पढ़ा नहीं है, इसलिए वो बहुत अच्छा नहीं लिख पा रहे हैं।
नीरज शर्मा—क्या आप मानते  हैं, आजकल सोशल मीडिया ब्लॉग व फेसबुक के माध्यम से बाढ़-सी आ गई है लघुकथा लेखन में?
सुभाष नीरव—मैं ऐसा नहीं मानता। जो बाढ़ अस्सी के दशक में थी, वो आज नहीं है। पत्रिकाएँ भी मददगार थीं उन दिनों। आधुनिक प्लेटफॉर्म को देखकर लगता है कि बाढ़-सी आ गई है, किन्तु वह बाढ़ नहीं है, वह लेखन का स्तर नहीं है। यह ऐसा माध्यम है जहाँ कोई संपादक ही नहीं है। फेसबुक पर ऐसा नहीं है कि अच्छी लघुकथाएँ नहीं आ रही हैं , पर बहुत कम संख्या में अच्छी लघुकथाएँ आ रही हैं।
नीरज शर्मा—क्या उनके पास अच्छे लेखन के लिए पैमाने नहीं हैं या वो उन्हें जानते नहीं हैं?
सुभाष नीरव—हम यह नहीं कह सकते कि नए लेखकों के पास लेखन के लिए कोई पैमाने नहीं है।
लघुकथा ने इतनी लम्बी यात्रा की है, इतने पैमाने बन चुके हैं, मापदंड तय हो चुके हैं कि यदि किसी में लेखन का जज़्बा है तो उसे बरकरार रखने के लिए उसे इतिहास में जाना जरूरी है।  वर्तमान के आगे  भविष्य व पीछे अतीत है। पीछे इतिहास है व भविष्य की ओर जाना है।  वर्तमान में जीते व्यक्ति को यह जानना भी जरूरी है कि हमें विरासत में क्या मिला है। नए लघुकथाकारों के पास पैमाने हैं, पर वो उन्हें जानना ही नहीं चाहते। वो तुरत-फुरत बस लिख डालना चाहते हैं।
नीरज शर्मा—नए लघुकथाकारों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
सुभाष नीरव—नए लोगों में कम उम्र ही नहीं पचास-साठ की उम्र के व्यक्ति भी हैं। साहित्यकार राजेन्द्र यादव जी कहा करते थे कि  साहित्य की दुनिया में प्रवेश के लिए दरवाज़ा बहुत छोटा होता है, इसमें झुककर ही निकलना पड़ता है, पर नई पीढ़ी सीधा निकलना चाहती है,  झुकना नहीं चाहती। वो नहीं चाहती कि कोई अग्रज उन्हें रोकें, टोकें। उनमें धैर्य या संयम नहीं है। यदि वो अपने अंदर यह माद्दा पैदा कर लें, थोड़ा पिछला इतिहास पढ़ लें, अग्रजों की बातों का संज्ञान लें, तो मुझे उनकी रचनात्मकता में कोई संदेह नहीं है।
नीरज शर्मा—लघुकथा लेखन में सुधार के लिए क्या किया जाना चाहिए?
सुभाष नीरव—इसके लिए नियमित रूप से, देश के विभिन्न प्रांतों में, कार्यशालाओं का आयोजन किया जाना चाहिए। यहाँ विस्तार से लघुकथा लेखन के पैमानों, मापदंडों के बारे में विचार साझा किए जाने चाहिए। लघुकथा की पुस्तकों के प्रकाशन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। नए लेखकों को अग्रजों द्वारा उचित मार्गदर्शन मिले तो कई अच्छे लघुकथाकार तैयार हो सकते हैं।

                                                                 साभार : 'अविराम साहित्यिकी' (लघुकथा विशेषांक,  अक्टूबर-दिसम्बर 2015)
                                                 
सम्पर्क :  डॉ॰ (श्रीमती( नीरज शर्मा, सरल कुटीर,  आर्य नगर,  नई बस्ती बिजनौर-246701   मो-09412713640

                          सुभाष नीरव, आर. ज़ेड. एफ,  30ए, दूसरी मंज़िल, प्राचीन काली माता मंदिर  के  पीछे, नाला पार, सृष्टि केमिस्ट के ऊपर, वेस्ट सागरपुर, नई दिल्ली – 110046 मो-09810534373


