Sunday, 25 October, 2020

डॉ. पुरुषोत्तम दुबे से संतोष सुपेकर की बातचीत

 ख्यात लघुकथाकार एवं समीक्षक डॉ. पुरुषोत्तम दुबे से संतोष सुपेकर की बातचीत

 लघुकथा कभी भी जल्दबाजी की उपज नहीं होती

डॉ॰ पुरुषोत्तम दुबे 


 

    [किसी भी विधा की समृद्धि के लिए उसमें उत्कृष्ट सृजन तो आवश्यक है ही, उसके मूल्यांकन हेतु, विधा के उज्ज्वल भविष्य के लिए, उसके लेखकों को आईना दिखाने हेतु उस विधा में किये गए सृजन की समीक्षा, समालोचना भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है। पिछले कई वर्षों से लघुकथा की समालोचना, सम्पादन, समीक्षा में रत वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर पुरुषोत्तम दुबेजी से लघुकथा को लेकर कुछ ऐसे प्रश्नों पर मैंने चर्चा की जो आज के लेखक को अक्सर दुविधा में डालते हैं-संतोष सुपेकर ]


संतोष सुपेकर : कहा जाता है कि कथ्य अपना शिल्प खुद तय करता है
, लघुकथा लेखक इससे क्या आशय समझे? कृपया किसी उदाहरण से समझाएं तो बेहतर।

डॉ. दुबे : लघुकथा का प्राणतत्त्व लघुकथा का कण्टेण्ट होता है। यह लघुकथाकार पर निर्भर है कि वह लघुकथा के लिए हाथ आए कथ्य को किस तरह सम्प्रेषित कर कथ्य को लघुकथा का आकार दे। लघुकथा में शिल्प का आगमन कथ्य की कलात्मक अभिव्यक्ति से सम्भव है। लघुकथा लेखन में सर्वप्रथम शिल्प पर नहीं, प्रत्युत कथ्य पर विचार किया जाता है। शिल्प तो उस नदी के समान है जो टेढ़े-मेढ़े पथ से गुजरते हुए समुद्र की थाह पा लेती है। लघुकथा में कथ्य को विवेचित करने में शिल्प की सहज उपस्थिति को एक उदाहरण से हल करता हूँ। 'विवेक की आर्थिक समृद्धि और तरक्की दिन-ब-दिन ऐसे बढ़ रही थी मानो गमले का मनी प्लाण्ट।'

प्रश्न २ : क्या सम्प्रेषण की तीव्रता लघुकथा में हमेशा आवश्यक है?

डॉ. दुबे : लघुकथा कभी भी जल्दबाजी की उपज नहीं होती। लघुकथाकार उसके विचारों की भट्टी में कण्टेण्ट को जितना पकाएगा, लघुकथा का कथ्य उतना प्रभावी होकर सामने आएगा। जब कण्टेण्ट विचारों में उबलने लगेगा, तब लघुकथा लेखन की तीव्रता स्वमेव लघुकथाकार में पैदा होगी।

प्रश्न 3. : कहते हैं कि एक लेखक को अपने अंदर के आलोचक को हमेशा जीवित रखना चाहिए, लघुकथाकार इस उलझन में पड़ जाते हैं कि वे पाठक के लिए लिखें या आलोचक के लिए? दूसरे शब्दों में, लघुकथा में क्लिष्टता और शुष्कता को प्राथमिकता दी जाए या सहज सरल लेखन को?

डॉ. दुबे : प्रथमत: लेखक ही आलोचक होता है। वह रचना के लिए विषय वस्तु का चयन आलोचनात्मक दृष्टि को आजमा कर ही करता है। किसी भी लघुकथाकार को लघुकथा लिखते समय यही विचार करना चाहिए कि वह लघुकथा के लिए लघुकथा लिख रहा है। पहले लघुकथा है, फिर पाठक, तदन्तर आलोचक। लघुकथा जितनी सहज और सरल होगी, उतना ही वह पाठकीय तादात्म्य प्राप्त कर सकेगी। आलोचना का काल्पनिक भय लघुकथा की रचना प्रक्रिया को सृजनात्मक साँसें कभी नहीं लेने देता है।

प्रश्न ४ : संवाद आधारित लघुकथा में कथा तत्व का अभाव हो जाता है, इसको लेकर आपका दृष्टिकोण?

डॉ. दुबे : संवाद लघुकथा की अन्त:वस्तु को विस्तार देता है। मेरी दृष्टि में कथा का एक तत्त्व संवाद है। प्राय: संवाद, कथा में निहित चरित्रों के मध्य घटता है। संवाद कथा के अंश हैं, अंशी नहीं।

प्रश्न ५ : सोशल मीडिया में आने से लघुकथा का भला हुआ है या बुरा?

डॉ. दुबे : अब सोशल मीडिया प्रासंगिक हो चुका है। नए लघुकथाकारों के लिए सोशल मीडिया वरदान साबित हो रहा है। देखा जाए तो नए लघुकथाकार फेसबुक या व्हाट्सएप पर अपनी लघुकथाएँ भेज कर अपनी लघुकथाओं पर पाठकीय प्रमाण-पत्र प्राप्त करने में जुटे हुए हैं। एक प्रकार से सोशल मीडिया किसी रचना की सृजनात्मकता को पारित करने में 'क्लियरिंग विण्डो' का काम करता है।

प्रश्न ६ : लघुकथा को लेकर अब भी बहुत सारी 'फ्रेम' हैं। कोई 'लघु' पर जोर देता है तो कोई 'कथा' पर! मशहूर लेखक चार-पाँच पंक्ति की रचना लिखे तो प्रशस्ति पाती है पर कोई नया लेखक ऐसा प्रयास करे तो उसे कमजोर रचना, कथातत्व का अभाव, अधूरी लघुकथा, पंच नहीं है, बताकर नकार दिया जाता है, इस पर आपके विचार?

डॉ. दुबे : यह लघुकथाकार को समझना है कि कथा के जिस कण्टेण्ट को लेकर वह चल रहा है, उसकी गति क्या है, कैसी है और उसका कथ्य कहाँ जाकर समाप्त होता है, यही एक लघुकथा के लिए उसकी 'फ्रेम' कही जाएगी। कथ्य को सम्प्रेषित करने में अनावश्यक बातों से बचकर चलना ही कथ्य की सटीकता पैदा करता है। लघुकथा अर्थ देने लगे यही लघुकथा का 'पंच' है। कोई आलोचक केवल हवा में बात कर लघुकथा की मीमांसा करे, तो ऐसे धमकीले स्वरों को नजरअंदाज कर चलते हुए लघुकथाकार 'लघु' और 'कथा' में सामंजस्य पैदा कर लेगा।

प्रश्न ७ : प्रथम पुरुष में कोई लघुकथा रची जाए तो क्या सावधानी रखी जाए कि वह संस्मरण न लगे?

डॉ. दुबे : सही कहा आपने। प्रथम पुरुष में लघुकथा लिखने के दौरान प्राय: लघुकथाकार पर संस्मरण रचने का आरोप मढ़ा जाता है। 'मैं' की संज्ञा को 'वह' के सर्वनाम की तरह उपयोग में लाकर लघुकथा को संस्मरण के आरोप से बचाया जा सकता है।

प्रश्न ८ : लघुकथा में कालखण्ड दोष और लेखकीय प्रवेश पर आपका दृष्टिकोण?

डॉ. दुबे : कोई एक घटते क्षण का सिरा ही एक संवेदनशील लघुकथाकार को लघुकथा रचना का प्रेरक आधार देता है। अत: समय के उसी एक क्षण की लगाम पकड़कर लघुकथाकार क्षण की बलिहारी से हल आये कथानक को विवेचित करता चलेगा, तो ऐसे में जनित लघुकथा कालदोष के कुचक्र से सर्वथा वंचित रहेगी। कभी-कभी ऐसी दशा में कि लघुकथा का कथ्य लेखक के चरित्र से साम्य खाता हुआ लघुकथाकार की स्मृति पटल पर छाप छोड़ने लगता है, तब लघुकथाकार लघुकथा के प्रणयन में लेखकीय प्रवेश पा लेता है, तो कोई हर्ज की बात नहीं है।

प्रश्न ९ : अब तक लघुकथा सम्मेलन हुए हैं जिसमें लघुकथाएँ पढ़ी जाती हैं आलोचक उन पर चर्चा करते हैं। विधा की सशक्तता के लिए क्या कोई लघुकथा पाठक सम्मेलन भी होना चाहिए?

डॉ. दुबे : लघुकथा सम्मेलन के आयोजन, लघुकथा विधा की बढ़ोतरी तथा विद्या को आयाम देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लघुकथा पर सम्मेलनों के आयोजन सदैव ही लघुकथा की दशा, दिशा और सम्भावनाओं के पक्षों को उजागर करते हैं। अत: ऐसे सम्मेलनों के आयोजन चलते रहने चाहिए। जहाँ तक लघुकथा पाठक सम्मेलन की बात है उसका निदान इसी में छुपा है कि अक्सर लघुकथा सम्मेलनों में भाग लेने के अर्थ में बहुधा लघुकथा में रुचि रखने वाले पाठक भी जुड़ जाया करते हैं। असल में लघुकथा के सम्मेलनों में उपस्थित लघुकथाकार स्वयं पहले लघुकथा के पाठक होते हैं, तदन्तर लघुकथाकार।

प्रश्न १० : कई बार लघुकथा पर सतही और घटनाप्रधान होने के आरोप लगते रहे हैं, इससे कैसे बचा जाए?

डॉ. दुबे : किसी लघुकथा पर सतही होने का आरोप तब ही लग जाता है कि ऐसी लघुकथा या तो जल्दबाजी में लिखी गई है या फिर लघुकथाकार की मानसिकता में लघुकथा की रचना-प्रक्रिया की समझ पैदा नहीं हुई है। घटना के आलोढ़न यदि नहीं होंगे तो लघुकथा कभी सजीव और अर्थवान नहीं हो सकेगी। सवाल यह कि लघुकथाकार अपनी अनुभूति में वासित घटना को सार्वभौमिक रूप दे पाता है अथवा नहीं? व्यक्ति से समष्टि की ओर पहुँचना ही एक लघुकथा की विजय यात्रा है।

प्रश्न ११ : आपकी नजर में लघुकथा में ऐसा कुछ शेष है जो अब तक नहीं रचा गया?

डॉ. दुबे : वैश्विकवाद, बाजारवाद तथा उदारवाद की धारणाओं ने अन्तराष्ट्रीय स्तर पर जहाँ एक ओर दुनिया को एक गाँव बना दिया है वहाँ मनुष्य की पहचान अन्तराष्ट्रीय बना दी है। ऐसी दृष्टि में एक बड़ा 'विजन' खुल गया है। मानवीय सभ्यता कहाँ से चली है और वर्तमान में किस रूप में परिलक्षित हो रही है। इसी विकासक्रम को आज तक का साहित्य रेखांकित करता है। जब तक सृष्टि पर मानवीय हलचल है, लेखन के लिए नए-नए आयामों के परिशिष्ट खुलते मिलेंगे।

सम्पर्क : *डॉ. पुरुषोत्तम दुबे, 'शशीपुष्प', ७४ जे/ए स्कीम न. ७१, इन्दौर-

मो. : ९३२९५८१४१४

             *संतोष सुपेकर, ३१, सुदामा नगर, उज्जैन- / मो. : ९४२४८१६०९६

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