Wednesday, 22 June, 2022

हमशक्ल दोस्त / स्वप्निल श्रीवास्तव

 जीवन वृत्तांत 

  कुछ चीजें हम रखकर भूल जाते है और उसे खोजते रहते हैं। अपनी एक किताब में  ग्रुप फ़ोटो रख दिया था जो वर्षों बाद बरामद हुआ है। किताबों में लोग प्रेमपत्र या सूखे हुए फूल रखते हैं लेकिन मैंने इस फ़ोटो को रख दिया था, इस लिहाज से कि वह सुरक्षित रहे। भले ही यह फ़ोटो  बहुत दिनों बाद मिला लेकिन यह महफूज था। इस ग्रूप फ़ोटो का तीसरा फ़ोटो थोड़ा क्षतिग्रस्त हो चुका था, इससे उन दिनों को याद करने  में कोई कठिनाई नही हुई। यह फ़ोटो हम लोगों के मित्र जगदीश कश्यप की है जिसे मैं लघुकथा का भीष्म पितामह कहता  था। वे लघुकथा की एक पत्रिका मिनीयुग निकालते थे। गाजियाबाद के स्टेशन रोड पर वे नगरपालिका की छोटी सी कोठरी अपना ठिकाना बनाए हुए थे ,उनकी रिहाइश कीर्तनवाली गली में थी। जब मैं वहाँ जाता था तो रेल की सीटी का शोर सुनायी पड़ता था, परिवार के लोग इस आवाज के अभ्यस्त थे। बाहर से आनेवालों को इस असुविधा का सामना करना पड़ता था।

  नगरपालिका की यह  कोठरी, कोठरी नही एक दड़बा था जहां हम दोस्त लोग फड़फड़ाते रहते थे–ज्यादातर दड़बे के बाहर  बैठते थे। उन  दिनों गाजियाबाद धीरे–धीरे विकसित हो रहा था ,जी टी रोड  दस बजे के बाद वीरान होने लगती थी। हाँ, जब सिनेमा का शो छूटता था तो लोग इस तरह हाल से निकलते थे जैसे  बिल से चीटियाँ निकल  रही  हों। क्या पता था कि आठवें दशक का गाजियाबाद एन सी आर का मुख्य केंद्र बन जाएगा और दिल्ली से होड़ लेने लगेगा। जब कभी गाजियाबाद जाता हूँ तो लगता है किसी नये महानगर में आ गया हूँ–इस नगर की संस्कृति बदल चुकी है। केवल शहर नही बदलते उसके साथ लोग भी बदलते हैं–विधाओं में परिवर्तन होते हैं।

    जगदीश कश्यप के साथ उनकी लघुकथा यात्रा में रमेश बतरा, महेश दर्पण, महावीर प्रसाद जैन, बलराम अग्रवाल बेहद सक्रिय थे। इस टोली में लघुकथा में सबसे ज्यादा  सक्रिय बलराम अग्रवाल हैं, उन्होंने आठवे दशक से जो यात्रा शुरू की थी, वह अब  तक जारी है। मैं तो कविता लिखता था लेकिन उनकी सोहबत में लघुकथा लिखने लगा था। उन दिनों लघुकथा की धूम थी। 'सारिका'  ने विश्वप्रसिद्ध कथाकारों की लघुकथाओं पर एक विशेषांक प्रकाशित किया था। भारत यायावर ने अपनी पत्रिका 'नवतारा' का एक अंक (1979) लघुकथा पर केंद्रित किया था जिसमें मेरी और अनिल  जनविजय की लघुकथा शामिल थीं। उन दिनों लघुकथा और लघुकहानी पर खूब विवाद चल रहा था। कुछ लोग लघुकथा को विधा मानने को तैयार नहीं थे। वे  कहते थे कि यह कहानी का संक्षिप्त रूप है।