Sunday, 25 October 2015

खेमकरण ‘सोमन’ की चार लघुकथाएँ

(1) इनसान

दंगे ने पूरे शहर को चपेट में ले लिया था, और वह अपनी जान बचाकर भाग रहा था। परन्तु ज्यादा दूर तक भाग न सका। सामने ही दस-पन्द्रह दंगाई खड़े थे। वह अन्दर तक काँप गया।
"क्या नाम है तुम्हारा?" उनमें से एक दंगाई ने पूछा।
"मेरा........मेरा नाम रहीम है।" वह घबराया, "मुझे जाने दो।"
"ओह, ये तो अपनी ही जाति-बिरादरी का है।" उन दंगाइयों में से वही पहला बोला, "ठीक है जाओ। निकल जाओ।"
वह आगे बढ़ा और सोच में पड़ गया। अभी बमुश्किल तीन-चार गलियाँ ही फाँदा होगा कि सामने ही दूसरे गुट के दर्जनों दंगाई हथियार लिए खड़े थे।
"क्या नाम है तुम्हारा?" उनमें से एक दंगाई ने पूछा।
"मेरा........मेरा नाम राम है।" वह घबराया, "मुझे जाने दो।"
"ओह, ये तो अपनी ही जाति-बिरादरी का है।" उन दंगाइयों में से वही पहला बोला, "ठीक है जाओ। जल्दी निकल जाओ।"
अब तो वह और भी गहरी सोच में पड़ गया। सोचता हुआ अभी कुछ ही दूर चला था कि तुरन्त भागता हुआ आया और दंगाइयों के सामने खड़ा हो गया।
"माफ करना।"  उसके चेहरे से डर के सारे भाव गायब थे। जोर से बोला, "मेरा कोई भी नाम नहीं है और न ही कोई धर्म है। मैं तो बस एक इनसान हूँ। हाँ, सबसे पहले एक इनसान।"
"इनसान है तो साले ये ले!" झट दूसरे दंगाई ने उसके पेट में तलवार घुसेड़ दी। तीसरे दंगाई ने एक जोरदार लात मारी। वह वहीं छटपटा कर दम तोड़ गया।


(2)  बंजरभूमि

लड़का छब्बीस साल का था और लड़की चैबीस साल की। दोनों ही रिसर्च स्काॅलर थे। दोनों में जबरदस्त प्यार था। दोनों साथ रहते थे।
लड़की ने अपने घर वालों को बता दिया कि ऐसी-ऐसी बात है, ये दिन ये रात है। घर वाले भी बहुत खुश हुए। लड़की के पिताजी ने कहा, ‘‘लड़का दूसरी जाति का, इससे हमें कोई समस्या नहीं है। हमें बेहद खुशी है कि हमारी बच्ची ने एक सही जीवन साथी की खोज की है।’’
एक दिन लड़के ने लड़की से कहा, ‘‘अवन्तिका, मुझे उस दिन का इन्तजार है जब हमारी शादी होगी। तुम्हारे पिताजी मुझे अच्छा-खासा दहेज देंगे। तब मैं अपने बहुत-से सपने साकार कर पाऊँगा। मैं अपने बल पर कुछ करना चाहता हूँ!’’
लड़के की बात सुनकर लड़की आहत हुई। उसने लड़के को ध्यान से देखा। वह उसे बंजरभूमि समान नजर आया। हाँ! उस भूमि की तरह, जो उपजाऊ होने का स्वाद नहीं जानती।
उसने उसी दिन एक बड़ा निर्णय लिया।


(3)  बहुत हुआ

शाम ढले एकाएक रोशनी का भभूका-सा उठा। जब तक कोई कुछ समझ पाता, तब तक बाहरी बस्ती में लाइन से खड़ी सातों झुग्गियाँ राख के ढेर में तब्दील हो चुकी थीें। कई मजदूरिनें तो 'माई…ऽ…बापू…ऽ…' डकराती हुई पछाड़ खाकर जमीन पर लोट-पोट होने लगीं और बेहोश हो गयीं। उनकी जमा-पूँजी, अन्न-अनाज सब-कुछ खत्म हो चुका था।
धीरे-धीरे रात घिरने लगी। छोटे-छोटे बच्चे बिना खाये-पीये ही सो गये; लेकिन युवा और वृद्ध मजदूरों की आँखों में नींद दूर-दूर तक न थी। हाँ! पानी जरूर था। सभी एक जगह मिल-बैठकर इस विपत्ति का हल खोजने की बातें कर रहे थे।
उनके बैठने से कुछ ही दूरी पर  मिट्टी की दीवारों वाले कुछ पुराने-से खुले-खुले मकान थे। ठंडी हवा का हल्का-सा झोंका आते ही, उनमें से एक के अन्दर से आवाज आनी शुरू हुई--"बहुत हुआ! बहुत हुआ! अब सहना मुश्किल है। मुझसे तो देखा नहीं जाता! बेटा, जल्दी से रजाई, दरी, चद्दर और कपड़े निकालो। आटा-चावल, सब्जी--जो मिले, सिर पर रखो। सर्दी बढ़ रही है।"
यह आवाज बाकी घरों ने भी सुनी। बतियाते मजदूरों ने घने अंधकार से निकलकर अपनी ओर बढ़ते कुछ सायों को देखा।

