Saturday, 27 August, 2022

रामदेव धुरंधर (बेल ऐर, मारीशस ) की छः लघुकथायें

अंधकार

मैं स्वयं नहीं जानता, कब निराशा या विचलन जैसी दुर्भावनाएँ मुझे घेर बैठती हैं और मैं इनका इस तरह से कैदी हो जाता हूँ कि शायद इनसे बाहर निकलने के लिए मेरा अपना कोई विकल्प होता ही न हो। यह अनजाने में हो जाता हो, तो इस पर मेरा कोई वश हो नहीं सकता। परंतु इतना तय है कि मैं इनसे लड़ता हूँ। जीत तो इनकी अकसर होती है, लेकिन जीत मेरी भी होती है। जीत होने पर मैं गहन आत्मतोष का अनुभव करता हूँ। हार जाने पर मेरे कहने के लिए शेष इतना ही रह जाता है कि मनुष्य हूँ, निराशा और विचलन मेरे अस्तित्व के हिस्से हो सकते हैं। पर यह ज़हर होता नहीं है कि मैं मर जाऊँ। इसे जीने का एक नाम जीवन भी है।

उस दिन निराशा या विचलन जैसी कोई बात नहीं थी। सवाल था तो बस अंधकार का। मैं बड़े मनोयोग से अपने प्रकाश-वृत्त में खड़ा था कि देखा अंधकार का एक विशाल भभका मेरी ओर बढ़ता चला आ रहा था। मैं एक ही झटके में इस सोच पर पहुँच गया था कि यह अंधकार मुझे और मेरे प्रकाश को तो लील ही जायेगा। पर यह मेरी जल्दी की सोच हुई थी। यह अंधकार न मुझे लीलता और न मेरे प्रकाश को अस्त-व्यस्त करता, बल्कि यह अंधकार तो अपना प्रकाश ढूँढ़ रहा था।

अनचाही

धनवान चोर ने चोरी से जितना कुछ अपने यहाँ जमा कर रखा था, पागल होने पर वह सब उसके हाथ से निकलने लगा। वहाँ के लोग भी उस चोर की तरह धनवान ही थे। इन सबका धन विपुल था। पर सच कहते हैं, धन किसके वश में होता है। धनवानों के सुनने में जब आया कि धनवान चोर पागल हो गया है और उसके यहाँ से कुछ पाया जा सकता है, तो उन्होंने वहाँ के लिए कूच कर दिया। वहाँ से कोई सोना लेकर भागा और जिसे सोना न मिला, तो चाँदी लेकर जाने में उसने संतोष किया। पैसा तो लोग भर-भर जेबें ले गये। आंगन के फूल-पौधों की लूट के लिए मानी तूफानी कोलाहल मचा हुआ था। ढेर सारा सामान ले जाना था, तो धनवानों को लॉरी की आवश्यकता पड़ी।

धनवान चोर ने गरीबों के 'दुःख' नाम के गाँव से दुःख भी चुराये थे। इन दुःखों को कोई धनवान लूटने के लिए भूल से भी हाथ आगे न बढ़ाता, बल्कि वे लात मारकर दुःखों को यहीं छोड़ते। पर यहाँ रहने के लिए संभावना न होने से दुःखों को स्वयं जाना तो पड़ता। लूट के उस दौर में दुःखों को भागने का स्वतः रास्ता मिल गया। इन दुःखों ने भागने की प्रक्रिया में एक ही झटके में अपनी मंज़िल पा ली थी। ये 'दुःख' नाम के जिस गाँव से यहाँ चोरी में आये थे, उसी गाँव के लिए चल दिये।