   जगदीश कश्यप उन लोगों के विरोध में थे जो लघुकथा को विधा मानने को तैयार नहीं थे। वे लंबे–लंबे लेख लिखते थे और अपनी स्थापना के लिए लड़ जाते थे। उनकी आक्रमकता से सभी डरते थे, हर बात पर तुनुक जाते थे। उनके आक्रामक होने के पहले ही मैं उनकी बात मान जाता था और आत्मसमर्पण की मुद्रा में आ जाता था। वे अपनी मूर्खतापूर्ण स्थापनाओ पर अडिग रहते थे। ऐसे अवसरों पर मैं जॉर्ज बर्नाड शॉ के इस वाक्य का सहारा लेता था, उन्होंने कहा था–इट इज बेटर टू कंप्रोमाइज विथ फूल्स (मूर्खों से राजी होने में ही भला है) वे जुनूनी तबीयत के मालिक थे, जो कोई उनसे असहमत होता था, उसकी बखिया उधेड़ देते थे। मुझे याद है कि उन्होंने राजस्थान की एक लघुकथा–लेखिका के खिलाफ एक जेहाद ही छेड़ दिया था। वे चरित्र हनन की सीमा तक उतर आये  थे।

  इसमें कोई संदेह नही कि वे अच्छी लघुकथाएँ लिखते थे। इसके अलावा उनके भीतर एक गुण और  था, वे आशुलिपि के उस्ताद थे। वे लड़कों को ट्यूशन देते थे–उन दिनों  जिन्हें आशुलिपि आती थी, उसकी नौकरी लगभग पक्की हो जाती थी। इसी के बल पर उन्हें डिस्ट्रिक्ट सप्लाई ऑफिस,  गाजियाबाद में स्टेनो की नौकरी मिल गयी थी। उनका जीवन ढर्रे पर आ गया था लेकिन अराजकता ने यहाँ भी उनका पीछा नही छोड़ा। रिश्वत के तौर पर वहाँ उन्हें पीने का रोग लग गया था, वे बेतरह पीते थे। इससे साहित्यिकों के बीच उनकी छवि धूमिल होने लगी और लीवर भी खराब होने लगा था। एक दिन लघुकथा का नायक हमें छोड़कर चला गया–उनकी अराजकता  हमें उनकी मृत्यु से ज्यादा प्रिय थी। हमें हमेशा सहजता प्रिय नहीं होती, कभी-कभार असहज भाव अच्छा लगता है। जगदीश कश्यप जैसे मित्र रस–परिवर्तन करते रहते हैं।

     ***

    अब इस दुखांत प्रकरण से अलग बलराम की  कथा पर आते हैं। बलराम अग्रवाल से मेरी मुलाकात बुलंदशहर में हुई थी। मेरे बॉस ने मुझे मेरठ  कार्यालय से बुलंदशहर  डिस्पैच  कर किया था। वहाँ मेरा काम अखबारों में सरकारी योजनाओं का प्रचार करना था, इस हेतु  वहाँ  सूचना केंद्र खोलना था। मैं इस केंद्र का केयर- टेकर, भिश्ती, चपरासी और डाकिया यानी था।  सूचना केंद्र का सफाई करना, अखबारों और पत्र –पत्रिकाओं को करीने से रखना मेरा दायित्व था।  जिस गली में सूचना केंद्र स्थापित था, बलराम उस गली में रहते थे। यह कवियों की गली थी जिसमें निर्धन और चंचल जैसे कई कवि रहते थे। उन्हें मंचों की शान  समझा जाता था, कविता पढ़ने  के पहले वे आलाप भरते थे और जब तालियाँ बजती तो उनका सदेह कविता–पाठ शुरू हो जाता था। वे गजब के तुकबाज थे, देखते–देखते कवित्त बना देते थे। हम उनका मुंह ताकते रह जाते  थे, यह सिद्धि हमें नहीं प्राप्त थी। बलराम कविताएँ नहीं लिखते  थे लेकिन कविताओं में उनकी रुचि थी। वे गंभीर साहित्य पढ़ते थे। सूचना केंद्र में अखबार और पत्र-पत्रिकाएं आती थी, मैं उस केंद्र को सुबह–शाम खोलता और बंद करता था। यह सूचना केंद्र, केंद्र कम मुशायरों और कवियों का मंच अधिक बन चुका था। अमूमन इसे आठ बजे तक बंद हो जाना चाहिए था, लेकिन यह देर रात तक गुलजार रहता था। शहर में यह अफवाह फैल गयी थी कि मैं भी कविताएँ लिखता हूँ। मुझे सुनने और अपने आपको ज्यादा सुनानेवाले  कवि यहाँ जुटने लगे। मुझे इसके अलावा कई काम करने होते थे, होटल में समय से पहुँचना होता था। अगर देर हो जाती थी तो स्टोव पर कोई पेट-भराव खाना बना लेता था। परांठे या रोटी के साथ आम या  मिरचे के आचार का कोई जोड़ नही। भूख लगने पर हर तरह के खाने में स्वाद आता था।  कभी–कभी अंडे की भुरजी मिल जाए तो क्या कहने–यह बिलासिता तो तनख्वाह के पहले दिन ही संभव थी। मेरी तनख्वाह 175 रुपये महीने थी–इसमें 'नंगा नहाएगा क्या, निचोड़ेगा क्या ?' का मुहावरा याद आता था। माह के पहले हफ्ते में वेतन उड़ जाता था फिर उधार पर भरोसा करना पड़ता था।

