Wednesday, 26 January, 2022

भोलानाथ सिंह की लघुकथाएँ

 1. साम्यवाद

साम्यवाद पर व्याख्यान देने के क्रम में प्रकाशनाथ ने अमीर-गरीब के बीच की खाई को पाटने पर ज़ोर देते हुए कहा‚ "जब तक हम गरीबों को पूरा सम्मान देते हुए गले नहीं लगाएँगे‚ इनके आँसू अपने हाथों से नहीं पोंछेंगे तब तक साम्यवाद पर भाषण देने से कुछ नहीं होगा। आज़ उदाहरण की ज़रूरत है ‚ उपदेश की नहीं।"

तालियों की गड़गड़ाहट थमने में काफ़ी वक्त लगा। प्रकाशनाथ के चेहरे पर बिखरी मुसकान उनके जीत को प्रतिबिंबित कर रही थी। आगामी चुनाव के लिए पृष्ठभूमि तैयार करने में वे जी-जान से लगे हुए थे। कार्यकर्ताओं में भी बड़ा उत्साह था।

थोड़ी देर में सभा बिखरने लगी। मंच भी जनशून्य हो गया। प्रकाशनाथ ने रात्रिभोज का आयोजन किया था। इसमें शहर भर के बड़े अधिकारी एवं व्यापारी निमंत्रित थे। शाकाहार एवं मांसाहार के कई व्यंजन परोसे जा रहे थे।

दीपक आज़ सुने भाषण से बड़ा उत्साहित था। वह मेहमानों को व्यंजन परोसने में अपार आनंद का अनुभव कर रहा था। अचानक मलाईबर्फ़ की एक तश्तरी उसके हाथ से छूटकर सेठ करोड़ीमल की पुत्री सुनयना की गोद में जा गिरी। उसी मेज़ पर प्रकाशनाथ भी बैठे भोजन का लुत्फ़ उठा रहे थे। सुनयना ने विशेष रोष प्रकट नहीं किया पर प्रकाशनाथ का चेहरा तमतमा उठा।

"माफ़ कीजिएगा‚ तश्तरी हाथ से फिसल गई...।" अभी दीपक का वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि प्रकाशनाथ ने भोजन सने हाथ से ही एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया -'चटाक' । दीपक बड़ी मुश्किल से सँभला था।

"सुनयना जी‚ बुरा मत मानिएगा। इन गरीब लोगों को इतनी तमीज़ कहाँ कि ढंग से भोजन परोस भी सकें"‚ कहते हुए प्रकाशनाथ सुनयना को मदमस्त नज़रों से देखे जा रहे थे।

पंडाल के कोने में जाकर दीपक गमछे से अपने आँसू पोंछने लगा।


2.जंगल में लोकतंत्र

लोमड़ सहस्रबुद्धि इस बार भी चुनाव जीत गया था। उसे बधाई देने वालों का ताँता लगा हुआ था। कई रंगे सियार भी आए थे। वनक्षेत्र कई प्रांतों में बँटा था। प्रतिनिधि भी विविध थे। कहीं शेर जीता तो कहीं भालू। कहीं सियार‚ बाघ‚ चीता‚ हाथी‚ अज़गर‚ लकड़बग्घा आदि।

जीत का ज़श्न कई दिनों तक मना। मिठाइयाँ बँटीं। सम्मान समारोह (नागरिक अभिनंदन ) एवं विजय ज़ुलूस की धूम मची रही। निर्धारित तिथि को शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन हुआ। सबने मिलकर शपथ लिया कि वे वन क्षेत्र की एकता‚ अखंडता एवं समृद्धि के लिए काम करेंगे। प्रत्येक जानवर की सेवा में स्वयं को समर्पित कर देंगे। सबको समान अधिकार प्राप्त होगा।

अब आई सरकार बनाने की बारी। सभी स्वतंत्र उम्मीद्वार थे। दलगत समर्पण से उनका कोई वास्ता था नहीं। सब प्रधानमंत्री बनने के दावेदार थे। वैसे भी पहले ही कौन एक-दूसरे के मित्र थे ! थे तो शत्रु ही। मलाईदार विभागों के लिए घमासान मचा हुआ था।

चतुर सियार ने स्थिति की नज़ाकत को भाँपते हुए कहना आरंभ किया - "मित्रों‚ आपस में लड़ना हमें शोभा नहीं देता। अब हम सामान्य से ऊपर हैं। लड़ने का काम सामान्य जानवरों पर छोड़िए। मेरी बात ध्यान से सुनिए। हम सब अब एक ही जाति के हैं - नेता जाति के। हमारी अलग पहचान है न अलग दल।"

 "तो फिर विभागों का बँटवारा कैसे होगा ?"

