Thursday, 1 October 2015

विभा रश्मि की लघुकथाएँ

10 जुलाई 2015 को श्रीमती विभा रश्मि की चार लघुकथाएँ 'जनगाथा' पर पोस्ट की थीं। आज प्रस्तुत हैं उनकी कुछ और लघुकथाएँ। उनके अनुसार, इनमें से कुछ पूर्व प्रकाशित लघुकथाओं का उन्होंने पुनर्लेखन किया है तथा कुछ ताजा लिखी, अभी तक अप्रकाशित भी हैं। 
॥ 1 ॥ हथेली पे उगता सूरज
अभी भोर नहीं हुई थी कि पहाड़ी गाँवों में धरती ज़लज़ले से काँप उठी। धमाकों के साथ कच्चे-पक्के निर्माण ध्वस्त हो गये। कुदरत का तांडव व तबाही का दिल दहलाता मंज़र..।
त्रासदी से बचेे रहवासी बार-बार धरा के कंपन और भूस्खलन से भयातुर हो पगलाये से सुरक्षित आश्रय तलाशते रहे।
सामूहिक चिताओं के सुलगते ही मानवता का दर्द फूट आसमाँ की आँखों से भी बहने लगा, चिताओं के जलने और दवाओं की दुर्गंध सर्द हवा में ठहर सी गई थी।
तबाही के इस मंज़र को कैमरे में कै़द करने की, देसी-विदेशी मीडिया कर्मियों में होड़-सी लगी थी।
दुखिया माँ-बेटी, मलबे में तब्दील अपने आशियाने के निकट तीन दिनों से बैठीं थीं। उसके सपने चिताओं के संग भस्म हो चुके थे।
उस औरत की गठरी में वितरित किये गये भोजन के पैकेटों को  उसकी नन्हीं बेटी बिखेरने का खेल खेलने की जि़द कर रोने लगती।
''धल चल ना'' नन्हीं की जि़द।
पर कहाँ था उसका आशियाना? माता-पिता व पति की याद कर वो मलबे की ओर देख, मुँह में आँचल ठूँस फफक पड़ी.....।
धीरे-से खिसककर वो अपने घर के मलबे के सामने जा बैठी। तभी नन्हीं एक ईंट का टुकड़ा उठा लाई। माइती की बाँह पकड़ गोद में चढ़ गई और ईंट का टुकड़ा उसे थमा दिया।
"ले मइती ! धल ले ले ...ले तेला धल।’’
ईंट को कस के थामकर उसने स्वयं को अपने घर की चौखट पर खड़ा पाया...।
बेटी को गोद में समेट कर वो बुदबुदा उठी--'फिर बाँधूंगी घर....।’                   

॥2॥ अंधेरा
डाॅक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची शांत नहीं हुई। ‘‘कित्ते पैसे हुए इन मुई लाल-पीली गोलियों के?’’
दाम सुनकर चच्ची ने बुर्के का पर्दा उलट दिया , ’’इत्ती ज़रा-ज़रा सी गोलियों के दो सौ रूपइए, लूट मच रही है लूट, अरी तू पैदा क्यों हुई मरी..!’’
पलट कर चच्ची ने शन्नो का झोंटा खींच दिया, वह ‘उई अम्मा’ कह, कराह कर रोने लगी।
      चच्ची की आंँखों से आग बरस रही थी। बेटी की तरफ़ मुड़ कर वह फिर चीख़ने लगीं, ‘‘ज़ीनत की बच्ची से वसूलूँगी सारे पैसे..... वही मरने आयी थी नल पे.....झगड़ा मुझ से था.बाल्टी खेंच मारी शन्नों के....नीचे के दाँत तो बिल्कुल गये। ज़रा-सी बच्ची बिलबिला गयी..कित्ता जुलम।’’
      ‘‘अरी चोप्प कर भली मानस, सड़क पर च्यों गला फाड़े है।’’
सकीना चच्ची को खींचकर सड़क पर ले आयी।  उसका बढ़ा हुआ हाथ झटक कर चच्ची बोली, ‘‘मैं च्यों चुप्प करूँ! क्या पता था ,मेरा बदला चुड़ैल औलाद से निकालेगी, अब तो आॅपरेशन होगा। कै दी है, दो हज़ार रूपये की चपत पड़ेगी........खाँसे लाऊँ....डाका डालूँ या कुँए में कूद जाऊँ....?’’
      चच्ची फिर शुरू हो गयी, ‘‘ऐसे ही हमारे चूल्हे औंधे पड़े हैं, उनके चूल्हे तो मटियाले हो रहे हैं...उनके ख़सम जवान बैठे हैं...ला-लाकर खिला देंगे......।.भाग तो हमारे ही फूटने थे, कौन लायेगा कमा कर......भरी जवानी में शराब की लत ले धँसी!’’
अपने शराबी खाविंद को याद कर वो गालियाँ देती रही।
      शन्नो डर कर  सकीना से लिपट गयी। उसकी ललछोई आँखों में भय छिपा बैठा था। धोबियों का मुहल्ला पार कर के वो अपनी सरहद में पहुँच गयी थी।
ओसारे में खाट पर दवाइयों को पटक कर चच्ची जीनत से लड़ने चल पड़ीं। शन्नों को लगा इस बार वे अपने दांँत भी तुड़वा कर लौटेंगी..। अकेली जायेंगी और...ज़ीनत का पूरा कुनबा टूट पड़ेगा।
      अम्मी के ओझल होते ही शन्नो दर्द के मारे रो पड़ीं।
उसके चोट से टूटे दाँत कम, भूख से बिलबिलाती आँतें ज़्यादा दुख रही थीं। उसने सोचा....बाजी की तरह वह भी अंधे कुएँ में कूदकर जान दे देगी।
पर अम्मी,नानी से कहे थीं कि  अंधा कुआँ बड़ा गहरा था, जिसमें....।
                   
