Saturday, 31 January 2009

जनगाथा फरवरी 2009


समय के साथ चलते मालवांचल के लघुकथाकार
सूर्यकांत नागर

(गतांक से आगे)
न्य लघुकथाकार, जिनका उल्लेख जरूरी लगता है, वे हैं—कृष्ण्कान्त दुबे, संजय कुमार डागा(हातोद), सुरेश बजाज, डॉ तेजपाल सिंह सोढ़ी, सिंघई सुभाष जैन, वीरचन्द नरवाले, सत्यनारायण पटेल, रमेश जाधव, कान्तिलाल ठाकरे, राज केसरवानी, मधुकर पँवार, महेश भण्डारी आदि। डॉ सोढ़ी का सन 2005 में लघुकथा संकलन ‘महामानव’ आया है। कृष्णकान्त दुबे ने प्रकृति और ग्रामीण परिवेश को लेकर अच्छी लघुकथाएँ लिखी हैं। डॉ रमेशचन्द्र दुबे का अलग से उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि उन्होंने भी लघुकथा विधा के संवर्धन हेतु बहुत काम किया है। ‘आस्था’ उनकी एक अविस्मरणीय लघुकथा है। व्यंग्यकार से एक जागरूक कवि का चोला पहन लेने वाले ब्रजेश कानूनगो ने यद्यपि कम ही लघुकथाएँ लिखी हैं, लेकिन जो भी लिखी हैं, वे उन्हें एक समर्थ लघुकथाकार सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। घुलती पृथ्वी, रंग-बिरंग आदि उनकी महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैं।
मालवा-अंचल की महिला लघुकथाकारों में ध्यान आकर्षित करने वाले नाम हैं—चेतना भाटी, अन्तरा करवड़े, लीला रूपायन, कृष्णा अग्निहोत्री, सीमा पाण्डे ‘सुशी’, रेखा कारड़ा, सुनयना वोरा, सुमति देशपाण्डे, डॉ पुष्पारानी गर्ग, स्वाति तिवारी(सभी इंदौर), प्रज्ञा पाठक और मीरा जैन(दोनों उज्जैन)। इनमें भी चेतना भाटी, अन्तरा करवड़े, सीमा पाण्डे, मीरा जैन और प्रज्ञा पाठक अधिक सक्रिय हैं। रेखा कारड़ा शारीरिक रूप से अशक्त होते हुए भी मानसिक रूप से काफी सशक्त हैं। साहित्य और कला के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। ‘उसका सपना’(2005) रेखाजी का लघुकथा-संग्रह है। प्रचार-प्रसार से दूर रहने वाली अंतरा करवड़े ने बहुत ही खूबसूरत लघुकथाएँ लिखी हैं। उनके लघुकथा-संग्रह ‘देन उसकी हमारे लिए’ को अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद ‘दिव्य’ रजत अलंकरण मिल चुका है। सीमा पाण्डे ‘सुशी’ और अंतराजी इंटरनेट पर भी बहुत सक्रिय हैं। चेतना भाटी की उल्लेखनीय लघुकथाएँ हैं—हेलमेट, ऊँची जाति, मंजर आदि। मीरा जैन की अब तक सौ से अधिक लघुकथाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। कई अन्य लघुकथा-संकलनों में भि वे संकलित हैं। ‘मीरा जैन की सौ लघुकथाएँ’ उनका एकल लघुकथा-संग्रह है। लघुकथा-लेखिकाओं की अधिकांश लघुकथाएँ परिवेशजन्य हैं। घर-परिवार, नाते-रिश्तों को शायद पूरी तरह छोड़ पाना उनके लिए संभव नहीं है। इसीलिए उनकी रचनाओं में अनुभूति की प्रामाणिकता है। प्रश्न यही है कि जो एक स्त्री अपने जीवन में झेलती-भोगती है, उसे पुरुष तो क्या, वह स्त्री जिसने वह-सब भोगा नहीं है, ठीक-से बयान नहीं कर सकती।
उज्जैन का जिक्र आया है तो वहाँ के पुरुष-लघुकथाकारों को भी याद कर लिया जाए। पोलियोग्रस्त स्व0 अरविन्द नीमा विकलांग होते हुए भी विचित्र जिजीविषा के धनी थे। लिखने-पढ़ने में उनकी गहरी रुचि थी। अच्छी रचनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया भेजना वे कभी नहीं भूलते थे। उनका एक लघुकथा-संग्रह ‘गागर में सागर’ उनकी मृत्यु के पश्चात सन 2000 में प्रकाशित हुआ था। उज्जैन के ही सन्तोष सुपेकर, राजेन्द्र नागर ‘निरन्तर’, मुकेश जोशी, शैलेन्द्र पाराशर, स्वामीनाथ पाण्डेय, डॉ शैलेन्द्र कुमार शर्मा, भगीरथ बड़ोले, बी0 एल0 आच्छा, डॉ प्रभाकर शर्मा, रमेश कर्नावट और श्रीराम दवे आदि अनेक रचनाकार लघुकथा-विधा से जुड़े हैं। ख्यात व्यंग्यकवि ओम व्यास ने भी लघुकथाएँ लिखी हैं। ‘मजदूरी’ उनकी एक महत्वपूर्ण रचना है। डॉ प्रभाकर शर्मा का संकलन ‘सागर के मोती’(2004) चर्चित रहा है। लेखक, पत्रकार, चिंतक श्रीराम दवे ने भी लघुकथाएँ लिखी हैं। उनके संपादन में इंदौर के तीन लघुकथाकारों का संकलन ‘त्रिवेणी’(2003) आया था। प्रो0 शैलेन्द्र पाराशर के संपादन में लघुकथाओं के संकलन ‘सरोकार’ का प्रकाशन उज्जैन से हुआ था। संकलन में रमेशचन्द्र शर्मा, हरीश कुमार, प्रभाकर शर्मा, रमेश कर्नावट, प्रवीण देवलेकर आदि की लघुकथाएँ शामिल थीं। उक्त संकलन का भव्य लोकार्पण-समारोह हुआ था जिसमें सांसद सत्यनारायण जटिया, ख्यात कवि-आलोचक प्रमोद त्रिवेदी, प्रो0 रमेश गुप्त ‘चातक’ आदि अनेक गणमान्य लोग उपस्थित थे। उक्त संकलन का लोकार्पण सूर्यकांत नागर ने किया था। इस अवसर पर लघुकथाकार वेद हिमांशु को सम्मानित भी किया गया था। प्रो0 बी0 एल0 आच्छा ने लघुकथा के सिध्दान्त-पक्ष पर अनेक विचारपरक लेख लिखे हैं। पिलकेन्द्र अरोरा भी इस दिशा में काफी सक्रिय हैं।
लेखक, कवि, विचारक और वरिष्ठ विज्ञानी रतलाम के डॉ जयकुमार जलज ने हिसाब, हासिल, नेता-शिष्य, वंशबेल, झूठा सच, शॉर्टकट जैसी यादगार कथाएँ लिखकर सिद्ध कर दिया है कि उनकी इस विधा पर गहरी पकड़ है। उनकी लघुकथाओं में मनुष्य के दोहरे चेहरे और स्खलित होते मानवीय मूल्यों के प्रति उनकी चिन्ता को रेखांकित किया जा सकता है। साहित्य की विभिन्न विधाओं में सतत लिखने वाले झाबुआ के रामशंकर ‘चंचल’ भी अब तक अनेक श्रेष्ठ लघुकथाएँ लिख चुके हैं। उनकी रचनाएँ देशभर की छोटी-बड़ी पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। उनके द्वारा संपादित ‘एकलव्य’(2004) संकलन में उनकी अनेक लघुकथाएँ संकलित हैं। उनकी झीतरा और ब्लाउज रचनाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अशोक ‘आनन’(मक्सी) ‘आयाम’ लघु-पत्रिका निकालते रहे हैं। इस पत्रिका का एक पूरा अंक लघुकथा को समर्पित था। ‘आनन’ ने स्वयं भी अनेक लघुकथाएँ लिखी हैं। ‘मातुश्री कमलादेवी स्मृति पुरस्कार’ का प्रोत्साहन पुरस्कार भी उनको मिल चुका है। ‘खिलौने’ उनकी उल्लेखनीय लघुकथा है। देवास के उपेन्द्र मिश्र एवं नितिन घुणे के समर्पण-भाव को याद रखना भी जरूरी है।
इंदौर में रहे और मुंबई में जा बसे अनन्त श्रीमाली ने सतीश राठी के साथ मिलकर लघुकथा के संवर्धन के लिए खूब काम किया। राठीजी के साथ वे ‘क्षितिज’ और ‘मनोबल’ के सहयोगी संपादक रहे। इंदौर के एक और लघुकथाकार जो फिलहाल नौकरी के सिलसिले में मुंबई में हैं, वे हैं—डॉ सतीश शुक्ल। शुक्लजी भी लघुकथा के प्रति समर्पित रहे हैं। कर्ज-अदायगी तथा स्वाभिंमान जैसी लघुकथाओं के माध्यम से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
मालवा-अंचल के देवास, उज्जैन, इंदौर आदि स्थानों पर लघुकथा-सम्मेलनों, सेमीनारों, कार्यशालाओं, लोकार्पण-समारोहों और चर्चा-गोष्ठियों का आयोजन अक्सर होता रहता है। इनमें लघुकथा लेखन के विविध पक्षों पर खुली चर्चा होती है। कुछ स्थानों पर लघुकथाओं पर आधारित चित्र-प्रदर्शनियाँ भी लगाई जा चुकी हैं। दिल्ली निवासी मधुदीप के लघुकथा-संग्रह ‘मेरी बात तेरी बात’ पर स्वयं मधुदीप की उपस्थिति में इंदौर में विस्तृत चर्चा हुई थी। चैतन्य त्रिवेदी के लघुकथा-संग्रह ‘उल्लास’ पर भी एकाधिक बार बहस हो चुकी है। मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति द्वारा भी लघुकथा-वाचन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। गत वर्ष डॉ सतीश दुबे की लघुकथाओं के गुजराती संकलन ‘करोड़ रज्जू’ का वृहद लोकार्पण-समारोह गुजराती समाज द्वारा आयोजित किया गया था। गुजरात साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित और कभी इंदौर में ही रहे रोहित श्याम चतुर्वेदी द्वारा हिन्दी से गुजराती में अनूदित यह पुस्तक काफी चर्चित रही। सतीश राठी ने ‘क्षितिज’ के लिए 1983-84 में लघुकथा-प्रतियोगिता आयोजित कि थी जिसमें फजल इमाम मलिक, मदन शर्मा और शंकर पुणतांबेकर को पुरस्कृत किया गया था। निर्णायक थे—निमाड़ लोक संस्कृति के पोषक रामनारायण उपाध्याय, सूर्यकांत नागर और राजेन्द्र पाण्डेय। अशोक शर्मा ‘भारती’ द्वारा आयोजित प्रतियोगिता का उल्लेख पूर्व में किया जा चुका है। मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति की मुख-पत्रिका ‘वीणा’ में आज भी लघुकथाओं का प्रकाशन नियमित रूप से हो रहा है। लघुकथा पर क्षेत्र के अनेक छात्र-छात्राओं द्वारा एम फिल हेतु लघु शोध-प्रबन्ध तथा पी-एच डी हेतु शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत कर डिग्रियाँ हासिल की गई हैं। इनमें कुछ नाम हैं—सुनीता पाटीदार, संजय गुप्ता, पल्लवी, भारती ललवानी, मनीषा व्यास आदि।
देश में लघुकथा के बदलते नक्शे के साथ-साथ मालवांचल में भी लघुकथा लेखन में भाषा, शिल्प और कथ्य के स्तर पर बदलाव आया है। हृदयहीनता, भ्रष्टाचार और परस्पर विरोधी स्थितियों वाले घिसे-पिटे विषयों से मुक्ति मिल रही है। अतिरिक्त स्पष्टीकरण और विवरणात्मकता के प्रति भी लेखक-वर्ग सावधान हुआ है। बदलते यथार्थ को सामने लाने के लिए लघुकथा के रचनात्मक स्वरूप में रूपात्मक बदलाव आया है। पहले लगता था, सारी लघुकथाएँ एक ही टकसाल से निकलकर आ रही हैं। अब मालवा का लघुकथाकार अधिक सजग हुआ है। उसने लघुकथा के बने-बनाए ढाँचे को तोड़ने की कोशिश की है। उसकी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समझ विकसित हुई है। लघुकथा के विकास की दृष्टि से यह एक शुभ लक्षण है। विक्रम सोनी, सतीश दुबे से प्रारम्भ परम्परा विकसित-पल्लवित होकर नए रंग-रूप में अपनी सुरभि बिखेर रही है और लघुकथा विधा के संवर्धन में अपना विनम्र योगदान कर रही है। निस्सन्देह मालवा-अंचल के लघुकथाकारों ने साहित्य कोष को समृद्ध करने और लघुकथा को अधिकाधिक लोगों से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उम्मीद है, अंचल की नई प्रतिभाएँ भी आगे आएँगी और इस विधा की जड़ों को मजबूत करने में भरपूर सहयोग करेंगी।
मोबाइल:09893810050