 "ठीक है‚ हम पर्ची पद्धति से इसका निर्णय लेंगे। एक बात मत भूलिए कि चुनाव निरस्त हुआ तो सबको नुकसान होगा। बुद्धि हो तो हर विभाग मलाईदार बन जाता है।"

पर्ची के माध्यम से विभागों का बँटवारा हो गया। दूसरे दिन कालू भालू एक मोटी सी किताब लेकर दरबार में उपस्थित हुआ। कहा -"देखिए यह पुस्तक शासन करने की पद्धति बताएगी। सारे जानवरों को यह मान्य है। हाँ‚ यदि कोई नियम हमारे अनुकूल न हो तो उसमें संशोधन का हमें अधिकार है। सामान्य जानवर हमारे फैसलों को मानने के लिए बाध्य होंगे। जंगल में लोकतंत्र कायम रहेगा।"


3. प्रोन्नति

 "सर! क्या मैं अंदर आ सकती हूँ ?"

 "हाँ-हाँ‚ क्यों नहीं! आईए‘"‚ निदेशक महोदय ने लैपटॉप पर अपनी नज़र गड़ाए ही कहा।

सुनीता के प्रवेश करते ही पूरा कमरा महक उठा था। निदेशक महोदय ने अपनी नज़रें उठाईं तो सुनीता को देखकर भौंचक रह गए।

सुनीता यूँ तो खूबसुरत थी ही ऊपर से आज़ उसका परिधान और प्रसाधन गज़ब ढा रहे थे। चाल में भी अल्हड़पन झलक रहा था। उम्र यही कोई पैंतीस-छत्तीस की होगी पर उस वक्त तो वह अट्ठारह वर्ष की कमसिन सी लग रही थी।

निदेशक महोदय बस देखते ही रह गए। कुछ क्षणोपरांत प्रकृतिस्थ होते हुए पूछा‚ "कहिए‚ क्या बात है ?"

"सुना है कार्यालय में आपके निजी सचिव पद पर किसी को प्रोन्नति दी जाने वाली है। यदि आपकी कृपा दृष्टि मुझपर पड़ जाए तो मैं धन्य हो जाऊँगी।"

"परंतु यहाँ तो आपसे अधिक वरिष्ठ लोग कतार में खड़े हैं। उन्हें किनारे कर.......! किस प्रकार संभव होगा ?"

आप चाहेंगे तो सबकुछ संभव हो सकता है। आपके मंतव्य की ही मुख्य भूमिका होगी। आप जो कहेंगे मैं करने को तैयार हूँ।"

"अच्छा‚ सोच-विचार कर देखता हूँ।"

"और हाँ‚ आज़ रात भोजन पर आप मेरे घर आमंत्रित हैं। मैं भी अकेली हूँ‚ आपका साथ मिल जाएगा। अब 'ना' मत कहिएगा।"

सुनीता मोहक मुसकान बिखेर‚ अदा के साथ बलखाकर चलती हुई कक्ष से बाहर निकल  गई । निदेशक मल्होत्रा जी के मस्तिष्क से जैसे एक तूफ़ान गुज़र गया था।

कुछ दिन बीत गए। सूचनापट्ट पर प्रोन्नति की ख़बर प्रकाशित कर दी गई। एक अनुभवी एवं वरिष्ठ व्यक्ति सागर कुमार को निजी सचिव का पदभार सौंपा गया था।

तीसरे दिन मल्होत्रा साहब दफ़्तर में बैठे हुए कुछ ज़रूरी काम निबटा रहे थे तभी जिला न्यायालय का अर्दली हाथ में सम्मन लिए हाज़िर हुआ। मल्होत्रा जी को सम्मन तामिल कर वह चला गया। मल्होत्रा जी ने उसे खोलकर पढ़ना प्रारंभ किया।

उनकी आँखें फटी-की-फटी रह गईं। चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। सुनीता ने उनपर प्रलोभन देकर महीनों यौन शोषण करने का आरोप लगाकर मुकदमा दर्ज़ कर दिया था।

4. रहमू चाचा

गाँव से शहर जाने  के क्रम में एक नदी पड़ती है।नदी का नाम है दामोदर।पुल न होने के कारण लोग नाव के सहारे नदी पार करने को बाध्य पहले भी थे और आज़ भी हैं।रहमान मियाँ नाव चलाया करते थे जिन्हें प्यार से मैं रहमू चाचा कहा करता था।वे मुझे लाड़ से बिटवा कहा करते थे।

पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में वर्षों बाहर रहना पड़ा।एकाएक घर आना हुआ।एक तरह का नफ़रत का माहौल फैलाया जा रहा था।लोग अविश्वास के वातावरण में जी रहे थे।कुछ स्वार्थी तत्व अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उटपटाँग बयानबाज़ी कर रहे थे।

शहर में तो माहौल गर्म था पर गाँव की ख़बर नहीं थी।घर लौटने के क्रम में मैं सोचता रहा कि रहमू चाचा न मिले तो मुश्किल में पड़ जाऊँगा।

ख़ैर नदी के पास पहुँचा तो दूर से ही नाव दीख गई और साथ ही दीखे रहमू चाचा।मैंने चैन की साँस ली।तट पर आया तब तक नाव लग चुकी थी।यात्रीगण सवार हो रहे थे।बच्चे,बूढ़े, स्त्री,पुरुष।कोई भेदभाव नहीं।अधिकांश यात्री हिंदु।

