Thursday, 31 January, 2019

लघुकथा : मैदान से वितान की ओर-21

इस धारावाहिक प्रस्तुति की अंतिम कड़ी

[रमेश जैन के साथ मिलकर भगीरथ ने 1974 में एक लघुकथा संकलन संपादित किया था—‘गुफाओं से मैदान की ओर’, जिसका आज ऐतिहासिक महत्व है। तब से अब तक, लगभग 45 वर्ष की अवधि में लिखी-छपी हजारों हिन्दी लघुकथाओं में से उन्होंने 100+ लघुकथाएँ  चुनी, जिन्हें मेरे अनुरोध पर उपलब्ध कराया है। उनके इस चुनाव को मैं अपनी ओर से फिलहाल लघुकथा : मैदान से वितान की ओरनाम दे रहा हूँ और वरिष्ठ या कनिष्ठ के आग्रह से अलग, इन्हें लेखकों के नाम को अकारादि क्रम में रखकर प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसकी प्रथम  11 किश्तों का प्रकाशन क्रमश: 17 नवम्वर 2018, 24 नवम्बर 2018, 1 दिसम्बर 2018,  4 दिसम्बर 2018, 8 दिसम्बर 2018, 12 दिसम्बर 2018, 15 दिसम्बर 2018, 17 दिसम्बर 2018, 20 दिसम्बर 2018, 24 दिसम्बर 2018, 27 दिसम्बर 2018, 30 दिसम्बर 2018, 2 जनवरी, 2019, 6 जनवरी 2019, 12 जनवरी 2019, 16 जनवरी 2019, 19 जनवरी 2019, 22 जनवरी 2019, 26 जनवरी 2019 तथा 29 जनवरी 2019 को  जनगाथा ब्लाग पर ही किया जा चुका है। यह इसकी इक्कीसवीं किश्त है। 
            टिप्पणी बॉक्स में कृपया ‘पहले भी पढ़ रखी है’ जैसा अभिजात्य वाक्य न लिखें, क्योंकि इन सभी लघुकथाओं का चुनाव पूर्व-प्रकाशित संग्रहों/संकलनों/विशेषांकों/सामान्य अंकों से ही किया गया है। इन  लघुकथाओं पर आपकी  बेबाक टिप्पणियों और सुझावों का इंतजार रहेगा।  साथ ही, किसी भी समय यदि आपको लगे कि अमुक लघुकथा को भी इस संग्रह में चुना जाना चाहिए था, तो यूनिकोड में टाइप की हुई उसकी प्रति आप  भगीरथ जी के अथवा मेरे संदेश बॉक्स में भेज सकते हैं। उस पर विचार अवश्य किया जाएगाबलराम अग्रवाल]
धारावाहिक प्रकाशन की  इक्कीसवीं कड़ी में शामिल लघुकथाकारों के नाम और उनकी लघुकथा का शीर्षक…
101  सूर्यकांत नागर—फल
102  हरनाम शर्मा—अब नाहीं
103  हरिशंकर परसाई—जाति
104  हसन जमाल—प्रत्याक्रमण
   105  हेमंत राणा—दो टिकट

101
  
सूर्यकान्त नागर
 
फल
“अम्माजी ने सुबह से कुछ नहीं खाया है, इन्हें भी कुछ दो।” लम्बी यात्रा के सहयात्री के नाते मैंने अपनी चिन्ता व्यक्त की।
“माँ सफर में अन्न ग्रहण नहीं करती,” बेटे ने बताया।
“कुछ फल-वल ही खरीद दो।” मैंने सुझाया। पता नहीं, बेटे ने सुना भी या नहीं, अथवा सुनकर भी अनसुना कर दिया। अगले स्टेशन पर ट्रेन रुकी तो अम्मा का नन्हा पोता अंगूरवाले को देख अंगूरों के लिए मचल उठा। हारकर पिता ने बेटे की इच्छा पूरी कर दी।
“बेटे, कुछ अंगूर दादी को भी दो।” पिता ने कहा, लेकिन लाडला इसके लिए तैयार नहीं हुआ। माँ-बाप ने डाँटा भी, मगर उस डाँट में प्यार इस तरह लिपटा था कि नन्हे पर कोई असर नहीं हुआ।
कुछ देर बाद “दस के तीन”, “दस के तीन” कहता हुआ सन्तरे बेचने वाला आया तो मुझसे फिर रहा न गया, “अम्माजी के लिए सन्तरे ही खरीद लो।” मैंने अपनी ओर से खरीदने की पहल इसलिए नहीं की कि अपमान मानकर पिता यह न कह बैठे—हमें भिखारी समझ रखा है क्या? बेटे ने कुछ देर विचार किया, फिर माँ से कहा, “अम्मा, जरा दस रुपए देना, मेरे पास छुट्टा नहीं है।”
“अम्मा ने कहा, “रहने दे बेटा, ऐसा भी क्या जरूरी है।”
बेटे ने जिद की तो अम्मा ने गाँठ से निकाल दस का नोट बेटे के हाथ पर धर दिया, लेकिन इस बार भी नन्हे ने सन्तरे की थैली झपट ली, बोला, “मैं किछी को छन्तरे नई दूँगा। अकेले खाऊँगा।”
बाप ने जोर-जबरदस्ती की तो नन्हा जोर-जोर से रोने लगा, हाथ-पैर पटकने लगा। छीना-झपटी में उसने पापा का मुँह भी नोच लिया। दादी अम्मा ने कहा, “रहने दे बेटा! नन्हा खा लेगा तो समझूँगी, मैंने खा लिया।”
नन्हे का पेट भर गया तो एक सन्तरा पापा की ओर बढ़ाते हुए कहा, “पापा, ये तुम खा लो।”
“दादी को दो बेटा!” पापा ने समझाना चाहा, पर नन्हा राजी नहीं हुआ। दादी निरीह भाव से यह सब देख रही थी। आखिर उसने कहा, “आज दे रहा है तो खा ले बेटा, पता नहीं, कल कैसा फल मिले।”