(4)    पावर वाले
उसने देखा कि इस समय वह आम जनता के बीच में खड़ा है।
दूसरी तरफ नंगे लोगों की एक विशाल फौज खड़ी है। शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं; बल्कि कपड़ों की जगह अजीबो-गरीब कीड़े रेंग रहे थे। उसे और आम जनता को देखकर नंगे लोग एक दूसरे के पीछे छिपने-छिपाने की कोशिश करने लगे।
वह जोर से चिल्लाया,‘‘अरे हरामियो! अब तुम सबको शर्म आ रही है! अब चेहरा छुपा रहे हो! कुत्तो!, जिस देश में रहते हो, जनमते हो, उसी देश को कंगाल कर देते हो। जनता भूखी-प्यासी मर जाती है और तुम सब उन्हीं के पैसों से फाइव स्टार होटलों में बेशर्मी के साथ रातें गर्म करते हो! देश का सारा पैसा लूटकर अपने घर में और विदेशी बैंकों में डाल रहे हो। अरे! पढ़े-लिखे युवाओं को भी छल-बल से सेना बनाकर अपने पीछे घूमाते-फिराते हो। उन्हें धोखे मेें रखते हो। मैंने कहा था न कि एक दिन तुम जैसे नेताओं को तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी! नंगे पड़े रहोगे। कीड़े पड़ेंगे। और देख लो… आज चेहरा भी दिखाने लायक नहीें बचे हो! थू...थू है तुम सब पर!’’
‘‘अरे भाई, किस पर थू-थू कर रहे हो?" उसके पिताजी ने उसे नींद से जगा दिया और बोले, ‘‘इतना पढ़-लिखकर भी तुम बेरोजगार हो! ऊपर से गलत-सलत सपने भी देखते रहते हो। अब उठो भी...देखो...बाहर वो नेताजी आये हैं। जाओ, चुनाव में उनके प्रचार-प्रसार के लिए दिन-रात एक कर दो। दयादृष्टि बनी रहेगी तो जल्दी ही कहीं सेटलमेण्ट करवा देेंगे। बहुत पावर वाले हैं। नहीं, तो घूमते ही रहोगे इधर-उधर जीवन भर!’’
‘‘बस पिताजी!’’ वह गुस्से में उबल पड़ा, ‘‘इसी दिन के लिए पढ़ाया था आपने मुझे कि सेना बनकर घूमता रहूँ इनका! जाकर कह दीजिए इनसे, भाग जायें तुरन्त; वरना एक-एक का सिर फोड़ डालूँगा!’’
पिताजी शीघ्र ही कमरे से बाहर निकल गये।


खेमकरण ‘सोमन’
जन्मतिथि: 02 जून 1984
जन्मस्थान: भूरारानी, रुद्रपुर, जिला: ऊधम सिंह नगर (उत्तराखण्ड)
शिक्षा      : एम.ए. (हिन्दी), बी.एड., टीईटी, यूसेट, यू.जी.सी. नेट/जे.आर.एफ.

प्रकाशित रचनाएँ: कथादेश, कथाक्रम, नया ज्ञानोदय, लमही, वर्तमान साहित्य, अलाव, अक्सर, पाठ, सर्वनाम, संरचना, उत्तरा महिला पत्रिका, दैनिक जागरण, कृति ओर, अविराम साहित्यिकी, आधारशिला, आजकल, अमर उजाला और प्रतिश्रुति इत्यादि पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, लघुकथा और आलोचना प्रकाशित व इन दिनों पहले कविता संग्रह की तैयारी
सम्प्राप्ति:
* दैनिक जागरण द्वारा कहानी ‘लड़की पसंद है’ पर युवा रचनाकार प्रोत्साहन  पुरस्कार
* कथादेश अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता 2012 द्वारा लघुकथा ‘अन्तिम चारा’ को तृतीय पुरस्कार

सम्प्रति: शोधछात्र व स्वतऩ्त्र लेखन

सम्पर्क: द्वारा बुलकी साहनी, प्रथम कुंज, ग्राम व पोस्ट- भूरारानी, रुद्रपुर, जिला--ऊधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड-263153   /      मो.: 09012666896, 09045022156    
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