Tuesday, 5 December, 2017

डॉ॰ शकुन्तला किरण से डॉ॰ लता अग्रवाल की बातचीत-1

     कम शब्दों में बहुत-कुछ कहने की कला है लघुकथा         डॉ॰ शकुन्तला किरण



[साथियो ! लघुकथा के क्षेत्र में आदरणीया डॉ॰ शकुन्तला ‘किरण’ जी एक जाना-पहचाना और सम्मानित नाम है। आप देश के किसी भी विश्वविद्यालय में लघुकथा के लिए पंजीकृत पहली शोधार्थी व पीएच॰ डी॰ शोधोपाधि प्राप्त व्यक्तित्व हैं (राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर सन् 1976 में पंजीकृत व सन् 1982 में पीएच॰ डी॰ उपाधि प्राप्त)| इस नाते इस क्षेत्र में आज जो भी इतिहास उपलब्ध है उसमें आपकी बड़ी भूमिका है | आपके द्वारा लिखित आलोचनात्मक पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा’ लघुकथा के महासागर का ऐसा लाइट हाउस है जिससे उस राह के राहगीर और पोत सदैव दिशा और प्रेरणा पाते रहेंगे |
डॉ॰ शकुन्तला किरण

डॉ॰ लता अग्रवाल
सुखद संयोग रहा कि अक्टूबर 2017 में अजमेर यात्रा के दौरान मुझे उनका निकट सान्निध्य मिला | दीदी ने नवें दशक से ही साहित्य पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया देने से स्वयं को दूर रखा था; किन्तु उस दिन मेरे निवेदन पर (जिसकी मैंने कल्पना नहीं की थी, न ही इस तैयारी के साथ उनसे मिलने गयी थी) उनकी अनुमति से, जो प्रश्न उस समय मस्तिष्क में आये मैंने उनसे किये और उन्होंने सहर्ष उन सबके जवाब भी दिए | यहाँ प्रस्तुत है उस लम्बी बातचीत की पहली किस्त| दूसरी किस्त शीघ्र ही इसी ब्लॉग पर जारी की जाएगी।डॉ॰ लता अग्रवाल]                                                    

1. डॉ लता अग्रवाल - दीदी, आप भारत की पहली लघुकथा शोधार्थी रही हैं, इसके लिए बधाई स्वीकार करें।कृपया हमारे लघुकथाकार परिवार को बताएँ कि शोध के लिए ‘लघुकथा’ को विषय के रूप में चुनने का ख्याल आपको कैसे आया ?
डॉ शकुंतला किरण जीधन्यवाद लता | दरअसल मुझे यह सुझाव मुझे स्व. प्रोफेसर कृष्ण कमलेश जी से मिला | मैंने स्वयं इस सम्बन्ध में कभी नहीं सोचा था| किन्तु जब कमलेश जी ने सुझाव दिया, ‘क्यों न लघुकथा पर शोध करो’ तब लगा, चलो पढ़कर देखते हैं | पढ़ा, तो बहुत रोचक विषय लगा और इस तरह यह मेरे शोध का विषय बना |
2. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा की वर्तमान समय में क्या उपादेयता है ?
डॉ शकुंतला किरण आप देख रही हैं आज हिंदी लघुकथा गद्य के सभी कथात्मक स्वरूपों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में न केवल सक्षम सिध्द हुई है अपितु अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों जैसे, प्रकाशन प्रसारण, मंच, संचार क्रांति आदि पर लिखी और पढ़ी जाने वाली सर्वाधिक लोकप्रिय विधा साबित हुई है | यही इसकी उपादेयता सिध्द करती है |
आपने अपने समय में देखा होगा—प्रसाद जी की कथा चाहे वह ‘आकाशदीप’ हो या 65-70 के दौर के किसी अन्य कहानीकार की कोई रचना, जब उसमें नायक-नायिका का वर्णन होता है अक्सर प्रकृति-वर्णन के साथ वातावरण का भी फैलाव मिलता रहा है । उस समय वह सब पढ़कर अच्छा भी लगता था लेकिन आज के पाठक का टेस्ट अलग है |
पहले लोग ‘चन्द्रकान्ता संतति’ बड़े शौक से पढ़ते थे; किन्तु इस यांत्रिकी युग में पाठक साहित्य का आनन्द भी लेना चाहता है और समय की बचत भी चाहता है | यही सब है, जो लघुकथा की मांग करता है |
3. डॉ लता अग्रवाल - साहित्य का उद्देश्य होता है समाज को नीति की राह दिखाना। क्या लघुकथा भी ऐसे ही किसी उद्देश्य को लेकर चलती है ?
डॉ शकुंतला किरणइसे मैं इस तरह कहूँगी की साहित्य सदैव अपने युग का प्रतिनिधित्व करता है। वर्तमान में बदली हुई मानसिकता के साथ कथा-साहित्य का उद्देश्य भी शिक्षात्मक एवं मनोरंजनात्मक से अधिक सामाजिक यथार्थ से पाठकों को अवगत कराना भी हो गया है, जिसके अंतर्गत गलत व्यवस्थाओं पर चोट करना, समाज के साथ व्यक्ति के बाह्य और आंतरिक परिवेश की विकृतियों को उघाड़कर  दिखाना उन पर चोट करना, ओढ़े हुए मुखौटों को नोच फेंकना हो गया है। लघुकथा इन सब उद्देश्यों की पूर्ति करती है |
4. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा अपने समापन के बाद पाठक के मस्तिष्क को झकझोरती  है’ आपके ही इस कथन पर आपके विचार चाहेंगे।
डॉ शकुंतला किरणलघुकथा पाठक को कुछ सोचने पर विवश करे। जैसे आपकी लघुकथा ‘गरीब का लंच बॉक्स’ सोचने पर विवश करती है कि हमारे बाहरी आवरण कितने खोखले हो गये हैं | हम मासूम बच्ची को भी अपनी संवेदनहीनता का शिकार बनाने से नहीं चूक रहे , तो लघुकथा कम से कम पाठक के ह्रदय को कुछ सोचने पर विवश करे, उसे एक चिन्तन बिंदु सौंपे |
5. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा के स्वरूप में कथ्य और तथ्य में परस्पर  तादात्म्य  कहाँ तक होना चाहिए ?
डॉ शकुंतला किरणदोनों का समान रूप से महत्व है | देखिये, तथ्य और कथ्य दोनों लघुकथा के महत्वपूर्ण अंग हैं | आपके पास तथ्य है तो उसे कथा में ढालने के लिए कथ्य की आवश्यकता होगी | इसके लिए आपको प्रभावी प्रस्तुतिकरण  हेतु समस्त परिस्थितियों का निर्माण करना होगा ताकि तथ्य प्रभावशाली बने | पुन: आपकी लघुकथा ‘गरीब का लंचबॉक्स’ से समझने का प्रयास करते हैं |आपके पास तथ्य है—‘एक गरीब लड़की’, जिसे सरकारी योजना के तहत एक सम्पन्न निजी स्कूल में प्रवेश तो मिल जाता है किन्तु स्कूल के शिक्षक और छात्र उसके स्तर का उपहास करते हुए सच को स्वीकार नहीं करना चाहते  |’ यह तथ्य है। इसे सीधे-सीधे कहने पर यह बात पाठकों को इतनी प्रभावित नहीं करेगी  | आपने इसके लिए स्कूल का माहौल रचा, मीरा और कुछ पात्र तैयार किये उनमें एक निक्कू भी है | फिर लंच बॉक्स को लेकर एक शिक्षक के द्वारा संवाद कहलवाए और अंत में कथा को चरमोत्कर्ष देने के लिए निक्कू के ड्राइवर द्वारा वह लंचबॉक्स दिलवाया, जो पाठक के मन में मीरा के प्रति गहरी संवेदना छोड़ गया | यह है तथ्य और कथ्य का संतुलन। यदि केवल मात्र तथ्य या फिर कथ्य ही प्रमुख होगा तो बात न पाठक के मर्म को नहीं छुएगी, न ही इतनी प्रभावोत्पादक होगी |  
6. डॉ लता अग्रवाल - आजकल लघुकथा के शब्द सीमा में निरंतर विस्तार हो रहा है इससे नव लेखकों में बहुत भ्रम की स्थिति है |क्या इसका कोई निश्चित प्रारूप या शब्द सीमा है आपकी दृष्टि में ?
डॉ शकुंतला किरण जी मेरी दृष्टि में, कभी कोई  लघुकथा किसी एक निश्चित शब्द सीमा में नहीं बांधी जा सकती | यह तो कथ्य की मांग पर निर्भर है | आपको मकान बनाना है या अस्पताल ? यह पहले तय करना होगा फिर उसके अनुरूप ही आप भूमि एवं भवन निर्माण के नक्शे का चयन करेंगे न ? तो यह कथ्य की मांग पर निर्भर करता है | हाँ ! इतना अवश्य कहूँगी कि प्रत्येक कथ्य के लिए अलग विधा है। यदि कथ्य लम्बे हैं तो कहानी, मनोरंजन प्रधान हैं तो चुटकुले हैं तथा  तीखेपन के लिए व्यंग्य आदि विधाएं  हैं । हर कथ्य लघुकथा के लिए उपयुक्त नहीं होता । लघुकथा में बात संक्षिप्त , प्रभावशाली तथा  शब्दों के आडम्बर से दूर अपेक्षित है |
7. डॉ लता अग्रवाल - क्या कहानी का ही संक्षिप्त रूप माना जा सकता है लघुकथा को ?
डॉ शकुंतला किरण जी ‘कथ्य’ किसी भी रचना की आत्मा होता है | कहानी और लघुकथा के कथ्य में प्रवृत्तियों और विस्तार की संभावनाओं का अंतर होता है | आप कहेंगे हाथी और चींटी की आत्मा में भला क्या अंतर ? तो कहानी का कथ्य बहिर्मुखी होता है—कमल के फूल की तरह, वहीँ लघुकथा अन्तर्मुखी होती है ठीक आक के फूल की तरह | विस्तार की सम्भावना कथ्य में निहित होती है | जैसे बीज पर निर्भर होता है कि वह दो फीट का गुलाब बनेगा या बीस-तीस फीट का देवदार| हम गुलाब को देवदार नहीं बना सकते, न ही देवदार का आकार गुलाब जितना छोटा कर सकते हैं, यदि किसी तरह प्रयास भी किया जाय तो यह उसकी नैसर्गिकता को समाप्त करना होगा   |
लघुकथा और कहानी में वही अंतर है जो एक तार और पत्र में है। पत्र की तुलना में तार में बहुत कम, सीमित और सार्थक शब्द होते हैं; किन्तु उनका प्रभाव पत्र से ज्यादा होता है | इस दृष्टि से हम कह सकते हैं कि कहानी एक पत्र है और लघुकथातार | हालाँकि वर्तमान यांत्रिक परिस्थितियों के सापेक्ष पत्र एवं तार की महत्ता बहुत कम हो गई है | 
8. डॉ लता अग्रवाल - अक्सर नव लघुकथाकार कहानी के विषय को लेकर ही लघुकथा रच डालते हैं इससे कैसे बचें ?
डॉ शकुंतला किरण - बहुत आसान है । देखिये, जिस तरह एक कमरे की दीवार पर लगे वल्ब के प्रकाश का दायरा लगभग पूरा कमरा होता है फलस्वरूप प्रकाश का घनत्व कमरे में चारों तरफ फ़ैल जाने के कारण कम हो जाता है किन्तु  वहीँ वल्ब टेबल लेम्प पर लगकर टेबल के लघु दायरे में सिमटकर सघन प्रकाश देता है | ठीक इसी तरह कहानी में जीवन की अनेक घटनाएँ जुडी होती है अथवा हो सकती हैं, परिणाम स्वरूप कहानी में  फैलाव बढ़ जाता है और फैलाव के मध्य किसी एक घटना का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता | वहीं, लघुकथा किसी एक काल-विशेष की घटना को प्रस्तुत करती है | फलस्वरूप उसके प्रभाव में घनत्व एवं प्रखरता होती है |
9. डॉ लता अग्रवाल - आपकी दृष्टि में एक सार्थक लघुकथा की क्या कसौटी है ?
डॉ शकुंतला किरणजो पाठकीय सोच को चिन्तन दे, उसके अंतर्मन को झकझोर कर सोचने पर विवश करे वही सार्थक लघुकथा है मेरी दृष्टि में | बस शब्द कम से कम हों, शैली प्रभावशाली हो, कथ्य और तथ्य का सुंदर समन्वय हो | यहाँ स्व. डॉ सतीश दुबे जी की एक लघुकथा ‘पासा’ का जिक्र करना चाहूँगी, पत्नी द्वारा पूछे गये हर प्रश्न के जवाब में पति के द्वारा सिर्फ हाँ, हूँ करने के कारण पहले तो महज औपचारिक संवाद लगते हैं; किन्तु जैसे ही पत्नी कहती है—‘ आज तुम्हारी क्लास फैलो कुसुम आई थी’ पति के जिव्हा पर लगा कर्फ्यू हट जाता है और वह उसके बारे में सब-कुछ जानने को आतुर हो पत्नी पर प्रश्नों की झड़ी लगा देता है, उत्तर में पत्नी का एक वाक्य—‘मैंने उससे ये सभी बाते पूछी थी मगर वह भी हाँ, हूँ ही करती रही’ |
पति,पत्नी के संक्षिप्त संवाद और भाषा की ऐसी कसावट कि एक शब्द या विराम चिन्ह तक भी वाक्य से  हटा लिया जाय तो पूरी कथा लड़खड़ा जाए| किन्तु इस छोटी-सी कथा में जीवन के कई पहलू खुलकर पाठक के सामने आ जाते हैं | कम शब्दों में बहुत कुछ कहने की कला है लघुकथा |
10. डॉ लता अग्रवाल - अपने शोध ग्रन्थ में आपने कहा है – “लघुकथा एक प्रकार से कम आय वाले अर्थशास्त्री का अपना निजी बजट है जिसे वह प्रबुद्धता के साथ बहुत सोच-समझकर इस प्रकार बनाता है कि प्रत्येक पैसे का सदुपयोग हो|” यह पैसे के सदुपयोग की कला के बारे में आपसे जानना चाहेंगे ?
डॉ शकुंतला किरणजी, यहाँ दो बातों की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगी — प्रथम, कम आय वाला साथ ही अर्थशास्त्री भी ; दूसरा, उसका अपना निजी बजट, सरकारी नहीं। एक तो वह अर्थशास्त्री है, मतलब सोच-समझ कर खर्च करने वाला; दूसरा यह बजट उसका अपना है, सरकारी नहीं| अमूमन लोग सरकारी पैसे के लिए इतने गंभीर नहीं होते। क्योंकि पता है—पैसा सरकार का है। यहाँ अपनी जेब से खर्च की बात है तो स्वत: ही सावधान रहता है |जैसे, एक व्यक्ति, जिसकी आमदनी कम है, वह परिवार को चलाने के लिए एक-एक पैसे का सदुपयोग करता है | वह पैसे खर्च करता है उन्हें व्यर्थ उड़ाता नहीं है, लघुकथाकार भी शब्दों का अर्थशास्त्री है|
11. डॉ लता अग्रवाल - कथ्य में विविधता लाने के लिए नव लघुकथाकारों को कोई नुस्खा ?
डॉ शकुंतला किरणविषय में वैविध्य तो है, बस आवश्यकता है लेखक की दृष्टि उसके गंतव्य तक पहुँचनी चाहिए | यह विषय अनुभवगत या वास्तविक लगना चाहिए , कोरी कल्पना के आधार पर न हों |
12. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा की भाषा कैसी होना चाहिए ?
डॉ शकुंतला किरण जीआम आदमी की भाषा जिसे आसानी से समझा जा सके, साथ ही पात्रगत भाषा हो | आप स्वयं सोचिये—एक अनपढ़ व्यक्ति के मुख से पंडिताऊ भाषा, एक बुजुर्ग ग्रामीण महिला के मुख से अंग्रेजी के शब्द, एक शराबी अथवा निम्न तबके के व्यक्ति द्वारा शालीन भाषा क्या सहज लगेगी ...? नहीं न| इससे कथा में स्वाभाविकता का वो रस नहीं आ पायेगा | पात्र शराबी या निम्न प्रवृत्ति का व्यक्ति है तो वैसे शब्द हमें लेने होंगे | यथा, ‘चल बे साले ...उल्लू के पट्ठे ...या फिर अनपढ़ व्यक्ति द्वारा—माई बाप ! म्हारी मजबूरी समझो को नी; ग्रामीण महिला—‘म्हारी तो किस्मत ई बदल गी’ कथा को गतिशीलता देने के लिए यह पात्रगत भाषा बहुत आवश्यक हो जाती है|
13. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा में बिम्ब और प्रतीकों के प्रयोग को आप कहाँ तक आवश्यक मानती हैं ?
डॉ शकुंतला किरणप्रतीक और बिम्ब का प्रयोग उतना ही हो जितना आवश्यक हो,सहजता से आयें | बात को घुमावदार और कथा में चमत्कार उत्पन्न करने के लिए इनका सायास प्रयोग मैं आवश्यक नहीं मानती |
14. डॉ लता अग्रवाल - फेंटेसी का लघुकथा में क्या स्थान है ?
डॉ शकुंतला किरण जीमैं लघुकथा में कल्पनावाद के पक्ष में नहीं। कारण, इसका स्वरूप छोटा है अत: कल्पना के लिए इसमें कोई गुंजाईश नहीं | छोटे से रूप में आप क्या - क्या कल्पना करेंगे | यह तो लेखक को तय करना है कि वह क्या कहना चाहता है ? छोटी बात है तो लघुकथा, उससे छोटी है तो हायकू | अगर उसके मस्तिष्क में कल्पना-लोक या वास्तविक जगत की अनुभूतियाँ  है तो इसके लिए कहानी और उपन्यास हैं न | वैसे भी, आज पाठक का अधिकांश समय तो फेसबुक, लेपटोप और कम्प्यूटर आदि ने ले लिया है। आप यह सोचिये—कम समय में, कम शब्दों में, प्रभावी तौर पर आप क्या दे सकते हैं पाठक को ?
15. डॉ लता अग्रवालसंवाद को रोचक और जीवंत बनाने के लिए कोई मार्गदर्शन दें ?
डॉ शकुंतला किरण जीपुन: कहूंगी पात्र के व्यक्तित्व को मद्देनजर संवादों की रचना की जाय। उन्हें संक्षिप्त करने के लिए थोड़ा-सा होमवर्क किया जाय तो निश्चित ही संवाद अच्छे बन पड़ेंगे |
16. डॉ लता अग्रवाल - कथा में पात्र प्रमुख होना चाहिए या घटनाएँ ?
डॉ शकुंतला किरणघटना नहीं है तो पात्र क्या कहेंगे ? यदि पात्र नहीं है तो घटना कैसे दर्शाई जाएगी ? यह वही बात हो गई—‘एक था राजा, एक थी रानी, दोनों मर गये खत्म कहानी |’ घटना में जीवन्तता लाने के लिए पात्रों की रचना करनी होती है | पात्रों से कहलवाने के लिए घटना गढ़नी पड़ती है | तभी कोई बात पाठक को प्रभावित करती है | दोनों तराजू के दो पलड़ों की तरह अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं |
17. डॉ लता अग्रवाल - आंचलिक परिवेश को चित्रित करते समय लेखक को किन बातों की सावधानी रखना चहिये ?
डॉ शकुंतला किरण जीआंचलिक परिवेश पाठक को नजर भी आना चाहिए | लघुकथा दृश्य सामग्री तो है नहीं, इसे केवल पात्रों के माध्यम से ही अनुभव कर सकते हैं | अत: पात्रों के संवाद या उनकी उपस्थिति के साथ उनके परिधान एवं परिवेशगत चित्रण में दूरदृष्टि एवं सजगता अपेक्षित है |
18. डॉ लता अग्रवाल - शीर्षक का चुनाव करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
डॉ शकुंतला किरण लघुकथा का शीर्षक कथ्य से सम्बन्धित, प्रभावोत्पादक साथ ही रोचक हो |
19. डॉ लता अग्रवाल - नवांकुर लघुकथा लेखकों के लिए क्या सन्देश है ?
डॉ शकुंतला किरणकेवल इसलिए न लिखें की लिखना है,  बजाय इसके कि जो बात, घटना आपको भीतर तक कचोटे; लगे कि इसे शब्द देने ही पड़ेंगे, तब लिखें |
20. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा का उद्देश्य चरित्र एवं विसंगतियों की ओर संकेत करना मात्र है न कि उनका उपचार बताना | ऐसा क्यों?  साहित्य का लक्ष्य तो सर्व कल्याण होता है।
डॉ शकुंतला किरणसर्व कल्याण के लिए  हितोपदेश की कहानियाँ, वेद पुराण के प्रसंग , नैतिक कथाएं, धर्मग्रंथों के उद्दरण ये सब चरित्र निर्माण को आधार बनाकर ही रचे गये हैं | दूसरे, जरा गौर से देखें तो इन लघुकथाओं में भी जब पाठक को उसकी अंतर्चेतना झकझोरती है तो अपने आप वह समस्या के समाधान के बारे में भी सोचता है | अत: यह काम पाठक को ही सौंपे तो बेहतर है |
21. डॉ लता अग्रवालनव-लघुकथाकारों से किस नवाचार की अपेक्षा आप रखते हैं ?
डॉ शकुंतला किरणउनके अपने अनुभव हैं, अनुभूतियां है जो उन्हें  विवश करेंगी। अनुभूति का वेग जितनी तीव्रता लिए होगा, उतना सार्थक लेखन होगा | लेखन में कोई क्षेत्र निश्चित हो, यह मैं उचित नहीं मानती | लेखन को टारगेट बनाकर या सीमा में बांधकर नहीं लिखना चाहिए |
22. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा का भविष्य कैसा देख रही हैं आप ?
डॉ शकुंतला किरणबहुत उज्जवल ! आज लघुकथाओं को लेकर जगह- जगह  प्रतियोगिताएं हो रही हैं, सम्मेलन हो रहे हैं, संगोष्ठियाँ हो रही है, मंच पर पठन हो रहा है , विधागत पत्र- पत्रिकाएँ निकल रही है, लघुकथा विशेषांक निकल रहे हैं, लोग इस बारे में सोच रहे हैं, भले ही वह लेखक बनने की धुन या अन्य किसी धुन में हो रहा है, हलचल तो हो रही है | मतलब लघुकथा प्रभावित कर रही है लेखक और पाठक दोनों को | तो निश्चय ही इसका भविष्य उज्ज्वल लग रहा है |         'दृष्टि' के महिला लघुकथाकार अंक(जनवरी-जुलाई 2018) में प्रकाशित

संपर्क 
डॉ शकुंतला ‘किरण’                                                 
निदेशक, मित्तल  हास्पिटल,                          
पुष्कर रोड, अजमेर (राजस्थान ) – 305004         
shakuntalakiranmittal@gmail.com                                                                            डॉ लता  अग्रवाल
73, यश विला, 
भवानी धाम फेस-1नरेला शंकरी,  
भोपाल – 462041        
agrawallata8@gmail.com

1 comment:

vibha rani Shrivastava said...

संग्रहनीय साक्षात्कार