नाव बीच नदी में पहुँची कि चाचा का गाना प्रारंभ हो गया।मेरे हाथ चप्पू पर अनायास ही चले गए।

सकपकाते हुए चाचा ने कहा, “ई का करत हौ बाबूजी? रहन दौ।“

“चाचा, आपने मुझे पहचाना नहीं? मैं आपका बिटवा।बचपन में पार होते हमेशा आपके साथ चप्पू चलाया करता था।“

“बिटवा ! तुम शहर गईके भी न बदले। ईहाँ तो पढ़े-लिखे बाबू लोगन के रंगतै अलग हैं।“

“कुछ लोग कभी नहीं बदलते काका। तुम भी तो नहीं बदले।आज़ भी यात्रियों को उसी स्नेह के साथ नदी पार कर रहे हो।“

“बिटवा, मनुस तो मनुस के ही काम आवे है। यही सत है, यही धरम है।“

अनपढ़ रहमू चाचा की सोच विख्यात लोगों से बहुत ऊँची थी।

5. मनहूस

मीना अभी-अभी कॉलेज से लौटी थी। मोहल्ले में अफरा-तफरी मची हुई थी। पता चला कि सूरज की मृत्यु हो गई है। घर में मातम और रुदन का माहौल छाया हुआ है। किसी ने बताया कि सूरज की माँ विमला देवी, मौत का कारण रीता को मान रही है। उसी मनहूस के कारण सूरज की मौत हुई है, ऐसा वह चीख-चीख कर सभी मोहल्ले वालों को बता रही है।

नई नवेली दुल्हन रीता की शादी को हुए मात्र डेढ़ महीना ही बीता था। अभी न तो पाँव का महावर न ही हाथ की मेहंदी पूरी तरह उतरी थी। बड़ी ही सुंदर और सुशील थी। गरीब बाप के कलेजे का टुकड़ा। अभाव में पली-बढ़ी पर शालीनता के धन दौलत से समृद्ध थी। उस पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा था।

मीना भी कुतूहलवश उसके घर जा पहुँची। देखा रीता एक कोने में गुमसुम सी बैठी थी। निःशब्द। आँखों से अविरल आँसू बहे जा रहे थे। विमला देवी छाती पीट-पीटकर ढाढ़ें मार कर रो रही थी। अचानक वह उठी और रीता को बालों से पकड़कर घसीटते हुए चीखने लगी, "इस मनहूस का साया जब से इस घर पर पड़ा है घर का सत्यानाश हो गया। यह मेरे बेटे को खा गई। चल निकल जा मेरे घर से !"

"माँ जी ! मैं कहाँ जाऊँगी ? मेरा क्या कसूर है ?" 

 "जुबान लड़ाती है कलमुँही ! जा डूब मर कहीं !"

सभी औरतों में कानाफूसी हो रही थी। कुछ मानने लगी थीं कि सच में ही रीता मनहूस है। मीना से यह अत्याचार देखा नहीं गया। मीना ने आगे बढ़कर विमला देवी का हाथ पकड़ लिया और कहा, "यह क्या कर रही हैं आप ? ये मनहूस-वनहूस कुछ नहीं होता है।"

"चल हट ! कल की छोकरी ! चार अक्षर क्या पढ़ ली है हमें चली है पढ़ाने !"

 "चाची !" मीना चीख पड़ी। "आपको मालूम नहीं था क्या कि सूरज शराब के नशे में धुत रहता था ? लगातार शराब पीने से उसका लीवर खराब हो चुका था। वर्षों से वह शराब पीता रहा था। रीता के आने से नहीं, आप की लापरवाही से उसकी मौत हुई है। आपके पति भी शराब के लत की भेंट चढ़ चुके हैं। फिर मनहूस कौन हुआ ?" 

 विमला देवी की रीता के बालों पर पकड़ ढीली पड़ गई थी। उसकी जुबान पर जैसे ताला लग गया था। औरतों के बीच फिर से कानाफूसी शुरू हो गई थी।


भोला नाथ सिंह 

(पूर्व में प्रशांत कुमार 'भोला' नाम से लेखन)

पता - फुटलाही, पत्रालय-बिजुलिया

वाया - चास, बोकारो, झारखण्ड

पिन कोड - 827013.

ई-मेल - bhola5566@gmail.com

जन्मदिन - 08/05/1970 (वास्तविक)

              07/01/1968 (शैक्षिक प्रमाण पत्रों में)

शिक्षा - हिन्दी में स्नातकोत्तर, बी॰एड॰, नेट

संप्रति - अध्यापन एवं लेखन

प्रकाशित पुस्तकें :

बाल उपन्यास - बहादुर दोस्त, THE TRIO  

कविता संग्रह -  यह जो कड़ी है, बिखरे हुए मनके

कहानी संग्रह - सारंग (भाग १,२)

लघुकथा संग्रह - क्षितिज की ओर

जासूसी उपन्यास - दौलत की ख़ातिर

(इसके अलावा अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, कविताएँ, बाल कथा, लघुकथा एवं आलेख प्रकाशित। क‌ई साझा संग्रहों में सम्मिलित।)


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