Monday, 16 July, 2018

परिंदों के दरमियां : पत्रात्मक प्रतिक्रिया-2 / डॉ. कुंकुम गुप्ता

कृति की सफलता उसके पाठकों के संतोष में निहित होती है। 'परिंदों के दरमियां' पर लगातार उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रियाएँ मिल रही हैं। अभी-अभी भोपाल निवासी आ. डॉ. कुंकुम गुप्ता की प्रतिक्रिया रजिस्टर्ड डाक से मिली है। आभारी हूँ। प्रस्तुत है उनका कथन :

आदरणीय बंधु
नमस्कार।
कांता राय द्वारा (प्रदत्त) आपकी पुस्तक 'परिंदों के दरमियां' पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, साथ ही लघुकथा की बारीकियाँ भी सीखने को मिलीं। मेरे मन में जो प्रश्न थे, उनके उत्तर भी अन्य प्रश्नकर्ताओं के प्रश्न में समाहित थे जिनका उत्तर आपकी पुस्तक पढ़कर मिल गया।
डॉ॰ कुंकुम गुप्ता
        मेरी, भोपाल की बहिनों के प्रश्न और उनकी लघुकथाओं का उल्लेख करना मेरे लिए गर्व की बात है। कुछ बातें, जो मन को अच्छी लगीं, उनका उल्लेख करना आवश्यक समझती हूँ :
1. विधा की जीवंतता और रचना की कालातीतता के लिए जरूरी है कि हम सिर्फ अनुशासन सीखें, साष्टांग बिछ जाना नहीं।
2. प्रतियोगिता के विषय पर लिखें अवश्य, लेकिन भेजने की आतुरता से बचें।
3. 'बाजारवाद' पर रोहिणी अग्रवाल की टिप्पणी सटीक है।
4. लघुकथाकार पात्रों के परस्पर संवादों, मनोभावों और द्वंद्व के माध्यम से दृश्य निर्माण करता है।
5. कथ्य का संवेदन-बिंदु कागज पर पूर्णता कब पाता है, यह महत्वपूर्ण बात है।
6. मानवीय मूल्यों का संरक्षण साहित्य का मुख्य उद्देश्य है।
7. उच्च-स्तरीय अध्ययन हमारे लेखन में उबाल भी पैदा करता है और एक दिशा भी देता है।
8. लघुकथाकार को संकेत की भाषा, व्यंजना की भाषा स्वयं में अवश्य विकसित करनी चाहिए।
9. अमर्यादित भाषा कोई भी साहित्य-प्रेमी स्वीकार नहीं करता।
10. नयी भावभूमि का चयन करना बेहतर है।
11. लघुकथा इंसटेंट लेखन नहीं है।
       कांता राय, कल्पना भट्ट, लता अग्रवाल, नीना (सिंह) सोलंकी, नयना (आरती)  कानिटकर की लघुकथाएँ शामिल कीं, यह प्रसन्नता की बात है।
        मैं तो इस विधा में नया कदम रख रही हूँ। यह विधा सामयिक एवं प्रभावी लगती है। पुस्तक पढ़कर आपके द्वारा दिये गये उत्तरों से आपकी अध्ययनशीलता तथा विधा के प्रति गहन चिंतन स्पष्ट झलकता है। आगे भी आपसे मार्गदर्शन की अपेक्षा रहेगी। 
     ◆ कुंकुम गुप्ता, भोपाल

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