राष्ट्रगीत 

वर्षों अंग्रेजों की ओर से देश संचालित होता रहा। लंबे संघर्ष के बाद अब देश आजाद हुआ था। एक तिथि निर्धारित हुई, देश का अपना झंडा आकाश में फहरता और अंग्रेजों का झंडा उतरता। मिस्टर सोहेल, जो देश का ख्यात कवि था, उससे राष्ट्रगीत लिखवाया जाता। इस सूचना ने उसे अभिभूत किया। उसके भीतर राष्ट्रप्रेम उमड़ आया। उसने सोच लिया, ऐसा भावभीना राष्ट्रगीत लिखेगा कि सदा रहने वाले देश में उसका नाम भी अमर रह जायेगा। इस काम के लिए उसके पास अग्रिम पैसा पहुँचने वाला था. लेकिन यहाँ से बात बिगड़ी। सोहेल अंग्रेजी भाषा का उपासक था। अंग्रेजी भाषा के होते उसने अंग्रेजों का यश भी तो बहुत गाया। उसकी अनेक ऐसी कविताएँ हुईं, जिनमें उसके अंग्रेज-परस्त विचार झिलमिल करते हों। इस बात को लेकर देश में लहर उठी और सोहेल को राष्ट्रगीत से अलग कर दिया गया। उसे बहुत क्रोध आया। उसने अपने राष्ट्रप्रेम की दुहाई देकर फोन से इधर-उधर पता लगाकर देख लिया, लेकिन राष्ट्रगीत लिखने का संयोग उसके हाथ से निकल जाने पर अब कुछ हो न पाया।

आजाद देश का राष्ट्रगीत लिखा गया। आजाद देश का झंडा आकाश में लहराया। राष्ट्रगीत से झंडे का अभिनन्दन किया गया। देश की इस भव्यता में मिस्टर सोहेल की कहीं भी परछाई दृष्टिगत नहीं हुई। वह राष्ट्रगीत को गाली देने के लिए अपने किसी कोने में पड़ा हुआ था। राष्ट्रप्रेम तो उससे और दूर पड़ गया था।

कान्हा वाली जाति

एक आदमी ने वेश्यावृत्ति के लिए एक घर किराये पर ले रखा था। औरतों को या तो वेश्या बनने के लिए मजबूर किया जाता था या वे स्वयं अपनी गरीबी के कारण वेश्या के रूप में उस वेश्याखाने से जुड़ जाती थीं।

सुनैना नाम की एक औरत इस धंधे में लगी हुई थी। उसने एक रात सोते वक्त एक सपना देखा। वह द्वापर युग के कान्हा की नृत्य-टोली की एक नर्तकी हुआ करती थी। उम्र बड़े प्यार से कट रही थी कि टोली टूट गई थी, क्योंकि कान्हा गोकुल छोड़कर मथुरा चला गया था। बाद में पता चला महाभारत का युद्ध लड़ा गया, जिसमें कान्हा की भूमिका सबसे ऊपर हुई। महाभारत के उस युद्ध में कान्हा इतना असाधारण हुआ कि उसे भगवान माना गया।

उसी जाति का काफिला द्वापर युग से चलते-चलते कलियुग में वेश्या का जीवन जीने वाली सुनैना के द्वार पर आ ठहरा था। उससे दुःखपूर्वक कहा जा रहा था कि तुम अपने को ऐसा बना लोगी, हम यह विश्वास नहीं कर सकते। सुनैना ने उन्हें सुनने पर कहा, "जो मैं हुई, यही तो मेरा पूरा सच हुआ। मैं न जानती थी कि हमारे लोगों की एक जाति हो गई है। अब मैं जान गई। कान्हा जो हमारी जाति का भगवान हुआ, उसे अब रोज़ पूजकर कहूँगी कि अगले जन्म में मुझे मेरी जाति का हिस्सा बना दे।"

सुनैना ने, इतना कहने के बाद भर आई आँखों से उन लोगों को विदा किया। उनके जाते ही वह अपने कमरे की ओर मुड़ने के लिए विवश हो गई। एक मंदिर का महंत उसके कमरे में सहवास के लिए उसका इन्तज़ार कर रहा था।

कंगाली के केन्द्र में

देश की ज़मीन ऊपजाऊ थी। किसान खेत जोतने में कुशल थे। मज़दूर कड़ी मेहनत करते थे। लोग मेहनत की रोटी खाते थे। बेईमानी से बचने की कोशिश की जाती थी। पर आश्चर्य कि इसके बावजूद देश पतन के गर्त में समाता चला जा रहा था।