लघुकथाएँ


लक्ष्मी-निवास
सुरेश शर्मा

दीपावली की आधी रात बीत चुकी थी। लक्ष्मीजी अपने वाहन पर सवार उपयुक्त पात्र को वरदान देने निकल पड़ीं।
एक झोपड़ी का दरवाजा बन्द था। भीतर-बाहर अँधेरा पसरा देखकर विस्मय के साथ लक्ष्मीजी ने पूछा, “दीवाली की रात भी अँधेरा?”
“यह एक गरीब मजदूर का घर है। दिनभर कठोर श्रम करने के बाद भी इसके परिवार का गुजारा नहीं हो पाता। इसीलिए आपका स्वागत नहीं कर पाया बेचारा।” उल्लू ने स्थिति स्पष्ट की तो लक्ष्मीजी ने आगे बढ़ने का इशारा किया।
कुछ दूर चलने के बाद एक घर के आगे केवल एक दीया टिमटिमाता हुआ देखकर वे ठिठकीं। आशय समझकर उल्लू बोला,“यह एक ईमानदार शासकीय कर्मचारी का घर है। ऊपर की कमाई को हाथ लगाना भी पाप समझता है। इसीलिए इसका परिवार गरीबी और अभाव से त्रस्त रहता है। अपनी क्षमता अनुसार ही आपकी सेवा कर सन्तुष्ट है, देवि!”
लक्ष्मीजी की खामोशी का अर्थ समझकर उल्लू आगे बढ़ लिया। तभी उनकी नजर विद्युत रोशनी से जगमगाते एक भव्य भवन पर पड़ी। वहाँ आतिशबाजी से आसमान तक गूँज रहा था। दर्जनों देशी-विदेशी कारों की लाइन लगी हुई थी। अच्छा-खासा शोर मचा हुआ था। लक्ष्मीजी को खोया हुआ-सा जानकर उल्लू बताने लगा, “यह एक हवाला और घोटालेबाज का महल है देवि! इसके पास अपार सम्पत्ति व काला धन है।”
सुनकर लक्ष्मीजी बोलीं, “तुम मुझे यहीं उतार दो।”
उल्लू उल्लू-सा खड़ा-खड़ा लक्ष्मीजी को भीतर जाते देखता रहा।
मोबाइल:09926080810

संस्कार
श्यामसुन्दर व्यास
(निधन: 03 अक्तूबर, 2007)

सार्वजनिक नल पर पानी भरने वालों की भीड़ जमा हो गई थी। हंडा भर जाने के बाद बूढ़ी अम्मा से हंडा उठाया नहीं जा रहा था।
लोगों का अधैर्य बड़बड़ाहट में बदलने लगा। मनकू ने हंडा हटाकर अपनी बाल्टी लगाते हुए बूढ़ी से कहा, “बहू को मेंहदी लगी है क्या, जो तू आ गई?”
कातर स्वर में बूढ़ी के बोल फूटे—“उसका पाँव भारी है।”
मनकू को लगा जैसे किसी ने उस पर घड़ों पानी डाल दिया हो।
उसने हंडा उठाया और बूढ़ी अम्मा के द्वार पर रख आया।


मूल्यान्तर
विक्रम सोनी

रोगाजी प्याऊ के आगे अंजुरी बाँधते उसे देखकर बेहद आत्मीयता व नम्रता से बोले,“क्यों बे हरामी की औलाद अहीरराम, तूने अभी तक एक टीन घी नहीं पहुँचाया? एक तेरे ही घर का हुआ तो हम खाते-पीते हैं। गाँव में एक तेरे ही घर की किसी चीज से हमें परहेज नहीं है, और तू है कि…”
“तीन गायें मर गयीं हुजूर।”
“अबे तो गाँवभर में सौ-सौ ग्राम भी माँग लिया होता तो टीन भर जाता। देखता, कौन साला हमारे नाम से नहीं देता!”
वह कुछ उत्तर देता, तभी पानी पिलाने वाली बुढ़िया ने धीरे-से कहा,“माँगकर ला देना बेटा, भिखारी को जूठन से परहेज नहीं होता।”
सम्पर्क:0734-2533910


हक़ की मजदूरी
प्रताप सिंह सोढ़ी

पने पाँच-वर्षीय बच्चे का हाथ पकड़े भूरीबाई दाड़की पाने की प्रतीक्षा में लगभग दो घण्टे से मजदूर-चौक में खड़ी हुई थी। उसने मजदूरी मिलने की आस अब छोड़ दी थी। सुस्ताने के लिए वह पास की पुलिया पर बैठ गयी। तभी, उसे किसी की आवाज़ सुनाई दी,“क्या काम नहीं मिला?”
उसने देखा कि एक नौजवान अपनी पतली नुकीली मूँछों पर उँगली फेरते हुए उसे घूर रहा था। संक्षिप्त-सा उत्तर दिया उसने—“नहीं मिला।”
“हम देंगे तुम्हें बढ़िया काम।”
“क्या मजदूरी दोगे?”
कमीज की कॉलर ऊपर उठाते हुए उसने कहा, “मुँहमाँगी मजदूरी मिलेगी।”
उसे घूरते हुए दृढ़तापूर्वक वह बोली, “हक़ की मजदूरी ही लूँगी। कहाँ जाना होगा?”
कुटिल हँसी बिखेरते हुए उस नौजवान ने उत्तर दिया, “मेरे ठिकाने पर चलना होगा, जहाँ सभी मजदूरिनें जाती हैं। वहाँ सभी सुविधाएँ हैं। दो-तीन घण्टे में तुम्हें छुट्टी मिल जाएगी और भरपूर मजदूरी भी।”
अनपढ़ भूरीबाई सब-कुछ समझ गई। उसकी भृकुटी तन गई और पूरी ताकत लगा वह चीख पड़ी, “अबे हरामी, मैं मजदूरी कर पेट भरती हूँ, इज्जत बेचकर नहीं। भाग जा यहाँ से, नहीं तो…।”
एक बड़ा-सा पत्थर उसके हाथ में था। भूरीबाई के इस विकराल रूप को देखकर वह नौजवान भयभीत वहाँ से भाग खड़ा हुआ। भूरीबाई ने अपने बच्चे का हाथ पकड़ा और लम्बे-लम्बे डग भरती, बड़बड़ाती हुई अपने घर की तरफ चल दी।
मोबाइल:09753128044

खामोश
रमेश मनोहरा

“क्यों लीला, आजकल खामोश क्यों रहने लगी? क्या हो गया, बोल्।”
“कुछ नहीं हुआ।”
“जो हमेशा दिन-रात बड़बड़ाती रहती थी। अपनी बहू को कम दहेज लाने पर कोसती रहती थी। मगर कुछ दिनों से देख रही हूँ—किसी ने तुम्हारी जुबान सी दी है। बता, बहू ने कुछ कह दिया क्या?”
“बहू क्या कहेगी मीरा बहिन्।”
“तो फिर किसने कह दिया?”
“मेरे अपने बेटे ने।”
“क्या कह दिया ऐसा तुम्हारे बेटे ने?”
“कह दिया, तुम दहेज के लिए बार-बार बहू को परेशान नहीं करोगी।”
“बेटे ने ऐसा कह दिया और तुम डर गई?”
“डरे मेरी जूती।” जरा गुस्से से लीला बोली।
“तो फिर, इतनी खामोश क्यों रहने लगी? बहू को भी अब दहेज के लिए नहीं उकसाती हो?”
“बात दरअसल यह हुई मीरा बहिन, बेटे ने जोर देकर कह दिया—अब दहेज के लिए बहू को परेशान करोगी तो हम दोनों आत्महत्या कर लेंगे।”
“और तुम डर गई?”
“हाँ मीरा बहिन, बेटा तो मेरा ही है। बहू में आँसू आ गये।
“यानी कि बेटा बहू का गुलाम हो गया?” मीरा ने उसके दर्द को फिर कुरेदा।
“हाँ मीरा बहिन, मैं अपने को नहीं खोना चाहती।” कहकर लीला ने अपनी वेदना उगल डाली।
मीरा बहिन अन्दर-बाहर से मुस्करा दी, क्योंकि यह योजना उसी की थी।
सम्पर्क:07414-229414


आशंका
डॉ योगेन्द्रनाथ शुक्ल

घर के सामने कार रुकने की आवाज़ आते ही पिता छड़ी के सहारे रूम की ओर चल दिए।
“बेटा! यात्रा में कोई कष्ट तो नहीं हुआ?”
“नहीं पिताजी।”
“कार्यक्रम अच्छी तरह निपट गया?”
“जी पिताजी। चाचाजी आपको बहुत याद कर रहे थे…मैंने कह दिया कि आपकी तबियत ठीक नहीं थी, इसलिए नहीं आ सके।”
“बेटा, तुम्हारी चाची बहुत अच्छी महिला थी…तुम्हें तकलीफ तो हुई होगी, लेकिन उनके तेरहवें में शामिल होना बहुत जरूरी था…उनका परिवार भले ही दूसरे शहर में रह रहा हो, पर हमारा खून तो एक ही है…।” यह कहते हुए उनकी आँखें भर आई थीं; किन्तु उन्हें मन ही मन सन्तोष भी था कि पुत्र और पुत्रवधू ने उनकी आज्ञा का पालन किया था।
रात को यश उनके कमरे में आया।
“दादाजी, पापा कानपुर से मेरे लिए ये वीडियो-गेम लाए हैं।”
“यह तो बहुत अच्छा है! जरा मुझे भी बताओ…।” उसके सिर पर हाथ फेरते हुए दादाजी ने कहा।
“दादाजी, मम्मी कह रही थी कि चाचीजी की साग-पूड़ी चार हजार में पड़ी।…दादाजी, क्या साग-पूड़ी इतनी मँहगी मिलती है?”
यश अपने प्रश्न का जवाब चाह रहा था और दादाजी अपने भावी जीवन के प्रति आशंकित हो मूर्तिवत खड़े थे।
सम्पर्क:0731-2483893


कचरा
मनोज सेवलकर

प्रतिदिन गली में आने वाली स्वीपर प्रत्येक घर के सामने झाड़ू लगाते हुए अपना निर्धारित वाक्य दोहराती—“आंटीजी, कचरा्।” तथा प्रत्येक घर उसका आशय जान उसकी हाथ-ट्राली में कचरा डाल देते। परन्तु मेरे पड़ोस में जब भी वह आती, तब उसके वाक्य में परिवर्तन हो जाता। कहती—“दादाजी, कचरा।” क्योंकि दादाजी प्रतिदिन उसी समय अपने घर के आँगन तथा आसपास की सफाई कर कचरा डस्टबिन में डालते, फिर उस स्वीपर की हाथ-ट्राली में।
आज भी दादाजी व्यस्त थे तथा उनकी बहू दरोगा की माफिक बरामदे में खड़ी अपने ससुरजी की गतिविधियों को देख रही थी। जैसे ही स्वीपर ने “दादाजी, कचरा” कहा, वैसे ही उन्होंने उससे प्रश्न किया—“तुम मुझे इस ट्राली में कहाँ डालोगी?”
स्वीपर ने कहा—“क्यों मजाक करते हैं दादाजी!”
“तुम ही तो रोज कहती हो—दादाजी कचरा!”
“वो तो दादाजी, मैं कचरा माँगती हूँ।”
“नहीं बेटा, मैं तो अब रोज कचरा होता जा रहा हूँ…।”
दादाजी की बात को वह तो हँसी-ठिठोली समझकर आगे बढ़ गई। बहू उनके आशय को समझ नाराजगी प्रकट करती, पैर पटकती घर के अन्दर चली गई।
सम्पर्क:0731-2484321