  वहाँ मेरी दिनचर्या अलग  थी, मैं दिशा–मैदान के लिए काली नदी जाता था, वहाँ से लौटकर मकान–मालिक के नल पर नहाता था और कपड़े बदल कर आठ बजे सुबह  सूचना केंद्र खोल देता था। सुबह खूब हड़बड़ी होती थी और रात को देर हो जाती थी, इसी के बीच जीवन घूमता रहता था। इसी बीच मेरे बचपन के कवि–नाटककार  मित्र  रवीन्द्र भारती मुझसे मिलने बुलंदशहर आये थे। बलराम और मैं उन्हे लेकर काली नदी ले गये थे, हम लोग  कुछ  देर तक पुल पर टहलते रहे फिर उसके पास के एक सघन बाग में चले आये थे। उस बाग की छाँह अब तक याद हैं। रवीन्द्र भारती जे पी आंदोलन में सक्रिय थे, वे जे पी और रेणु के नजदीक थे। उन्होंने उस आंदोलन की बहुत-सी बातों को साझा किया। दुनिया में मैं कही भी रहूँ वे मुझे  खोज लेते थे। अब उनकी यह आदत छूट गयी है। सब लोग अपनी–अपनी जिंदगी में मशरूफ़ हो गये हैं, लोगों को  अपने लिए वक्त नही मिलता तो गैरों के लिए कहाँ समय मिलेगा।

  उस दौर की फटेहाली और फक्कड़पन खूब याद आता है, उन दिनों को कोई अगर खरीदना चाहे तो मैं किसी कीमत पर नही बेचूँगा। ऐसे दिन अनमोल होते हैं, वे याद रहते हैं।

     आपातकाल के बाद जनता सरकार गठित हो रही थी, यह सत्ता परिवर्तन का समय था। इधर जीवन की  सत्ता  भी बदल रही थी। मुझे दूसरी नौकरी का परवाना मिल चुका था, मैं ट्रेनिंग के लिए लखनऊ पहुँच चुका था, उसके बाद पोस्टिंग होनी थी। मैं यह सोच ही रहा था कि मेरी नियुक्ति गृह जनपद के आसपास होगी लेकिन जब नियुक्ति पत्र मिला तो उस पर पिलखुआ–गाजियाबाद लिखा हुआ था। मुझे तत्काल गाजियाबाद ज्वाइन करना था –मुझे पश्चिमी उ. प्र से अभी मुक्ति नही मिल पायी। बलराम की नौकरी डाक विभाग में लग चुकी थी, इस बार हम लोगों का मिलन स्थल गाजियाबाद बना, वहीं पर लघुकथा के गुरू जगदीश कश्यप मिले। गाजियाबाद में मेरी मुलाकात कथाकार सोमेश्वर और अपने समय के प्रमुख गीतकार कुँवर बेचैन से हुई। वहाँ यदा-कदा  गोष्ठियों का आयोजन होता रहता था ,उसमें नवोदित  कवि आते रहते थे, वे बछड़ों की तरह उछलते–कूदते रहते थे। जिसका कंठ मधुर होता था, उसे अच्छा कवि मान लिया जाता था। हम लोग छंद कविता में पारंगत नहीं थे इसलिए हमें कोई महत्व नहीं मिलता था।