॥3॥ भरोसा         
हाइवे पे बने ताया के ढाबे के पीछे कबाड़ में जिंदो का छोटा पुत्तर तीन दिनों से नशे में बेसुध पड़ा था। उसने गाँव वापस जाने से साफ़ इंकार कर दिया था।
बड़ा पुत्तर कनाडा जा बसा था। पैसे भी भेज देता था।
जब से छोटा झूठ बोलने और पैसे चुराने लगा था पापा जी की नाराज़गी और सख़्ती उस पर बढ़ गई थी...।
फ़ेल होने के कारण आखि़र स्कूल से उसे प्रताडि़त कर निकाल दिया गया।
घर में पापा जी की मार और सख़्ती से डर वो घर से भाग ताई के ढाबे में आ टिका था। कलह और तमाशे के डर से जिंदो बेटे को दिल ही दिल में याद कर लेती।
      आवारा निखट्टू लड़कों ने दोस्ती के बहाने उसका हाथ थामा और नशे का आदि बना  दिया। अब उनकी कुसंगति में  नशे की सूइयाँ चुभो कर जिंदो का पुत्तर अपनी बाजू छलनी कर के पड़ा रहता ।
      ढाबे में दिन भर ग्राहकों की चहल-पहल रहती।बाहर मंजियों पे ग्राहक बैठे-लेटे रहते।
      ताई बड़ी जिगरा वाली थी।
ढाबे के इर्द-गिर्द मँडराते नशेडि़यों को ताई बेंत से पीट के खदेड़ती। कबाड़ में छिपा कर रखी नशीली पुडि़यों को वो कचरे में फेंक आती।
      रोट्टी खा लै... ताई रोटी-दाल के लिये उसे झिंझोड़ कर उठाती।
अनुभवी ताई जान गई थी कि मुंडे नू भरोसे ते प्यार दी लोड़ हैग्गी.....।
ढाबे में एक तरफ ख़राब पडे़ टी.वी. को जिंदो के निकम्मे बेटे ने ठीक कर के चला दिया । ताया को  तो यकीन हीं न हुआ। पर ताई ने उसके सिर पे हाथ फेरा .... वो गुमसुम सा पिछवाड़े जा कर फिर सो गया।
एक सुबह...ताया बड़े ख़ुश थे ।
सुण नी....कल्ल पुत्तर नू मत्था टिकाण गुरुद्वारे लै चलांगे अस्सी......मुंडे नू कोई समझ नहीं पाया... वाहेि-गुरु दी जो मर्जी...।
हुण वाहे गुरु दी किरपा से बच्चे दा सुख साड्डे नसीब-ते. ..।
ताया ने ऊपर आकाश की ओर देख कर तसल्ली की गहरी साँस ली।