Saturday, 17 January 2009

जनगाथा जनवरी, 2009





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प्रिय पाठकगण,
नया साल आपके जीवन को नई स्फूर्ति से भर दे। समृद्धि सदैव बनी रहे और उन्नति के मार्ग हमेशा खुले रहें।
27 दिसम्बर, 2007 को हमने लघुकथा समालोचना और रचना पर केन्द्रित जनगाथा का शुभारम्भ किया था। जनवरी, 2009 से समकालीन लघुकथा नाम से एक अन्य ब्लॉग सिर्फ लघुकथाओं के लिए प्रारम्भ किया है। इसे आप दायीं ओर हमकदम शीर्ष तले दिए गए लिंक समकालीन लघुकथा पर क्लिक करके आसानी से पढ़ सकते हैं। आशा है कि लघुकथा के लेखकों-पाठकों-अध्येताओं को जनगाथा के साथ-साथ समकालीन लघुकथा का अंक भी पसंद आयेगा।
दिसम्बर 2008 से हमने मालवा-अंचल के लघुकथा-लेखन से परिचित कराना प्रारम्भ किया है।
इसी दौरान मध्य प्रदेश के ही निमाड़-अंचल के श्रमशील लेखक श्रीयुत जगदीश जोशीला ने हिन्दी के 44 चुनिंदा कथाकारों की कुल 132 लघुकथाओं का निमाड़ी-बोली में पुस्तकाकार अनुवाद प्रस्तुत किया है—‘निमाड़ी मऽ हिन्दी की खास नानी वार्ता नऽ नाम से। जोशीला जी के अनुसार प्रस्तुत पुस्तक देश की बोलियों में लघुकथाओं का प्रथम अनुवाद है। बेशक, हिन्दी लघुकथाओं ने भारत की लगभग हर भाषा तक अपनी पहुँच बनाई है। जर्मनी की डॉ इरा वलेरिया सरमा को कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से भारतीय भाषा के इतिहास और दक्षिण एशियाई अध्ययन के अन्तर्गत हिन्दी कला और साहित्य में अभिव्यक्ति की नवीन गद्यात्मक शैली का ऐतिहासिक व साहित्यिक विश्लेषण(A Historical and literary Analysis of Modern Hindi Prose Genre) विषय मिला, जिसका आधार उन्होंने हिन्दी लघुकथा को बनाया। भारतीय विशेषकर हिन्दी लघुकथा-साहित्य पर केन्द्रित उनका शोध-प्रबंध 344 पृष्ठीय अंग्रेजी आलोचनात्मक पुस्तक के रूप में द लघुकथा नाम से 2003 में बर्लिन के प्रकाशन संस्थान वॉल्टर डि ग्रूते(Walter de Gruyter) से प्रकाशित हो चुका है और उसमें देशभर के चर्चित-अचर्चित सैकड़ों लघुकथाकारों की लघुकथाओं को संदर्भ के रूप में उद्धृत किया गया है। यह पुस्तक कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस के अनुमोदन पर छपी है। वर्तमान में इसका मूल्य लगभग 158 अमरीकी डॉलर उल्लिखित है। तात्पर्य यह कि लघुकथा ने निमाड़-अंचल से लेकर कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी तक का सफर सफलतापूर्वक तय कर लिया है।
लघुकथा के क्षेत्र में आज भले ही बहुत अधिक हो-ल्ला नहीं मच रहा है, लेकिन काम लगातार हो रहा है। एक और अच्छी खबर यह है कि अजमेर की डॉ शकुन्तला किरण द्वारा सम्पन्न लघुकथा का हिन्दी का पहला शोध-ग्रंथ हिन्दी लघुकथा अपनी स्वीकृति(1981) के लगभग 27 वर्षों के लम्बे अन्तराल के बाद अब प्रकाशित हो गया है। 256 पृष्ठीय यह ग्रंथ लघुकथा-आन्दोलन और समकालीन-लघुकथा से जुड़े अनेक पहलुओं को समझने के लिए एक आवश्यक पुस्तक है। लघुकथा के इस विकास और सफलता के पीछे जिन हजारों जुझारू लेखकों का श्रम छिपा है, उन सभी को हमारा नमन। बलराम अग्रवाल
समय के साथ चलते मालवांचल के लघुकथाकार
सूर्यकांत नागर
(गतांक से आगे)
मालवा के ग्रामीण जन-जीवन के चितेरे, मालवी संस्कारों में रचे-बसे कथाकार चन्द्रशेखर दुबे, जिनका जनवरी 2005 में 80 वर्ष की आयु में देहावसान हुआ, ने बहुत अच्छी लघुकथाएँ लिखी हैं। निश्छल ग्रामीण-जन की तस्वीर उकेरने में वह सिद्धहस्त थे। शहरी बाबू की ठसक की तुलना में गाँव का व्यक्ति अधिक सहज, सरल एवं शालीन होता है, इस तथ्य को उनकी फासला लघुकथा में रेखांकित किया जा सकता है। बिना किसी शिल्प-वैभव के अपनी बात को प्रभावी ढंग से कहने में दुबेजी माहिर थे। उनकी अन्य महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैंउनका स्नेह, फालतू बातें, राँग नम्बर, ये शब्द आदि।
मूलत: इंदौर निवासी, फिलवक्त मनावर में पदस्थ बैंक-अधिकारी, श्री सतीश राठी पिछले ढाई दशक से लघुकथा-विधा से गहराई से जुड़े हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं में लिखने वाले, लघुकथा को समर्पित राठी क्षितिज वार्षिकी का सम्पादन करते हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने तीसरा क्षितिज, मनोबल, समक्ष लघुकथा-संकलनों का संपादन किया है। उनकी अनेक लघुकथाओं का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उनकी कुछ उल्लेखनीय रचनाएँ हैंनियति, कंसलटेंसी, आग्रह, कुत्ता, खुली किताब आदि।
सुरेश शर्मा ने शुरुआत कहानी-लेखन से की थी। उनके कुछ एकल और कुछ संपादित कहानी-संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं; लेकिन जल्दी ही उन्हें लगा कि कहानी के बजाय वे लघुकथा में अपने भावों को और भी सशक्त ढंग से अभिव्यक्त कर सकते हैं, और शायद इसीलिए उन्होंने पूरे समर्पण भाव से इस दिशा में अपना रुख कर लिया। आज उनकी गिनती देश के प्रमुख लघुकथाकारों में होती है। अनुभव से उपजी उनकी लघुकथाएँ वैचारिक और सांकेतिक हैं। एक व्यंग्य दृष्टि भी वहाँ स्पष्ट नजर आती है। एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य था—‘समान्तर पत्रिका के वृह्द लघुकथा-अंक(2001) का संपादन, जिसे सुरेश शर्मा एवं डॉ इसाक अश्क ने संयुक्त रूप से संपादित किया। इसमें देशभर के 126 लघुकथाकारों की कथाएँ संकलित हैं। त्रिवेणी लघुकथा-संकलन में भी सुरेश शर्मा की कीटाणुनाशक प्रतिनिधि लघुकथाएँ संग्रहीत हैं। इज्जत, संस्कार, घर और मकान, माँ और माँ, बन्द दरवाजे आदि उनकी उल्लेखनीय लघुकथाएँ हैं।
ख्यातिलब्ध ललित निबन्धकार एवं प्राचीन चित्रकला के अध्येता नर्मदाप्रसाद उपाध्याय का अधिकांश कार्यकाल इंदौर-उज्जैन में रहा है। इन दिनों भी वे इंदौर में हैं। सन 1977 में उन्होंने नरेन्द्र मौर्य के साथ समान्तर लघुकथाएँ का संपादन किया था जिसमें कमलेश्वर, नरेन्द्र कोहली, रमेश बतरा, हिमांशु जोशी, कमल गुप्त और हरिशंकर परसाई जैसे दिग्गजों की लघुकथाएँ शामिल थीं। उपाध्यायजी ने पेट, मूल्यों के लिए, शीर्षक, पश्चाताप जैसी अविस्मरणीय लघुकथाओं की रचना की है। डॉ योगेन्द्रनाथ शुक्ल ने बहुत बाद में लघुकथाएँ लिखना प्रारम्भ किया, लेकिन वे इन दिनों काफी तेजी से लघुकथाएँ लिख रहे हैं और थोड़े ही समय में उन्होंने स्वयं को प्रतिभाशाली लघुकथाकार के रूप में स्थापित कर लिया है। चूँकि शुक्लजी प्राध्यापक हैं, अत: उनकी अनेक लघुकथाएँ शिक्षा-जगत से संबंधित हैं। ईमान का इनाम और चीख को उनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ कहा जा सकता है। हालाँकि श्रीराम दवे द्वारा संपादित संकलन त्रिवेणी विख्यात लघुकथाकार बलराम अग्रवाल ने लिखा है—‘डॉ शुक्ल किसी बात को अंडर करंट नहीं करते। सब-कुछ साफ-साफ कह देते हैं। डॉ शुक्ल के सद्प्रयासों से एक अभिनव आयोजन शासकीय कला एवं वाणिज्य विद्यालय, इंदौर में लघुकथा के विचार-पक्ष पर हुआ था। इसमें साहित्यकार और जिलाधीश मनोज श्रीवास्तव, प्रकाशक-लेखक मधुदीप(दिल्ली), ख्यात लघुकथाकार डॉ कृष्ण कमलेश(भोपाल), सूर्यकांत नागर और स्वयं डॉ योगेन्द्रनाथ शुक्ल ने शिरकत की थी। इसमें मनोज श्रीवास्तव ने लघुकथा को परिभाषित करते हुए कहा था कि यदि उपन्यास सर्च-लाइट है, कहानी स्पॉट-लाइट है तो लघुकथा लेज़र-लाइट है जो घाव करने के साथ-साथ उपचार भी करती है। श्री शुक्ल का लघुकथा-संग्रह शपथ-पत्र (1999) भी चर्चित रहा। बाद में मराठी भाषा में भी उसका अनुवाद हुआ।
त्रिवेणी के तीसरे लघुकथाकार हैं प्रतापसिंह सोढ़ी। वे भी लम्बे समय से लघुकथाएँ लिख रहे हैं। सोढ़ीजी गहन चिन्तन-दृष्टि के स्वामी हैं। वे भारतीय संस्कृति के पोषक हैं, लेकिन अंधविश्वास और अंधश्रद्धा के खिलाफ। उनका भरोसा संकेतात्मकता में है। उनकी संरक्षण, तस्वीर बदल गई, जूते आदि लघुकथाएँ हमें दूर तक सोचने को मजबूर करती हैं।
एक और रचनाकार जिसके अल्प और विनम्र योगदान को याद रखा जा सकता है, वह है इन पंक्तियों का लेखक। काली माटीके संपादक सुरेश शर्मा के शब्दों मेंश्री सूर्यकांत नागर पिछले तीन दशक से सक्रिय हैं। मनुष्य के दोहरे और दोगलेपन तथा उसकी कथनी-करनी के भेद को उजागर करने की व्याकुलता उनकी लघुकथाओं में देखी जा सकती है। नैतिक और मानवीय मूल्यों के प्रति आग्रह भी उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है। डॉ सतीश दुबे के साथ लघुकथा-संकलन प्रतिनिधि लघुकथाएँ का तथा गजानन देशमुख के साथ मध्य प्रदेश के 52 लघुकथाकारों की लघुकथाओं का संकलन तीसरी आँख का उन्होंने संपादन किया है। लघुकथा विधा के सिद्धांत-पक्ष पर उनके अनेक आलेख प्रकाशित हुए हैं। उनकी लघुकथाओं का मराठी, पंजाबी और सिन्धी में अनुवाद हुआ है। हाल ही में किताबघर(दिल्ली) से उनकी लघुकथाओं का संग्रह विषबीज (2006) आया है। उन्होंने प्रतिष्ठित समाचार-पत्र नई दुनिया में बहैसियत उप-संपादक आठ वर्षों तक निरन्तर लघुकथाओं को स्थान दिया। यह उल्लेख अप्रासंगिक न होगा कि अनेक नए रचनाकारों ने अपनी लघुकथाओं के लेखन का प्रारम्भ नई दुनिया से ही किया था।
इंदौर के ही अशोक शर्मा भारती के योगदान को भी कम करके नहीं आँका जा सकता। उन्होंने अनेक यादगार लघुकथाएँ लिखने के अतिरिक्त अपनी माँ की स्मृति में लघुकथा-प्रतियोगिता का आयोजन भी किया था। प्राप्त 161 लघुकथाओं को तलाश जारी है(1988) शीर्षक पुस्तक में संकलित किया था। प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार खण्डवा के लखन स्वर्णिक को तथा तृतीय पुरस्कार दिल्ली के कमल चोपड़ा को मिला था। रोजगार, सबक, तब क्या होगा, आदमी आदि भारतीजी की महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैं। इसी क्रम में राजेन्द्र पाण्डेय का नाम भी काबिले-जिक्र है, हालाँकि इन दिनों वे कम सक्रिय हैं। चरणसिंह अमी लघुकथा के नियमित लेखक नहीं हैं, लेकिन पूर्व में उन्होंने उम्दा लघुकथाएँ लिखी हैं जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और संकलनों में प्रकाशित हुई हैं। वे एक अच्छे कवि, कला-समीक्षक और संपादक हैं। वे चित्रावण और इबारत जैसी पत्रिकाओं का संपादन भी करते हैं। उन्होंने कुछ वृत्त-चित्र भी बनाए हैं। रमेश अस्थिवर अत्यन्त स्वाभिमानी, आत्मविश्वासी और दृष्टि-सम्पन्न रचनाकार हैं। अनेक सार्थक लघुकथाएँ लिखने के अलावा उन्होंने लम्बे समय तक शब्दवर पत्रिका का संपादन किया और उसमें लघुकथाओं को पर्याप्त स्थान दिया। आदमी(1989) उनकी लघुकथाओं का संग्रह है।
चैतन्य त्रिवेदी का नाम लघुकथा की दुनिया में अचानक विद्युत की भाँति कौंधा। मूलत: कवि और व्यंग्यकार श्री चैतन्य त्रिवेदी ने आर्य स्मृति सम्मान(किताबघर, दिल्ली) से अलंकृत होने से पूर्व उजागर रूप से कोई लघुकथा नहीं लिखी थी। पहले ही स्ट्रोक में उन्होंने अपनी प्रतिभा और अभिव्यक्ति-कौशल का जो परिचय दिया, उसने सभी को चौंका दिया। उनके पुरस्कृत लघुकथा-संग्रह उल्लास(2000) की लघुकथाओं ने लघुकथा के बँधे-बँधाए ढाँचे को ध्वस्त किया है। उनका रचना-विधान विलक्षण है। उनकी लघुकथाएँ सांकेतिक और काव्यात्मक हैं। दास साहब का कुत्ता, जूते और कालीन, उस दिन मांडव में, खुलता बन्द घर, टी वी वाले भैया आदि उनकी उल्लेखनीय लघुकथाएँ हैं।
कम किन्तु अच्छा लिखने वाले और प्रचार से दूर रहने वाले एक लघुकथाकार हैंहिन्दीतर भाषी, इंदौर के ही एन उन्नी। कथाकार-पत्रकार बलराम और कथाकार-संपादक बलराम अग्रवाल दोनों ही उन्नीजी की लघुकथाओं से बेहद प्रभावित हैं। उन्नीजी की कुछ अच्छी लघुकथाएँ हैंकबूतरों से भी खतरा है, सर्कस, तलाश आदि। हिन्दी में लिखने वाले मालवा-अंचल के दूसरे हिन्दीतर भाषी लघुकथाकार हैंराजेन्द्र काटदरे। उन्होंने समय-समय पर अनेक विचार-प्रधान लघुकथाएँ रची हैं। लघुकथा के प्रति उनके समर्पण-भाव का ही परिणाम है कि उन्होंने हिन्दी लघुकथा डॉट कॉम नाम से वेबसाइट शुरू की हुई है। पिछले दिनों उन्होंने अपने माता-पिता की स्मृति में लघुकथा-कथन का आयोजन भी किया था, जिसमें डॉ सतीश दुबे, सुरेश शर्मा, सूर्यकांत नागर और देवेन्द्र होलकर ने अपनी-अपनी लघुकथाओं का पाठ किया था। काटदरेजी की महत्वपूर्ण लघुकथाएँ हैंनशा, बचत, गुस्सा, चोरी और आतंकवादी। देवेन्द्र होलकर के नाम से याद आया कि मालवा-अंचल से वह तीसरे हिन्दीतर भाषी कथाकार हैं जो लघुकथाएँ लिखते रहते हैं। समाज सेवा, व्यापार, युक्ति और तरकीब उनकी उल्लेखनीय लघुकथाएँ हैं। वैसे, देवेन्द्र होलकर की ख्याति एक सजग पत्र-लेखक के रूप में भी है।
मोबाइल:09893810050
(शेष आगामी अंक में)