लोगों ने पता लगाना आवश्यक माना, ऐसे समृद्ध देश की ऐसी हालत क्यों होती चली जा रही है? खोज से पता चला--राजा और रानी इसके अक्षम्य दोषी हैं। राजा ने देश की आय से करोड़ों का सोना खरीदकर अपने महल में छिपा रखा था। रानी साज-सिंगार की इतनी शौकीन थी कि देश की सालाना आय में से काफ़ी प्रतिशत अपने खर्च में उड़ा देती थी। विडंबना इससे भी आगे यह कि इन्होंने देश का करोड़ों पैसा अपने नाम से विदेशी बैंकों में जमा कर रखा था।

ऐसे आत्मकेन्द्रित राजा और रानी से लोग घृणा करने लगे। रानी को बंदी बना लिया गया और राजा को कहीं दूर समुद्री घाटी में काला पानी भुगतने के लिए भेज दिया गया।

गुणों से युक्त जिस आदमी को राजा बनाकर  गद्दी पर बिठाया गया, उसने अपनी ईमानदारी का सच्चा परिचय दिया। देश खुशहाल हुआ; लोगों का आत्मबल बढ़ा; लेकिन दुर्भाग्य कि यह सब कारगर न बन पाया। सत्ताच्युत राजा और रानी ने बेईमानी की जो बुनियाद रख छोड़ी थी, उसके परिणाम में किसान, मज़दूर सब फिसलते गये। देखते-देखते देश नये सिरे से कंगाल।

सच कहते हैं, मानवता, सभ्यता, संस्कृति और आचरण से कोई दूषित हो जाये और उस दूषण में विशेषकर राजा और रानी हों, तो उस देश को संभलने में युग लग जायें या ऐसा भी कि वह देश हमेशा के लिए खत्म हो जाए !

अंधभक्ति

अकूत काले धन के मालिक चरित्रहीन स्वामी ईश्वरानन्द ने अपनी जीवनी में लिखवाया है कि कठोर तपस्या के बाद उसे भगवान के दर्शन हुए थे। भगवान ने उससे कहा था--आधा संसार मांगे, तो उसकी कठोर तपस्या को ध्यान में रखने से इतने बड़े वैभव का वह हकदार है; पर उसने भगवान से आधा संसार न लेकर अपने शरीर के लिए गज-भर ज़मीन ली। वह जहाँ जाये, इतनी-सी ज़मीन उसके साथ रहे। वह अपनी इतनी ही ज़मीन से हाथ बढ़ाकर जनसेवा में अपने को समर्पित रखेगा।

भगवान उसे यह वरदान देकर अंतर्धान हुआ। वह जनसेवा की भावना से चला जा रहा था कि एक आदमी उसके सामने आ खड़ा हुआ था। पर अंदरूनी बात यह थी, कि वह राक्षस था । उस राक्षस ने उसकी जासूसी करके पता लगा लिया था कि वह भगवान से वरदान पाकर लौट रहा है। उस राक्षस ने कहा, उसे काटकर अपने में समा लेगा और स्वयं ईश्वरदर्शी कहलायेगा। पर यह भगवान को स्वीकार न था। भगवान तो चाहता था कि ईश्वरानन्द संसार में तो एक ही हो। भगवान ने स्वयं आकर अपने परम भक्त ईश्वरानन्द को बचाया और उसे धर्म के आसन पर बिठाया।

अपने इस नाटकीय जीवन-चरित के बल पर आज संसार में ईश्वरानन्द के लाखों अनुयायी पाये जाते हैं।

(सभी लघुकथाएँ 'प्राची' वैश्विक लघुकथा विशेषांक, अप्रैल-मई (संयुक्तांक) 2022; सौजन्य संपादक:डॉ. रामनिवास 'मानव' से साभार)

रामदेव धुरंधर 




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