   गाजियाबाद के तीन कस्बे पिलखुआ, गढ़मुक्तेश्वर और हापुड़ में मेरे तीन रचनात्मक साल गुजरे। पिलखुआ रहते हुए संभावना प्रकाशन हापुड़ आना–जाना बना रहा–जब मैनें अपना ठिकाना हापुड़ बनाया तो बलराम वहाँ आते-जाते रहे। उन दिनों रवीन्द्रनाथ त्यागी मेरठ कैंट के इंचार्ज और सर्वे-सर्वा  थे, वे बड़े अधिकारी तो थे ही अपने समय के प्रसिद्ध व्यंगकार थे। उनकी विनोदप्रियता अद्भुत थी , व्यंग के साथ वे कविताएँ भी लिखते थे। हरिशंकर परसाई ने उनसे कहा था कि तुम मुझसे  बड़े लेखक हो क्योंकि तुम व्यंग के साथ कविताएँ भी लिखते हो। आलोचकों की राय उनके बारे में चाहे जो हो,  वे लेखक के  साथ बड़े मनुष्य थे। इतने बड़े ओहदे पर पहुँचने के बाद उन्हें अहंकार छू तक नहीं गया था। वे हापुड़ अपनी गाड़ी से नहीं, पैसेंजर ट्रेन से आते थे। यह सहजता दुर्लभ थी। वहाँ पर उन्होंने अपने उपन्यास 'अपूर्ण कथा' के अध्याय  सुनाए थे जिसे पढ़ते हुए वे जार-जार रोते थे। यह उपन्यास उनके जीवन की दारुण-कथा थी।

    उन्होंने मुझे बलराम के साथ देखकर कहा था कि तुम दोनों हमशक्ल लग रहे हो। यह बात किसी ने नहीं इंगित की थी। फिर तो हम एक-दूसरे को आईने में देखने लग गये थे। हम हमशक्ल भले  ही कुछ कम हों, लेकिन हम दोनों में विचारों की साम्यता जरूर थी। बलराम में अब भी मस्ती बनी हुई है। कुछ साल पहले जब वह फैजाबाद आया था तो यह बात तसदीक हुई। उसके कील–काँटे दुरुस्त थे। 

    कई बार बलराम को गाजियाबाद में देखकर कई लोगों ने मुझसे कहा–आपको गाजियाबाद में देखा है; जबकि मैं उस दिन गाजियाबाद नहीं गया था। अगर हम कुछ नहीं बनते तो अपनी हमशक्ल के कारण जासूसी फिल्मों में चरित्र अभिनेता तो बन ही जाते। फिल्मों में  हमशक्ल बनाये जाते हैं हम तो रूबरू हमशक्ल थे। समय के साथ हमारी शक्ल बदलती जा रही है, हमारे गेट-अप भी बदल गये हैं। वक्त की धूल आईने पर पड़ चुकी है। हमारे चेहरे धुंधले हो चुके है लेकिन एक समय में हम हमशक्ल थे। यह बात बहुत दिलचस्प है।










स्वप्निल श्रीवास्तव 

510 – अवधपुरी कालोनी – अमानीगंज 

फैजाबाद – 224001 

मोबाइल 9415332326


(बाएँ से) स्वप्निल श्रीवास्तव,  बलराम अग्रवाल, जगदीश कश्यप (फोटो:1978)



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