लघुकथाएँ
औकात
एन उन्नी
कबाड़ की माँग बढ़ रही है। कबाड़ की कीमत बढ़ रही है। कबाड़ से नए-नए सामान बनकर मण्डी पहुँच रहे हैं। कुल मिलाकर कबाड़ की इज्जत काफी बढ़ गई है।
इस ज्ञान के साथ घर का अति-सूक्ष्म निरीक्षण किया तो पाया कि कमरे कबाड़ से भरे पड़े हैं। एक-साथ दे नहीं सकते, क्योंकि कॉलोनी में एक ही कबाड़ी आता है। कबाड़ ले जाने के लिए उसके पास एक ही ठेला है। मैंने कबाड़ को इकट्ठा किया। भाव करके किश्तों में कई बार ठेला भर दिया। कबाड़ी की खुशी देखते ही बनती थी। आखिर में, जब घर खाली हुआ और मुझे खाने को दौड़ा, तो कबाड़ की अन्तिम किश्त के रूप में मैं स्वयं ठेलागाड़ी पर आसीन हो गया। मजाक समझकर कबाड़ी हँस दिया। कहने लगा, कबाड़ की कीमत आप जानते ही हैं और आप की भी। आप कृपया उतर जाइए।
मैं उतर गया और वह चला गया। उस निर्दयी कबाड़ी की चाल मैं चुपचाप देखता रहा। सोचता रहा किआखिर मेरी औकात क्या है?
सम्पर्क:09893004848

चालाकी
चैतन्य त्रिवेदी
साहूकार ने कहा, ब्याज में तुम्हारा खून पी जाऊँगा।
ठीक है, लेकिन एक शर्त पर! कर्जदार भी कम नहीं था।
कैसी शर्त?
जो खून पानी-पानी हो जाएगा…
ठीक है, उसे छोड़ दूँगा।
अन्त में साहूकार को थक-हार कर अपने मूल पर सन्तोष करना पड़ा।
सम्पर्क:0731-2794711

गन्दी दीवारें
देवेन्द्र गो होलकर
अंजना और मैं पक्की सहेलियाँ थीं। दोनों ने साथ-साथ स्नातक किया। स्नातक होते ही मेरे हाथ पीले कर दिए, परन्तु अंजना की पढ़ाई जारी रही। हफ्ते-दो हफ्ते में अंजना मेरे घर आ जाती थी, तब हम दोनों खूब बातें किया करते थे। समय व्यतीत होता गया। मैं दो बच्चों की माँ बन गई। अंजना जब भी मेरे घर आती, मेरे घर को व्यवस्थित करने की सलाह अवश्य देती। वह हमेशा कहती—“सुनीता, तुमने अपने बॉबी को सिर पर बैठा रखा है। देखो, उसने सारे कमरों की दीवारों पर पेंसिल से आड़ी-तिरछी लाइनें खींचकर उन्हें गन्दा कर रखा है।
अब मैं अंजना को कैसे समझाऊँ कि मेरी बड़ी लड़की टीनू जब भी अपना होमवर्क करने बैठती है, बॉबी भी कॉपी-पेंसिल की जिद करता है और वह कॉपी सहित दीवारों को आड़ी-तिरछी लाइनों से खराब कर देता है।
अंजना की शादी हो गई। वह अपने पति के साथ दूसरे शहर चली गई। पाँच वर्षों बाद ज्ञात हुआ कि अंजना के पति का तबादला भी इसी शहर में हो गया है। बहुत प्रसन्न्ता हुई कि चलो, अब दोनों सहेलियाँ एक ही शहर में रहेंगी।
शीघ्र ही अंजना मेरे घर आई तो हम दोनों प्रसन्नता से मिलीं। उसने पूर्ववत मेरे घर का मुआयना किया तो घर को व्यवस्थित पाया। दीवारों पर नया रंग चढ़ा दिया गया था। मैंने कहा,अंजू, अब घर ठीक है? दीवारें भी साफ-सुथरी हैं। अब हमारा बॉबी बड़ा हो गया है, अब वह दीवारें गन्दी नहीं करता। तुम सुनाओ, तुम्हारे कितने बच्चे हैं? मेरा प्रश्न सुनकर उसके चेहरे पर विषाद की रेखाएँ खिंच गईं। उसने ठण्डी साँस भरकर कहा—“सुनीता, अपनी किस्मत ऐसी कहाँ कि कोई घर की दीवारों को गन्दा करे! सुनीता, वास्तव में तुम्हारे घर की वे दीवारें कितनी सुखद अनुभूति देती थीं जो तुम्हारे लाड़ले बॉबी ने आड़ी-तिरछी लाइनों से चितर दी थीं। अब मेरी एक ही अभिलाषा हैकोई नन्हा मेरी गोद में आए, वह मेरे व्यवस्थित घर को अव्यवस्थित करे, दीवारों पर अपने नन्हें-नन्हें हाथों से आड़ी-तिरछी लाइनें खींचे!
अंजना के शब्द मेरे कानों में अभी भी गूँज रहे थेबच्चों वाला अव्यवस्थित घर बिन बच्चों वाले व्यवस्थित घर से कहीं ज्यादा अच्छा है।
सम्पर्क:0731-2484452

बचत
राजेन्द्र वामन काटदरे
जब बहुत देर ताक वो भिखारी मकान के सामने खड़ा हो एकाध रोटी के लिए मिन्नतें करता रहा तो मकान-मालिक गुस्से से फूट पड़ा—“अब आगे जाते हो या गालियाँ निकालूँ? साले काम-धाम को कहेंगे तो अभी नानी याद आ जाएगी। फोकट की रोटी चाहिए तुम लोगों को।
साबजी, कुछ काम हो तो बता दीजिए, कर दूँगा। भिखारी गिड़गिड़ाते हुए बोला, दो दिन से पेट में कुछ नहीं गया है।
चल, आँगन बुहार दे, एक रुपया दूँगा। मकान-मालिक बोला।
ठीक है बाबूजी। भिखारी ने हामी भरी।
तभी मकान-मालकिन बाहर आई और मकान-मालिक से गुरगुराते हुए बोली, आँगन-वाँगन साफ करवाने की कोई जरूरत ना है।
देखो, कितना गन्दा हो रहा है। सिर्फ…एक रुपए में… मकान-मालिक ने कुछ कहने की कोशिश की।
मकान-मालकिन आवाज धीमी करते हुए बोली, बड़े दानवीर कर्ण बन रहे हो! अरे जानते भी हो कि ऐसे ही लोग चोरी-चकारी करते हैं। दिन में काम के बहाने घर देख जातेअ हैं और रात में हाथ साफ कर जाते हैं। फिर कुछ सोचकर वो बोलीं, वैसे आँगन गन्दा तो हो ही रहा है…ये आशा भी दिनभर जाने क्या करती रहती है!
और उन्होंने रुपया बचाते हुए अपनी बहू को आवाज लगा दी।
सम्पर्क:0731-2592977

क्लीन-सिटी
सतीश राठी
उस सुबह नगर की सारी गन्दगी पर जैसे बर्फ की चादर पड़ गई थी। नागरिक अपने-अपने घरों में ऊँघते हुए पड़े थे। नगर के प्रथम नागरिक माननीय महापौर महोदय एक वातानुकूलित कार में, बाहर से आए हुए उस प्रतिनिधि-मण्डल को लेकर नगर-भ्रमण पर निकले थे, जिसे विभिन्न नगरों में से चयन कर, किसी एक नगर को क्लीन-सिटी का पुरस्कार देना था।
कार की खिड़कियों पर काले शीशे चढ़े हुए थे। गन्दी बस्तियों को पीछे छोड़ते हुए, कार उस प्राचीन महल के दरवाजे पर आकर रुकी जहाँ कभी प्राचीन राजवंश के महाराजा रहा करते थे। उस विशाल महल में लकड़ी के घूमते फर्श पर लगी विशाल डाइनिंग टेबल पर प्रतिनिधि-मण्डल के लिए शाही लंच की व्यवस्था थी। लंच के बाद प्रतिनिधि-मण्डल विशेष रूप से सजाई गई सड़कों से बन्द कार में गुजर गया। नदी, जो एक बदबूदार नाले में बदल चुकी थी, उसके पास के मार्ग से उन्हें ले जाया गया। कालोनियों में मल से भरी नालियाँ, स्वच्छंद विचरण करते सुअर, नल से वितरित होने वाला कीड़े-युक्त पानी और धुएँ से प्रदूषित होती हवा वाले क्षेत्रों से उन्हें बचाया गया।
रात्रि को शाही रेस्ट-हाउस में बातें हुईं। बोतलें खुलीं। सूटकेसों के आदान-प्रदान हुए। अगले दिन के समाचार-पत्रों में उस नगर के क्लीन-सिटी का पुरस्कार जीतने की घोषणा कर दी गई।
समाचार पढ़कर जिन मकानों के नालों में बदबूदार गटरों से गुजरकर कीड़े-युक्त पानी बूँद-बूँद टपक रहा था, उनके रहवासियों ने चिकौटी काट-काट कर अपने शरीर की चमड़ी लाल कर ली कि कहीं वे स्वप्न तो नहीं देख रहे!
लेकिन, जिन लोगों की चमड़ी मोटी और रक्त का रंग सफेद हो चुका था, वे सब उन ऊँघते हुए नगरवासियों को बधाई देते हुए जश्न मना रहे थे।
सम्पर्क:09893164272

चौकीदार
संतोष सुपेकर
मैं सामने के मकान में, हाल ही में रहने आए उस वृद्ध को रोज देखता हूँ। खाँसता, कराहता वह कमजोर-सा व्यक्ति, अलस्सुबह से देर रात तक, न केवल एक कुर्सी डाले घर के बाहर ही बैठा रहता है; बल्कि कई बार तो खाना भी बाहर ही बैठकर खाता है। उसके परिवार में उसके अलावा, जवान नौकरीपेशा बेटा और नवविवाहिता बहू के सिवा कोई और दिखता नहीं है।
एक दिन मैंने पूछा,बाबा, पहले आप क्या करते थे? मतलब, नौकरी…धन्धा…?
बेटा, पहले भी मैं चौकीदार ही था एक फैक्ट्री में।
पहले भी…क्या मतलब? क्या अभी भी आप…?
बेटा, मेरी बात काटता वह बोला, पहले आठ घंटे ही करता था, अब पन्द्रह-सोलह घंटे की चौकीदारी करता हूँ। दिनभर बहू घर में अकेली होती है, इसलिए…और शाम को बेटा आने के बाद, वे दोनों चार-पाँच घंटे घूमने जाते हैं, इसलिए!
सम्पर्क:09302237914

मूल्यों के लिए
नर्मदाप्रसाद उपाध्याय
वे बेहद मोटे थे। इतने कि चला भी नहीं जाता था। वे चलते नहीं, लुढ़कते थे। उन्हें चलते देखकर लगता जैसे किसी गोल-मटोल तकिए के पाँव लगे हों। वे बोलते तो उनका बोलना समझ नहीं आता और जनता बोलती तो उन्हें सुनाई नहीं देता। उनके पास सारी ज्ञानेन्द्रियाँ थीं, लेकिन ऐसी जैसे किसी मिट्टी की मूरत पर कान और नाक चिपका दिए गए हों। मगर उनका बहुत सम्मान था। जनता के लिए वे श्रद्धेय थे, पूजनीय थे, वन्दनीय थे।
वे मूल्यों के लिए जीवित थे।
उसी शहर में एक ऐसा जीव भी था, जिसे गलती से इन्सान मान लिया गया था। उसके पास पहनने को कपड़े नहीं थे। खाने को अनाज नहीं था। उसे सुनने के लिए जनता नहीं थी। दीनता अपने चरम को छूती थी उसके व्यक्तित्व में।
वह मूल्यों के लिए मर रहा था।
सम्पर्क:0731-2363449

Tuesday, 9 December 2008

जनगाथा दिसम्बर, 2008


मध्यप्रदेश के मुख्यत: जिला इंदौर, उज्जैन, देवास, शाजापुर, रतलाम और राजगढ़ का क्षेत्र मालवा-अंचल कहलाता है। समूचा मालवा-अंचल अपनी सांस्कृतिक, साहित्यिक, कलात्मक और शैल्पिक उच्चता के कारण विश्वभर में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। लघुकथा के क्षेत्र में भी मालवा-अंचल के कथाकारों के अपना विशिष्ट योग दिया है, उसे स्तरीयता प्रदान की है। पिछ्ले दिनों इंदौर के कथाकार श्रीयुत सुरेश शर्मा के संपादन में मालवा-अंचल के कथाकारों की लघुकथाओं का संकलन ‘काली माटी’ प्रकाशित हुआ है, जिसमें शरद जोशी, निरंजन जमींदार, डॉ0 श्यामसुन्दर व्यास, डॉ0 सतीश दुबे, सूर्यकांत नागर, विक्रम सोनी, प्रभु जोशी, प्रतापसिंह सोढ़ी, सतीश राठी, एन0 उन्नी आदि मालवा-अंचल के कुल 57 कथाकारों की 140 से ऊपर लघुकथाएँ संकलित हैं। इस बार प्रस्तुत हैं ‘काली माटी’ में संकलित कुछ महिला कथाकारों की लघुकथाएँ। –बलराम अग्रवाल

समय के साथ चलते मालवांचल के लघुकथाकार
सूर्यकांत नागर

मालवा की शस्य-श्यामल भूमि अत्यन्त उर्वरा है। यहाँ गेहूँ, गन्ना, चना बहुतायत से उपजता है तो प्रतिभाएँ भी समान रूप से जन्म लेती हैं। एक समय था जब मालवा की शामें ठण्डी और रातें सुहावनी होती थीं। प्रकृति के साथ खिलवाड़ ने इस भू-भाग के मिजाज बदल दिए हैं। अब तो हालत यह है कि—‘रात गनीमत थी लोग कहते हैं, सुबह भी बदनाम हो रही है अब।’ मौसम के मिजाज भले ही बदल गए हों, मालवी व्यक्ति के संस्कार अभी भी पूरी तरह नहीं बदले हैं। बहुत कुछ बचा है, जिस पर गर्व किया जा सकता है। आज भी यहाँ मनुष्य के व्यवहार में नरमी और शालीनता है, आचरण में भद्रता है, उदारता है। संस्कृति की छाप हमें मालवी लोक-गीतों और लोक-कथाओं में स्पष्ट दिखाई देती है। यही क्रम हमें बाद की कथा-कहानियों में भी दृष्टिगत होता है। वस्तुत: अपने मूल-संस्कारों, वृत्तियों से मुक्त हो पाना आसान नहीं है। यही कारण है कि अंचल के साहित्यिक में यहाँ की माटी की सौंधी सुगंध मौजूद है। मानवीय मूल्य और पड़ौसी से प्रेम की गुहार आज भी यहाँ है। एक परिवार की बेटी पूरे गाँव की बेटी है। हाँ, समय के अनुसार सामाजिक जागरूकता का परिचय भी मालवावासियों ने दिया है और वे समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चले हैं।
आधुनिक संदर्भ में भले न हो, मालवा-क्षेत्र में लोक और बोध-कथाओं के रूप में लघुकथाओं का अस्तित्व रहा है। लघुकथा का आदि-ग्रंथ सन 1802-1803 में रचा गया। बताया जाता है कि ‘हिंदी स्टोरी टेलर’ में 108 लघुकथाएँ थीं। वर्ष 1894 में ‘बैताल पच्चीसी’ का प्रकाशन इंदौर से ही हुआ था। मालवी में भी लघुकथाएँ लिखी गईं। निरंजन जमींदार, बालमुकुंद गर्ग, सतीश दुबे, ललिता रावल आदि की मालवी लघुकथाएँ लोकप्रिय हुईं। अगस्त, 1945 के ‘वीणा’ के अंक में डा0 श्यामसुन्दर व्यास की लघुकथा ‘ध्वनि प्रतिध्वनि’ प्रकाशित हुई थी। उल्लेखनीय है कि उस समय व्यासजी की आयु मात्र अठारह वर्ष थी। तब से व्यासजी द्वारा लघुकथा-लेखन मृत्युपर्यंत जारी रहा। मालवा-क्षेत्र में लघुकथा को जीवित रखने में डा0 व्यास का विशेष योगदान रहा। उनकी लघुकथाएँ प्राय: प्रतीकात्मक होती हैं और उनमें व्यंग्य की एक अन्तरधारा की भाँति प्रवाहित होता रहता है। ‘काँकर- पाथर’ पुस्तक में उनकी 51 लघुकथाएँ हैं। व्यासजी की कुछ प्रमुख लघुकथाएँ हैं—गाल पर उभरे निशान, ठण्डी आग, आजाद प्रहरी, खूँटा और चारा आदि। व्यासजी के अनुसार,‘लघुकथा जीवन के महाकाव्य का एक छोटा-सा छन्द है।’ रामचन्द्र श्रीवास्तव ‘चन्द्र’ ने भी लघुकथाएँ लिखीं, जो ‘वीणा’ में प्रकाशित हुईं। सन 1928 में लिखी उनकी लघुकथा ‘बेबी’ काफी चर्चित रही। यह उल्लेख असंगत नहीं होगा कि पड़ोसी निमाड़ ने भी मालवा को लघुकथा-लेखन के लिए प्रेरित किया। स्व0 माखनलाल चतुर्वेदी की ‘बिल्ली और बुखार’, जिसे हिंदी की प्रथम लघुकथा कहा गया है तथा स्व0 रामनारायण उपाध्याय द्वारा लिखित और सन 1940 में ‘वीणा’ में प्रकाशित उनकी लघुकथाएँ ‘आटा’ और ‘सीमेंट’ इस कथन की पुष्टि करती हैं।
हिंदी लघुकथा-लेखन में नए दौर की शुरुआत तब हुई, जब कमलेश्वर ने ‘सारिका’ में लघुकथाओं का प्रकाशन प्रारम्भ किया। उस दौर में मुख्यत: व्यवस्था पर चोट करती व्यंग्य-प्रधान लघुकथाएँ लिखी जाती रहीं। लेकिन आठवें दशक के उत्तरार्द्ध में व्यंग्यात्मक सत्ता वाली लघुकथाओं के स्थान पर मानवीय संवेदना और मनोवैज्ञानिक धरातल वाली लघुकथाएँ लिखी जाने लगीं। सीधे व्यंग्य-युक्त कथाओं के स्थान पर करुणा-सिक्त व्यंग्य का प्रयोग होने लगा। यह जरूरी भी था, क्योंकि केवल राजनीतिक विसंगतियाँ ही सब-कुछ नहीं हैं। जीवन के विविध पक्षों को, जीवन के सत्य को और मानवीय मूल्यों को उकेरा जाना भी उतना ही जरूरी है। इस बदलाव की प्रतिध्वनि मालवा-क्षेत्र में भी और इंदौर में भी सुनाई देने लगी। इसका बीड़ा उठाया ‘वीणा’ ने तथा डा0 सतीश दुबे और विक्रम सोनी के संपादन में प्रकाशित ‘लघु आघात’ ने। वर्ष 1974 में ही सतीश दुबे की 34 लघुकथाओं का संग्रह ‘सिसकता उजास’ भी आ गया था। इनमें कुछ लघुकथाएँ अपेक्षाकृत लम्बी थीं, लेकिन वे लघुकथा के ढाँचे में ही समाहित थीं। दुबेजी को यह श्रेय भी प्राप्त है कि वर्ष 1978 में उन्होंने सर्वप्रथम मालवी में लघुकथा लिखी और सन 1981 में पहली बार उनकी लघुकथा का मंचन भी हुआ। उनकी प्रमुख लघुकथाएँ हैं—रीढ़, कम्प्रोमाइज, बरकत, वादा, शक आदि। इसके बाद नए विचार, नए विषय और नए शिल्प के साथ लघुकथाएँ आने लगीं, हालाँकि आधुनिक-लघुकथा का वह शैशव-काल ही था। घिसे-पिटे विषयों पर प्राय: सामान्य-सी लघुकथाएँ लिखी जा रही थीं, लेकिन पहला धमाका तब हुआ जब रतलाम से रमेश जैन और भगीरथ के संपादन में ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ प्रकाशित और चर्चित हुआ। इस संकलन की चर्चा आज भी सर्वत्र होती है। वर्ष 1976 में ‘वीणा’ के रजत जयन्ती अंक में कई नामधारी लेखकों की लघुकथाएँ छपीं। इसी वर्ष सतीश दुबे और सूर्यकांत नागर के संपादन में ‘प्रतिनिधि लघुकथाएँ’ नामक संकलन प्रकाशित हुआ जिसमें अधिकांश लेखक इंदौर और उसके आसपास के क्षेत्र के थे।
यह तथ्य कम महत्वपूर्ण नहीं है कि मालवा में जन्मे, बढ़े-पढ़े प्रख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी ने भी कुछ लघुकथाएँ लिखी थीं। उनकी लघुकथाओं में व्यंग्य एक ‘अण्डर-करण्ट’ की तरह रहता है। उनकी मैं भगीरथ हूँ, कुत्ता, चौथा बंदर आदि लघुकथाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वैसे लघुकथाएँ कहानीकार-चित्रकार प्रभु जोशी ने भी लिखीं, लेकिन जब बाद में उन्होंने कहानियाँ लिखना बंद कर दिया तो लघुकथाओं के लिए भी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी। ‘प्रजातंत्र’ उनकी यादगार लघुकथा है।
विक्रम सोनी, जो इन दिनों मौन हैं और लगता है जैसे सन्यासाश्रम में चले गये हैं, को आज भी गोष्ठियों, सेमिनारों और संकलनों में सम्मान के साथ याद किया जाता है। दरअसल, उनका योगदान है ही इतना महत्वपूर्ण। उन्होंने सन 1981 से प्रारम्भ आगामी सात वर्षों तक ‘लघु आघात’ का संपादन-प्रकाशन इंदौर से किया और लघुकथा के प्रचार-प्रसार में महती भूमिका निभाई। यही नहीं, उन्होंने मानचित्र(1983), छोटे-छोटे सबूत(1984), पत्थर से पत्थर तक, दरख्त तथा लावा(1987) जैसे अखिल भारतीय स्तर के लघुकथा-संकलनों का संपादन भी किया। ‘लघु आघात’ और ‘प्रतिनिधि लघुकथाएँ’ के माध्यम से जो एक नया नाम उभरा, वह है—वेद हिमांशु। वह आज भी लघुकथा के प्रति समर्पित हैं। उन्होंने राजेन्द्र निरन्तर को साथ लेकर ‘स्याह हाशिए’ लघुकथा-संकलन का संपादन किया। इसमें लगभग 50 क्षेत्रीय लघुकथाकारों की कथाएँ संकलित हैं। फिलवक्त वह शाजापुर में हैं।
दिसम्बर 1981 इसलिए याद किया जाएगा, क्योंकि इस माह में साहित्यिक पत्रिका ‘वीणा’ का लघुकथा विषेशांक प्रकाशित हुआ था, जिसमें अनेक प्रतिष्ठित एवं नवोदित लघुकथाकारों की लघुकथाएँ छपी थीं। इसमें जहाँ एक ओर विष्णु प्रभाकर, रामनारायण उपाध्याय, रमेश बतरा, कमल चोपड़ा, बलराम, कमलेश भारतीय, मनीषराय यादव जैसे प्रतिष्ठित एवं स्थापित रचनाकारों की लघुकथाएँ थीं, वहीं क्षेत्रीय-स्तर पर डा0 श्यामसुन्दर व्यास, राजेन्द्र कुमार शर्मा, चन्द्रशेखर दुबे, सुरेश शर्मा, निरंजन जमींदार, वसंत निरगुणे, वेद हिमांशु, महेश भंडारी, अर्जुन चौहान आदि की लघुकथाएँ भी शामिल थीं। लघुकथा-विधा के विविध पक्षों पर विचारोत्तेजक आलेख भी थे। इस दौरान धार के देवीप्रकाश हेमन्त ने भी कुछ अच्छी लघुकथाएँ लिखीं।
एक और लघुकथाकार, जिनके नामोल्लेख के बिना यह विवरण अधूरा ही माना जाएगा, वह हैं इंदौर के स्व0 राजेन्द्र कुमार शर्मा। गलत ट्रेन, बाँध, धन्धा, दो नम्बर आदि उनकी यादगार लघुकथाएँ हैं। ‘गलत ट्रेन’ लघुकथा की तारीफ तो कथाकार बलराम ने एकाधिक बार की है। राजेन्द्र कुमार ने ही ‘स्वदेश’ समाचार-पत्र में मालवा-क्षेत्र के अनेक लघुकथाकारों को लेकर लघुकथा-केन्द्रित एक परिशिष्ट निकाला था। राजेन्द्र की असामयिक मृत्यु लघुकथा-विधा की एक बड़ी क्षति है।… (शेष आगामी अंक में)


लघुकथाएँ


छोटा बच्चा
सीमा पाण्डे ‘सुशी’

रिमझिम फुहारें बरसना अभी बस बन्द ही हुई थीं। बगीचे के वृक्षों की पत्तियों पर बूँदें मोती की तरह अटकी हुई थीं। ठण्डी हवा के झोंके, चाय का प्याला, नजर उपन्यास पर तो कभी राह से गुजरने वाले इक्का-दुक्का लोगों पर ठहर जाती।
“ले लो…ऽ…बरसाती…ऽ…छोटे बच्चों की…ऽ…!” मीठी-सी हाँक सुनाई दी। जब देखा, तो चेहरे पर हँसी बिखर गई। बेचने वाला खुद ही एक छोटा-सा बच्चा था। नजरों से नजरें मिलीं और उसके कदम गेट तक आ गये।
“बरसाती चाहिए बच्चों की?” बिल्कुल मुसीबत से उबारने वाला अन्दाज।
“नहीं, जब घर में छोटा बच्चा ही नहीं है तो बरसाती का क्या उपयोग?”
“अच्छा…!” कदम पलटे।
सुनो! तुम क्यों नहीं ओढ़ लेते एक बरसाती? भीग रहे हो।” माथे पर छितरे बाल और चेहरे पर चमकते-लुढ़कते मोती देखकर रहा न गया।
“क्लऽऽच!” ‘बेकार में टाइम खोटी कर दिया’ जैसे कुछ भाव चेहरे पर थे और वातावरण में देर तक गूँजता रहा उसका यह प्रश्न—“मैं कोई छोटा बच्चा हूँ क्या?”

दवा में छिपा दर्द
मीरा जैन


एक हितैषी ने बारह वर्षीय ध्रुव को लगभग डाँटते हुए समझाने की कोशिश की—“क्यों रे धुरवा, लगता है तू कुछ ज्यादा ही समझदार हो गया है? बड़े लोगों की बराबरी करने में तुला है!! पहले अपने शरीर को देख, हड्डियों का ढाँचा हो रहा है। पेट और पीठ चिपककर एक हो गये हैं। खाने के लिए भरपेट भोजन नहीं है, फिर भी इस कड़कड़ाती ठण्ड में तू शायद दूसरों की देखा-देखी दौड़ लगाता है। इतना मत दौड़ा कर, नहीं तो सूख कर काँटा हो जाएगा। स्वस्थ रहने के चक्कर में तू बीमार भी पड़ सकता है, समझा?”
पहले तो ध्रुव चुप रहा, लेकिन हितैषी की समझाइश जब लम्बी होने लगी तब उसने हिचकिचाते हुए मुँह खोला—“बाबूजी, मैं स्वस्थ रहने के लिए ही दौड़ता हूँ, पर दूसरों की देखा-देखी नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से। रात की चौकीदारी करने के बाद सुबह पाँच बजे बापू जब घर आते हैं, तब मेरा ओढ़ना-बिछौना उनका हो जाता है। उस वक्त मेरे पास ठण्ड से बचने के लिए दौड़ने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं होता है।”
ध्रुव का स्पष्टीकरण सुन कुछ समय पूर्व हितैषी के चेहरे पर व्याप्त गर्वीलापन अब सिमटकर सिर से पर तक धारण ऊनी वस्त्रों में समाहित हो चुका था।

बाकी सब
प्रज्ञा पाठक

“चल यार! कॉलेज की छुट्टी होने वाली है। लड़कियाँ बाहर निकलेंगी, जरा मजा लेंगे।”
पहले की बात से दूसरा पूर्णत: सहमत था। कॉलेज पहुँचने पर पहले ने दूसरे की ओर तेजी से पलटकर कड़क स्वर में कहा—“बाकी सब तो ठीक है, मगर वह पीले रंग के सूट वाली मेरी बहन है, उसके आसपास भी मत फटकना।”
दूसरे ने भी उसी रुक्षता से पहले को अपनी बहन के प्रति सावधान किया। पुन: दोनों परस्पर सहमत हुए और बाकी सब पर अपना नैसर्गिक अधिकार मानकर मजा लेने में मशगूल हो गए।

ग्रह-शान्ति

चेतना भाटी

फिर वही चीख-पुकार, जैसीकि हमेशा रहती थी उस घर में। चिड़चिड़ापन, तनाव, गुस्सा, जलन, कुढ़न, प्रतिस्पर्धा, बदले की भावना एक-दूसरे से, घर के प्रत्येक सदस्य में।
अभी कुछ ही दिनों पहले बड़ा यज्ञ करवाया था ग्रह-शान्ति के लिए गृह-स्वामी ने और तीर्थ-स्थल पर जाकर भी करवाई थी ग्रह-शान्ति। और अब फिर वही स्थिति! ग्रह-कलह!!
दूर, अन्तरिक्ष में स्थित ग्रह हैरान थे—हमें तो शान्त किया जा रहा है, मगर इनका क्या?

भविष्यफल
लीला रूपायन

श्रीमती सहगल को पता नहीं, वहम था या उनकी दुर्बलता। उन्हें भविष्यफल जानने की बड़ी उत्सुकता रहती थी। कभी पेपर में भविष्यफल देखतीं, कभी किसी हस्तरेखा जानने वाले के पास चली जातीं या उसे घर पर ही बुलवा लेतीं। हर ज्योतिषी को पूरे परिवार की पत्रिका दिखाती रहतीं। उनकी इस आदत के कारण सारा घर परेशान था। पति समझाते—“भगवान का दिया क्या नहीं है हमारे पास। पैसा, इज्जत, अच्छी सन्तानें, घर की इतनी बड़ी कोठी, नौकर-चाकर; और क्या चाहिए तुम्हें? इतने आज्ञाकारी बच्चे पाकर भी जाने तुम और क्या जानना चाहती हो? मन में कोई बात हो तो मुझे बताओ, बच्चों को बताओ। खड़े-खड़े पूरी कर देंगे।”
बड़े भारी मन से वह पति को बतातीं—“कुछ खास नहीं जी, बस यही धड़का लगा रहता है, कहीं किसी बच्चे के साथ कोई अनहोनी न हो जाए। रोज-रोज पेपरों में पढ़-पढ़कर जान निकल जाती है। कहीं अपहरण हो गया, कहीं बलात्कार, कहीं एक्सीडेंट! परिवार में छोटे से लेकर बड़े बाहर आते-जाते रहते हैं। लड़कियाँ भी स्कूल कॉलेज जाती हैं, किसी के साथ कोई…!”
“तो क्या ये हस्तरेखा जानने वाले, जिन्हें बुलाकर घर में बिठा लेती हो, वे तुम्हारी हर समस्या को सुलझा देंगे?” पति की आवाज में गुस्सा होता है।
श्रीमती सहगल बड़ी निश्चितता से बताती,“हाँ जी, जो उपाय बताते हैं, उन्हें पूरा करने से ग्रह टल जाते हैं। देखो न, अपना बंटी पाठ करने से ठीक हो गया था। कैसे मन से पण्डित जी ने सारा पूजा-पाठ किया था।”
“और जो डॉक्टर ने इलाज किया था?”
“मानो या न मानो। ठीक तो पण्डित जी की पूजा से ही हुआ था। जब उठकर भागने लगा था, तब पूजा समाप्त की थी उसने।”
“कौन माथा फोड़े तुम्हारे स्त्री-हठ से।” पति के गुस्से का भी उन पर असर नहीं होता था।
एक दिन उनकी पोती सारा कॉलेज से आई तो देखकर दंग रह गई। दादी एक को नहीं, दो-दो को हाथ दिखा रही हैं। साथ में घर वालों की जन्म-पत्रिका भी लेकर बैठी हैं। वे दोनों, जो सूरत से गुण्डे-मवाली लग रहे थे, दादी को ग्रह-दशा बता-बता कर ठगे जा रहे थे।
“माँ जी, अपना ध्यान रखना…घर में कोई सदस्य आपको नुकसान पहुँचा सकता है।” एक ने कहा।
दूसरा बोला,“बोला न माँ जी, पैसा बुरी चीज है, पैसे की खातिर…।” बाकी बात उसने अधूरी छोड़ दी।
सारा सब-कुछ आराम से सुनती रही। फिर वह चुपके-से उठी और घासलेट की बोतल के साथ माचिस भी ले आई। उनके ऊपर घासलेट उँड़ेलकर बोली,“क्यों महाराज, आज अपना भविष्यफल देखकर नहीं निकले थे घर से कि आपकी मृत्यु एक कन्या के हाथों होने वाली है?” और उसने माचिस की तीली जला ली। दोनों भविष्यफल बताने वाले महाशय अपना झोला छोड़कर सिर पर पैर राखकर भाग गए। सारा की हिम्मत दादी की आँखों पर पड़ा परदा हटा दिया।


परिवर्तन
रेखा कारड़ा

“देखो बेटा, कल आपके प्रिंसीपल ने सबके सामने मम्मी और पापा को बेइज्जत किया या नहीं?” रोहित अपने आठ वर्षीय बेटे से कह रहा था।
“जी पापा!” अंकुर का सिर शर्म से झुक गया।
“जानते हो, उन्होंने यह धमकी दी है कि अगर इस साल तुम्हारा रिजल्ट अच्छा नहीं बना तो तुम्हें स्कूल से निकाल देंगे।”
“…”
“बेटे, हम आप पर कितना खर्च करते हैं, आपने कभी सोचा है?”
“…”
“सुबह नींद से उठकर आप रोजाना चाय पीते हैं…”
“…”
“…और नहीं तो एक रुपए की तो होगी!”
“…”
“फिर आप नाश्ता खाते हैं, उस पर कितने खर्च होते हैं?”
“…”
“उसके बाद दिन का खाना, स्कूल जाने-आने का टैक्सी का किराया, स्कूल की फीस, आवश्यक अध्ययन सामग्री, फिर शाम की चाय और रात का भोजन। इसके अलावा भी बेटे, हम अनगिनत खर्च तुम्हारे लिए करते हैं; जैसे, घुमाने ले जाना, पिक्चर ले जाना, नए कपड़े, जूते लाना अथवा खेल-खिलौने आदि…।”
पापा की सारी बातें सुन अंकुर मुँह से कुछ भी नहीं कह पाया।
“लेकिन बेटे, इन सब के बदले हम आपसे चाहते क्या हैं? सिर्फ यही न कि तुम हमारा मान बढ़ा नहीं सकते तो कम-से-कम घटाओ तो नहीं।”
अगले परीक्षा-परिणाम में अंकुर पूरे प्रदेश में प्रथम रहा।

मुखौटा
सुमति देशपाण्डे

आश्रम की सफाई का कार्य बहुत जोर-शोर से चल रहा था।
दीनानाथ जी अपने कमरे में शान्ति से बैठे थे। आश्रम के अधिकारी ने उनके कमरे में झाँका—“चलो, आपका कमरा तो एकदम साफ-सुथरा और व्यवस्थित है। आज सभी से अपने-अपने कमरे साफ करवाने हैं। कल शहर के प्रतिष्ठित माननीय श्रीमान केसरलाल जी आश्रम देखने आ रहे हैं। बड़े दानी हैं वे। साफ-सफाई का बहुत अच्छा ख्याल रहता है उनका। वृद्धों के प्रति उनके मन में बहुत आस्था-आदर है।”
आश्रम के अधिकारी उनकी तारीफ के पुल बाँधे जा रहे थे। वह कह रहे थे,“कल जब वे आएँगे, सब के लिए कम्बल लेकर आ रहे हैं, कल का खाना भी उन्हीं की तरफ से रहेगा। उनके पापा की पसन्द का खाना बनेगा।”
दीनानाथ जी को बातें सुनना असह्य हो रहा था। उन्हें लग रहा था कि जोर-से चिल्ला कर कह दें—“केसरलालजी, और कोई नहीं, मेरा बेटा केशव है।”

Sunday, 16 November 2008

हरियाणा का हिंदी लघुकथा लेखन / डा॰ अशोक भाटिया

सितम्बर, 2008 में प्रारम्भ हुए डा अशोक भाटिया के लेख की अंतिम किश्त इस बार प्रस्तुत है। इसी के साथ ‘जनगाथा’ की प्रस्तुति का पहला वर्ष भी पूरा हो रहा है। सभी मित्रों से आवश्यक सुझाव व सहयोग आमंत्रित हैं। – बलराम अग्रवाल


हरियाणा का हिंदी लघुकथा लेखन
डा॰ अशोक भाटिया

अक्टूबर, 2008 से आगे का अंश…
हरियाणा के प्रतिनिधि लघुकथा लेखक

विष्णु प्रभाकर
हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार विष्णु प्रभाकर मूलत: नाटककार व कहानीकार हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने जीवनी और लघुकथा-साहित्य में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है।
विष्णु प्रभाकर की पहली लघुकथा ‘सार्थकता’ मुंशी प्रेमचंद द्वारा संस्थापित/संपादित ‘हंस’ पत्रिका के जनवरी 1939 अंक में प्रकाशित हुई थी। इनके अब तक—‘जीवन पराग’(1963), ‘आपकी कृपा है’(1982) और ‘कौन जीता कौन हारा(1989)—तीन लघुकथा-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इन तीनों ही संग्रहों में लघुकथाएँ और बोधकथाएँ, दोनों साथ-साथ रखी गई हैं। ‘आपकी कृपा है’ संग्रह में लघुकथा-आंदोलन के महत्व का उल्लेख करते हुए वह कहते हैं—“आज लघुकथा को लेकर जो आंदोलन उभरा है, यदि वह न उभरा होता तो संभवत: मेरा ध्यान इस ओर इतनी गंभीरता से न जाता।” उनके ही शब्दों में—“आदर्श लघुकथा वह होती है, जो किसी कहानी का कथानक न बन सके।”
विष्णु प्रभाकर की अनेकश: चर्चित लघुकथाओं में फर्क, पानी की जाति, ईश्वर का चेहरा और दोस्ती प्रमुख हैं। ‘फर्क’ लघुकथा में मनुष्य-मनुष्य के बीच बनाई हुई सीमाओं पर सहज व्यंग्य किया गया है, तो ‘ईश्वर का चेहरा’ रचना भावनात्मक धरातल पर आकर सांप्रदायिक भेदभाव को भुलाने की प्रेरणा देती है।
विष्णु प्रभाकर की सन 1963 के बाद लिखी लघुकथाएँ मुख्य रूप से मानवीय संवेदनाओं की रचनाएँ हैं। उन्होंने द्वंद्व के माध्यम से मानव में छिपे शुभ और सुंदर तत्वों को उभारने का कलात्मक प्रयास किया है। इन रचनाओं की ताकत इनकी सजग सरलता व सहजता में है।

पूरन मुद्गल
मूलत: कहानीकार और कवि पूरन मुद्गल की पहली लघुकथा ‘कुल्हाड़ा और क्लर्क’ सन 1964 में हिंदी मिलाप में प्रकाशित हुई थी। इनकी लघुकथाओं का पहला संग्रह ‘निरंतर इतिहास’ सन 1982 में प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त ‘लघु आघात’ पत्रिका में इन्होंने लघुकथा के आलोचना-पक्ष पर भी कलम चलाई है। वह आठवें दशक में हिंदी लघुकथा आंदोलन के सक्रिय साक्षी रहे हैं।
पूरन मुद्गल जन-पक्षधरता के रचनाकार हैं। अपनी लघुकथाओं में इन्होंने विभिन्न सामाजिक-पारिवारिक विषयों को उकेरा है। ‘अमरता’, ‘निरंतर इतिहास’, ‘बाहर भीतर’, ‘पहला झूठ’ इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं। हंसराज रहबर के शब्दों में—“पूरन मुद्गल ने अपनी लघुकथाओं में जीवन की साधारण घटनाओं को इस तरह उकेरा है कि वर्तमान समाज का कोई न कोई सत्य नजरों के सामने आकर साकार हो जाता है।” शंकर पुणतांबेकर का मत है कि—“पूरन मुद्गल संस्कारगत(कुसंस्कारगत भी) व्यक्ति के चित्रण में सिद्धहस्त हैं।”

रमेश बतरा
समकालीन हिंदी लघुकथा को सही दिशा देने वाले रचनाकारों में कथाकार-संपादक रमेश बतरा अग्रणी हैं। इन्होंने आठवें दशक के आरंभ से ही एक ओर अपने विभिन्न लेखों के माध्यम से लघुकथा की शक्ति और व्यापकता को लगातार रेखांकित किया तो दूसरी ओर स्तरीय लघुकथाएँ लिखकर इस साहित्य-प्रकार को समृद्ध किया। 1971-72 में करनाल से पाक्षिक समाचार-पत्र ‘बढ़ते कदम’ संपादित कर उसमें लघुकथाओं को स्थान दिया। अगस्त 1973 में इन्होंने अम्बाला छावनी से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘तारिका’ का लघुकथांक संपादित किया और जून 1974 में चंडीगढ़ से प्रकाशित ‘साहित्य निर्झर’ का लघुकथांक। इस दौर के बाद पहले वह प्रतिष्ठित कथा-पत्रिका ‘सारिका’ में, तत्पश्चात ‘नवभारत टाइम्स’ तथा ‘संडे मेल’ में उप-संपादक व वरिष्ट उप-संपादक रहे। इन सभी पत्र-पत्रिकाओं में कार्यरत रहते हुए इनके माध्यम से तथा इनके अतिरिक्त अन्य पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी रमेश बतरा ने हिंदी लघुकथा के स्वरूप को निखारने-सँवारने का काम निरंतर जारी रखा। अपनी लघुकथाओं का हालाँकि वह कोई एकल लघुकथा-संग्रह प्रकाशित नहीं करा पाए; बावजूद इसके समकालीन हिंदी लघुकथा साहित्य में उनका स्थान अक्षुण्ण है। ‘सुअर’, ‘खोया हुआ आदमी’, ‘बीच बाज़ार’, ‘नौकरी’, ‘लड़ाई’, ‘नागरिक’ आदि इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं। ‘कहूँ कहानी’ शीर्षक इनकी लघुकथा अपने अति-लघु आकार व तीव्र संवेदनशीलता के कारण बेहद चर्चित है—
--ए रफीक भाई! सुनो…उत्पादन के सुख से भरपूर थकान की खुमारी लिए, रात मैं कारखाने से घर पहुँचा, तो मेरी बेटी ने एक कहानी कही—एक लाजा है, वो बोत गलीब है!
रमेश बतरा की लघुकथाएँ अँधेरे में रोशनी का काम करती हैं। कलात्मकता और सांकेतिकता के ज़रिए वह अपने कथन को सशक्त रूप में उभारते हैं। इनकी लघुकथाएँ ज़रा-सा कलात्मक घुमाव देकर शब्दों से नई अर्थ-व्यंजनाएँ उभारने में सक्षम हैं। इनकी ‘सुअर’ शीर्षक लघुकथा सांप्रदायिक उन्मादियों को सचेत करती है कि—मस्जिद में सुअर नहीं घुस आया, बल्कि सुअर तो राजनीतिक गलियारे से निकली संकीर्णता का नाम है।


पृथ्वीराज अरोड़ा
समकालीन हिंदी लघुकथा को पुनर्स्थापित करने में महत्वपूर्ण योग देने वाले कथाकारों में पृथ्वीराज अरोड़ा प्रमुख हैं। इनकी अधिकतर लघुकथाएँ ‘सारिका’ के माध्यम से सामने आईं। अब तक इनके दो लघुकथा-संग्रह—‘तीन न तेरह’(1997) और ‘आओ इंसान बनाएँ’(2007) प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी पहली लघुकथा ‘एहसास’ सन 1974 में प्रकाशित हुई।
पृथ्वीराज अरोड़ा की लघुकथाओं का मूल-स्वर अन्याय और कुप्रथाओं का विरोधी है। मुख्यत: मध्य-वर्ग पर केन्द्रित इनकी रचनाएँ मध्य-वर्ग की संवेदना की उपज हैं। इनकी लघुकथाएँ पाठक को संघर्षशील होने व अन्याय के विरुद्ध सक्रिय होने की प्रेरणा देती हैं। ‘दया’, ‘दु:ख’, ‘विकार’, ‘कील’, ‘प्रभु-कृपा’ आदि इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं। ‘दया’ पृथ्वीराज अरोड़ा की ही नहीं, हिंदी की श्रेष्ठ लघुकथाओं में अपना स्थान रखती है। ‘दया-भाव भी धन पर निर्भर है’—इसे रचनात्मक माध्यम द्वारा स्पष्ट करते हुए यह रचना इतिहास की छोटी-सी कड़ी को नई दृष्टि से देखने का आग्रह करती है।

कमलेश भारतीय
आठवें दशक में हिंदी लघुकथा के परिदृश्य में जो कथाकार निरंतर सृजनरत रहे, उनमें कमलेश भारतीय प्रमुख हैं। व्यवसाय से पत्रकार कमलेश भारतीय के अब तक तीन लघुकथा-संग्रह—‘मस्तराम जिंदाबाद’(1984), ‘इस बार’(1992), और ‘ऐसे थे तुम’(2008) प्रकाशित हो चुके हैं। भारतीय की पहली लघुकथा ‘किसान’ सन 1971 में ‘प्रयास’ में प्रकाशित हुई थी। इनकी लघुकथाएँ मुख्यत: ‘सारिका’, ‘कादम्बिनी’, ‘दैनिक ट्रिब्यून’ में छपी हैं। इनके अतिरिक्त प्रमुख लघुकथा-विशेषांकों में भी इनकी लघुकथाएँ शामिल होती रही हैं।
कमलेश भारतीय ने अपनी लघुकथाओं में एक साथ ग्राम्य जीवन, महानगरीय सभ्यता और आतंकवाद-विरोध पर कलम चलाई है। इनकी प्रतिनिधि लघुकथाओं में ‘अब क्या देंगे’, ‘किसान’, ‘सपने’, ‘कायर’, ‘विश्वास’ और ‘मन का चोर’ शामिल हैं। ‘कायर’ इनकी सबसे चर्चित लघुकथा है, जो संतुलन और मजबूती के साथ स्त्री-पुरुष संबंधों को उभारती है। कमलेश भारतीय मूलत: मानवीय संबंधों के कथाकार हैं। इनकी लघुकथाओं की भाषा अपनी रवानगी व सादगी के कारण खास तौर से ध्यान खींचती है।

अशोक भाटिया

अशोक भाटिया ने लघुकथा के क्षेत्र में रचना, आलोचना, संपादन और अनुवाद—चार धरातलों पर कार्य किया है। ‘जंगल में आदमी’(1990) इनकी लघुकथाओं का चर्चित संग्रह है। इनकी पहली लघुकथा ‘अपराधी’ जून 1978 में प्रकाशित ‘समग्र” के लघुकथांक में छपी थी। ‘रंग’, ‘रिश्ते’, ‘तीसरा चित्र’, ‘पीढ़ी-दर-पीढ़ी’, ‘चौथा चित्र’, ‘व्यथा कथा’, ‘कपों की कहानी’ आदि इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ मानी जाती हैं। राधेलाल बिजघावने के शब्दों में, “अशोक भाटिया डस्टबिन-संस्कृति की सड़ाँध और एकतरफा अभियोगों की छिन्न-भिन्न मानसिकता को लघुकथाओं में बुनते हैं।” और रामयतन यादव के शब्दों में,“… ‘रंग’ वेदनात्मक अनुभूति पर आधारित सहज रूप से तिलमिला देने वाली लघुकथा है। यह लघुकथा सूक्ष्म विचार-शक्ति और सर्जनात्मक क्षमता का विस्मयकारी प्रमाण है।”
बलराम अग्रवाल का कहना है कि—“…‘श्रेष्ठ पंजाबी लघुकथाएँ’(1990) अशोक भाटिया का पंजाबी से हिंदी में किए गए स्तरीय अनुवाद और संपादन का कार्य है, जबकि ‘पेंसठ हिंदी लघुकथाएँ’(2001), ‘निर्वाचित लघुकथाएँ’(2005) और ‘विश्व साहित्य से लघुकथाएँ’(2006) उनके सजग लघुकथा-चयन और शोधपरक संपादकीय लेखों/ बेधक भूमिकाओं के कारण अनगिनत संपादित लघुकथा-संकलनों की भीड़ में अपना अलग और विशिष्ट मुकाम रखते हैं। उनका आलोचनात्मक लेख ‘हिंदी लघुकथा की यात्रा’ अनेक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।”
‘लघुकथा और शास्त्रीय सवाल’(1987) लघुकथा पर इनका पहला आलोचनात्मक लेख था और यह कार्य अद्यावधि जारी है। पंजाबी के अलावा अशोक भाटिया अंग्रेजी और उर्दू भाषा से भी लघुकथाओं का हिंदी में अनुवाद करते रहे हैं।

रामकुमार आत्रेय
मूलत: कवि, रामकुमार आत्रेय सन 1980 से लघुकथाएँ भी निरंतर लिख रहे हैं। इनकी लघूकथाएँ हिंदी की राष्ट्रीय स्तर की लगभग सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं, यथा—‘सारिका’, ‘हंस’, ‘कथादेश’, ‘कथाक्रम’, ‘वर्तमान साहित्य’, ‘अक्षरा’, ‘वागर्थ’ और व्यावसायिक/सरकारी पत्रिकाओं ‘कादम्बिनी’ व ‘आजकल’ में छपती रही हैं। अब तक रामकुमार आत्रेय के तीन लघुकथा-संग्रह—‘इक्कीस जूते’(1993), ‘आँखों वाले अंधे’(1999) और ‘छोटी सी बात’(2006) प्रकाशित हो चुके हैं।
‘समझ’, ‘सपनों की संदूकची’, ‘नींद’, ‘इक्कीस जूते’, ‘मक्कारी’, ‘छोटी-सी बात’, ‘हरिद्वार’, ‘समय’ आदि इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं। इनकी लघुकथाओं का मूल-स्वर अन्याय की खिलाफत और न्याय की तलाश है। प्रभावान्विति के लिए रामकुमार आत्रेय कहीं आंचलिक भाषा का, तो कहीं दृष्टांत और रूपक का सहारा लेते हैं।

रामनिवास मानव
मूल रूप से कवि रामनिवास मानव की कलम पिछले तीन दशकों से लघुकथा-लिखन में भी चलती रही है। अब तक रामनिवास मानव के दो लघुकथा-संग्रह ‘घर लौटते कदम’(1988) और ‘इतिहास गवाह है’(1996) प्रकाशित हो चुके हैं। इनसे पूर्व दर्शन दीप के साथ इनकी लघुकथाओं का संग्रह ‘ताकि सनद रहे’(1982) भी प्रकाशित हो चुका है। डा सुभाष रस्तोगी के शब्दों में—“…’घर लौटते कदम’ में जहाँ पारिवारिक जीवन और दाम्पत्य-संबंधों से जुड़ी लघुकथाओं का प्राधान्य था, वहाँ इस(इतिहास गवाह है) संग्रह में लेखक ने सामाजिक विसंगतियों, राजनीतिक विद्रूपताओं तथा जीवन के अन्यान्य पक्षों से जुड़े कथा-प्रसंगों को अपनी लघुकथा-रचना का आधार बनाया है।”
‘स्टेटस’, ‘टोलरेन्स’, ‘मुक्ति’, ‘बोझ’, ‘साँप’ आदि इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं। सहज, सजग भाषा इनकी लघुकथाओं की शक्ति को बढ़ाती है।

हरियाणा राज्य की अनेक महिला लघुकथाकारों की लघुकथाएँ भी यत्र-तत्र छ्पती रही हैं, परन्तु सार्थक लेखन की दृष्टि से समकालीन लघुकथा के उन्नयन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली जिन दो कथाकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है, वे हैं—उर्मि कृष्ण और कमला चमोला।

उर्मि कृष्ण
सार्थक लेखन में विश्वास करने वाली उर्मि कृष्ण ने लेखन और संपादन दोनों माध्यमों से लघुकथा-साहित्य को समृद्ध किया है। अम्बाला छावनी से, पहले महाराज कृष्ण जैन ने और 2002 के बाद से उर्मि कृष्ण ने ‘तारिका’ में लगातार लघुकथाओं को स्थान दिया है। ‘तारिका’ के अगस्त 2002 और सितम्बर 2005 के अंक इन्होंने लघुकथांक के रूप में संपादित किए हैं। उर्मि कृष्ण की लघुकथाओं के संग्रह का नाम ‘दृष्टि’ है।
‘मैं दुर्गा हूँ’, ‘कुहनी की चोट’, ‘दृष्टि’, ‘यह मेरा भाई है’ आदि इनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ हैं।
इनकी लघुकथाएँ एक ओर नारी के स्वर को दृढ़ता से उभारती हैं, तो दूसरी ओर जीवन के श्रेष्ठ और उज्ज्वल पक्ष को वाणी प्रदान करती हुई अँधेरे के खिलाफ अलख जगाती हैं। उर्मि कृष्ण की लघुकथाएँ ‘सादगी में उँचाई’ सिद्धांत को साकार करने वाली रचनाएँ हैं।

कमला चमोला
कमला चमोला मूल रूप से कहानीकार हैं। किंतु, सन 2000 के लगभग से वह लघुकथा-लेखन में भी सार्थक हस्तक्षेप कर रही हैं। हिंदी की प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में इनकी लघुकथाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। सन 2000 में, ‘हंस’ में प्रकाशित रचना ‘लाठी’ इनकी पहली लघुकथा है।
‘भय’ और ‘देश-दिल्ली’ इनकी प्रथिनिधि व बहु-प्रशंसित लघुकथाएँ है। ‘भय’—जहाँ पुरुष की फितरत को सहज लेकिन तिलमिला देने शैली मे सामने लघुकथा है; वहीं ‘देश-दिल्ली’ लघुकथा देश की दुर्दशा का तकलीफदेह बयान है।

अन्य प्रमुख लघुकथाकार
लघुकथा-लेखन में रत राज्य के समस्त रचनाकारों के लघुकथा-कार्य पर टिप्प्णी प्रस्तुत करने की अनुमति यह फार्मेट नहीं देता है। फिर भी, उपर्युक्त लघुकथाकारों के अतिरिक्त विकेश निझावन, मधुकांत, रूप देवगुण, अरुण कुमार, ज्ञानप्रकाश विवेक, हरनाम शर्मा, अनिल शूर आज़ाद, प्रद्युम्न भल्ला, सुरेन्द्र गुप्त, सुरेश जाँगिड़ उदय, प्रेमसिंह बरनालवी, आदि उल्लेखनीय रचनाकार हैं, जो हिंदी लघुकथा-पटल पर आधिकारिक कलम चला रहे है।

संपर्क: 1882, सेक्टर 13, करनाल-132001(हरियाणा)
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लघुकथाएँ

एक और अभिमन्यु
मुकेश शर्मा

बड़बड़ाता हुआ छुन्ना बैठक के भीतर प्रवेश कर गया। सामने नेताजी खाना खा रहे थे, इसीलिए छुन्ना चुपचाप सामने रखी कुर्सी पर जा बैठा। नेताजी की अनुभवी आँखों से छुन्ना की परेशानी छिपी न रह सकी; बोले, “छुन्ना, क्या बात है, कुछ परेशान हो?”
“परेशान तो क्या साब…बस्स…!”
“हूँ…क्या हुआ?”
“साब वो…वो इंसपेक्टर है ना, पुलिसवाला—अभिमन्यु…साब, उसे मालूम है मैं आपका आदमी हूँ…फिर भी साब, साले की आँखों में लिहाज नहीं है!”
“कुछ हुआ भी होगा?”
“साब, आज फिर ढाई लाख का माल पकड़ लिया है। पहले भी ये गिरी हुई हरकत एक-दो बार कर चुका है।”
“हूँ!” नेताजी गंभीर हो गए।
“रात मेरे आदमी ट्रक पर माल लाद रहे थे, साब…चूहा, चूहा साब!”
“हैं?” नेताजी की प्रश्नवाचक दृष्टि उसकी ओर उछली।
“साब, वो आपके पाँव के पास मोटा-सा चूहा है।”
“ओ…” नेताजी नीचे देखते हुए मुस्कराने लगे, “सुनो, क्या रेट है उसका?”
“किसका साब? उस पुलिसवाले का? साब, बड़ा बेईमान आदमी है, रिश्वत के नाम से ही बिदकता है।”
“अच्छा! तब तो वाकई समस्या गंभीर है!” नेताजी ने थाली में हाथ धोए और उसी में कुल्ला करके बोले, “सुनो, ये थाली बाहर रख आओ।”
“जी साब!” छुन्ना मुस्कराते हुए उठा और थाली बाहर रखकर भीतर आ गया।
“कमरे का दरवाजा भीतर से बंद कर लो…और खिड़की भी।”
छुन्ना एक क्षण के लिए हैरान हुआ, किंतु फिर आदेश का पालन करने लगा।
“मेज पर रखे फल फ्रिज में रख दो, यह मिठाई का डिब्बा भी…”
“जी साब!”
“और हाँ, फ्रिज में से एक पनीर का टुकड़ा निकालकर उस चूहे के पिंजरे में लगा दो…अब पिंजरा नीचे रख दो…हाँ, अब बताओ, तुम क्या कह रहे थे।”
“साब, मैं बता रहा था कि…”
छुन्ना अपनी बातों को दोहराने लगा। एकाएक ‘खट’ की आवाज सुनकर छुन्ना चुप हो गया।
“चूहा पिंजरे में फँस गया है। पिंजरे में अटके पनीर के टुकड़े के अतिरिक्त कोई खाने की चीज खुले स्थान पर नहीं थी। इसे भूख लगी होगी।” नेताजी रहस्यमय ढंग से मुसकराए।
“अच्छा साब, अनुमति दीजिए।” छुन्ना एकाएक उठ खड़ा हुआ।
“पर वो तुम्हारा इंसपेक्टर वाला मामला?”
“साब, अब तो यह काम मैं खुद निपटा लूँगा।”
छुन्ना की बात सुन नेताजी जोर-जोर से हँसने लगे।


बौना आदमी
हीरालाल नागर

अंतत: फैसला हुआ कि इस बार भी माँ हमारे साथ नहीं जाएगी। पत्नी और बच्चों को लेकर स्टेशन पहुँचा। ट्रेन आई और हम अपने गंतव्य की ओर चल पड़े। ठीक-से बैठ भी नहीं पाए होंगे कि डिब्बे के शोर को चीरता हुआ फ़िल्मी-गीत का मुखड़ा—‘हम बने तुम बने एक दूजे के लिए’—गूँज उठा। उँगलियों में फँसे पत्थर के दो टुकड़ों की टिक्…टिक्…टिकिर…टिक्…टिक् के स्वर में मीठी पतली आवाज ने जादू का-सा असर किया। लोग आपस में आपस में धँस-फँसकर चुप रह गए।
गाना बंद हुआ और लोग ‘वाह-वाह’ कर उठे। उसी के साथ उस किशोर गायक ने यात्रियों के आगे अपना दायाँ हाथ फैला दिया।
“बाबूजी, दस पैसे!” मेरे सामने पाँच-छ्ह साल का दुबला-पतला लड़का हाथ पसारे खड़ा था।
“क्या नाम है तेरा?” मैंने पूछा।
“राजू।”
“किस जाति के हो?”
लड़का निरुत्तर रहा। मैंने लड़के से अगला सवाल किया, “बाप भी माँगता होगा?”
“बाप नहीं है।”
“माँ है?”
“हाँ है, क्यों?” लड़के ने मेरी तरफ तेज निगाहें कीं।
“क्या करती है तेरी माँ?”
“देखो साब, उलटी-सीधी बातें मत पूछो। देना है तो दे दो।”
“क्या?”
“दस पैसे।”
“जब तक तुम यह नहीं बताओगे कि तुम्हारी माँ क्या करती है, मैं एक पैसा नहीं दूँगा।” मैंने लड़के को छकाने की कोशिश की।
“अरे बाबा, कुछ नहीं करती। मुझे खाना बनाकर खिलाती-पिलाती है और क्या करती है!”
“तुम भीख माँगते हो और माँ कुछ नहीं करती? भीख माँगकर खिलाते हो उसे?”
“माँ को उसका बेटा कमाकर नहीं खिलाएगा तो फिर कौन खिलाएगा?” लड़के ने करारा जवाब दिया। मेरे चेहरे का रंग बदल गया, जैसे मैं उसके सामने बहुत बौना हो गया हूँ।

रिश्तों की पहचान

सुरेन्द्र कुमार अंशुल

“सारी मिस्टर, अब कुछ नहीं हो सकता…।” कहते हुए डाक्टर ने मरीज का निर्जीव हाथ छोड़ दिया था और फिर मरीज की पथराई आँखों को मूँदते हुए चादर सिर उढ़ा दी थी।
“आपकी फीस डाक्टर…?” युवक की दर्द में लिपटी आवाज सुनाई पड़ी।
“रहने दीजिए। जब मैंने कुछ किया ही नहीं तो फीस कैसी? और फिर, इंसानियत भी तो कोई चीज है भई।” युवक के कंधे को थपथपाते हुए डाक्टर ने सहानुभूति व स्नेह दर्शाया था और फिर अपना बैग उठाकर घर से बाहर निकल गया था।
युवक और उसकी पत्नी किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े थे कि क्या करें और क्या न करें।
तभी पत्नी बोली,“सुनो, बाबूजी मर ही चुके हैं…अब कम से कम बाबूजी की उँगली में पड़ी सोने की अँगूठी व हाथ में बँधी घड़ी तो उतार लो…पास-पड़ोस के लोग आने के बाद तो…! व्यर्थ में ही ये कीमती सामान बाबूजी की चिता में…!”
युवक ने पत्नी की ओर देखा और फिर वह लपककर बाबूजी की निर्जीव उँगली से सोने की अँगूठी व हाथ में बँधी घड़ी को उतारने में जुट गया।
और फिर कुछ देर बाद, उस घर से रोने की आवाजें सुनाई पड़ने लगीं। धीरे-धीरे पड़ोस के लोग वहाँ एकत्रित होने लगे थे।

दाग
राजकुमार निजात

रात्रि में वह पहुँचा। बस से उतरकर सीधा अपने मित्र के यहाँ मिलने चला आया। दरवाजा खटखटाया। भीतर से पूछा गया—“कौन है?”
“मैं…दिलीप!”
“दिलीप?”
“हाँ, त्रिवेदीजी का मित्र—दिलीप पंकज।”
दरवाजा खुल गया।
“भीतर चले आइए। कहाँ से आए हैं आप?”
“दूर से आ रहा हूँ।”
“मगर वे तो हैं नहीं। बाहर गए हैं।”
“ओह! मैं तो मित्रवत आया था। समीप के नगर में किसी कार्यक्रम में मुझे आना पड़ा। सोचा, बीस किलोमीटर और सही। उनसे मिलाप हो जाएगा—अत: चला आया था। …अच्छा, रुकूँगा तो यहीं पर ही मैं। आपको असुविधा…?”
“नहीं-नहीं, आप बेफिक्र सोइए। मुझे कोई असुविधा नहीं होगी। …खाना तो खाएँगे न?”
“खाना मैं खा चुका हूँ, धन्यवाद!”
सुबह मेहमान जल्दी ही उठ गया। नहा-धोकर प्रात: पाँच बजे ही वह तैयार हो गया। उसे वापस लौटना था, जल्दी। श्रीमती त्रिवेदी से नमस्ते की। थैला उठाया और चल पड़ा। बाहर अँधेरा खुल गया था। एक-दो व्यक्ति गली में से गुजरे।
सुबह होने तक आस-पड़ोस में चर्चा उभरी—बड़ी पवित्र और चरित्रवाली बनी फिरती है। रात में जाने कौन था वह! अँधेरे-अँधेरे ही भगा दिया उसे। पौ फटने से पहले ही।”
उसने सुना।
उसे लगा—अब वह जीवित नहीं रही। उसे जिंदा ही गाड़ा जा रहा है या लटका दिया गया है, आसमान में कहीं।

आँकड़े
कमला चमोला

वह देह-व्यापार करने वाली औरतों पर शोध कर रही थी। शाश्वत समाजशास्त्रीय विषय था। आँकड़ों के एकत्रीकरण के लिए अक्सर उसे लालबत्ती-क्षेत्र की वर्जित गलियों में जाना पड़ता। आते-जाते कुछ ऊल-जुलूल फब्तियाँ भी कान में पड़ जातीं—नई चिड़िया लगती है…है तो खूबसूरत…नईं रे, मैडमजी हैं…क्यों, मैडमजी के क्या…
आगे का वार्तालाप अश्लील इशारे में हो रहा है—समझ जाती वह। कान में अनसुनेपन की रुई ठूँसती आगे बढ़ जाती। उसे क्या इनकी बकवास से; उसे तो जल्द से जल्द काम खत्म करना है। समय कम है उसके पास। कालेज में पोस्ट विज्ञापित होने ही वाली है प्राध्यापिका की।
यहाँ की औरतों के लिए अब अपरिचित नहीं है वह। देह-व्यापार के पक्ष में इनके अपने ही तर्क हैं—अपनी-अपनी कमाई के ढंग हैं बहना…तू भी तो कलम चलाकर हाथ की कमाई खाती है…पेट भरने को शरीर का कोई न कोई अंग तो बेचना ही पड़ता…।
लिखित-सामग्री का प्रारूप लेकर रोज नरेन्द्रपाल जी के पास जाना पड़ता है उसे। वे भी पूरा सहयोग दे रहे हैं। पोस्ट को अपने रसूख से दो माह के लिए विज्ञापित होने से उन्होंने ही रोक रखा है किसी तरह। उनकी पत्नी का भी पूरा सहयोग है। वे लोग तो काम में जुटे रहते हैं और श्रीमती पाल भरे चाय के कप रखने और खाली कप उठाने में लगी रहती हैं। उसने सोच रखा है—शोध-प्रबंध के धन्यवाद-ज्ञापन में श्रीमती पाल का भी अवश्य आभार प्रकट करेगी। दो-एक केस-स्टडी ही शेष हैं अब तो। आज भी वह जुटी थी काम में।
नरेन्द्रपाल बोले, “इसी हफ्ते काम खत्म करने की कोशिश करो। महीने के अंत तक थीसिस जमा हो जानी चाहिए। दोनों शिक्षक भी मेरे अपने हैं। पन्द्रह दिन के अंदर ही रिपोर्ट भेज देने का वादा ले लिया है उनसे…बस, अब प्राध्यापिका ही समझो अपने-आपको। वशिष्ठजी के दोनों विद्यार्थियों को तो कम से कम छह माह लगेंगे डिग्री लेने में। तुम्हारा रास्ता साफ है।”
“धन्यवाद सर…” कृतकृत्य-सी हो उठी वह।
एकाएक नरेन्द्रपाल ने उसका हाथ खींचा…असंतुलित-सी वह उनकी ओर ढह गई।
“ये…ये क्या सर…?”
“एडवांस में मिठाई माँग रहे हैं भई, और क्या…?”
“पत्नी मायके गई है। आज तो चाय भी तुम्हें ही बनानी पड़ेगी डाक्टर अंजलि। भई, हमारे लिए तो तुम अभी से डाक्टर हो…”
देह-व्यापार का अंतिम आँकड़ा भी पूरा हो गया था।


अनलिखा
हरनाम शर्मा

लंच-बाक्स खुलते ही मेरे चहुँ ओर शुद्ध घी में तली सब्जी की महक फैल गई, जिसका स्वाद मैंने उसे खाकर और निकट बैठे एक मजदूर ने सूँघकर लिया।
वह बैठा किसी को खत लिख रहा था। लिखते-लिखते उसने एक-दो बार मेरी ओर देखा तो मुझे अटपटा-सा लगा। मैंने एक रोटी उसकी ओर बढ़ा दी। उसने कहा, “नहीं बाबूजी, हम खाते हैं।” हालाँकि साफ जाहिर था कि वह कभी खा पाता है, कभी नहीं। दिन-रात मशीनों पर काम करके उसे न तो खाने का अवकाश ही मिलता है और न स्वाद ही।
मैंने आग्रह किया तो उसने कहा,”चार रोटियाँ खा चुकने के बाद मुझे एक रोटी देने का आपका आशय?”
इसका उत्तर यद्यपि मेरे पास नहीं था, किन्तु मैं बोला, “नहीं, खा लो। अगर तुम बुरा न मानो, मैंने केवल औपचारिकतावश पूछा था। इसे कुछ और न समझो।”
उसने मेरे हाथ से रोटी ले ली और तुरन्त बड़ी शालीनता से कहा, “बुरा न मानें, मैं आपकी यह रोटी औपचारिकता से लौटा रहा हूँ। अपनी रोटी मैं वक्त पर खा चुका हूँ।”
मैं हड़बड़ाकर पीछे हटा तो वह भी मुस्कराता हुआ चला गया।
जिस पुरजे पर वह खत लिख रहा था, वह वहीं रह गया। लिखा था—माँ, वहाँ हल चलाकर शाम की रोटी नसीब हो जाती थी। यहाँ न सोने का समय है, न तुम्हें याद करने का…और रोटी खाने का तो न समय है और न पैसे!

निरुत्तर
सत्यवीर मानव

“कहाँ जा रहे हो?”
“मंजिल पर।”
“पर…रास्ता तो इधर है!”
“जाया तो इधर से भी जा सकता है न?”
“पर, बना-बनाया रास्ता छोड़कर?”
“क्या यह रास्ता सदा से है?”
“नहीं तो।”
“फिर?”
“!”