102
 
हरनाम शर्मा 

अब नाहीं
“भगवन कसम मनै नेम है साहब इब मैं यो काम कत्तई नीं करता. कुछ नीं करता. बस कपड़ों पे प्रेस कर गुजर करूँ.”                
“.....” नए दरोगा की आँखें संवादहीन न थीं.
“माई-बाप कदी वर्दी प्रेस करवानी हो तो लेता आऊँगा बस यों ही काम आ सकूँ इब तो मैं.”
“हरामजादे,झूठ तुम्हारे खून में समाया रहेगा जन्मभर .तेरा रिकोर्ड बोल रहा है साले तू अफीम चरस गांजा सारी चीजें बेचता है. मुझे आज इस थाने में पन्दरवां  दिन  हो गया एक बार भी नहीं आया!”
“साहब जब धन्धा छोड़ दिया तो के करूँ आ कै .जब कमाई थी तो थाने की चौथ न्यारी सबसे पहले जावै  थी आपैई. थाने नै मेरे से कोई शिकायत नीं थी. इब बताओ...”
“हाँ-हाँ बताऊंगा। भूतनी के, अपना धन्धा छोडकर हमारा धन्धा चौपट करवा दो। जरा बताइयो, मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है। तेरा धन्धा तब ही बंद हुआ, जब मैं इस थाने में आया। साले तुम लातों के भूत बातों से नहीं मानते। एकाध बार कचैहरी के चक्कर कटवा दूँगा तो सारा धन्धा ख़ूब चल पडेगा, बोल ससुरे... ”                      
“के करूँ साहब, बात यों नहीं है।”
“और क्या है कल से कोई बात नहीं सुनूँगा। चौथ थाने में पहुँच जानी चाहिए हफ्ते बाद समझे धन्धा चालू करो या मरो।”      
“साहब साठ से ऊपर हो गया पोरस थक गे अब नहीं होगा।”
“अरे ससुरे बूढ़े,  भोतई कर्मठोक है तू तो। अरे भई, तेरी कोई औलाद तो होगी।”
“जी, छोरी थी; ब्याह दी।”
“और घरवाली।” बुढिया को इंगित कर नए साहब ने पूछा।                                   
“ना जी, यो तो निरी गऊ है जी। इसने कदी भी मेरे धंधे में साथ नहीं दिया।”
“बस देख लो; और मैं कुछ नहीं सुनना चाहता।  हमें भी आखिर कुछ चाहिए पिछले कागजों का पेटा भरने के लिए। कुछ धन्धा करो, म्हारा भी कुछ हो। समझे!”  आँखें तरेरकर दरोगा गुर्राया। बूढ़े के इंकार करने से पूर्व ही डंडा तन चुका था, मगर जर्जर हाथों ने उस डंडे को हवा में ही थाम लिया।  

103
 
हरिशंकर परसाईं
 
जाति          
कारखाना खुला। कर्मचारियों के लिए बस्ती बन गई। ठाकुरपुरा से ठाकुर साहब और ब्राह्मणपुरा से पण्डितजी  कारखाने में काम करने लगे और पास-पास के ब्लॉक में रहने लगे। ठाकुर साहब का लड़का और पण्डितजी की लड़की दोनों जवान थे। उनमें पहचान हुई, पहचान इतनी बढ़ी कि वे शादी करने को तैयार हो गए। 
जब प्रस्ताव उठा, तो पण्डितजी ने कहा, “ऐसा कभी हो सकता है… ब्राह्मण की लडकी ठाकुर से शादी करे। जाति चली जाएगी।’’
ठाकुर साहब ने कहा कि ऐसा हो नहीं सकता परजाति में शादी कारण से हमारी जाति चली जाएगी।
किसी ने उन्हें समझाया कि लड़के–लडकी बड़े हैं, पढ़े–लिखे हैं, समझदार है। उन्हें शादी कर लेने दो। अगर उनकी शादी नहीं हुई तो भी वे चोरी-छिपे मिलेंगे; और तब जो उनका सम्बन्ध होगा वह तो व्यभिचार कहा जाएगा।
इस पर ठाकुर साहब और पण्डितजी ने कहा, “होने दो।  व्यभिचार से जाति नहीं जाती है। शादी से जाती है।