॥4॥ रिश्ता
  श्रावन की पूनो आने में अभी वक़्त था।सकीना आपा का पूरा परिवार राखियाँ बनाने में जुटा था।हमारे छोटे शहर में उसकी बनाई खूबसूरत राखियाँ खूब धूम मचातीं। हमेशा की तरह इस बार भी काफ़ी बड़ा आॅडर मिला था।हालाँकि बाज़ार में प्रतिस्पर्धा कम न थी।
तीन दिनों से सकीना आपा बुख़ार से निढाल थीं।हालत बिगड़ी तो अस्पताल में जाँच के बाद भर्ती होना पड़ा। उन्हें ख़ून चढ़ रहा था। डाॅक्टर का कहना था कि जब तक प्लेटलेट्स सामान्य नहीं आ जाते उन्हें छुट्टी नहीं मिलेगी।अली मुंबई पढ़ने चला गया वर्ना वो सारी भाग -दौड़ कर लेता।
      सबके हाथ-पाँव फूल गये।ऐसे आड़े वक्त में बड़ी फूफी और उनकी बेटियाँ आगे आयीं। दिन-रात एक करके कर्मठ अँगुलियाँ मनमोहक स्नेहसूत्र बनाने में जुट गयीं।
      सकीना आपा की सकुशल घर लौट आने की खु़़़शी दोगुनी हो गई, जब फूफी ने गले लगा के राखियों का आॅर्डर पूरा कर लेने की सुखद ख़बर सुनाई।
      लक्ष्मी स्टोर वाले अपना आॅडर उठाने आ पहुँचे थे। सकीना आपा ने देरी के लिये
माफ़ी माँगते हुए पहली राखी उसकी कलाई पर बाँध दी। तभी मोबाइल बज उठा।
अली का फ़ोन था । सकीना आपा बिस्तर पे बैठ गयीं और मोबाइल कान से सटा अली को इधर के हाल बताने लगीं। 
’’मैं ठीक हूँ ,राखियों का आॅर्डर फूफी ने पूरा किया, खु़दा की रहमत ...।’’
कमरा मिला?’’
’’अभी दोस्तों के साथ कमरा शेयर कर रहा हूँ , अम्मी! मेरा नाम ही परेशानी का सबब ....।वर्ना अब तक इतनी मुसीबत...कोई बात नहीं, मिल कर रह लेंगे।आप अपनी सेहत संभालें अम्मी...।‘‘
सक़ीना दुपट्टे से आँखें पोंछने लगी तो राखियों के डिब्बों को थैलों में सजाते हुए लक्ष्मी स्टोर वाले के बेटे ने सवालों से भरी निगाह से आपा को देखा। 
वे बोल पड़ीं -’’कमज़ोरी से आँखें ना जाने क्यों बार-बार पनिया रहीं ....।’’वे वाक्य  पूरा नहीं कर पायीं....।

    ॥5॥ मिठास                
कंकूबाई किचन में दोपहर का भोजन पका रही थी। स्कूल की छुट्टी के कारण बाई का छोकरा भी साथ आया था।आज वो रसोईघर के बाहर चुपचाप बैठा मेधा मेमसाब को अपने बेटे को नाश्ता खिलाते बड़े कौतुहल से देख रहा था।
 डायनिंग टेबल पर फ्रूट बास्केट में ढेर सारे दशहरी और अल्फ़ांज़ो आम सजे थे। कंकूबाई के बेटे की निगाह बार-बार डायनिंग टेबल पर फ्रूट बास्केट में रखे रसीले आमों में उलझ जाती। मेधा ने उसकी हसरत भरी निगाहें पकड़ लीं।
 आमों को मेधा ने कपड़े से ढक दिया। बेटे को खिलाने के लिये आम की    फाँकें प्लेट में सजाईं और उसे भी खींच कर भीतर कमरे में ले गई....।
      कुछ बरस बीत गये। गर्मी की उमस भरी दोपहर में मेधा के द्वार की घंटी बज उठी।
रसोईघर से गीले हाथ डस्टर से पोंछते हुए मेधा ने द्वार खोला तो एक नौजवान को मुस्कराते खड़ा पाया।
‘‘किससे मिलना है?’’
‘‘मेधा लोखंडे मेमसाब से,मेरी आई ,कंकूबाई नाम था,वो खाना बनाती थी इस घर में’’।
आगंतुक युवक ने मेधा को पहचान लिया और पैर स्पर्श करने झुका पर मेधा ने उसे बीच में हीं रोक लिया।
युवक ने अपना पूरा परिचय दिया-’’मैं कंकूबाई का बेटा रत्तू ,हाँ आई बीमार रहती है....।मैं बाजू वाली रोड के साथ में मद्रासी होटल के रसोड़े में काम पे लग गया हूँ।’’
मेधा ने उसे पहचान कर प्रश्न उछाल दिया, ‘‘कंकूबाई कैसी है?’’
’’ठीक नहीं है...अब मैं कमाई करता हूँ, आई आराम करती है।’’
      उसने कलाई घड़ी में समय देखा और बोल पड़ा-‘‘जास्ती देर हो गया।’’
अपने हाथ में थामे पोलिथिन के बंडल को उसने इतने़े आदर सेे मेधा को थमाया कि वो उसे अस्वीकार न कर सकी।
’’ये ख़ास आपके बेटे के लिये, पहली पगार में से छोटा सा कुछ..,ना नहीं बोलने का मेमसाब। ’’ वो मुंबइकर की तरह बोल रहा था।
उसके जाते ही मेन डोर बंद कर मेधा ने पैकेट खोल कर देखा, उसमें  रसीले दशहरी आम महक रहे थे।
 

विभा रश्मि

जन्म—यू॰पी॰ में 1952
शिक्षा—एम॰ ए॰ बी॰एड॰ कोलकाता एवं राजस्थान विश्वविद्यालय।
प्रकाशन—प्रथम कहानी ‘उपहार’  1974 में कलकत्ता से प्रकाशित। कहानी संग्रह ‘अकाल ग्रस्त रिश्ते’ (1976) कोलकाता से प्रकाशित।
सारिका, कथायात्रा, मधुमति, साहित्य गुंजन, जगमग दीप ज्योति, बस्तर पाति, साहित्य नेस्ट, कुतुबनुमा आदि देश के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत प्रकाशन। कहानियों का आकाशवाणी से 1985 से निरंतर प्रसारण। विभिन्न कविता व लघुकथा संग्रहों में कविताएँ एवं लघुकथाएँ प्रकाशित। ‘कुहू तू बोल’ हाइकु संग्रह प्रेस में।  कविता संग्रह व लघुकथा संग्रह पर कार्य ।
फेस बुक पर ‘सरस्वती दीप साहित्य हाइकु ताँका’ के अंतर्गत  व हिन्दी हाइकु साहित्य नेट मैग्ज़ीन में हाइकु प्रकाशित।
सेंट मेरीज़ कान्वेंट से अवकाश प्राप्त।
पुरस्कार व सम्मान—सर्वश्रेष्ठ शिक्षिका 1995, कोलकाता में महाविद्यालयी कविता लेखन प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार,  सामाजिक कार्यए अंधविद्यालय में  सेवाकार्य व कहानी सुनाना। राजस्थान लेखिका सम्मेलनों में पत्रवाचन व भागीदारी।
संप्रति—स्वतंत्र लेखन।
मो॰नं॰ — 09414296536

Sunday, 6 September 2015

नए पैरोकारों की भूलभुलइया में लघुकथा / श्याम सुन्दर अग्रवाल

प्राकृतिक भूलभुलइयाँ                                                      चित्र : आकाश अग्रवाल



विगत 2 सितम्बर 2015 को भाई बलराम अग्रवाल के ब्लॉग ‘जनगाथा’ पर पोस्ट हुआ माननीय डॉ. पुरुषोत्तम दुबे जी का आलेख ‘हिन्दी लघुकथा का ‘दिल्ली दरवाजा’ पढ़ा। बलराम अग्रवाल ने इस आलेख का लिंक फेसबुक पर‘लघुकथा साहित्य’ समूह पर भी डाला। शायद इसी कारण फेसबुक पर सक्रिय बहुत से लेखक-आलोचक इसे पढ़ सके। इस आलेख के माध्यम से दिल्ली के लघुकथाकारों व लघुकथा साहित्य के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए कार्य से परिचित करवाने के लिए माननीय डॉ. पुरुषोत्तम दुबे जी व बलराम अग्रवाल का बहुत-बहुत धन्यवाद।
अपने उक्त आलेख के अंत मे डॉ. पुरुषोत्तम दुबे लिखते हैं:
‘प्रस्तुत आलेख का पटाक्षेप करने से पूर्व बजरिये इसी आलेख के वर्तमान हिन्दी लघुकथा के रूप-स्वरूप पर नये सिरे से बहस-मुबाहिसा की बात स्थापित लघुकथाकारों से करना चाहता हूँ। गोकि आजकल ताबड़तोड़ लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं। किसी विधा पर किया जाने वाला अधिकाधिक लेखन ही उस विधा को विनाश का फलक भी देता है। वर्चस्वशुदा लघुकथाकार अपने बेबाक वक्तव्यों से लघुकथा में कदम रखने वाले नवागन्तुकों को सचेत करें। गोकि फूहड़ और स्तरहीन लघुकथाओं के संग्रह/संकलन की भूमिका लिखने से बचें। लघुकथा लेखन की दिशा में प्रवेश करने के निमित्त हिन्दी लघुकथा का ‘दिल्ली दरवाजा’ खुला हुआ है। हिन्दी लघुकथा लेखन की वैतरणी पार करने के लिए हम दिल्ली के लघुकथाकारों को जानें, समझें, पहचानें। कम-अज-कम उनको पढ़ें, उनके अवदानों को समीप से देखें। लघुकथा के प्रति उनकी रागात्मक संवेदना अथवा संवेदनात्मक राग पर विचार करें। यही शुभ-सोच लघुकथा विधा को मानक प्रदान करेगी।’
मुझे ऐसा लगता है कि डॉ. पुरुषोत्तम दुबे के आलेख का यह अंतिम पैरा कुछ लेखकों-आलोचकों को परेशान कर रहा है। इसी पैरा से आहत दिख रहे माननीय योगराज प्रभाकर जी ने दिनांक 4 सितम्बर को ‘लघुकथा साहित्य’समूह पर ही अपना उग्र आक्रोश एक छोटी-सी आलेखात्मक पोस्ट द्वारा जाहिर किया। मेरे विचार में साहित्य के क्षेत्र में हर व्यक्ति के, चाहे वह लेखक हो, पाठक हो या आलोचक हो, अपने विचार होते हैं। अपना अनुभव होता है। सभी को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है। मेरी निगाह में डॉ. दुबे के आलेख में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे लगता हो कि वे लघुकथा का अहित चाहते हैं। ‘लघुकथा उन्नयन’ के लिए डॉ. दुबे का मार्ग योगराज प्रभाकर जी के मार्ग से अलग हो सकता है। भारत की आज़ादी के लिए महात्मा गाँधी अपने ढंग से लड़े और भगतसिंह-चंद्रशेखर आदि अपने ढंग से। दोनों के ही योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।
मेरे विचार में ‘ताबड़तोड़’ तो वहीं लिखा जाlता है, जहाँ नियम या तो तय नहीं है या फिर अनुशासनहीनता होती है। छंदबद्ध कविता से छंद रहित कविता अधिक लिखी जा रही है जिसका नाम लेने भर से आज का प्रकाशक भाग खड़ा होता है। ग़ज़ल का मापदण्ड तो और भी सख्त है फिर भी बहुत से संपादक अपनी पत्रिका में उसे छापने से मना कर देते हैं। हाइकू को 5-7-5 के पैमाने से हटकर लिखिए, फिर पता चलेगा कि उस हाइकूकार का कितना स्वागत होता है। हाइकू के क्षेत्र में भी सक्रिय संपादक अनाड़ी लेखकों के हाइकू रद्दी की टोकरी में डाल रहे हैं।
अपनी पोस्ट में माननीय योगराज प्रभाकर जी जिसे‘जुमा-जुमा आठ दिन’ कहते हैं वे आठ दिन पचास नहीं तो पेंतालीस वर्ष तो हो ही गए हैं। लगभग आधी सदी का बीत जाना बहुत अधिक नहीं, तो बहुत कम समय भी नहीं होता। ‘नवांकुरों को नज़रंदाज़ करो’ जैसी बात न दुबे जी ने अपने आलेख में कही, न मेरे विचार में कोई और कह रहा है। बात तो लेखन की है व्यक्ति की नहीं। डॉ. दुबे ने लिखा है—‘फूहड़ और स्तरहीन लघुकथाओं के संग्रह/संकलन की भूमिका लिखने से बचें।’और अगर वरिष्ठ जन इससे नहीं बचेंगे तो प्रभाकर जी जैसे प्रखर समीक्षकों को सदैव यह कहने का अवसर मिलेगा कि ‘साहित्यिक गलियारों में लघुकथा को आज भी चुटकुला कहने और माननेवालों की कमी नहीं है।’
मेरे विचार में न तो कोई किसी के लिखने पर पाबंदी लगा सकता है और न ही उसे निरुत्साहित कर सकता है। जिस लेखन में दम है, उसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। डॉ. पुरुषोत्तम दुबे भी अपने आलेख मे लिखते हैं—‘खेमेबाजियाँ और झण्डाबरदारी के आरोप-प्रत्यारोप कब और किस युग में नहीं लगे? लेकिन परिपक्व लेखन पर क्या कभी कोई उँगली उठ सकी है?’
एक बात के लिए मैँ माननीय योगराज प्रभाकर जी को धन्यवाद देना चाहता हूँ। उनकी यह पोस्ट पढ़कर बहुत-से लघुकथाकारों ने अपने मन की बात कह दी, जिसे कहने में उससे पहले वे थोड़ी झिझक महसूस कर रहे होंगे। इन रचनाकारों की टिप्पणियों को देखकर मुझे लघुकथाकारों को दो भागों में बाँटना पड़ेगा। पहले मुझ जैसे,जो पिछले 30-35-40 साल से लघुकथा लेखन में हैं, इन्हें मैं केवल उम्र व अनुभव के लिहाज से ही ‘सीनियर’ कह लेता हूँ। दूसरे वे, जो गत कुछ माह से लेकर चार-पाँच वर्षों से ही लघुकथाएँ लिख रहे हैं। उन्हें केवल उम्र व अनुभव के आधार पर ही अगर मैं ‘जूनियर’ कह दूँ तो शायद ही किसी को एतराज होगा।
यहाँ ‘जूनियर्स’ की टिप्पणियों से ऐसा आभास हो रहा है कि ‘सीनियर्स’ उनका मार्गदर्शन न कर ‘उत्साहमर्दन’ कर रहे हैं। सीनियर्स द्वारा किसी-किसी की तो अच्छी-भली स्तरीय लघुकथाओं का ही गला घोंट दिया जा रहा है। भेदभाव के आरोप भी लग रहे हैं। मुझे तो ऐसा लगा जैसे यहाँ ‘जूनियर’ही ‘सीनियर’ का मार्गदर्शन कर रहे हैं, समझा रहे हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए, कैसे करना चाहिए! मुझे तो लगता है कि वे लघुकथा विधा के बारे में सीनियर्स से अधिक जानते हैं। माननीय सुमीत चौधरी की निम्न टिप्पणी मेरी बात की गवाही दे रही है—‘मुझे तो लगता है कई नवोदित रचनाकार इन स्थापित रचनाकारों से अच्छा लिख रहे हैं...बहुत सारे स्थापित रचनाकार लघुकथा लेखन में उनकी जैसे इच्छा तोड़-मरोड़ कर लिखते जा रहे हैं... कई पुस्तकें/रचनाएँ इसकी गवाह है...उनके द्वारा लघुकथा का रूप भी बिगड़ रहा है... नवोदित कहीं लघुकथा लेखन में स्थापित को  पीछे न छोड़ दें तो मन में डर तो स्वाभाविक ही है.... आदरणीय योगराज जी सर सही कह रहे हैं... उनकी इस बात को हम सभी की सहमति है...’
 फेसबुक पर ‘लघुकथा साहित्य’ से अलग भी लघुकथा के कई समूह सक्रिय हैं और जहाँ तक मेरी जानकारी हैं उनके सदस्यों की संख्या ‘लघुकथा साहित्य’ समूह के सदस्यों की संख्या के मुकाबले बीसगुना तक अधिक है। वहाँ पर पोस्ट रचनाओं को यहाँ के सदस्यों की कुल संख्या से कहीं अधिक लेखक-आलोचक पढ़ते हैं, चार-पाँच सौ तक ‘लाइक’ का बटन दबाने वाले होते हैं और सौ से अधिक टिप्पणियाँ भी हो जाती हैं। मेरे विचार में जिन लेखकों को लगता है कि ‘लघुकथा साहित्य’ पर उनकी रचनाओं से ठीक व्यवहार नहीं हो रहा, सही मार्गदर्शन नहीं हो रहा, उन्हें इस समूह पर अपनी रचनाएँ पोस्ट करनी ही नहीं चाहिएँ। वहाँ उनका ठीक से मार्गदर्शन तो होगा ही उन्हे मानसिक संतोष भी मिलेगा। जिस गली, घर, समूह में मेरी बात न सुनी जाती हो, मेरा अनादर होता हो, अपनी गली, मोहल्ले के उस घर या समूह में जाना मैं तो पसंद नहीं करता।
अंत में यही कहूँगा कि अगर हम पड़ोसी के घर जाकर परिवार के मुखिया को यह समझाएँगे कि उसे अपना घर कैसे चलाना चाहिए, तो सोच सकते हैं कि वह हमें क्या समझेगा।
                                                         -0-
      सम्पर्क : 575, प्रताप सिंह नगर, निकट दशमेश पब्लिक स्कूल, कोटकपूरा (पंजाब)                         मो॰ : +919478047837