104

हसन जमाल

प्रत्याक्रमण
आक्रमण बलात्कार के लिए ही था।
युवती आक्रमणकारी के चंगुर में असहाय पक्षी की तरह फड़फड़ा रही थी। निजता का रास्ता न था। आक्रमणकारी दाँत भींचकर आँखों की पुतलियों को असामान्य ढंग से बाहर निकालकर नई देखी हुई फिल्म के अनुसार युवती के काबू में न आ सकने वाले चंचल हाथ-पैरों के बाँधने की ताबड़-तोड़ कोशिश कर रहा था। इस कोशिश में उसका सारा शरीर पसीने में नहा गया। बुरी तरह हाँफने लगा था वह। उसकी लस्त-पस्त देख युवती ने पहली बार प्रतिरोध को रोका। हाथ-पैर ढीले छोड़ दिए। एक हल्की-सी मुस्कान के साथ उसने निहायत मुलायम आवाज में आक्रमणकारी को सम्बोधित किया, ‘‘क्या सारा बल तुम इसी काम में लगा दोगे?’’
         स्विच बंद करते ही मशीन जिस तरह स्थिर हो जाती है, आक्रमणकारी जड़वत् हो गया। एक सकते का आमतारी हो गया उस पर। भौंचक्का-सा वह हाथ-आए शिकार को बेबसी से देखने लगा। लगा, सचमुच उसमें बल नहीं रहा।
         और इसी दरमियान अस्त-व्यस्त कपड़ों को सँभालती हुई युवती उसके चंगुल से निकल भागी। आक्रमणकारी प्रत्याक्रमण की चोट तलाशने लगा, लेकिन चोट का निशान कहीं नहीं था।
                                                           
और अंत में एक लघुकथा  बलराम अग्रवाल की ओर से…

105

हेमंत राणा

दो टिकट
जाड़ो के दिन थे, वर्मा जी बालकोनी में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। रिटायरमेंट के बाद, ज़िदगी इतनी बोर ना थी। लेकिन जब से पत्नी साथ छोड़कर गई, एक-एक पल काटना मुश्किल हो गया। अब तो अखबार ही उनका साथी था। तभी अंदर से उनके पोते ने आवाज लगाई, “दादा जी, टेबिल पर आप का फ़ोन बज रहा है…”
वर्मा जी ने वहीं बैठे-बैठे कहा, “देख तो, क्या नाम लिखा आ रहा है?”
“कोई आर जी लिखा आ रहा है…”
“उन्ही का फ़ोन है, जिनकी बेटी की शादी में तू मेरे साथ गया था।” वर्मा जी ने पोते के हाथ से फ़ोन लेते हुए कहा।
“हाँ बोलो ऋचा, कैसी हो?”
“मै ठीक हूँ, तुम कैसे हो?”
“बस अब तो बची खुची जिंदगी गुजारनी ही, सो गुजार रहे है। फ़ोन कैसे किया, कुछ काम था क्या?”
“हाँ, घर से भागना था।”
“इस सत्तर साल की उम्र में, किसके साथ भाग रही हो?”
“तुम्हारे साथ।”
“मेरे साथ भागना होता तो उस बीस साल की उम्र में भाग जातीं। तब तुम आई नहीं और मै सुबह से शाम तक हाथ में ट्रेन के दो टिकट लिए रेलवे स्टेशन पर खड़ा रहा।”
“हाँ, तब नही आ सकी।… फिर शादी, उसके बाद बच्चे। बस उसी में रम के रह गई। गुप्ता जी मेरे लिए यह मकान और बेटी की जिम्मेदारी छोड़ कर गये थे। बेटी अपने घर चली गई और यह मकान मैंने एक संस्था को लाइब्रेरी खोलने के लिए दे दिया, अपने लिए एक कमरा रखा है।"
"यह तो तुमने अच्छा किया। अब इतने बड़े मकान का अकेली करोगी भी क्या?"
"एक बस तीर्थ यात्रा के लिए जा रही है। उसी में दो टिकट बुक कराये हैं। आ जरूर जाना। कहीं ऐसा ना हो, इस बार मैं दो टिकट लिए खड़ी रहूँ।”
“तीर्थ यात्रा पर, अपने दीवाने के साथ भागकर जाओगी। भगवान बहुत पाप देंगे।” इस बार वर्मा जी की आवाज में एक खनक थी।
“अरे कोई पाप-वाप नहीं देंगे। पहले भी तो हम मन्दिर में कौन-सा पूजा करने जाते थे।” अब ऋचा की आवाज भी, वर्मा जी की आवाज के साथ खनखना रही थी।

No comments: